मंगलवार, 12 अगस्त 2014
गुरुवार, 7 अगस्त 2014
मोदी ने भारत नेपाल संबंधों को ऐतिहासिक आयाम दिया
यह तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के घोर विरोधी भी स्वीकार करेंगे कि उन्होंने नेपाल की संविधान सभा सह संसद में अविस्मरणीय भाषण दिया है। मोदी के कट्टर समर्थकों को भी इतने उम्दा और प्रभावी भाषण की उम्मीद नहीं थी जिसमें एक साथ भावनाओं का निश्च्छल उद्रेक भी झलके और ठोस व ऐतिहासिक प्रस्ताव भी, जिसमें इतिहास और वर्तमान का ऐसा अनूठा पुट हो जो दिलों को छुए और विरोधियों को भी अपना बना लेेने की क्षमता रखे, जिसमें सांस्कृतिक, आघ्यात्मिक, सामाजिक....प्राकृतिक अविच्छिन्नता का प्रतिबिम्ब हो और हाथ से हाथ, कंधा से कंधा मिलाकर विकास का प्रतिमान कायम करने का आह्वान और प्रेरणा भी, जिसमें नेपाल को संविधान बनाकर पूरे विश्व के लिए शांति और अहिंसा के लोकतांत्रिक रास्ते से राजनीतिक व राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने का ऐसा उद्वेलन का भाव हो कि कुछ सभासदन वहीं यह प्रण लेने लग जाएं कि अब हम अपना संविधान निर्माण करके ही रहेंगे.......। सच कहा जाए तो नेपाल ने इसके पूर्व किसी भारतीय प्रधानमंत्री को तो छोड़िए, किसी का भी ऐसा भाषण नहीं सुना होगा जिससे उनके अंदर अपनत्व के साथ ऐसा आत्मविश्वास और आत्मगौरव का भाव पैदा कर सके। नेपाल तो छोडिए, किसी भी दो पड़ोसी देशों के संबंधों में किसी मेजबान प्रधानमंत्री के इस तरह के भाषण का उदाहरण इतिहास मंें भी विरले ही होगा। इसलिए यदि आम मीडिया की यह टिप्प्णी है कि मोद का जादू नेपाल में सिर चढ़कर बोला या मोदी ने नेपालियों का दिल जीता तो इसमें अतिशयोक्ति तलाशना मुश्किल है।
आखिर जब विचार से भाजपा जैसी पार्टी के धुर विरोधी माओवादी प्रचंड तक कह रहे हैं कि उनका भाषण दिल को छू गया है और इससे दोनों देशों के संबंधों में नई गरमी की शुरुआत हो गई है तो इससे आगे मोदी की सफलता का और क्या प्रमाणपत्र चाहिए! प्रचंड और उनके सहयोगी तथा उन्हीं की तरह पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई अगली कतार में बैठे थे और दोनों को कई बार मेजें थपथपाते देखा गया। प्रचंड ने कहा कि मोदी का भाषण ऐतिहासिक रहा। जिस तरीके से मोदीजी ने गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक, राम और सीता से होते हुए दोनों देशों को जोड़ने की कोशिश की वह लाजवाब है। मैं मानता हूं मोदी की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच रिश्तों में सहयोग और भरोसे का माहौल मजबूत होगा। जब उनसे पूछा गया कि भारत नेपाल से ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग चाहता है, क्या नेपाल इस समझौते पर आगे बढ़ेगा? प्रचंड ने कहा कि अब कोई समझौता मुश्किल नहीं है। भारत से ऊर्जा समझौता होकर रहेगा। जाहिर है, इस प्रतिक्रिया के बाद कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। नेपाल के विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के साथ मोदी की बातचीत के बाद कहा कि ऐसा लगा कि हम एक मजबूत और दूरदर्शी व्यक्तित्व से बात कर रहे हैं। हम उनकी बातों और प्रस्तावों से बहुत प्रभावित हैं।
मैंने नेपाल में काम किया है खासकर मधेस आंदोलन के दौरान। इस नाते मैं कह सकता हूं कि दोनों देशों में सबसे ज्यादा यदि किसी बात का महत्व है तो भावनाआंे का। हाल के वर्षों में भावनाओं की जगह कूटनीतिक यांत्रिकता संबंधों का निर्धारण कर रहीं थीं, जिनसे वहां भारत को लेकर निराशा और कुछ हद तक क्षोभ का भी माहौल बना हुआ था। भारत विरोधी भाषा केवल माओवादी नहीं बोलते थे सभी पार्टी के नेता गाहे बगाहे ऐसी भाषा का प्रयोग करते थे। चीन ने इसी का लाभ उठाकर पिछले सात-आठ सालांें में वहां अपना व्यापक प्रसार किया है। पहली बार वहां के बजट में चीन का वित्तपोषण हुआ। यह भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल था, पर हमारे राजनीतिक नेतृत्व की विफलताओं के कारण ऐसा हुआ। तत्काल भारत के राजनीतिक नेतृत्व के सामने नेपाल के संदर्भ में चार लक्ष्य हैं- एक, वहां संविधान का निर्माण हो और नेपाल का शासन उसके तहत संचालित होने लगे, दो, जो विश्वास के बीच खाई बन गई है वह पटे ही नहीं, विश्वास अपनापन और परस्पर सहकार में बदलने की दिशा में अग्रसर हो तथा तीन, उर्जा का क्षेत्र विशेषकर जल विद्युत से संबंधित पूर्व की परियोजनाएं साकार हों और नई परियोजनाओ पर आपसी सहयोग के साथ तेजी से काम हो., नेपाल विकास पथ पर अग्रसर हो जिसमें भारत की सहकारी भूमिका हो.......।
संविधान निर्माण सबसे पहली आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि इस समय जो सरकार है उसे भारत समर्थित सरकार माना जाता है। यदि इसके कार्यकाल में संविधान न बना तो फिर इसका आरोप भारत पर आएगा और विरोधी इसका लाभ उठाएंगे...खासकर माओवादी भारत विरोधी अभियान चलाकर फिर से सत्ता पर काबिज हो सकते हैं और वहां विद्रोह एवं हिंसा भी खड़ा हो सकता है। अगर संविधान निर्माण हो तो वह बिल्कुल संसदीय लोकंतत्र की कल्पना के अनुरुप सर्वसमावेशी एवं मधेसियों की मांग के अनुसार सच्चे संघीय स्वरुप वाला हो। पिछली संविधान सभा का कार्यकाल लगातार बढ़ाया गया, पर संविधान का निर्माण न हो सका। वर्तमान संविधान सभा सह संसद भी एक वर्ष पूरा करने जा रहा है पर संविधान निर्माण के लिए चार-पांच से ज्यादा बैठकें नहीं हुईं हैं। आप ध्यान दीजिए मोदी के पूरे भाषण में आपसी निकटता और अविच्छिन्नता साबित करने के आवश्यक विन्दुओं के बाद सबसे ज्यादा अंश संविधान की आवश्यकता, उसके स्वरुप एवं उसके महत्व पर ही था। मोदी ने कहा कि पूरी दुनिया की नजर आपकी ओर है कि युद्ध से बुद्ध की ओर अग्रसर एक देश ने किस तरह संविधान निर्माण कर देश का शांति और अहिंसक तरीके से रुपांतरित कर दिया है। इससे हिंसा के आधार पर बदलाव चाहने वाले दुनिया के समूहों को भी प्रेरणा मिलेगी। जाहिर है, नेपाल केन्द्रीत भारत की कूटनीति का मुख्य लक्ष्य अब वहां संविधान निर्माण में सहयोग करना तथा उसके लिए सक्रिय रहना हो गया है। मोदी ने प्रधानमंत्री कोईराला को अपनी ओर से भारत में राज्य सभा चैनल द्वारा संविधान निर्माण पर निर्मित श्रृखला की एक सीडी भेंट की। यह उनको समझाने के लिए था कि किस तरह भारत के संविधान निर्माताओं ने आपसी मतभेदों के बावजूद तय समय सीमा मेें अपने लिए संविधान का निर्माण कर दिया।
अगर पूर्व सरकार ने इस तरह की कोशिश की होती तो निश्चय मानिए नेपाल का संविधान कब का तैयार हो चुका होता। फिर आज नेपाल की स्थिति अलग होती एवं दुराव की जो खाई पैदा हुई वह नहीं होती। हमें यह स्वीकार कर चलना होगा कि नेपाल और भारत के बीच अविश्वास की एक जटिल सी खाई बन चुकी है। पहाड़ के लोगों में यह दुष्प्रचार है कि भारत नेपाल की ओर बुरी नजर रखता है एवं वह इसके संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। दूसरी ओर जिन मधेसियों का भारत से लगाव है वे मान रहे हैं कि भारत ने उनके अधिकार पाने के संघर्ष में जितना सहयोग करना चाहिए था नहीं किया। उर्जा परियोजनायें भी इसी का शिकार हैं। 1997 में पंचेश्वर परियोजना पर हस्ताक्षर हुआ लेकिन काम नहीं हो सकता। प्रचार यह हुआ कि भारत वहां बांध बनाकर अपने लिए बिजली ले जाएगा और हमें कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए माओवादी उसका बराबर विरोध करते रहे, काम नहीं होने दिया। इसके विपरीत चीन ने उसके साथ मिलकर छोटी छोटी परियोजनायें पूरी कर लीं। चीन को तिब्बत के लिए बिजली चाहिए वह नेपाल के माध्यम से लेना चाहता है। मोदी ने विश्वास बहाली के लिए जितना संभव था प्रस्ताव दिए। उन्होंने कहा कि जिस दिन मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय में कदम रखा, उस दिन से ही नेपाल के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करने का मुद्दा अपनी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता में रखा हूं। उन्होंने कहा, मैं भारत के सवा सौ करोड़ लोगों की ओर से दोस्ती और सद्भावना का संदेश लेकर आया हूं। 1950 की संधि की समीक्षा की बात कोइरला से बातचीत में स्वीकार कर लिया। माओवादी इसे बड़ा मुद्दा बना रहे थे। आधुनिक समय के अनुरुप यह संधि बने इसमें हमें क्यों हर्ज होना चाहिए। 10 हजार करोड़ रुपए का नया रियायती कर्ज तो इनमें से एक था। छात्रों के लिए वजीफों की संख्या बढ़ाना, तेल गैस के लिए पाइपलाईन, बिजली की आपूर्ति की मात्रा बढ़ाना, टेलीफोन बातचीत के भारी शुल्क को कम करने की पहल, सार्क उपग्रह ...आदि उसके पहलू थे।
सच यह है कि दोनों देशों के बीच दूरियां पाटने के जितने पहलू हो सकते थे उनने उठाया। यह पहली बार था जब भारत के प्रधानमंत्री ने नेपाल को विकसित देश बनने के ऐसे सूत्र दिए जो व्यावहारिक लगे और नेपालियांे ने उसका स्वागत किया। पानी का उपयोग कर बिजली बनाने और सिंचाई करने के अलावा हिमालय पर अनुसंधान, इसे जड़ी बुटियों के माध्यम से होलिस्टिक स्वास्थ्य का हब बनाना, अकार्बनिक खेती का केन्द्र बनाना, सामान्य पर्यटन केन्द्र के अलावा दुनिया के एडवेंचर चाहने वालों का पर्यटन केन्द्र बनाना आदि ऐसी बातें थीं जो इसके पूर्व भारत की ओर से कही ही नहीं गईं थीं। मोदी ने जो अंग्रेजी के तीन शब्द हिट का सूत्र दिया वह नेपाल में गूंज रहा है। उनके मुताबिक हिट का अर्थ है - एच - हाइवेज (राजमार्ग), आई - आई-वेज यानी इन्फौर्मेशन वेज, और टी से मतलब है ट्रांसवेज (पारगमन मार्ग)। उन्होंने कहा कि संयुक्त रूप से इन तीनों के जरिए देश के तीव्र विकास का रास्ता तैयार होगा और भारत जल्द से जल्द यह तोहफा प्रदान करना चाहता है। मोदी ने कहा कि बेहतर संपर्क मार्ग निर्माण में भारत नेपाल की मदद करेगा। नेपाल में सूचना हाइवे विकसित करने में भी भारत नेपाल को सहायता देगा ताकि नेपाल दुनिया के देशों में पीछे नहीं छूट जाए। नेपाल को भी डिजिटल दुनिया में आगे रहना होगा और पूरी दुनिया के साथ उसका संपर्क स्थापित होना चाहिए।
किसी को ऐसा लग सकता है कि मोदी ने पशुपतिनाथ के मंदिर में जिस पूजा में हिस्सा लिया, वो उनका निजी था। लेकिन नहीं निजी के साथ इसका प्रतीकात्मक महत्व द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे पहले किसी राजनेता ने इस तरह की पूजा में हिस्सा नहीं लिया है। भारत नेपाल संबंधों में धर्म, अध्यात्म का विशेष महत्व है। भय यह था कि मोदी के जनकपुर एवं लुम्बिनी न जाने से मधेसियों में निराशा पैदा होगी। लेकिन मोदी ने भाषण के अंत में घोषणा कर दी कि जब वे सार्क सम्मेलन में आयेंगे तो दोनों जगहों पर जाएंगे। इससे उनको भी आत्मसंतोष हुआ होगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मोदी की यात्रा से नेपाल भारत रिश्तों का सही तरीके से पहली बार ठोस मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक आधार तैयार हुआ है। इसमें उनने चीन का विरोध कहीं नहीं किया, पर अगर भारत उनकी सोच और भाषण के अनुरुप आगे बढ़ा तो चीन के विस्तार पर काफी हद तक विराम लगेगा। लेकिन इसके लिए कार्यप्रणाली भी बदलनी होगी। सबसे पहले दूतावास की मिनी दरबार की छवि तोड़कर इसी तरह संवेदनशील बनाना होगा। इसके लिए वहां राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने वाले को राजदूत बनाया जाए एवं वैसे लोगों को वहां अन्य भूमिकायें मिलें। इससे भ्रष्टाचार एवं सामंती व्यवहार खत्म होगा, अन्यथा मोदी का सपना और बनाया गया वातावरण कमजोर पड़ जाएगा।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
मंगलवार, 5 अगस्त 2014
गुरुवार, 31 जुलाई 2014
गाजा मामले पर भारत सरकार का रुख
नरेन्द्र मोदी सरकार गाजा पट्टी में इजरायल की ओर से किए जा रहे हमले पर अपने रवैये को लेकर दोहरे विरोध का सामना कर रही है। इजरायल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में वोट डालने के कारण यदि भाजपा के कार्यकर्ता एवं कट्टर समर्थक सरकार के खिलाफ हैं तो संसद में इस मुद्दे पर निंदा प्रस्ताव पारित न कराए जाने को लेकर कुछ विपक्षी दल नाक भौं सिकोड़ रहे हैं। इजरायल एवं फिलिस्तीन ऐसा मामला है जिस पर भारत में कभी एक राय नहीं रही है। हमेशा देश इस पर विभाजित रहा हैं। वामपंथी दल या उस सोच के समर्थक हमेशा से इजरायल को खलनायक मानते हुए फिलीस्तीन के पक्ष में खड़े होते रहे हैं। भाजपा एवं संघ परिवार का रुख हमेशा इजरायल के समर्थन का दिखता रहा है। प्रश्न है कि वर्तमान रुख को हम किस तरह लेे? अगर सीधे-सीधे देखंे तो संसद में बहस नहीं कराना एवं प्रस्ताव में मत डालना सरकार के दोहरे रुख का प्रमाण नजर आएगा? तो क्या यही सच है?
सबसे पहले मानवाधिकार परिषद में आए प्रस्ताव को समझने की कोशिश करें। इसमें लाए गए प्रस्ताव में सबसे पहले गाजा पट्टी में इजराइली हमले में मारे जा रहे निर्दाेष लोगों की हत्या की निंदा की गई थी। साथ ही इसमें इजराइली हमले की जांच करने की बात भी कही गई थी। सामान्य तौर पर देखें तो ऐसे प्रस्ताव का समर्थन करने में कोई समस्या नजर नहीं आएगा। न सरकार के पक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि अगर प्रस्ताव में इजराइल की ओर से जबर्दस्त सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने की आलोचना की गई थी तो इसके समर्थन में मत देने में क्या समस्या थी? यह सच है कि इजराइल के पक्ष में सिर्फ अमेरिका ने वोट डाला। वैसे भी चीन, रूस, ब्राजील, भारत, पाकिस्तान समेत 46 देशों में 24 ने प्रस्ताव के पक्ष में यानी इजराइल के खिलाफ वोट दिया। आप देखेंगे ब्रिक्स के सारे देश इस प्रस्ताव के समर्थन में यानी इजरायल के खिलाफ खड़े हुए। हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन में जिस एकजुटता की बात की गई थी यह कदम उसके अनुरुप था। लेकिन इसके साथ सच यह भी है कि यूरोप के सभी देशों सहित कुल 17 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। तो यह विकल्प भी भारत के पास था। भाजपा समर्थकों का कहना है कि भारत को प्रस्ताव के खिलाफ जाना चाहिए था और अगर न गया तो कम से कम वह बहिर्गमन तो कर ही सकता था। हालांकि सरकार समर्थकों का तर्क यह है कि भारत ने पहली बार ऐसा नहीं किया है। इसके पूर्व भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई बार इजराइल के खिलाफ वोट दिया है। यह परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के समय से चली आ रही है। चूंकि, प्रस्ताव निर्दाेषों की हत्या की आलोचना और पूरे मामले की जांच से जुड़ा था, इसलिए भारत ने अपनी विदेश नीति में निरंतरता के मद्देनजर इजराइल के खिलाफ वोट दिया।
साफ है कि यह तर्क सबके गले नहीं उतर सकता। यह भारत ही है जिसने नरसिंह राव के नेतृत्व में जायनवाद बनाम नस्लवाद के खिलाफ वोट देकर इजरायल को उबारा था। यह भारत ही है जिसने इजरायल को मान्यता दी और अनेक देशों का विरोध झेलते हुए भी उसके साथ पूर्ण राजनयिक रिश्ता कायम किया। तब फिलीस्तीन नामक देश का उदय भी नहीं हुआ था। हां, इसके साथ यासर अराफात के नेतृत्व में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन को भी भारत समर्थन करता रहा है। तो इस प्रकार भारत की पृष्ठभूमि ही इजरायल एवं फिलीस्तीन के संदर्भ में दोहरा दिखता रहा है। लेकिन इसके पीछे सशक्त सोच थी। भारत इजरायल के अस्तित्व को भी स्वीकारता रहा है तथा वह फिलीस्तिनियों के भी स्वतंत्र देश के रुप में आविर्भाव का पक्षधर था। तो हम विचार करते समय इस पक्ष को न भूलें।
लेकिन इस समय मामला दूसरा है। यह बात ठीक है कि हमास एक आतंकवादी संगठन है और उसे अनेक जेहादी आतंकवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त है। उसने जिस तह इजरायली लड़कों की हत्या करके अपना आचरण प्रदर्शित किया वह असह्य था। 2012 में हमास और इजराइल के बीच युद्धविराम समझौता हुआ था। उसके बाद से दोनों के बीच आपसी हमलों में कमी आई थी। हालांकि अप्रैल 2014 में अमेरिका की पहल पर फलस्तीनी संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिशें नाकाम हो गई थीं। अचानक पिछले जून में हमास और फतह के बीच समझौता हो गया और दोनों ने एकता सरकार बना ली। इस तरह से दोनों गुटों ने 8 वर्षों से चल रही तनातनी के दौर को खत्म कर दिया। फलस्तीन के दो बड़े गुटों के बीच समझौतो को अपने लिए खतरा मानना इजराइल के लिए स्वाभाविक था। इसी बीच, इजराइल के तीन युवाओं का पश्चिमी किनारा में रहने वाले एक फलस्तीनी परिवार ने अपहरण कर हत्या कर दी। इजराइल ने दावा किया कि वह हमास की कार्रवाई थी। हालांकि हमास ने इस आरोप से इन्कार किया, लेकिन उसके इन्कार पर विश्वास करना कठिन है। इसके बाद ही इजरायल ने बड़े पैमाने पर फलस्तीनियों को गिरफ्तार करना शुरू किया और दबाव बनाया। हमास ने इस कार्रवाई का जवाब रॉकेट से दिया। इसके बाद इजरायल ने उस पर हमला कर दिया। अभी तक करीब 1200 लोग मारे जा चुके हैं।
तो स्थिति विकट है। यकीनन गाजापट्टी में जिस तरह बच्चों की हत्यायें हो रही हैं उनसे दिल दहल जाता है और यह मानवाधिकार का खुलेआम उल्लंघन है, लेकिन हमास जैसे कट्रपंथी आतंकवादी समूह का मनोबल बढ़े यह भी उचित नहीं होगा। प्रस्ताव की सबसे बड़ी कमी यही थी कि हमास को लेकर इसमें कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं था। हम मानते हैं कि हमास से खतरे को लेकर इजराइल का चिंतित होना सही है। लेकिन गाजा में इजराइल की ओर से जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है यह भी सच है। गाजा में इजरायल की ओर से असंतुलित लड़ाई लड़ी जा रही है। अगर इस प्रस्ताव से लड़ाई रुक जाती तो बात समझ में आने वाली थी। ऐसा तो हुआ नहीं। तो इस प्रस्ताव का महत्व केवल प्रतीकात्मक ही है।
बावजूद इसके भारत के लिए बहिर्गमन का रास्ता ज्यादा उचित और भविष्य की दृष्टि से लाभकारी होता। हालांकि इससे इजरायल के साथ रिश्तों पर नकारात्मक असर नहीं होगा। भारत सरकार ने इस बात का ध्यान रखा है कि इजराइल को यह संदेश चला जाए कि भारत उसके साथ रिश्ते को अहमियत देता है और संयुक्त राष्ट्र संघ में वोट ज्यादा से ज्यादा चिंता जताता है न कि विरोध। इजरायल यह अवश्य ध्यान रखेगा कि भारत ने विपक्ष के दबाव के बावजूद उस पर संसद में वैसी बहस तो नहीं होने दी जैसी विपक्ष चाहता था। विपक्ष का एक तबका चाहता था कि बहस हो एवं इजरायल के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित हो। यह निस्संदेह, विदेश नीति के लिए गलत संदेश वाला होता। इजरायल हमारे लिए कई मामलांे में सहयोग और सहायक है। आतंकवाद के मामले पर हमें उसके सहयोग की लगातार आवश्यकता है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा के सभापति को चिट्ठी लिखकर कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि किसी मित्र देश को लेकर किसी तरह की अशोभनीय या विवादित टिप्पणी की जाए। सुषमा का कहना था कि हमारे दोनों देशों (इजराइल और फलस्तीन) के साथ राजनयिक संबंध हैं। किसी भी मित्र देश के खिलाफ टिप्पणी उस देश के साथ हमारे रिश्ते पर बुरा असर डालेगा।
यह सही सोच थी। काश, यही सोच मानवाधिकार परिषद में भी प्रतिबिम्बित होती। भारत की परंपरागत समस्या यही है कि एक बार तो वह लगता है जैसे किसी मुद्दे पर बिल्कुल एक परिपक्व और सबल देश की तरह तनकर खड़ा होता है लेकिन अगले ही पल वह ऐसी गं्रथि का शिकार हो जाता है जिससे उसकी पूर्व की भंगिमा कमजोर पड़ जाती है। ऐसा ही गाजा मामले में भी हुआ है। संसद में निंदा प्रस्ताव पारित न होने देने का मुखर रुख और प्रस्ताव के पक्ष में मत के बीच शत-प्रतिशत समानता तलाशी मुश्किल है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष: 01122483408, 09811027208
मंगलवार, 29 जुलाई 2014
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