शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

भारतीय पर्व-परंपरा का समूह - पंचोत्सव

प्रो. रवि शर्मा 'मधुप'

भारत पर्वों का देश है। यहाँ लगभग प्रति माह या यूँ कहें कि प्रतिदिन ही, कोई-न-कोई पर्व या उत्सव मनाया जाता है, किंतु एक साथ पाँच उत्सव मनाने का अद्भुत संयोग दीपावली के आसपास आता है। इन पाँचों उत्सवों को देश के विभिन्न भागों में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन पाँच उत्सवों में पहला है धनतेरस । दूसरा है नरक चतुर्दशी | तीसरा है दीपावली | चौथा गोवर्धन पूजा तथा पाँचवाँ है भाई दूज ये पाँचों पर्व कार्तिक मास में मनाए जाते हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होकर ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलते हैं। इन पाँचों उत्सवों के संबंध में कुछ बातें इस प्रकार हैं-

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन तेरस मनाया जाता है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा मिलती है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र-मंथन का विचार किया। इतना विशाल समुद्र कैसे मथा जाए? इस प्रश्न के समाधान के लिए समुद्र के बीचों-बीच मंदराचल पर्वत को रखा गया और उसे वासुकि नाग से लपेटकर मथने का निर्णय हुआ। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह समुद्र-मंथन प्रारंभ हुआ। इस समुद्र-मंथन से 14 रत्न निकले, जिनमें विष और अमृत भी थे।

इस समुद्र-मंथन से निकले विष को भगवान शंकर ने अपने कंठ में ले लिया। इस विष के प्रभावस्वरूप उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। समुद्र-मंथन से निकले अमृत को देवताओं के बीच बांट दिया गया, जिस कारण देवता अमर हो गए। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को इसी समुद्र-मंथन से धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर निकले थे, जो आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि धन्वंतरि देव विष्णु जी के अंशावतार हैं, जिन्होंने विश्व में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार के लिए यह अवतार लिया था। भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, कहा भी गया है, "पहला सुख नीरोगी काया, दूजा सुख घर में माया। इसीलिए पंचोत्सव का पहला पर्व धन तेरस है।

कुछ लोग इस दिन को कुबेर का दिन मानते हैं, इसलिए इस दिन को धन की वृद्धि का दिन भी मानते हैं। इस कारण इसे धन तेरस नाम से जाना जाता है। अपने घर में धन की वृद्धि के लिए लोग सोने-चांदी के आभूषण, धातु के बर्तन आदि खरीदते हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार देवताओं को राजा बलि के भय एवं आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए ही श्री विष्णु भगवान ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यग्य स्थल जाकर उनसे तीन पग धरती माँगी। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि को सचेत किया। बलि द्वारा बात न माने जाने पर शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप में प्रवेश कर गए और जल मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, ताकि राजा बलि दान का संकल्प ही न ले सकें। वामन अवतार लिए हुए विष्णु जी इस चाल को समझ गए और कमंडल में कुशा रख दी, जिससे शुक्राचार्य की एक आँख फूट गई। राजा बलि ने भगवान वामन को अपना सब कुछ दान में दे दिया। इस प्रकार राजा बलि ने देवताओं से जो कुछ भी छीना था, उससे कहीं अधिक धन-संपत्ति देवताओं को प्राप्त हुई। इसी उपलक्ष्य में धन तेरस का त्योहार मनाया जाता है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, नर्क निवारण चतुर्दशी या रूप चौदस कहते हैं। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके उसकी कैद से 16000 स्त्रियों को मुक्त करवाया था। नरक चतुर्दशी की रात को यमराज के लिए दीपदान की प्रथा प्रचलित है। लोग दीए जलाकर घर के बाहर रखते हैं, घर की साफ-सफाई करके उसमें विद्यमान कूड़े-करकट रूपी नरक को घर से बाहर निकालते हैं। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि वर्षा ऋतु में घर में सीलन, गंदगी तथा कीट-पतंग हो जाते हैं, जिन्हें साफ़ करके घर को फिर से नया बना लेते हैं। इसी प्रकार, इस दिन हमें केवल बाहरी गंदगी ही नहीं, बल्कि भीतरी गंदगी भी साफ कर लेनी चाहिए, ताकि हम पुनः पवित्र, शुद्ध एवं निर्मल हो जाएँ। इस पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य अपने घर को स्वच्छ बनाकर उसमे उजाला और पूरे घर को आलोकित करना है।

इसी क्रम में कार्तिक मास की अमावस्या को तीसरा पर्व दीपावली मनाया जाता है, जो हिंदुओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पर्व है। दीपावली पर्व के साथ दो कथाएँ जुड़ी हुई हैं। पहली कथा के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को समुद्र-मंथन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं, इसीलिए इन्हें 'समुद्र तनया' या 'सागर पुत्री' भी कहा जाता है। धरती पर धन की देवी लक्ष्मी जी के आगमन की खुशी में घर-आंगन साफ करके दीप जलाए जाते हैं तथा लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। लक्ष्मी जी के साथ शुभ लाभ एवं बु‌द्धिप्रदाता गणेश जी एवं विद्या तथा कलाओं की देवी सरस्वती जी की पूजा का भी विधान मिलता है। इसका कारण संभवतः यह है कि केवल धन से जीवन नहीं चलता, यदि मनुष्य के पास केवल धन हो, तो वह अनेक बुराइयों जैसे आलस्य, नशा आदि का शिकार हो जाता है। इसीलिए धन के साथ-साथ बु‌द्धि और विद्या का होना भी अति आवश्यक है। हमें विद्या की सहायता से धर्मानुकूल तरीकों से धन अर्जित करना चाहिए और उसका सदुपयोग परिवार, समाज एवं राष्ट्रहित में करना चाहिए।

दीपावली से जुड़ा हुआ दूसरा प्रसंग त्रेता युग का है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक मास की अमावस्या को विष्णु जी के अवतार श्री राम लंकापति रावण का वध करके अयोध्या वापस आए थे। उस रात अमावस्या होने के कारण गहरा अंधेरा था, अतः अयोध्यावासियों ने दीपों की पंक्ति से अयोध्या नगरी को प्रकाशित किया। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी संपूर्ण भारत में लोग कार्तिक मास की अमावस्या को घरों में प्रकाश करते हैं। प्रकाश ज्ञान तथा सभी सकारात्मक भावों का प्रतीक है और अमावस्या की रात में अंधकार अज्ञान, अराजकता, दानवी वृत्तियों एवं समस्त नकारात्मक भावों का प्रतीक है, जिसे दूर करने के लिए लोग अपने घरों को प्रकाश से आलोकित करते हैं।

पाँच उत्सवों में चौथा उत्सव है गोवर्धन पूजा या अन्नकूट। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि इसी दिन श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों एवं वहाँ के पशुधन को इंद्र के कोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली से उठाया था। गोवर्धन शब्द ही अपने आप में विशेष अर्थ रखता है। कृषि प्रधान देश भारत में गाय भी संपत्ति का ही रूप मानी जाती थी और गाय की वृ‌द्धि, धन संपदा की वृ‌द्धि के रूप में देखी जाती थी। इस दिन लोग गोवर्धन के प्रतीक रूप में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं और श्री कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाते हैं।

पाँच पर्वों के इस श्रृंखला में पाँचवाँ और अंतिम पर्व है भाई दूज । इसे भैया दूज या यम द्वितीया भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यमराज और यमुना भाई-बहन हैं। यमराज स्वर्ग लोक में रहते हैं, जबकि यमुना मृत्यु लोक अर्थात धरती पर रहती हैं। यमुना को अपने भाई की बहुत याद आती थी। उनकी प्रार्थना पर इसी दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर जाकर भोजन किया था। बहन द्वारा किए गए आदर-सत्कार से प्रसन्न होकर उन्होंने बहन को वरदान दिया कि इस दिन यदि कोई भाई अपनी बहन के हाथ का भोजन ग्रहण करेगा, तो दोनों को दीर्घायु प्राप्त होगी और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कारण, इस पर्व को यम द्वितीया भी कहते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के आपसी प्रेम, सौहार्द और मजबूत रिश्तों का प्रतीक है। इस दिन भाई अपनी बहन के घर जाते हैं। बहन भाई का स्वागत करती है, भोजन कराती है और भाई उसे उपहार देता है।

एक और किंवदंती के अनुसार नरकासुर का वध करने के बाद भगवान कृष्ण अमावस्या के दूसरे दिन अपनी बहन सुभद्रा से मिलने उनके घर गए थे। सुभद्रा ने आरती, तिलक, पुष्प और मिठाइयों से उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। बहन भाई के इसी प्रेमपूर्ण व्यवहार के प्रतीक रूप में यह पर्व मनाया जाता है।

इस प्रकार, पाँच पर्वो का यह समूह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं गौरवशाली पर्व परंपरा की याद तो दिलाता ही है, उत्सवधर्मी भारतवासियों के जीवन में आर्थिक समृ‌द्धि, सुख एवं स्वास्थ्य का उपहार भी लेकर आता है। इसी कारण लगभग पूरे भारत तथा विदेशों में भी यह पंचोत्सव अत्यंत धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

(लेखक प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, दिल्ली विश्ववि‌द्यालय, दिल्ली 110007 निवास - सुर-सदन, डब्ल्यू, जैड. 1987, रानी बाग, दिल्ली 110034 हैं। ई मेल drrvshrma@gmail.com मोबाइल 09811036140)

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