बसंत कुमार
पिछले दिनों एक क्रिमिनल केस में 85 वर्ष के एक वृद्ध को जेल भेजने का मामला आया, यद्यपि भारत की न्याय व्यवस्था में 20 से 40वर्ष तक आपराधिक मामले चलते है औरआरोपी जब मरने की कगार पर पहुंच गए लोगों को जेल भेजने की घटना नई नहीं है। फिर भी जब 85 वर्ष का वृद्ध को जो ठीक से चल भी नहीं सकता जिसको अपनी दिनचर्या के लिए एक व्यक्ति की जरूरत पड़ती है उसको हत्या के आरोप के पचासी वर्ष की आयु में जेल भेजना कुछ समझ में नहीं आता। बता दे की इस मामले में फैसला लगभग 40 वर्ष के बाद आया था।इसी तरह 1972 में देश के तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में फैसला लगभग 50 वर्ष बाद आया और तब तक अधिकांश आरोपियों की मृत्यु हो चुकी थी।ऐसे में 70 वर्ष से अधिक आयु लोगों को जेल में रखने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला आया है जो स्वागत योग्य है क्योंकि किसी अपराधी को दंड देने का न्यायिक सिद्धांत यह है कि इनको सुधारने का मौका दिया जाए पर जिस व्यक्ति को 40 वर्ष के ट्रायल के बाद 85 और 90 वर्ष की आय में जेल भेजा जाएतो इससे अपराधी को सुधरने के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की जहां न्याय के दृष्टिकोण से अनुचित है वहीं मानवाधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों सभी राज्यों को और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार औरअशक्त कैदियों को समय से पहले रिहाई के लिए 3 महीने के भीतर स्पष्ट नीति तैयार कर उसे नोटिफाई करें। कोर्ट ने ऐसी ही प्रक्रिया को पारदर्शी और समय बद्ध बनाने के लिए तकनीक आधारित डिजिटल व्यवस्था लागू करने का भी निर्देश दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।याचिका में देश भर में 70 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग गंभीर रूप से बीमार, अशक्त और असहाय कैदियों की मानवीय आधार पर समय से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार है-
- सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को बुजुर्ग और लाइलाज बीमारियों से पीड़ित और अक्षम कैदियों की रिहाई के लिए पारदर्शी और स्पष्ट नियम बनाने होंगे।
- इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए ex -prison pirtal का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है ताकि समय पर निर्णय हो सके।
- बीमारी के मामले में जांच के लिए मेडिकल बोर्ड बनाए जाएंगे।
- इस आदेश का पालन कैसे किया जाय इसकी रिपोर्ट State legal Service Authority के माध्यम से 6महीने में सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी होगी।
इन आदेशों से यह साफ हो जाता है कि कोर्ट को अपराधी को सजा देते समय अपराध की प्रवृत्ति दोषी का पिछला रिकॉर्ड और उसके आयु को ध्यान में रखना चाहिए। पर अभी तक इन तथ्यों का विचार किए बगैर कोर्ट स्टीरियोटाइप ढंग से दोषी पाए जाने वाले लोगों को जेल में डाल देती रहे और इस प्रकार से प्रथम बार अपराध करने वाले कैदी भी जेल की चारदीवारी में रहकर आदतन अपराधियों के सानिध्य में रहकर जब जेल से बाहर निकलते हैं तो वह शातिर अपराधी बन जाते हैं ।अभी हाल में₹40 की रिश्वत लेने वाले 80 वर्षी बुजुर्ग को उच्च न्यायालय द्वारा जेल में भेज दिया गया है जबकि इस अपराधी ने ट्रायल और अपील में मिलाकर कुल 40 वर्ष इस केस में निकाल दिए हैं। इस समय देश में जेल में उनके कैपेसिटी से अधिक कैदियों की संख्या होने के बावजूद न्यायालय द्वारा बीमार बुजुर्गों को जेल भेजा जा रहा है।
पहली बार अपराध में करने वाले और बीमार लोगों के लिए भारत सरकार की ओर से अपराधी परीविक्षा अधिनियम 1958 (प्रोविजन आफ ऑफेंडर्स एक्ट 1958 )लाया गया जो एक कल्याणकारी और सुधारात्मक कानून है इसका मुख्य उद्देश्य पहले या छोटे-मोटे अपराध के दोषियों को जेल भेजने के बजाय उन्हें परी विक्षा अधिकारी की निगरानी में रखकर सुधरने और समाज में पुनर्निवास का अवसर प्रदान करता है इसके प्रमुख बिंदु और प्रावधान यह है-
- चेतावनी देकर छोड़ देना (धारा 4) -यदि व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 379 (चोरी) 380, 381, 404 या 420 के अंतर्गत हो और उसे किसी अन्य अपराध में पहले दोषी नहीं ठहराया गया हो तो फिर उसकी चरित्र अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उसे चेतानी देकर छोड़ दिया जाता है।
- अच्छे आचरण पर रिहा करना (धारा 4)-यह इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा है यदि किसी व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जिसमें सजाये मौत या आजीवन कारावास का प्रावधान नहीं है तो न्यायालय उसे जेल भेजने के बजाय अच्छे आचरण की परीक्षा वधि पर रिहा कर सकता है।
- दोस्त सिद्धि का कलंक मिटाना (धारा 12)-इस अधिनियम के तहत लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भविष्य में नौकरियां अन्य जगहों पर किसी प्रकार की अयोग्यता का सामना न करना पड़े, इससे व्यक्ति के जीवन पर अपराध के कलंक से मुक्ति मिल जाती है।
प्रोबेशन एक्ट के कल्याण कारी प्रावधानों के बावजूद न्यायालय छोटे मोटे अपराधों में सजा पाए अभियुक्तो को इस प्राविधान का लाभ देने से कतराती है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार कर लिया है कि रिहाई शब्द से आपराधिक परिवीक्षा अधिनियम 1958 के अंतर्गत जुर्माने के भुगतान से भी मुक्ति शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार अधिनियम का उद्देश्य अपराधियों को पुनर्वासित करके उन्हें सुधरे हुए नागरिक बनाना है और यह सिद्धांत पर आधारित है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के कारण अपराधी बनता है , यही ध्यान देने की आवश्यकता है कि 1958, का अधिनियम एक लाभकारी कानून है इसलिए विधायी आशय को ध्यान में रखते हुए इन प्रावधानों का उपयोग व्यापक रूप में होना चाहिए। देश में जेलों में बंद इतने अच्छे और गुणी लोग हैं जिन्हें दोष सिद्धि और कारावास के कलंक से मुक्त होकर समाज में पुनर्वासित होने का अवसर अवश्य देना चाहिए।
दुर्भाग्य से निचली अदालत के दुर्भाग्य पूर्ण फैसले को ही अंतिम फैसला मानकर एक दोषी ठहराए व्यक्ति को अपने आप को निर्दोष साबित करने का मौका नहीं मिलता क्योंकि ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई में 20वर्ष से अधिक लग जाते हैं ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का नया आदेश ऐसे लोगो के लिय राहत ले आयेगा।

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