मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

गाँव की चौपाल: खुशहाली की मज़बूत नींव

डॉ. राजेश के पिलानिया

भारत के कई हिस्सों में गाँव की चौपाल एक पारंपरिक एकत्र होने का स्थान है, जो स्थानीय बैठक स्थल और सामाजिक केंद्र के रूप में काम करता है। यह केवल मिलने या सामाजिक जमावड़े की जगह नहीं है; बल्कि लंबे समय से गाँव के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रही है। इसकी प्रासंगिकता और महत्त्व सर्वविदित हैं।

गाँव की चौपाल और खुशहाली - गाँव की चौपाल एक प्रभावशाली स्थान है और खुशहाली का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है, लेकिन दुर्भाग्य से इस भूमिका को उतनी पहचान नहीं मिलती। गाँवों की खुशहाली के लिए इसके इस पहलू को समझना ज़रूरी है, साथ ही इसकी कमियों और उभरती चुनौतियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। गाँव की चौपाल कई तरीकों से खुशहाली में योगदान देती है। इनमें से कुछ प्रमुख पहलू नीचे दिए गए हैं।

सामाजिक मेल-जोल और सामुदायिक भावना - पहला, यह वह स्थान है जहाँ पारंपरिक बैठकों का आयोजन होता है और यह सामाजिक केंद्र के रूप में कार्य करता है, जिससे समुदाय और आपसी जुड़ाव की भावना विकसित होती है। यह सामुदायिक भावना जीवन को अर्थ और उद्देश्य देती है, जिससे लोगों में खुशहाली बढ़ती है।

आपसी बातचीत से अकेलेपन में कमी - दूसरा, यह बैठक स्थल लोगों को आपस में बातचीत के अवसर देता है, जिससे अकेलेपन की समस्या कम होती है। आज के समय में अकेलापन दुनिया भर में खुशहाली के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। हालाँकि कुछ स्थानों पर इन चौपालों का उपयोग पुरुषों के लिए महिलाओं की तुलना में अधिक आसान होता है।

मजबूत रिश्तों का निर्माण - तीसरा, यह स्थान लोगों के बीच मजबूत संबंध और रिश्ते बनाने में मदद करता है। दुनिया भर में खुशहाली पर हुए विभिन्न शोधों के अनुसार, रिश्ते खुशहाली के प्रमुख स्रोतों में से एक हैं।

हास्य, हँसी और भावनात्मक स्वास्थ्य - चौथा, यह वह जगह है जहाँ लोग हास्य और हँसी का आनंद लेते हैं, जिससे एंडोर्फ़िन का स्राव होता है, जो चार प्रमुख खुशहाली हार्मोनों में से एक है, और यह खुशहाली को बढ़ावा देता है।

मनोरंजन और जीवन का आनंद - पाँचवाँ, लोग यहाँ खेलों और अन्य सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, जिससे जीवन का आनंद बढ़ता है और खुशहाली में वृद्धि होती है।

सहायता लेना और देना - छठा, लोग इस स्थान का उपयोग सहायता माँगने और सहायता देने के लिए करते हैं। दूसरों की मदद करना या ज़रूरत पड़ने पर मदद लेनादोनों ही खुशहाली में योगदान देते हैं।

भावनाओं की साझेदारी और तनाव में कमी - सातवाँ, लोग यहाँ केवल भौतिक स्थान ही साझा नहीं करते, बल्कि भावनाएँ, वस्तुएँ, और जीवन के सुख-दुख भी साझा करते हैं। इससे तनाव कम होता है, भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहतर होती है और भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

समग्र भलाई पर प्रभाव - ये कुछ प्रमुख पहलू हैं जो तनाव, पीड़ा और असंतोष को कम करने और खुशहाली समग्र कल्याण को बढ़ाने में मदद करते हैं। यह सच है कि चौपालों पर समस्याएँ, बहसें और मतभेद भी होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में सहमति के माध्यम से इन्हें संभाल लिया जाता है, हालाँकि इसके विपरीत स्थितियाँ भी कई बार देखने को मिलती हैं।

बदलते समय में चौपाल की प्रासंगिकता - इस प्रकार, गाँव की चौपाल की अवधारणा एक खुशहाल जीवन के निर्माण के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। लेकिन समय के साथ, सोशल मीडिया पर बढ़ते ज़ोर और आमने-सामने के संपर्क में कमी के कारण यह अवधारणा कमजोर होती जा रही है। यदि गाँव की चौपालों का बेहतर प्रबंधन किया जाए और उभरती चुनौतियों तथा नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो गाँव चौपाल मॉडल के माध्यम से अधिक खुशहाल और संतोषजनक जीवन की ओर बढ़ सकते हैं। 

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर और भारत के हैप्पीनेस गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं।)

 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

खुशी बढ़ाने में गले लगाने की वैज्ञानिक भूमिका

डॉ. राजेश के पिलानिया 

हम सभी के लिए एक खुशहाल जीवन जीने के तरीके खोजना महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए खुशी अंतिम लक्ष्य है और एक अच्छे जीवन की ऑक्सीजन है। हम खुशी को संयोग पर नहीं छोड़ सकते।

खुशी के एक साधन के रूप में गले लगाना - खुशी के लिए उपलब्ध एक महत्वपूर्ण साधन है गले लगाना। गले लगाना वह व्यवहार है जिसे हम अनादि काल से करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं हैहर कोई इसके बारे में जानता है और समय-समय पर इसका उपयोग करता है। गले लगाने का यह सरल साधन हमारी खुशी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गले लगाने और खुशी पर शोध प्रमाण- कई शोध अध्ययनों ने बार-बार और स्पष्ट रूप से यह दिखाया है कि गले लगाना खुशी बढ़ाने में मदद करता है। इसके कुछ प्रमुख कारण नीचे दिए गए हैं।

पहला, गले लगाने से ऑक्सीटोसिन नामक खुशी का हार्मोन स्रावित होता है, जो व्यक्ति को प्रसन्न महसूस कराता है

दूसरा, गले लगाना कॉर्टिसोल के स्तर को कम करने में मदद करता है, जिससे तनाव घटता है।

तीसरा, स्पर्श के माध्यम से गले लगाना पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करता है, जिससे हृदय गति कम होती है और तंत्रिका तंत्र शांत होता है।

चौथा, गले लगाना व्यक्ति को जुड़ाव का अनुभव कराता है और अकेलेपन की भावना को कम करता है, जो आज की दुनिया में दुख का एक प्रमुख कारण है।

पाँचवाँ, गले लगाना सुरक्षा और विश्वास की भावना उत्पन्न करता है, और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा खुशी की मुख्य आवश्यकताओं में से एक है।

छठा, गले लगाना भावनात्मक संबंधों और रिश्तों को मजबूत करता है, जो खुशी के मूल कारणों में से हैं, जैसा कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए सबसे लंबे खुशी अध्ययन में दर्शाया गया है।

सातवाँ, गले लगाना व्यक्ति को भावनात्मक सहारा महसूस कराता है और क्रोध या उदासी जैसी नकारात्मक भावनाओं को कम करने में मदद करता है।

आठवाँ, गले लगाना लोगों को जुड़ा हुआ, प्रेमित और देखभाल किया हुआ महसूस कराता है, जिससे जीवन अधिक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण लगता हैजो खुशी के लिए एक आवश्यक शर्त है।

नौवाँ, गले लगाना उत्सव, आनंद, सराहना और जुड़ाव का एक माध्यम भी है, जब लोग लंबे समय बाद मिलते हैं या किसी अवसर का उत्सव मनाते हैं।

दैनिक जीवन में गले लगाने को शामिल करना - जैसा कि ऊपर देखा गया, गले लगाने के खुशी, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए अत्यधिक लाभ हैं। इसलिए हमें गले लगाने को गंभीरता से लेना चाहिए और इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

गले लगाते समय सजग रहना - हालाँकि, फ्लू के मौसम, वायरल संक्रमण या कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान गले लगाने में सावधानी बरतनी चाहिए। साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों तथा परंपराओं के प्रति भी जागरूक रहना आवश्यक है।

पाठकों के लिए संदेश -इसलिए, हमें सजगता के साथ गले लगाना चाहिए और इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की आदत विकसित करनी चाहिए, ताकि तनाव का ध्यान रखा जा सके, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सहयोग मिले, रिश्ते और जुड़ाव मजबूत हों, तनाव का प्रबंधन हो सके और ऊपर बताए गए अन्य अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकें। गले लगाने के इस सरल कार्य से व्यक्ति खुशी को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना सकता है और अधिक खुशहाल जीवन जी सकता है।

आइए अब से हम खुशी की ओर बढ़ने के लिए गले लगाना शुरू करें! और गले लगाने के माध्यम से खुशी का अनुभव करें तथा उसे दूसरों के साथ साझा करें, क्योंकि इससे दोनों पक्ष अधिक खुश महसूस करते हैं। खुशहाल गले लगाना!

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर और भारत के हैप्पीनेस गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं।)

 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

घूसखोर पंडत फिल्म पर विवाद क्यों?

बसंत कुमार

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज बाजपेई की फिल्म घुसखोर पंडित के शीर्षक पर विवाद हो रहा है यद्यपि उच्च न्यायालय में फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दे दिया है का शीर्षक बदल दिया जायेगा, इससे यह विवाद तो रूप गया है पर इसके पीछे कुछ प्रश्न छोड़ दिया गया है कि पंडत शब्द क्या किसी वर्ण विशेष की जागीर है और क्या इस फिल्म के माध्यम से उस वर्ण विशेष की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचा रहा है और फिल्म उद्योग द्वारा बन रही फिल्मों में किसी जाति पर और क्षेत्र के लोगो की विशेष छवि को पेश किया जाता रहा है पर आज तक इस पर विरोध नहीं हुआ तो क्या हजारों वर्ष प्राचीन वर्ण व्यवस्था इतनी इतनी हल्की सोच की हो गई है कि उससे मिलते जुलते नाम पर ही कोई फिल्म बनाने पर विवाद खड़ा हो गया और मामला सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट तक पहुंच गया।

सत्तर के दशक की फिल्मों में जब से फिल्मों में भ्रष्टाचार आदि विषयों पर फिल्में बनने लगी है या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने लगी तब से फिल्म केटाइटल पर विरोध होने लगा है। एक दशक पहले फिल्म पद्मावत के मूल शीर्षकों पर विवाद खड़ा हुआ और करणी सेना ने फिल्म के रिलीज पर ही अपनी आपत्ति खड़ी कर दी थी। जबकि रानी पद्मावती का यह चरित्र चित्रण प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने काव्य में कई सदियों पहले लिखा पर उस समय उस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई पर अब हम इतने असहनशीन हो गए हैं कि किसी फिल्म के टाइटल मात्र से भड़क जाते है बगैर यही जाने की इसमें फिल्म में उस चरित्र की प्रशंसा है या आलोचना। मैने स्वयं फिल्म पद्मावत देखी और पाया कि रानी पद्मावती का जो व्यक्तित्व फिल्म में दर्शाया गया है उस पर न सिर्फ क्षत्रिय समाज नहीं बल्कि पूरे हिंदू समाज को गर्व होना चाहिए एक पतिव्रता जो सुंदर होने के साथ साथ अपने पति और राज्य की जनता के भले के लिए सोचता रहती है और ऐसे उच्च व्यक्तित्व वाली महारानी के बारे में हमारा पीढ़ियां जाने, बाकी इस ऐतिहासिक सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अलाउद्दीन खिलजी ने हिंदुस्तान में शासन किया और वह बहुत ही क्रूर था बाकी सुंदर स्त्रियों के लिएआकर्षण मानव की कमजोरी रही है और न जाने कितने युद्ध इसीलिय हुए पर हमारे इतिहास में महिला के व्यक्तित्व को लेकर जो अवधारणा रही है वो कभी नहीं बदली और न बदलेगी।

यदि हम अपने समाज में प्राचीन कहानियों को पढ़े तो हर कहानी इसी बात से शुरू होती थी कि गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था और एक धनी साहूकार रहता था जहां ब्राह्मण को लोगो से प्राप्त दान और दक्षिणा से ही गुजारा करता हुआ दिखाया जाता था वही साहूकार बनिया को सूदखोर लोगों की जमीन हड़पने वाला दिखाया जाता था तो क्या इन कहानियों ने सामाजिक सद्भाव को कभी बिगाड़ा, मुंशी प्रेम चंद की कहानी सबसेर गेहूं में गांव के जमींदार का जो चित्रण दिखाया गया है उस पर किसी जमीदार साहू कार ने कभी कोई अपत्ति नहीं की, लेकिन यह कहानी आज के युग में लिखूं गई होता तो मुंशी प्रेम चंद के पुतले जला दिए गए होते या फिर वे किसी कोर्ट में अपने बचाव में वकील के साथ खड़े हुए होते दिखाई देते। उनकी एक और कहानी में किसान की गाय खूंटे से बंधे बंधे मर जाती है और गो हत्या के दोष से किसान का ब्राह्मणों द्वारा जो शोषण दिखाया गया क्या उस पर कभी ब्राह्मण समाज ने क्या कभी आपत्ति की?शायद कभी नहीं बल्कि सभी उसको पढ़कर आनंद उठाते।

जहां तक हिंदी फिल्मों की बात है तो फिल्मों में किसी एक जाति विशेष और क्षेत्र विशेष के लोगों को एक विशेष रूप में दसको से दिखाया जाता रहा है लेकिन कभी इस पर कभीभी भी कोई आपत्ति नहीं हुई। फिल्मों में घर के नौकर क्या रसोईया पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के लोगों को दिखाया जाता रहा है और इन्हें महाराज कहके बुलाया जाता है, अब यह नहीं समझ में आता कि महाराज कोई जाति है या एक उपनाम बताया गया है इसी प्रकार पुजारी को किसकी जाति ब्राह्मण होती है उसको पाखंडी ढोंगी सदैव लालची दिखाया जाता रहा है। इस प्रकार बनिया को बेईमान सूद खोर अत्याचारी दिखाया जाता रहा है बात यहीं तक नहीं रुकती क्षत्रिय को ठाकुर जमीदार के रूप में दिखाई जाता है जो जनता पर अत्याचार करता रहता है और जनता उनके रहमों करम पर जीती है जैसे राजेंद्र कुमार और प्राणद्वारा अभिनीत फिल्म गवार में जो जमीदार राजपूत की छवि दिखाई गई है और कभी भी गले से नहीं उतरती पर किसी भी वर्ग ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई भारतीय फ़िल्म उद्योग की पहली फिल्म अछूत कन्या में अंतर्जातीय विवाह जैसी चीज दिखाइए और यह दर्शाया गया की एक दलित कन्या को समाज में किस तरह से ट्रीट किया जाता है पर इस पर किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं दिखाई, वही फिल्मों में पादरी को नेक और मुसलमान को आतंकी दिखाया जाता है और दलित को पूरी फिल्में हाथ जोड़ता हुआ और कोड़े खाते हुए दिखाया जाता है पर आज तक इस समाज में कभी आपत्ति नहीं हुई पर ऐसा क्या है कि अब लोग इन छोटी-छोटी बातों पर लोग सोशल मीडिया से लेकर कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। और हमारे न्यायालय अपने बेशकीमती समय को लाखों की संख्या में पेंडिंग मामलों को निपटाने के बजाय इन फालतू बातों पर ध्यान देते है।

वैसे यह बात सर्वविदित है कि पंडित शब्द किसी जाति विशेष के लिए नहीं इस्तेमाल नहीं किया जाता क्योंकि हिंदू वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण एक वर्ण है ना कि जाति है और उसी तरह से पंडित सम्मान पूर्वक विद्वानों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला शब्द है इसको किसी भी रूप में ब्राह्मण का समानार्थी या पर्यायवाची नहीं माना जा सकता जैसेप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आशीर्वाद जी को लीजिए इसीलिए उनको पंडित इसलिए कहा गया है कि अपने क्षेत्र की महान विभूति है जबकि उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है इसी प्रकारअनेक विभूतिया है जिनको हम पंडित कहते हैं लेकिन वह जाति से ब्राह्मण नहीं है। पंडित आनंद नारायण मुल्लाह एक ऐसी विभूति थे जिनके नाम के आगे पंडित और पीछे मुल्लाह दोनों सब लगे हैं। इसी प्रकार पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिसके नाम के आगे पंडित और पीछे बिस्मिल दोनों लगा हुआ था। पता नहीं कितने ऐसे लोग हैं जो नाम के आगे पंडित तो लगते हैं पर उनकी जाति ब्राह्मण नहीं है फिर इस फिल्म में पंडित को ब्राह्मण का पर्यायवाची क्यों मान लिया गया और उसके रिलीज होने पर आपत्ति क्यों लगाई। पता लगा है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माताओं जाता हूं भारत सरकार और फिल्म सेंसर बोर्ड को नोटिस जारी किया है कि इस टाइटल के साथ फिल्म कैसे पास की गई जबकि वास्तविकता यह है कि पंडित शब्द किसी भी रूप में ब्राह्मण का पर्यायवाची नहीं है।

नाम के आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने पर प्रसिद्ध राष्ट्रवादी विचारक व विद्वान डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी ने एक आपत्ति उठाई थी की डॉ. आंबेडकर जो जिनके पास 32 डिग्रियां थी कई भाषाओं का ज्ञान था वह कानून की अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और संविधान निर्माता के रूप में विभिन्न विषय पर पकड़ थी पर उनके आगे पंडित शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने उन्हें बाबा साहब बना दिया गया और जवाहर लाल नेहरू नेहरू जो किसी भी दृष्टिकोण से विद्वान नहीं थे उनके नाम के आगे पंडित लगा दिया गया। इसी तरह देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने भी कहा था कि हम डॉक्टर अंबेडकर को बाबा साहब आंबेडकर के बजाय पंडित आंबेडकर क्यों नहीं कह सकते और संभावित इन लोगो की यह बात मान ली गई होती तो आज हिंदू समाज में सवर्णों और दलितों के बीच जो शीत युद्ध चल रहा है वह नहीं हुआ होता और संभवत बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने धर्मांतरण नहीं किया होता इसलिए हमें यह मानना पड़ेगा की पंडित शब्द शब्द किसी जारी के लिए नहीं बल्कि विद्वता का सूचक है और यह विद्वानों के साथ ही लगाए जाना चाहिए।

कैसी विडम्बना है कि दुनियां की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में से एक जिसने अपने देश में आने वाले विभिन्न संस्कृतियों को मानने वाले लोगों को अपने में समाहित कर लिया है और इस संस्कृति में प्राचीन काल से विभिन्न जातियों को लेकर अनेक कहावतें कही जाती रही हैं और कभी भी किसी जाति के लोगों ने बुरा नहीं माना, पर आज हमारी सोच इतनी संकीर्ण हो गई है कि एक फिल्म के टाइटिल पर ही इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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