शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

गाय, गोविंद और गौशाला : संस्कृति से समृद्धि की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’

पवन वर्मा


भारत की सभ्यता की जड़ें केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि उस चेतना में हैं जो करुणा, सहअस्तित्व और संवेदनशीलता को जीवन का सार मानती है। उस चेतना का सबसे जीवंत प्रतीक गाय है। जो केवल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय मन, माटी और धर्म का नितांत अभिन्न अंग है। वह खेतों की हरियाली में, लोकगीतों की धुन में, और हमारे उत्सवों के उल्लास में बराबरी से सहभागी रही है। उसे ‘माता’ कहा गया, और यह केवल श्रद्धा नहीं थी। यह उस संबंध की अभिव्यक्ति थी जो जीवन, प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को सबसे स्वाभाविक रूप में दिखाता है। वैदिक दृष्टि और सांस्कृतिक सभ्यता ऋग्वेद का मंत्र “गावो विश्वस्य मातरः” केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सहअस्तित्व की सर्वोच्च घोषणा है। गाय को ‘विश्वमाता’ कहना यह मानना है कि पोषण और करुणा, धर्म और जीवन, एक-दूसरे से विलग नहीं। भारतीय चिंतन में गाय वह माध्यम रही जिससे ग्रामीण समाज में आत्मनिर्भरता आती है, खेत उपजाऊ बनते हैं और परिवार समृद्ध होता है। महाभारत में कहा गया है- “गावः सर्वसुखप्रदाः,” अर्थात गायें समस्त सुख देनेवाली हैं। यह सुख केवल भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। गोपालन, केवल दुग्ध उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। जिसमें त्याग, सेवा और संतुलन का भाव निहित है।  मध्यप्रदेश इस दृष्टि से भारत का एक जीवित उदाहरण है। जहाँ परंपरा, नीति और ग्रामीण जीवन एक-दूसरे में रचे-बसे हैं। नर्मदा की पवित्रता, मालवा की मिट्टी की सुगंध और बुंदेलखंड के लोकगीतों में ‘गोविंद’ और ‘गौ’ की भावना सहज रूप में प्रकट होती है। यहाँ की संस्कृति में गोपालन केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अस्तित्व का हिस्सा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने इस परंपरा को केवल धार्मिक आयोजन के सीमित दायरे से निकालकर नीति की मुख्यधारा में स्थापित किया है। उन्होंने गाय को न केवल श्रद्धा का विषय माना, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्थायी स्तंभ के रूप में देखा। ‘गौशाला विकास’, ‘गोवर्धन पूजा’ और ‘गोपालन संवर्धन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह दृष्टि क्रियान्वित होती दिख रही है।

परंपरा से नीति तक की यात्रा - जहाँ पहले गोवर्धन पूजा केवल घर-आँगन का धर्मिक उत्सव थी, वहीं अब यह मध्यप्रदेश में सामूहिक संकल्प का प्रतीक बन चुकी है। 21 और 22 अक्टूबर, 2025 को राज्यभर में जिस भव्यता से यह पर्व मनाया गया, उसने यह संदेश दिया कि शासन और संस्कृति के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस पर्व को राज्यव्यापी स्वरूप देते हुए ‘गौशाला’ को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र घोषित किया। यह कदम प्रशासनिक दृष्टि से उतना ही दूरदर्शी है जितना सांस्कृतिक रूप से गहरे अर्थों वाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गाय अब केवल पूजा की मूर्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की धुरी है।

नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र - आज मध्यप्रदेश की गौशालाएँ केवल आश्रय स्थल नहीं रहीं। वे ग्रामीण जीवन के आत्मनिर्भर मॉडल के रूप में विकसित हो रही हैं। गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक खेती, वर्मी-कम्पोस्ट निर्माण, पंचगव्य उत्पादों तथा गोबर गैस संयंत्रों ने गाय को कृषि और उद्योग के संगम में पुनः प्रतिष्ठित किया है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है, क्योंकि यह उस विचार का पुनर्जागरण है जिसमें प्रकृति का दोहन नहीं, उसका संवर्धन होता है। गौशालाएँ अब ग्रामीण जनजीवन की प्रयोगशालाएँ हैं, जहाँ सामाजिक आस्था, पर्यावरणीय संरक्षण और आजीविका का समन्वय एक साथ दिखाई देता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि “गावः सर्वं प्राप्यते लोके”, अर्थात गाय से संसार के सभी श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होते हैं। यह आज के संदर्भ में और भी प्रासंगिक है। जैविक खेती को बढ़ावा देने से लेकर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने तक, गाय आधुनिक पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

गोवर्धन पूजा का सामाजिक रूपांतरण - गोवर्धन पूजा अब केवल धार्मिक विधि नहीं रही। यह अब ‘नीति और लोक’ के संगम का अवसर बन चुकी है। जब प्रशासन, समाज और संस्कृति एक साथ किसी पर्व को मनाते हैं, तब वह अनुष्ठान से आगे बढ़कर नीतिगत उद्घोषणा बन जाता है। राज्य के प्रत्येक जिले, गाँव और पंचायत स्तर पर आयोजित गोवर्धन पर्व में जब अधिकारी, किसान, महिलाएँ और विद्यार्थी एक मंच पर आए, तो यह सामाजिक साझेदारी की अनूठी मिसाल बनी। यह आयोजन एक प्रकार से ‘सांस्कृतिक जननीति’ का उदाहरण है, जो विश्वास दिलाता है कि धर्म और विकास विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। 

पर्यावरण और आत्मनिर्भरता की नयी दिशा - ‘गोपालन संवर्धन योजना’ के तहत पंचगव्य आधारित उद्योग और जैविक उत्पादों के निर्माण ने गाँवों में नए अवसर खोले हैं। गोबर से ऊर्जा, खाद और औषधि का निर्माण ग्रामीण भारत की उस परंपरा का पुनर्जीवन है जो आत्मनिर्भरता और सतत जीवनशैली पर आधारित थी।मध्यप्रदेश में अब कई गौशालाओं ने गोबर गैस संयंत्रों के ज़रिए न केवल ऊर्जा संकट को घटाया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर बिजली और ईंधन का भी उत्पादन प्रारंभ किया है। इससे पर्यावरण प्रदूषण घटा है और ग्रामीण समुदायों की आर्थिक बचत भी हुई है। यही वह दृष्टिकोण है जिसमें ‘धर्म नीति बनता है और नीति धर्म का विस्तार करती है।’

शासन और संस्कृति का अभिन्न संबंध- इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब राज्य व्यवस्था अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी रहती है, तब समाज की स्थिरता और विकास साथ-साथ चलते हैं। गाय का संरक्षण, केवल एक प्रशासनिक योजना नहीं, बल्कि ‘संवेदनशील शासन’ की पहचान है। मध्यप्रदेश की यह पहल राजनीतिक अर्थों में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के धरातल पर खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जिस प्रकार गौशालाओं को नीति के केंद्र में रखा, उसने यह सिद्ध किया कि विकास मात्र निर्माण नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा की रक्षा भी है। अथर्ववेद का श्लोक  “गोभिः प्रजाः सुवृता भवन्ति” आज इसी नीति में साकार होता दिखता है। जब गाँवों में गाय की सेवा के माध्यम से जैविक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है, तब यह श्लोक केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि नीति का प्रत्यक्ष रूप बन जाता है।

भारतीयता की परम्परा - गाय की सेवा का अर्थ केवल दूध का संग्रह या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस सोच का पुनर्पाठ है जो कहती है कि मनुष्य और प्रकृति प्रतियोगी नहीं, सहचर हैं। यह दर्शन भारतीयता का मूल है। हमारे यहाँ अर्थ और धर्म कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। आज, जब वैश्विक स्तर पर ‘सस्टेनेबिलिटी’ का विमर्श बढ़ रहा है, तब भारत की यह परंपरा आधुनिक विकास का आधार बन सकती है। गाय, गौशाला और गोवर्धन पूजा इस सोच का जीवंत उदाहरण हैं कि परंपरा केवल अतीत का बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का मार्गदर्शन भी है। ग्रामीण पुनर्जागरण की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’ अब केवल संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण पुनर्जागरण का संग्राम बन चुकी है। आज गाँवों में नयी पीढ़ी समझ रही है कि गोबर सिर्फ अपशिष्ट नहीं, बल्कि संसाधन है। गौमूत्र औषधि का स्रोत है। गाय केवल खेत की सहचरी नहीं, बल्कि पर्यावरण की प्रहरी है। सरकार ने जब इन पहलों को आर्थिक प्रशिक्षण और अनुसंधान से जोड़ा, तब यह योजना आत्मनिर्भर भारत की भावना के अनुरूप बन गई। यह वही आत्मनिर्भरता है जिसके केंद्र में स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वाभिमान तीनों समाहित हैं। 

धर्म और विकास का संगम - स्कन्दपुराण में कहा गया है- “गावो मां पातु सर्वतः,” अर्थात गाय मेरी सर्वत्र रक्षा करे। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक तंत्र का सूत्रवाक्य है, जो बताता है कि जो समाज गाय की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है। जब शासन इस सिद्धांत को अपनाता है, तो नीति में केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं रहते, बल्कि लोककल्याण की भावना जुड़ जाती है। मध्यप्रदेश ने यह दर्शाया है कि धर्म और नीति, भावनाएँ और प्रशासन, परंपरा और तकनीकी नवाचार  सब साथ चल सकते हैं, यदि दृष्टि संवेदनशील और दिशा स्पष्ट हो

संस्कृति से समृद्धि - 21वीं सदी का भारत एक ऐसे दोराहे पर है जहाँ उसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है। मध्यप्रदेश का ‘गौशाला मॉडल’ इस चुनौती का भारतीय उत्तर प्रस्तुत करता है। यहाँ विकास, संस्कृति से पोषण लेता है और संस्कृति विकास से दिशा। जैविक खाद, पंचगव्य औषधियाँ, गोबर गैस संयंत्र और पशुधन आधारित उद्योग न केवल अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी घटाते हैं। यह आधुनिक अर्थशास्त्र का भारतीय संस्करण है  जो बताता है कि लाभ और लोककल्याण में संघर्ष नहीं, संगति संभव है।

संवेदनशील शासन की नई पहचान - मध्यप्रदेश की इस पहल ने यह भी सिद्ध किया है कि शासन केवल कानून लागू करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनमूल्यों को संरक्षित रखने की प्रक्रिया भी है। जब नीति करुणा और संस्कृति से संलिप्त होती है, तब वह ‘शासन’ नहीं, ‘सेवा’ बन जाती है। गोवर्धन पूजा का व्यापक आयोजन केवल प्रशासनिक दक्षता का उदाहरण नहीं, बल्कि उस भावनात्मक एकता का प्रतीक है जो समाज और सरकार को एक सूत्र में बांधती है। जब पंचायत स्तर पर अधिकारी स्वयं गोसेवा में भाग लेते हैं, तब यह कार्यक्रम धार्मिकता से आगे बढ़कर लोकनीति बन जाता है। 

गाय भारतीय जीवन का प्रतीक - “गावो धनं गावो मे जीवनं”  गोपालसहस्रनाम का यह श्लोक गाय की भूमिका को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करता है। गाय न केवल धन है, बल्कि जीवन का पर्याय है। गाँव की आत्मा उसके साथ बसती है। खेत की उपज, परिवार की आराधना और समाज की स्थिरता, तीनों उसकी उपस्थिति से आलोकित होती हैं।आज जब शहरी केंद्रों में जीवन उदासीनता और भौतिकता में उलझा है, तब मध्यप्रदेश का ग्रामीण भारत गाय के माध्यम से पुनः अपनी जड़ों से जुड़ता हुआ दिखता है। यह दृश्य केवल धार्मिक पुनर्जागरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मस्मरण का संकेत है।

नीति, संस्कृति और संवेदना का संगम - गाय, गोविंद और गौशाला। ये तीन शब्द केवल परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की त्रिविध आत्मा हैं। इनका संगम यह सिखाता है कि विकास तब ही टिकाऊ हो सकता है जब वह संस्कृति से प्रेरित और समाज से जुड़ा हो।मध्यप्रदेश ने यह सिद्ध किया है कि धर्म और शासन का मेल किसी टकराव का नहीं, बल्कि सृजन का माध्यम है। यहाँ गोवर्धन पूजा, गौशाला विकास और गोपालन संवर्धन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि नीति का वह रूप हैं जो “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” को भारतीय आत्मा देता है। जब शासन संवेदनशील और दूरदर्शी होता है, तो वह केवल योजना नहीं बनाता,वह जीवन को गढ़ता है, संस्कृति की रक्षा करता है, और समाज को दिशा देता है। यही वह संदेश है जो गाय, गोविंद और गौशाला से निकलता है कि  संवेदनशील विकास ही सच्चा धर्म है, और धर्मसम्मत नीति ही सच्चा विकास है।  (विनायक फीचर्स)

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

अशोक पहलवान बने एनसीपी (एसपी) के नजफगढ़ के जिला अध्यक्ष


संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने संगठन को मज़बूत बनाने और ज़मीनी स्तर पर कार्यों को गति देने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए नजफगढ़ जिले के लिए जिला अध्यक्ष के रूप में अशोक पहलवान की नियुक्ति की घोषणा की। यह नियुक्ति 23 अक्टूबर 2025 से तत्काल प्रभाव से लागू होगी।

इस संबंध में प्रदेश संयोजक इंजीनियर डी. सी. कपिल द्वारा जारी नियुक्ति-पत्र में कहा गया है कि श्री अशोक पहलवान जी को उनके सामाजिक योगदान, संगठनात्मक अनुभव और जनसेवा के प्रति समर्पण को देखते हुए यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है।

प्रदेश संयोजक डी.सी. कपिल ने कहा कि अशोक पहलवान जी लंबे समय से समाज और संगठन के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में नजफगढ़ जिले में पार्टी की संगठनात्मक पकड़ और मजबूत होगी। हमें विश्वास है कि वे पार्टी की विचारधारा और नीतियों को जनता तक प्रभावी रूप से पहुंचाने का कार्य करेंगे।

डी.सी. कपिल ने साथ ही यह भी कहा कि पार्टी का लक्ष्य जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना और जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना है। अशोक पहलवान जी की नियुक्ति इसी दिशा में एक निर्णायक कदम है।

नवनियुक्त जिला अध्यक्ष अशोक पहलवान ने अपनी नियुक्ति पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पार्टी नेतृत्व द्वारा जताए गए विश्वास पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि वे क्षेत्र की जनता के हितों की रक्षा और संगठन के विस्तार के लिए समर्पित रहेंगे।

प्रदेश संयोजक इंजी. डी. सी. कपिल ने श्री अशोक पहलवान जी को नई जिम्मेदारी मिलने पर हार्दिक शुभकामनाएं दीं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

 






शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

भारतीय पर्व-परंपरा का समूह - पंचोत्सव

प्रो. रवि शर्मा 'मधुप'

भारत पर्वों का देश है। यहाँ लगभग प्रति माह या यूँ कहें कि प्रतिदिन ही, कोई-न-कोई पर्व या उत्सव मनाया जाता है, किंतु एक साथ पाँच उत्सव मनाने का अद्भुत संयोग दीपावली के आसपास आता है। इन पाँचों उत्सवों को देश के विभिन्न भागों में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन पाँच उत्सवों में पहला है धनतेरस । दूसरा है नरक चतुर्दशी | तीसरा है दीपावली | चौथा गोवर्धन पूजा तथा पाँचवाँ है भाई दूज ये पाँचों पर्व कार्तिक मास में मनाए जाते हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होकर ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलते हैं। इन पाँचों उत्सवों के संबंध में कुछ बातें इस प्रकार हैं-

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन तेरस मनाया जाता है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा मिलती है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र-मंथन का विचार किया। इतना विशाल समुद्र कैसे मथा जाए? इस प्रश्न के समाधान के लिए समुद्र के बीचों-बीच मंदराचल पर्वत को रखा गया और उसे वासुकि नाग से लपेटकर मथने का निर्णय हुआ। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह समुद्र-मंथन प्रारंभ हुआ। इस समुद्र-मंथन से 14 रत्न निकले, जिनमें विष और अमृत भी थे।

इस समुद्र-मंथन से निकले विष को भगवान शंकर ने अपने कंठ में ले लिया। इस विष के प्रभावस्वरूप उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। समुद्र-मंथन से निकले अमृत को देवताओं के बीच बांट दिया गया, जिस कारण देवता अमर हो गए। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को इसी समुद्र-मंथन से धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर निकले थे, जो आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि धन्वंतरि देव विष्णु जी के अंशावतार हैं, जिन्होंने विश्व में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार के लिए यह अवतार लिया था। भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, कहा भी गया है, "पहला सुख नीरोगी काया, दूजा सुख घर में माया। इसीलिए पंचोत्सव का पहला पर्व धन तेरस है।

कुछ लोग इस दिन को कुबेर का दिन मानते हैं, इसलिए इस दिन को धन की वृद्धि का दिन भी मानते हैं। इस कारण इसे धन तेरस नाम से जाना जाता है। अपने घर में धन की वृद्धि के लिए लोग सोने-चांदी के आभूषण, धातु के बर्तन आदि खरीदते हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार देवताओं को राजा बलि के भय एवं आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए ही श्री विष्णु भगवान ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यग्य स्थल जाकर उनसे तीन पग धरती माँगी। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि को सचेत किया। बलि द्वारा बात न माने जाने पर शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप में प्रवेश कर गए और जल मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, ताकि राजा बलि दान का संकल्प ही न ले सकें। वामन अवतार लिए हुए विष्णु जी इस चाल को समझ गए और कमंडल में कुशा रख दी, जिससे शुक्राचार्य की एक आँख फूट गई। राजा बलि ने भगवान वामन को अपना सब कुछ दान में दे दिया। इस प्रकार राजा बलि ने देवताओं से जो कुछ भी छीना था, उससे कहीं अधिक धन-संपत्ति देवताओं को प्राप्त हुई। इसी उपलक्ष्य में धन तेरस का त्योहार मनाया जाता है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, नर्क निवारण चतुर्दशी या रूप चौदस कहते हैं। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके उसकी कैद से 16000 स्त्रियों को मुक्त करवाया था। नरक चतुर्दशी की रात को यमराज के लिए दीपदान की प्रथा प्रचलित है। लोग दीए जलाकर घर के बाहर रखते हैं, घर की साफ-सफाई करके उसमें विद्यमान कूड़े-करकट रूपी नरक को घर से बाहर निकालते हैं। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि वर्षा ऋतु में घर में सीलन, गंदगी तथा कीट-पतंग हो जाते हैं, जिन्हें साफ़ करके घर को फिर से नया बना लेते हैं। इसी प्रकार, इस दिन हमें केवल बाहरी गंदगी ही नहीं, बल्कि भीतरी गंदगी भी साफ कर लेनी चाहिए, ताकि हम पुनः पवित्र, शुद्ध एवं निर्मल हो जाएँ। इस पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य अपने घर को स्वच्छ बनाकर उसमे उजाला और पूरे घर को आलोकित करना है।

इसी क्रम में कार्तिक मास की अमावस्या को तीसरा पर्व दीपावली मनाया जाता है, जो हिंदुओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पर्व है। दीपावली पर्व के साथ दो कथाएँ जुड़ी हुई हैं। पहली कथा के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को समुद्र-मंथन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं, इसीलिए इन्हें 'समुद्र तनया' या 'सागर पुत्री' भी कहा जाता है। धरती पर धन की देवी लक्ष्मी जी के आगमन की खुशी में घर-आंगन साफ करके दीप जलाए जाते हैं तथा लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। लक्ष्मी जी के साथ शुभ लाभ एवं बु‌द्धिप्रदाता गणेश जी एवं विद्या तथा कलाओं की देवी सरस्वती जी की पूजा का भी विधान मिलता है। इसका कारण संभवतः यह है कि केवल धन से जीवन नहीं चलता, यदि मनुष्य के पास केवल धन हो, तो वह अनेक बुराइयों जैसे आलस्य, नशा आदि का शिकार हो जाता है। इसीलिए धन के साथ-साथ बु‌द्धि और विद्या का होना भी अति आवश्यक है। हमें विद्या की सहायता से धर्मानुकूल तरीकों से धन अर्जित करना चाहिए और उसका सदुपयोग परिवार, समाज एवं राष्ट्रहित में करना चाहिए।

दीपावली से जुड़ा हुआ दूसरा प्रसंग त्रेता युग का है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक मास की अमावस्या को विष्णु जी के अवतार श्री राम लंकापति रावण का वध करके अयोध्या वापस आए थे। उस रात अमावस्या होने के कारण गहरा अंधेरा था, अतः अयोध्यावासियों ने दीपों की पंक्ति से अयोध्या नगरी को प्रकाशित किया। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी संपूर्ण भारत में लोग कार्तिक मास की अमावस्या को घरों में प्रकाश करते हैं। प्रकाश ज्ञान तथा सभी सकारात्मक भावों का प्रतीक है और अमावस्या की रात में अंधकार अज्ञान, अराजकता, दानवी वृत्तियों एवं समस्त नकारात्मक भावों का प्रतीक है, जिसे दूर करने के लिए लोग अपने घरों को प्रकाश से आलोकित करते हैं।

पाँच उत्सवों में चौथा उत्सव है गोवर्धन पूजा या अन्नकूट। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि इसी दिन श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों एवं वहाँ के पशुधन को इंद्र के कोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली से उठाया था। गोवर्धन शब्द ही अपने आप में विशेष अर्थ रखता है। कृषि प्रधान देश भारत में गाय भी संपत्ति का ही रूप मानी जाती थी और गाय की वृ‌द्धि, धन संपदा की वृ‌द्धि के रूप में देखी जाती थी। इस दिन लोग गोवर्धन के प्रतीक रूप में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं और श्री कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाते हैं।

पाँच पर्वों के इस श्रृंखला में पाँचवाँ और अंतिम पर्व है भाई दूज । इसे भैया दूज या यम द्वितीया भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यमराज और यमुना भाई-बहन हैं। यमराज स्वर्ग लोक में रहते हैं, जबकि यमुना मृत्यु लोक अर्थात धरती पर रहती हैं। यमुना को अपने भाई की बहुत याद आती थी। उनकी प्रार्थना पर इसी दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर जाकर भोजन किया था। बहन द्वारा किए गए आदर-सत्कार से प्रसन्न होकर उन्होंने बहन को वरदान दिया कि इस दिन यदि कोई भाई अपनी बहन के हाथ का भोजन ग्रहण करेगा, तो दोनों को दीर्घायु प्राप्त होगी और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कारण, इस पर्व को यम द्वितीया भी कहते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के आपसी प्रेम, सौहार्द और मजबूत रिश्तों का प्रतीक है। इस दिन भाई अपनी बहन के घर जाते हैं। बहन भाई का स्वागत करती है, भोजन कराती है और भाई उसे उपहार देता है।

एक और किंवदंती के अनुसार नरकासुर का वध करने के बाद भगवान कृष्ण अमावस्या के दूसरे दिन अपनी बहन सुभद्रा से मिलने उनके घर गए थे। सुभद्रा ने आरती, तिलक, पुष्प और मिठाइयों से उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। बहन भाई के इसी प्रेमपूर्ण व्यवहार के प्रतीक रूप में यह पर्व मनाया जाता है।

इस प्रकार, पाँच पर्वो का यह समूह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं गौरवशाली पर्व परंपरा की याद तो दिलाता ही है, उत्सवधर्मी भारतवासियों के जीवन में आर्थिक समृ‌द्धि, सुख एवं स्वास्थ्य का उपहार भी लेकर आता है। इसी कारण लगभग पूरे भारत तथा विदेशों में भी यह पंचोत्सव अत्यंत धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

(लेखक प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली विश्ववि‌द्यालय, दिल्ली 110007 निवास - सुर-सदन, डब्ल्यू, जैड. 1987, रानी बाग, दिल्ली 110034 हैं। ई मेल drrvshrma@gmail.com मोबाइल 09811036140)

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

कई साफ संकेत दे रहे हैं बिहार के चुनाव

अवधेश कुमार

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले ही राजनीतिक दलों ने करो या मरो जैसा प्रश्न बनाने की राजनीति की है। राहुल गांधी ने‌ महीनों पहले से ही चुनाव आयोग पर भाजपा के पक्ष में काम करने का आरोप लगाना शुरू किया। उन्होंने डर पैदा किया कि महाराष्ट्र में चुनाव आयोग ने भाजपा को जीताने के लिए मतदाताओं के नाम हटाए और जोड़े तथा मतदान के दौरान आंकड़ों तक में हेरा फेरी की और यही बिहार में दोहराया जाएगा। बड़ी तैयारी से दो बड़ी पत्रकार वार्ताएं आयोजित हुई। स्वयं उन्होंने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाली। इन सबका एक उद्देश्य यह था कि किसी तरह बिहार के लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा तथा चुनाव आयोग के विरोध में आयें, विद्रोह करें, सड़कों पर उतरें और आगामी चुनाव में उसे पराजित किया जा सके। चुनाव आयोग द्वारा पूरे देश के लिए निर्धारित विशेष मतदाता परीक्षण अभियान या एस आई आर की शुरुआत बिहार से करने के कारण भी यह चुनाव शीर्ष राष्ट्रीय मुद्दा बना रहा। हालांकि अंतिम सूची में सारे आरोप धराशायी हुए,किंतु इसका एक परिणाम यह हुआ कि बिहार विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों से इस मायने में काफी भिन्न हो गया है कि देश ही नहीं भारत में रुचि रखने वाले दुनिया की भी दृष्टि यहां लगी हुई है।

बिहार के जमीनी हालात स्पष्ट करते हैं कि राहुल गांधी ,कांग्रेस और अन्य पार्टियों के प्रचंड शोर के बावजूद धरातल पर तथाकथित वोट चोरी मुद्दा बिल्कुल नहीं है। पिछले दो वर्षों से ज्यादा समय से बिहार में यात्रा कर तीसरी शक्ति के रूप में खड़े होने की कोशिश कर रहे जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इसका संज्ञान तक नहीं लिया। चुनाव प्रबंधक होने के कारण उन्हें मतदाता सूचियों, चुनाव की प्रवृत्तियों और परिणाम की अन्य अनेक नेताओं से ज्यादा अधिकृत जानकारी है। उनके एसआईआर के प्रति निरपेक्ष भाव का संदेश लोगों में यही गया कि राहुल गांधी , तेजस्वी यादव या गठबंधन के उनके अन्य साथी जानबूझकर चुनाव आयोग के साथ भाजपा के वरुद्ध लोगों के अंदर आक्रोश पैदा  करने की रणनीति पर चल रहे हैं। इस रणनीति का विपक्ष के लिए सबसे बड़ी क्षति हुई कि चुनाव पूर्व के एक महत्वपूर्ण काल में बिहार सरकार के विरुद्ध संभावित मुद्दे भी उभर नहीं सके।जो मुद्दे है नहीं उसे बड़े-बड़े झूठ के आधार पर आप आरोप लगाते हैं, उत्तेजना पैदा करते हैं तो आम लोगों में विरुद्ध प्रतिक्रिया होती है और जमीन पर आपकी विश्वसनीयता कमजोर होती है। बिहार में एसआईआर को लेकर लोगों के अंदर यही भाव है और इसका चुनाव पर भी न्यूनाधिक असर पड़ना है।  राजद और  तेजस्वी यादव को इसका भान हुआ तो उस यात्रा के बाद बिहार अधिकार यात्रा में निकले। नाम में अधिकार यात्रा शब्द रहा लेकिन वोटर की जगह बिहार आ गया। इसमें उन्होंने सामान्य मुद्दे अवश्य उठाएं। वोटर अधिकार यात्रा के बारे में राजद की प्रमुखता वाले गठबंधन के समर्थकों की टिप्पणी यही है कि जितनी ऊर्जा, संसाधन उसमें लगाए गए उससे वास्तव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को ही लाभ हुआ।

अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय वातावरण ने भी विधानसभा चुनाव को हमेशा प्रभावित किया है और बिहार में इसका असर दिख रहा है। कुछ समय से दुनिया ऐसे मोड़ पर है जहां भारत के हर व्यक्ति के अंदर राजनीतिक निर्णय को लेकर सतर्कता बढ़ीहै। नेपाल की हिंसक उथल-पुथल के बाद आयोजित होने के कारण बिहार चुनाव इससे बिल्कुल अप्रभावित नहीं हो सकता। उसके पूर्व बांग्लादेश तथा श्रीलंका और इसी तरह आंदोलन में भारत के अंदर ऐसे ही करने के साफ दिखते प्रयासों के कारण बहुत बड़े वर्ग को शांति, स्थिरता, विकास और सुरक्षा पर ज्यादा संवेदनशील बनाया है। ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद कुछ देशों के भारत विरोधी रवैये से राष्ट्रवाद का भाव ज्यादा प्रखर हुआ है। बिहार क्षेत्रवाद की सोच से राजनीतिक व्यवहार करने वाला राज्य नहीं रहा। पूरे देश में हिंदुत्व के आधार पर भाजपा का एक ठोस वोट बैंक बन चुका है और चुनावों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वक्फ संशोधन कानून पर मुस्लिम संगठनों के साथ राजद, कांग्रेस आदि के खड़ा होने तथा मुस्लिम कट्टरपंथ की घटनाओं पर उनकी चुप्पी के विरुद्ध गैर मुसलमानों के बड़े वर्ग में प्रतिक्रिया है । कांग्रेस के कारण विपक्ष जहां एसआईआर में फंसा रहा वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और केंद्र सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर से लेकर ,अपनी विदेश नीति, रक्षा नीति को लोगों तक पहुंचाने के अभियान चलाएं, प्रधानमंत्री ने लाल किले से लोगों को सीमा के साथ धार्मिक और नागरिक स्थलों की सुरक्षा के प्रति सचेत करते हुए सुदर्शन चक्र की योजना रखी,  सरकार जीएसटी में कटौती का बड़ा कर सुधार लेकर आ गई जिससे परिवारों को खर्चे में थोड़ी राहत मिल रही है। भाजपा इसे लेकर जनता के बीच गई जिसमें बिहार भी शामिल है। हालांकि भाजपा-जदयू और राजग केवल इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित नहीं है। सच कहें तो विपक्ष के अभियान के समानांतर प्रधानमंत्री लगातार रेल, सड़क, हवाई अड्डा, अस्पताल, कॉलेज , स्कूल सहित आधारभूत संरचना एवं विकास परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास करते रहे तो दूसरी ओर कई योजनाओं में महिलाओं, किसानों, मजदूरों आदि के खाते में सीधे रकम स्थानांतरित हुई। इनमें मुख्यमंत्री रोजगार योजना के तहत करीब 1 करोड़ महिलाओं के खाते में भेजे गए 10 हजार रुपए तथा रोजगार में निवेश करने के प्रमाण पर भविष्य में दो लाख देने के वायदे से भी वातावरण बनाया है। यह कितना उचित है अनुचित इस पर बहस हो सकती है किंतु महिलाओं के बड़े वर्ग का वोट इससे राजग की ओर आने की संभावना बढ़ गई है। इसी तरह जीविका दीदी ने भी राजग के पक्ष में महिलाओं का सुदृढ़ीकरण किया है।

बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव के समय तेजस्वी यादव की जबरदस्त लोकप्रियता थी, किंतु उपमुख्यमंत्री बनने के बाद जबसे विपक्ष में आए हैं वैसे स्थिति बिल्कुल नहीं है। बार-बार पाला बदलने और बीच के काल में तिलमिलाहट भरे वक्तव्यों और व्यवहारों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि कमजोर हुई थी। एक बड़ा समूह उनसे छुटकारा भी चाहने लगा था। पिछले सात आठ महीना में स्थिति काफी बदली है। भाजपा की नीति इस समय दिल्ली तथा उसके पूर्व हरियाणा, महाराष्ट्र में मिली जीत को कायम रखने की है। इसलिए वह किसी किस्म का जोखिम नहीं लेना चाहती। नीतीश कुमार को लेकर भाजपा के स्वर पूरी तरह बदल गए। एक-एक नेता उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने तथा पुनः उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाए जाने का बयान दे रहे हैं। इसमें तेजस्वी यादव या अन्य नेताओं का यह कहना कि भाजपा चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी जनता के गले नहीं उतर रहा। प्रशांत किशोर ने लगातार अपनी यात्राओं , सभाओं और वक्तव्यों से बिहार से जुड़े अनेक आवश्यक, लोगों को स्पर्श करने वाली मुद्दे उठाए। इससे जन जागरण हुआ है। उन्होंने लालू यादव परिवार से लेकर भाजपा के प्रमुख नेताओं पर भी तीखे हमले किए हैं। बावजूद बिहार का वर्तमान राजनीतिक समीकरण बदल जाने की संभावना जमीन पर बिल्कुल नहीं दिखती है। मतदाताओं के सामने प्रश्न है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी और प्रदेश में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार को कायम रखकर राजनीतिक स्थिरता ,सामाजिक न्याय, शांति, विकास, मुस्लिम कट्टरपंथ का सरकार द्वारा नियंत्रण और सुरक्षा के प्रति निश्चिंत रहें या कुछ स्थानीय मुद्दों के कारण उनके विरुद्ध जाएं? इस सोच में विपक्ष के पक्ष में बहुमत मत नहीं दे सकता।

बिहार में जातीय सामाजिक समीकरण को प्रमुख कारक माना जाता रहा है। किंतु बिहार में हमने 2005 , 2010, 2014 और 2019 में बहुत बड़ी संख्या में लोगों को जातीय सीमाओं से उठकर मतदान करते भी देखा है। वैसे अभी तक प्रदेश में नीतीश कुमार और केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग के सामाजिक समीकरण में भी क्षरण के संकेत नहीं हैं तो दूसरी ओर राजग नेतृत्व वाले गठबंधन में नए प्रभावी सामाजिक वर्गों के जुड़ने का भी कोई प्रमाण नहीं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पिछले चुनाव में चिराग पासवान की लोजपा का राजग से बाहर आकर 137 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने के परिणामस्वरूप राजद गठबंधन को समतुल्य मत प्रतिशत एवं सीटें प्राप्त हुईं । लोजपा गठबंधन में है तथा जीतन राम मांझी के हम एवं उपेंद्र कुशवाहा के लोकतांत्रिक मोर्चा के कारण शक्ति बढ़ी है। राजद नेतृत्व वाले गठबंधन में पशुपति पारस, विकासशील इंसान पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा इसकी भरपायी करेंगे ऐसा नहीं लगता।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का...

संजीव शर्मा

मोबाइल फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्तिया परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?

हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।

दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।

बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं।

हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों।

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और 2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का। (विनायक फीचर्स)

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