सोमवार, 26 जनवरी 2026

यूजीसी अधिसूचना 2026 का विरोध क्यों?

बसंत कुमार

अभी हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देशभर में उच्च शिक्षा संस्थान में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम अनुसूचित किए हैं, इन नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान के परिसर ने समानता इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है, इनका न पालन करने पर संस्थान को डिग्री या कार्यक्रम प्रदान करने से रोकने और दंड का सामना पड़ सकता है। नए नियमावली के अनुसार प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र स्थापित करना और समावेशन सुनिश्चित करना है, इसके अंतर्गत एक इक्विटी कमेटी गठित होनी है जिसका जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में ओबीसी विकलांग एससी-एसटी और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। इक्विटी कमेटी को वर्ष में काम से कम दो बैठक करना अनिवार्य होग, प्रत्येक संस्थान को ईओसी के कार्य प्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

अब प्रश्न क्या उठना है कि इस नई नियमावली की आवश्यकता क्यों पड़ी संभवतः इसके निम्न कारण दिखाई देते हैं-

  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्च शिक्षा संस्थानों में क्षमता को बढ़ावा देना वन में 2026 को 13 जनवरी 2026 को अनुचित किया यह वर्ष 2012 से लागू भेदभाव रूपी नियमों का अध्यतन रूप है।
  • पिछले वर्ष फरवरी में यूजीसी ने इन नियमों का मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग की जाति आधारित व भेदभाव के दायरे से बाहर रखा क्या गया था।
  • मसौदा न्यू मूवी यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हाथों उत्साहित करने के लिए जुर्माने का प्रावधान किया जाए।
  • अंतिम अधिवेशन नियमों में यूजीसी में ओबीसी को जाकर भेदभाव के दायरे में शामिल किया गया है साथ ही भेदभाव की परिभाषा को थोड़ा परिभाषित किया गया है ताकि इसमें वर्ष 2012 के भिन्नमालयों की निहित भाषा को भी शामिल किया जा सके।

-    अब भेदभाव अब की परिभाषा किसी भी हित कारक के खिलाफ चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष हो केवल धर्म चाहती लिंग जन्म स्थान विकलांगता या इसमें से किसी भी आधार पर किया गया, अनुचित क्या पक्षपात पूर्ण व्यवहार या कोई भी कार्य भेदभाव के अंतर्गत शामिल किया जाएगा।

यूजीसी के उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा को प्रोत्साहित करने के नियम 2026 पर विवाद काफी गहरा गया है उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों में सवर्ण समाज इसका विरोध कर रहा है। जबकि सरकार इसे सामान्य बढ़ाने की पहला बता रही है, विरोधियों का कहना है कि यह असमानता को बढ़ावा देगा समान समाज ने इस नियमावली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को लिखे अपने पत्र में निमन बातें लिखी है -

-    पिछला वर्ग और दलित वर्ग के छात्रों के साथ किसी भी तरह का न्याय नहीं होना चाहिए लेकिन नए नियम बनाते समय सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए नया नियम सामान्य समाज के छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन सकता है।

इस नए अधिनियम का विरोध करने के लिए सवर्ण समाज पूरी तैयारी के साथ बैठा हुआ है वही डासना धाम के महंत महामंडलेश्वर यदि नरसिंहानंद गिरि ने गंगा किनारे इस अधिनियम के विरोध के लिए धरने पर बैठने जा रहे थे पर पुलिस ने शांति व्यवस्था के गड़बड़ होने की आशंका से महामंडलेश्वर को वहां जाने से रोक दिया, परिणामस्वरूप महामंडलेश्वर की समर्थकों ने इसका घोर विरोध किया, कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के एक सिटी मजिस्ट्रेट ने इस अधिनियम और महामंडलेश्वर के साथ हुए व्यवहार के कारण अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है पर यह स्पष्ट नहीं है कि उस मजिस्ट्रेट कर त्यागपत्र कुछ और कारणों से है या यूजीसी के नए नियमावली के विरोध में है।

यूजीसी का कहना है कि नए नियम साल 2012 के उसे भेदभाव निरोधी ढांचे को मजबूत करने के लिए जारी किए गए हैं उनका तर्क है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 2019 की तुलना में 2023 में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। हकीकत यह भी है कि यह निर्णय हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या और सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्देश के बाद आया है। रोहित वेमुला केस में उसे वक्त देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालय के कैंपस का राजनीतिक कम तापमान बढ़ गया था। विपक्ष ने इस मामले को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। वामपंथी दलों के साथ साथ जवाहर लाल यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में महीना तक प्रोटेस्ट चला था।

इस यूजीसी ऐक्ट में अति पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को भी जोड़ दिया गया है लेकिन एक बात पर ध्यान नहीं दिया गया है कि अति पिछड़ों में वर्गीकृत जाट, यादव, कुर्मी जैसी डोमिनेंट जातियां भी अनुसूचित जातियों और जनजातीय के खिलाफ भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाते हैं। क्योंकि ये जातियां भी अपने आप को क्षत्रिय वंशियों के रूप में मनाती रही हैं। हम दलित और आदिवासियों के साथ भेदभावपूर्ण जातिगत भेदभाव के मामले में यह सवर्णों से पीछे नहीं रहती है। अगर एससी/एसटी एक्ट में दर्ज हुए मामलों की संख्या पर ध्यान दिया जाए तो ये जातियां दलित और आदिवासियों पर अत्याचार के मामले में बहुत आगे रही है इसलिए यूजीसी एक्ट के अधिनियम-2026 में ओबीसी वर्गों को शामिल करके सिर्फ सवर्ण जातियों को छोड़ दिया जाना भी विवाद का विषय है। ठीक है कि निम्न वर्ग की अधिक पिछड़ी जातियां नाई, कोहार, मल्लाह, लोहार, नोनिया, माली आदि दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार नहीं करती या भेदभाव नहीं करती पर जो ओबीसी में वर्गीकृत डोमिनेंट जातियां हैं वे इन पर भेदभाव करती हैं और इस बात को इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए यह नियमन सूचित करते समय की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था।

यूजीसी के उच्च शिक्षण संस्थान में एससी -एसटी के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल किया गया है क्योंकि यूजीसी का मानना है कि अब तक के पिछले प्रावधान कैंपस में जांच के भेदभाव को कम करने में या रोकने में नाकाम रहे हैं। यूजीसी की अपनी रिपोर्ट के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतें कम होने के बजाय बढ़ी है, जब इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हो रही है तो इसे रोकने के लिए सशक्त समयबद्ध और जवाब देह प्रावधानो की जरूरत होती है, इसी कारण नए नियमों के अनुसार भेद भाव की शिकायत के 24 घंटे में समिति की बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्यवाही की समय सीमा तय की गई है। जब यह सवाल उठाए जा रहा है कि इस समिति में सवर्ण वर्ग या सामान्य वर्ग के लोगों को क्यों नहीं शामिल किया गया तो इस बारे में ध्यान देने की बात यह है कि इस मामले में जो भी कमेटी बनेगी, उसका अध्यक्ष संस्थान का प्रमुख होगा और यह भी बात किसी से छिपी नहीं है की उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रमुख ज्यादातर सवर्ण समाज के व्यक्ति होते हैं और उच्च शिक्षा के प्राइवेट संस्थान अधिकांशतः ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य समाज के लोगो के होते है, इसके अलावा समिति में एससी/एसटी या ओबीसी को रखने के बाद इसलिए की गई है कि स्वतंत्र भारत में पिछले 80 वर्षों से एक परिपाटी चली आ रही है कि सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री दलित ही होगा और आदिवासी मंत्रालय का मंत्री आदिवासी ही होगा और अल्पसंख्यक मंत्रालय का मंत्री मुस्लिम या ईसाई होता है और गृह मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय का मंत्री कोई दलित या पिछड़ा न होकर कोई सवर्ण या वैश्य ही होता है। जब तक हम सभी वर्गों एवं जातियों में आपसी विश्वास पैदा नहीं कर लेते तब तक इस तरह की हालत होते रहेंगे जिस दिन एक सवर्ण सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का मंत्री बनेगा और जाति द्वेष और उत्पीड़न समाप्त हो जाएगा तो इस देश में इस तरह की कमेटी की आवश्यकता नहीं रहेगी।

वर्ष 1950 में तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर द्वारा सदन में हिंदू कोड बिल लाया गया जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में महिलाओं को समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार का देना था, पर उस समय काशी के धर्म गुरु स्वामी करपात्री महाराज के विरोध के कारण यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका और कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और उसके 77 वर्षों बाद भी महिलाएं अपने बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसलिए धर्म गुरुओं को विधायिका के कार्यों से दूर रहना चाहिए। अभी भी यूजीसी अधिनियम का विरोध कुछ धर्मगुरुओं और शंकराचार्य द्वारा किया जा रहा है जो उचित नहीं है क्योंकि देश की विधायिका यानी संसद में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर लगभग 700 सांसद है और जिसमें से आधे से अधिक सांसद सवर्ण समाज के हैं तो उनका यह कर्तव्य बनता है कि विधायक का हिस्सा होने के कारण इस अधिनियम के गुण दोष का विश्लेषण करके उसे सदन के माध्यम से उठाएं, इस बिल का विरोध करने वाले संत महात्मा शंकराचार्य ने यह साबित कर दिया है कि वे पूरे हिंदू समाज के धर्मगुरु न होकर सिर्फ सवर्ण समाज के धर्म गुरु है यह स्थिति ठीक नहीं है इससे हिंदू समाज सवर्णों पिछड़ों और दलितों के बीच बट जाएगा और इससे हिंदू संस्कृति का नुकसान होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का लोकार्पण, कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ भव्य समारोह

संवाददाता 

नई दिल्ली। समसामयिक विषयों की अंतरराष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका चाणक्य वार्ता के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन व परिचर्चा एवं सहस्त्र-चंद्र-दर्शन कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक लक्ष्मीनारायण भाला जी के जन्मदिवस पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आपको बता दे चाणक्य वार्ता ने अपने गौरवमय 10 वर्षों का सफर पूरा किया है। पत्रिका मौजूदा समय में भारत की लोकप्रिय पत्रिकाओं में एक मानी जाती है। इस कार्यक्रम में पत्रिका के बाल साहित्य विशेषांक का विमोचन किया गया। इस विशेषांक में 125 लेखकों ने बच्चों को केंद्र में बनाकर लेख, कहानियां, कविताओं के माध्यम से अपना योगदान दिया है। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्याम जाजू ने कहा कि चाणक्य वार्ता अपने आप में एक अद्भुत पत्रिका है। कोरोना काल के दौरान अनेक स्थापित पत्रिकाएं बंद हो गई मगर चाणक्य वार्ता इस कठिन समय में भी लगातार प्रकाशित होती रही। उन्होंने कहा कि इस पत्रिका ने कम संसाधनों में भी लंबा सफर तय किया है। यह दिखाता है कि जनहित से जुड़ी पत्रकारिता करने के लिए बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती है। श्री भाला के विषय में बोलते हुए श्याम जाजू ने कहा कि भाला जी 82 वर्ष की आयु में भी बहुत सक्रिय होकर कार्य कर रहें है।वें युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि भाला जी हमेशा लोगों की मदद करने के लिए आगे रहते हैं।

समारोह अध्यक्ष श्री ताई तागा, संरक्षक, विद्या भारती एवं पूर्व अध्यक्ष भाजपा, अरुणाचल प्रदेश ने इस मौके पर नॉर्थ ईस्ट के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाएं गए कदमों को लेकर कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ने नॉर्थ ईस्ट को बाकी राज्यों के साथ सार्थक रूप से जोड़ने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इन राज्यों के लोगों को एक नई पहचान देने का काम किया है। इसके अलावा मोदी सरकार के प्रयासों से नॉर्थ ईस्ट में विकास की गंगा बह रही है। समारोह को संबोधित करते हुए डाॅ. विनोद बब्बर, वरिष्ठ साहित्यकार ने चाणक्य वार्ता को 10 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनाएं प्रदान की। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार एवं संविधान विशेषज्ञ लक्ष्मीनारायण भाला ने अपने संबोधन में कहा कि संघ की शाखा के माध्यम से उनको बच्चों से जुड़ने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि बच्चों से उन्होंने बहुत कुछ सिखा है वह कहते है कि उनको 10 से अधिक भाषाएं आती है यह सब उनको बच्चों के माध्यम से सीखने को मिली है। उन्होंने चाणक्य वार्ता को लेकर कहा कि वह इस पत्रिका के संरक्षक है और उनको गर्व है कि पत्रिका को देश के लाखों लोग अपना आशीर्वाद दे रहे है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यह पत्रिका सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हो रही है। चाणक्य वार्ता आज जनसाधारण की आवाज बनकर सामने आई है। इस कार्यक्रम में डाॅ. बलराम अग्रवाल, बाल साहित्यकार, अलका सिन्हा, वरिष्ठ साहित्यकार ने भी अपने विचार साझा किए। वहीं इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत मृत्युंजय झा, मुख्य संयोजक द्वारा किया गया। स्वागत भाषण द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अजीत कुमार ने सभी का आभार जताया‌।कार्यक्रम का संचालन डाॅ. अमित जैन, संपादक-चाणक्य वार्ता द्वारा किया गया।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को सकारात्मक दृष्टि से देखें

अवधेश कुमार

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तीन दिवसीय कार्यक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जैसी भी रही हो देश ने इससे सकारात्मक संदेश लिया है। कार्यक्रम के आकर्षक दृश्यों ने देश में अपने इतिहास -संस्कृति -सभ्यता -अध्यात्म को लेकर सुदृढ़ हो रही चेतना को और सामूहिक बल प्रदान किया है। स्पष्ट है पूरे कार्यक्रम की योजना अत्यंत गंभीर विवेचन के बाद बनी जिसमें अध्यात्म ,साधना व कर्मकांड सहित इतिहास और पराक्रम का समुच्चय उचित रूप में समाहित था। तीन दिनों के मंत्र जाप के कर्मकांडीय विधान के पीछे संपूर्ण वातावरण में सकारात्मक चेतना और ऊर्जा पैदा कर ब्रह्मांड के कल्याण में योगदान का भाव था तो 108 घोड़े के शास्त्रीय विधान के साथ शौर्य यात्रा न केवल सोमनाथ संघर्ष में बलिदान हुए लोगों को श्रद्धांजलि की ओर लक्षित था बल्कि आत्मविश्वास पैदा करने का भाव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया। पूजा और अभिषेक के बाद उपस्थित जन समुदाय का संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जिनने सोचा कि सोमनाथ मंदिर नष्ट हो गया वे कहीं समाप्त हो गए लेकिन आज भी सोमनाथ का यह पताखा लहराता हुआ बता रहा है कि हम पर चाहे जितने हमले हों हमें नष्ट नहीं कर सकते। अंत में उन्होंने कहा भी कि इसी विश्वास के साथ हमें भारत को आगे बढ़ाना है तथा दुनिया की ऐसी शक्ति बनानी है जो विश्व कल्याण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सके।


2026 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के लिए दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक, 1026 में महमूद गजनवी ने मंदिर पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था, जिसके 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। दूसरे, 11 मई, 1951 को स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष हो गए हैं। वर्तमान राजनीति एवं अन्य बौद्धिक क्षेत्र में इसे जैसे भी देखा जाए अगर स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, विद्वान और नेता कन्हैयालाल मानणक लाल मुंशी सहित अनेक महापुरुषों ने इसके पुनर्निर्माण किया तो निश्चय ही इसके पीछे गंभीर विमर्श और चिंतन था। सोमनाथ का उल्लेख द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले आता है- "सौराष्ट्रे सोमनाथं च"।‌ इसका अर्थ है कि सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। सोमनाथ पहला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती के संगम पर स्थित है। इस त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का अपना अलग महत्व है। मंदिर परिसर के बाणस्तंभ पर संस्कृत (आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग) और दूसरी तरफ इंग्लिश में एक अभिलेख है। इसमें लिखा है- इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है। यह वही स्थान माना जाता है जहां भगवान कृष्ण ने अपना शरीर त्याग कर वैकुंठ गमन किया था।


सोमनाथ: द श्राइन इटरनल पुस्तक में केएम मुंशी ने लिखा है कि गजनवी ने 18 अक्टूबर, 1025 को सोमनाथ की ओर बढ़ना शुरू किया और लगभग 80 दिन बाद, 6 जनवरी 1026 को किलेबंद मंदिर शहर पर हमला कर दिया।‌‌ सोमनाथ मंदिर में लूट और विध्वंस की घटना 8 जनवरी, 1026 की है। अनेक लोगों ने प्रश्न उठाया कि आखिर विध्वंस का उत्सव कैसे मनाया जा सकता है? प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। आक्रांता आते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से खड़ा हुआ। इतना धैर्य, संघर्ष और पुनर्निर्माण का उदाहरण दुनिया के इतिहास में दुर्लभ है। उनका यह वक्तव्य सबसे ज्यादा बहस का विषय बना है कि सोमनाथ को तोड़ने वाले आक्रांता आज इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, लेकिन दुर्भाग्य से देश में आज भी ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जो मंदिरों के पुनर्निर्माण का विरोध करती रही हैं। इसे राजनीतिक वक्तव्य मान सकते हैं। किंतु सोमनाथ के इतिहास को बार-बार विकृत करने की कोशिश हुई। कुछ का मानना है कि सोमनाथ सात बार लूटा गया जबकि कुछ 17 आक्रमण की बात करते हैं। सबसे पहला आक्रमण मोहम्मद बिन कासिम के सूबेदार जुनैद ने किया था और अंतिम हमला औरंगजेब द्वारा। यानी 980 ई से लेकर 1702 तक सोमनाथ पर लगातार हमला होता रहा तो इसके पीछे केवल धन लूटना कारण नहीं हो सकता इस पर 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने, 1394 में मुजफ़्फर खान ने और 1459 में ,महमूद बेगड़ा ने हमला किया था।‌ इसके बावजूद मंदिर रहा। वऔरंगजेब ने 1669 में इसे गिराने का आदेश दिया तथा 1702 में  इतना तोड़ दिया गया कि मरम्मत नहीं हो सकी और 1706 में इसे मस्जिद में बदल दिया गया। क्या इसे आप लूट का इतिहास कहेंगे ? नहीं तो इतिहासकारों ने सच्चाई का दमन क्यों किया?


रानी अहिल्याबाई होल्कर ने द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण सोमनाथ की महत्ता को पहचानते हुए 1783 में पास में एक नया मंदिर बनवाया तथा विधिपूर्वक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। उनकी सोच थी कि जब वास्तविक जगह पर मंदिर बनेगा तो बनेगा किंतु द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में जाने वाले मस्जिद के पास से लौट जाएं यह अच्छा नहीं होगा, इसलिए वहां एक भव्य मंदिर होना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद पिछले लगभग 1000 वर्ष के काल में ध्वस्त प्रेरणा, चेतना और भारत की अंत:शक्ति के केन्द्रों के पुनरुद्धार की बात उठी और इनमें सबसे पहला स्थान सोमनाथ का ही था।  सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ गएऔर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। मंदिर के निर्माण और धन की व्यवस्था के लिए सोमनाध ट्रस्ट की स्थापना की गई।‌ 15 दिसंबर ,1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया तो मंदिर का दायित्व के एम मुंशी को दी गई। राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद यजमान बने, 1950 में आधारशिला रखी गई और 5 - 6 महीने में पहले चरण का काम पूरा हो गया। जनता द्वारा चंदे से लगभग 25 लाख रुपए इकट्ठे हुए थे। 11 मई, 1951 को राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने प्राण प्रतिष्ठा की। वैसे मंदिर संपूर्ण रूप में बनकर 1955 में तैयार हुआ। 


यहां इनमें विस्तार से जाना संभव नहीं है। किंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल , केएम मुंशी, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एवं अन्य नेताओं के बीच संबंधित पत्र व्यवहार देखेंगे तथा सार्वजनिक वक्तव्यों पर नजर दौड़ाएंगे तो पता चल जाएगा कि इसका कितना विरोध हुआ। पंडित नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन न वे सरदार पटेल को रोक सके न मुंशी को और न डॉ राजेंद्र प्रसाद को। इनके कारण अन्य नेता भी इसमें लगे। डॉ राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भूमिका निभाकर परंपरा स्थापित किया था कि गुलामी के कालखंड में ऐसे ध्वस्त स्थानों का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण होना चाहिए और उसमें सरकार का शीर्ष नेतृत्व भी भूमिका निभा सकता है।  हां, निर्माणों में सरकारी पैसा न लगे इसका ध्यान रखा गया। महात्मा गांधी ने भी सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से सहमति व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सरकारी खजाने से इसमें एक पैसा नहीं लगना चाहिए।


कहने का तात्पर्य कि सेक्यूलरवाद के नाम गलत सोच और व्यवहार तब से आज तक कायम है । इसीलिए समस्याएं आती हैं और ऐसे कार्यों को सांप्रदायिक, फासीवादी और न जाने क्या-क्या नाम दे दिया जाता है।


आखिर विदेशी आक्रमणकारियों से लेकर देश के अंदर मजहबी सोच वाले हमलावरों ने सोमनाथ और ऐसे दूसरे मंदिरों को निशाना क्यों बनाया?  मेहमूद गजनवी और उसकी फौज ने केवल संपत्ति लूटकर सोमनाथ मंदिर का विध्वंस नहीं किया था बल्कि उपस्थित व्यक्तियों को मार दिया या बंदी बनाकर अपने साथ ले गया । स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा गया। बलात्कार हुए ,क्रूरता पूर्वक हत्याएं हुईं या बंदी बनाकर ले जाईं गईं  जिन्हें गुलामों के बाजार में बेचा गया।‌ मंदिर परिसर में 50 हजार  लोगों के उपस्थित होने की बात है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का कत्लेआम इतिहास के क्रूरतम अध्यायों में से एक है। मिन्हाज सिराज के अनुसार गजनवी ने मूर्ति के चार टुकडे किये थे, एक गजनी की जमी मस्जिद में, दूसरा उसे शाही महल की सीढियों पर, तीसरा मक्का और चौथा मदीना भेज दिया। महमूद ने मूर्तियों को गलियों और मस्जिद की सीढियों पर डलवा दिया। उसने कहा नमाज के लिए जाने वाले नमाजी इन बूतों को पैरों तले रौंदेंगे। अलबरूनी गजनवी के साथ ही आया था और उसने अनेक बातें इसके संदर्भ में लिखी है। तो स्वाभिमान पर्व से इतिहास के सारे  सच देश के सामने आए जिसमें मजहबी सोच से हमलों‌ और उसके प्रतिरोध तथा पुनर्निर्माण के प्रयास शामिल है । इससे यह विश्वास और गहरा हुआ है कि हमारी शाश्वत अंत:शक्ति को कोई नष्ट नहीं कर सकता। वास्तव में ऐसे पर्व हमारे लिए प्रेरणा और स्थायी आत्मविश्वास के कारण बनते हैं।

 

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

गले की फांस बन रहे हैं दलितों आदिवासियों की सुरक्षा हेतु बनाए गए कानून

बसंत कुमार

भारत सरकार ने देश के दलित और आदिवासियों की सुरक्षा के लिए एससी/एसटी एक्ट के अलावा कुछ कानून बनाए थे जिसमें दलित आदिवासियों की शोषण के विरुद्ध उनकी सुरक्षा की जा सके परंतु देखने में यह आया है कि यह कानून जो उनकी सुरक्षा के लिए बने थे वह उनके गले की फांस बनते जा रहे हैं मसलन 1970 के दशक के दौरान एक कानून बनाया गया था कि कोई भी सवर्ण किसी दलित आदिवासी की जमीन ना लिखवा सके और इसके लिए यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई किसी दलित या आदिवासी की जमीन जायदाद लिखवाता है तो उसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति होनी चाहिए परंतु आज आर्थिक सुधार के युग में लोग खेती से भाग रहे हैं और उद्यमिता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं परंतु कोई भी दलित/आदिवासी जिलाधिकारी की परमिशन न मिलने के कारण अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचकर कोई उद्योग धंधा नहीं शुरू कर सकता क्योंकि यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कोई भी सवर्ण उसकी जमीन नहीं खरीदना चाहता और खरीदया भी है तो उसे बाजार के हिसाब से वाजिब भी नहीं मिलते इसलिए अब समय आ गया है कि दलितों के लिए की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून पर पुनः विचार किया जाए।

मेरे एक जानने वाले लखनऊ में रहते थे किसी नामी गिरामी कंपनी में काम कर रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था उन्होंने एलडीए से एक फ्लैट भी खरीद लिया था परंतु दुर्भाग्य से उनका एक्सीडेंट हो गया और वो काम करने लायक नहीं रह गए और नतीजा यह हुआ जिस कंपनी में काम करते थे उन्हें निकाल दिया गया और वह बेरोजगार हो गए क्योंकि एक्सीडेंट में उनका एक पैर टूट गया था तो अपने इलाज के लिए वह अपने फ्लैट को बेचना चाहते थे पर क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे इसलिए उनको जमीन या फ्लैट को बेचने के लिए उन्हें जिलाधिकारी की परमिशन मिलनी जरूरी थी और इसी जटिल प्रक्रिया से बचने के लिए उन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा था और जो लोग खरीदने को तैयार भी थे उसका वाजिब दाम नहीं दे रहे थे परिणाम यह हुआ की वे परमिशन केलिए कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते स्वर्ग को प्यार हो गए, कहने का मतलब यह है की जो उनकी मेहनत की कमाई से बनाई गई थी। वह भी उनके मुसीबत में काम नहीं प्रॉपर्टी अगर सक्षम प्राधिकारी के परमिशन की अड़चन नहीं आती तो उन्हें अपनी जमीन का पूरा लाभ मिल जाता और वह अपना इलाज करा सकते थे पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि जो कानून उनकी सुरक्षा के लिए बनाया गया था वही कानून उनके गले की पास बन गया।

1970 के दशक में मैं अपने जनपद जौनपुर के प्रसिद्ध कॉलेज टीडी कॉलेज का छात्र था वहां पर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की फीस एक आने हुआ करती थी और सामान्य श्रेणी के बच्चों की फीस सवा छह रुपए हुआ करती थी लेकिन जो दलित या आदिवासी छात्र क्लास टीचर को एक आने थी देने आया करते थे उसे क्लास टीचर के द्वारा व्यंग वाणी सुनने को मिलते थे। कई बार क्लास टीचर कहते थे कि भाई पूरे क्लास की इकट्ठी दे दिया करो यह कभी कहते कि साल भर की इकट्ठी दे दिया करो। अब उस समय के 13-14 वर्ष के दलित छात्रों के मन में क्या गुजरती थी वह स्वर्ण अध्यापक नहीं समझ सकते थे। मुझे इस बात की हैरानी होती थी कि जब इन छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और गरीब सवर्ण छात्रों के लिए विद्यालय मैनेजमेंट की ओर से पुअर फंड जैसी स्कीमें लागू थी, तो यह एक आने फीस का फंडा क्यों रखा गया था इससे दलित व आदिवासी वर्ग के छात्रों में इंफेरियारिटी कंपलेक्स के साथ-साथ उन्हें अपमानित भी होना पड़ता था। मुझे कक्षा 11 का एक किस्सा याद है हम लोग विज्ञान के छात्र थे और विज्ञान केमिस्ट्री के शिक्षक क्लास में आए और सभी बच्चे उनके सम्मान में खड़े हो गए पर एक दलित छात्रा जिसका ध्यान कहीं और था वह अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ तो अध्यापक महोदय ने यह कहकर उसे अपमानित किया की सवा छ रुपए फीस देने वाले सीट से खड़े हो सकते हैं तो तुम एक आने फीस देने वाली इतना भी नहीं कर सकते। कोई भी यह समझ सकता है कि एक पढ़े लिखे सवर्ण शिक्षक द्वारा किसी दलित छात्र का इस तरह से अपमान करना उसके मन में कितनी पीड़ा देता होगा।

यहां तक की देश की संसद और राज्यों की विधानसभा में जब कोई सांसद या विधायक जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आता है और सदन में बोलने के लिए खड़ा होता है तो उसके नाम के आगे उसे क्षेत्र का नाम और सुरक्षित लिख दिया जाता है जबकि सामान्य सीट से आए हुए विधायक या सांसदों के सामने इस प्रकार का जाति बोधक शब्द नहीं लिखा जाता तो क्या सांसद और विधानसभा में भी दलित और आदिवासियों का एक अलग समूह बनाए जाने की मंशा है कायदे से विविधता में अनेकता वाले भारत में यह प्रक्रिया बंद होनी चाहिए क्योंकि ऐसे सांसद जो सुरक्षित क्षेत्र से जीत कर आए हैं वह सब प्लीज दलित आदिवासियों का प्रतिदिन नहीं करते मैं अपने पूरे क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए किसी भी सुरक्षित सीट से आए सांसद या विधायक के सामने के नाम के आगे उसका क्षेत्र सुरक्षित लिखना की प्रणाली बंद की जानी चाहिए। यह तो कुछ ऐसा ही है जब 18वीं सदी में पुणे में पेशवा के राज में दलितों को अपनी पहचान के लिए कमर में झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था जैसे देश के सबसे सफल और सुलझे हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द जी को सदैव भारत गणराज्य के राष्ट्रपति की बजाय दलित राष्ट्रपति कहा गया।

सन 1989 में एससी/एसटी एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989) एक ऐसा कानून आया जो एससी/एसटी लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया ताकि उन्हें सामाजिक सुरक्षा और न्याय मिल सके और उन्हें अपमानित और प्रताड़ित ना किया जा सके। यह कानून विशेष न्यायालय के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई करता है और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता के उन्मूलन) के तहत एससी/एसटी समुदायों पर होने वाले अपराधों को रोकने और उनके मालिक मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए या कानून संसद द्वारा बनाया गया क्योंकि आईपीसी और अन्य कानून इस घृणित अपराधों के से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

यद्यपि यह अधिनियम दलितों और आदिवासियों को उत्पीड़न और शोषण से बचाने के लिए लाया गया था, पर क्या यह अपने उद्देश्य में सफल हुआ है या एक विचारणीय प्रश्न है। होता यह है कि जो गरीब या आदिवासी वास्तव में पीड़ित होता है और उसके साथ अमानवीय उत्पीड़न की घटना होती है वह सवर्णों के दबाव और भय से पुलिस में जाकर इसकी रिपोर्ट लिखने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि इस देश की पुलिस और प्रशासन दबंग और पैसे वालों की सुनती हैं इसके विपरीत इस अधिनियम का उपयोग सवर्णों की आपस की लड़ाई में अपने यहां नौकरी करने वाले दलित और आदिवासियों को एक दूसरे के विरोध में उपयोग करते देखा गया है, यहां तक की कुछ जमीदार अपने यहां कुछ दलित आदिवासियों को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखते हैं की वह अपने प्रतिद्वंद्वी सजातिय लोगो के विरुद्ध इन दलित और आदिवासियों का उपयोग कर सके। इसलिए जो दलित आदिवासी वास्तव में पीड़ित हैं और उन्हें इस अधिनियम की आवश्यकता है उन्हें उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए पर जो लोग इस अधिनियम का दुरुपयोग करते हुए पाए जाते हैं उन पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे यह अधिनियम जिस उद्देश्य के लिए बना था उसका निष्पक्ष रूप से पालन किया जा सके।

आज की परिस्थितियों में वंचितों और आदिवासियों को जहां एक तरफ सुरक्षा प्रदान करना व न्याय दिलाना है, साथ ही साथ उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाना है इसलिए सरकार को चाहिए कि जो कानूनी प्रावधान उन्हें मुख्य समाज से अलग करते है या उन पर दलित आदिवासी होने का ठप्पा लगाते है उन्हें समाप्त करके वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाए तभी एक समरस भारत का निर्माण किया जा सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गृह मंत्रालय नए कानूनों पर झांकी "दण्ड से न्याय की ओर"

संवाददाता

नई दिल्ली। गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत यह झांकी वर्ष 2023 में अधिनियमित एवं लागू किए गए तीन परिवर्तनकारी आपराधिक न्याय कानूनों-भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-कोप्रदर्शित करती है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। यह झांकी "दण्ड से न्याय की ओर" के सिद्धांत से प्रेरित होकर भारत की न्याय व्यवस्था में आए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को रेखांकित करती है।

झांकी का अग्र भागमें नए संसद भवन के ऊपर स्थापित तीन नई कानून पुस्तकों को दर्शाया गया है, जो भारत के संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं।

झांकी के मध्य भाग मेंवैज्ञानिक जांच पद्धतियों और डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग के माध्यम से प्रक्रियात्मक परिवर्तन को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक फॉरेंसिक विशेषज्ञ को अपराध स्थल की जांच करते हुए तथा एक पुलिस अधिकारी को ई-साक्ष्य ऐप के माध्यम से डिजिटल रूप से साक्ष्य एकत्र करते हुए दर्शाया गया है। LED डिस्प्ले पैनल नए कानूनों में निहित प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है, जिसमें ई-साक्ष्य के माध्यम से डिजिटल साक्ष्य संग्रह, नाफिस (NAFIS) द्वारा डिजिटल फिंगरप्रिंट विश्लेषण तथा न्याय श्रुति के माध्यम से वर्चुअल सुनवाई जैसे आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न पहलू शामिल हैं। मोबाइल फॉरेंसिक वैन अपराध स्थल तक त्वरित पहुंच और फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह की गतिशीलता का प्रतीक है। ये सभी तत्व आधुनिक तकनीक के व्यापक उपयोग द्वारा सटीकता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले नए कानूनों के सार को प्रदर्शित करते हैं।

झांकी के पीछे के भाग में एक महिला अधिकारी को एकीकृत नियंत्रण कक्ष प्रणाली संचालित करते हुए दर्शाया गया है, जो समयबद्ध न्याय, त्वरित प्रतिक्रिया, पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण तथा सीसीटीवी कैमरों जैसे डिजिटल उपकरणों के प्रभावी उपयोग को प्रदर्शित करता है। झांकी का पिछला हिस्सा विभिन्न भाषाओं में पुस्तकों से सुसज्जित है, जो नए कानूनों की सभी नागरिकों तक पहुंच और उनमें निहित सामूहिक राष्ट्रीय भावना को दर्शाता है। झांकी के भूमि तत्व प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों, फॉरेंसिक विशेषज्ञों, विशेष कमांडो इकाइयों में अधिक महिला अधिकारियों और बीट पेट्रोलिंग के माध्यम से जनता-केंद्रित कानूनों के प्रति सामूहिक संकल्प को प्रदर्शित करते हैं, जो समावेशिता, पेशेवर दक्षता, समर्पण और जन-केंद्रित दृष्टिकोण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

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