क्या आप चुनाव में नामांकन भरने जा रहे हैं तो ध्यान रखें इन बातों को नहीं तो नामांकन हो सकता है रद्द
शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025
क्या आपका भी नामांकन रद्द हुआ है, जाने क्यों हो जाते हैं नामांकन रद्द
बिहार के युवकों का रोजगार के लिए पलायन क्यों?
दीपावली के दूसरे दिन से दिल्ली व मुंबई से छठ पूजा के लिए बिहार जाने वालों की भीड़ मैं दशकों से देख रहा हूं पर हर वर्ष इस पर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों का जो सिलसिला चलता है वो हास्यास्पद है। इस बार भी दीपावाली के एक दो दिन बाद की मुंबई रेलवे स्टेशन से बिहार की ओर जाने वाली ट्रेनों में भेड़-बकरियों की तरह ठूस कर जाने वाली भीड़ को पोस्ट करते हुए राष्ट्रीय जनता दल की तेजतर्रार प्रवक्ता प्रियंका भारती ने यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि एनडीए सरकार में बिहार के लोगों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसी स्थिति आई है। वहीं दूसरी ओर एनडीए के प्रवक्ता यह दिखाने में लगे थे कि दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों से छठ पूजा के पर्व पर जाने वालों के लिए 1400 से अधिक ट्रेनें चलाई जा रही हैं और जो लोग यही रहकर छठ पूजन करना चाहते हैं उनके लिए उपयुक्त व्यवस्था की गई है और तो और यमुना सहित अन्य नदियों के घाटों पर सफाई लाइट आदि की व्यवस्था की गई है। इससे पहले दिल्ली में समुचित व्यवस्था का ढोल आम आदमी पार्टी पीटती थी और भाजपा उसकी खामियां गिनाती थी।
आरजेडी की प्रवक्ता मुंबई से बिहार की ओर जानी वाली
ट्रेनों की हालत दिखाते समय यह भूल गई कि यूपीए शासन के दौरान उनकी पार्टी के
राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव देश के रेल मंत्री थे और उस समय बिहार की
मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी का छठ के पर्व पर अर्घ्य देने का दृश्य टेलीविजन
पर लाइव दिखाया जाता था पर उस समय भी बिहार की ओर छठ पूजा पर जाने वाले यात्रियों
का यही हाल होता था और कैसा दुर्भाग्य है कि देश के दर्जनों भर नेता देश के रेल
मंत्री के उत्तरदायित्व का निर्वाह कर चुके हैं जिसमें बाबू जगजीवन राम, ललित नारायण मिश्र, एबीए घनी खान चौधरी, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार आदि सभी इस पद को सुशोभित कर चुके
है पर सिर्फ बाबू जगजीवन राम और ललित नारायण मिश्र के कार्यकाल को छोड़कर सबके समय
में छठ के समय पूर्वांचलियों को ऐसे ही भेड़-बकरियों की तरह जाना पड़ता है। ऐसा
लगता है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सारे युवक सब छोड़छाड़ कर दिल्ली
मुंबई कमाने आ गए हैं। आखिर क्या कारण हैं कि आज इन प्रदेशों में छप्पर उठाने के
लिए भी युवा नहीं मिलते और अब तो एनडीए और इंडिया गठबन्धन सत्ता में आने के बाद
करोड़ों लोगों को रोजगार देने की बात कर रहे हैं जिसके वहां से युवकों का पलायन
रुक जाए।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवाओं का बड़े
शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण है वहां पर व्याप्त बेरोजगारी। इसी बेरोजगारी के
कारण युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई, दिल्ली, पंजाब या अन्य शहरों की ओर भागते हैं और वहां जाकर फैक्ट्रियों में मजदूरों का
काम करते हैं या फिर सिक्योरिटी गार्ड्स का काम करते है और देश के सबसे बड़े कृषि
प्रदेश पंजाब में भी खेतों के मालिक तो पंजाब के किसान होते हैं पर खेतों की देखभाल
करने वाला और खेतों में काम करने वाला मजदूर या तो उत्तर प्रदेश का होता है या फिर
बिहार का होता है। अभी हाल में बिहार में बड़े औद्योगिक घराने न लग पाने के कारण पर
देश के गृहमंत्री अमित शाह ने यह कहा कि जमीन ने मिल पाने के कारण यहां पर बड़े
उद्योग नहीं लग रहे हैं। पर यह याद दिला दूं जब बिहार में अडानी समूह को अपना
प्रोजेक्ट लगाने के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन दी जा सकती है तो अन्य उद्योगों के लिए
जमीन का न मिलना गले नहीं उतरती। माननीय गृह मंत्री जी को बिहार और पूर्वी उत्तर
प्रदेश के बारे में यह बात पता नहीं है कि यहां पर कुछ परिवारों के पास इतनी अधिक
जमीन है कि उन्हें खुद नहीं पता कि उनके पास कितनी जमीन है और 90% परिवारों के पास इतनी
भी जमीन नहीं है कि वो रहने के लिए घर बना लें और कुछ के पास इतनी भी जमीन नहीं है
कि वे सरकार द्वारा दिए गए शौचालय भी बनवा लें। दिल्ली की सब्जी मंडी और सदर बाजार
में अधिकांश लेबर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं और दूसरी विडम्बना है कि
राजधानी में 30-40% ब्यूरोक्रेट्स, नेता और मीडिया में काम करने वाले पत्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के
सम्पन्न घराने के लोग हैं पर हमारे समाने छठ के समय ट्रेनों का जो दृश्य दिखाया
जाता है वह फैक्ट्रियों, दुकानों और मंडी में काम करने
वालों का होता है।
किसी भी राज्य की बेरोजगारी दूर करने में राज्य में
चालू कल कारखानों का विशेष योगदान रहता है और बिहार इस मामले में सर्वाधिक पिछड़ा
राज्य है। देश में रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले युवाओं की सर्वाधिक संख्या
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से है। आश्चर्यजनक है कि युवाओं की संख्या के आधार
पर जनसांख्यिक लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंट) लेने में बिहार अन्य प्रदेशों के
विकाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, पर स्वयं बिहार को बीमारू राज्य की
श्रेणी से बाहर निकालने के लिए बिहार पर एक औद्योगिक नीति की आवश्यकता है। बिहार
सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण प्रदेश की औद्योगिक क्षेत्र की मंदी की कहानी कहता है।
बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2024- 25 के अनुसार ग्रास स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) में इसकी हिस्सेदारी 2021-22 में 9.9% से गिरकर वर्ष 2023-24 में 7.6 रह गई है।
मैन्यूफेक्चरिंग में गिरावट कमजोर औद्योगिक बुनियादी ढांचे, कम निवेश और बड़े
पैमाने पर उद्योगों की कमी को दर्शाता है।
सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के पंजीकरण
पोर्टल पर आंकड़े देखे तो भारत में एमएसएमई उद्योगों की संख्या की तुलना में बिहार
का योगदान मात्र 5.47% है। बिहार में कुल एमएसएमई उद्योगों की संख्या 14,23,380 है जबकि उत्तर प्रदेश
में यह संख्या 10.69% योगदान के साथ 34,03, 834 है। यदि हम सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों में अलग-अलग कर के देखे तो सूक्ष्म
उद्यमों में बिहार की हिस्सेदारी 4.11% और उत्तर प्रदेश की की हिस्सेदारी 9.25% है। लघु उद्यमों में बिहार की हिस्सेदारी 2.64% है जबकि इस क्षेत्र
में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 8.25% है। मध्यम उद्यम क्षेत्र में बिहार क्षेत्र की हिस्सेदारी 1.49% है और उत्तर प्रदेश का
हिस्सा 7.04% है। देश में बिहार का श्रम बल हिस्सा 30.7% है और बेरोजगारी दर 8.7% है। इसका अभिप्राय यह
है कि बिहार के युवा अन्य प्रदेशों में श्रम करके उनके विकास में योगदान कर रहे
हैं पर उनका अपना राज्य विकास के नाम पर फिसड्डी बना हुआ है। मजे की बात यह है कि
देश के एमएसएमई मंत्री महादलित मुसहर समुदाय से आते हैं और बिहार से आते हैं और
इसके मंत्रालय के सचिव चाहे उड़ीसा कैडर के आईएएस है पर वे भी बिहार के हैं फिर भी
एमएसएमई सेक्टर की बिहार में स्थिति इतनी दयनीय क्यों है।
जब अटल बिहारी वाजपाई जी देश के प्रधानमंत्री बने तो
देश में बेरोजगारी दूर करने के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई), मंत्रालय की अवधारणा लेकर आए जिससे घर-घर में छोटे उद्योग लगे और प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी जी भी इस मंत्रालय को अपना विजन मंत्रालय कहते हैं और इस मंत्रालय का
प्रभार इस क्षेत्र के लोगों के मिला- 1. महावीर प्रसाद - गोरखपुर(बांसगांव), 2. कालराज मिश्र – देवरिया, 3. गिरिराज सिंह -बिहार, 4. भानु प्रताप सिंहवर्मा - जालौन(उप्र), 5. जीतन राम मांझी -बिहार।
इतने सारे एमएसएमई मंत्री होने के बावजूद उद्यमिता के
क्षेत्र में बिहार देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में है। इस पिछड़ेपन के लिए एनडीए, यूपीए (इंडिया गठबन्धन) सभी जिम्मेदार हैं। यहां बस चुनाव जीतने के लिए जाति
का गुणा-भाग चल रहा है और कुछ नहीं। कुछ दल वोट लेने के लिए मुसहर जाति के माउंटेन
मैंन के नाम से मशहूर दशरथ मांझी के परिवारों वालों को घर बनाकर दे रहे हैं पर इस
जाति के अधिकांश भूमिहीनों को घर बनाने के लिए 3 डिसमिल जमीन देने की जो घोषणा हुई
थी उसको इंप्लीमेंट करने के लिए जोर नहीं दे रहे हैं और इस आदिम जाति के लोगों को
एसटी कैटेगरी में डलवाने हेतु कोई भी एलायंस बात नहीं कर रहा है तो आप सोच सकते
हैं कि यहां के युवाओं का पलायन कैसे रुकेगा।
यदि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से नौकरी की तलाश
में युवाओं का पलायन रोकना है तो प्रदेश को जाति पर आधारित राजनीति से ऊपर उठना
होगा, जिस दिन यह जनप्रतिनिधि जातिय आंकड़ों के बजाय योग्यता, शिक्षा और कर्मठता के बल पर चुने जाने लगेंगे उस दिन से बिहार देश के आर्थिक
नक्शे पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देगा, पर प्रश्न यह है कि महात्मा बुद्ध और सम्राट अशोक की कर्मभूमि माने जाने वाला
बिहार जातीय दलदल से कब बाहर निकलेगा।
गाय, गोविंद और गौशाला : संस्कृति से समृद्धि की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’
पवन वर्मा
भारत की सभ्यता की जड़ें केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि उस चेतना में हैं जो करुणा, सहअस्तित्व और संवेदनशीलता को जीवन का सार मानती है। उस चेतना का सबसे जीवंत प्रतीक गाय है। जो केवल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय मन, माटी और धर्म का नितांत अभिन्न अंग है। वह खेतों की हरियाली में, लोकगीतों की धुन में, और हमारे उत्सवों के उल्लास में बराबरी से सहभागी रही है। उसे ‘माता’ कहा गया, और यह केवल श्रद्धा नहीं थी। यह उस संबंध की अभिव्यक्ति थी जो जीवन, प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को सबसे स्वाभाविक रूप में दिखाता है। वैदिक दृष्टि और सांस्कृतिक सभ्यता ऋग्वेद का मंत्र “गावो विश्वस्य मातरः” केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सहअस्तित्व की सर्वोच्च घोषणा है। गाय को ‘विश्वमाता’ कहना यह मानना है कि पोषण और करुणा, धर्म और जीवन, एक-दूसरे से विलग नहीं। भारतीय चिंतन में गाय वह माध्यम रही जिससे ग्रामीण समाज में आत्मनिर्भरता आती है, खेत उपजाऊ बनते हैं और परिवार समृद्ध होता है। महाभारत में कहा गया है- “गावः सर्वसुखप्रदाः,” अर्थात गायें समस्त सुख देनेवाली हैं। यह सुख केवल भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है। गोपालन, केवल दुग्ध उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। जिसमें त्याग, सेवा और संतुलन का भाव निहित है। मध्यप्रदेश इस दृष्टि से भारत का एक जीवित उदाहरण है। जहाँ परंपरा, नीति और ग्रामीण जीवन एक-दूसरे में रचे-बसे हैं। नर्मदा की पवित्रता, मालवा की मिट्टी की सुगंध और बुंदेलखंड के लोकगीतों में ‘गोविंद’ और ‘गौ’ की भावना सहज रूप में प्रकट होती है। यहाँ की संस्कृति में गोपालन केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अस्तित्व का हिस्सा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने इस परंपरा को केवल धार्मिक आयोजन के सीमित दायरे से निकालकर नीति की मुख्यधारा में स्थापित किया है। उन्होंने गाय को न केवल श्रद्धा का विषय माना, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्थायी स्तंभ के रूप में देखा। ‘गौशाला विकास’, ‘गोवर्धन पूजा’ और ‘गोपालन संवर्धन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह दृष्टि क्रियान्वित होती दिख रही है।
परंपरा से नीति तक की यात्रा - जहाँ पहले गोवर्धन पूजा केवल घर-आँगन का धर्मिक उत्सव थी, वहीं अब यह मध्यप्रदेश में सामूहिक संकल्प का प्रतीक बन चुकी है। 21 और 22 अक्टूबर, 2025 को राज्यभर में जिस भव्यता से यह पर्व मनाया गया, उसने यह संदेश दिया कि शासन और संस्कृति के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस पर्व को राज्यव्यापी स्वरूप देते हुए ‘गौशाला’ को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र घोषित किया। यह कदम प्रशासनिक दृष्टि से उतना ही दूरदर्शी है जितना सांस्कृतिक रूप से गहरे अर्थों वाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गाय अब केवल पूजा की मूर्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की धुरी है।
नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र - आज मध्यप्रदेश की गौशालाएँ केवल आश्रय स्थल नहीं रहीं। वे ग्रामीण जीवन के आत्मनिर्भर मॉडल के रूप में विकसित हो रही हैं। गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक खेती, वर्मी-कम्पोस्ट निर्माण, पंचगव्य उत्पादों तथा गोबर गैस संयंत्रों ने गाय को कृषि और उद्योग के संगम में पुनः प्रतिष्ठित किया है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है, क्योंकि यह उस विचार का पुनर्जागरण है जिसमें प्रकृति का दोहन नहीं, उसका संवर्धन होता है। गौशालाएँ अब ग्रामीण जनजीवन की प्रयोगशालाएँ हैं, जहाँ सामाजिक आस्था, पर्यावरणीय संरक्षण और आजीविका का समन्वय एक साथ दिखाई देता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि “गावः सर्वं प्राप्यते लोके”, अर्थात गाय से संसार के सभी श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होते हैं। यह आज के संदर्भ में और भी प्रासंगिक है। जैविक खेती को बढ़ावा देने से लेकर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने तक, गाय आधुनिक पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
गोवर्धन पूजा का सामाजिक रूपांतरण - गोवर्धन पूजा अब केवल धार्मिक विधि नहीं रही। यह अब ‘नीति और लोक’ के संगम का अवसर बन चुकी है। जब प्रशासन, समाज और संस्कृति एक साथ किसी पर्व को मनाते हैं, तब वह अनुष्ठान से आगे बढ़कर नीतिगत उद्घोषणा बन जाता है। राज्य के प्रत्येक जिले, गाँव और पंचायत स्तर पर आयोजित गोवर्धन पर्व में जब अधिकारी, किसान, महिलाएँ और विद्यार्थी एक मंच पर आए, तो यह सामाजिक साझेदारी की अनूठी मिसाल बनी। यह आयोजन एक प्रकार से ‘सांस्कृतिक जननीति’ का उदाहरण है, जो विश्वास दिलाता है कि धर्म और विकास विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
पर्यावरण और आत्मनिर्भरता की नयी दिशा - ‘गोपालन संवर्धन योजना’ के तहत पंचगव्य आधारित उद्योग और जैविक उत्पादों के निर्माण ने गाँवों में नए अवसर खोले हैं। गोबर से ऊर्जा, खाद और औषधि का निर्माण ग्रामीण भारत की उस परंपरा का पुनर्जीवन है जो आत्मनिर्भरता और सतत जीवनशैली पर आधारित थी।मध्यप्रदेश में अब कई गौशालाओं ने गोबर गैस संयंत्रों के ज़रिए न केवल ऊर्जा संकट को घटाया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर बिजली और ईंधन का भी उत्पादन प्रारंभ किया है। इससे पर्यावरण प्रदूषण घटा है और ग्रामीण समुदायों की आर्थिक बचत भी हुई है। यही वह दृष्टिकोण है जिसमें ‘धर्म नीति बनता है और नीति धर्म का विस्तार करती है।’
शासन और संस्कृति का अभिन्न संबंध- इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब राज्य व्यवस्था अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी रहती है, तब समाज की स्थिरता और विकास साथ-साथ चलते हैं। गाय का संरक्षण, केवल एक प्रशासनिक योजना नहीं, बल्कि ‘संवेदनशील शासन’ की पहचान है। मध्यप्रदेश की यह पहल राजनीतिक अर्थों में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के धरातल पर खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जिस प्रकार गौशालाओं को नीति के केंद्र में रखा, उसने यह सिद्ध किया कि विकास मात्र निर्माण नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा की रक्षा भी है। अथर्ववेद का श्लोक “गोभिः प्रजाः सुवृता भवन्ति” आज इसी नीति में साकार होता दिखता है। जब गाँवों में गाय की सेवा के माध्यम से जैविक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है, तब यह श्लोक केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि नीति का प्रत्यक्ष रूप बन जाता है।
भारतीयता की परम्परा - गाय की सेवा का अर्थ केवल दूध का संग्रह या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस सोच का पुनर्पाठ है जो कहती है कि मनुष्य और प्रकृति प्रतियोगी नहीं, सहचर हैं। यह दर्शन भारतीयता का मूल है। हमारे यहाँ अर्थ और धर्म कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। आज, जब वैश्विक स्तर पर ‘सस्टेनेबिलिटी’ का विमर्श बढ़ रहा है, तब भारत की यह परंपरा आधुनिक विकास का आधार बन सकती है। गाय, गौशाला और गोवर्धन पूजा इस सोच का जीवंत उदाहरण हैं कि परंपरा केवल अतीत का बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का मार्गदर्शन भी है। ग्रामीण पुनर्जागरण की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’ अब केवल संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण पुनर्जागरण का संग्राम बन चुकी है। आज गाँवों में नयी पीढ़ी समझ रही है कि गोबर सिर्फ अपशिष्ट नहीं, बल्कि संसाधन है। गौमूत्र औषधि का स्रोत है। गाय केवल खेत की सहचरी नहीं, बल्कि पर्यावरण की प्रहरी है। सरकार ने जब इन पहलों को आर्थिक प्रशिक्षण और अनुसंधान से जोड़ा, तब यह योजना आत्मनिर्भर भारत की भावना के अनुरूप बन गई। यह वही आत्मनिर्भरता है जिसके केंद्र में स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वाभिमान तीनों समाहित हैं।
धर्म और विकास का संगम - स्कन्दपुराण में कहा गया है- “गावो मां पातु सर्वतः,” अर्थात गाय मेरी सर्वत्र रक्षा करे। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक तंत्र का सूत्रवाक्य है, जो बताता है कि जो समाज गाय की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है। जब शासन इस सिद्धांत को अपनाता है, तो नीति में केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं रहते, बल्कि लोककल्याण की भावना जुड़ जाती है। मध्यप्रदेश ने यह दर्शाया है कि धर्म और नीति, भावनाएँ और प्रशासन, परंपरा और तकनीकी नवाचार सब साथ चल सकते हैं, यदि दृष्टि संवेदनशील और दिशा स्पष्ट हो।
संस्कृति से समृद्धि - 21वीं सदी का भारत एक ऐसे दोराहे पर है जहाँ उसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है। मध्यप्रदेश का ‘गौशाला मॉडल’ इस चुनौती का भारतीय उत्तर प्रस्तुत करता है। यहाँ विकास, संस्कृति से पोषण लेता है और संस्कृति विकास से दिशा। जैविक खाद, पंचगव्य औषधियाँ, गोबर गैस संयंत्र और पशुधन आधारित उद्योग न केवल अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी घटाते हैं। यह आधुनिक अर्थशास्त्र का भारतीय संस्करण है जो बताता है कि लाभ और लोककल्याण में संघर्ष नहीं, संगति संभव है।
संवेदनशील शासन की नई पहचान - मध्यप्रदेश की इस पहल ने यह भी सिद्ध किया है कि शासन केवल कानून लागू करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनमूल्यों को संरक्षित रखने की प्रक्रिया भी है। जब नीति करुणा और संस्कृति से संलिप्त होती है, तब वह ‘शासन’ नहीं, ‘सेवा’ बन जाती है। गोवर्धन पूजा का व्यापक आयोजन केवल प्रशासनिक दक्षता का उदाहरण नहीं, बल्कि उस भावनात्मक एकता का प्रतीक है जो समाज और सरकार को एक सूत्र में बांधती है। जब पंचायत स्तर पर अधिकारी स्वयं गोसेवा में भाग लेते हैं, तब यह कार्यक्रम धार्मिकता से आगे बढ़कर लोकनीति बन जाता है।
गाय भारतीय जीवन का प्रतीक - “गावो धनं गावो मे जीवनं” गोपालसहस्रनाम का यह श्लोक गाय की भूमिका को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करता है। गाय न केवल धन है, बल्कि जीवन का पर्याय है। गाँव की आत्मा उसके साथ बसती है। खेत की उपज, परिवार की आराधना और समाज की स्थिरता, तीनों उसकी उपस्थिति से आलोकित होती हैं।आज जब शहरी केंद्रों में जीवन उदासीनता और भौतिकता में उलझा है, तब मध्यप्रदेश का ग्रामीण भारत गाय के माध्यम से पुनः अपनी जड़ों से जुड़ता हुआ दिखता है। यह दृश्य केवल धार्मिक पुनर्जागरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मस्मरण का संकेत है।
नीति, संस्कृति और संवेदना का संगम - गाय, गोविंद और गौशाला। ये तीन शब्द केवल परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की त्रिविध आत्मा हैं। इनका संगम यह सिखाता है कि विकास तब ही टिकाऊ हो सकता है जब वह संस्कृति से प्रेरित और समाज से जुड़ा हो।मध्यप्रदेश ने यह सिद्ध किया है कि धर्म और शासन का मेल किसी टकराव का नहीं, बल्कि सृजन का माध्यम है। यहाँ गोवर्धन पूजा, गौशाला विकास और गोपालन संवर्धन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि नीति का वह रूप हैं जो “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” को भारतीय आत्मा देता है। जब शासन संवेदनशील और दूरदर्शी होता है, तो वह केवल योजना नहीं बनाता,वह जीवन को गढ़ता है, संस्कृति की रक्षा करता है, और समाज को दिशा देता है। यही वह संदेश है जो गाय, गोविंद और गौशाला से निकलता है कि संवेदनशील विकास ही सच्चा धर्म है, और धर्मसम्मत नीति ही सच्चा विकास है। (विनायक फीचर्स)
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025
अशोक पहलवान बने एनसीपी (एसपी) के नजफगढ़ के जिला अध्यक्ष
नई दिल्ली। राष्ट्रवादी
कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने संगठन को मज़बूत बनाने और ज़मीनी स्तर पर
कार्यों को गति देने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए नजफगढ़ जिले के लिए जिला
अध्यक्ष के रूप में अशोक पहलवान की नियुक्ति की घोषणा की। यह नियुक्ति 23 अक्टूबर 2025 से तत्काल प्रभाव से लागू होगी।
इस संबंध में प्रदेश संयोजक
इंजीनियर डी. सी. कपिल द्वारा जारी नियुक्ति-पत्र में कहा गया है कि श्री अशोक
पहलवान जी को उनके सामाजिक योगदान, संगठनात्मक अनुभव और जनसेवा के प्रति समर्पण को
देखते हुए यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है।
प्रदेश संयोजक डी.सी.
कपिल ने कहा कि “अशोक पहलवान जी लंबे समय से समाज और संगठन के
लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में नजफगढ़ जिले में पार्टी की
संगठनात्मक पकड़ और मजबूत होगी। हमें विश्वास है कि वे पार्टी की विचारधारा और
नीतियों को जनता तक प्रभावी रूप से पहुंचाने का कार्य करेंगे।”
डी.सी. कपिल ने
साथ ही यह भी कहा कि पार्टी का लक्ष्य जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना
और जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना है। अशोक पहलवान जी की नियुक्ति इसी दिशा
में एक निर्णायक कदम है।
नवनियुक्त जिला
अध्यक्ष अशोक पहलवान ने अपनी नियुक्ति पर आभार व्यक्त करते हुए कहा
कि वे पार्टी नेतृत्व द्वारा जताए गए विश्वास पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करेंगे।
उन्होंने कहा कि वे क्षेत्र की जनता के हितों की रक्षा और संगठन के विस्तार के लिए
समर्पित रहेंगे।
प्रदेश संयोजक इंजी. डी. सी.
कपिल ने श्री अशोक पहलवान जी को नई जिम्मेदारी मिलने पर हार्दिक शुभकामनाएं दीं और
उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।
शनिवार, 18 अक्टूबर 2025
भारतीय पर्व-परंपरा का समूह - पंचोत्सव
प्रो. रवि शर्मा 'मधुप'
भारत पर्वों का देश है। यहाँ लगभग प्रति माह या यूँ कहें कि प्रतिदिन ही, कोई-न-कोई पर्व या उत्सव मनाया जाता है, किंतु एक साथ पाँच उत्सव मनाने का अद्भुत संयोग दीपावली के आसपास आता है। इन पाँचों उत्सवों को देश के विभिन्न भागों में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन पाँच उत्सवों में पहला है धनतेरस । दूसरा है नरक चतुर्दशी | तीसरा है दीपावली | चौथा गोवर्धन पूजा तथा पाँचवाँ है भाई दूज ये पाँचों पर्व कार्तिक मास में मनाए जाते हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुरू होकर ये पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलते हैं। इन पाँचों उत्सवों के संबंध में कुछ बातें इस प्रकार हैं-
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन तेरस मनाया जाता है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा मिलती है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र-मंथन का विचार किया। इतना विशाल समुद्र कैसे मथा जाए? इस प्रश्न के समाधान के लिए समुद्र के बीचों-बीच मंदराचल पर्वत को रखा गया और उसे वासुकि नाग से लपेटकर मथने का निर्णय हुआ। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह समुद्र-मंथन प्रारंभ हुआ। इस समुद्र-मंथन से 14 रत्न निकले, जिनमें विष और अमृत भी थे।
इस समुद्र-मंथन से निकले विष को भगवान शंकर ने अपने कंठ में ले लिया। इस विष के प्रभावस्वरूप उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। समुद्र-मंथन से निकले अमृत को देवताओं के बीच बांट दिया गया, जिस कारण देवता अमर हो गए। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को इसी समुद्र-मंथन से धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर निकले थे, जो आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि धन्वंतरि देव विष्णु जी के अंशावतार हैं, जिन्होंने विश्व में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार के लिए यह अवतार लिया था। भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, कहा भी गया है, "पहला सुख नीरोगी काया, दूजा सुख घर में माया। इसीलिए पंचोत्सव का पहला पर्व धन तेरस है।
कुछ लोग इस दिन को कुबेर का दिन मानते हैं, इसलिए इस दिन को धन की वृद्धि का दिन भी मानते हैं। इस कारण इसे धन तेरस नाम से जाना जाता है। अपने घर में धन की वृद्धि के लिए लोग सोने-चांदी के आभूषण, धातु के बर्तन आदि खरीदते हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार देवताओं को राजा बलि के भय एवं आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए ही श्री विष्णु भगवान ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यग्य स्थल जाकर उनसे तीन पग धरती माँगी। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि को सचेत किया। बलि द्वारा बात न माने जाने पर शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप में प्रवेश कर गए और जल मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, ताकि राजा बलि दान का संकल्प ही न ले सकें। वामन अवतार लिए हुए विष्णु जी इस चाल को समझ गए और कमंडल में कुशा रख दी, जिससे शुक्राचार्य की एक आँख फूट गई। राजा बलि ने भगवान वामन को अपना सब कुछ दान में दे दिया। इस प्रकार राजा बलि ने देवताओं से जो कुछ भी छीना था, उससे कहीं अधिक धन-संपत्ति देवताओं को प्राप्त हुई। इसी उपलक्ष्य में धन तेरस का त्योहार मनाया जाता है।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी, नर्क निवारण चतुर्दशी या रूप चौदस कहते हैं। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके उसकी कैद से 16000 स्त्रियों को मुक्त करवाया था। नरक चतुर्दशी की रात को यमराज के लिए दीपदान की प्रथा प्रचलित है। लोग दीए जलाकर घर के बाहर रखते हैं, घर की साफ-सफाई करके उसमें विद्यमान कूड़े-करकट रूपी नरक को घर से बाहर निकालते हैं। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि वर्षा ऋतु में घर में सीलन, गंदगी तथा कीट-पतंग हो जाते हैं, जिन्हें साफ़ करके घर को फिर से नया बना लेते हैं। इसी प्रकार, इस दिन हमें केवल बाहरी गंदगी ही नहीं, बल्कि भीतरी गंदगी भी साफ कर लेनी चाहिए, ताकि हम पुनः पवित्र, शुद्ध एवं निर्मल हो जाएँ। इस पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य अपने घर को स्वच्छ बनाकर उसमे उजाला और पूरे घर को आलोकित करना है।
इसी क्रम में कार्तिक मास की अमावस्या को तीसरा पर्व दीपावली मनाया जाता है, जो हिंदुओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पर्व है। दीपावली पर्व के साथ दो कथाएँ जुड़ी हुई हैं। पहली कथा के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को समुद्र-मंथन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं, इसीलिए इन्हें 'समुद्र तनया' या 'सागर पुत्री' भी कहा जाता है। धरती पर धन की देवी लक्ष्मी जी के आगमन की खुशी में घर-आंगन साफ करके दीप जलाए जाते हैं तथा लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। लक्ष्मी जी के साथ शुभ लाभ एवं बुद्धिप्रदाता गणेश जी एवं विद्या तथा कलाओं की देवी सरस्वती जी की पूजा का भी विधान मिलता है। इसका कारण संभवतः यह है कि केवल धन से जीवन नहीं चलता, यदि मनुष्य के पास केवल धन हो, तो वह अनेक बुराइयों जैसे आलस्य, नशा आदि का शिकार हो जाता है। इसीलिए धन के साथ-साथ बुद्धि और विद्या का होना भी अति आवश्यक है। हमें विद्या की सहायता से धर्मानुकूल तरीकों से धन अर्जित करना चाहिए और उसका सदुपयोग परिवार, समाज एवं राष्ट्रहित में करना चाहिए।
दीपावली से जुड़ा हुआ दूसरा प्रसंग त्रेता युग का है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक मास की अमावस्या को विष्णु जी के अवतार श्री राम लंकापति रावण का वध करके अयोध्या वापस आए थे। उस रात अमावस्या होने के कारण गहरा अंधेरा था, अतः अयोध्यावासियों ने दीपों की पंक्ति से अयोध्या नगरी को प्रकाशित किया। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी संपूर्ण भारत में लोग कार्तिक मास की अमावस्या को घरों में प्रकाश करते हैं। प्रकाश ज्ञान तथा सभी सकारात्मक भावों का प्रतीक है और अमावस्या की रात में अंधकार अज्ञान, अराजकता, दानवी वृत्तियों एवं समस्त नकारात्मक भावों का प्रतीक है, जिसे दूर करने के लिए लोग अपने घरों को प्रकाश से आलोकित करते हैं।
पाँच उत्सवों में चौथा उत्सव है गोवर्धन पूजा या अन्नकूट। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि इसी दिन श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों एवं वहाँ के पशुधन को इंद्र के कोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली से उठाया था। गोवर्धन शब्द ही अपने आप में विशेष अर्थ रखता है। कृषि प्रधान देश भारत में गाय भी संपत्ति का ही रूप मानी जाती थी और गाय की वृद्धि, धन संपदा की वृद्धि के रूप में देखी जाती थी। इस दिन लोग गोवर्धन के प्रतीक रूप में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं और श्री कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाते हैं।
पाँच पर्वों के इस श्रृंखला में पाँचवाँ और अंतिम पर्व है भाई दूज । इसे भैया दूज या यम द्वितीया भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यमराज और यमुना भाई-बहन हैं। यमराज स्वर्ग लोक में रहते हैं, जबकि यमुना मृत्यु लोक अर्थात धरती पर रहती हैं। यमुना को अपने भाई की बहुत याद आती थी। उनकी प्रार्थना पर इसी दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर जाकर भोजन किया था। बहन द्वारा किए गए आदर-सत्कार से प्रसन्न होकर उन्होंने बहन को वरदान दिया कि इस दिन यदि कोई भाई अपनी बहन के हाथ का भोजन ग्रहण करेगा, तो दोनों को दीर्घायु प्राप्त होगी और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कारण, इस पर्व को यम द्वितीया भी कहते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के आपसी प्रेम, सौहार्द और मजबूत रिश्तों का प्रतीक है। इस दिन भाई अपनी बहन के घर जाते हैं। बहन भाई का स्वागत करती है, भोजन कराती है और भाई उसे उपहार देता है।
एक और किंवदंती के अनुसार नरकासुर का वध करने के बाद भगवान कृष्ण अमावस्या के दूसरे दिन अपनी बहन सुभद्रा से मिलने उनके घर गए थे। सुभद्रा ने आरती, तिलक, पुष्प और मिठाइयों से उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। बहन भाई के इसी प्रेमपूर्ण व्यवहार के प्रतीक रूप में यह पर्व मनाया जाता है।
इस प्रकार, पाँच पर्वो का यह समूह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं गौरवशाली पर्व परंपरा की याद तो दिलाता ही है, उत्सवधर्मी भारतवासियों के जीवन में आर्थिक समृद्धि, सुख एवं स्वास्थ्य का उपहार भी लेकर आता है। इसी कारण लगभग पूरे भारत तथा विदेशों में भी यह पंचोत्सव अत्यंत धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
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