प्रो. नीलम महाजन सिंह
मुस्लिम समुदाय के सुधारक, सर सैयद अहमद खान के संघर्ष को सलाम, जिन्होंने शिक्षा, आर्थिक व राजनीतिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को सशक्त बनाने में आजीवन योगदान दिया। उनका जन्म 17 अक्टूबर 1817 को हुआ था व 27 मार्च 1898 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक थे। उन्होंने एडिनबर्ग, यूनाइटेड किंगडम से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ आंदोलन, एम.ए.ओ. कॉलेज, अलीगढ़ की वैज्ञानिक सोसायटी, एस.टी.एस. स्कूल (मिंटो सर्कल), यूनाइटेड पैट्रियटिक एसोसिएशन आदि की शुरुआत की। वे ब्रिटिश साम्राज्य में 'मुंसिफ' के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। उनके पुत्रों डॉ. सैयद महमूद और सैयद हामिद ने अपने प्रख्यात पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। सर सैयद अहमद के भाई ने एक साप्ताहिक, 'सैयदुल अखबार' शुरू किया, जो शुरुआती उर्दू समाचार पत्रों में एक था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है।
सर सैयद अहमद खान को विभिन्न माध्यमों से वैश्विक श्रद्धांजलि दी जाती है; व्याख्यान, संगोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ, रंगमंच या स्कूलों में साहित्यिक प्रतियोगिताएँ। 'अलीगेरियन' वे लोग हैं जिन्होंने समाज को शिक्षित करने की दिशा में काम किया है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. जी. बालाकृष्णन, भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल, गोपाल सुब्रमण्यम व वरिष्ठ अधिवक्ता बहार यू. बरकी के तत्वावधान में 'एएमयू एलुमनाई इंटरनेशनल' का गठन किया गया है। बहार यू. बरकी कहते हैं, "अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को एक अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में कानूनी दर्जा दिलाने का कार्य भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में विधिक न्यायशास्त्र का विषय बना हुआ है।" सर सैयद अहमद खान व उनके बेटे डॉ. महमूद द्वारा मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के महत्व को उजागर करने में निभाई गई भूमिका के बारे में, बहार यू. बर्की आगे कहते हैं, "अगर मुस्लिम समुदाय शिक्षित और 'इल्म' से समृद्ध हो जाए, तो यह हमें आर्थिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से सशक्त बनाएगा।" पूर्व विदेश मंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, लेखक, सलमान खुर्शीद अपने नाना, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन के कथन को उद्धृत करते हैं, जो शिक्षा को अत्यधिक महत्व देते थे। प्रतिभाशाली फिल्म निर्माता-निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली, अलीगढ़ के शाही व पुश्तैनी परिवार से हैं।
एएमयू के ज्ञानवर्धक लेखक, राहत अबरार ने कई पुस्तकों में एमएमयू का इतिहास समेटा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों में शामिल हैं; अल्ताफ़ हुसैन हाली, हज़रत मोहानी, माजिद दरियाबादी, रफ़ी अहमद किदवई, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, बेगम आबिदा अहमद, सरदार अली जाफ़री, न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम, अभिनेता राज कुमार, कवि शहरयार, जावेद कासिम और अनगिनत अन्य ... 1838 में अपने पिता की मृत्यु तक, सर सैयद अहमद ख़ान ने एक संपन्न युवा मुस्लिम कुलीन के लिए पारंपरिक जीवन व्यतीत किया। अपने पिता की मृत्यु के बाद, उन्हें अपने दादा व पिता की उपाधियाँ विरासत में मिलीं और सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र द्वारा उन्हें 'आरिफ जंग' की उपाधि से सम्मानित किया गया। नवाब मोहसिन-उल-मुल्क, सर सैयद अहमद खान, न्यायमूर्ति सैयद महमूद, ब्रिटिश राज में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सेवा करने वाले मुस्लिम समुदाय के पहले व्यक्तियों मेें थे। मुगलों की राजनीतिक शक्ति में लगातार गिरावट को देखते हुए, सर सैयद ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में शामिल होने का फैसला किया। वे औपनिवेशिक सिविल सेवा में प्रवेश नहीं कर सके क्योंकि 1860 के दशक में ही भारतीयों को भर्ती किया गया था। उनकी पहली नियुक्ति दिल्ली में 'सद्रर अमीन' के कार्यालय में आपराधिक विभाग के 'सेरेस्टदार' (क्लर्क) के रूप में हुई थी, जो रिकॉर्ड रखने व अदालती मामलों के प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार थे। फरवरी 1839 में, उन्हें आगरा स्थानांतरित किया व कमिश्नरी के कार्यालय में 'नायब मुंशी' या डिप्टी रीडर के पद पर पदोन्नत किया गया।
1841 में उन्हें फतेहपुर सीकरी का मुंसिफ (उप-न्यायाधीश) नियुक्त किया गया और बाद में 1846 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। वे 1854 तक दिल्ली में रहे। 1855 में उन्हें बिजनौर में 'सद्र अमीन' के पद पर पदोन्नत हुए। 10 मई 1857 को भारतीय विद्रोह के समय सर सैयद, बिजनौर में 'मुख्य कर (tax - revenue) अधिकारी' के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने विद्रोह से कई अधिकारियों व उपने परिवार के सदस्यों की जान बचाई। दिल्ली, आगरा, लखनऊ और कानपुर जैसे तत्कालीन मुस्लिम शक्ति केंद्र बुरी तरह प्रभावित हुए। हालाँकि सर सैयद अपनी माँ को बचाने में सफल रहे, लेकिन मेरठ में उनकी मृत्यु हो गई, क्योंकि उन्होंने कई भावनात्मक कठिनाइयों का सामना किया था।1858 में, उन्हें मुरादाबाद दरबार में एक उच्च पद 'सदर-उस-सुदूर' पर नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने अपनी साहित्यिक कृति 'भारतीय विद्रोह के कारण' पर कार्य शुरू किया। 1864 में वे बनारस गए और 'लघु मामलों के उप-न्यायाधीश' के पद पर पदोन्नत हुए। अप्रैल 1869 में, वे अपने दो बेटों; डॉ॰ सैयद हामिद और डॉ॰ सैयद महमूद के साथ इंग्लैंड गए, जहाँ डॉ॰ सैयद महमूद ने इंग्लैंड में अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त की।
सर सैयद 1876 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए और अलीगढ़ में बस गए। 1878 में, उन्हें 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के अतिरिक्त सदस्य के रूप में नामित किया गया, जहाँ उन्होंने जुलाई 1878 से जुलाई 1883 तक सेवा की। उन्होंने 1887 से 1893 तक दो कार्यकालों के लिए उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लेफ्टिनेंट गवर्नर की विधान परिषद की सेवा की। सर सैयद के प्रारंभिक प्रभाव उनकी माँ, बेगम अज़ीज़-उन-निसा व नाना, ख्वाजा फ़रीदुद्दीन थे, दोनों ने उनकी शिक्षा में विशेष रुचि ली। मुगल दरबार में 'वज़ीर' के पद पर कार्यरत होने के अलावा, ख्वाजा फरीदुद्दीन एक शिक्षक, गणितज्ञ व खगोलशास्त्री थे। सर सैयद अहमद खान, सूफीवाद के प्रति समर्पित थे। ख्वाजा ज़ैनुद्दीन अहमद संगीत भी गणित के विशेषज्ञ थे, जिनसे वे प्रभावित हुए।
सर सैयद के प्रारंभिक धार्मिक लेखन तीन धार्मिक विचारधाराओं से प्रभावित हैं: 'शाह गुलाम अली दहलवी की नक्शबंदी परंपरा', शाह वलीउल्लाह देहलवी, व सैयद अहमद बरेलवी का 'मुजाहिदीन आंदोलन'। वे 'ग़ालिब और ज़ौक़' से प्रभावित हुए, जिनकी उत्कृष्ट गद्य और कविता शैली ने सर सैयद की लेखन शैली को प्रभावित किया। वे अक्सर इमाम बख्श साहबाई और सदरुद्दीन खान अज़ुरदा देहलवी से मिलने जाते थे। उन पर उनके शिक्षक, कंधाला के नूरुल हसन का प्रभाव रहा जो 1840 के दशक के आरंभ में आगरा कॉलेज में अरबी के विद्वान थे। ट्यूनीशियाई सुधारक, हेयर्डिन पाशा के कार्यों ने मुस्लिम समुदाय में सुधार लाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करने के उनके दृष्टिकोण को प्रभावित किया। सर सैयद के प्रिय पश्चिमी लेखक, जॉन स्टुअर्ट मिल, जोसेफ एडिसन और रिचर्ड स्टील आदि थे। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति इकबाल ए. अंसारी, सलमान खुर्शीद, बहार यू. बरकी, सिराजुद्दीन कुरैशी, आरिफ हुसैन और अख्तर आदिल, सर सैयद अहमद खान की विरासत को आगे बढ़ाने में कार्यरत हैं । इस अद्भुत व्यक्तित्व को सलाम। सर सैयद अहमद खान सदेव अमर रहेंगें।
प्रो. नीलम महाजन सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका, दूरदर्शन व्यक्तित्व, राजनीतिक विश्लेषक, शिक्षाविद और समाजसेवी)
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