मंगलवार, 30 जून 2026

अनाथ बच्चों को मिले मनन जैसी मां

विवेक शुक्ला

भारत के शहरों में हजारों अनाथ बच्चे माता-पिता के बिना सड़कों पर भटकते नजर आते हैं। शोषण, भुखमरी और निराशा उनके साथी बन जाते हैं। भारत में अनाथ बच्चों की संख्या विश्व में सबसे अधिक बताई जाती है। माता-पिता की मृत्यु, परित्याग या पारिवारिक विघटन के कारण ये बच्चे असुरक्षित हो जाते हैं। जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट 2015 और मिशन वात्सल्य  जैसी योजनाएं इन बच्चों के संरक्षण, देखभाल, शिक्षा और पुनर्वास के लिए संस्थागत व गैर-संस्थागत व्यवस्था प्रदान करती हैं। दत्तक ग्रहण नियम 2017 और फोस्टर केयर गाइडलाइंस परिवार-आधारित देखभाल को बढ़ावा देते हैं। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं-अपर्याप्त फंडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी, संस्थागत देखभाल में भावनात्मक उपेक्षा और पुनर्वास के बाद ट्रैकिंग की कमी। कोविड-19 महामारी ने स्थिति और बिगाड़ी, जिसके लिए पीएम केयर्स  फंड से सहायता दी गई।

अन्य देशों की तुलना में भारत अभी संस्थागत देखभाल पर निर्भर है, जबकि विकसित राष्ट्र परिवार-आधारित मॉडल को प्राथमिकता देते हैं। अमेरिका में फोस्टर केयर सिस्टम प्रमुख है, जिसमें रिश्तेदार देखभाल और छोटे ग्रुप होम्स शामिल हैं। बड़े अनाथालयों को कम किया गया है क्योंकि परिवार-आधारित वातावरण बच्चों के विकास के लिए बेहतर साबित होता है। नॉर्डिक देशों (स्वीडन, नॉर्वे) में मजबूत सामाजिक कल्याण प्रणाली के तहत फोस्टर फैमिली और प्रोफेशनल सपोर्ट उपलब्ध है, जिससे पुनर्वास दर उच्च है।

जयपुर की मनन चतुर्वेदी ने अपनी पूरी जिंदगी इन निराश्रित बच्चों को समर्पित कर दी है। वे इन बच्चों की मां बनकर उन्हें न सिर्फ छत, बल्कि ममता, शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य दे रही हैं। उनकी 'सुरमन संस्थान' आज 127 बच्चों का एक स्नेहपूर्ण परिवार बन चुका है।

दरअसल एक सुबह मनन चतुर्वेदी अपनी कार के पास गईं तो टायर के पास एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था। उन्होंने उसे उठाया, छाती से लगाया और उसी क्षण अपना बच्चा मान लिया। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। 1998  में उन्होंने  सुरमन संस्थान की नींव रखी। 'सुरमन' का अर्थ गहरा है- समता, उम्मीद, राह, मन और आह्वान। शुरू में छोटा आश्रय केंद्र आज पूरे परिवार का रूप ले चुका है। यहां अनाथ, परित्यक्त, नशीले पदार्थों के शिकार, यौन शोषण से बचाए गए और समाज द्वारा ठुकराए गए बच्चे रहते हैं। बच्चे उन्हें 'मां' या 'दीदी' कहकर पुकारते हैं। अब तक उन्होंने 750 से अधिक बच्चों को विभिन्न परिवारों में स्थापित किया है।

मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली मनन का जीवन आरामदायक हो सकता था, लेकिन उन्नीस साल की उम्र में एक मौत से जूझ रही अनाथ बच्ची की पीड़ा ने सब बदल दिया। आरंभिक दिनों में धन की कमी, गहने बेचने और किराए के मकान से निकाले जाने जैसी चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी। आज उनके कई बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और आत्मनिर्भर नागरिक बन चुके हैं। शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

सरकार और समाज की जिम्मेदारियाँ --- भारत में लाखों अनाथ और परित्यक्त बच्चे सड़कों पर भटकते, शोषण के शिकार होते और सपनों से वंचित रह जाते हैं। मनन चतुर्वेदी जैसी समर्पित आत्माएं इन बच्चों को ममता, शिक्षा और भविष्य दे रही हैं, लेकिन इस बाबत सैकड़ों सोशल वर्कर चाहे। इन बच्चों की सुरक्षा, पालन-पोषण और विकास सरकार व समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

सरकार को बाल अधिकार संरक्षण कानूनों का सख्ती से क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, शिक्षा का अधिकार और बाल श्रम निषेध कानूनों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। अनाथ आश्रमों के लिए पर्याप्त बजट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और कौशल विकास कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएं। बाल तस्करी, यौन शोषण और सड़क पर रहने वाले बच्चों की गणना व पुनर्वास की प्रक्रिया तेज की जानी चाहिए। गोद लेने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और तेज बनाना भी जरूरी है।

समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नागरिकों को दान, स्वयंसेवा और जागरूकता के माध्यम से इन बच्चों के साथ खड़े होना चाहिए। कॉर्पोरेट्स को सीएसआर  फंड्स को ऐसे संस्थानों में लगाना चाहिए। पड़ोस, समुदाय और मीडिया को इन बच्चों को अपनाने, उनकी शिक्षा में मदद करने और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का संकल्प लेना होगा।

भारत के पड़ोसी चीन में राज्य-चालित अनाथालय प्रमुख हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक देखभाल आम है। जापान और दक्षिण कोरिया अभी भी अनाथालयों पर भरोसा करते हैं, हालांकि फोस्टर केयर बढ़ रहा है। ये देश शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर जोर देकर बच्चों को आत्मनिर्भर बनाते हैं।

भारत को सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से सीखकर फोस्टर केयर, किंशिप केयर और समुदाय-आधारित पुनर्वास को मजबूत करना चाहिए। शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक सहायता से इन बच्चों को मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है। समाज और सरकार की संयुक्त जिम्मेदारी से ही ये बच्चे सशक्त नागरिक बन सकेंगे।

'सुरमन संस्थान' इस बात का प्रमाण है कि एक संस्था और एक व्यक्ति कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। लेकिन जब सरकार नीतिगत समर्थन और समाज भावनात्मक व आर्थिक सहयोग देगा, तभी हम एक ऐसा भारत बना पाएंगे जहाँ कोई बच्चा निराश्रित न रहे।

मनन चतुर्वेदी सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक समर्पित चित्रकार भी हैं। उन्होंने वस्त्र डिजाइन का करियर छोड़कर बच्चों की पीड़ा और उम्मीद को कैनवास पर उतारा। उनका कहना है, “मैं कपड़ों को रंगने की बजाय बच्चों की आंखों में रंग भरना चाहती हूं।उन्होंने  72 घंटे की लगातार चित्रकारी का विश्व रिकॉर्ड बनाया। अब वो 30 जून और 1 जुलाई को दिल्ली के कनॉट प्लेस पर 24 घंटे का चित्रकारी आयोजन कर रही हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी उनसे मिलने पहुंचीं। उनकी कूची से बने चित्र बेचकर सारी आय बच्चों की शिक्षा, भोजन और स्वास्थ्य पर खर्च होगी।

आज बाल अधिकारों की चर्चा में मनन चतुर्वेदी जैसे लोग याद दिलाते हैं कि शब्दों से आगे बढ़कर काम करना ही असली सेवा है। भारत को प्रगति की राह पर बढ़ने के लिए ऐसे हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं की जरूरत है। सरकार और समाज यदि आर्थिक, नीतिगत और भावनात्मक सहयोग दें तो हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहां कोई बच्चा निराश्रित न रहे। मनन की यात्रा साबित करती है कि करुणा और समर्पण से असंभव भी संभव हो जाता है।

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