नरेन्द्र मोदी सरकार गाजा पट्टी में इजरायल की ओर से किए जा रहे हमले पर अपने रवैये को लेकर दोहरे विरोध का सामना कर रही है। इजरायल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में वोट डालने के कारण यदि भाजपा के कार्यकर्ता एवं कट्टर समर्थक सरकार के खिलाफ हैं तो संसद में इस मुद्दे पर निंदा प्रस्ताव पारित न कराए जाने को लेकर कुछ विपक्षी दल नाक भौं सिकोड़ रहे हैं। इजरायल एवं फिलिस्तीन ऐसा मामला है जिस पर भारत में कभी एक राय नहीं रही है। हमेशा देश इस पर विभाजित रहा हैं। वामपंथी दल या उस सोच के समर्थक हमेशा से इजरायल को खलनायक मानते हुए फिलीस्तीन के पक्ष में खड़े होते रहे हैं। भाजपा एवं संघ परिवार का रुख हमेशा इजरायल के समर्थन का दिखता रहा है। प्रश्न है कि वर्तमान रुख को हम किस तरह लेे? अगर सीधे-सीधे देखंे तो संसद में बहस नहीं कराना एवं प्रस्ताव में मत डालना सरकार के दोहरे रुख का प्रमाण नजर आएगा? तो क्या यही सच है?
सबसे पहले मानवाधिकार परिषद में आए प्रस्ताव को समझने की कोशिश करें। इसमें लाए गए प्रस्ताव में सबसे पहले गाजा पट्टी में इजराइली हमले में मारे जा रहे निर्दाेष लोगों की हत्या की निंदा की गई थी। साथ ही इसमें इजराइली हमले की जांच करने की बात भी कही गई थी। सामान्य तौर पर देखें तो ऐसे प्रस्ताव का समर्थन करने में कोई समस्या नजर नहीं आएगा। न सरकार के पक्ष में यह भी कहा जा सकता है कि अगर प्रस्ताव में इजराइल की ओर से जबर्दस्त सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने की आलोचना की गई थी तो इसके समर्थन में मत देने में क्या समस्या थी? यह सच है कि इजराइल के पक्ष में सिर्फ अमेरिका ने वोट डाला। वैसे भी चीन, रूस, ब्राजील, भारत, पाकिस्तान समेत 46 देशों में 24 ने प्रस्ताव के पक्ष में यानी इजराइल के खिलाफ वोट दिया। आप देखेंगे ब्रिक्स के सारे देश इस प्रस्ताव के समर्थन में यानी इजरायल के खिलाफ खड़े हुए। हाल ही में ब्रिक्स सम्मेलन में जिस एकजुटता की बात की गई थी यह कदम उसके अनुरुप था। लेकिन इसके साथ सच यह भी है कि यूरोप के सभी देशों सहित कुल 17 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। तो यह विकल्प भी भारत के पास था। भाजपा समर्थकों का कहना है कि भारत को प्रस्ताव के खिलाफ जाना चाहिए था और अगर न गया तो कम से कम वह बहिर्गमन तो कर ही सकता था। हालांकि सरकार समर्थकों का तर्क यह है कि भारत ने पहली बार ऐसा नहीं किया है। इसके पूर्व भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई बार इजराइल के खिलाफ वोट दिया है। यह परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के समय से चली आ रही है। चूंकि, प्रस्ताव निर्दाेषों की हत्या की आलोचना और पूरे मामले की जांच से जुड़ा था, इसलिए भारत ने अपनी विदेश नीति में निरंतरता के मद्देनजर इजराइल के खिलाफ वोट दिया।
साफ है कि यह तर्क सबके गले नहीं उतर सकता। यह भारत ही है जिसने नरसिंह राव के नेतृत्व में जायनवाद बनाम नस्लवाद के खिलाफ वोट देकर इजरायल को उबारा था। यह भारत ही है जिसने इजरायल को मान्यता दी और अनेक देशों का विरोध झेलते हुए भी उसके साथ पूर्ण राजनयिक रिश्ता कायम किया। तब फिलीस्तीन नामक देश का उदय भी नहीं हुआ था। हां, इसके साथ यासर अराफात के नेतृत्व में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन को भी भारत समर्थन करता रहा है। तो इस प्रकार भारत की पृष्ठभूमि ही इजरायल एवं फिलीस्तीन के संदर्भ में दोहरा दिखता रहा है। लेकिन इसके पीछे सशक्त सोच थी। भारत इजरायल के अस्तित्व को भी स्वीकारता रहा है तथा वह फिलीस्तिनियों के भी स्वतंत्र देश के रुप में आविर्भाव का पक्षधर था। तो हम विचार करते समय इस पक्ष को न भूलें।
लेकिन इस समय मामला दूसरा है। यह बात ठीक है कि हमास एक आतंकवादी संगठन है और उसे अनेक जेहादी आतंकवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त है। उसने जिस तह इजरायली लड़कों की हत्या करके अपना आचरण प्रदर्शित किया वह असह्य था। 2012 में हमास और इजराइल के बीच युद्धविराम समझौता हुआ था। उसके बाद से दोनों के बीच आपसी हमलों में कमी आई थी। हालांकि अप्रैल 2014 में अमेरिका की पहल पर फलस्तीनी संकट के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिशें नाकाम हो गई थीं। अचानक पिछले जून में हमास और फतह के बीच समझौता हो गया और दोनों ने एकता सरकार बना ली। इस तरह से दोनों गुटों ने 8 वर्षों से चल रही तनातनी के दौर को खत्म कर दिया। फलस्तीन के दो बड़े गुटों के बीच समझौतो को अपने लिए खतरा मानना इजराइल के लिए स्वाभाविक था। इसी बीच, इजराइल के तीन युवाओं का पश्चिमी किनारा में रहने वाले एक फलस्तीनी परिवार ने अपहरण कर हत्या कर दी। इजराइल ने दावा किया कि वह हमास की कार्रवाई थी। हालांकि हमास ने इस आरोप से इन्कार किया, लेकिन उसके इन्कार पर विश्वास करना कठिन है। इसके बाद ही इजरायल ने बड़े पैमाने पर फलस्तीनियों को गिरफ्तार करना शुरू किया और दबाव बनाया। हमास ने इस कार्रवाई का जवाब रॉकेट से दिया। इसके बाद इजरायल ने उस पर हमला कर दिया। अभी तक करीब 1200 लोग मारे जा चुके हैं।
तो स्थिति विकट है। यकीनन गाजापट्टी में जिस तरह बच्चों की हत्यायें हो रही हैं उनसे दिल दहल जाता है और यह मानवाधिकार का खुलेआम उल्लंघन है, लेकिन हमास जैसे कट्रपंथी आतंकवादी समूह का मनोबल बढ़े यह भी उचित नहीं होगा। प्रस्ताव की सबसे बड़ी कमी यही थी कि हमास को लेकर इसमें कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं था। हम मानते हैं कि हमास से खतरे को लेकर इजराइल का चिंतित होना सही है। लेकिन गाजा में इजराइल की ओर से जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है यह भी सच है। गाजा में इजरायल की ओर से असंतुलित लड़ाई लड़ी जा रही है। अगर इस प्रस्ताव से लड़ाई रुक जाती तो बात समझ में आने वाली थी। ऐसा तो हुआ नहीं। तो इस प्रस्ताव का महत्व केवल प्रतीकात्मक ही है।
बावजूद इसके भारत के लिए बहिर्गमन का रास्ता ज्यादा उचित और भविष्य की दृष्टि से लाभकारी होता। हालांकि इससे इजरायल के साथ रिश्तों पर नकारात्मक असर नहीं होगा। भारत सरकार ने इस बात का ध्यान रखा है कि इजराइल को यह संदेश चला जाए कि भारत उसके साथ रिश्ते को अहमियत देता है और संयुक्त राष्ट्र संघ में वोट ज्यादा से ज्यादा चिंता जताता है न कि विरोध। इजरायल यह अवश्य ध्यान रखेगा कि भारत ने विपक्ष के दबाव के बावजूद उस पर संसद में वैसी बहस तो नहीं होने दी जैसी विपक्ष चाहता था। विपक्ष का एक तबका चाहता था कि बहस हो एवं इजरायल के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित हो। यह निस्संदेह, विदेश नीति के लिए गलत संदेश वाला होता। इजरायल हमारे लिए कई मामलांे में सहयोग और सहायक है। आतंकवाद के मामले पर हमें उसके सहयोग की लगातार आवश्यकता है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा के सभापति को चिट्ठी लिखकर कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि किसी मित्र देश को लेकर किसी तरह की अशोभनीय या विवादित टिप्पणी की जाए। सुषमा का कहना था कि हमारे दोनों देशों (इजराइल और फलस्तीन) के साथ राजनयिक संबंध हैं। किसी भी मित्र देश के खिलाफ टिप्पणी उस देश के साथ हमारे रिश्ते पर बुरा असर डालेगा।
यह सही सोच थी। काश, यही सोच मानवाधिकार परिषद में भी प्रतिबिम्बित होती। भारत की परंपरागत समस्या यही है कि एक बार तो वह लगता है जैसे किसी मुद्दे पर बिल्कुल एक परिपक्व और सबल देश की तरह तनकर खड़ा होता है लेकिन अगले ही पल वह ऐसी गं्रथि का शिकार हो जाता है जिससे उसकी पूर्व की भंगिमा कमजोर पड़ जाती है। ऐसा ही गाजा मामले में भी हुआ है। संसद में निंदा प्रस्ताव पारित न होने देने का मुखर रुख और प्रस्ताव के पक्ष में मत के बीच शत-प्रतिशत समानता तलाशी मुश्किल है।
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