शनिवार, 9 मार्च 2024

वोट फार कैश मामले मे सुप्रीम कोर्ट का साराहनीय फैसला

बसंत कुमार
सर्वोच्च न्यायालय ने पैसा लेकर वोट देने के मामले में सांसदो विधायको पर अपराधिक मुकदमा चलाये जाने वाली छुट को अभी हाल मे दिये हुए फैसले से समाप्त कर दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव केश मे 1998 मे पांच जजो की बेंच द्वारा दिये गए फैसले को पलटते हुए सात जजो की बेंच ने यह फैसला सुनाकर यह सुनिश्चित कर दिया है कि सांसदो/ विधायको सदन मे भाषण देने या वोट डालने के लिए रिश्वत लेने का दोषी पाये जाने पर कानूनी संरक्षण को समाप्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून के समक्ष खास और आम दोनों ही नागरिक एक समान है। सात जजो की संविधान पीठ जिसने यह फैसला सुनाया उसमे मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्र चूड, जस्टिस ए ए बोपन्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस पी एस नरसिम्हा, जस्टिस जे वी परदिवाला, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे। 
  इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने कहा " माननीय सर्वोच्च् न्यायालय का यह निर्णय देश मे राजनीति को स्वच्छ करेगा और देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था मे लोगो का विश्वास और गहरा होगा। अब यह प्रश्न उठता है कि जिस प्रकार से चुनाव की राजनीति मे संसद और विधान परिषद मे पहुँचने वाले अधिकांश नेता करोडो या अरबो के मालिक है और इन धनाड्यो के आगे चाल चरित्र और सत्यनिष्ठा वाले नेताओ कार्य कार्ताओ की पूंछ नही होती तो राजनीति कैसे स्वच्छ होगी, चाहे कोई भी पार्टी हो आज की चुनाव की राजनीति में टिकट बाटते उम्मीदवार की शिक्षा, योग्यता इम नदारी देखने के बजाय उसकी सम्पति देखती है वह अलग बात है कि वह सम्पति कैसे कमाई बनाई गई है। ऐसे लोगो से बनी संसद या विधायिका कैसे नैतिकता के उच्च आयाम स्थापित करेगी।
इससे पूर्व संविधान के अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 195 के तहत विधान मंडलों और संसद के सदस्यों के सदस्यों को रिश्वत लेने के मामले मे अपराधिक मामलों से छुट मिलती थी, यह छूट 1998 मे सर्वोच्च न्यायालय के पी वी नरसिम्हा राव मामले मे दिये गए जजमेंट के कारण मिली थी, जिसके कारण निर्वाचित प्रतिनिधि वोट के बदले नोट के मामलो मे बच जाते थे। इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय मे अपने ही पुराने (1998) के फैसले को उलट दिया है अर्थात अब उन्हे संसदीय विशेषधिकार के तहत रिश्वत खोरी की छुट नही दी जा सकती। यह निर्णय देते हुए मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्र चूड ने टिप्पड़ी करते हुए कहा " हम मानते है कि रिश्वत खोरी संसदीय विशेषधिकार  नही है, माननीय सांसदो द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार और रिश्वत खोरी भारत के संसदीय लोकतंत्र को बरबाद कर देगा "। इस फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देश के पूर्व मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा" जब जनता जनादेश देकर आपको चुनती है, इसके बाद ऐसे लोग जो जनता के जनादेश के साथ विश्वास घात करते हैं तो उन्हे ना तो कानूनी संरक्षण मिल सकता है ना ही सियासी संरक्षण मिल सकता है।
वास्तव मे अनुच्छेद 19(1)(A) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यक्तिगत अधिकार को मान्यता देता है और 105(2) और 194(2) का उद्देश्य प्रथम तया अपराधिक कानून के उल्लंघन के लिए दंडात्मक कार्यवाही शुरु करने से प्रतिरक्षा प्रदान नही करता, जो संसद सदस्य के रूप मे अधिकारों और करतव्यो के प्रयोग से स्वतंत्रत रूप से उत्पन्न हो सकता है, ऐसे मामले मे सांसद को विशेषधिकार के रूप मे तभी छूट दी जा सकती है जब दिया गया भाषण या वोट देनदारी को जन्म देने वाली कार्यवायी के लिए एक आवश्यक एवं अभिन्न अंग हो
सर्वोच्च न्यायालय मे यह मामला सीता सोरेन की अपील पर आया, यह मामला एक जन प्रतिनिधि की रिश्वत खोरी से संबंधित है। इस मामले के तार पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव से से जुड़े हुए हैं। उनकी सरकार को 1993 मे अविश्वास मत के दौरान, बचाने के लिए दी गयी रिश्वत के मामले से थी, जिसमे झारखंड मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अद्यक्ष सिबु सोरेन और उनकी पार्टी के चार सांसद शामिल थे जहा सांसदो ने सरकार बचाने के लिए वोट देने के बदले मे रिश्वत ली थी, सीता सोरेन को जन सेवक के तौर पर गलत काम करने के साथ अपराधिक साजिश रचकर जनसेवक की गरिमा घटाने वाला काम करने का आरोपी बनाया गया था। इस मामले मे अनुच्छेद 194 के प्रावधान 2 के अनुसार जन प्राधिनिधियो को उनके सदन मे वोट डालने के लिए रिश्वत लेने पर मुकदमे मे घसीटा नहीं जा सकता।
पर सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ द्वारा यह फैसला आने से समय समय पर सांसदो द्वारा किये गए रिश्वत खोरी के मामलों पर अब अपराधिक प्रक्रिया का सामना करना होगा, अभी कुछ माह पूर्व टी एम सी की सांसद महुआ मोयित्रा द्वारा पैसा लेकर प्रश्न पूछने के आरोप पर सदस्यता रद्द कर दी गयी तो क्या रिश्वत के मामले मे दोषी पाए जाने पर सदस्यता रद्द किया जाना ही काफी था जबकि इनके विरुद्ध सरकारी कर्मचारी की भाँति भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत कार्यवाही क्यों नही की गयी और जब ऐसा होगा तभी हमारे जन प्रतिनिधियों के मन में कानून के प्रति सम्मान और उसके उल्लंघन पर सजा का डर व्याप्त होगा, हमारे सांसदो द्वारा पैसा लेकर प्रश्न पूछने का मामला हो या फिर पैसा लेकर सरकार के समर्थन मे वोट डालने का मामला हो यह बुराई तब तक नही रुकेगी जब तक सभी राजनीतिक दलों द्वारा धन बल देख कर टिकट दिया जाता रहेगा क्योकि जो लोग पैसे के बल पर सांसद बनेंगे उनसे कभी भी इमान दारी की राजनीति की अपेक्षा नही की जा सकती, इसलिए धन कुबेरो का अनुचित तरीके से कमाए धन का उपयोग राजनीति मे रुकना चाहिए।
भारत के संसद के इतिहास मे कुछ सदस्यों द्वारा संसद के अंदर करोडो रुपये की गड्डिया लहराते हुए सांसदो की तस्वीर आज भी लोगो के मन मस्तिस्क मे छाई हुई है और जल्द ही यह भ्रम टूटना चाहिए कि पैसे के बल पर कोई संसद मे पहुँच सकता है या पैसे के बल पर सरकारे बन बिगड़ सकती है हमे उन आदर्शो का पुन: पालन करना सिखना होगा जो स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारी लाल नंदा जैसे नेताओ ने स्थापित किया था।

गुरुवार, 7 मार्च 2024

ऐसी राजनीतिक तस्वीर बदले तो कैसे

अवधेश कुमार

चुनाव ऐसा अवसर होता है जब आपको राजनीति के सारे नकारात्मक चरित्र हमारे सामने घनीभूत होकर उभरते हैं। हालांकि इसमें आज चार्ज का कोई कारण इसलिए नहीं होता क्योंकि इस तरह की घटनाएं राजनीति की बारंबारता का अंग बन चुके हैं। लोकसभा चुनाव के पूर्व दलों और नेताओं के व्यवहारों और वक्तव्यों पर आम लोग अब आश्चर्य भी प्रकट नहीं करते। मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक नेताओं के पाला बदल, कल तक के राजनीतिक विरोधियों के साथ चुनावी गठबंधन पर चाहे जितना प्रश्न उठाएं या उसका किसी दृष्टि से विश्लेषण करें इससे धरातल पर ठोस गुणात्मक अंतर आएगा ऐसा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि वर्षों से भारत में राजनीतिक सुधार यानी राजनीतिक दलों के अंदर वैचारिक, व्यवहारिक और व्यक्तित्व के परिवर्तनों को लेकर जो भी आवाज उठाई गई उसका अत्यंत कम असर हुआ है। आम आदमी पार्टी द्वारा 

दिल्ली, हरियाणा और गुजरात में कांग्रेस के साथ गठबंधन पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आखिर दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के प्रमुख अरविंद केजरीवाल जिस पार्टी और परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता में आए और उनको सजा दिलवाने का वायदा करते रहे उसके साथ गठबंधन करते हैं तो उस राजनीति पर प्रश्न उठेगा। किंतु क्या इसका असर भी हो सकता है ? या फिर अरविंद केजरीवाल या आम आदमी पार्टी ऐसा करने के मामले में भारतीय राजनीति में एकमात्र उदाहरण है?

वास्तव में राजनीति का जब एकमात्र ध्येय येन-केन -प्रकारेण सत्ता में पहुंचना या बने रहना हो जाए तो ऐसा ही होता है। आईएनडीआईए की कल्पना आने के पूर्व तक आम आदमी पार्टी का घोषित स्टैंड था कि उसको किसी भी गठबंधन से कोई लेना- देना नहीं है। वह गठबंधन की राजनीति की आलोचना करती थी। अन्ना हजारे के अभियान के दौरान की बातों को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए क्योंकि उसे कितनी बार याद दिलाएंगे, किंतु हाल तक के अपने राजनीतिक-रणनीतिक स्टैंड से भी पार्टी बदल जाए तो फिर क्या कहा जा सकता है। जिस शराब घोटाले और ईडी कार्रवाई का दिल्ली की कांग्रेस पार्टी समर्थन कर रही थी वह अचानक न केवल इस पर खामोश हो गई है बल्कि कई टीवी डिबेट में कार्रवाइयों के लिए सरकार की आलोचना करती है।यही स्थिति भाजपा और राजग विरोधी पार्टियों की पश्चिम बंगाल के संदेशखाली जैसे जघन्य और वीभत्स अपराध के मामले में भी है। विपक्ष की किसी पार्टी के प्रमुख नेता ने संदेशखाली को लेकर तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी या वहां के पुलिस प्रशासन की आलोचना नहीं की। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव ,लालू यादव, राष्ट्रीय जनता दल, शरद पवार , एनसीपी उद्धव ठाकरे आदि का एक ट्वीट हमने नहीं देखा। पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं उससे लगता है कि धनबल और बाहुबल का प्रभाव बंगाल में घटने की बजाय ज्यादा सशक्त हुआ है। जिस तरह गिरफ्तारी के बाद संदेशखाली का मुख्य अभियुक्त शेख शाहजहां चल रहा था, लगता था जैसे पुलिस किसी वीआईपी को सुरक्षा देकर ले जा रही हो। 55 दिनों बाद उसकी गिरफ्तारी बताती है कि अपराध,धनबल तथा एकपक्षीय भयावह सांप्रदायिक बाहुबल का गठजोड़ पश्चिम बंगाल की राजनीति का स्थायी चरित्र बन गया हो। 80 के दशक से भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा मुद्दा रहा।  लगातार राजनीतिक सुधार की मांग उठती रही। लगता था कि धीरे-धीरे अपराध, बाहुबल , धन बल और वोट के लिए संप्रदायिक अपराध की अनदेखी की राजनीति से अंत हो रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस वाम मोर्चा के शासन में अपराधियों,  माफियाओं और सांप्रदायिक तत्वों के बोलबाला के विरुद्ध ही संघर्ष करके सत्ता तक आई किंतु उनका शासन उससे भी ज्यादा इन सारी बीमारियों का वीभत्सतम उदाहरण बन गया है। 

बाहुबल और धनबल का राजनीति के साथ स्पष्ट दिखता रिश्ता तथा सिद्धांतहीन, आदर्शहीन पालाबदल कई राज्यों में सामने आ रहे हैं। एक समय राजनीतिक और सत्ता शीर्ष का भ्रष्टाचार विरोधी दलों का सबसे बड़ा मुद्दा होता था। यह स्थिति पूरी तरह पलट गई है। आज भ्रष्टाचार के आरोप के विरुद्ध नेताओं और सत्ताशीर्ष पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई विपक्ष के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो गया है। इस स्थिति की पहले कल्पना नहीं थी। पहले मनीष सिसोदिया, फिर संजय सिंह और हेमंत सोरेन तथा ऐसे छोटे-बड़े नेताओं को जेल जाना पड़ा, न्यायालय उनको जमानत तक नहीं दे रहा, किंतु विरोधी राजनीति का स्वर है मानो ये सारे पाक साफ हों। न्यायालय जब तक किसी को सजा नहीं देती हम उन्हें दोषी नहीं मानते किंतु बिना आधार के इतनी बड़ी कार्रवाई नहीं होती और होती है तो शांति से न्यायिक प्रक्रिया का सामना किया जा सकता है। सच कहा जाए तो एक बीमारी के उपचार की जगह उससे बड़ी बीमारी ने हमारी राजनीति को घर कर लिया है। यह राजनीतिक सुधार की विपरीत दिशा है। आने वाले समय में राजनीति और शीर्ष भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई कितनी कठिन होगी इसका अनुमान आज की स्थिति से लगाया जा सकता है। एक नेता पर कार्रवाई हुई नहीं कि वकीलों की फौज उन्हें बचाने के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच जाती है। बड़े-बड़े लोग पक्ष में खड़े हो जा रहे हैं। यह राजनीति की ऐसी प्रवृत्ति है जिसका अंत तभी संभव है जब राजनीतिक सुधार इस अवस्था में पहुंच जाए जहां केवल देश और समाज की चिंता करने वाले ज्ञानी , विवेकशील और संकल्पबद्ध लोग ही चुनावी राजनीति में रहे। ऐसी स्थिति सामने नहीं दिख रही।

संघ और भाजपा का विरोध राजनीति में एक बड़ा वर्ग पहले भी करता था। इस समय यह विरोध घृणा की उस अवस्था में पहुंच गया है जहां लगता है कि दलों और नेताओं के विवेक और अविवेक में कोई अंतर नहीं बचा। इसमें कोई कितना भी भ्रष्टाचारी हो, बाहुबली हो, सांप्रदायिक हो, अगर नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा विरोधी है तो विपक्ष के बड़े समूह के लिए सहज स्वीकार्य। यह इस समय भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती है। मजे के बाद देखिए कि इस स्थिति ने पार्टियों को अपने दूरगामी भविष्य की चिंता से भी विलग कर दिया है। ‌ उदाहरण के लिए कांग्रेस के व्यावहारिक नेताओं को आभास है कि दिल्ली, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्य में अगर आम आदमी पार्टी आगे बढ़ी तो सबसे ज्यादा क्षति उन्हीं की होगी। बावजूद वह गठबंधन को तैयार हैं तो क्यों? यही स्थिति दूसरी पार्टियों के साथ भी है। अनेक पाला बदलने वालों के लिए भाजपा भी अपना द्वार खोली हुई है। नीतीश कुमार जैसे सिद्धांतहीन और अस्थिर व्यक्ति जब चाहते हैं भाजपा को छोड़कर चले जाते हैं और फिर वापस आ जाते हैं। वे मुख्यमंत्री भी बने रहते हैं। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस समय ऐसी सशक्त स्थिति में है जब वह सिद्धांतहीन और आरोपी नेताओं से अपने को काफी हद तक बचाए रख सकती है। इससे उसके चुनावी प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि जब तक कोई नेता विरोधी खेमे में होता है उसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाती। जैसे ही वह भाजपा के साथ आता है, विरोधी चिल्लाने लगते हैं कि देखो-देखो जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप था वह उनके साथ चला गया। इसलिए जनता ऐसी आलोचनाओं को गंभीरता से नहीं लेती है।

वास्तव में एक बड़े वर्ग के लिए स्थिति इतनी निराशाजनक है कि वे इन पर टिप्पणी करना भी समय नष्ट करना मानते हैं। उनके अनुसार भारतीय राजनीति की विद्रुपताओं पर जितना कुछ लिखा-बोला जा चुका है कि अलग से कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं रहती। जो कुछ भी लिखा जाएगा उसमें प्रसंग और चेहरे नये हो सकते हैं , पर मुद्दे और विषय पुराने ही होते हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की भी भूमिका है। आम लोग भी अगर मतदान करते समय सिद्धांतहीन ,पाला बदल तथा धनबल और बाहुबल से राजनीति करने वालों का साथ और सम्मान न दें, उनके पक्ष में मतदान न करें तो प्रवृत्ति बदल सकती है। भाजपा इस समय सबसे बड़ी ही नहीं, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम सबसे ज्यादा लोगों के आकर्षण वाली पार्टी है। वह इस स्थिति का राजनीतिक सुधार के लिए उपयोग करके उदाहरण बने। जहां भी भाजपा की सरकार हो वहां ऐसे तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई, पार्टी में ऐसे लोगों के लेने का निषेध तथा दूसरी पार्टी की सत्ता में ऐसे तत्वों के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष जैसे तीन स्तरीय व्यवहार की उम्मीद उससे की जाती है। दूसरी पार्टियां भी समझ लें कि आम लोगों के अंदर उसके ऐसे व्यवहार से असंतोष बढ़ता  है तथा अनेक पार्टीयां बीच-बीच में सत्ताच्युत होतीं हैं तो इसके पीछे सिद्धांतहीन और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण बिगड़ी हुई छवि की प्रमुख भूमिका रही है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092 , मोबाइल 9811027208

बुधवार, 6 मार्च 2024

जियोसिनेमा और एम एस धोनी ने टाटा आईपीएल 2024 के लिए गठबंधन किया

मुबंई। एक बार फिर से लौट आया है क्रिकेट का त्यौहार, यानि टाटा आईपीएल की बहार। जहां वर्ष 2024 के शुरुआती सीज़न में टाटा आईपीएल का सभी को बड़ी बेसब्री से इंतजार है। वहीं जियो सिनेमा ने भी एक और रोमांचक संस्करण का वादा निभाते हुए अपना अभियान शुरू किया है। इस अभियान में तीन एड फिल्में शामिल हैं, जिनमें से पहली में एम एस धोनी डबल रोल में हैं। ये तीनों एड फिल्में डिजिटल पर टाटा आईपीएल देखने के चस्के और आनंद को उजागर करती हैं। यह अभियान इस बात से पर्दा उठता है कि आज के दौर में बढ़ती संख्या में भारतीय डिजिटल पर लाइव स्पोर्ट देखने का विकल्प चुन रहे हैं, जिसमें टाटा आईपीएल भी शामिल है। पिछले सीजन में जियो सिनेमा लगभग 449 मिलियन व्यूअर के रिकॉर्ड पर पहुंच गया था।

द स्क्रिप्ट रूम द्वारा परिकल्पित और अर्ली मैन फिल्म्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में एम एस धोनी को दादा और पोते के अनोखे डबल रोल में फिल्माया गया है। इसमें दिखाया गया है कि टाटा आईपीएल मैच के दौरान पोता अपने फोन की स्क्रीन से चिपका हुआ है, जबकि दादा भी अपने फोन पर उसी मैच को देखने में तल्लीन हैं, अचानक उनके सीने में बेचैनी होने लगती है। अस्पताल के रास्ते में एम्बुलेंस में बैठा मेडिकल अटेंडेंट भी अपने फोन पर गेम देखता हुआ नजर आता है, जबकि दादा और पोते भी मजाकिया अंदाज में अपने-अपने फोन पर मैच देखते रहते हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब दादाजी की गैस घूमती है, और उन सभी को एहसास होता है कि बेचैनी महज़ गैस की वजह से हुई थी। तभी मैच में एक सिक्स लगता है, जिससे तीनों खुश हो जाते हैं और फिल्म खत्म हो जाती है। यह एड फिल्म टीवी, डिजिटल, सोशल और प्रिंट मीडिया में दिखाई जाएगी।

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

भाजपा के 100 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट फाइनल!

 ·     भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर की जगह शिवराज को उम्मीदवार बनाकर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश में है भाजपा

·         शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ भोजपुरी स्टार पवन सिंह

·         इनमें पीएम मोदी और अमित शाह की सीट भी शामिल है।

·         पीएम मोदी वाराणसी, अमित शाह गांधीनगर से लड़ेंगे चुनाव

·       दिल्ली भाजपा सांसदों का भविष्य खतरे में है क्योंकि पार्टी कम से कम तीन मौजूदा सांसदों को बदलने की तैयारी में है। 

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा ने अपने 100 उम्मीदवारों के नाम लगभग

फाइनल कर दिए हैं। देर रात तक भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक हुई जिसमें पीएम मोदी भी शरीक हुए। पीएम मोदी रात 11 बजे केंद्रीय कार्यालय पर आए थे और सुबह 3:30 के करीब निकले। बैठक में पहली सूची पर मंथन हुआ। सूत्रों का कहना है एक-दो दिन में पहली लिस्ट आ सकती है।

इस लिस्ट में पीएम नरेंद्र मोदी (वाराणसी), गृह मंत्री अमित शाह (गांधीनगर), राजनाथ सिंह (लखनऊ) सहित हाई प्रोफाइल उम्मीदवारों के नाम फाइनल किए गए हैं और 'कमजोर' सीटें जो भाजपा 2019 में हारी या कम अंतर से जीतीं उन पर फोकस किया गया है।

देर रात सीईसी की बैठक में जिन राज्यों पर चर्चा हुई उनमें यूपी, एमपी, उत्तराखंड, गुजरात, असम, तेलंगाना, केरल समेत अन्य शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री जो राज्यसभा सांसद हैं उनके आगामी चुनाव लड़ने की संभावना है, उनमें भूपेन्द्र यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया, निर्मला सीतारमण, धर्मेन्द्र प्रधान, सर्बानंद सोनोवाल, वी मुरलीधरन शामिल हैं। भाजपा कई महिला चेहरों सहित नए चेहरों पर ध्यान केंद्रित करेगी।

इसके अलावा भाजपा बंगाल के आसनसोल में टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को टक्कर देने के लिए भाजपा भोजपुरी स्टार पवन सिंह सहित अन्य जगहों पर भी कुछ सेलिब्रिटी चेहरों को ला सकती है। दिल्ली भाजपा सांसदों का भविष्य खतरे में है क्योंकि पार्टी कम से कम तीन मौजूदा सांसदों को बदलने की तैयारी में है।

तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के अन्नामलाई को भी मैदान में उतारे जाने की संभावना है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान को भोपाल से मैदान में उतारा जा सकता है। भोपाल से इस समय भाजपा की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर हैं जो अक्सर विवादों में रही है। इसके अलावा तेलंगाना में भाजपा मौजूदा सांसदों बांदी संजय, जी किशन रेड्डी और अरविंद धर्मपुरी को फिर से चुनावी मैदान में उतारा जाएगा।

अलग अलग राज्यों को लेकर भी इस बैठक में चर्चा हुई। बैठक में राजस्थान को लेकर भी चर्चा हुई और इस दौरान सीएम भजनलाल, वसुंधरा राजे और सतीश पूनिया भी मौजूद रहे। असम को लेकर यह तय हुआ कि 3 सीटें भाजपा सहयोगियों को देगी जबकि 2 सीटें असम गण परिषद और 1 सीट एपीपीएल को मिलेगी।

 

मछलीशहर लोकसभा सीट से भाजपा के प्रबल दावेदार हैं बसंत कुमार

·     पत्रकारिता जगत से भी सम्बन्ध रखते हैं बसंत कुमार

·      भारत सरकार के उप सचिव पद से ली है स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति

जौनपुर। आगामी लोकसभा चुनाव की घोषणा होने वाली है जिसको लेकर सभी पार्टियां अपने प्रत्याशियों की घोषणा में जातीय गुणा-भाग में व्यस्त हैं लेकिन इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण सीट मछलीशहर (सु.) बनी हुई है। इस सीट पर भाजपा की ओर से जनपद जौनपुर के ग्राम पिपरा के निवासी व भारत सरकार के पूर्व उप सचिव व एनडीए-1 सरकार में एमएसएमई मंत्रालय में सलाहकार रहे बसंत कुमार सबसे प्रबल दावेदार के रूप में सामने नजर आ रहे हैं।

वे शिक्षित हैं तथा उनके पास लगभग 3 दशक का प्रशासनिक अनुभव है। वे एक अच्छे लेखक हैं जिन्होंने राष्ट्रवादी कर्म योगी, हिन्दुत्व एक जीवनशैली, युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद, एकात्मवाद भाजपा का संकल्प, भारत में उद्यमिता, आंबेडकर और राष्ट्रवाद जैसी किताबें लिखी हैं। इन पुस्तकों का लोकार्पण भाजपा के शिखर पुरूष लाल कृष्ण आडवाडी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, डॉ. सत्य नारायण जटिया, योगी आदित्यनाथ आदि महानुभवों द्वारा किया गया है। इतना ही नहीं, देशभर से खासकर नई दिल्ली से प्रकाशित वीर अर्जुन, अमर भारती जैसे दैनिक समाचार पत्रों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रत्येक सप्ताह श्री कुमार के स्तम्भ भी प्रकाशित होते हैं, जिनमें वह बड़ी बेबाकी से अपने विचार रखते हैं। उल्लेखनीय है कि वीर अर्जुन के सम्पादक के रूप में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी भी काम कर चुके हैं।

इतना सब होने के बावजूद बसंत कुमार भाजपा से लगातार इसलिए वंचित किए जाते रहे हैं क्योंकि वे जिस बिरादरी से संबंध रखते हैं उसे बसपा का पारंपरिक वोट माना जाता रहा है पर अपनी राष्ट्रवादी सोच के कारण उन्होंने बसपा की ओर से पार्टी जॉइन करने के ऑफर को ठुकरा दिया और एक दशक से अधिक समय से भाजपा में एक कार्यकर्ता के रूप में लगे हुए हैं। उन्होंने सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के पश्चात् वर्ष 2011 में भाजपा सदस्यता ग्रहण की तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र के सानिध्य में हिंदुत्व व राष्ट्रवाद के विषय को गहराई से जाना और भाजपा के नीतियों और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में कड़ी मेहनत की और 2011 में लालकृष्ण अडवाणी और कलराज मिश्र के नेतृत्व में जन स्वाभिमान यात्रा में पूरे प्रदेश का भ्रमण किया।

वर्ष 2014 में जब कलराज मिश्र देवरिया से चुनाव लड़ रहे थे तो बसंत कुमार ने कड़ी मेहनत की और पूरे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी का एहसास कराया जिसकी वजह से पूरे क्षेत्र में उन्हें कलराज मिश्र का हनुमान कहा जाता था और जब नरेंद्र मोदीजी के मंत्रिमंडल में कलराज मिश्र एमएसएमई मंत्री बनाए गए तो बसंत कुमार को इस मंत्रालय में सलाहकार बनाया गया।

श्री बसंत कुमार के के पिता श्री गुरु प्रसाद (बड़े बाबू) प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अपनी कालेज शिक्षा वर्ष 1941 में कठिन परिष्तिथियो में पूरी की, क्योंकि उस समय कालेज में शिक्षा प्राप्त करना सिर्फ सवर्ण जमीदारों का एकाधिकार होता था। शिक्षा प्राप्ति के बाद 1946 में भारत सरकार में डाक तार विभाग में बिना आरक्षण के नौकरी प्राप्त की। उनके देहांत के वर्षों बाद भी क्षेत्र के लोग गुरु प्रसाद (बड़े बाबू) का नाम बड़ी श्रद्धा से लेते हैं। अपने पिता की भांति बसंत कुमार ने भी शिक्षा में टापर रहे हैं। वह मड़ियाहु महाविद्यालय में वर्ष 1977-78 में टापर होने के कारण कालेज छात्र यूनियन में प्रतिनिधि के नाम से मनोनीत किये गए।

वे हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि आरक्षण का लाभ वंचित समाज के निर्धन व्यक्तियों को ही मिले और जो लोग एक बार आरक्षण का लाभ लेकर संपन्न हो चुके हैं उन्हें अपने बच्चो के लिए आरक्षण का लाभ स्वत: छोड़ देना चाहिए जिससे उसका लाभ वंचित समाज के दूसरे निर्धनों को मिल सके। अपनी इसी सोच के कारण उन्होंने अपने दोनों बेटों को दिल्ली के टॉप की शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा दिलाई और आरक्षण का लाभ लेकर उन्हे आईएएस या आईपीएस बनाने के बजाय ऐसी फील्ड चुनी जहां आरक्षण का ठप्पा न हो, उनका बड़ा बेटा अजीत रंजन दिल्ली क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करने के बाद इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेल रहा है जबकि छोटा बेटा विनीत रंजन सर्वोच्च न्यायालय में एडवोकेट है।

बसंत कुमार एक पहल नामक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं और अपनी संस्था के माध्यम से वंचितों और निर्धनों की शिक्षा और रोजगार में मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं। वे विधायक या सांसद न होते हुए भी मछलीशहर (जौनपुर) के लोगों की मदद हर समय करते हैं चाहे वह दिल्ली में काम हो या मछलीशहर में। बसंत कुमार की विशेषता जो उन्हें अन्य लोगों से अलग रखती हैं कि वे अपने प्रतिद्वंदियों को भी दिल्ली में बड़े राष्ट्रीय नेताओं से मिलाने में कोताही नहीं करते।

ऐसे सरल स्वभाव के बहुमुखी प्रतिभा के धनी व विद्वान लेखक बसंत कुमार को यहां की जनता चाहती है कि भाजपा अपना प्रत्याशी बनती है तो भाजपा की यहां से भारी मतों से जीत होगी और क्षेत्र में चहुंमुखी विकास होगा।

अब अगर यहां के पूरे समीकरण को समझने की कोशिश करें तो इनके उम्मीदवार बनाए जाने से भाजपा के साथ-साथ मछलीशहर के लोगों को भी फायदा होगा।

मछलीशहर को तहसील का दर्जा प्राप्त - जौनपुर जिले में शामिल मछलीशहर भी उत्तर प्रदेश के 80 संसदीय क्षेत्रों में से एक संसदीय क्षेत्र (74वीं संख्या) है और यह शहर व्यापार के लिहाज से प्रदेश का अहम नगर है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में शामिल मछलीशहर को तहसील का दर्जा प्राप्त है। पश्चिम में प्रतापगढ़, रायबरेली और लखनऊ को मछलीशहर से जोड़ता है जबकि मछलीशहर पूर्वी तरफ से जौनपुर और वाराणसी से जुड़ा हुआ है।

महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक-2011 की जनगणना के आधार पर मछलीशहर तहसील की आबादी 7 लाख से ज्यादा (7,36,209) है, जिसमें महिलाओं (3,75,252) की संख्या पुरुषों (7,36,209) से ज्यादा है। इस संसदीय क्षेत्र का लिंगानुपात प्रदेश के उन चंद संसदीय क्षेत्रों में शामिल है जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। एक हजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या 1,040 है। यहां की साक्षरता दर 70.81% है।

अनुसूचित जाति की आबादी 22 फीसदी - जातिगत आधार पर यहां की आबादी पर नजर डाली जाए तो मछलीशहर संसदीय क्षेत्र में 22.7% आबादी (166,766) अनुसूचित जाति की है, जबकि अनुसूचित जनजाति यहां की कुल आबादी का 0.1 फीसदी (625) ही है। धार्मिक आधार पर 90.61 फीसदी आबादी हिंदुओं की है, जबकि मुस्लिम समाज के 8.9% लोग ही यहां रहते हैं।

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