गुरुवार, 5 मार्च 2026

न्यायालय, पुलिस और जन प्रतिनिधियों (नेताओं) के प्रति भ्रष्ट होने का पूर्वाग्रह पालना अनुचित

बसंत कुमार

इधर कुछ दिनों से एन सी ई आर टी की कक्षा 8कीसमाज शास्त्र की पुस्तक के न्यायपालिका के भ्रष्टाचार नामक शीर्षक से एक चैप्टर प्रकाश जिसमे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार और न्यायलयों में दशकों से लंबित मामलों की जानकारी दी गई। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले का संज्ञान लेते हुए इस चैप्टर को बैन करने का आदेश दिया और इस प्रकार के चैप्टर के पुस्तक में शामिल होने पर नाराजगी यद्यपि एनसीईआरटी ने इस विषय में माफी मांग ली है, पर प्रश्न यह उठता है कि एन सी ई आर टी जैसी संस्था जो देश में शिक्षा और अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयो पर निर्णय लेती है और इसके लिए इस संस्थान में बड़े विद्वान लोगों की टीम रहती है वहां इस प्रकार की लापरवाही कैसे हुई और पाठयक्रम में एक ऐसा पथ जोड़ दिया गया जो देश की आने वाले युवा पीढ़ी के मन में देश की न्यायपालिका व न्यायालयों के विषय में किसी तरह का भ्रम पैदा करे।

यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका अपने उच्च आदर्शो को बनाए रखने में नाकाम रही है, जस्टिस वर्मा जिनके सरकारी आवास पर से अनगिनत नोटों के बंडल पाए गए और कुछ अन्य जजों के कृत्य के कारण न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है, कुछ वर्ष पूर्व तमिलनाडु उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज जस्टिस कर्णनन मैं पत्र लिख कर उच्च न्यायपालिका में कार्यरत कई जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए थे।

एक बार संसद में न्यायमूर्ति जस्टिस मुखर्जी पर भ्रष्टाचार केआरोप पर महाभियोग लाया गया पर संसद के उत्तर भारत व दक्षिण भारत की लाबी में बट जाने के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। कुछ माह पूर्व एक सिरफिरे वकील ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बी आर गवई के ऊपर भरी अदालत में जूता फेंकने का साहस किया। यह घटना है उस उच्च न्यायपालिका का अपमान है जहां देश का नागरिक पीड़ित होने पर सामने वाले को बड़े गर्व से कह देता है आई विल सी यू इन द कोर्ट उसका यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि देश की न्यायपालिका जाति धर्म लिंग भेद से परे रहकर ईमानदारी से काम करती है पर पाठ्य पुस्तक में इस तरह के चैप्टर का छपना सचमुच दुर्भाग्य पूर्ण है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए जस्टिस सुरेश कैत खुले आम यह आरोप लगाया कि देश की न्यायालय में वंचित यानी दलित समाज के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता जबकि जस्टिस सुरेश कैत दिल्ली उच्च न्यायालय के साथ अन्य न्यायालयों में सम्मानित न्यायाधीश रहे है पर हैरानी की बात यह है कि सेवा में रहते हुए उन्होंने कभी भी न्यायपालिका में दलितों व वंचितों के साथ अन्याय होने की बात नहीं उठाई, लेकिन जस्टिस सुरेश कैत ये बात सेवा में रहते हुए यह बात उठा देते तो सम्भव; इस विषय में कुछ हो सकता था, फिर भी आज भी इन सारे विवादों के प्रकाश में आने के बावजूद देश के नागरिकों में न्यायपालिका के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास है।

एनसीईआरटी की पुस्तक के विवादित पाठ में न्यायालय में दशकों से लंबित मुकदमों का भी वर्णन किया गया है जिनकी संख्या लाखों में हो गई है इन बातों को समय-समय पर समाचार पत्र सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों द्वारा उठाया जाता रहा है पर न्यायालय में इतनी संख्या में लंबित मुकदमों के लिए सिर्फ कोर्ट को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों द्वारा मामलों को लंबा लटकाना पुलिस द्वारा दोषपूर्ण तफ्तीश और सरकार द्वारा न्यायालय में खाली पदों को न भरना भी एक कारण है। हमारी पुलिस कानून व्यवस्था और शिकायतों को निपटाने में सफल नहीं रही है जहां कोर्ट केसेस में वकील डेट लेकर मामले को लटकाते है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियांभी पीछे नहीं है चार्ज शीट समय पर फाइल न करना या प्रॉसिक्यूशन का समय पर उपस्थित न होना बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कारण है। इसकाअन्य कारण पुलिस विभाग में स्टाफ की संख्या में भारी कमी है।

जो भी पुलिस बल हमारे पास उपलब्ध है वह कानून व्यवस्था और मुकदमों को निपटने के बजाय, भारी संख्या में वीआईपी सुरक्षा में तैनात रहती है क्योंकि सुरक्षा रखना अब नेताओं और बाहुबलियों के लिए आवश्यकता नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गया है, मैंने स्वयंअनुभव किया है कि कुछ ऐसे नेता हैं जो उम्र 80 या 90 के पड़ाव में पहुंच चुके हैंऔर जिन्हें यमराज के अलावा किसी और से कोई डर नहीं है पर वह भी वाई प्लस और जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा रखते हैं सरकार को चाहिए कि अब नेताओं और बाहुबलियों को दी जाने वाली सुरक्षा का रिव्यू करें और अनावश्यक सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटा कर पुलिस कर्मियों को कानून व्यवस्था अपराध रोकने और प्रॉसिक्यूशन जैसे कामों में लगाया जाए। जिससे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या में कमी लाई जा सके।

चाहे चाहे फिल्म उद्योग हो या मीडिया का अन्य साधन हो न्यायपालिका के साथ-साथ पुलिस और जनप्रतिनिधियों को सदैव भ्रष्टाचार में लिप्त ही दिखाई जाता है परंतु कभी भी इस तरह की फिल्मों या साहित्य पर रोक नहीं लगाई जाती, सेंसर बोर्ड इन फ़िल्मों को कैसे पास कर देता है यह समझ से परे है। जहां तक पुलिस का सवाल है कोई भी सभ्य आदमी यह नहीं चाहता की कोई वर्दी धारी पुलिस वाला उनके घर आए, मेरे एक दोस्त जो पुलिस अधिकारी है वे मेरी एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में मेरे पास आना चाहते थे, परंतु वे पहलेऑफिस से अपने घर गए और यूनिफार्म बदल करमेरे पास आएऔर पूछने पर कहने लगे कि आजकल हमारी इमेज इतनी खराब हो गई है की कोई भी शरीफ आदमी यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाली पुलिस वाला वर्दी पहनकर उनके घर आए। यह ठीक है कि जीवन के हर पक्ष से भ्रष्टाचार से मुक्ति होनी चाहिए परंतु किसी पक्ष विशेष चाहे वह पुलिस हो चाहे न्यायालय हो चाहे हमारे जनप्रतिनिधि हो उनकी इमेज को भ्रष्ट या अनैतिक दिखाना समाज के लिए ठीक नहीं है। जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार में या अनाचार में लिप्त पाया जाए उसे पर तुरंत से तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए परंतु एक व्यक्ति के कारण उसे पूरे समाज को भ्रष्टाचार या अनाचार में लिप्त नहीं माना जाना चाहिए, इस तरह कीबनाई गई इमेज पूरे समाजको बर्बाद कर देती है इस कारण जो एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट कह कर 12-14 साल के उम्र के बच्चों के दिमाग में यह बिठा देना कि देश की न्यायपालिका भ्रष्ट है बिल्कुल ही अनुचित है।

एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायालय के भ्रष्ट होने का जो पाठ छप गया था यदि वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कीछवि खराब करने के लिए किया गया है तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैक्यूंकि भारत की न्यायपालिका विश्व की गिनी चुनी न्यायपालिकाओं में से एक है जिसके विषय में यह माना जाता है कि राजनीति या अन्य शक्तियों से प्रभावित नहीं होती पर यह भी आवश्यक है कि न्यायालय को भ्रष्ट और सुस्त वाली छवि से उबारने के लिए स्टीरियोटाइप वर्किंग से मुक्ति पानी होगी न्यायालय को यह देखना होगा की वही लोग जेल में डाले जाएं जिनको जेल में डालना आवश्यक हो और न्यायालय में न्याय के आशा में आए लोगों को तारीख पर तारीख नहीं मिलनी चाहिए इससे लोगों में न्यायपालिका के प्रति आस्था में वृद्धि होगी और दशकों को सेलंबित मुकदमों संख्या में कमी आएगी।

कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म क्रांतिवीर आई थी जिसमें नेता, पुलिस, जज, भूमाफिया सभी को भ्रष्टाचार में लिप्त व गरीबों का अमानवीय शोषण करने वाला दिखाया गया था निश्चय ही जनमानस के बीच सभी की नकारात्मक छवि अनुचित है और हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों की छवि को धूमिल होने से बचाया जाए।

यह निर्विवाद सत्य है कि भ्रष्टाचार में लिप्त में कुछ लोगों के आ जाने से देश की न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है और 30 -40 साल तक न्याय न्याय के लिए भटकते लोगों। को न्याय न मिलने के कारण न्यायपालिका की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी लोग न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायालय का ही दरवाजा खटखटाना में विश्वास करते हैं और ऐसे में न्यायपालिका के बारे में जूनियर कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में भ्रामक बातें लिखना और स्कूल जाने वाले बच्चों के मन में न्यायपालिका व अन्य संस्थाओं के बारे में भ्रम पैदा करना अत्यंत गंभीर है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

सोमवार, 2 मार्च 2026

ईरान पर अमरीकी हमलों पर OIC की चुप्पी तो देखो

विवेक शुक्ला
मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर रमजान की रौनक अपने चरम पर थी। मीनारा मस्जिद के आसपास की गलियों में खरीददारों की भीड़ उमड़ रही थी। इसी हलचल के बीच एक होटल में बैठे कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार और कारोबारी गहरी चिंता के साथ मुस्लिम देशों के संगठन, Organisation of Islamic Cooperation (ओआईसी), की निष्क्रियता पर चर्चा कर रहे थे। उनका सवाल सीधा था—अमरीका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद भी ओआईसी की आवाज़ इतनी धीमी क्यों है?
57 मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला यह संगठन अक्सर फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर मुखर रहता है, प्रस्ताव पारित करता है और कड़े बयान जारी करता है। लेकिन जब मामला ईरान जैसा प्रभावशाली और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में अहम देश हो, तब उसकी प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत नरम क्यों दिखाई देती है? यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक जटिलताओं से जुड़ा है।
अमरीका और ईरान के बीच तनाव कोई नया अध्याय नहीं है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंधों में अविश्वास और टकराव बना हुआ है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उस पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ती भूमिका ने इस तनाव को और गहरा किया है। जब भी हालात बिगड़ते हैं, पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिक जाती हैं। ऐसे समय में उम्मीद की जाती है कि इस्लामिक देश एकजुट होकर शांति, संवाद और न्याय की वकालत करेंगे। पर व्यवहार में तस्वीर अधिक जटिल दिखती है।
ओआईसी का गठन मुस्लिम देशों के बीच सहयोग, एकता और साझा हितों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। सिद्धांततः यदि किसी सदस्य देश पर संकट आए तो बाकी देश उसका समर्थन करें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी आवाज़ बनें। लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह संगठन अक्सर औपचारिक बयानों तक सीमित रह जाता है। ईरान के मामले में भी कई देशों ने सावधानी भरे वक्तव्य दिए, कुछ ने चुप्पी साध ली, और कुछ ने अप्रत्यक्ष रूप से अमरीकी रुख के प्रति सहमति जताई।
इस विभाजन के पीछे सबसे बड़ी वजह मुस्लिम दुनिया के भीतर मौजूद वैचारिक और रणनीतिक मतभेद हैं। पश्चिम एशिया में ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रभाव की प्रतिस्पर्धा रही है। एक ओर शिया नेतृत्व वाला ईरान है, तो दूसरी ओर सुन्नी बहुल खाड़ी देश। यह प्रतिस्पर्धा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व, सुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव से भी जुड़ी है। परिणामस्वरूप, किसी भी सामूहिक मंच पर सर्वसम्मति बनाना कठिन हो जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण कई मुस्लिम देशों के अमरीका के साथ गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना काफी हद तक अमरीकी सैन्य सहयोग पर आधारित है। ऊर्जा व्यापार, हथियार सौदे और निवेश संबंध भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वे खुलकर अमरीका की आलोचना करने से बचते हैं। उनकी प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों और आंतरिक स्थिरता की रक्षा करना होती है। इस यथार्थवादी दृष्टिकोण के कारण वे ईरान के समर्थन में आक्रामक रुख अपनाने से हिचकते हैं।
इसके अलावा, कुछ अरब देशों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव के लिए ईरान की नीतियाँ भी जिम्मेदार रही हैं। यमन, सीरिया और इराक में उसकी सक्रियता को लेकर कई देशों में असंतोष है। इसलिए वे इस टकराव को केवल “मुस्लिम देश बनाम अमरीका” के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में आंकते हैं। यही सोच ओआईसी के भीतर साझा बयानबाज़ी को सीमित कर देती है।
ओआईसी की कार्यप्रणाली भी एक बाधा है। संगठन अक्सर सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाता है। जब सदस्य देशों के हित, गठबंधन और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हों, तब कठोर और स्पष्ट निर्णय लेना कठिन हो जाता है। कई बार तीखे शब्दों वाले प्रस्ताव पारित तो हो जाते हैं, लेकिन उनके अनुपालन या ठोस कूटनीतिक कदमों का अभाव रहता है। इससे संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
दूसरी ओर, आम मुस्लिम समाज की अपेक्षाएँ अलग हैं। वे चाहते हैं कि इस्लामिक देश अन्याय या बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ एकजुट स्वर में बोलें। सोशल मीडिया पर भी यह भावना दिखाई देती है कि कम से कम कूटनीतिक स्तर पर मजबूत और स्पष्ट रुख अपनाया जाना चाहिए था। लेकिन सरकारें भावनात्मक आवेगों की बजाय रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा गणनाओं के आधार पर निर्णय लेती हैं।
इस स्थिति का व्यापक प्रभाव भी है। यदि 57 देश सचमुच एक मंच पर संगठित होकर बोलें, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव काफी बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर वे एक मजबूत दबाव समूह बन सकते हैं। पर आपसी अविश्वास और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण यह संभावना अक्सर साकार नहीं हो पाती।
यह भी सच है कि केवल धार्मिक या भावनात्मक एकता से जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान नहीं होता। मुस्लिम देशों के बीच आर्थिक असमानताएँ, शासन प्रणालियों में अंतर, सुरक्षा चुनौतियाँ और बाहरी शक्तियों के साथ अलग-अलग रिश्ते हैं। जब तक इन अंतर्विरोधों को स्वीकार कर संवाद और सहयोग की दिशा में ठोस प्रयास नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े संकट पर एकजुट प्रतिक्रिया की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने एक बार फिर इस्लामिक दुनिया की आंतरिक सीमाओं को उजागर किया है। Organisation of Islamic Cooperation के सामने चुनौती यही है कि वह केवल औपचारिक वक्तव्यों तक सीमित न रहे, बल्कि सदस्य देशों के बीच भरोसा, पारदर्शिता और साझा रणनीति विकसित करे। यदि इस्लामिक देश वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेद कम कर व्यापक सामूहिक हितों को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा हर बड़े संकट में उनकी बंटी हुई प्रतिक्रिया निराशा को ही जन्म देती रहेगी।

जब कश्मीर के मसले पर ईरान भारत के साथ खड़ा था

विवेक शुक्ला
अब जब अमरीका ने ईरान के खिलाफा जंग छेड़ी हुई है और इस मौके पर भारत साफ तौर पर अमरीका के साथ खड़ा नजर आ रहा तब 1994 की एक घटना को याद करना जरूरी है। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजने का फैसला किया — जबकि दिनेश सिंह एम्स में भर्ती थे और स्ट्रोक के बाद बेहद कमजोर हालत में थे। सवाल उठता है, आखिर इतनी क्या मजबूरी थी कि बीमार मंत्री को अस्पताल से सीधा ईरान भेजा गया?
मामला क्या था? - मार्च 1994 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी। पाकिस्तान, इस्लामी देशों के संगठन OIC के कई देशों के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाना चाहता था। अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता, तो मामला आगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक जा सकता था — जो भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक मुश्किल बन सकता था।
ईरान क्यों अहम था? विदेश मामलों के जानकार और हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में कूटनीति पर लिखते रहे अरुण कुमार उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि OIC में आमतौर पर फैसले सहमति (कंसेंसस) से होते हैं। अगर कोई बड़ा देश जैसे ईरान साथ न दे, तो सहमति टूट जाती है और प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाता।
यहीं पर ईरान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई। भारत चाहता था कि ईरान इस प्रस्ताव का समर्थन न करे।

बीमार दिनेश सिंह को ही क्यों भेजा गया? - दिनेश सिंह उस समय स्ट्रोक से उबर रहे थे और दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा था। फिर भी राव ने उन्हें ही भेजने का फैसला किया, क्योंकि वे खुद विदेश मंत्री थे, उनका कद और साख ज्यादा थी। ईरान को यह दिखाना जरूरी था कि भारत इस मुद्दे को कितना गंभीर मान रहा है। अगर कोई जूनियर मंत्री जाता, तो उतना असर शायद नहीं होता। एक बीमार, व्हीलचेयर पर आए वरिष्ठ मंत्री का जाना अपने आप में एक मजबूत संदेश था। 

ईरान में क्या हुआ? - दिनेश सिंह का काम था प्रधानमंत्री राव का निजी संदेश ईरान के राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफ़संजानी तक पहुँचाना। उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर वेलायती से भी सीधे बात की। बताया जाता है कि ईरानी नेतृत्व उनके स्वास्थ्य की हालत देखकर हैरान रह गया — और इससे भारत की गंभीरता का अंदाज़ा उन्हें साफ हो गया। मिशन कुछ घंटों का ही था। दिनेश सिंह सीधे वापस भारत लौटे और फिर अस्पताल चले गए।

नतीजा क्या निकला? - आखिरकार ईरान ने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। OIC में सहमति नहीं बन पाई और पाकिस्तान की कोशिश कमजोर पड़ गई। जिनेवा में भारत एक बड़ी कूटनीतिक हार से बच गया। इस तरह, राव का यह फैसला — भले ही जोखिम भरा था — लेकिन उस समय की परिस्थितियों में बेहद अहम और सफल साबित हुआ।

सीधी भाषा में कहें तो, राव ने दिनेश सिंह को इसलिए भेजा क्योंकि दांव बहुत बड़ा था। भारत को हर हाल में उस प्रस्ताव को रुकवाना था, और इसके लिए सबसे मजबूत संदेश भेजना जरूरी था — चाहे उसके लिए बीमार विदेश मंत्री को ही क्यों न जाना पड़े। जाने माने आई सर्जन डॉक्टर राजवर्धन आजाद बताते हैं कि वे तब एम्स में ही थे जब दिनेश सिंह अस्पताल से एक खास मिशन के चलते ईरान गए थे। उन्हें इस मामले की जानकारी दिनेश सिंह के फिर अस्पताल में लौटने पर मिली थी।

रविवार, 1 मार्च 2026

भारत-चीन सीमा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी चर्चा होनी चाहिए

कर्नल शिवदान सिंह

लोकसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेना के भूतपूर्व अध्यक्ष जन नरवाने की प्रकाशित नहीं हुई पुस्तक को सदन में लहराते हुए मौजूदा सरकार को निर्णय लेने में अक्षम बताने की कोशिश की है। 2020 में गलवान संघर्ष के समय लद्दाख के कैलाश क्षेत्र में कुछ चीनी टैंकोकी हरकत देखी गई जिसके बारे में सेना प्रमुख ने सरकार से इनके विरुद्ध कार्रवाई के बारे में जानने की कोशिश की जिसके उत्तर में जैसा कि पिछले लंबे समय से सरकार ने सेना को देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने की पुरी छूट दी हुई है उसी प्रकार सरकार ने सेना प्रमुख को बताया कि जो उन्हें जो उचित लगे वह कार्रवाई कर सकते हैं। इसके लिए सेना ने कोई अतिरिक्त संसाधन या गोला बारूद की मांग सरकार से नहीं की थी तो इससे साफ हो जाता है कि इसमें विवाद या सरकार की निष्क्रियता कहीं भी नजर नहीं आ रही है। इसी प्रकार कुछ राजनीतिक दल सेना और सरकार की कामयाबी को कम दिखाने के प्रयास में ऑपरेशन सिंदूर और 2016 में जम्मू कश्मीर के ऊरि क्षेत्र में पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकी कैंपों पर भारतीय सेना के द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइकका भी प्रूफ मांग रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की सबसे बड़ी कामयाबी थी कि हमारी सेना ने सफलता पूर्वक पाकिस्तान में लश्करे तैयबा के 11 कैंप और वहां के पांच हवाई अड्डओ पर हमला करके उनको बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही पाकिस्तान इसके जवाब में हमारे देश का बाल बांका भी नहीं कर सका। उसके ड्रोनों और मिसाइलो को हमारा अभेद एयर डिफेंस सिस्टम सीमा में घुसने से पहले ही बर्बाद कर देता था। इसलिए दुनिया की प्रेस किसी भी भारत के नुकसान का फोटो विश्व पटल पर नहीं रख सकी। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सफलता को देखते हुए विश्व के 135 देशों ने भारत के ऑपरेशन की सराहना की थी। इस सब के बावजूद भी हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल सेना की इन सफलताओं को भी स्वीकार नहीं करके सेना के मनोबल को गिराने का प्रयास करते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नकारात्मक है।

लद्दाख क्षेत्र और चीन के बारे में प्रश्न करने वालों को इस विषय पर भी विचार करना चाहिए की 1962 के युद्ध में भारत की हार और उसके 38000 वर्ग किलोमीटर सियाचिन क्षेत्र को चीनी सेना ने किन कारणों से कब्जे में कर लिया था। 1950 के दशक में चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत अपने पड़ोसी देशों की भूमियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसी के अंतर्गत चीन ने 1955 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया तथा उसके साथ-साथ सीमावर्ती भूटान नेपाल और भारत के क्षेत्र की तरफ भी अपनी सैनिक गतिविधि बढ़ाने शुरू कर दी थी। चीन के इस कब्जे को विश्व पटल पर उचित तथा न्याय संगत ठहरने के लिए भारत ने चीन के तिब्बत पर कब्जे को उचित ठहराते हुए उसे मान्यता प्रदान कर दी और तिब्बत को चीन के भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद चीन ने तिब्बत के दक्षिणी क्षेत्र से सियाचिन होकर एक सड़क बननी शुरू कर दी जिससे उसकी गतिविधियां भारतीय सीमा तक बढ़ गई। 1958 तक चीन काफी आक्रामक मूड में भारतीय सीमा की तरफ क् बढ़ने लगा। इसको देखते हुए तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने चीन की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेमन को पेश करते हुए सेना के लिए आधुनिक हथियार और गोला बारूद के लिए धन की मांग की जिससे चीनी सेना का मुकाबला किया जा सके। परंतु उनके इस प्रस्ताव को भारत सरकार ने नहीं माना तथा प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा कि हमने चीन के साथ पंचशील संधि की है जिसके अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हुए एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। जब काफी प्रयासों के बाद भी नेहरू ने अपना निर्णय न बदलते हुए सेना बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की इससे निराश होकर जन. थीमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया जिसको भारत सरकार ने स्वीकार नहीं कियाइसके बाद जन. ने सेना की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद करते हुए सेना के संचालन से दूरी बना ली। इसके बाद बिना किसी कारण के चीनी सेना ने अक्टूबर 1962 में लद्दाख नेफा और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर आधुनिक हथियारों से हमला कर दिया

भारतीय सैनिकों के पास उस समय केवल बोल्ट एक्सन राइफल थी जिससे चीनी सेना की आधुनिक हथियारों का मुकाबला असंभव था। इसके अलावा भारत-चीन सीमा तक भारतीय क्षेत्र में संचार के साधन सड़क इत्यादि बिल्कुल नहीं थे इसके कारण सेना को समय पर सहायता भेजा जाना असंभव था। इसके बावजूद भी भारतीय सेवा ने बहादुरी सेचीनी हमले का मुकाबला किया और इसी हमले में लद्दाख के रेजांगला की सुरक्षा में तैनात में मेजर शैतान सिंह ने अपने 110 सैनिकों के साथ दुश्मन के 1200 सैनिकों का मुकाबला बहादुर से किया। जब उनकी रायफलों की गोलियां समाप्त हो गई और पीछे से कोई मदद की आशा नहीं थी नहीं थी। तब उस स्थिति में शैतान सिंह ने पीछे भागने के स्थान पर दुश्मन का मुकाबला राइफल की संगिनो से करने का निश्चय करके अपने सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया। जिसमें एक-एक भारतीय सैनिक ने चीन के 10–10 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और चीन के इस हमले को नाकाम कर दिया। इस युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उसके सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। उस समय संचार व्यवस्था का इतना बुरा हाल था कि इन सैनिकों के मृत शरीरों की जानकारी पूरे 40 दिन के बाद उस समय प्राप्त हुई जब एक चरवाहा अपनी भेडॉ को चराते हुए उस क्षेत्र में गया और उसने वहां पर इन सैनिकों के शब् और चीनी सैनिकों के शब चारों तरफ बिखरे हुए देखे। इसकी सूचना उसने फौरन सेना को दी तब उनकी वीरता की कहानी देश को पता चली और उनके शरीरों का अंतिम संस्कारकिया जा सका

इसी क्रम में चीन ने 1967 में देश के मुख्य भाग कोउत्तर पूर्वी राज्यों से से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहे जाने क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई जिसके द्वारा वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों पर कब्जा करना चाह रहा था। इसके लिए चीन ने अपनी आक्रामक करवाई सिक्किम की सीमाओं पर शुरू कर दी। इसकी जानकार सिक्किम क्षेत्र के जीओसी मेजर जनरल सगत सिंह ने सेना मुख्यालय तक पहुंचा दी थी। इस पर जन. सागत सिंह को भारत सरकार के निर्देश सेना मुख्यालय के द्वारा प्राप्त हुये कि वे चीन के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे तथा सीमाओं से 1000 मीटर पीछे हटकर मोर्चा संभालेंगे। इस प्रकार 1962 के युद्ध की तरह ही चीन को भारत सरकार पूरा मौका भारत में अंदर प्रवेश करने का दे रही थी परंतु जन. सगत सिंह नेइस आदेश का पालन नहीं किया तथा अपने सैनिकों को और भी मजबूती से नाथुला और उसके आसपास तैनात कर दिया।

जब चीन ने सितंबर 1967 में नाथुला पर हमला किया तो जन. सगत सिंह स्वयं अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पीछे जाकर पोजीशन संभाली और घोषणा करवा दी की जो भी भारतीय सैनिक मोर्चे से पीछे भागेगा उसकी हत्या वे स्वयं वे गोली मारकर करेंगे। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों का मनोबल इतना बढ़ाया कि भारतीय सैनिकों ने चीनी हमले को नाकाम करते हुए उसके सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। इस प्रकार देखा जा सकता है की 1962 की हार और 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में जाने के लिए किसी हद तक केवल भारत सरकार ही जिम्मेदार थी। क्योंकि उसने भारतीय सेना को उचित गोला बारूद उपलब्ध नहीं कराया जिसके कारण भारतीय सेना चीनी सेना का मुकाबला नहीं कर पाई। इसके अतिरिक्त चीन के साथ लगने वाली उत्तर पूर्वी सीमाओं और लद्दाख क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचा जैसे सड़क इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके कारण समय से सेना के लिए उचित सहायता समय से नहीं पहुंच सकी। 

विश्व में चीन की गतिविधियों और उसकी चालों को समझ कर भारत सरकार ने चीन की हर चाल को नाकाम करने के लिए उत्तर पूर्वी तथा लद्दाख सीमा तक संचार व्यवस्था जैसे राजमार्ग तथा हवाई अड्डे बना दिए हैं। यह राजमार्ग इतनी क्षमता के हैं कि उनके द्वारा सेना के लड़ाकू टैंक भी शीघ्रता से सीमा तक पहुंच कर चीनी हमलों को नाकाम करके चीन के अंदर तक मार कर सकते हैंइसके लिए उत्तर पूर्व की सीमाओं के लिए स्ट्राइक कोर का गठन किया गया है जिसमें लड़ाकू टैंक होते हैं। 1962 के युद्ध में लड़ाकू विमान का प्रयोग चीनी हमले के विरुद्ध नहीं किया गया था। जिसका मुख्य कारण था कि उस क्षेत्र में इन विमानो केउतरने और उड़ान भरने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसको देखते हुए अब अकेले लद्दाख क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चार हवाई अड्डे– थोयस, लेह, नियोमा तथा कारगिल में स्थापित कर दिए गए हैं। जिनसे आधुनिक राफेल विमान दुश्मन पर मार कर सकेंगे। इसके साथ ही चीन से लगती सभी सीमाओं पर आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त सैनिक तैनात किए गए हैं। जिससे चीन अपनी संख्या से हमारे सैनिकों को हराने का प्रयास न कर सके। इस सबके साथ अब 1962 और 1967 जैसी स्थिति नहीं है जिसमें जन सगत सिंह को नाथुला की सुरक्षा से पीछे हटने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिए थे। आज की स्थिति में एक सैनिक कमांडर को सीमाओं की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिएभारत सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ती है। आज के समय मेंसैनिक कमांडर सीमा को सुरक्षा के लिए निर्णय लेने में स्वतंत्र है जैसा की जन. नरवाने ने स्वयं कीअपनी पुस्तक में लिखा है। 

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर का महत्व देखते हुए उन्होंने बांग्लादेश में भी इसके समानांतर एक कॉरिडोर निर्माण का वादा किया है। जिसके द्वारा के भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ संपर्क हर स्थिति में बना रहे। यदि 1967 में जन. संगत सिंह केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार कार्रवाई करते तो आज हो सकता है यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर और हमारे उत्तर पूर्व के 7 राज्य भारत का हिस्सा ना होते। इसलिए आज के समय में देश की सीमाओं की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम भारत सरकार ने थल, जल और वायु मेंकर दिया है। इसलिए अब चीन भारत को पहले जैसी धमकियां और आंखें नहीं दिख रहा है बल्कि वह भारत के साथ हर तरह के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटने के लिए तैयार है।

 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

संयुक्त परिवार की व्यवस्था क्या आज भी प्रासंगिक है?

बसंत कुमार

हम दिल्ली के जिस इलाके में रहते हैं उसे दिल्ली का बड़ा समृद्ध इलाका का माना जाता है लेकिन एक चीज जो प्रायः मन को कचोटती रहती है की इन बड़े-बड़े घरों में वृद्ध पति पत्नी अकेले रहते हैं और उनको देखने वाला कोई नहीं रहता क्योंकि इनमें से अधिकांश के बेटे बहु विदेश में रहते हैं या अच्छे अवसर की तलाश में अन्य शहरों में रहते हैं। इन वेदों की खबर लेने वाला कोई नहीं है अगर यह बीमार हो जाए तो पैसा होने के बावजूद भी उनकी देख लेकर देखरेख वाला कोई नहीं रहता। हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि की इन समृद्ध परिवारों के वृद्धो की देख-रेख करने के लिए वृद्ध आश्रम की एक विकल्प बचता है, ये भरे पूरे परिवार के होने के बावजूद अनाथालयों में या वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। खाने को भारत पूरा परिवार है बेटे बेटियां सभी उच्च पदों पर हैं लेकिन उन्हें 2 जून की रोटी देने वाला कोई नहीं है और यह समस्या पिछले30-40 वर्षों से अधिक हो गई है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद आधुनिकता की दौड़ में हम संयुक्त परिवार प्रथा से दूर न्यूक्लियर फैमिली की ओर अग्रसर हो रहे हैं अब इस समय यह विचार करने का समय आ गया है की क्या संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने से और न्यूक्लियर फैमिली कॉन्सेप्ट आने से हमारे सुकून भरे दिन अब लद चुके हैं।

वास्तविकता यह है कि डब्बे के दशक के जब से आर्थिक सुधार युग का आगमन हुआ और हम पश्चात देशों के सम्पर्क में आ गए तो हमारे आधुनिक जीवन शैली ने पारिवारिक ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवार का टूटना एकल परिवारों का बढ़ना और आपसी संवाद में कमी हमारे जीवन में चार और मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं रोजगार बेहतर अवसरों की तलाश में लोग अपने घरों से दूर हो रहे हैं जिसे पारिवारिक भावनात्मक सहारा कमजोर पड़ रहा है। आर्थिक सुरक्षा सीमित आए परिवार की जिम्मेदारियां का दबाव और रिश्तो में प्रति दूरियां मन को अस्थिर कर रही हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद पारंपरिक और आधुनिक सोच का टकराव तथा रिश्तो के अनावश्यक हस्तक्षेप पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। आज मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती काम नहीं बल्कि कम से जुड़ा दबाव और समाज में बनी इमेज है। परिवार की उम्मीदें रिश्तेदारों की तुलना और लोग क्या कहेंगे का डर इंसान को भीतर से तोड़ रहा है और यही मानसिक दवा तनाव धीरे-धीरे हमारी मानसिक दशा को और पारिवारिक संबंधों को खराब कर रहा है।

आज अधिक पैसा कमाने और अच्छे जीवन की तलाश में लोग बाहर जा रहे हैं और परिवार बिखर रहे हैं और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि है कि प्राचीन संयुक्त परिवार की परंपरा से हम दूर होते जा रहे हैं और पैसा कमाने की बोर्ड में घर का सुकून हमसे छीना जा रहा है और बड़े बुजुर्ग की ओर से हम उदासीन होते जा रहे हैं, आज के दो दशक पूर्व यदि पति पत्नी में कोई विवाद होता था तो घर के बड़े बुजुर्ग इस विवाद को बड़ी आसानी से सुलझा देते थे पर आज हम घर के बड़े बुजुर्गों से दूर हो गए हैं और पति-पत्नी कि थोड़े-थोड़े से मन मोटे झगड़ा के बाद स्थिति कोर्ट और तलाक तक पहुंच जाती हैआज के आधुनिक युग में जहां पर घर के बड़े बुजुर्ग वृद्ध आश्रम अनाथालय में रहने को मजबूर हैं वहीं पति-पत्नी के बीच कोर्ट केसेस और तलाक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है अब अवसर आ गया है किन समस्याओं के बारे में गंभीरता से सोचें और जान क्या आखिर क्यों हम मानसिक रूप से अस्थिर क्यों हो रहे हैं।

यदि हम इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करें तो हमें समझ में आता है लोगों का लगातार चिंतित रहना स्वभाव में चिडचिडापन का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का बिछड़ना है जिसकी वजह से हम या तो दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहते हैं और संवाद के लिए कोई जगह नहीं होती जबकि संयुक्त परिवार प्रणाली में हम दिन भर काम करने के बाद शाम को परिवार के सभी सदस्यों के बीच संवाद करते थे समाचार सुलझाई जाती थी और फिर दूसरे दिन तरोताजा होकर कम पर जाते थे लेकिन आज संयुक्त परिवार बिगड़ने से ना तो संवाद हो रहे हैं और ना ही बड़े गुना से सलाह ली जा रही है जिसके कारण हमारा पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसी स्थिति का लगातार बने रहना बहुत ही चिंताजनक है। लगातार चिंता चिड़चिड़ापन एकाग्रता में कमी, नींद न आने की समस्या, शारीरिक थकान सामाजिक अलगाव तथा भावनात्मक असंतुलन लंबे समय तक न बने रहे इसके लिए इसका समाधान आवश्यक है।

समाधान की शुरुआत परिवार से ही होती है। खुला संवाद एक दूसरे की भावनाओं को समझना और अपनापन ही मानसिक सुकून की पहली सीढ़ी है। बच्चों को डांट नहीं सहयोग की जरूरत होती है। युवाओं को आलोचना नहीं विश्वास चाहिए और बुजुर्गों को उपेक्षा नहीं सम्मान और साथ चाहिए, पर न्यूक्लियर फैमिली की कॉन्सेप्ट आने से यह सब समाप्त हो गयाहै। परिवार का टूटना परिवार का टूटना केवल सामाजिक ढांचे का बदलाव नहीं बल्कि एक गहरी मानसिक पीड़ा है संवेदनशीलता और आपसी सहयोग से ही इसके इलाकों काम किया जा सकता है जब समाज सफलता से पहले खुशहाली को प्राथमिकता देगा तो यह समस्याएं सदा समाप्त हो जाएंगे जब तक इंसान अपने मन को समझना नहीं सीखेगा तब तक बाहरी सफलताएं भी उसको शांति प्रदान नहीं करेंगी। यह जानने के पहले हमें समझना होगा कि हमारे संयुक्त परिवार से हमें क्या फायदे थे और अब संयुक्त परिवार बिखरने से क्या नुकसान हो रहे हैं।

सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवार आज के भाग दौड़ भरे तनाव युक्त जीवन में सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग, बच्चों के बेहतर लालन पालन और आर्थिक मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये घर के बुजुर्गों की देखभाल भी सुनिश्चित करते हैं और उनका अकेलापन दूर करते हैं और बच्चों में संस्कार और सुरक्षा प्रदान करते हैं क्योंकि बच्चे दादी-दादी या परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में बेहतर सामाजिक मूल्य और संस्कार सीखते हैं और यह उन्हें एकाकीपन के कारण उपजने वाली हताशा व निराशा आज के प्रभाव से दूर करता है दूसरे शब्दों में हमारे परंपरागत संयुक्त परिवार एक साथ कई समस्याओं से निपटने का मजबूत माध्यम है। पिछले दो-तीन दशकों से हमने केंद्रीय की परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) को अपनाने के कारण जिन मुसीबत को झेला है या झेल रहे हैं उनसे निपटने के लिए यही एक मात्र साधन है।

यद्यपि आज हम 21वीं शताब्दी के वैश्विक युग में जी रहे हैं जहां प्रतिस्पर्धा की होड़ में और पूरा विश्व एकही छतरी के नीचे समाया हुआ है फिर भी भारतीय परिपेक्ष में संयुक्त परिवार आज भी बहुत प्रासंगिक है। एक संयुक्त परिवार में सभी लोग एक दूसरे का सुख-दुख आपस में बांट लेते हैं और परिवार में कोई एक व्यक्ति कमजोर या अक्षम है उसका भी गुजारा हो जाता है। अकेलेपन के कारण जो बच्चे आज कल हताशा और निराशा में आत्म हत्या जैसे कदम उठा रहे हैं इन सब चीजों से बचने के संयुक्त परिवार जैसे परम्परागत समाज की ओर लौटना एक मात्र विकल्प है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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