सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

दूसरे चरण में 12 राज्यों का होगा SIR, तीन बार आपके घर आएगा BLO, आज रात फ्रीज होगी वोटर लिस्ट


संवाददाता

नई दिल्ली। बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान ही चुनाव आयोग ने कहा था कि एसआईआर पूरे देश में होगा। सोमवार को चुनाव आयोग की अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि दूसरे चरण के तहत 12 राज्यों की वोटर लिस्ट का एसआईआर किया जाएगा। सीईसी ने यह भी कहा कि बिहार में वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन सफलतापूर्वक पूरा हो गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि एसआईआर का फेज वन खत्म हो गया। बिहार के साढ़े सात करोड़ वोटरों ने बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया. 90 हजार बीएलओ और राजनीतिक दलों ने मिलकर मतदाता सूची को शुद्ध बनाने का काम किया। बिहार की मतदाता सूची बिल्कुल साफ हो गई है।

21 साल पहले हुआ था वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण - मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि वोटर लिस्ट की शुद्धिकरण का काम 21 साल पहले 2002-04 में हुआ था। उन्होंने कहा कि इतने सालों में वोटर लिस्ट में कई बदलाव जरूरी है। लोगों का पलायन होता है। इससे एक से ज्यादा जगह वोटर लिस्ट में नाम रहता है। निधन के बाद भी कई लोगों को नाम लिस्ट में रह जाता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि फाइनल मतदाता सूची प्रकाशित करने के बाद अगर किसी को कोई शिकायत रहती है तो वह पहले डीएम को अपील कर सकता है और उसके बाद CEO को भी दे सकते हैं, जिसके बाद व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाएगा।

- मुख्य चुनाव आयुक्त ने क्या अहम बातें कहीं?
- फ्रीज हो जाएंगी 12 राज्यों की वोटर लिस्ट
- नहीं दिखाना होगा कोई कागज
- तीन बार घर आएंगे BLO
- लोग ऑनलाइन भी कर पाएंगे आवेदन


फ्रीज कर दी जाएगी वोटर लिस्ट-- मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त ने यह भी कहा कि जिन भी राज्यों में SIR होगा, वहां आज रात को उन राज्यों में मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया जाएगा। इसके अलावा उन्‍होंने कहा कि आज तक जितने लोगों का नाम मतदाता सूची में है, उन्हें कोई कागज नहीं देना होगा। इसका अर्थ है कि पुराने SIR और अभी के मतदाता सूची में जिनका नाम है, उन्हें कोई कागज नहीं देना होगा।

जानें कब क्या-क्या होगा?

ट्रेनिंग/प्रिंटिंग – 28 अक्टूबर से 3 नवंबर 2025 तक

घर-घर गणना- 4 नवंबर से 4 दिसंबर 2025 तक

ड्राफ्ट मतदाता सूचियों की रिलीज डेट – 9 दिसंबर 2025 तक

दावे और आपत्तियों की अवधि – 9 दिसंबर 2025 से 8 जनवरी 2026 तक

सुनवाई और सत्यापन – 9 दिसंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक

फाइन वोटर लिस्ट – 7 फ़रवरी 2026 तक


सीईसी ज्ञानेश कुमार ने कहा कि BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर तीन बार मतदाताओं के घर जाएंगे। ऑनलाइन भी फॉर्म भरने की सुविधा रहेगी। साथ ही कहा कहा कि मृत लोग, स्थाई तौर पर दूसरे जगह शिफ्ट हो चुके और दो जगह पर रजिस्टर्ड मतदाताओं की पहचान भी BLO करेगा।

सर सैयद अहमद खान: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के महानायक

 प्रो. नीलम महाजन सिंह


मुस्लिम समुदाय के सुधारक, सर सैयद अहमद खान के संघर्ष को सलाम, जिन्होंने शिक्षा, आर्थिक व राजनीतिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को सशक्त बनाने में आजीवन योगदान दिया। उनका जन्म 17 अक्टूबर 1817 को हुआ था व 27 मार्च 1898 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक थे। उन्होंने एडिनबर्ग, यूनाइटेड किंगडम से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ आंदोलन, एम.ए.ओ. कॉलेज, अलीगढ़ की वैज्ञानिक सोसायटी, एस.टी.एस. स्कूल (मिंटो सर्कल), यूनाइटेड पैट्रियटिक एसोसिएशन आदि की शुरुआत की। वे ब्रिटिश साम्राज्य में 'मुंसिफ' के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। उनके पुत्रों डॉ. सैयद महमूद और सैयद हामिद ने अपने प्रख्यात पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। सर सैयद अहमद के भाई ने एक साप्ताहिक, 'सैयदुल अखबार' शुरू किया, जो शुरुआती उर्दू समाचार पत्रों में एक था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है। 
सर सैयद अहमद खान को विभिन्न माध्यमों से वैश्विक श्रद्धांजलि दी जाती है; व्याख्यान, संगोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ, रंगमंच या स्कूलों में साहित्यिक प्रतियोगिताएँ। 'अलीगेरियन' वे लोग हैं जिन्होंने समाज को शिक्षित करने की दिशा में काम किया है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. जी. बालाकृष्णन, भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल, गोपाल सुब्रमण्यम व वरिष्ठ अधिवक्ता बहार यू. बरकी के तत्वावधान में 'एएमयू एलुमनाई इंटरनेशनल' का गठन किया गया है। बहार यू. बरकी कहते हैं, "अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को एक अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में कानूनी दर्जा दिलाने का कार्य भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में विधिक न्यायशास्त्र का विषय बना हुआ है।" सर सैयद अहमद खान व उनके बेटे डॉ. महमूद द्वारा मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के महत्व को उजागर करने में निभाई गई भूमिका के बारे में, बहार यू. बर्की आगे कहते हैं, "अगर मुस्लिम समुदाय शिक्षित और 'इल्म' से समृद्ध हो जाए, तो यह हमें आर्थिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से सशक्त बनाएगा।" पूर्व विदेश मंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, लेखक, सलमान खुर्शीद अपने नाना, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन के कथन को उद्धृत करते हैं, जो शिक्षा को अत्यधिक महत्व देते थे। प्रतिभाशाली फिल्म निर्माता-निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली, अलीगढ़ के शाही व पुश्तैनी परिवार से हैं। 
एएमयू के ज्ञानवर्धक लेखक, राहत अबरार ने कई पुस्तकों में एमएमयू का इतिहास समेटा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों में शामिल हैं; अल्ताफ़ हुसैन हाली, हज़रत मोहानी, माजिद दरियाबादी, रफ़ी अहमद किदवई, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, बेगम आबिदा अहमद, सरदार अली जाफ़री, न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम, अभिनेता राज कुमार, कवि शहरयार, जावेद कासिम और अनगिनत अन्य ... 1838 में अपने पिता की मृत्यु तक, सर सैयद अहमद ख़ान ने एक संपन्न युवा मुस्लिम कुलीन के लिए पारंपरिक जीवन व्यतीत किया। अपने पिता की मृत्यु के बाद, उन्हें अपने दादा व पिता की उपाधियाँ विरासत में मिलीं और सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र द्वारा उन्हें 'आरिफ जंग' की उपाधि से सम्मानित किया गया। नवाब मोहसिन-उल-मुल्क, सर सैयद अहमद खान, न्यायमूर्ति सैयद महमूद, ब्रिटिश राज में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सेवा करने वाले मुस्लिम समुदाय के पहले व्यक्तियों मेें थे। मुगलों की राजनीतिक शक्ति में लगातार गिरावट को देखते हुए, सर सैयद ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में शामिल होने का फैसला किया। वे औपनिवेशिक सिविल सेवा में प्रवेश नहीं कर सके क्योंकि 1860 के दशक में ही भारतीयों को भर्ती किया गया था। उनकी पहली नियुक्ति दिल्ली में 'सद्रर अमीन' के कार्यालय में आपराधिक विभाग के 'सेरेस्टदार' (क्लर्क) के रूप में हुई थी, जो रिकॉर्ड रखने व अदालती मामलों के प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार  थे। फरवरी 1839 में, उन्हें आगरा स्थानांतरित किया व कमिश्नरी के कार्यालय में 'नायब मुंशी' या डिप्टी रीडर के पद पर पदोन्नत किया गया।
1841 में उन्हें फतेहपुर सीकरी का मुंसिफ (उप-न्यायाधीश) नियुक्त किया गया और बाद में 1846 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। वे 1854 तक दिल्ली में रहे। 1855 में उन्हें बिजनौर में 'सद्र अमीन' के पद पर पदोन्नत हुए। 10 मई 1857 को भारतीय विद्रोह के समय सर सैयद, बिजनौर में 'मुख्य कर (tax - revenue) अधिकारी' के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने विद्रोह से कई अधिकारियों व उपने परिवार के सदस्यों की जान बचाई। दिल्ली, आगरा, लखनऊ और कानपुर जैसे तत्कालीन मुस्लिम शक्ति केंद्र बुरी तरह प्रभावित हुए। हालाँकि सर सैयद अपनी माँ को बचाने में सफल रहे, लेकिन मेरठ में उनकी मृत्यु हो गई, क्योंकि उन्होंने कई भावनात्मक कठिनाइयों का सामना किया था।1858 में, उन्हें मुरादाबाद दरबार में एक उच्च पद 'सदर-उस-सुदूर' पर नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने अपनी साहित्यिक कृति 'भारतीय विद्रोह के कारण' पर कार्य शुरू किया। 1864 में वे बनारस गए और 'लघु मामलों के उप-न्यायाधीश' के पद पर पदोन्नत हुए। अप्रैल 1869 में, वे अपने दो बेटों; डॉ॰ सैयद हामिद और डॉ॰ सैयद महमूद के साथ इंग्लैंड गए, जहाँ  डॉ॰ सैयद महमूद ने इंग्लैंड में अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त की। 
सर सैयद 1876 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए और अलीगढ़ में बस गए। 1878 में, उन्हें 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के अतिरिक्त सदस्य के रूप में नामित किया गया, जहाँ उन्होंने जुलाई 1878 से जुलाई 1883 तक सेवा की। उन्होंने 1887 से 1893 तक दो कार्यकालों के लिए उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लेफ्टिनेंट गवर्नर की विधान परिषद की सेवा की। सर सैयद के प्रारंभिक प्रभाव उनकी माँ, बेगम अज़ीज़-उन-निसा व नाना, ख्वाजा फ़रीदुद्दीन थे, दोनों ने उनकी शिक्षा में विशेष रुचि ली। मुगल दरबार में 'वज़ीर' के पद पर कार्यरत होने के अलावा, ख्वाजा फरीदुद्दीन एक शिक्षक, गणितज्ञ व खगोलशास्त्री थे। सर सैयद अहमद खान, सूफीवाद के प्रति समर्पित थे। ख्वाजा ज़ैनुद्दीन अहमद संगीत भी गणित के विशेषज्ञ थे, जिनसे वे प्रभावित हुए। 
सर सैयद के प्रारंभिक धार्मिक लेखन तीन धार्मिक विचारधाराओं से प्रभावित हैं: 'शाह गुलाम अली दहलवी की नक्शबंदी परंपरा', शाह वलीउल्लाह देहलवी, व सैयद अहमद बरेलवी का 'मुजाहिदीन आंदोलन'। वे 'ग़ालिब और ज़ौक़' से प्रभावित हुए, जिनकी उत्कृष्ट गद्य और कविता शैली ने सर सैयद की लेखन शैली को प्रभावित किया। वे अक्सर इमाम बख्श साहबाई और सदरुद्दीन खान अज़ुरदा देहलवी से मिलने जाते थे। उन पर उनके शिक्षक, कंधाला के नूरुल हसन का प्रभाव रहा जो 1840 के दशक के आरंभ में आगरा कॉलेज में अरबी के विद्वान थे। ट्यूनीशियाई सुधारक, हेयर्डिन पाशा के कार्यों ने मुस्लिम समुदाय में सुधार लाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करने के उनके दृष्टिकोण को प्रभावित किया। सर सैयद के प्रिय पश्चिमी लेखक, जॉन स्टुअर्ट मिल, जोसेफ एडिसन और रिचर्ड स्टील आदि थे। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति इकबाल ए. अंसारी, सलमान खुर्शीद, बहार यू. बरकी, सिराजुद्दीन कुरैशी, आरिफ हुसैन और अख्तर आदिल, सर सैयद अहमद खान की विरासत को आगे बढ़ाने में कार्यरत हैं । इस अद्भुत व्यक्तित्व को सलाम। सर सैयद अहमद खान सदेव अमर रहेंगें।

प्रो. नीलम महाजन सिंह

(वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका, दूरदर्शन व्यक्तित्व, राजनीतिक विश्लेषक, शिक्षाविद और समाजसेवी)

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

दिल्ली में कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल, अपराधियों के हौसले बुलंद, भाजपा सरकार सो रही है: सरदार बलविंदर सिंह

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों ने राजधानी की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी है। चोरी, लूट, हत्या, बलात्कार और नशे के व्यापार जैसे अपराधों में बढ़ोत्तरी ने दिल्ली की जनता को असुरक्षित महसूस करने पर मजबूर कर दिया है। यह कहना है राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचन्द्र पवार) के दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष सरदार बलविंदर सिंह का।

सरदार बलविंदर सिंह ने कहा कि दिल्ली की कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे दिनदहाड़े वारदातों को अंजाम दे रहे हैं और पुलिस व सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है।

उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार सिर्फ धर्म और नफरत की राजनीति करने में व्यस्त है, जबकि आम नागरिक की सुरक्षा उनके एजेंडे में कहीं नहीं है। दिल्ली में बढ़ते अपराध यह साबित करते हैं कि बीजेपी ने राजधानी को अपराधियों के हवाले छोड़ दिया है।

बलविंदर सिंह ने आगे कहा कि अगर यही हालात रहे, तो आने वाले चुनावों में जनता भाजपा को जवाब देगी। दिल्ली को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल देने के लिए अब बदलाव जरूरी है।

उन्होंने दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय से भी मांग की कि अपराधों पर सख्त कार्रवाई की जाए, पुलिस बल को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष अभियान चलाया जाए।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

कायस्थ राजवंशो का ऐतिहासिक गौरव

विवेक रंजन श्रीवास्तव

भारतीय समाज में हमेशा कायस्थ समुदाय का एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान  रहा है। परंपरागत रूप से लेखन, प्रशासन और राजकीय कार्यों से जुड़े इस समुदाय ने न केवल प्रशासकों और मंत्रियों के रूप में बल्कि स्वतंत्र शासकों और राजवंशों के रूप में भी भारतीय इतिहास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजा टोडरमल अकबर के प्रमुख दरबारी थे । कायस्थ राजवंशों के ऐतिहासिक योगदान, उनके शासन क्षेत्रों और वर्तमान परिदृश्य में उनकी स्थिति का विश्लेषण इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

कायस्थ समुदाय की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत हैं। पौराणिक परंपरा के अनुसार, कायस्थ चित्रगुप्त के वंशज माने जाते हैं। पद्म पुराण में उल्लेख है कि चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए और उनके कुल बारह पुत्र हुए, जिनसे कायस्थों की विभिन्न उपशाखाएं विकसित हुईं। इतिहासकारों के अनुसार, गुप्त काल से पूर्व ही बंगाल में कायस्थ पद की स्थापना हो चुकी थी। 

बंगाल में कायस्थ समुदाय का इतिहास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मुस्लिम विजय के पश्चात, बंगाली कायस्थों ने क्षेत्र के पुराने हिंदू शासक वंशों सेन, पाल, चंद्र और वर्मन राजवंशों का प्रतिनिधित्व किया। इस प्रकार वे बंगाल के सरोगेट शासक योद्धा बन गए। बंगाली कायस्थ कई कुलों में विभाजित थे, जिनमें कुलीन कायस्थ उच्च श्रेणी के  थे। पारंपरिक कथाओं के अनुसार,  बोस, घोष, मित्रा, गुहा और दत्ता पांच प्रमुख बंगाली कायस्थ उप जातियां थे। गौड़ कायस्थों में नंदी, पाल, इंद्र, कर, भद्र, धर, ऐच, सुर, दाम, बर्धन, शील, चाकी और आध्य जैसे प्रमुख कुल शामिल थे।

ऐतिहासिक अभिलेखों में उल्लेख है कि गौड़ कायस्थों में महाभारत काल के भागदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त जैसे राजा हुए थे। 

मध्यकाल में बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में कायस्थ परिवारों ने स्थानीय शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन परिवारों ने न केवल राजनीतिक सत्ता का प्रयोग किया बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराओं को भी समृद्ध किया। बंगाली कायस्थों का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि वे साहित्य, कला और शिक्षा के क्षेत्र में भी सदैव अग्रणी बने रहे।

दक्षिण भारत में, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश में, कायस्थ राजवंश ने तेरहवीं शताब्दी में शासन किया। यद्यपि वे नाममात्र रूप से काकतीय राजवंश के अधीन थे, किंतु व्यावहारिक रूप से वे स्वतंत्र शासक थे। कायस्थ राजवंश ने आंध्र में पनुगल से मार्जवाड़ी तक विशाल क्षेत्र पर शासन किया, जिसकी राजधानियां वल्लूर और गांडिकोटा थीं। इस राजवंश में चार शासक हुए, जो सभी महान योद्धा और प्रशासक के रूप में विख्यात थे। गांडिकोटा का किला आज भी उनकी स्थापत्य कला और सैन्य दक्षता का प्रमाण है। यह किला अपनी सुरक्षा व्यवस्था और रणनीतिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध था और कायस्थ राजाओं की सैन्य कुशलता को प्रदर्शित करता है।

उत्तर भारत में चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की विभिन्न शाखाएं थीं जिनमें अंभिष्ट, अस्थाना, बाल्मीक, भटनागर इत्यादि  थीं। ग्यारहवीं शताब्दी के बाद के शिलालेखों में विभिन्न क्षेत्रीय वंशों का उल्लेख मिलता है जो उत्तर भारतीय कायस्थों की शाखाओं से संबंधित थे। इन वंशों को उनकी सामान्य व्यावसायिक विशेषज्ञता के साथ पहचाना जाता था और जिनके सदस्य मध्यकालीन राज्यों के प्रशासन में विशेष रूप से प्रभावशाली हो गए थे। कुछ कायस्थों ने  सैन्य कमांडरों और क्षेत्रीय शासकों के रूप में भी पद संभाले। उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में कायस्थ मंत्रियों, सेनापतियों और सलाहकारों के रूप में राजदरबारों में महत्वपूर्ण स्थान थे।

कायस्थों ने केवल राजनीतिक शासन ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में भी अद्वितीय योगदान दिया। चित्रगुप्तवंशी कायस्थ और बंगाली कायस्थ पारंपरिक रूप से प्रारंभिक मध्ययुगीन राज्यों में हिंदू राजाओं के लिए प्रशंसा भाषण और स्तोत्र लिखने के लिए जिम्मेदार थे, जिन्हें प्रशस्ति के रूप में जाना जाता है। वे वित्तमंत्री, सेनाध्यक्ष और शासक के सलाहकार के रूप में नियुक्त किए जाते थे। उनकी लेखन कला, भाषा ज्ञान और प्रशासनिक कौशल ने उन्हें राजदरबारों में अपरिहार्य बना दिया था। कायस्थों ने राजकीय अभिलेखों का रखरखाव, राजस्व प्रबंधन और न्यायिक कार्यों में भी लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ब्रिटिश शासन के दौरान, बंगाली कायस्थों और बंगाली ब्राह्मणों ने उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं में महत्वपूर्ण प्रगति की। उनकी पारंपरिक लेखन और प्रशासनिक कुशलता ने उन्हें औपनिवेशिक प्रशासन में महत्वपूर्ण पद दिलाने में मदद की। इस दौरान कायस्थ समुदाय ने शिक्षा, साहित्य, कला और राजनीति में बहुत अग्रणी भूमिका निभाई। अंग्रेजी शिक्षा को अपनाने में कायस्थ समुदाय अग्रणी रहा और इसने उन्हें आधुनिक व्यवसायों और सेवाओं में प्रवेश का अवसर प्रदान किया। बंगाल में नवजागरण काल में भी कायस्थ समुदाय के कई विद्वानों, लेखकों और सुधारकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आधुनिक भारत में कायस्थ समुदाय एक उच्च शिक्षित और सामाजिक ,आर्थिक रूप से प्रगतिशील समुदाय के रूप में स्थापित है। शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून और कला के क्षेत्र में कायस्थ समुदाय के सदस्यों ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। ऐतिहासिक रूप से लेखन और प्रशासन से जुड़े होने के कारण, समुदाय ने आधुनिक शिक्षा को शीघ्रता से अपनाया और विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की। आज भारतीय नौकरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा जगत और व्यावसायिक क्षेत्रों में कायस्थ समुदाय का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है।

वर्तमान में कायस्थ समुदाय भारतीय राजनीति में सक्रिय भागीदारी रखता है। विभिन्न राज्यों में कायस्थ नेता महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन हैं। हालांकि, परंपरागत शाही परिवारों की तरह राजवंशीय शासन की प्रणाली अब विद्यमान नहीं है, फिर भी कुछ पुराने कायस्थ राजपरिवारों के वंशज अभी भी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कायस्थ समुदाय ने अपनी पारंपरिक प्रशासनिक कुशलता और शिक्षा के प्रति लगाव को बनाए रखते हुए राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया है।

कायस्थ समुदाय अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए सक्रिय रहा है। चित्रगुप्त पूजा, जो कायस्थों का प्रमुख त्योहार है, आज भी बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। विभिन्न कायस्थ सभाओं और संगठनों ने समुदाय के इतिहास, संस्कृति और योगदान को दस्तावेजित करने और प्रचारित करने के प्रयास किए हैं। समुदाय ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और सामाजिक कल्याण संगठनों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कायस्थ पाठशाला, विभिन्न ट्रस्ट और फाउंडेशन समाज के विकास में सक्रिय हैं। ये संस्थाएं न केवल समुदाय के सदस्यों की सहायता करती हैं बल्कि व्यापक समाज के कल्याण में भी योगदान देती हैं।

आधुनिक भारत में कायस्थ समुदाय भी पारंपरिक पहचान और आधुनिक व्यावसायिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है। युवा पीढ़ी में वैश्विक दृष्टिकोण और व्यापक सामाजिक एकीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। साथ ही, समुदाय अपनी ऐतिहासिक विरासत को भुलाए बिना समकालीन भारतीय समाज में अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित कर रहा है। शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता के क्षेत्रों में कायस्थ युवा पीढ़ी नए आयाम स्थापित कर रही है।

कायस्थ समुदाय का इतिहास भारतीय इतिहास का एक समृद्ध अध्याय है। प्राचीन काल में महाभारत के योद्धाओं से लेकर मध्यकाल में बंगाल, आंध्र और उत्तर भारत के शासकों तक, कायस्थों ने राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यद्यपि पारंपरिक राजवंशीय शासन अब इतिहास का हिस्सा बन गया है, किंतु कायस्थ समुदाय ने आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में भी शिक्षा, व्यवसाय, प्रशासन और राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाए रखी है।

चंद्रसेनीय कायस्थ प्रभु (CKP) (महाराष्ट्र और गुजरात) अर्थात पश्चिमी भारत में शासन और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। यह उपजाति आज भी मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गुजरात में प्रशासनिक और पेशेवर क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

कुछ स्रोतों में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंशों का उल्लेख है, जो मध्य भारत में सत्ता में रहे थे। मंडला के गौंड राजाओं ने दीवानी कार्यों के लिए हमारे कायस्थ परिवार को उत्तरप्रदेश से मंडला बुलवाया था , वहां हमारा घर आज भी "महलात" कहलाता है। भोपाल रियासत में भी कायस्थ  बड़े बड़े ओहदों पर रहे हैं। एतमातदोला राजा छक्कू लाल नसरते जंग रियासत के वजीर थे। आखिरी राजा सर अवध नारायण जी रियासत भोपाल के वज़ीर थे उन्होंने  ही रियासत के भारत गणराज्य में शामिल होने के इकरार नामे पर दस्तखत किए थे । आज भी उनका परिवार भोपाल में उनकी कोठी में रहता है । भोपाल में गिन्नौरी की बगिया राजा छक्कू लाल  के समय की आज भी मौजूद है।

वर्तमान में, समुदाय की चुनौती यह है कि वह अपनी गौरवशाली विरासत को संरक्षित करते हुए भी समकालीन भारत के बहुलवादी और समावेशी समाज में सक्रिय योगदान दे। कायस्थ समुदाय की यात्रा प्राचीन शासकों से आधुनिक पेशेवरों तक, परिवर्तन और निरंतरता दोनों की कहानी है, जो भारतीय सभ्यता की गतिशीलता और लचीलेपन को दर्शाती है। इस समुदाय का इतिहास यह सिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य स्थापित करना संभव है और एक समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए भी राष्ट्रीय मुख्यधारा का अभिन्न अंग बन सकता है।

कायस्थ राजवंशों का इतिहास व्यापक और जटिल है, किन्तु कायस्थ जहां भी रहे हैं सदैव प्रभावी बने रहे। (विनायक फीचर्स)

8 हजार फीट ऊंचे शिखर पर 108 फीट के हनुमान

संजीव शर्मा

हिमाचल प्रदेश में ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ शिमला के सबसे लोकप्रिय स्थान मॉल रोड पहुंचते ही दूर पर्वत की चोटी पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा बरबस ही सभी का ध्यान खींच लेती है। इस प्रतिमा और बादलों की आंख मिचौली से शिमला के बदलते मौसम का अंदाजा भी लगता रहता है क्योंकि कभी यह प्रतिमा बादलों में छिपकर अदृश्य हो जाती है तो कभी सूर्य की किरणें को आत्मसात कर दिव्यता से चमकने लगती है। 

यह प्रतिमा इस तरीके से स्थापित की गई है कि मॉल रोड से लेकर इसके आसपास के कई इलाकों से आप हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं और अब यह मॉल रोड के एक प्रमुख आकर्षणों में से एक है।

इस पहाड़ को जाखू हिल्स और हनुमान जी को ‘शिमला के रक्षक’ कहा जाता है। आख़िर, हनुमान चालीसा में ऐसे ही थोड़ी लिखा गया है..’तुम रक्षक काहू को डरना।’

जाखू वाले हनुमान जी केवल एक मंदिर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यहां की गाथा रामायण काल से जुड़ी है और यह अकाट्य आस्था का स्थान है। शिमला की ऊंची चोटियों के बीच, समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह जाखू मंदिर आस्था, प्रकृति और रोमांच का एक अद्भुत संगम है एवं शिमला के 'ताज' से कम नहीं  है।

मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के दौरान युद्ध में मेघनाथ द्वारा शक्ति बाण चलाने से मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय की और जा रहे थे तो अचानक उनकी दृष्टि जाखू पर्वत पर तपस्या में लीन यक्ष ऋषि पर पड़ी। 

संजीवनी बूटी का परिचय जानने के लिए हनुमान जी यहां पर उतर गए।  बताया जाता है कि उनके वेग से जाखू पर्वत जो पहले काफी ऊँचा था, आधा पृथ्वी के गर्भ में समा गया। बूटी का परिचय प्राप्त करने के उपरान्त हनुमान  द्रोण पर्वत की और चले गए। जाखू पर्वत पर जिस स्थान पर हनुमान जी उतरे थे वहां पर आज भी उनके चरण चिन्हों को संगमरमर से निर्मित करके सुरक्षित रखा गया है। 

हनुमान ने ऋषि यक्ष को वापसी में इसी स्थान पर उनसे मिलते हुए लौटने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा के दौरान हनुमान को मार्ग में कालनेमी राक्षस के कुचक्र सहित कई बाधाओं को पार करना पड़ा और समय अधिक लग गया। तब हनुमान समय पर संजीवनी बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने के लिए इस रास्ते की बजाए दूसरे छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए लंका चले गए। जाखू हिल्स पर अन्न जल त्यागकर हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे ऋषि यक्ष की व्याकुलता बढ़ने लगी। उनकी व्याकुलता देख हनुमान जी ने ऋषि को दर्शन दिए और न आने का कारण बताया। उनके अंतर्ध्यान होने के तुरन्त बाद यहां बजरंग बली की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई जो आज भी मन्दिर में पूजी जाती है। 

यक्ष ऋषि ने ही हनुमान जी के यहां ठहराव की स्मृति में इस मन्दिर का निर्माण किया। ऋषि 'यक्ष' के नाम पर ही पर्वत का नाम पहले 'यक्ष' था, जो समय के साथ बदलते हुए 'याक', फिर 'याखू' और अंत में 'जाखू' बन गया।

जाखू मंदिर का अब सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फीट ऊँची सिंदूरी प्रतिमा है । वर्ष 2010 में स्थापित यह मूर्ति इतनी विशाल है कि इसे शिमला के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है। यह प्रतिमा शहर की पहचान बन चुकी है और इसे 'प्राइड ऑफ शिमला' भी कहा जाता है। अब यहां विशाल ध्वज भी स्थापित कर दिया गया है।

जाखू मंदिर तक पहुँचना भी अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। पर्यटक मॉल रोड के रिज मैदान से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल या टैक्सी का उपयोग कर सकते हैं। पैदल रास्ता घने देवदार के जंगल से होकर गुज़रता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। वहीं संकरे पहाड़ी कच्चे-पक्के मार्ग पर टैक्सी की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। वहीं, जो पर्यटक खड़ी चढ़ाई से बचना चाहते हैं उनके लिए जाखू रोपवे एक बेहतरीन विकल्प है। 

रिज मैदान से शुरू होकर यह रोपवे कुछ ही मिनटों में सीधे मंदिर परिसर तक पहुँचा देता है, साथ ही शिमला शहर के मनमोहक नज़ारे भी दिखाता है। जाखू पहाड़ी की चोटी से शिमला शहर, आसपास की चोटियों और घाटियों का मनोरम और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। 

कुल मिलाकर जाखू मंदिर केवल पत्थर और मूर्तियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह सिद्ध स्थान है जहाँ देवत्व और प्रकृति का मिलन होता है इसलिए शिमला की यात्रा जाखू हनुमान के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। (विनायक फीचर्स)

लेखक संजीव शर्मा
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