शनिवार, 9 मार्च 2024

अमन और शांति के लिए मार्च

 

8 मार्च 2024 शुक्रवार को इन्द्रलोक क्षेत्र में पुलिस द्वारा हुई घटना के कारण, हालात को देखते हुए चांदनी महल क्षेत्र में अमन और शांति बनी रहे, इसके लिए SHO थाना चांदनी महल श्री प्रभात कुमार झा और चौकी इंचार्ज तुर्कमान गेट श्री विक्रम सिंह ने समाजसेवी फिरदौस मंसूरी व इलाक़े के स्थानीय लोगों के साथ मिल कर दौरा किया और लोगों से अमन और शांति बनाए रखने की अपील की।

वोट फार कैश मामले मे सुप्रीम कोर्ट का साराहनीय फैसला

बसंत कुमार
सर्वोच्च न्यायालय ने पैसा लेकर वोट देने के मामले में सांसदो विधायको पर अपराधिक मुकदमा चलाये जाने वाली छुट को अभी हाल मे दिये हुए फैसले से समाप्त कर दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव केश मे 1998 मे पांच जजो की बेंच द्वारा दिये गए फैसले को पलटते हुए सात जजो की बेंच ने यह फैसला सुनाकर यह सुनिश्चित कर दिया है कि सांसदो/ विधायको सदन मे भाषण देने या वोट डालने के लिए रिश्वत लेने का दोषी पाये जाने पर कानूनी संरक्षण को समाप्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून के समक्ष खास और आम दोनों ही नागरिक एक समान है। सात जजो की संविधान पीठ जिसने यह फैसला सुनाया उसमे मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्र चूड, जस्टिस ए ए बोपन्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस पी एस नरसिम्हा, जस्टिस जे वी परदिवाला, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे। 
  इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने कहा " माननीय सर्वोच्च् न्यायालय का यह निर्णय देश मे राजनीति को स्वच्छ करेगा और देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था मे लोगो का विश्वास और गहरा होगा। अब यह प्रश्न उठता है कि जिस प्रकार से चुनाव की राजनीति मे संसद और विधान परिषद मे पहुँचने वाले अधिकांश नेता करोडो या अरबो के मालिक है और इन धनाड्यो के आगे चाल चरित्र और सत्यनिष्ठा वाले नेताओ कार्य कार्ताओ की पूंछ नही होती तो राजनीति कैसे स्वच्छ होगी, चाहे कोई भी पार्टी हो आज की चुनाव की राजनीति में टिकट बाटते उम्मीदवार की शिक्षा, योग्यता इम नदारी देखने के बजाय उसकी सम्पति देखती है वह अलग बात है कि वह सम्पति कैसे कमाई बनाई गई है। ऐसे लोगो से बनी संसद या विधायिका कैसे नैतिकता के उच्च आयाम स्थापित करेगी।
इससे पूर्व संविधान के अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 195 के तहत विधान मंडलों और संसद के सदस्यों के सदस्यों को रिश्वत लेने के मामले मे अपराधिक मामलों से छुट मिलती थी, यह छूट 1998 मे सर्वोच्च न्यायालय के पी वी नरसिम्हा राव मामले मे दिये गए जजमेंट के कारण मिली थी, जिसके कारण निर्वाचित प्रतिनिधि वोट के बदले नोट के मामलो मे बच जाते थे। इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय मे अपने ही पुराने (1998) के फैसले को उलट दिया है अर्थात अब उन्हे संसदीय विशेषधिकार के तहत रिश्वत खोरी की छुट नही दी जा सकती। यह निर्णय देते हुए मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्र चूड ने टिप्पड़ी करते हुए कहा " हम मानते है कि रिश्वत खोरी संसदीय विशेषधिकार  नही है, माननीय सांसदो द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार और रिश्वत खोरी भारत के संसदीय लोकतंत्र को बरबाद कर देगा "। इस फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देश के पूर्व मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा" जब जनता जनादेश देकर आपको चुनती है, इसके बाद ऐसे लोग जो जनता के जनादेश के साथ विश्वास घात करते हैं तो उन्हे ना तो कानूनी संरक्षण मिल सकता है ना ही सियासी संरक्षण मिल सकता है।
वास्तव मे अनुच्छेद 19(1)(A) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यक्तिगत अधिकार को मान्यता देता है और 105(2) और 194(2) का उद्देश्य प्रथम तया अपराधिक कानून के उल्लंघन के लिए दंडात्मक कार्यवाही शुरु करने से प्रतिरक्षा प्रदान नही करता, जो संसद सदस्य के रूप मे अधिकारों और करतव्यो के प्रयोग से स्वतंत्रत रूप से उत्पन्न हो सकता है, ऐसे मामले मे सांसद को विशेषधिकार के रूप मे तभी छूट दी जा सकती है जब दिया गया भाषण या वोट देनदारी को जन्म देने वाली कार्यवायी के लिए एक आवश्यक एवं अभिन्न अंग हो
सर्वोच्च न्यायालय मे यह मामला सीता सोरेन की अपील पर आया, यह मामला एक जन प्रतिनिधि की रिश्वत खोरी से संबंधित है। इस मामले के तार पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव से से जुड़े हुए हैं। उनकी सरकार को 1993 मे अविश्वास मत के दौरान, बचाने के लिए दी गयी रिश्वत के मामले से थी, जिसमे झारखंड मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन अद्यक्ष सिबु सोरेन और उनकी पार्टी के चार सांसद शामिल थे जहा सांसदो ने सरकार बचाने के लिए वोट देने के बदले मे रिश्वत ली थी, सीता सोरेन को जन सेवक के तौर पर गलत काम करने के साथ अपराधिक साजिश रचकर जनसेवक की गरिमा घटाने वाला काम करने का आरोपी बनाया गया था। इस मामले मे अनुच्छेद 194 के प्रावधान 2 के अनुसार जन प्राधिनिधियो को उनके सदन मे वोट डालने के लिए रिश्वत लेने पर मुकदमे मे घसीटा नहीं जा सकता।
पर सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ द्वारा यह फैसला आने से समय समय पर सांसदो द्वारा किये गए रिश्वत खोरी के मामलों पर अब अपराधिक प्रक्रिया का सामना करना होगा, अभी कुछ माह पूर्व टी एम सी की सांसद महुआ मोयित्रा द्वारा पैसा लेकर प्रश्न पूछने के आरोप पर सदस्यता रद्द कर दी गयी तो क्या रिश्वत के मामले मे दोषी पाए जाने पर सदस्यता रद्द किया जाना ही काफी था जबकि इनके विरुद्ध सरकारी कर्मचारी की भाँति भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत कार्यवाही क्यों नही की गयी और जब ऐसा होगा तभी हमारे जन प्रतिनिधियों के मन में कानून के प्रति सम्मान और उसके उल्लंघन पर सजा का डर व्याप्त होगा, हमारे सांसदो द्वारा पैसा लेकर प्रश्न पूछने का मामला हो या फिर पैसा लेकर सरकार के समर्थन मे वोट डालने का मामला हो यह बुराई तब तक नही रुकेगी जब तक सभी राजनीतिक दलों द्वारा धन बल देख कर टिकट दिया जाता रहेगा क्योकि जो लोग पैसे के बल पर सांसद बनेंगे उनसे कभी भी इमान दारी की राजनीति की अपेक्षा नही की जा सकती, इसलिए धन कुबेरो का अनुचित तरीके से कमाए धन का उपयोग राजनीति मे रुकना चाहिए।
भारत के संसद के इतिहास मे कुछ सदस्यों द्वारा संसद के अंदर करोडो रुपये की गड्डिया लहराते हुए सांसदो की तस्वीर आज भी लोगो के मन मस्तिस्क मे छाई हुई है और जल्द ही यह भ्रम टूटना चाहिए कि पैसे के बल पर कोई संसद मे पहुँच सकता है या पैसे के बल पर सरकारे बन बिगड़ सकती है हमे उन आदर्शो का पुन: पालन करना सिखना होगा जो स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारी लाल नंदा जैसे नेताओ ने स्थापित किया था।

गुरुवार, 7 मार्च 2024

ऐसी राजनीतिक तस्वीर बदले तो कैसे

अवधेश कुमार

चुनाव ऐसा अवसर होता है जब आपको राजनीति के सारे नकारात्मक चरित्र हमारे सामने घनीभूत होकर उभरते हैं। हालांकि इसमें आज चार्ज का कोई कारण इसलिए नहीं होता क्योंकि इस तरह की घटनाएं राजनीति की बारंबारता का अंग बन चुके हैं। लोकसभा चुनाव के पूर्व दलों और नेताओं के व्यवहारों और वक्तव्यों पर आम लोग अब आश्चर्य भी प्रकट नहीं करते। मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक नेताओं के पाला बदल, कल तक के राजनीतिक विरोधियों के साथ चुनावी गठबंधन पर चाहे जितना प्रश्न उठाएं या उसका किसी दृष्टि से विश्लेषण करें इससे धरातल पर ठोस गुणात्मक अंतर आएगा ऐसा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि वर्षों से भारत में राजनीतिक सुधार यानी राजनीतिक दलों के अंदर वैचारिक, व्यवहारिक और व्यक्तित्व के परिवर्तनों को लेकर जो भी आवाज उठाई गई उसका अत्यंत कम असर हुआ है। आम आदमी पार्टी द्वारा 

दिल्ली, हरियाणा और गुजरात में कांग्रेस के साथ गठबंधन पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आखिर दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के प्रमुख अरविंद केजरीवाल जिस पार्टी और परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता में आए और उनको सजा दिलवाने का वायदा करते रहे उसके साथ गठबंधन करते हैं तो उस राजनीति पर प्रश्न उठेगा। किंतु क्या इसका असर भी हो सकता है ? या फिर अरविंद केजरीवाल या आम आदमी पार्टी ऐसा करने के मामले में भारतीय राजनीति में एकमात्र उदाहरण है?

वास्तव में राजनीति का जब एकमात्र ध्येय येन-केन -प्रकारेण सत्ता में पहुंचना या बने रहना हो जाए तो ऐसा ही होता है। आईएनडीआईए की कल्पना आने के पूर्व तक आम आदमी पार्टी का घोषित स्टैंड था कि उसको किसी भी गठबंधन से कोई लेना- देना नहीं है। वह गठबंधन की राजनीति की आलोचना करती थी। अन्ना हजारे के अभियान के दौरान की बातों को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए क्योंकि उसे कितनी बार याद दिलाएंगे, किंतु हाल तक के अपने राजनीतिक-रणनीतिक स्टैंड से भी पार्टी बदल जाए तो फिर क्या कहा जा सकता है। जिस शराब घोटाले और ईडी कार्रवाई का दिल्ली की कांग्रेस पार्टी समर्थन कर रही थी वह अचानक न केवल इस पर खामोश हो गई है बल्कि कई टीवी डिबेट में कार्रवाइयों के लिए सरकार की आलोचना करती है।यही स्थिति भाजपा और राजग विरोधी पार्टियों की पश्चिम बंगाल के संदेशखाली जैसे जघन्य और वीभत्स अपराध के मामले में भी है। विपक्ष की किसी पार्टी के प्रमुख नेता ने संदेशखाली को लेकर तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी या वहां के पुलिस प्रशासन की आलोचना नहीं की। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव ,लालू यादव, राष्ट्रीय जनता दल, शरद पवार , एनसीपी उद्धव ठाकरे आदि का एक ट्वीट हमने नहीं देखा। पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं उससे लगता है कि धनबल और बाहुबल का प्रभाव बंगाल में घटने की बजाय ज्यादा सशक्त हुआ है। जिस तरह गिरफ्तारी के बाद संदेशखाली का मुख्य अभियुक्त शेख शाहजहां चल रहा था, लगता था जैसे पुलिस किसी वीआईपी को सुरक्षा देकर ले जा रही हो। 55 दिनों बाद उसकी गिरफ्तारी बताती है कि अपराध,धनबल तथा एकपक्षीय भयावह सांप्रदायिक बाहुबल का गठजोड़ पश्चिम बंगाल की राजनीति का स्थायी चरित्र बन गया हो। 80 के दशक से भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा मुद्दा रहा।  लगातार राजनीतिक सुधार की मांग उठती रही। लगता था कि धीरे-धीरे अपराध, बाहुबल , धन बल और वोट के लिए संप्रदायिक अपराध की अनदेखी की राजनीति से अंत हो रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस वाम मोर्चा के शासन में अपराधियों,  माफियाओं और सांप्रदायिक तत्वों के बोलबाला के विरुद्ध ही संघर्ष करके सत्ता तक आई किंतु उनका शासन उससे भी ज्यादा इन सारी बीमारियों का वीभत्सतम उदाहरण बन गया है। 

बाहुबल और धनबल का राजनीति के साथ स्पष्ट दिखता रिश्ता तथा सिद्धांतहीन, आदर्शहीन पालाबदल कई राज्यों में सामने आ रहे हैं। एक समय राजनीतिक और सत्ता शीर्ष का भ्रष्टाचार विरोधी दलों का सबसे बड़ा मुद्दा होता था। यह स्थिति पूरी तरह पलट गई है। आज भ्रष्टाचार के आरोप के विरुद्ध नेताओं और सत्ताशीर्ष पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई विपक्ष के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो गया है। इस स्थिति की पहले कल्पना नहीं थी। पहले मनीष सिसोदिया, फिर संजय सिंह और हेमंत सोरेन तथा ऐसे छोटे-बड़े नेताओं को जेल जाना पड़ा, न्यायालय उनको जमानत तक नहीं दे रहा, किंतु विरोधी राजनीति का स्वर है मानो ये सारे पाक साफ हों। न्यायालय जब तक किसी को सजा नहीं देती हम उन्हें दोषी नहीं मानते किंतु बिना आधार के इतनी बड़ी कार्रवाई नहीं होती और होती है तो शांति से न्यायिक प्रक्रिया का सामना किया जा सकता है। सच कहा जाए तो एक बीमारी के उपचार की जगह उससे बड़ी बीमारी ने हमारी राजनीति को घर कर लिया है। यह राजनीतिक सुधार की विपरीत दिशा है। आने वाले समय में राजनीति और शीर्ष भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई कितनी कठिन होगी इसका अनुमान आज की स्थिति से लगाया जा सकता है। एक नेता पर कार्रवाई हुई नहीं कि वकीलों की फौज उन्हें बचाने के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच जाती है। बड़े-बड़े लोग पक्ष में खड़े हो जा रहे हैं। यह राजनीति की ऐसी प्रवृत्ति है जिसका अंत तभी संभव है जब राजनीतिक सुधार इस अवस्था में पहुंच जाए जहां केवल देश और समाज की चिंता करने वाले ज्ञानी , विवेकशील और संकल्पबद्ध लोग ही चुनावी राजनीति में रहे। ऐसी स्थिति सामने नहीं दिख रही।

संघ और भाजपा का विरोध राजनीति में एक बड़ा वर्ग पहले भी करता था। इस समय यह विरोध घृणा की उस अवस्था में पहुंच गया है जहां लगता है कि दलों और नेताओं के विवेक और अविवेक में कोई अंतर नहीं बचा। इसमें कोई कितना भी भ्रष्टाचारी हो, बाहुबली हो, सांप्रदायिक हो, अगर नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा विरोधी है तो विपक्ष के बड़े समूह के लिए सहज स्वीकार्य। यह इस समय भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती है। मजे के बाद देखिए कि इस स्थिति ने पार्टियों को अपने दूरगामी भविष्य की चिंता से भी विलग कर दिया है। ‌ उदाहरण के लिए कांग्रेस के व्यावहारिक नेताओं को आभास है कि दिल्ली, हरियाणा और गुजरात जैसे राज्य में अगर आम आदमी पार्टी आगे बढ़ी तो सबसे ज्यादा क्षति उन्हीं की होगी। बावजूद वह गठबंधन को तैयार हैं तो क्यों? यही स्थिति दूसरी पार्टियों के साथ भी है। अनेक पाला बदलने वालों के लिए भाजपा भी अपना द्वार खोली हुई है। नीतीश कुमार जैसे सिद्धांतहीन और अस्थिर व्यक्ति जब चाहते हैं भाजपा को छोड़कर चले जाते हैं और फिर वापस आ जाते हैं। वे मुख्यमंत्री भी बने रहते हैं। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस समय ऐसी सशक्त स्थिति में है जब वह सिद्धांतहीन और आरोपी नेताओं से अपने को काफी हद तक बचाए रख सकती है। इससे उसके चुनावी प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि जब तक कोई नेता विरोधी खेमे में होता है उसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाती। जैसे ही वह भाजपा के साथ आता है, विरोधी चिल्लाने लगते हैं कि देखो-देखो जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप था वह उनके साथ चला गया। इसलिए जनता ऐसी आलोचनाओं को गंभीरता से नहीं लेती है।

वास्तव में एक बड़े वर्ग के लिए स्थिति इतनी निराशाजनक है कि वे इन पर टिप्पणी करना भी समय नष्ट करना मानते हैं। उनके अनुसार भारतीय राजनीति की विद्रुपताओं पर जितना कुछ लिखा-बोला जा चुका है कि अलग से कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं रहती। जो कुछ भी लिखा जाएगा उसमें प्रसंग और चेहरे नये हो सकते हैं , पर मुद्दे और विषय पुराने ही होते हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की भी भूमिका है। आम लोग भी अगर मतदान करते समय सिद्धांतहीन ,पाला बदल तथा धनबल और बाहुबल से राजनीति करने वालों का साथ और सम्मान न दें, उनके पक्ष में मतदान न करें तो प्रवृत्ति बदल सकती है। भाजपा इस समय सबसे बड़ी ही नहीं, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम सबसे ज्यादा लोगों के आकर्षण वाली पार्टी है। वह इस स्थिति का राजनीतिक सुधार के लिए उपयोग करके उदाहरण बने। जहां भी भाजपा की सरकार हो वहां ऐसे तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई, पार्टी में ऐसे लोगों के लेने का निषेध तथा दूसरी पार्टी की सत्ता में ऐसे तत्वों के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष जैसे तीन स्तरीय व्यवहार की उम्मीद उससे की जाती है। दूसरी पार्टियां भी समझ लें कि आम लोगों के अंदर उसके ऐसे व्यवहार से असंतोष बढ़ता  है तथा अनेक पार्टीयां बीच-बीच में सत्ताच्युत होतीं हैं तो इसके पीछे सिद्धांतहीन और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण बिगड़ी हुई छवि की प्रमुख भूमिका रही है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092 , मोबाइल 9811027208

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