शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

बुलंदशहर हिंसा के पीछे की साजिश को समझिए

 

अवधेश कुमार

बुलंदशहर में स्याना के महाव गांव की भयावह घटना ने मुख्यतः दो बातें साबित की हैं। एक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगाए गए बारुद के ढेर अभी खत्म नहीं हुए हैं। किंतु इससे भी बड़ी बात यह कि सारी स्थिति समझते हुए प्रशासन समय पर कार्रवाई करने में विफल रही। हालांकि अंत में स्थिति संभाल ली गई। बुलंदशहर में तब्लीगी इज्तमा के कारण भारी मुसलमान पहुंचे थे। अगर हिंसा या हिंसा के संदर्भ में किसी तरह की अफवाह फैलती तो आज क्या स्थिति होती इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। पूरी घटना को देखें तो इसमें बड़ी सांप्रदायिक हिंसा का सुनियोजित षडयंत्र नजर आता है। इतनी संख्या में गोवंश को काटकर खेतों में डाल देने का क्या उद्देश्य हो सकता है? अगर किसी को गोकशी करनी है तो वह उसे छिपाने का प्रयास करेगा। खेतों में गाय के अवशेष जगह-जगह लटकाकर रखे गये थे। गाय के सिर और खाल आदि अवशेष गन्ने पर लटका रखे थे जो दूर से ही दिख रहे थे। ऐसा करने वालों को पता था कि चारों ओर से बुलंदशहर के तब्लीगी इज्तमा में जमा लोग इस रास्ते से भी लौटने वाले हैं जिसके पहले हिन्दू गोवंश के कटे अवशेषों को देखकर आक्रोशित हो चुके होंगे और वे गुस्से में उन पर हमला कर सकते हैं। उसके बाद तो हिंसा आग की तरह फैलनी ही थी।

इस दृष्टि से विचार करें तो कहा जा सकता है कि प्रदेश और देश सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के एक बड़े षडयंत्र से बचा गया है। हालांकि उसमें भीड़ से जूझते एक इन्सपेक्टर का बलिदान हो गया, एक नवजवान भी गुस्साये भीड़ एवं पुलिस के बीच संघर्ष का शिकार हो गया, चौकी तक जल गई, सरकारी वाहनों और संपत्तियों को भारी नुकसान हुआ और यह सब दुखद और एक सभ्य समाज के नाते शर्मनाक भी है किंतु विचार करने वाली बात है कि स्थिति इतनी बिगड़ी क्यों? गोहत्या की सूचना मिलने पर हिन्दू समाज गुस्से में आएगा यह राज्य सरकार और उसके मातहत काम करने वाले पुलिस और प्रशासन को बताने की आवश्यकता नहीं थी। कुछ दिनों पहले ही खुर्जा में 21 गोवंश कटे मिले थे। ऐसी स्थिति में लोगों का स्थानीय पुलिस प्रशासन के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करना भी स्वाभाविक था। लोग ट्रैक्टर, ट्रौली में भरकर यदि हाईवे या पुलिस चौकी पर प्रदर्शन करने की जिद पर अड़े थे तो गुस्सैल भीड़ को देखते हुए इसे भी अस्वाभाविक कतई नहीं कहा जा सकता है। आरंभ में पुलिस प्रशासन की कोशिश किसी तरह भीड़ को शांत करना ही होता है। किंतु ऐसे मामलों में जहां धार्मिक भावनायें भड़कीं हों शांत करना आसान नहीं होता। पुलिस की संख्या कम और भीड़ की ज्यादा। भीड़ ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर हाईवे पर चिंगरावठी पुलिस चौकी पर पहुंचीं। वहां की घटना के बारे में अलग-अलग विवरण है। पुलिस का कहना है कि कुछ लोग मान गए थे लेकिन इसी बीच पथराव होने लगा, तोड़-फोड़ की जाने लगी और फिर पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की। बेकाबू भीड़ ने पुलिस के कई वाहन फूंक दिए और चिंगरावठी पुलिस चौकी में आग लगा दी।

एकाएक ऐसा नहीं हो सकता। मामले में पुलिस प्रशासन की हर स्तर पर विफलता साबित होती है। पुलिस को नौ बजे सुबह सूचना मिल गई थी। गोहत्या की घटना पर देश भर की जो स्थिति है और स्वयं उत्तर प्रदेश का जो माहौल है उसे देखते हुए पुलिस प्रशासन को तुरत एक्शन में आना चाहिए था। बिल्कुल सड़क से लगे इलाके में पहुंचना भी कठिन नहीं था। 10 बजे सुबह एसडीएम और स्याना के इंस्पेक्टर पहुंचे। 11 बजे सुबह ग्रामीण ट्रैक्टर-ट्राली में अवशेष लेकर चिंगरावठी चौकी रवाना होने लगे। यानी इस बीच दो घंटे का समय चला गया। हालांकि आसपास के कुछ थाने की पुलिस वहां पहुंच रही थी। करीब 11.30 बजे सुबह ग्रामीणों और पुलिस के बीच फायरिंग और पथराव शुरू हुआ। इस बीच स्थिति को संभाला जा सकता था। स्थिति जब नियंत्रण से बाहर हो गई तब करीब 12.30 बजे जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बुलंदशहर से रवाना हुए। आखिर उसम वो किस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे? वे पहुंचे तब तक इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की मौत हो चुकी थी। आईजी, एडीजी और कमीश्नर तो 3.30 बजे पहुंचे। 10 बजे तक सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी आधी-अधूरी जानकारी फैल चुकी थी। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उनके सहयोगियों तक इतनी संवेदनशील घटना की जानकारी नहीं पहुंची? नहीं पहुंची तो इसका अर्थ है कि दावों के विपरीत पूरी व्यवस्था लचर है। अगर पहुंची और पुलिस प्रशासन को सक्रिय होने में इतना विलंब हुआ तो साफ है कि सरकार ने इसकी गंभीरता को समझते हुए समय पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी नहीं किए।

 राज्य सरकार इसलिए भी कठघरे में है, क्योंकि पिछले काफी दिनों से खुफिया विभाग की रिपोर्टों के अंश सामने आ रहे थे जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गोहत्या सहित अन्य कार्यों से हिंसा भड़काने की योजनाओं की बात थीं। कहा गया था कि पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है। पिछले कुछ महीनों में मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर समेत कई जिलों में गोहत्या की अफवाह मात्र पर तनाव पैदा हुआ है। पथराव, वाहनों में तोड़फोड़ व आगजनी की घटनायें हो चुकी है। पुलिस तक पर फायरिंग तक हो चुकी है। जिस प्रदेश की ऐसी स्थिति हो वहां इतनी लचर कार्रवाई शर्मनाक है। आधे घंटे के अंदर पर्याप्त संख्या में पुलिस, पीएसी, आरएएफ, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ नेताओं का समूह पहुंच जाना चाहिए था। समय का विवरण बताता है कि इतनी बड़ी घटना को संभालने के लिए उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को जितनी तत्परता दिखानी चाहिए नहीं दिखाई गई। सरकार सचेत हो जाती तो ऐसी स्थिति नहीं होती। यह कैसा कानून का राज है जहां करीब एक घंटे तक युद्ध का मैदान बना हो, जहां पुलिस को चौकी छोड़कर भागना पड़ा... गांव के सामान्य लोग भी घरबार छोड़कर भाग रहे हों? कह सकते हैं उच्चाधिकारियों के सामने बुलंदशहर में तब्लीगी इज्तमा को शांतिपूर्वक संपन्न कराना तथा लोगों को सुरक्षित वापस भेजने की जिम्मेवारी थी। किंतु इस घटना को संभालने का दायित्व भी तो उन्हीं का था। पुलिस का लगा कि यदि जाम नहीं हटा तो सांप्रदायिक हिंसा हो सकती है इसलिए उन्होंने जबरन लोगों को हटाने की कोशिश की। पुलिस की थोड़ी संख्या बढने पर लाठीचार्ज हुआ और पूरी स्थिति बिगड़ गई। अब स्याना छावनी में तब्दील हो चुकी है। बड़े अधिकारियों के साथ पांच कंपनी आरएएफ और छह कंपनी पीएसी के साथ-साथ पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। जब सब कुछ हो गया तो ऐसा करने से अब क्या हासिल होगा?

यह भी विचार करने की बात है कि अगर उत्तर प्रदेश में सारे अवैध कत्लखाने बंद हो गए, गोवंश की हत्या प्रतिबंधित है तो इतनी संख्या में उनके कटे अंग, उतारे गए चमड़े आदि आए कैसे? बजरंग दल के जिस जिला संयोजक पर लोगों को उकसाने का आरोप है उसने ही थाने को इसकी सूचना दी और नामजद रिपोर्ट लिखवाई थी। इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री के स्वयं रुचि लेने के बावजूद से गोवंश की हत्यायें हो रही हैं। इतनी संख्या में गोवंश की हत्या और उनके शरीर के अंगों को अलग करने का काम पेशेवर ही कर सकते हैं। जिसे अनुभव नहीं वह तो खाल नहीं उतार सकता। यह गंभीर विषय है और यह भी पुलिस प्रशासन की विफलता दर्शाती है। जड़ तो गोवंश की हत्या ही है। दुर्भाग्य से हम मूल कारणों को गौण बनाकर उसके बाद हुई हिंसा को प्रमुख मान रहे हैं। गोवंश की हत्या कर खेतों में रखने वाले समाज के दुश्मन हैं। लोगों को इसके खिलाफ प्रदर्शन करने, धरना देने का भी अधिकार है, पर कानून हाथ में लेना अपराध है। आप पुलिस पर हमला करें, गाड़ियां जलायें, थाने जलायें यह कतई स्वीकार्य नहीं। आखिर उस 47 वर्ष के पुलिस अधिकारी का क्या कसूर था? मारे गए उस नवजवान का क्या दोष था? पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सुबोध कुमार सिंह की मौत बायीं आंख में गोली लगने से हुई और सिर पर भी भारी चीज की चोट के निशान पाए गए हैं। इस तरह गोली मारने का काम कोई अपराधी ही कर सकता है। षडयंत्रकारी यही चाहते थे कि लोग गुस्से में हिंसा करें और चारों ओर सांप्रदायिक संघर्ष हो। जिस तरह के षडयंत्र चल रहे हैं उसमें समाज को ज्यादा सतर्क और संतुलित होने की जरुरत है। अगर अहिंसक प्रदर्शन होता तो केवल गोहत्या का मुद्दा देश के सामने होता। प्रतिक्रिया में हुई हिंसा सुर्खियां बन रहीं हैं। पुलिस अपनी विफलता कभी नहीं स्वीकारती। किंतु  खुफिया रिपोर्ट आपके पास है और घटनायें पहले से घट रहीं हैं फिर भी कार्रवाई में ऐसी लापरवाही को क्या कहा जा सकता है?  यह सरकार और उसकी पुलिस को तमगा देने की भूमिका तो नहीं है। आप दूसरे को खलनायक बना दीजिए जबकि दोषी आप भी हैं।

 अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है: ज्वाला सिंह



संवाददाता

नोएडा। नोएडा के सेक्टर 17 और 18 की झुग्गियों में से रास्ता बंद करने पर लोग परेशान हो रहे थे तभी जनशक्ति पार्टी (राष्ट्रीय) के कार्यकर्ताओं ने अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं को फाेन कर दिया। इस पार्टी के के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्वाला सिंह ने हमें बताया कि मेरे पास फोन आया कि नोएडा अथॉरिटी उनके झुग्गीयो में जाने वाले रास्ते को बंद कर रही है जिससे कि उनके आने जाने का मार्ग  हमेशा के लिए बंद हो जाएगा तो हम सब जनशक्ति पार्टी के साथी घटनास्थल पर पहुंचॆ  और कड़ा विरोध जताते हुए आंदोलन की चेतावनी दिए तत्पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब यह रास्ता कभी बंद नहीं होगा और अब अथॉरिटी उस कच्चे रास्ते को पक्का करेगी, इस नेक काम के लिए नोएडा अथॉरिटी को जनशक्ति पार्टी के सभी सदस्यों की तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद, ये नोएडा के उन कार्यकर्ताओं की जीत है जो की निस्वार्थ भाव से पार्टी और नोएडा के लोगों की सेवा में लगे हुए हैं इस जीत पर मैं उनको कोटी कोटी धन्यवाद करता हूं तथा आश्वस्त करता हूं की  किसी भी वक्त जब भी जनशक्ति पार्टी के किसी भी कार्यकर्ता को हमारॆ किसी भी नेता की जरूरत पड़ेगी वह उसी वक्त उनके साथ उनके संघर्षों में शामिल होगा! मैं विशेष तौर पर भाई संदीप कुमार जी, भाई मनोज झा जी, भाई रमेश जी और भाई फ़ैयाज जी का धन्यवाद करता हूं जो पूरे संघर्ष के दौरान मेरे साथ रहे आप लोग का सहयोग ही हमारी ताकत है।





गुरुवार, 29 नवंबर 2018

उद्धव ठाकरे की अयोध्या राजनीति

 

अवधेश कुमार

जबसे शिवसेना ने घोषणा की थी कि उद्धव ठाकरे अयोध्या का दौरा करेंगे तभी से इसका कई दृष्टिकोणों से विश्लेषण हो रहा था। यह प्रश्न उठ रहा था कि अयोध्या जाने का निर्णय उनको क्यों करना पड़ा? बाला साहब ठाकरे के स्वर्गवास के बाद शिवसेना की कमान थामे उनको छः वर्ष हो गए। इस बीच उनको अयोध्या आने की याद नहीं आई। अचानक उनकी अंतरात्मा में श्रीराम भक्ति पैदा हो गई हो तो अलग बात है। किंतु जिसके अंदर भक्ति पैदा होगी वह तिथि तय करके, उसकी पूरी तैयारी कराके नहीं आएगा। 24 नवंबर को उनके अयोध्या पहुंचने के काफी पहले से उनके 22 सांसद, लगभग सभी विधायक एवं प्रमुख नेता अयोध्या में उनके कार्यक्रमों की तैयारी तथा माहौल बनाने में जुटे थे। पूरे अयोध्या को इन्होंने शिवेसना के भगवा झंडे तथा नारों से पाट दिया था। शिवेसना की हैसियत या उद्धव ठाकरे का वैसा जनकार्षण नहीं है कि उनके दर्शन या स्वागत के लिए भीड़ उमड़ पड़े। बावजूद महाराष्ट्र से आए शिवेसना के उत्साही कार्यकर्ताओं ने कुछ समय के लिए वातावरण को उद्धवमय बनाने में आंशिक सफलता पाई। लक्ष्मण किला में पूजा तथा सरयू घाट पर आरती करते उद्धव, उनकी पत्नी तथा पुत्र की तस्वीरें लाइव हमारे पास आतीं रहीं। प्रश्न है कि क्या इतने से उनका उद्देश्य पूरा हो गया?

इस प्रश्न के उत्तर के लिए समझना होगा कि उनका उद्देश्य था क्या? अयोध्या आने के पहले मुखपत्र सामना में उन्होंने केन्द्र सरकार पर ही नहीं हिन्दू संगठनों पर भी तीखा प्रहार किया था। कहा गया कि मन की बात बहुत हो गई अब जन की बात हो। हिन्दू संगठनों से पूछा गया था कि मेरे अयोध्या आने से उनको परेशानी क्यों हो रही है? सरकार से पूछा गया था कि लगातार मांग करने के बावजूद सरकार अयोध्या पर चुप्पी क्यों साधी हुई है? बहुत सी बातें थी जिसे हम शिवसेना शैली मान चुके हैं। लक्ष्मणकिला में पूजा में उपस्थित प्रमुख संतों को देखकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा होगा। इसके बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में केन्द्र सरकार के बारे में कह दिया कि कुंभकर्ण तो छः महीना सोता था और उसके बाद जगता था यह तो स्थायी रुप से सोने वाला कुंभकर्ण है जिसे मैं जगाने आया हूं। यह कहdj कि सिना से कुछ नहीं होता उसमें दम होना चाहिए, दिल चाहिए, ह्रदय चाहिए और वह मर्द का होना चाहिए उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पर हमला किया। मंदिर वहीं बनायेंगे तारीख नहीं बतायेंगे नहीं चलेगा हमें तारीख चाहिए। एक सहयोगी दल के नाते यह सरकार के मुखिया पर अविश्वास एवं तीखा प्रहार था। उसके बाद मांग वही थी, अध्यादेश या विधेयक लाएं। 25 नवंबर की पत्रकार वार्ता भी उनकी अत्यंत संक्षिप्त थी। उनको एवं रणनीतिकारों को पता था कि पत्रकार अनेक असुविधानजनक सवाल पूछेंगे जिनका उत्तर देना कठिन होगा। इसलिए एक छोटा वक्तव्य तथा तीन सवालों का जवाब देकर खत्म कर दिया। यह सवाल पूछा गया था कि उत्तर भारतीयों पर हमले होते हैं तो आप चुप रहते हैं जिसका वो संतोषजक जवाब दे नहीं सकते थे। आखिर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के पूर्व आरंभिक दिनों में शिवेसना भी यही करती थी। उसकी उत्पत्ति सन्स औफ द स्वॉयल यानी महाराष्ट्र महाराष्ट्रीयनों के लिए विचार से हुआ था।

बहरहाल, उद्धव अपना संदेश देकर वापस चले गए। उन्होंने संत समिति द्वारा आयोजित विशाल सभा में भाग लेने की कोशिश भी नहीं की। उस पर एक शब्द भी नहीं बोला। यह भी उनकी स्वयं को सबसे अलग दिखाने रणनीति थी। शिवसेना एवं स्वयं उद्धव बालासाहब के बाद पहचान की वेदना से गुजर रहे हैं। बालासाहब ने परिस्थितियों के कारण क्षेत्रीयतावाद से निकलकर प्रखर हिन्दुत्ववादी नेता की छवि बना ली थी। उनकी वाणी में जो प्रखरता और स्पष्टता थी उद्धव उससे वंचित हैं। हिन्दुत्व के आधार पर ही शिवसेना राजनीति में प्रासंगिक रह सकता है तथा उद्धव भी। उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना अंतर्विरोधी गतिविधियो में संलग्न रही है। जैन समुदाय के पर्व के समय मांस बिक्री पर प्रतिबंध का विरोध करते हुए शिवसैनिकों ने स्वयं मांस के स्टॉल लगाकर बिक्री की। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि शिवसेना भाजपा पर तो प्रहार करती है, लेकिन अपनी कोई निश्चित वैचारिक दिशा ग्रहण नहीं कर पा रही। भाजपा से अलग दिखाने के प्रयासों में उसकी स्वयं की विश्वसनीयता और जनाधार पर असर पड़ा है। इस कारण शिवसैनिकों की परंपरागत आक्रामकता में भी कमी देखी जा रही है।

इसका राजनीतिक असर भी हुआ है। भाजपा महाराष्ट्र में उसके छोटे भाई की भूमिका में थी। आज वैसी स्थिति नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 23 क्षेत्रों मे विजय मिली, जबकि शिवसेना को 18 में। यह परिणाम यथार्थ का प्रमाण था। किंतु शिवेसना उसे मानने को तैयार नहीं थी। शिवेसना ने कहा कि भाजपा की सीटें इसलिए ज्यादा हो गई क्योंकि हमारे मत उसके उम्मीदवारों को मिल गए हमारे उम्मीदवारों को उनके पूरे मत नहीं मिले। यह विश्लेषण सही नहीं था। अपने को साबित करने के लिए विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने गठबंधन तोड़ दिया। परिणाम भाजपा ने 122 विधानसभा सीटों पर विजय पाई जबकि शिवसना 63 में सिमट गई। उसके बाद स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन शिवसेना से बेहतर रहा। शिवसेना अपनी स्थिति को मान ले तो शायद शांति से वह भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन के नाते बेहतर एकजुट रणनीति बना सकती है। किंतु प्रदेश में बड़ा भाई बने रहने की उसकी सोच ऐसा होने के मार्ग की बाधा है। बालासाहब की अपनी छवि थी, जो उन्होंने परिस्थितियों के अनुरुप मुखर बयानों, सही रणनीतियों तथा कर्मों से बनाई थी। भाजपा भी उनका सम्मान करती थी। उन्होंने गठबंधन होने के बाद उद्धव और उनके साथियों की तरह कभी भाजपा पर प्रहार नहीं किया। अटलबिहारी वाजपेयी एवं लालकृष्ण आडवाणी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते थे। संध के अधिकारियों से भी वे संपर्क में रहते थे। उद्वव ऐसा नहीं कर पा रहे हैं और अपनी अलग पहचान बनाने की अकुलाहट में प्रदेश एवं केन्द्र सरकार में होते हुए भी वे एवं उनके लोग विपक्ष की तरह आक्रामक बयान दे रहे हैं।

उनके अयोध्या आगमन को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखना होगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की इच्छा उद्धव के अंदर होगी, लेकिन यह यात्रा राजनीतिक उद्देश्य से किया गया था। अयोध्या का मामला संघ, संत समिति एवं विश्व हिन्दू परिषद के कारण फिर चरम पर पहुंच गया है। उद्धव को लगा है कि प्रखर हिन्दुत्व नेता की पहचान तथा पार्टी के निश्चित विचारधारा का संदेश देने के लिए यह सबसे उपयुक्त अवसर है। इसमें रास्ता यही है कि भाजपा को राममंदिर पर कठघरे में खड़ा करो और स्वयं को इसके लिए पूर्ण समर्पित। यही उन्होंने अयोध्या में किया। उन्होंने कहा कि भाजपा चुनाव के समय राम-राम करती है और चुनाव के बाद आराम। उसके बाद वे और तल्ख हुए। कह दिया कि भाजपा रामलला हम आयेंगे मंदिर वहीं बनायेंगे को पूरा करे या लोगों को कह दे कि यह भी एक चुनावी जुमला था। उन्होंने बार-बार अयोध्या आने का ऐलान किया। देखना होगा कि आगे वे आते हैं या नहीं। किंतु साफ है कि जब तक सरकार कोई कदम नहीं उठाती वो इसी तरह आक्रामकता प्रदर्शित करते रहेंगे। किंतु उद्धव भूल गए कि भाजपा की तरह वे भी कठघरे में है। यह सवाल उन पर भी उठेगा कि इतने दिनों तक उन्हें श्रीराम मंदिर निर्माण की याद क्यों नहीं आई? उनके सांसद संयज राउत दावा कर रहे थे कि रामभक्तों ने 17 मिनट 18 मिनटा या आधा घंटा में काम तमाम कर दिया। उस समय शिवसेना आंदोलन में कहां थी? यह सफेद झूठ है कि शिवसैनिकों ने बाबरी ध्वस्त किया। वो उन शिवसैनिकों को सामने लाएं। जितनी छानबीन हुई उसमें शिवसैनिको का नाम कहीं नहीं आया। भाजपा 1992 तक तो आंदोलन में समर्पण से लगी थी। 1998 तक घोषणा पत्र के आरंभ में इसे शामिल करती थी। शिवेसना ने कभी ऐसा नहीं किया। यदि उद्धव में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर इतनी ही उत्कंठा थी तो उनको उच्चतम न्यायालय में अपने वकील खड़ाकर त्वरित और प्रतिदिन सुनवाई की अपील करनी चाहिए थी। वे प्रधानमंत्री से मिल सकते थे। अपने लोगों को मस्जिद पक्षकारों से बात करने के लिए नियुक्त कर सकते थे। इनमें से कुछ भी उन्होंने नहीं किया। जनता पूरी भूमिका का मूल्यांकन करेगी। अयोध्या आकर पूजा, आरती की औपचारिकता तथा मंदिर के लिए अध्यादेश की माग एवं प्रधानमंत्री की निंदा से वे बालासाहब की तरह महाराष्टृर में हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि नहीं पा सकते।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208 

 

 

 

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

पंजाब में आतंकवादी हमला बड़े खतरे का संकेत

 

अवधेश कुमार

यह निस्संदेह राहत की बात है कि पंजाब पुलिस ने अमृतसर के निरंकारी भवन पर हमला करने वालों को गिरफ्तार कर लिया है।  गिरफ्तार आतंकवादी का संबंध खालिस्तान लिबरेशन फोर्स से है। उसे पाकिस्तानी एजंेंसी आईएसआई से समर्थन मिला था। दोनों हमलावर प्रशिक्षित नहीं थे। पाकिस्तान में किसी हैप्पी से ग्रेनेड मिलने की बात उसने कबूली है। यह हैप्पी पाक स्थित केएलएफ का प्रमुख हरमीत सिंह हैप्पी ही है, जो आरएसएस नेताओं तथा कार्यकर्ताओं और ईसाई पादरी की हत्या के लिये रची गई साजिश का भी मास्टरमाइंड है। पंजाब पुलिस ने इससे पहले पांच ऐसे हथगोले, एके 47 राइफल सहित हथियार बरामद किये, जिन्हें सीमा पार से भेजा गया था। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जिस दृढ़ता से आतंकवादियों को परास्त करने तथा सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने का ऐलान किया है वह स्वागतयोग्य है। किंतु आरंभ में उनकी पुलिस ने जिस तरह के बयान दिए उससे निराशा हुई थी। वस्तुतः जिनने 1980 के दशक में पंजाब के भयावह आतंकवाद के दृश्य देखें हैं उनका दिल निश्चय ही अमृतसर जिले के राजासांसी क्षेत्र के अदलीवाल गांव के निरंकारी भवन पर हुए हमले से दहल गया होगा। रविवार को निरंकारी भवनों हर जगह अनुयायी एकत्रित होते हैं ओर सत्संग चलता है। सत्संग के बीच बाइक सवार दो युवक आएं और मंच के पास बम चलाकर भाग जाएं तो साफ है कि वो निरंकारी के लोगों की हत्या करना चाहते थे।

भले ये प्रशिक्षित आतंकवादी नहीं थे, पर 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकवादी ऐसे ही बाइकों पर नकाबपोश के रुप में आकर हमले करते थे। इसलिए यह तरीका भी भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। पंजाब पुलिस अपने बचाव में जो भी तर्क दे लेकिन यह स्थान अमृतसर शहर से केवल सात किलोमीटर की दूरी पर है। इसे दूरस्थ गांव नहीं माना जा सकता। पंजाब पुलिस का अधिकृत बयान था कि उनके पास किसी भी संभावित खतरे को लेकर कोई इनपुट नहीं था। निरंकारी समाज को लेकर किसी भी तरह का मुद्दा नहीं था और न ही ऐसा कोई इनपुट पुलिस के पास था। क्या पुलिस के पास ऐसी सूचना होगी कि फलां संस्थान और फलां जगह हमला होगा तभी उसे सटीक इनपुट माना जाएगा? धार्मिक स्थलों पर हमले का इनपुट तो था। कुछ ही दिनों पहले थलसेना प्रमुख जनरल विपीन रावत ने कहा था कि पंजाब में आतंकवादी शक्तियां फिर से सिर उठा रहंी हैं और तुरत कार्रवाई नहीं की गई तो हमारे लिए कठिनाइयां बढ़ जाएंगी।

जाहिर है, पंजाब पुलिस ज्ञात तथ्य को छिपाने का प्रयास कर रही थी। हमले के तीन दिनों पहले ही खबर आई थी कि खुफिया एजेंसियों ने दिल्ली पुलिस को इनपुट भेजा है कि कश्मीर का खूंखार आतंकी जाकिर मूसा अपने साथियों के साथ पंजाब के रास्ते दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पनाह ले सकता है। इनपुट में कहा गया था कि जैश-ए-मोहम्मद के 6 से 7 आतंकवादी हमले की साजिश रच रहे हैं। सीमा पार से छह-सात आतंकवादियों के पंजाब में घुसने की खबर थी। जाकिर मूसा के अमृतसर में देखे जाने की खबर आई थी। खुफिया ब्यूरो को इनपुट मिला कि जाकिर मूसा गिरोह के सात आतंकवादी फिरोजपुर आए थे। पठानकोट जिले के माधोपुर के नजदीक ड्राइवर की हत्या कर एसयूवी कार छीनने वाले चार लोग भी अभी तक फरार है। पंजाब पुलिस के हवाले से ही यह बताया गया था कि ये चार आतंकवादी आतंकी मंसूबों को अंजाम देने की खातिर पंजाब में घुसे हैं। ये चारों संदिग्ध जम्मू रेलवे स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज में भी नजर आए थे। दिल्ली से सुरक्षा एजेंसियों ने पांच और संदिग्ध आतंकवादियों की तस्वीरें पंजाब के पुलिस महानिदेशक सुरेश अरोड़ा को मेल की गई थीं। इनका हमले में हाथ नहीं है लेकिन इन सब सूचनाओं के बाद पिछले कई दिनों से पंजाब में हाईअलर्ट तो था।

पिछले 1 नवंबर को पटियाला में शबनमदीप सिंह नामक खालिस्तानी आतंकवादी गिरफ्तार हुआ था। इसने कहा था कि दीपावली से पूर्व हमले की योजना है। इसने बस स्टैंड जैसे भीड़ वाले इलाके में विस्फोट की योजना की बात बताई थी। इसके बाद आखिर पुलिस को क्या इनपुट चाहिए था? जालंघर में ही एक कश्मरी युवक ग्रेनेड के साथ पकड़ा गया था। इतना ही नहीं जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ पंजाब पुलिस ने हाल ही में पंजाब के संस्थानों में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों के दो गिरोहों का पर्दाफाश किया था, जिनके संबंध कश्मीरी आतंकवादी संगठनों से थे। यह खबर भी लंबे समय से थी कि लंदन से कनाडा तक के खलिस्तान समर्थक पंजाब मंे फिर से हिंसा और अशांति की स्थिति पैदा करने के लिए सक्रिय हैं तथा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अपने स्तर पर काम कर रही है। 18 महीनों में स्वयं पंजाब पुलिस ने 15 से ज्यादा आतंकवादी मॉड्यूल को नष्ट करने का दावा किया है। अगर आपने 15 मॉड्यल पकड़े तो निश्चय ही ऐसे अनेक मॉड्यूल छिपे हुए होगे। आंकवादियों ने कैप्टन अमरींदर सिंह एवं सेना प्रमुख जनरल रावत को जान से मारने की धमकी दिया हुआ है। इन सबके बाद कैसा इनपुट चाहिए यह समझ से परे है। 12 अगस्त को लंदन के सिख्ख फार जस्टिस के बैनर से 2020 सिख जनमत संग्रह रैली निकाली गई। इसमें खालिस्तानी उग्रवादी समूहों के बचे आतंकवादियों को संदेश निहित था कि आप सक्रिय हो, आपके साथ बड़ा समुदाय खड़ा है। यह अलग बात है कि इनसे बड़ी संख्या में सिख्खों ने ही लंदन में इनके विरोध मेें रैली निकालकर करारा जवाब दे दिया। किंतु इससे इन दुष्ट समूहों की सक्रियता का पता तो चल ही गया। 

इसलिए ऐसे हमले की आशंका नहीं होने के किस बयान को स्वीकार नहीं किया जा सकता। पंजाब में अशांति पैदा करने वाले भारत विरोधी खालिस्तानी समूह भाड़े के हत्यारों से बीच-बीच में अलग-अलग संगठनों की हत्यायें करवा रहे थे। आरएसएस और शिवसेना के नेताओं की हत्या का उद्देश्य यह था कि इससे हिन्दू गुस्से में सिखों से लड़ने लगंे और प्रदेश सांप्रदायिक दंगांें की चपेट में आ जाए। ठीक यही दृष्टिकोण निरंकारी अनुयायियों पर हुए हमले में भी देखा जा सकता है। निरंकारी मिशन एक बड़ा समूह है। बाबा बूटा सिंह द्वारा 1929 में स्थापित संत निरंकारी मिशन के दुनिया भर में एक करोड़ से ज्यादा अनुयायी माने जाते हैं। ठीक सत्संग के समय हमला करने का सीधा उद्देश्य यही हो सकता है कि ये गुस्से में ंिहंसा आरंभ कर दें। संत निरंकारी मिशन स्वयं को न तो कोई नया धर्म मानते हैं और न ही किसी मौजूदा धर्म का हिस्सा, बल्कि वे मानव कल्याण के लिए समर्पित एक आध्यात्मिक आंदोलन के रुप में स्वयं को देखते हैं। स्थापना के समय से ही सिख समुदाय का एक वर्ग इसका विरोध करता रहा है। वे इसे सिख विरोधी धर्म कहते हैं। 40 वर्ष पूर्व 13 अप्रैल 1978 को वैसाखी के दिन अमृतसर में निरंकारी भवन पर हुए हमले के बाद पंजाब हिंसा की चपेट में आ गया था और भिंडरावाले एक वर्ग में लोकप्रिय हुआ। हमले के बाद अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ जिसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए थे। इसके विरोध में रोष दिवस मनाया गया। जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने इसको उग्र रुप दिया और उसके बाद क्या हुआ हम सब जानते हैं। पंजाब के आतंकवाद पर काम करने वाले कई विद्वान मानते हैं कि अगर वह हमला न हुआ होता तो भिंडरावाले और उसके साथी एक वर्ग के हीरो बनकर नहीं उभरते एवं उस प्रकार के भयावह चरमपंथ का आविर्भाव नहीं होता।

तो पंजाब को हिंसा की आग में झोंकने के हाल के वर्षों के सारे प्रयासों, आतंकवादियों से संबंधित इनपुट, गिरफतारियां, आतंकवादी मॉड्यूल को विफल करने तथा अंततः निरंकारी मिशन के सत्संग पर हमले के बाद यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि पंजाब को ठीक 1980 के दशक के भयावह दौर में ले जाने की साजिशें रची जा चुकीं हैं। हमले का स्थान और समय बताता है कि निरंकारी मिशन पर हमला बिल्कुल सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। भारत विरोधी समूह निश्चय ही इससे 1978 दुहराने की उम्मीद कर रहे होंगे। लेकिन पंजाब के लोगों ने हिंसक संघर्ष का जो दंश झेला है उसमें वे दोबारा किसी सूरत में नहीं फंसेंगे। निरंकारी अनुयायियों ने जिस तरह का धैर्य दिखाया है, उनके प्रवक्ताओं ने जैसा संतुलित बयान दिया है उससे इनकी साजिश विफल हो चुकी है। किंतु ये आगे भी  हमले की कोशिश और भाड़े के हत्यारों से हत्यायें करवायेंगे। उम्मीद है पुलिस आगे कोई बहाना तलाशने की जगह ऐसे साजिशों को समयपूर्व नष्ट करने में सफल होगी। राज्य को केन्द्र तथा दूसरे राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के साथ सतत् समन्वय बनाकर अलगाववादी हिंसा को सिर उठाने के पहले ही कुचलने की हरसंभव कार्रवाई करनी चाहिए। जरुरत हो तो केन्द्र सरकार पंजाब और पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, गृह सचिवों, पुलिस प्रमुखों सहित अन्य सुरक्षा बलों के प्रमुखों के साथ खुफिया एजेंसियों की बैठक बुलाकर आकलन करे तथा सुरक्षा ऑपरेशन की योजना बनाकर आगे बढ़ा जाए।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पंाडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शनिवार, 17 नवंबर 2018

तालिबान के साथ मॉस्को वार्ता में भागीदारी उचित

 

अवधेश कुमार

रुस की राजधानी मास्को में आतंकवादी संगठन तालिबान के साथ बातचीत में शामिल होने की खबर ने देश में हलचल पैदा कर दिया। भारत का आतंकवादी संगठनों से किसी तरह की बातचीत में भागीदारी न करने का रुख रहा है। अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के तालिबानों के साथ कतर की राजधानी दोहा में वार्ता की कोशिशों का भारत ने कभी खुलकर विरोध नहीं किया लेकिन प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई अवसरों पर साफ बोला है कि अच्छे और बुरे आतंकवादी नहीं होते, आतंकवादी आतंकवादी होते हैं। इसमें अचानक भारत के शामिल होने से कुछ प्रश्न पैदा होगे। इस खबर के आते ही जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कह दिया कि जब तालिबान के साथ भारत बातचीत कर सकता है तो यहां के संगठनों के साथ क्यों नहीं करता? इस पर देश में विवाद चल रहा है और आगे भी चलेगा। यह भारत है जहां राजनीतिक दलों के नेताओं का विचार देशहित की सोच से नहीं, वोट की चिंता से निर्धारित होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि विरोधी दल सरकार को दुश्मन मानकर स्टैंड तैयार करते और बयान देते हैं। मास्को वार्ता सम्मेलन के साथ भी यही हुआ है। कोई यह समझने के लिए तैयार नही है कि आखिर भारत का भाग लेना विदेश नीति की दृष्टि से लाभकारी है या नहीं? इसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा? सबसे बढ़कर अगर भारत उसमें शामिल नहीं होता तो क्या होता?

मास्को ढांचा बातचीत पहले भी हुई है और भारत की ओर से संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हुए थे लेकिन उसमें तालिबान नहीं था। पहली बार दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक दफ्तर से एक दल भाग ले रहा है। भारत की ओर से मंत्री नहीं सेवानिवृत्त्त राजनयिक टीसीए राघवन और अमर सिन्हा भाग ले रहे हैं। अमर सिन्हा अफगानिस्तान में भारत के राजदूत और राघवन पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे हैं। विवाद बढ़ने पर विदेश मंत्रालय की ओर से प्रवक्ता रवीश कुमार सामने आए। उन्होंने कहा कि मॉस्को बैठक में भारत ने गैर-अधिकारिक स्तर पर भाग लेने का फैसला किया। रवीश कुमार ने दोहराया कि भारत ऐसे सभी प्रयासों का समर्थन करता है जिससे अफगानिस्तान में शांति और सुलह के साथ एकता, विविधता, सुरक्षा, स्थायित्व और खुशहाली आए। भारत की नीति रही है कि इस तरह के प्रयास अफगान-नेतृत्व, अफगान-मालिकाना हक और अफगान-नियंत्रित होनी चाहिए और इसमें अफगानिस्तान सरकार की भागीदारी होनी चाहिए। इसके बाद कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। भारत वहां तालिबान से बातचीत नहीं कर रहा है। अफगान सरकार भी इसमें सीधे तौर पर भाग नहीं ले रही है। उसके यहां से हाई पीस काउंसिल इसमें भाग ले रहा है। इसी तरह भारत की हिसेदारी गैर-अधिकारी स्तर पर होगी।

सच यह है कि भारत ने रुस के निमंत्रण को स्वीकार करने के पहले काफी विचार-विमर्श किया। अफगानिस्तान से भी बातचीत की गई। अफगानिस्तान की चाहत है कि शांति एवं पुनर्निर्माण के जो भी प्रयास हों उसमें भारत की भागीदारी रहे। वह हम पर ज्यादा भरोसा करता है। अफगानिस्तान में हमारी सक्रियता पाकिस्तान और चीन को संतुलित करता है जो हमारे राष्ट्रीय हित में है। हम वहां  पुनर्निर्माण के काम में व्यापक स्तर पर लगे हैं। क्या स्थिति होती यदि अफगानिस्तान के चाहने के बावजूद भारत उससे अपने को अलग रखता? यह मूर्खता होती जिसका खामियाजा न जाने कितने वर्षों तक भारत को भुगतना पड़ता। पाकिस्तान और चीन दोनों की चाहत थी कि भारत इसमें शामिल नहीं हो। रूस ने मॉस्को ढांचा बातचीत में अफगानिस्तान, भारत, ईरान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, चीन, पाकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कस्मेनस्तान, उज्बेकिस्तान, अमेरिका और अफगान तालिबान को न्योता दिया था। इसमें अमेरिका को छोड़कर सभी भाग ले रहे हैं। ऐसी किसी प्रक्रिया से प्रत्यक्ष तौर पर बाहर रहकर भारत क्या पा लेता?

हा, रुस के इरादे को लेकर संदेह हैं। ऐसा नहीं है कि भारत को इसका पता नहीं है या इस पर विचार विमर्श नहीं किया गया। राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में रुस अमेरिका के समानांतर महाशक्ति के रुप में स्वयं को खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अफगानिस्तान में उसे लेकर आशंकायें हैं और अच्छे संबंध नहीं है। सम्मेलन द्वारा रुस उस देश में अपनी प्रभावी उपस्थिति चाहता है। ध्यान रखिए जब अफगानिस्तान में मजहबी लड़ाकुओं ने संघर्ष आरंभ किया उस समय यह सोवियत संघ के समूह के कम्युनिस्ट शासन के अंतर्गत था एवं नजीबुल्ला उसके द्वारा बिठाए गए अंतिम राष्ट्रपति थे। सोवियत संघ की सेनाएं वहां से वापस गई और चरमपंथियों ने नजीबुल्ला की हत्या कर दिया। संभव है पुतिन के अंदर अपने इस पूर्व प्रभाव वाले देश में सक्रिया भूमिका निभाने की भावना प्रबल हुई हो। रूस यह भी नहीं चाहता कि अफ़ग़ानिस्तान में केवल अमेरिका की मौजूदगी रहे। कुछ लोग इसे शांति वार्ता की जगह अमेरिका के सामनांतर स्वयं को खड़ा कने का सम्मेलन भा कह रहे हैं। रुस पर तालिबानों की मदद करने का आरोप भी लगता है। ऐसा माना जाता है कि रुस अमेरिका से कुछ बातें वहां मनवाना चाहता है। रूस ने इससे इनकार किया है। लेकिन तालिबान के ठिकानों से मिले रूसी हथियार इसकी पुष्टि करते हैं। रुस की नीति यह थी कि आईएसआईएस से लड़ने के लिए तालिबानों की मदद की जाए। यह खतरनाक नीति थी पर थी। माना जाता है कि इस समय अफ़ग़ानिस्तान में दो लाख या इससे अधिक तालिबानी लड़ाके हैं। इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के शरणार्थी शिविरों से आए हुए लोग हैं। इन लड़ाकों को नियमित रूप से वेतन और अन्य खर्च देना होता है। तो कहां से आता है इसके लिए धन? पाकिस्तान की इसमें भूमिका है, पर उसकी हैसियत सारा खर्च उठाने की न थी, न है। इसलिए तालिबान ने नए मददगार तलाशे। ईरान ने भी तालिबान को लंबे समय तक हर स्तर की मदद की थी। हां, आज की स्थिति में ईरान तालिबान की वित्तीय सहायता नहीं करता। साफ है कि तालिबान को कई देशों से हथियार और धन मिल रहे हैं। इसमें रुस का नाम पाकिस्तान के साथ आ रहा है। तालिबान फिर अपने-आप ताकतवार तो हुआ नहीं है।

31 जनवरी 2018 को जारी हुए बीबीसी के एक अध्ययन के अनुसार तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के 70 प्रतिशत हिस्से में खुलकर गतिविधियांे को अंजाम दे रहे हैं जिसमें से छह प्रतिशत पर उसका पूरा नियंत्रण है। अफ़ग़ान सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत बताया। 70 प्रतिशत से कम भी हो लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्र काफी विस्तृत है इस भयावह सच को नकारा नहीं जा सकता।  अगर इसके पीछे रुस की भूमिका है तो फिर अफगानिस्तान ने इसमें अपने यहां से प्रतिनिधि भेजना क्यों स्वीकार किया? रुस लंबे समय से अफगानिस्तान सरकार को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि उसकी रुचि वहां शांति स्थापित करने तथा विकास प्रक्रिया में भागीदारी की है। शायद परिस्थितियां देखकर अफगानिस्तान सरकार ने स्वयं शामिल होने की बजाय गैर आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा। भारत की नीति स्पष्ट है, जहां अफगानिस्तान वहां भारत। यही श्रेष्ठ नीति है। वैसे भी रुस और चीन की कोशिश तालिबान को भी हर प्रक्रिया में एक कोण बना देने की लग रही है। तालिबान को मान्यता देने का भागीदार भारत नहीं बन सकता लेकिन उसकी अनुपस्थिति का लाभ लेकर ये देश ऐसा कर लें यह भी हमारे हित में नहीं है। वहां हमारे गैर आधिकारिक प्रतिनिधि इसके विरुद्ध तर्क दे सकते हैं। इस तरह मास्को वार्ता में भागीदारी हर दृष्टि से भारत के दूरगामी हित में है। 

हालांकि मॉस्को सम्मेलन से अफगानिस्तान में शांति स्थापना की दिशा में कोई ठोस परिणाम निकलने की अभी संभावना नहीं है। तालिबान ने बयान जारी किया कि हमारा प्रतिनिधमंडल अमरीका की घुसपैठ पर चर्चा केंद्रित रखेगा। शांति वार्ता के पहली शर्त होती है, हिंसा का रुकना। तालिबान ने आतंकवादी हमले बंद नहीं किए हैं। अमेरिका के बिना अफगानिस्तान के लिए किसी शांति प्रयास का कोई अर्थ नहीं है। अमेरिका तालिबान से क़तर में बातचीत कर रहा है। जुलाई और अक्तूबर में दो दौर की बातचीत संपन्न हो चुकी है। तालिबान की मुख्य मांग विदेशीे सेनाओं की वापसी की है तथा वह कहता रहा है कि अमेरिका के अलावा किसी से बातचीत व्यर्थ है। तालिबान अफ़ग़ान सरकार को कठपुतली का प्रशासन कहता है और हिंसा रोकने को तैयार नहीं। ऐसी मानसिकता में शांति संभव ही नहीं है। बावजूद इसके अगर रुस वार्ता आयोजित किया है, अफगानिस्तान सहित 10 देशों तथा तालिबान को भाग लेने के लिए तैयार किया तो हमें उससे कतई दूर नहीं रखना चाहिए था। अफगानिस्तान संबंधी प्रयासों में पाकिस्तान और चीन रहे तथा हम न रहें यह तो पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

 

 

 

 

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/