शुक्रवार, 5 जनवरी 2024
हिट एंड रन के नये कानून के विरोध मे राजनीति
हिट और रन के नये कानून के खिलाफ पूरे देश में कुछ दिनों से चल रही हड़ताल दिल्ली सहित पूरे देश मे महसूस की जा रही है, देश भर मे ड्राई वरो के विरोध प्रदर्शन और हड़ताल के कारणों से कई शहरों मे पेट्रोल और डीजल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। देश की राजधानी दिल्ली मे भी लोगो को पैनिक मे डाल दिया है और लोग ऐसी स्थिति से उबरने के लिए पेट्रोल पम्पो पर लंबी लाइन लगाए खड़े है, इससे डीजल पेट्रोल की खपत मे (जमा खोरी) बढ़ने की आशंका है, यही नही इस नये कानून के कारण ड्राईवर काम छोड़कर भाग रहे है यद्यपि ड्राईवर के संगठनो ने अभी हड़ताल की घोषणा नही की है। फिर भी ड्राईवरो की हड़ताल का असर अब बाजारों पर दिखने लगा है, स्थिति यह है कि चावल से लेकर दाल समेत सभी खद्यानो की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दिल्ली मे नया बाजार से लेकर सदर बाजार नरेला अनाज मंडी में रोजाना सैकड़ो ट्रक अनाज लेकर आते है लेकिन ट्रक ड्राई वरो की हड़ताल की वजह से कई मंडियों मे सप्लाई ठप हो गयी है, गल्ला व्यापारियों की शिकायत है कि हड़ताल की वजह से उनका लाखों का माल अटका हुआ है और पुराना स्टाक भी खत्म होने वाला है यदि सप्लाई की स्थिति यथा शीघ्र समान्य नही हुई तो बाजार मे दिक्कत आने की पूरी संभावना है।
आखिर हिट एंड रन के मामले मे कानून मे ऐसा क्या बदलाव हुआ है कि ड्राईवरो को हड़ताल पर जाना पड़ा है और वे जगह जाम कर रहे है. भारतीय दण्ड संहिता की नयी धारा 106(2) के तहत की लापरवाहि या तेज गाड़ी चलाने से किसी की मौत हो जाती है और चालक बिना पुलिस/ मजिस्ट्रेट को बिना सूचना दिये भाग जाता हैं तो ड्राईवर को 10 साल की कैद और सात लाख का जुर्माना लगाया जाता है, इस नये कानून से ड्राई वरो को यह चिंता है कि हादसे के बाद यदि वे मौके पर पाए गए तो भीड़ की हिंसा का शिकार हो सकते हैं और ड्राईवरो की आय इतनी नही होती की इतना अधिक जुर्माना भर सके। लापरवाही से से गाड़ी चलाने से मौत के कारण दी जाने वाली सजा के पहले के कानून के बारे मे जानना आवश्यक है। पहले भारतीय दण्ड संहिता की धारा 279 के तहत लापर वाही से गाड़ी चलाने और 304( ए) के तहत लापरवाही से ड्राइविंग से मौत और धारा 338 के तहत जान जोखिम मे डालने से केश होता था और अधिक तम सजा दो वर्ष की होती थी पर अब यह मामला राजनीतिक हो गया है, गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी हादसे के बाद यदि हालात विपरीत है तो आरोपी गाडीवाला कुछ दूर जाकर सूचना दे सकता है या पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर सकता हैं और पुलिस की जांच मे सहयोग करेगा तो ऐसे मामलों मे केश 10 साल नही अधिकतम, 5 साल वाली सजा मे दर्ज होगा, फिर भी कांग्रेस ने हड़ताल के समर्थन में उतरने का फैसला किया है। इस मामले में राजनीतिक दल राजनीति कर रहे है और इस हड़ताल के कारण मात्र दो दिनों में 10 राज्यो मे, 2000 से अधिक पेट्रोल पंप सूखे पड़े हैं,
प्रश्न यह है कि सरकार ने हिट एंड रन मामले में कानून बना कर इतनी सख्त सजा क्यो कर दी कि ड्राईवरो को हड़ताल पर जाना पडा, इसकी दोषी अपरोक्ष रूप से सरकार ही है, कुछ वर्षो पहले सरकार ने कानून मे बदलाव करके ड्राईवर के लिए न्युनतम शैक्षिक योग्यता ही समाप्त कर दी अब सवाल यह है कि निरक्षर व्यक्ति कैसे रोड सेफ्टी नियम और साइन बोर्ड पढ़ेंगे। दर असल हिट एंड रन कानून को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच अब रोड सेफ्टी अब चर्चा का विषय बन गया है। आम तौर पर रोड पर हो रही सड़क दुर्घटनाओ के आंकड़े आंकड़े आने के बावजूद इसके असली कारण जानने की कोशिश नही की जाती। पता होना चाहिए कि हिट एंड रन मामले मे सालाना 25 से 30 हजार लोगो की जान जाती है वही रोड एक्सीडेंट में हर साल औसतन डेढ़ लाख लोग अपनी जान गंवा देते है। सरकार को हिट एंड रन मामलो पर कड़े कानून बनाने के स्थान पर कुछ ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे सड़को पर दुर्घटना की संख्या मे कमी लायी जा सके।
ट्रक ड्राईवरो की हड़ताल और प्र दरशनो के साथ रोड सेफ्टी के मामले मे छिड़ी बहस के बाद दिल्ली पुलिस का एक नया विश्लेषण सामने आया है इसमें खुलाशा हुआ है कि दिल्ली मे पिछले तीन सालों में सड़क दुर्घटना के मामलो मे 30 से 40% मामले हिट एंड रन के है, गंभीर बात यह है कि हिट एंड रन के मामलो मे 47% लोगो की मौत हुई। देश मे बड़े पैमाने पर एसिडेंट्स की वजह है ड्राईवरो की लापरवाही या उसका ध्यान भटकना, इस तरह के हादसो को रोकने के लिए सबसे जरुरी हैं कि ड्राईवरो की प्रापर ट्रैनिंग हो जिससे वे सड़क पर चलते हुए नियमो का पालन तो करे साथ ही साथ वे सड़क दुर्घटनाओ को लेकर संवेदन शील बने।
इस समय देश मे सबसे अधिक कोई चीज नजर अंदाज' की जा रही है तो वह है सड़क पर चलने वाले वाहनो को चलाने वाले ड्राईवरो की ट्रेनिंग और सबसे अधिक चिंता का विषय है इनको मिलने वाला लाइसेंस जो 2 से 5 हजार मे बड़े आसानी से मिल जाता है। हमारे सिस्टम में लोगो को लाइसेंस तो आसानी से मिल जाता है पर ड्राईवरो को स्किल नही मिलती जबकि मनको के हिसाब से हर एक लाख आवादी पर कम से कम एक ड्राइविंग सेंटर होना चाहिए, इस हिसाब से इस समय देश मे 14 लाख ड्राइविंग सेंटर होने चाहिए पर अभी देश में ड्राइविंग सेंटर्स की संख्या मात्र कुछ हजार है जिनमे गिनती के कुछ ऐसे ही है जिनमे ट्रेन्ड इंस्ट्रॅक्चर और आधुनिक इंफ्रेस्ट्रॅक्चर है, कई ट्रेनिंग स्कूल तो ट्रेनिंग के नाम पर र
स्म अदायगी करते है पर ये ड्राइविंग लाइसेंस दिलाने के काम मे खूब पैसा बना रहे है।
कायदे से सरकार को सबसे पहले ड्राइविंग ट्रेनिंग के लिए जिला स्तर तक इंफ्रेस्ट्रॅक्चर विकसित करना चाहिए जिससे को ड्राईवरो को अच्छी ट्रेनिंग देकर सड़क दुर्घटना के खतरे को कम करना चाहिए, हमारे सिस्टम में लाइसेंस का जुगाड़ तो हो जाता है पर ड्राइविंग का स्किल नही मिलता। विशेषज्ञों के अनुसार कायदे से एक कॉमर्शियल ड्राईवरो की न्युनतम शैक्षिक योग्यता हायर सेकेंडरी होनी चाहिये पर सरकार ने कुछ साल पहले कानून बदल कर ड्राईवरो की शैक्षिक योग्यता ही खत्म कर दिया। इसी तरह लंबी दूरी तक ट्रक चलाने के लिए दो ड्राईवर अनिवार्य होते थे जिससे एक ड्राईवर के थकने या नीद आने पर दूसरा गाड़ी चला ले पर सरकार ने ये अनिवार्यता भी समाप्त कर दी और इसे स्वैक्षिक बना दिया। सड़क दुर्घटना हिट एंड रन पर सख्त कानून बनाने से नही कम नही होंगी बल्कि ड्राईवरो की ट्रेनिंग पर फोकस करने और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने से कम होंगी, सरकार ड्राईवरो के लिए सोसल सेक्युरिटी का इंतजाम करे और ऐसे कदम उठाये कि ड्राईवरो को सम्मान के नजरिये से देखा जाए।
गुरुवार, 4 जनवरी 2024
श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से विपक्ष दूर क्यों
अवधेश कुमार
अनेक विपक्षी दलों के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वो निमंत्रण मिलने के बावजूद अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे। कुछ लोगों ने तो इस कार्यक्रम का ही तीखा विरोध कर दिया है। हालांकि इसके परे आम लोगों में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तथा लोकार्पण को लेकर उत्साह का माहौल साफ दिखाई पड़ता है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा को लेकर देश में कायम यह वातावरण अस्वाभाविक नहीं है। हमारे देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या रही है जो श्रीराम मंदिर आंदोलन के महत्व और उसके प्रभाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। यह देखते हुए भी कि अयोध्या आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी को देश के एक बड़े वर्ग का चहेता बना दिया ऐसे लोग आज तक सच्चाई स्वीकारने को तैयार नहीं है। उनका यही मानना रहा है कि भाजपा और संघ ने जानबूझकर अपनी राजनीति के लिए श्रीराम मंदिर के मुद्दे को उठाया, देश में सांप्रदायिक विभाजन किया तथा हिंदुओं का ध्रुवीकरण करके अपना वोट बैंक बढ़ाया। कुछ नेताओं का बयान भी है कि आखिर लोकसभा चुनाव के पहले ही इसका इसकी प्राण प्रतिष्ठा क्यों हो रही है? उनके अनुसार यह सीधे-सीधे राम मंदिर का राजनीतिकरण है। कोई पार्टी राजनीति में है, केंद्र की सत्ता में है तो उसकी भूमिका के पीछे राजनीति होगी। किंतु क्या यह मान लिया जाए कि प्राण प्रतिष्ठा का पूरा कार्यक्रम केवल भाजपा की राजनीति है और वह इसका 2024 की दृष्टि से लाभ लेना चाहती है?
इसके उत्तर के लिए यह प्रश्न करना होगा कि फिर मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम कब रखा जाना चाहिए था? जिन लोगों के लिए आज भी मंदिर कोई मुद्दा नहीं है उनके वक्तव्य की इस संदर्भ में कोई प्रासंगिकता नहीं है। उनकी बात छोड़ दीजिए। उन सारे हिंदुओं के बारे में विचार करिए जिनके मन में यह आकांक्षा थी कि करीब 500 वर्ष पहले जिस पवित्र मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाया गया वहां मंदिर का निर्माण हो। इस मंदिर को बचाने और फिर बाद में उस जगह को प्राप्त कर पूजा पाठ करने के लिए संघर्ष का लंबा इतिहास है। अनेक इतिहासकारों ने उसे महत्व देने की कोशिश नहीं की। न्यायालयों में दोनों पक्षों की हुई बहस तथा पैसों से साफ हो गया कि इसके लिए संघर्ष सतत चलता रहा। इसमें हिंदुओं के साथ सिख, बौद्ध ,जैन सबकी भूमिका रही है। इतने संघर्ष और स्वतंत्रता प्राप्ति के बावजूद लगभग 72 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद इसका फैसला आया। क्या उसे फैसले को साकार करने के लिए समय सीमा का संकल्प नहीं होना चाहिए था? हमारे देश में किसी भी निर्माण में समय सीमा का संकल्प नहीं दिखाते हैं तो वह कितना आगे खींच जाएगा इसकी कल्पना हम आप सबको है। एक निर्माण कार्य शुरू होने के बाद वह कब पूरा होगा इसकी गारंटी नहीं होती। वैसे भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाचार आने लगा था कि आम लोगों के दर्शन और पूजन के लिए 2023 के अंत या 2024 के आरंभ में श्रीराम मंदिर खुल जाएगा। निश्चित रूप से इसे हर हाल में पूरा किया ही जाना चाहिए था। कौन सा चुनाव कब है, इसका प्रभाव उन चुनावों पर क्या पड़ेगा इसकी दृष्टि से विचार करना अनुचित होता। संसदीय लोकतंत्र में चुनाव अपने समय पर आयोजित होते हैं और उसके लिए ऐसे ऐतिहासिक सांस्कृतिक आयोजन को टाला नहीं जा सकता।
संकल्पबद्धता और इसका ध्यान रखते हुए दिन रात एक नहीं किया जाता तो 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा संभव नहीं होती। संपूर्ण मंदिर और उससे संबंधित अन्य निर्माण कार्य आगे भी जारी रहेंगे। ऐसा सामान्यतः होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब सरदार वल्लभभाई पटेल , कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, डा राजेंद्र प्रसाद जैसे महान नेताओं ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की योजना बनाई तब भी उसका विरोध हुआ था। हालांकि तब देश में न मीडिया का इतना प्रसार था और न राजनीति में ऐसा तीखा विभाजन और वोट की रणनीति की दृष्टि से ही हर मुद्दे पर अपना स्टैंड लेने का माहौल था। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा और निर्माण की पूरी कथा जिन्हें पता है वो किसी तरह का प्रश्न नहीं उठा सकते। 8 मई , 1950 को मन्दिर की आधारशिला रखी गई तथा 11 मई ,1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मन्दिर में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया। तब तक मंदिर का संपूर्ण निर्माण नहीं हो पाया था। एक मुहूर्त तय हो गया था और भावना यही थी कि लंबे समय से बंद ज्योतिर्लिंग का दर्शन पूजन जितनी जल्दी आरंभ हो जाए उतना ही अच्छा। दूरदर्शी नेताओं का मानना था कि ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के साथ धीरे-धीरे देश का वायुमंडल बदलेगा और भारत फिर 15 अगस्त, 1947 के पहले की दुर्दशा को प्राप्त नहीं होगा। ध्यान रखिए, वर्तमान सोमनाथ मंदिर का निर्माण 1962 में जाकर पूरा हुआ। इसलिए आधे-अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठाने वाले सोमनाथ मंदिर के इतिहास को अवश्य पढ़ ले।
वास्तव में इस तरह का प्रश्न उठाने वाले लोगों की सोच को समझना कठिन नहीं है। इनमें कुछ ऐसे हैं जिनको मंदिर से ही समस्या रही है और जिनकी राजनीति इससे बुरी तरह प्रभावित हुई। कुछ संघ और भाजपा के स्थायी विरोधी हैं। किसी संगठन या राजनीतिक दल का विरोध करने में समस्या नहीं है पर हर विषय में हमारा विरोध का ही स्टैंड रहे यह अपनी नकारात्मकता और कुंठा को प्रमाणित करता है। राम मंदिर केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं है, भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण, एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में भारत के उद्भव तथा विश्व कल्याण के लिए समर्पित भावना वाले देश के उदय की दृष्टि से इसका महत्व है। मंदिर की मूर्तियां पत्थरों या धातुओं की हो, प्राण प्रतिष्ठा एवं नियमपूर्वक पूजन के साथ वह संपूर्ण वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करने का केंद्र बनता है। संघ परिवार या अन्य हिन्दू संगठनों के लिए यह आंदोलन किसी एक मंदिर के निर्माण तक ही सीमित नहीं था। वह भारत की अंत:शक्ति- आध्यात्मिक -सांस्कृतिक -सभ्यतागत पराभव एवं मानहरण के साथ संपूर्ण देश को व्याप्त पराजय व हीनग्रंथि से निकाल कर भारत को उसके गौरव पर पुनर्स्थापित करने की साधना का अंग था। किसी की संघ या अन्य संगठनों से जितना भी मतभेद हो, श्रीराम मंदिर आंदोलन ने भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और एक सांस्कृतिक पहचान के साथ राष्ट्र के उद्भव का संपूर्ण संकेत दिया। धीरे-धीरे इसके पीछे विरोध में कमी आई और ऐसे लोग भी अंदर से मानने लगे कि वहां मंदिर निर्माण ही होना चाहिए जो पहले यह स्वीकार नहीं करते थे। राजनीतिक दलों के सामने समस्या यह हो गई कि राम मंदिर का विरोध करेंगे तो एक बड़े वर्ग के वोट से वंचित हो जाएंगे। इसलिए अनेक दल और नेता न चाहते हुए भी इसके विरोध में खड़े होने से बचने लगे। यह बदले हुए भारत का ही परिणाम था जो आज तक कायम है। इसलिए राम मंदिर का सार्वजनिक विरोध करने वाले नेताओं की संख्या काफी कम हो गई।
चूंकि लंबे समय तक आपने आंदोलन का विरोध किया, मंदिर के अस्तित्व को भी नकारने का अभियान चलाया और कुछ तो इससे आगे बढ़कर श्रीराम को ही एक मिथक साबित करते रहे। ऐसे लोग न्यायालय में भी गए। हालांकि उन्हें लगातार मुंह की खानी पड़ी क्योंकि तथ्य इसके विपरीत थे। लगातार विरोध करने और नकारने के बाद उन सबके लिए मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना कठिन है और इसे आसानी से समझा जा सकता है। आखिर कल तक विरोध करने वालों को लगता होगा कि वह किस मुंह से वहां जायें। इनकी समस्याओं के कारण मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं रुक सकती। हालांकि इन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ इसका लाभ ले जाएंगे तो इन्हें अवश्य शामिल होना चाहिए।
शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023
मानव संसाधन प्रबंधन देश के विकास में सहायक : डॉ विनय कुमार
नई दिल्ली। इंटीग्रेटेड इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन रिसोर्स के द्वारा इंडिया इंटरनेशनल
सेंटर दिल्ली में शुक्रवार को ग्लोबल हुमन रिसोर्स कॉन्क्लेव 2023 का आयोजन
किया गया जिसमें मानव संसाधन प्रबंधन और आत्मनिर्भर भारत विषय पर चर्चा
हुईइस अवसर पर ग्लोबल ह्यूमन रिसोर्स कॉन्क्लेव 2023 के संयोजक डॉ विनय कुमार ने कहा कि मानव संसाधन प्रबंधन के कारण देश में विकास तेजी से हो रही है और भारत अभी विश्व के पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, माननीय प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व में देश आत्मनिर्भर भारत बनने की ओर बढ़ रहा है और इसमें मानव संसाधन लीडरो की अहम भूमिका है, मानव संसाधन के लोग सॉल्यूशन पर ज्यादा जोर देते हैं प्रॉब्लम पर नहीं, आजकल भारत की इकोनॉमी 4 ट्रिलियन डॉलर है और कुछ साल बाद हम जर्मनी और जापान को भी पीछे छोड़ देंगे, हमें विकास के साथ सतर्क होने की आवश्यकता है, हमने जिनको पीछे छोड़ा वह हमसे ईर्ष्या भी करेंगे, लेकिन भारत को इससे घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि भारत किसी का नुकसान नहीं चाहता है और भारत केवल मानवता और वसुधैव कुटुंबकम को बढ़ावा देता है I
इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता मानव संसाधन लीडर्स संदीप सिंह शासन ने कहा कि प्रधानमंत्री के विभिन्न योजनाओं के कारण देश आत्मनिर्भर भारत बनने के कगार पर है और देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने की आवश्यकता है, भारतीय सेवा के रिटायर्ड कर्नल और आईआईएमटी कॉलेज के प्रोफेसर के एन चौबे ने कहा लेबर लॉ में सुधार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग कर भारत को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, लैडर 2 सक्सेस के संस्थापक मिशेल खन्ना ने कहा कि मानव संसाधन नीति में कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि मानव संसाधन को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके, द्रोणाचार्य कॉलेज के प्रोफेसर साहब सिंह ने कहा कि उच्च शिक्षा में छात्रों को कौशल विकास और एंटरप्रेन्योरशिप पर जोर देने की आवश्यकता है, आईएमएस कॉलेज के प्रोफेसर नवीन विरवानी ने कहा डिजिटल टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के कारण देश में काफी प्रगति हुई है I
कॉन्क्लेव में मानव संसाधन के अधिकारी एवं विभिन्न महाविद्यालय के प्राध्यापक, रिसर्च स्कॉलर और छात्रों ने भी भाग लिया, धन्यवाद ज्ञापन आईआईएचआर के संयुक्त सचिव स्वर्णिम दीक्षित ने किया
पूना पैक्ट देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी भूल
बसंत कुमार
वैश्वीकरण युग के पश्चात देश और पूरे विश्व में आर्थिक सुधारों की बाढ़ सी आ गई है और पूरा विश्व उदारवाद, वैयक्तिकरण और वैश्वीकरण की राह पर चल पड़ा है और सरकारी कार्यालयों में कर्मचरियो की संख्या कम करने के उद्देश्य से संविदा पर कर्मचारियो को भर्ती करके काम लेने की प्रथा चल पड़ी है। इसके कारण सरकारी कर्मचारियों को किए जाने वाले वेतन भुगतान पर आने वाले खर्च में काफी कमी आ गई है और इस धन को इंफ्रा स्ट्रक्चर के विकास पर खर्च किया जा रहा है, इससे चारों ओर विकास तो दिखाई दे रहा है। परंतु युवाओं के लिए नौकरियों में काफी कमी दिखाई दे रही है। वैसे सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों की कमी की मंसा केंद्र सरकार द्वारा गठित पांचवें वेतन आयोग ने ही कर दी थी और ज्यों-ज्यों आर्थिक विकास के लिए स्पर्धा में तेजी आई सरकार ने कर्मचारियों के वेतन पर होने वाले खर्च में कटौती करने के उद्देश्य से नियमित कर्मचारियो की संख्या में कमी करके संविदा पर रखे हुए कर्मचारियों से काम चलाना शुरु कर दिया। इसके कारण भारी संख्या में युवा बेरोजगार हो गए पर ये युवा और उनके अभिवावक अपनी बेरोजगारी का कारण आर्थिक सुधार नही बल्कि संविधान में दलितांे को दिए गए आरक्षण को मानते हैं। वह इस आरक्षण के लिए महात्मा गाँधी और डा आंबेडकर के बीच 1932 में हुए पूना पैक्ट को मानते हैं। अब बहस इस बात पर उठती हैं कि पूना पैक्ट देश के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी भूल थी।
पूना पैक्ट या पूना समझौता महात्मा गाँधी और डॉ. आंबेडकर के बीच पुणे की यरावदा जेल में 24 सितंबर 1932 को हुआ था जिसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सप्रदायिक अधिनियम में संशोधन के रूप में अनुमति प्रदान की थी। इस समझौते में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन मंडल के फैसले को त्याग कर दिया गया और दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में केंद्रीय विधायिका और प्रांतीय विधानसभा में कुल सीटों की संख्या 18 प्रतिशत कर दी गई। इससे पूर्व द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में विचार-विमर्श के पश्चात कम्युनल अवार्ड की घोषणा की गई। जिसके अंतर्गत डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा उठाई गई राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को मानते हुए दलितों को दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट से दलित वर्ग अपना प्रतिनिधि चुनेंगे और दूसरे वोट से सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को चुनेंगे। इस प्रकार दलित प्रतिनिधि केवल दलितों के ही वोट से चुना जाना था। वास्तव में सांप्रदायिक पंचाट की घोषणा ब्रिटिश प्रधान मंत्री रैम्सजे मैक्डोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को दलितों सहित 11 समुदायों को पृथक निर्वाचन मण्डल प्रदान किया गया।
दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मण्डल का गांधी जी ने विरोध किया और यरावदा जेल में इसके विरोध में 20 सितंबर 1932 को अनशन प्रारंभ कर दिया। 24 सितंबर 1932 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासो से गाँधी जी और डॉ. आंबेडकर के मध्य पूना समझौता हुआ जिसमें संयुक्त हिंदू निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत दलितों के लिए स्थान आरक्षित रखने पर सहमति बनी। इस समझौते से डॉ. आंबेडकर को कंम्युनल अवार्ड से मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ना पड़ा तथा संयुक्त निर्वाचन पद्धति को स्वीकार करना पड़ा जो आज-कल देश में प्रचलित है। पर साथ ही विधायिका में दलितों के लिए 18 प्रतिशत सीटे आरक्षित कराने में सफलता प्राप्त की तथा प्रत्येक प्रांत में शिक्षा अनुदान में पर्याप्त राशि आरक्षित कराई और सरकारी नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग की भर्ती को सुनिश्चित किया। कहा जाता है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करके डॉ. आंबेडकर ने गांधी जी को जीवनदान दिया। डॉ. आंबेडकर को इस समझौते को दबाव में किया और वे इससे संतुष्ट नही थे। उन्होंने गाँधी के अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी मांग से पीछे हटने के लिए दबाव डालने के लिए गाँधी जी के द्वारा खेला गया नाटक करार दिया। 1942 में डा आंबेडकर ने इस समझौते का धिक्कार किया, उन्होंने अपने द्वारा लिखे गये ग्रंथ ‘स्टेट ऑफ माइनारिटी‘ में पूना पैक्ट संबंधी नाराजगी व्यक्त की। वास्तविकता यह थी कि रैम्मसेे मैक्डोनाल्ड खुद को भारतीयों का दोस्त मानते थे और वे भारतीय समाज के मुद्दों को हल करना चाहते थे और गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद ही कम्युनल अवार्ड की घोषणा की गई थी।
अब प्रश्न यह उठता है कि पूना पैक्ट 1932 जो दलितों के आरक्षण का आधार बना वह सवर्ण समाज के तीन प्रमुख व्यक्तियों महात्मा गाँधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित मदन मोहन मालवीय की सहमति से हुआ तो आरक्षण का विरोध करने वाले लोग आरक्षण के लिए देश के प्रमुख राष्ट्रवादी डॉ. अंबेडकर को उत्तरदायी क्यों मानते हैं। कुछ दिन पूर्व मेरी मुलाकात प्रसिद्ध दलित नेता व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से हुई, आपसी बातचीत में श्री मांझी ने पूना पैक्ट द्वारा उपजी परिस्थितियों पर दुख व्यक्त करते हुए बताया कि यदि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की बात मान ली गई होती तो दलित प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए सिर्फ दलित ही मतदान करते तो वे अपने प्रतिनिधित्व के लिए सक्षम और शिक्षित लोगों का चुनाव करते जबकि आज के सिस्टम में ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक दलितों का प्रतिनिधित्व अधिकांशतः ऐसे लोग करते हैं जो ऐसे लोगों के पिछलग्गू होते है जिन्होंने इनका शादियों तक शोषण किया है। आरक्षित सीटों पर ऐसे लोग आते हैं जो इन सवर्ण के हलवाह या चरवाह ही होते हैं जो चुनाव जितने के बाद अपनी मुहर जेब में रखकर अपने आका के पीछे-पीछे चलते हैं और उनकी बताई जगह पर ठप्पा लगा देते हैं। यदि किसी आरक्षित सीट पर कोई प्रतिभावान या शिक्षित दलित लड़ने का साहस कर भी लेता है तो उसे पनपने ही नही दिया जाता। ऐसे कमजोर नेतृत्व के बल पर वंचित समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पायेगा और आरक्षण अनिश्चितकाल तक चलता रहेगा और दलित समुदाय राजनीतिक दलों के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होता रहेगा,
अब सोशल मीडिया व अन्य मंचों पर अनुसूचित जाति के आरक्षण को कोसना बन्द होना चाहिए। इस समय बढ़ती बेरोजगारी का वास्तविक कारण जाने बगैर लोग अपनी नाकामी के लिए आरक्षण को दोष देते हैं और इस आरक्षण के लिए संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर को कोसते हैं जबकि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्मसे मैकडोनाल्ड के कम्युनल अवार्ड के कारण दलित निर्वाचक मंडल के प्रावधान को नाकाम करने के उद्देश्य से किया गया। पूना पैक्ट महात्मा गॉंधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद व पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से साकार हुआ और इसके कारण वर्तमान में चल रहा दलित आरक्षण अस्तित्व में आया। फिर भी दलित विचारक यह तर्क देते हैं कि दलितों हेतु पृथक निर्वाचन मंडल को नकारने और आधुनिक आरक्षण पद्धति लागू करने के कारण उनकी जाति की जनसंख्या के मात्र 3 प्रतिशत लोग इससे लाभांवित हो पाए हैं। यदि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की बात मान ली गई होती और दलित प्रतिनिधि चुनने का मतदाता दलित ही होता तो दलितों व वंचितों का प्रतिनिधित्व शिक्षित व योग्य दलित करते न कि सवर्ण जमीदारों के घरों में काम करने वाले अंगूठा छाप व पिछलग्गू लोग और आरक्षण का प्रावधान अनिश्चितकाल के लिए नही होता।
गुरुवार, 28 दिसंबर 2023
चुनावी रणनीति का शिकार हुई संसद
अवधेश कुमार
संसद के शीतकालीन सत्र ने अपने माननीय सांसदों के निलंबन का रिकॉर्ड बना दिया। पूरा देश सांसदों के व्यवहार और निलंबन देखकर विस्मित था। दोनों सदनों को मिलाकर 146 सांसदों के निलंबन की कभी कल्पना नहीं की गई होगी। सत्र समाप्त होने के साथ आईएनडीआईए के सदस्यों ने पहले संसद से विजय चौक तक विरोध मार्च निकाला और बाद में जंतर-मंतर पर धरना दिया व विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन को नाम दिया गया था, लोकतंत्र बचाओ देश बचाओ। ठीक विपरीत सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष पर लोकतंत्र के अपहरण का आरोप लगाया है। संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा है कि दृश्य ऐसा था मानो विपक्षी सांसद अपने निलंबन करने के लिए गिड़गिड़ा रहे हों। इसमें सबसे चिंता का विषय सरकार और विपक्ष की लड़ाई का लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति बनाम विपक्ष में परिणत हो जाना है। प्रत्यक्ष तौर पर भले यह न दिखे पर सच्चाई यही है। अगर माननीय सांसद सर्वसम्मति से निर्धारित आचरण को तोड़ते हुए बेल में जाते हैं , तख्तियां दिखाते हैं, नारे लगाते हैं, आसन की ओर कागज फेंकते हैं तो यह सरकार का नहीं आसन यानी अध्यक्ष और सभापति का अपमान होता है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ तथा कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के बीच का पत्र व्यवहार देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी चिंताजनक है। धनकर ने खरगे और राकांपा प्रमुख शरद पवार को पत्र लिखकर कहा है कि स्वीकार नहीं की जाने वाली मांगों के जरिए सदन को पंगु बनाने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि पीड़ा के साथ कह रहा हूं कि मेरे आग्रह और प्रयासों को सदन में स्वस्थ कामकाज के लिए आपका समर्थन नहीं मिला। अनुभवी नेता के तौर पर आप जानते हैं कि पीठासीन अधिकारी के साथ बातचीत उच्च प्राथमिकता होती है। सभापति के लिए इससे अधिक पीड़ादायी कुछ नहीं हो सकता है कि मुलाकात का आग्रह स्वीकार नहीं किया गया। यह संसदीय परंपरा के अनुरूप नहीं था। उनकी एक पंक्ति देखिए,- यह देखकर दुख हुआ कि कुशल राजनीतिज्ञ का दृष्टिकोण प्रदर्शित करने और उच्च सदन की गरिमा बनाए रखने के बजाय अनुभवी सदस्यों ने भी दलगत भावना से प्रेरित दृष्टिकोण अपनाया। दूसरी ओर खरगे ने अपने पत्र में इतनी बड़ी संख्या में सांसदों के निलंबन को भारत के संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के लिए हानिकारक बताते हुए कहा है कि वह इससे व्यथित और चिंतित हैं और निराशा व दुखी महसूस कर रहे हैं। उनकी पंक्ति देखिए , – मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि संसद की सुरक्षा में सेंध के मुद्दे पर राज्यसभा के के नियम और प्रक्रियाओं से संबंधित नियमों के तहत कई नोटिस दाखिल किए गए थे। खेद का विषय है कि न तो इनको स्वीकार किया गया और न ही मुझे या विपक्षी दलों के किसी अन्य सदस्य को बोलने की अनुमति प्रदान की गई। इन पंक्तियों के बाद किसी को संदेश रह जाता है कि खरगे अंततः किसे आरोपित कर रहे है?
संसद के दोनों सदन में अध्यक्ष व सभापति का निर्णय ही मान्य होता है। खरगे कह रहे हैं कि हमने आपको नोटिस दिया लेकिन आपने चर्चा नहीं करायी। वे उपराष्ट्रपति से मिलने की बात कर रहे हैं किंतु इसमें भी उन्होंने लिखा है कि आपसी सहमति से निर्धारित तिथि पर वह उनसे मामले पर चर्चा करें और उनकी चिताओं का निवारण करें। इस तरह की भाषा में लिखा गया पत्र ही बताता है कि स्थिति कितनी बिगड़ चुकी है। सरकार के साथ तनाव, मतभेद व संघर्ष समझ में आता है किंतु अध्यक्ष और सभापति तक की बातें न मानी जाए और उन्हें आरोपित किया जाए तो इनमें बीच का रास्ता नहीं निकल सकता। इससे पता चलता है कि सदन के अंदर कितनी विकट स्थिति रही होगी। अगर 2024 लोकसभा की चुनावी रणनीति का शिकार संसद को बनाया जाएगा तो ऐसी ही स्थिति पैदा होगी। मान कर चलिए कि इस संसद के अंतिम सत्र यानी बजट सत्र में भी ऐसे ही डरावने दृश्य उत्पन्न होंगे।
दो युवकों का दर्शक दीर्घा से कूदना और एक का जूते से प्लास्टिक कैन निकालकर पीला धुआं छोड़ना चिंताजनक घटना थी। इसे गंभीरता से लेकर सुरक्षा में ऐसे आवश्यक बदलाव करने चाहिए जिसे न दर्शक दीर्घा में आने वाले दुष्प्रभावित हो और न ही आगे से इस तरह के जोखिम की संभावना रहे। सभी माननीय सांसदों को ध्यान रखना चाहिए कि देश और दुनिया में ऐसी तस्वीर न बने कि भारत अपनी संसद की सुरक्षा करने में भी सक्षम नहीं है। कुछ विपक्षी सांसद कहने लगे कि कल कोई हथियार लेकर भी अंदर आ जाएगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि संसद की सुरक्षा में हथियार लेकर जाने की गुंजाइश नहीं है। दोनों युवकों के दर्शक दीर्घा से कूदने, बेंच पर उछलने तथा धुआं छोड़ने के साथ सांसदों ने ही उनकी पिटाई की, मार्शल उन्हें पकड़ कर बाहर ले गए तथा सदन सुचारु रुप से चलने लगा। अचानक कुछ देर बाद हंगामा हो गया। देखते- देखते विपक्षी सांसदों के बेल में जाने, आसन पर कागज के टुकड़े फेंकने, महासचिव की कुर्सी तक जाकर हंगामा करने तथा तख्तियां लेकर नारे लगाने में परिणत हो गया। जब संसद ने सर्वसम्मति से तय किया है कि तख्तियां लेकर बेल में आने पर निलंबन ही होगा तो जाहिर है जाने वाले सबको पता था। सारे दृश्य स्पष्ट कर रहे हैं कि सांसदों ने जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा की जिनसे उनके निलंबन के अलावा आसन के पास दूसरा विकल्प न रहे। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक्स पर लिखा भी कि वे पहली बार तख्ती लेकर बेल में गए और अपने निलंबन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तो यह स्वयं को निलंबित कराने की ऐसी रणनीति थी जिसका दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता। निलंबन पर सांसदों को अफसोस होना चाहिए कि उन्होंने लोकतंत्र की शीर्ष इकाई के शीर्ष प्रतिनिधि वाले आचरण की मर्यादा का उल्लंघन किया। निलंबन पर गर्व महसूस करने और साथियों द्वारा महिमामंडित किए जाने का माहौल बनाया गया। विपक्ष की मांग थी कि सुरक्षा चूक पर गृह मंत्री बयान दें , जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने स्वयं कहा कि संसद की सुरक्षा का दायित्व उनका है, इसलिए वे इस पर बयान देंगे। लोकसभा अध्यक्ष को बयान देने की स्थिति बनायी जानी चाहिए थी।
ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर सदन में चर्चा न की जा सके। किंतु इसके लिए दोनों पक्षों को अपने रुख में लचीलापन दिखाने की आवश्यकता थी। यह विषय सरकार की आक्रामक घेरेबंदी की बजाय सभी दलों के बीच विमर्श का था कि ऐसा क्यों हुआ और आगे इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो। ऐसा क्यों हुआ?
विधानसभा चुनाव में आईएनडीआईए लगभग अस्तित्वहीन हो गया था तथा कांग्रेस के अहंवादी व्यवहार से इसके कई घटक दलों में नाराजगी थी। कांग्रेस को लगा कि यही स्थिति है जिसमें फिर विपक्ष को भाजपा विरोध पर एकजुट किया जा सकता है। भाजपा विरोध के नाम पर संसद में विपक्षी एकजुटता सबसे आसान रास्ता था और रणनीति के तहत ऐसा व्यवहार किया गया। आज एक तरफ सरकार और दूसरी ओर आईएनडीआईए है। विपक्ष व्यवहार से अपना निलंबन कराने पर तुला हो तो सरकार के लिए विधेयक पारित कराना ज्यादा आसान हो जाता है। यही इस सत्र में हुआ। अंग्रेजों के समय का भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और अपराध न्याय प्रक्रिया को आमूल रूप से बदल दिया गया किंतु विपक्षी सदस्य इस पर चर्चा से वंचित रहे। बेशक , संसद चलाने की जिम्मेवारी सरकार की ज्यादा है किंतु विपक्ष की भी है। मल्लिकार्जुन खरगे ने जंतर-मंतर धरना में कहा कि देश में बेरोजगारी की स्थिति है तथा बेरोजगारों में गुस्सा है। उन्होंने इन युवाओं के विरोध और निंदा की जगह कहा कि इन्होंने गलती की कि संसद में कूद गए। अगर यह छोटी गलती है तो सुरक्षा की बड़ी चूक कैसे हो गई? विपक्ष ने घटना को इस रूप में पेश किया कि देश की हालत अत्यंत खराब है, नरेंद्र मोदी सरकार में नौजवान बेरोजगारी से परेशान और आक्रोशित हैं, जिसे उन्होंने संसद में कूद कर प्रकट कर दिया। विपक्ष का यह सार्वजनिक रूख असंतुलित मानस के लोगों को इस तरह या सदृश दूसरी या इससे बड़ी घटनाओं के लिए प्रेरित करेगा। सरकार यह स्वीकार नहीं करेगी और न ही यह सच है कि मोदी सरकार के विरुद्ध जनता में व्यापक आक्रोश है। ऐसे में सरकार और विपक्ष के बीच रास्ता निकालने की कोई संभावना ही नहीं थी और हमारे लोकतंत्र की शीर्ष इकाई राजनीति का दुर्भाग्यपूर्ण शिकार हो गई।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल-9811027208
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