गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हिंदू धर्म में ही नहीं दलितों में भी है ऊंच-नीच का भाव

बसंत कुमार

कुछ दिन पूर्व एक दलित समाज के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने एक कार्यक्रम में यह कह दिया कि जाति पर आधारित आरक्षण तब जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेट से शादी के लिए एक ब्राह्मण पुत्री तैयार नहीं होती उनके इस बयान की आलोचना भी हुई और होनी भी चाहिए क्योंकि शादी-विवाह दो आत्माओं का मिलन है और न कि जातीय समझौदा, बल्कि इस बयान ने एक और विवाद को जन्म दे दिया कि क्या सिर्फ हिंदुओं में ही ऊंच नीच का भेद भाव है या दलित समाज में भी ऊंच-नीच का भेदभाव होता है, कुछ विद्वान यह कहते हैं कि ये जातियां सिर्फ आरक्षण के लिए एक है अन्यथा इनमें आपस मे जाति पात भेद भाव बहुत अधिक है।

वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की मछली शहर सुरक्षित सीट से भारतीय जनता पार्टी ने रामचरित्र निषाद को प्रत्याशी बनाया और मोदी लहर में जीत कर वे सांसद बन गए पर ऊंची महत्वकांक्षा के अनुरूप मोदी सरकार में मंत्री नहीं बन पाए। उन्हें कई बार यह कहते सुना गया कि मंत्री पद के लिए मैं ओबीसी से दलित (अछूत) बना पर कोई फायदा नहीं हुआ! रामचरित्र निषाद की ओबीसी से दलित बनने की टिश यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म के चतुर्वर्ण में आने वाली शूद्र जातियों में भी ऊंच नीच का भाव छिपा हुआ है। दरअसल निषाद, मल्लाह केवट आदि जातियां दिल्ली में तो अनुसूचित जाति वर्ग में वर्गीकृत हैं पर अन्य राज्यों में इन्हें ओबीसी में माना जाता है और इसी कानूनी स्थिति का फायदा उठाते हुए रामचरित्र निषाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर प्रश्न यह उठता है कि जब आप दलितों के लिए आरक्षित सीट से सांसद बनने में सफल हो गए पर दलितो के लिए सवर्णों जैसा पूर्वाग्रह क्यों? मजे की बात यह है कि निषाद मल्लाह व अन्य जातियां वर्षों से अनुसूचित जातियों में शामिल होने की मांग कर रही है पर वे स्वयं चमार व वाल्मीकिआदि जातियों को छूने से परहेज करते हैं फिर इसके लिए सवर्ण समाज को ही दोस्त क्यों दिया जाए।

उत्तर प्रदेश और बिहार में एक जाति मुसहर है जो जाति पदानुक्रम में सबसे नीचे आते हैं और उनका काम लोगों की शादियों में दोना और पत्तल बनाकर देना होता है और उनकी महिलाएं जब दोना पत्तल लेकर किसी सवर्ण के यहां जाती हैं तो एक कोने में बैठकर इस बात का इंतजार करती रहती हैं की बारात में आए मेहमानों का खाना समाप्त हो और उनके पत्तलों में बचे खुचे भोजन को इकट्ठा कर के अपने घर ले जाए पर यही मुसहर जब किसी चमार या वाल्मीकि के यहां पत्तल लेकर जाता है तो वह पका हुआ भजन खाने के बजाय सिद्धा मांगता है, सिद्धा का मतलब है कि कच्चा आटा दाल और आलू जिसे वह अपने घर पर बनाकर खा सके, कहने का तात्पर्य है कि मुसहर कितनी भी बुरी हालत में हो वह चमार के यहां खाना नहीं खाएगा। बड़े आश्चर्य की बात है सवर्णों के साथ रोटी बेटी का संबंध की बात करने वाले दलित समाज के लोग आपस में रोटी बेटी के रिश्ते की बात तो छोड़िए उनके साथ बैठकर खाना भी नहीं खाते।

देश को स्कैवेंजर फ्री बनाने वाले टॉयलेट मां के नाम से मशहूर पद्म भूषण दो बिंदेश्वर पाठक ने दलितों के बीच आपसी जातिवादी मतभेद का बड़ा मजेदार किस्सा सुनाया। बिंदेश्वर पाठक के पिताजी का स्वर्गवास हो गया और उनकी 13वीं में गांव के सभी वर्ग के लोगों को आमंत्रित किया गया। समस्या तब आई जब उनके गांव के दुसाध (पासवान) व चमार जाति के लोग एक साथ पंगत में बैठकर खाना खाने को तैयार नहीं हुए, तब डॉक्टर पाठक ने उनके लिए अलग-अलग पंगत में बैठा कर खाना खिलाया। भारत को आजाद हुए लगभग 8 दशक होने वाले हैं परंतु दलित समाज की दो डोमिनेंट जातियां चमार और बाल्मीकि में कभी भी एकता नहीं हुई, जातियों के आम नागरिक ही नहीं इन जातियों के बड़े-बड़े नेता भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते, यही कारण है कि बिहार के राजनीति में दुसाधों के नेता चिराग पासवान और मुसहरों का प्रतिनिधित्व करने वाले जीतन राम मांझी कभी भी एक-दूसरे का समर्थन नहीं करते और दोनों ही पार्टियां राजनीतिक नेतृत्व करने के बजाय 15% सवर्ण नेतृत्व के आगे-पीछे घूमने को मजबूर हैं और इनकी राजनीति नीतीश कुमार और लालू प्रसाद को के रहमो-करम पर टिकी हुई है। सन 1980 के दशक में कांशीराम का नेतृत्व दलित समाज के लिए चमत्कारिक घटना थी फिर भी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ चमार मतदाताओं को गोल बंद कर सकी। पासी समाज खटीक समाज एवं वाल्मीकि समाज बसपा के साथ नहीं जुड़े या तो ये समाजवादी पार्टी के साथ रहे या भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे। क्योंकि इन वर्गों को किसी एक दलित जाति का मजबूत होना मंजूर नहीं है।

दलितों में आपस में जातिवाद पाया जाता है जो मुख्य रूप से आंतरिक, सामाजिक पदानुक्रम वर्चस्व की लड़ाई आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय उप- जातिय पहचान के कारण होता है। जहां खुद दलित समूह अन्य पर हावी होने की कोशिश करते हैं जिससे आपसी भेदभाव और संघर्ष पैदा होता है जैसे उत्तर प्रदेश में पासी खटीक धोबी आज आरक्षण के लाभ के लिए बेशक अपने आप को अनुसूचित जाति या दलित कहते हैं पर यह सामाजिक रूप में चमार बाल्मीकियों के साथ कभी भी किसी प्रकार का हिस्सा नहीं रखना चाहती रोटी बेटी की बात तो दूर यहां तक कि एक दूसरे के यहां खाना भी नहीं खाते। एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में चमारो और मुसहरों पर सबसे अधिक अत्याचार की घटनाएं दुसाध पासवान समाज के द्वारा की जाती हैं क्योंकि दोनों ही जातियां एससी/एसटी एक्ट की परिधि में आती है इसलिए एससी एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज नहीं होता। लेकिन दलितों में जातिगत भेदभाव के कुछ कारण है जो निम्नलिखित हैं-

इन दलित जातियों के व्यवसाय अलग-अलग थे जैसे सूअर पालना, मैला ढोना, मरे पशुओं को ढोना या जच्चा बच्चा करना, इस कारणसे इनको अलग-अलग जातियों में रखा गया पर जब पूना पैक्ट के पश्चात यह सभी जातियां आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति में सम्मिलित हो गई, पर उनके जातियां अहंकार अलग-अलग रहे इस कारण ये जातियां अनुसूचित जाति के रूप में बेशक एक हो पर जाति के रूप में बिल्कुल अलग-अलग है।

इस समय उच्च दलित वर्ग व निम्न दलित वर्ग के बीच में भेदभाव का जो सिलसिला चल निकला है वह इस समाज के लिए बहुत घातक होगा पहले दलित उच्च वर्ण यानि स्वर्ण समाज के शोषण से परेशान था पर अब दलितों के निम्न वर्ग का शोषण दलितों के उच्च वर्ग के लोग कर रहे हैं, यह निम्न श्रेणी के दलितों के लिए दोहरी समस्या बन गई है क्योंकि उनको दलितों के उच्च वर्ग के साथ-साथ सवर्ण उच्च वर्गों का शोषण झेलना पड़ रहा है दलितों के बीच आपस में भेदभाव का मुख्य कारण उनके आंतरिक जातिगत संरचना, अशिक्षा और गरीबी तथाप्रतिस्पर्धा है, जहां ऐतिहासिक भेदभाव और सामाजिक पदानुक्रम के कारण उप समूहों के बीच संसाधनों और सम्मान के लिए संघर्ष होता है जिससे सामूहिक पहचान के बजाय छोटे-छोटे समूह बनते हैं और वह एक दूसरे को अपने से हीन मानते हैं दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच और छुआछूत का भाव मुख्य रूप से ऐतिहासिक भेदभाव सामाजिक आर्थिक असमानता और वर्चस्व की मानसिकता के कारण होता है जब दलितों की उपजातियां द्वारा खुद को उच्च और दूसरे को निम्न मानने की प्रवृत्ति बनी रहती है तो बाहर की उच्च जातियों से मिली हीन भावना और भेदभाव स्वाभाविक है इसकेकारण सामाजिक भेद भाव और मानसिक दबाव बढ़ता है।

अतः यदि हिंदू समाज को जाति-पात व ऊंच-नीच के भाव से दूर रखना है तो हमे दो क्षेत्रों में एक साथ काम करना होगा एक ओर सवर्ण समाज को हिंदू दलित समाज के लोगो को ऊंच नीच का भाव त्याग कर अपनाना होगा वहीं दलित समाज को जातीय पदानुक्रम में अपने से नीचे के लोगो को अपनाना होगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

देवेंद्र तिवारी

वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है। यह समय न तो पूरी तरह संकट का है और न ही पूरी तरह उत्साह का। बल्कि यह एक ऐसा दौर है जहाँ समझदारी, धैर्य और सही निर्णय लेने की क्षमता सबसे अधिक मायने रखती है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने महामारी, युद्ध, महँगाई और ब्याज दरों में तेज़ उतार-चढ़ाव जैसे कई झटके झेले हैं। इन सबके बीच अब वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है, लेकिन अनिश्चितता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

🌍 वैश्विक आर्थिक स्थिति: सतर्कता का समय - आज वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी लेकिन नियंत्रित गति से आगे बढ़ रही है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में आर्थिक वृद्धि सीमित बनी हुई है। वहाँ की केंद्रीय बैंकिंग नीतियाँ अभी भी महँगाई को लेकर सतर्क हैं।

ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण महँगाई पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ पाई है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक प्रतिबंधों ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया है।

इसका सीधा असर यह हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब आक्रामक जोखिम लेने के बजाय पूँजी की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं। यानी आज का वैश्विक माहौल “जोखिम से बचाव” का है, न कि “जोखिम उठाने” का।

🇮🇳 भारतीय अर्थव्यवस्था: स्थिरता और आत्मविश्वास की मिसाल - जहाँ कई देश आर्थिक दबाव में हैं, वहीं भारत एक मजबूत और संतुलित अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू बाज़ार और युवा जनसंख्या है।

वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की GDP वृद्धि दर 7% से अधिक रहने का अनुमान है। घरेलू खपत, इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और सर्विस सेक्टर इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। 

“मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और PLI जैसी सरकारी योजनाओं ने न केवल निवेश का माहौल सुधारा है, बल्कि भारत को दीर्घकालिक विकास की दिशा में भी अग्रसर किया है।

💰 महँगाई और मौद्रिक नीति: संतुलन का उदाहरण - भारतीय रिज़र्व बैंक ने बीते वर्षों में एक संतुलित और जिम्मेदार नीति अपनाई है। महँगाई को नियंत्रित रखने के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी गति दी गई है। 

ब्याज दरों में स्थिरता से व्यवसायों को योजना बनाने में मदद मिली है और आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिली है। यह स्थिरता निवेशकों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।

📊 शेयर बाज़ार और निवेश का परिदृश्य

📈 इक्विटी मार्केट - भारतीय शेयर बाज़ार में समय-समय पर उतार-चढ़ाव बना हुआ है, लेकिन इसका दीर्घकालिक दृष्टिकोण मजबूत है।

बैंकिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, IT, डिफेंस, रिन्यूएबल एनर्जी और कैपिटल गुड्स जैसे सेक्टर निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। IPO मार्केट में आई सक्रियता यह दर्शाती है कि कॉरपोरेट सेक्टर को भारत की आर्थिक दिशा पर भरोसा है। समझदार निवेशकों के लिए गिरावट डर का कारण नहीं, बल्कि अवसर होती है।

🪙 सुरक्षित निवेश विकल्प - अनिश्चित वैश्विक माहौल में सोना और चाँदी जैसे पारंपरिक निवेश फिर से महत्वपूर्ण बन गए हैं। डेट फंड, बॉन्ड और फिक्स्ड इनकम प्रोडक्ट्स उन निवेशकों के लिए उपयोगी हैं जो स्थिरता और मानसिक शांति को प्राथमिकता देते हैं।

⚠️ आने वाली चुनौतियाँ - वैश्विक मंदी का असर भारत के निर्यात पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतें भारत के लिए बड़ा जोखिम बनी हुई हैं। भू-राजनीतिक तनाव से बाज़ारों में अचानक अस्थिरता आ सकती है। इन चुनौतियों से डरने के बजाय इनके लिए तैयार रहना ज़रूरी है।

💡 निवेशकों के लिए सही रणनीति - आज के समय में निवेश का मतलब केवल रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि जोखिम को समझदारी से संभालना है। डायवर्सिफिकेशन अनिवार्य है। लॉन्ग-टर्म सोच अपनाएँ। SIP और अनुशासित निवेश को प्राथमिकता दें। अफवाहों के बजाय फंडामेंटल्स पर भरोसा करें। बीमा और वित्तीय सुरक्षा को नज़रअंदाज़ न करें। 

🧭 निष्कर्ष - वर्तमान वित्तीय परिदृश्य हमें यह सिखाता है कि अवसर और जोखिम हमेशा साथ चलते हैं। भारत आज एक ऐसी स्थिति में है जहाँ सही निर्णय और धैर्य से वित्तीय रूप से सशक्त भविष्य बनाया जा सकता है। समझदारी से लिया गया आज का निर्णय आने वाले वर्षों की नींव बनता है।

आखिर बिहारी कब तक गाली के रूप में इस्तेमाल होता रहेगा?

बसंत कुमार

मैं सन 1979 में रेलवे सेवा आयोग की परीक्षा पास करके उत्तर रेलवे प्रधान कार्यालय में 20 वर्ष की आयु में लिपिक के पद पर तैनात हुआ क्योंकि मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का रहने वाला था इसलिए मुझे कार्यालय के सहपाठियों द्वारा बिहारी संबोधित करके बुलाया जाता था, क्योंकि दिल्ली में पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार के लोगों को बिहारी कहके संबोधित किया जाता है। यद्यपि मैं वहां सबसे अधिक शिक्षित लोगों में था पर मेरे लिए बिहार संबोधन शायद प्रयोग होता था कि मैं जिस क्षेत्र से आया हूं उसे पिछड़ा और गंवारों का क्षेत्र माना जाता था। आज लगभग 50 वर्ष हो चुके हैं पर मैं यह नहीं समझ पाया हूं की कब तक बिहारी शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा। अभी कुछ दिन पूर्व उत्तराखंड के भाजपा के एक नेता ने उन लड़कों जिनकी शादियां नहीं हो रही थी को संबोधित करते हुए यह कह दिया की बिहार में 20-25 हजार रुपए में लड़कियां मिल जाती हैं। प्रश्न यह है कि लोग बिहारी शब्द को गाली के रूप में कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे।

उत्तराखंड के नेता का यह बयान न सिर्फ बिहार और बिहारी का अपमान है बल्कि यह महिला जाति का भी अपमान है जिस भारत में महिला को देवी के रूप में पूजा जाता था वहां एक व्यक्ति एक बिहारी महिला को 20-25 हजार रुपए में पत्नी बनाने का ख्वाब देख रहा है। आश्चर्य की बात है कि किसी भी बिहारी नेता, नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता ने इस बात का विरोध नहीं किया है। कैसी विडम्बना है कि जिस बिहार ने गौतम बुद्ध, चाणक्य, सम्राट अशोक जैसे महान विभूतियां पैदा की और आधुनिक भारत में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, टॉयलेट मैन के नाम से मशहूर पद्म विभूषण विंदेश्वर पाठक आदि न जाने कितनी महान हस्तियों को जन्म दिया और आज भी नई दिल्ली में नौकरशाह के रूप में सचिव, अतिरिक्त सचिव, संयुक्त सचिव, कमिश्नर स्तर के अधिकांश बिहारी मौजूद हैं लेकिन अभी भी बिहारी को पिछड़ा, बेवकूफ का पर्याय मानकर, मजाक का पात्र बनाया जाता है। यह भी सत्य है कि दिल्ली के व्यापारियों की दुकानें, औद्योगिक संस्थान, किरायेदारों से अपनी जीविका-आजीविका चलाने वाले जमीदारों की जिंदगी बिहारियों के बल पर चलती है पर हर जगह बिहारी का मजाक उड़ाना अनुचित है। जिस देश में पंजाबी मराठी कहना गौरव की बात होती है उसी देश में बिहारी एक गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है आखिर ऐसा क्यों है। इस पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए और ऐसा हमारे बिहार के बड़े-बड़े नेता और नौकरशाह खुद तो बिहार से आकर दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, हौजखास, ग्रेटर कैलाश जैसे पाश इलाकों में राजसी ठाट बाट से रहते हैं पर बिहार और बिहारियों के बारे में कोई नहीं सोचता।

एक ओर देश के रेल मंत्री स्लीपर बंदे भारत ट्रेन का रोज-रोज प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उनको यह नहीं पता है कि बिहार से आने जाने वाली ट्रेनों में पूरे वर्ष भर आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिलता है और होली, दीपावली और छठ पूजा के दौरान दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे शहरों में काम करने वाले बिहार के श्रमिकों को घर जाने के लिए अनारक्षित डिब्बों में भेड़ बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर जाना पड़ता है। आज तक भारतीय रेल ने कभी भी बिहार में आने-जाने वाली ट्रेनों में बढ़ती भीड़ और सीट की अनुपलब्धता पर कोई लॉन्ग टर्म योजना बनाने की कोशिश नहीं की, जबकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में नजर डालें तो ललित नारायण मिश्र, बाबू जगजीवन राम, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार, अब्दुल ग़फुर, लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नाम वाले नेता भारत के रेल मंत्री रहे हैं। लेकिन कभी भी बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में जाने वाली रेलगाड़ियों के बारे में नहीं सोचा। देश के रेल मंत्री से आग्रह है कि बंदे भारत राजधानी आदि ट्रेनों की सुविधा के साथ-साथ बिहार में जाने वाली ट्रेनों पर भी ध्यान दें।

आज दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में 80 % से 90% किरायेएदार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग होते हैं यह जिन लोगों के मकान में किराये पर रहते हैं वहां पर उनकी महिलाओं को भी बड़ी उल्टी नजर से देखा जाता है मकान मालिक जहां अपनी आर्थिक आमदनी के लिए इन किरायेदारों पर निर्भर करते हैं वही उनकी महिलाओं पर इनकी कुदृष्टि रहती है जो कहीं से भी उचित नहीं है पर उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के निकम्मेपन के कारण बिहार के युवक 10 - 15 हजार रूपए की नौकरी के लिए महानगरों में पड़े हुए हैं, जहां वे झुग्गी झोपड़ी या फिर किराये के मकान में नरकीय जिंदगी गुजारने को मजबूर रहती है देखना यह है कि बिहार वोटो के सहारे सरकारें तो बनती बिगड़ती रहती है लेकिन क्या बिहार की अस्मिता के लिए कोई सरकार या कोई राजनीतिक दल काम कर रहा है।

बिहार में प्राकृतिक संसाधनों का अ संतुलित वितरण बिहार के गरीबों के इस अपमान का कारण है, बिहार में दो तरह के वर्ग के लोग रहते हैं एक इतना गरीब है कि उसे दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता और एक इतना अमीर है कि उसको पता ही नहीं कि उसके पास कितनी जमीन या प्रॉपर्टी है इसी गरीबों के कारण बिहार के लोग गांव से पलायन करके शहरों में 10-20 हजार की नौकरी करते हैं यदि पूरे देश में नजर डालें तो पंजाब का व्यक्ति अपनी खेती के लिए मशहूर है, कर्नाटक और हैदराबाद के व्यक्ति आईटी इंजीनियरिंग के लिए मशहूर हैं, केरल के व्यक्ति की पहचान नर्सिंग इंडस्ट्री के लिए है लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की पहचान मजदूरी पल्लेदारी आदि के लिए है अब जहां दुनिया वैश्वीकरण में प्रतिस्पर्धा कर रही है वहां देखना यह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी मजदूर के ब्रांड से कब बाहर निकाल पाते हैं, इस विषय में एक किस्सा मशहूर है एक बिहार के व्यक्ति दिल्ली में यूपी पुलिस आयुक्त के रूप में तैनात थे गाड़ी में जाते समय उन्होंने अपने ड्राइवर से टूटी हुई सड़क के बारे में शिकायत की तो ड्राइवर ने बगल के दुकान वाले से कहा की भाई चार-पांच बिहारियों को भेज दे यह सड़क ठीक करवानी है तो कर में बैठे पुलिस उप आयुक्त ने कहा की पांच बिहारी नहीं चारही भेजना क्योंकि एक बिहारी इस गाड़ी में बैठा हुआ है तो यह है बिहारी की पहचान।

पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार व अन्य पिछले में राज्यों को उधमिता से जोड़ने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया गया जिससे वहां के लोग उधमिता से जुड़े और उन्हें महानगरों में जाकर मजदूरों के रूप में नौकरी न करनी पड़े कैसी विडंबना है कि महावीर प्रसाद, कलराज मिश्र, गिरिराज सिंह, भानु प्रताप सिंह वर्मा और जीतन नाम माझी जैसे बड़े नेता कई दशकों तक देश के एमएसएमई विभाग के मंत्री रहे और वे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले थे, यहां तक के एमएसएमई विभाग के सचिव भी उत्तर प्रदेश बिहार के निवासी रहे हैं पर दुर्भाग्य इस बात का है की बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उद्यमिता के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ और वहां के पढ़े-लिखे युवा अपना उद्यम शुरू करने के बजाय महानगरों में श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं और न ही इन लोगों के मन में उद्यमिता के क्षेत्र में काम करने के लिए इच्छा शक्ति जगाने का काम हुआ। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव बताना चाहता हूं कि मैं एनडीए-1 में एमएसएमई सलाहकार के रूप में कार्यरत था और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम में बैठा करता था वहां मेरे पास उत्तर प्रदेश व बिहार के अनेक लोग काम की तलाश में आते थे और मेरी कोशिश होती थी की इनक्यूबेशन आदि में प्रशिक्षण दिलाकर इनको उद्यमिता के क्षेत्र में डाला जाए पर होता यह था की सब कुछ देख लेने के बाद वह यही कहते थे की साहब हमें 10-12 हजार रुपए की नौकरी दिलवा दो, कहने का मतलब यह है की इन लोगों को कभी भी उद्यमिता के क्षेत्र में मानसिक रूप से तैयार नहीं किया गया और दूसरों की नौकरी करना इन्होंने अपना भाग्य मान लिया है। 

 बिहार की छठ पूजा के अवसर पर बिहार केवोटरों के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों घाट बनवाने से लेकर अन्य सुविधाये मुहैया करा ने के लिए जोर-जोर से दिखावा करती है और कुछ पार्टियों तो बिहारी वोटर को लुभाने के लिए बिहार से आकर दिल्ली में बसे हुए बिहारके लोगों को अपना प्रत्याशी भी बनाते हैं पर आज उत्तराखंड सरकार के एक मंत्री के पति द्वारा बिहार की महिलाओं के लिए इस तरह का अनुचित बात कहने पर कोई भी पार्टी इसका विरोध करने को तैयार नहीं है यह बिहार के अस्मिता का प्रश्न नहीं बल्कि देश की बेटियों का बेटियों की अस्मिता का प्रश्न है और और प्रधानमंत्री जी की बेटी बढ़ाओ बेटी बचाओ और बेटीपढ़ाओ नारी का अपमान है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

जी रामजी तथा इसके विरोध के मायने

अवधेश कुमार

भाजपा की राज्य सरकारें या प्रदेश इकाइयां हर जगह जी राम जी पर पत्रकार वार्तायें आयोजित कर रही हैं तथा पार्टी के स्तर पर इसे अभियान के रूप में लिया गया है। सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा सामान्यतया कम होता है। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दृढ़ता के साथ संसद में पारित कराकर संदेश दे दिया था कि इसे हर हाल में क्रियान्वित किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। कई अन्य दल भी इसके विरुद्ध मोर्चाबंदी कर रहे हैं। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगीं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध और इसके समानांतर भाजपा के द्वारा इसके समर्थन का अभियान चलेगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 2005 में नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परंपरा न पहले थी न आगे स्थापित हो सकती है। देश , काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होतीं हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नयी आरंभ भी होतीं हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यूपीए सरकार ने भी महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग सेविशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी इसलिए जारी योजना में नाम जोड़ा  गया। विपक्ष की ओर उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्युलर चरित्र समाप्त होता है?  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि की सनातन और हिंदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम परिचित हैं। इसलिए यह भी जी राम जी के साथ महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो जाता है।

वर्तमान कार्यक्रम मनरेगा है ही नहीं। मनरेगा समाप्त कर जी राम जी नया कानून बना है। इसलिए यह आलोचना गलत है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर जी राम जी कर दिया गया है। नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के ऐसे कृतिमान बनाये जिनको रोक पाना मनरेगा ढांचे में संभव नहीं हो पाया। केंद्र से राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एनजीओ के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूर्ति हो रही है। जी राम जी में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण , डिजिटल मॉनिटरिंग,सशक्त सोशल ऑडिट साप्ताहिक पब्लिक डिस्क्लोजर आदि के प्रावधान से भ्रष्टाचार की संभावनाएं क्षीण होती हैं। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ उनमें और आज में अनेक मायनों में बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होते समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आर्थिक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023 24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज के गांवों की स्थिति वैसी ही नहीं है। गांव की डिजिटल पहुंच बढ़ी है , बिजली आपूर्ति काफी हद तक सुनिश्चित है, यातायात संपर्क की सुविधा बेहतर हुई है और सामाजिक सुरक्षा आज ज्यादा सशक्त है।  भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।

 इसमें केवल 100 की जगह 125 दिनों के रोजगार की ही बात नहीं है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को ऐसे सशक्त और टिकाऊ आधारभूत ढांचा देना है जिनसे वे सक्षमता की ओर बढ़ें। इसमें बने निर्मित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना स्ट्रेट में शामिल किया जाएगा। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े सारे काम एक ही व्यवस्था से जुड़ेंगे। जी राम जी में चार मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। बाढ़ और सुखार के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे शामिल है। जीरामजी का स्वरुप और संस्कार मनरेगा से अलग है। तब काम अलग-अलग श्रेणियों में फैले हुए थे। यहां रोजगार पर फोकस होते हुए भी गांव के लिए स्थिर उत्पादक क्षमता पैदा करने और बढ़ाने यानी आत्मनिर्भरता का भाव है। मनरेगा या पहले के ग्रामीण रोजगार योजनाओं का फोकस ऐसा नहीं था। इसमें ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। इन योजनाओं को प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसे राष्ट्रीय प्रणालियों से भी संबद्ध किया जाएगा।

मिशन अमृत सरोवर के तहत 68, 000 से ज्यादा जल निकाय बने या पुनर्जीवित हुए हैं । इससे खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन , बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका सुरक्षित होगी। सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।

जी राम जी के व्यय की 40% जिम्मेवारी राज्यों पर डालने का विरोध हो रहा है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है वहां के लिए विचार करना चाहिए। वैसे भारतीय स्टेट बैंक ने एक रिपोर्ट में इस आलोचना को निराधार बताते हुए कहा है कि राज्य इसमें नेट गेनर होंगे। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व साझा करने की प्रणाली में राज्यों को 17,000 करोड रुपए का अतिरिक्त आवंटन होगा। आवंटन के आधार पर आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु को थोड़ा नुकसान दिख रहा है जबकि शेष राज्यों में ज्यादा आवंटन का आंकड़ा सामने आता है। राज्यों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सशक्त करने की नीतियां अपनानी पड़ेगी। फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की योजनाओं की जगह ऐसी योजना से लोगों का ज्यादा भला होगा। मुख्य बात है इस व्यवहारिक तथा गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाले कार्यों का कल्पना के अनुरूप क्रियान्वयन। यह जिम्मेवारी अंततः राज्यों , स्थानीय प्रशासन, पंचायत तथा सामाजिक -सांस्कृतिक -धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर आती है। इस कार्यक्रम में गांव के लोगों की रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनरेगा सीमांत और सामान्य मध्यम किसानों के लिए अनर्थकारी बनकर सामने आया था। मुख्य कृषि कार्य के समय कृषि श्रमिकों की उपलब्धता अत्यंत कम हो गई थी। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मूल अनाज उत्पादन वाली खेती छोड़ दी। बुवाई से कटाई तक किसानों के लिए कष्टकर स्थिति रही है। मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे या गुस्से में आ जाते थे। जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई ,कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं थी। अब काम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। हालांकि मनरेगा ने पूरी व्यवस्था में जैसा उथल-पुथल मचाया उसमें कृषि को पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है फिर भी इसका सकारात्मक असर होगा।

कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन, परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन या  संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगी। किंतु अगर कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों आदि को जी रामजी नाम रखने से समस्या है तो इसका उपचार नहीं। सभी देवी-देवता केवल मनुष्य से परे शक्ति संपन्नता के ही नहीं सात्विकता, नैतिकता ,समाज के लिए आत्मोत्सर्ग तथा सर्व कल्याणकारी चरित्र वाले हैं। उनके नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्यूलर चरित्र प्रभावित नहीं होता। इसमें आध्यात्मिकता एवं आम लोगों के लिए योजना की पवित्रता बनाए रखने की जो भावना पैदा हो सकती है उससे व्यापक सेक्यूलर भाव क्या हो सकता है?

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

प्रसिद्ध फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी पुस्तक लाइफ हग मी टाइट के विमोचन की घोषणा की

संवाददाता

नई दिल्ली। प्रतिष्ठित फिल्मकार दिलीप विरेंद्र सूद ने अपनी नई पुस्तक लाइफ हग मी टाइटः आशा, हास्य और संकल्प की कहानीका विमोचन किया है। यह पुस्तक व्हाइट फाल्कन पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशिल की गई है। लेखक के जीवन अनुभवों से प्रेरित यह पुस्तक एक संवेदनशील और प्रेरक कथा प्रस्तुत करती है, जिसमें रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं, पारिवारिक दायित्वों और जीवन की अनिश्थित सीखों के बीच संतुलन को सशक्त रूप से दर्शाया गया है।

200 से अधिक पृष्ठों में विस्तृत लाइफ हग भी टाइट चुनौतियों और उपलब्धियों के क्षणों को गर्मजोशी, दृढ़ता और सौम्य हास्य के साथ पिरोती है। यह पुस्तक आशा और निरंतर प्रयास की शक्ति को रेखांकित करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव पर एक सकारात्मक और प्रेरणादायी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

साहित्यिक विमोचन के साथ-साथ, इस पुस्तक को एक प्रमुख फीचर फिल्म के रूप में रुपांतरित करने की योजना भी विकसित की जा रही है, जिससे इसकी भवनात्मक गहराई काग़ज़ से परदे तक विस्तार पा सके।

दिलीप विरेंद्र सूद एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित लेखक, निर्देशक और निर्माता है, जिनके कार्यों को अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहना और पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे भारत सरकार द्वारा आयोजित 68वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के प्रतिष्ठित जूरी सदस्य भी रह चुके हैं। वर्तमान में वे प्रसार भारती, भारत सरकार के राष्ट्रीय नेटवर्क के लिए भारत का पहला साइबर अपराध जागरुकता कार्यक्रम साइबर क्राइम की दुनिया का निर्माण कर रहे हैं।

लाइफ हग मी टाइट दिलीप विरेंद्र सूद की रचनात्मक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो व्यक्तिगत अनुभूतियों, कलात्मक चिंतन और आशा के सार्वभौमिक अनुभव को सशक्त रूप से प्रस्तुत करती है।

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