रविवार, 23 नवंबर 2025

विवाह पंचमी: मर्यादा, समर्पण और संस्कारों की अमर प्रेरणा

 आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

भारतीय संस्कृति सिखाती है कि नित्य कर्म यदि चेतना, श्रद्धा और कर्तव्य भावना के साथ किये जाए, तो वह संस्कार बन जाते हैं। सोलह संस्कारों के साथ ही हम जीवन के प्रत्येक कर्म यथा स्नान, भोजन, शयन, जागरण, कृषि कार्य का आरंभ एवं समापन आदि को भी संस्कार ही मानते हैं। इन कार्यों को पूजा-अर्चना एवं श्रद्धा के साथ करते हैं। यही जीवन दृष्टि हमारी संस्कृति को अतिविशिष्ट बनाती है। संस्कार का अर्थ है- शुद्धिकरण, परिष्कार, सुधार, सभ्य या पवित्र बनाने की क्रिया, अर्थात् अच्छे कर्मों द्वारा मन, वचन एवं शरीर का परिष्कार करना। इसी वजह से संस्कार शब्द का प्रयोग चरित्र, आचरण और जीवन की पवित्रता के संदर्भ में भी किया जाता है।

इसी श्रृंखला में हमारी संस्कृति में विवाह पंचमी का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। यह पावन पर्व भगवान श्रीराम और माता सीता के दिव्य विवाह की स्मृति में प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि 25 नवम्बर को है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण ही नहीं, अपितु धर्म, प्रेम और मर्यादा के शाश्वत मूल्यों के समन्वय का उत्सव है।

अयोध्या और जनकपुर की संयुक्त आस्था - इस दिन भक्तगण व्रत-उपवास रखते हैं, घरों और मंदिरों में मंडप सजाए जाते हैं। कलश स्थापना, दीप प्रज्वलन, भजन-संध्या और रामायण पाठ  का आयोजन होता है। विवाहित दंपती इस दिन अपने मंगलमय दांपत्य जीवन के लिए विशेष रूप से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

यह पर्व भारत और नेपाल के मध्य सांस्कृतिक एकता और सांझी आस्था का भी प्रतीक है। जनकपुर (अब नेपाल में), जिसे माता सीता की जन्मभूमि माना जाता है, में इस पावन अवसर पर विशालविवाह पंचमी मेला’ का आयोजन होता है। वहाँ राम जानकी मंदिर  में श्रीराम और सीता का प्रतीकात्मक विवाह संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। वहीं अयोध्या में कनक भवन  और अन्य मंदिरों में भक्तगण विशेष पूजन-अर्चना करते हैं और सीयावर रामचंद्र जी की जय”  के उद्घोष से सम्पूर्ण नगरी गुंजायमान हो उठती है। दीपों की ज्योति से नगर प्रकाशित हो जाता है। तब विवाह पंचमी हमें यह स्मरण कराती है कि प्रेम, आध्यात्म और मर्यादा ही जीवन का सच्चा आधार हैं।

आदर्श दांपत्य जीवन की प्रेरणा - विवाह पंचमी हमें दाम्पत्य जीवन के उस स्वरूप की याद दिलाती है, जिसमें प्रेम के साथ मर्यादा, त्याग, और परस्पर सम्मान निहित है। वर्तमान समय में, जब वैवाहिक जीवन में अस्थिरता और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं साथ ही वैवाहिक जीवन की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं, इस परिस्थिति में श्रीराम और सीता का आदर्श यह सिखाता है कि सच्चा दाम्पत्य जीवन परस्पर सहयोग, विश्वास, कर्तव्य एवं त्याग पर आधारित होता है, न कि भौतिक आकर्षण पर। कुल-परिवार एवं समाज का हित व्यक्तिगत हित से ऊपर होता है। ‘मैं’ आधारित सोच एवं स्वयं की सुख-सुविधा नहीं अपितु ‘हम’ की भावना एवं सामाजिक धारणाओं का सम्मान ही वैवाहिक जीवन की धुरी होती है। यह सन्देश देती है कि वैवाहिक जीवन मात्र भौतिक संबंध नहीं, अपितु दो आत्माओं का आध्यात्मिक मिलन है, जो धर्म और कर्तव्य से जुड़ा होता है। माता सीता का भगवान राम के साथ वनवास जाने, दर-दर विचरण करने एवं उनके इशारे पर अयोध्या छोड़ने का निर्णय इन्हीं भावनाओं के ज्वलंत उदाहरण हैं।

वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ पुराणों में विशेषकर पद्म पुराण तथा विभिन्न कथा-साहित्य में श्रीराम-सीता विवाह का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण के "पातालखण्ड" में सीता-राम विवाह प्रसंग को धार्मिक, सांस्कृतिक और लोकमर्यादा का आदर्श बताया गया है। इसमें सीता स्वयंवर, शिव धनुष को भंग करना और विवाह की पद्धति को अत्यंत दिव्य और प्रेरक कहकर, संपूर्ण समाज के लिए मर्यादा एवं संस्कारों की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।​ यह प्रसंग इस बात की पुष्टि करता है कि विवाह पंचमी अकेले प्रेम या युगल-मिलन का पर्व नहीं, अपितु मर्यादा, समर्पण और सत्कार्यों की परंपरा का अमर प्रतीक है, जिसमें कर्तव्य, अनुशासन एवं संस्कारों का सर्वोच्चतम स्थान है। यह पर्व हमें पुराणकालीन धार्मिक आदर्शों से जोड़ते हुए समाज को संस्कारशील बनाता है।

संस्कृति का संरक्षण एवं नारी सामान का वैश्विक सन्देश - आधुनिक युग में जब पश्चिमी प्रभावों के कारण सनातनी परंपराएँ क्षीण होती जा रही हैं, यह पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। विवाह पंचमी भारतीय समाज में संस्कार, धर्म और कर्तव्य की भावना को सुदृढ़ करने का माध्यम बनती है। माता सीता के जीवन से समाज यह सीखता है कि नारी शक्ति, धैर्य, और गरिमा की प्रतीक है। आज जब विश्वभर में महिला सशक्तीकरण की चर्चा होती है, तब माता सीता के वैवाहिक जीवन के आदर्श हमें यह बताते हैं कि ढाढस, सौम्यता एवं साहस का अद्भुत संगम नारी के व्यक्तित्व में ही फूलता-फलता है।

सामाजिक एकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्त्रोत - विवाह पंचमी का पर्व सामूहिक उत्सव का प्रतीक है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और शोभायात्राएँ लोगों के बीच सामाजिक सौहार्द और धार्मिक आस्था का वातावरण निर्मित करती हैं। यह पर्व परिवार और समाज में सम्मान, समर्पण और संतुलन के मूल्यों को सुदृढ़ करता है। आज के बदलते सामाजिक परिवेश में यह पर्व हमें संस्कारों, निष्ठा और मर्यादा में निहित अनंत आध्यात्मिक ऊर्जा का स्मरण कराता है।

आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण के बालकाण्ड में सीता द्वारा श्रीराम का दाहिना हाथ अपने बाएं हाथ में लेने की क्रिया का पाणिग्रहण संस्कार के रूप में वर्णन है, जो विवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संस्कार केवल एक सामाजिक रीति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और मानसिक समर्पण का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से वर और वधू एक-दूसरे के जीवन में पूर्ण समर्थन और साथ चलने का संकल्प लेते हैं। पाणिग्रहण का अर्थ है हाथ का ग्रहण, जो मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। यह क्रिया वर वधू के बीच विश्वास, प्रेम, और जिम्मेदारी की नींव रखती है, जो उनके वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और स्थायी बनाती है। पाणिग्रहण संस्कार से दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, जीवन की खुशियों और कठिनाइयों में संयुक्त रूप से आगे बढ़ने का एक-दूसरे को वचन देते हैं।

निष्कर्ष - विवाह पंचमी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी त्रेता युग में थी। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख, मर्यादा, प्रेम, निष्ठा और कर्तव्यपालन में निहित है। श्रीराम और सीता के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपने परिवार और समाज को संस्कारवान बना सकते हैं। वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो टूटते हुए परिवारों को बचा सकते हैं। भगवान श्रीराम और माता सीता के आदर्श विवाह का यह पर्व आज के बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का संदेश देता है। यही इसकी वास्तविक सीख एवं  शाश्वत महत्त्व है। महाकवि तुलसीदस ने ठीक ही कहा है, सिय राम मय सब जग जानी।

(लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

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