बुधवार, 3 दिसंबर 2025

जातिवाद लड़ाई में हिंदू संस्कृति का नुकसान

बसंत कुमार

विगत कुछ महीनों से दलित बनाम सवर्ण इतना अधिक हो गया है कि देश में राष्ट्रवादी सिद्धांतों में विश्वास करने वाली पार्टी की सरकार के कार्यकाल में ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल में ट्रिपल तलाक और संविधान से विवादित अनुच्छेद 370 जैसे प्रावधानों को समाप्त करके महिलाओं के सशक्तिकरण और कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय को जीने के अधिकर देने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सपा सांसद राम जी लाल सुमन द्वारा संसद में राणा सांगा के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी से सांगा के समर्थक राजपूत समाज और दलित समाज के बीच विवाद होता रहा। यह विवाद समाप्त हुआ भी नहीं था कि अनिल मिश्रा जैसे वकील ने यह विवाद पैदा कर दिया कि बाबा साहब आंबेडकर संविधान निर्माता नहीं थे बल्कि इसका निर्माण उनके सलाहकार रहे सर बीएन राव ने किया। इसके बाद मध्य प्रदेश के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा द्वारा आरक्षण को लेकर जो अवांछित टिप्पणी आई और सवर्ण समाज और दलित समाज के बीच तलवार खींची है लेकिन इसका नुकसान हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति का हो रहा है जबकि वैदिक काल से सवर्ण और शूद्र दोनों ही हिंदू धर्म का हिस्सा रहे हैं और हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी न कि जन्म पर आधारित थी फिर आज जन्म के आधार पर शूद्र और सवर्ण समाज के बीच इतना घमासान क्यों हो रहा है। इसके लिए हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था के इतिहास को जानना आवश्यक है।

पहले के समय में हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था में मुख्यत चार वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र और ये व्यवस्था सामाजिक आर्थिक संचालन के लिए थी, जहां ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से समाज का नेतृत्व करता था। क्षत्रिय राजा होने के साथ साथ प्रजा की रक्षा करता था। वैश्य आर्थिक गतिविधियों का संचालन करता था और शूद्र सेवा के कार्यों और टेक्निकल कामों जैसे लोहार, कोहार, बढ़ई, नाई आदि कामों को करता था पर पंच वर्ण जिसे हम आज दलित, अछूत, म्लेच्छ कहते हैं। वह कहां से आया इसे जानने के लिए हमें हिन्दू धर्म के इतिहास का अध्ययन करना पड़ेगा।

मूल वैदिक काल के ग्रंथों में जाति का उल्लेख नहीं मिलता। इसीलिए पुरुष सूक्त जो ऋग्वेद के अंत में प्रकाशित हुआ, को वंशानुगत जाति व्यवस्था के समर्थन हेतु प्रकाशित किया गया कहने का अभिप्राय यह है कि पुरुष सूक्त के अलावा ऋग्वेद में कहीं भी शूद्र शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। कुछ विद्वानों का मानना है कि पुरुष सूक्त वैदिक काल का एक संयोजन था जो एक दमनकारी और शोषक वर्ग की संरचना वर्ग से पहले से ही अस्तित्व में होने को निरूपित व वैध बनाने हेतु लिखा गया था। यद्यपि पुरुष सूक्त में क्षत्रिय शब्द का प्रयाग नहीं हुआ है परंतु इसमें राजन शब्द का प्रयोग हुआ है, राजन शब्द उस समय के राजा के लिए प्रयोग हुआ जो समाज के विशिष्ठ वर्ग के रूप में स्थापित हो गए थे और वैदिक काल के अंतिम चरण में राजन शब्द को क्षत्रिय शब्द में स्थापित कर दिया गया। शतपथ ब्राह्मण में वर्ण क्रम ब्राह्मण, वैश्य, क्षेत्रीय व शूद्र है पर वर्तमान ब्राह्मण वादी परंपरा का वर्ण क्रम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र है पर बौद्ध कालीन परंपरा में क्षत्रिय उत्कृष्ठ वर्ग माना गया। परन्तु राजपूत काल (आठवीं से 12वीं शताब्दी) में भारतीय उप महादीप में वर्ण व्यवस्था का ऐसा चरण आया जहां राजनीतिक विकेंद्रीकरण के बीच में गहन और बहुआयामी परिवर्तन हुए, इस काल में जातिय संरचना में कठोरता के साथ साथ सामाजिक गतिशीलता देखी गई और ब्राह्मणों की सर्वोच्चता स्थापित हुई। ब्राह्मण वर्ग को राजदरबारो का सहारा मिला और वे धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाने लगे।

हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य समुदाय वर्णाश्रम का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है, इस समुदाय को लक्ष्मी पुत्र माना जाता है वैश्य समाज का प्राचीन काल से वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत मेगास्थनीज ने वैश्य समाज की विरासत की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि देश में भरण पोषण के प्रचुर साधन तथा उच्च जीवन स्तर अद्भुत विकास वैश्यों के कारण है, वणिकों की आश्चर्य जनक प्रतिभा का प्रथम दिग्दर्शन हमें हड़प्पा और मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हो गया था। उस काल में वैज्ञानिक ढंग से बनाए गए व्यवस्थित नगर संसार में और कही नहीं है। भारत के वणिकों ने चीन मिस्र, यूनान तथा दक्षिण अमेरिका आदि देशों में जाकर न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढाया बल्कि उन देशों की अर्थ व्यवस्था को सुधारा। ईसा से 200 वर्ष पूर्व कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड आदि देशों में जाकर बस गए, वहां उनके द्वारा बनवाए गए उस काल के सैकड़ों मंदिर आज भी विद्यमान हैं। वणिकों ने भारतीय धर्म दर्शन और विज्ञान से संबंधित लाखों ग्रंथों का अनुवाद करवाया जो आज भी वहां उपलब्ध है।

हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था में शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था जिसका कार्य मुख्य रूप से अन्य तीन वर्णों की सेवा करना था। शूद्रों का स्थान और उनके कर्तव्यों का वर्णन शास्त्रों में विशिष्ठ रूप से वर्णित है। शूद्रों का हिन्दू समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था क्योंकि श्रम और सेवा के माध्यम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था। पर भारतीय समाज में एक वर्ण और आया जो अछूत या बहिष्कृत कहा गया कुछ लोग उसे शूद्र के साथ ही मानते हैं परन्तु हिंदू वर्ण व्यवस्था में शूद्रों और अछूतों में बहुत अंतर है वे पंच वर्ण के रूप में माने जाते है, राजनीतिक तौर पर वे हिंदू धर्म का हिस्सा माने जाते हैं पर सामाजिक तौर पर वे कहीं भी स्वीकार्य नहीं है। उत्तर वैदिक काल में शूद्रों की स्थिति अछूतो से बेहतर थी शूद्र समाज की सेवा करते हुए समझ के अन्य वर्णों के साथ उठ बैठ सकते थे पर अछूतो को समाज से बाहर ही माना जाता रहा है और मनु ने चौथे वर्ण शूद्र को तीन वर्णों की सेवा का दायित्व सौंपा और मनु की दंड न्याय प्रक्रिति आदि के प्रसंगों में शूद्रों के प्रति असमानता पूर्ण व्यवहार को मान्यता दी पर अछूतो से इनकी स्थिति बेहतर थी।

अछूतों की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्ध हिंदू विचारक व अर्थ शास्त्री डा सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व पुनरुत्थान में खुलासा करते हुए कहते है कि आज के अछूत/दलित पक्के हिन्दू थे और ब्राह्मण व क्षत्रिय थे पर मुहम्मद गोरी के द्वारा स्थापित सल्तनत काल और मुगल काल में जजिया के न देने और मुसलमानो के धर्म परिवर्तन के दबाव के आगे न झुकने के कारण इन्हें मैला साफ करने और मरे हुए पशुओं को ढोने और उनकी खाल उतारने और उनका मांस खाने को मजबूर कर दिया गया और बाद में वे उन्हीं हिंदुओं द्वारा उपेक्षित और घृणा का शिकार होते रहे और आज भी तो रहे है और आज भी हिंदू समाज में चूड़ा चमार गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है। पर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आंबेडकर सहित अनेक समाज सुधारकों द्वारा इनकी मुक्ति के लिए प्रयास किए जाने लगे, वो अलग बात है कि अपनी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत ब्रिटिश इंडिया सरकार द्वारा इनके लिए अलग निर्वाचन मंडल की व्यवस्था दी गई और यदि डा आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच पूना पैक्ट नहीं हुआ होता तो पाकिस्तान की तरह भारत का एक और विभाजन हो गया होता पर दुर्भाग्य से स्वयंभू सनातन के झंडा बरदार समझने वालों द्वारा गांधी और आंबेडकर दोनों का विरोध किया जा रहा है कही बापू को राष्ट्रपिता कहने पर विरोध हो रहा है और कही आंबेडकर को संविधान निर्माता कहने पर विरोध किया जा रहा है।

देश के हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है और विभिन्न पंथों को मानने वाले लोगों की अलग अलग पूजा पद्धति है, हिन्दू देश का राष्ट्रीय धर्म है और विभिन्न पूजा पद्धति मानने वाले पंथ इसकी शाखाएं हैं, इसलिए इन्हें मुसलमानों और अछूतों (पंच वर्ण) को भी हिंदुत्व का हिस्सा मानना होगा और तभी एक स्वस्थ और सुदृढ़ हिंदुस्तान का निर्माण हो सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

पाठकों का पत्र - सरकार कर्ज को कड़ाई से वसूले

कर्ज आदमी, मजबूरी में लेता है। अब उसकी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है, वह लिया कर्ज वापस करें। आज तो कर्ज लेना जैसे उधार का घी पीना रह गया है। आज लोगों का यही नजरिया है-लिया गया विशेष रूप से सरकारी कर्ज कोई लौटाने की चीज है। जैसे महाराष्ट्र सरकार ने किसानों का जून 2026 तक कर्जा माफ करने को कहा है। जब लिया कर्जा माफ हो जाये, तो वह खुश होगा और भी लोग है जो सत्ता के करीब होने के नाते जिन्होंने कर्ज ले रखा है। सरकार भी उनसे वसूली के लिए हल्के मन से दवाब डालती है। उनका बकाया बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। कर्ज लेकर न लौटाना पड़े। इससे लोगों में यही संदेश जायेगा कि सरकारी बकाया भी कोई देने की चीज है। ऐसे लोगों की आदत हो गई है रूपया मारने की। और वह बड़ी शान से कहते हैं-सरकार का मारा है। तुम्हारे पेट में क्यूं दर्द हो रहा है। ऐसे लोगों की आदत हो गई है रूपया मारने की। और वह बड़ी शान से कहते हैं- सरकार का मारा है। तुम्हारे पेट में क्यूं दर्द हो रहा है। इससे लोगों में गलत संदेश जाता है। वहीं इस देश में ईमानदार लोग भी है जो बिजली, पानी या कोई देनदारी बाकी नहीं रखते। वैसे, कर्ज एक उधार की सांसों की तरह है। जब-तब वह जलील भी होता रहता है। अच्छा है सरकार ऐसी रेबरी बांटने से बचे। कर्ज को कड़ाई से वसूले।

दिलीप गुप्ता, बरेली

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

चिट्ठी आई है : कर्ज एक उधार की सांसों की तरह है

दिलीप गुप्ता, बरेली

कर्ज आदमी, मजबूरी में लेता है। अब उसकी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है, वह लिया कर्ज वापस करें। आज तो कर्ज लेना जैसे उधार का घी पीना रह गया है। आज लोगों का यही नजरिया है-लिया गया विशेष रूप से सरकारी कर्ज कोई लौटाने की चीज है। जैसे महाराष्ट्र सरकार ने किसानों का जून 2026 तक कर्जा माफ करने को कहा है। जब लिया कर्जा माफ हो जाये, तो वह खुश होगा। और भी लोग है जो सत्ता के करीब होने के नाते जिन्होंने कर्ज ले रखा है। सरकार भी उनसे वसूली के लिए हल्के मन से दवाब डालती है। उनका बकाया बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। कर्ज लेकर न लौटाना पड़े। इससे लोगों में यही संदेश जायेगा कि -सरकारी बकाया भी कोई देने की चीज है। ऐसे लोगों की आदत हो गई है रूपया मारने की। और वह बड़ी शान से कहते हैं-सरकार का मारा है। तुम्हारे पेट में क्यूं दर्द हो रहा है। ऐसे लोगों की आदत हो गई है रूपया मारने की। और वह बड़ी शान से कहते हैं- सरकार का मारा है। तुम्हारे पेट में क्यूं दर्द हो रहा है। इससे लोगों में गलत संदेश जाता है। वहीं इस देश में ईमानदार लोग भी है जो बिजली, पानी या कोई देनदारी बाकी नहीं रखते। वैसे, कर्ज एक उधार की सांसों की तरह है। जब-तब वह जलील भी होता रहता है। अच्छा है सरकार ऐसी रेबरी बांटने से बचे। कर्ज को कड़ाई से वसूले।



राजवंशी देवी : भारत के प्रथम राष्ट्रपति की शक्ति और सादगी

विवेक शुक्ला

डॉ राजेंद्र प्रसाद 1946-50 तक संविधान सभा के अध्यक्ष और फिर 1950 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, तब भी उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन की चकाचौंध में रुचि नहीं दिखाई। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई परंपराओं को शुरू किया जिन पर अब भी अमल हो रहा है। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में महत्वपूर्ण त्योहारों को मनाने की परंपरा शुरू की। इनमें राष्ट्रपति भवन में रहने वाले स्टाफ की भी भागेदारी रहती। राजवंशी देवी दिवाली, होली, रक्षाबंधन और ईद पर आगंतुकों और स्टाफ के साथ वक्त बिताती। उनके साथ भोजन करतीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद तो कुछ देर के बाद वहां से निकल जाया करते थे, पर राजवंशी देवी वहीं रहती। राष्ट्रपति भवन में सभी उन्हें 'मां जी' कहते थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद को देश के राष्ट्रपति के कार्यकाल (1950-1962) के दौरान रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन के मुलाजिमों की बेटियां राखी बांधती। बदले में, राजवंशी देवी सबको उपहार देती। राजवंशी देवी बेटियों और उनके अभिभावकों के साथ काफी देर तक बातचीत करती। उनका मार्गदर्शन करतीं। दरअसल डॉ राजेंद्र प्रसाद के दौर में रक्षाबंधन राष्ट्रपति भवन में एक सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में स्थापित किया गया। राखी का आयोजन सादगीपूर्ण होता था, जिसमें गोल मार्केट  या बंगाली मार्केट की पारंपरिक मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था। राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन का आयोजन अब एक स्थायी उत्सव बन चुका है। इसका यहा पर रहने वाली बेटियों को इंतजार रहता है।

राजधानी दिल्ली में आयोजित छठ महापर्व के पहले आयोजन को राजवंशी देवी का आशीर्वाद मिला। पहला छठ का आयोजन 1956 केन्द्र सरकार के कर्मियों की कॉलोनी सरोजनी नगर के निवासी श्रीकांत दुबे की पहल पर आयोजित हो रहा था। वे तब राजधानी के कुछ भोजपुरी समाज के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति भवन में साइकिल पर सवार होकर पहुंचे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को छठ उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया। उस जमाने में आज की तरह की सुरक्षा व्यवस्था कहीं भी नहीं होती थी। हालांकि, विभिन्न कारणों से वे शामिल नहीं हो सके, लेकिन उनकी पत्नी राजवंशी देवी ने सरोजिनी नगर में आयोजित छठ महापर्व में शिरकत की। अगले कुछ वर्षों तक वे इस आयोजन में शामिल होती रहीं और सभी के साथ आत्मीयता से मिलती-जुलती। राजवंशी देवी  कुछ समय अपने सरोजिनी नगर में रहने वाले रिश्तेदार विश्वेश्वर नारायण के फ्लैट पर भी आया करती थीं।  राजवंशी देवी सरलता और सादगी की मिसाल थीं।

राजवंशी देवी राष्ट्रपति भवन के अंदर चलने वाले स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हुए मेधावी बच्चों को पुरस्कृत भी करती थीं। अब इसका स्कूल का नाम राजेन्द्र प्रासद केन्द्रीय विद्लाय है। हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। राजवंशी देवी इस दिन पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के साथ रहा करती थीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद 1 फरवरी, 1950 को राष्ट्रपति भवन में सपरिवार रहना शुरू कर दिया था। 26 जनवरी, 1950 से इसे राष्ट्रपति भवन कहा ही जाने लगा। इसी उपलक्ष्य में यहां हर वर्ष 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्पति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के बीच खेल कूद प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। इनके विजेताओं को राष्ट्रपति पुरस्कृत करते हैं।राजवंशी देवी ने कभी राष्ट्रपति भवन के स्टाफ को यह महसूस नहीं होने दिया था कि वे देश के राष्ट्रपति की पत्नी हैं।

राष्ट्रपति भवन में भारत के पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटब़ॉल खिलाड़ी अनादि बरूआ का परिवार करीब चालीस साल रहा। उनके पिता राष्ट्रपति भवन में काम करते थे। वे बताते हैं कि राजवंशी देवी कभी-कभी खुद अपनी पौत्रियों को राजा बाजार (कनॉट प्लेस) के ऱघुमल कन्या विद्लाय में सुबह छोड़ने जाती थीं। ईद पर राष्ट्रपति भवन मस्जिद में उत्सव का माहौल होता है। राष्ट्रपति की ओर से सभी कर्मचारियों को मिठाई बांटी जाती है। राष्ट्रपति भवन मस्जिद के इमाम के लिए अपने परिवार के साथ यहाँ रहने का भी प्रावधान है। हालाँकि, सुरक्षा कारणों से उनके विवाहित बच्चों को यहाँ रहने की अनुमति नहीं है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पहल पर ही राष्ट्रपति भवन परिसर के भीतर एक मंदिर और एक मस्जिद दोनों का निर्माण किया गया था। कुछ जानकार कहते हैं कि उन्होंने  अपनी पत्नी राजवंशी देवी की सलाह पर इस तरह का कदम उठाया था। चूंकि राष्ट्रपति भवन के ठीक बाहर चर्च और गुरुद्वारा पहले से ही मौजूद हैं, इसलिए शायद उन्हें बनाने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस की गई हो।  सहज, सरल, धैर्यवान और अत्यंत त्यागमयी – यही राजवंशी देवी का व्यक्तित्व था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा आत्मकथा (प्रथम प्रकाशन 1946, बाद में राजपाल एंड सन्ज़ से पूर्ण संस्करण 2013-14 में) में अपनी पत्नी श्रीमती राजवंशी देवी के बारे में  अत्यंत भावपूर्ण और सम्मानपूर्ण ढंग से उल्लेख किया है। उनकी आत्मकथा में निजी जीवन का वर्णन बहुत कम है, क्योंकि उन्होंने इसे जानबूझकर सार्वजनिक जीवन और स्वाधीनता संग्राम पर केंद्रित रखा था। फिर भी जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह उनकी पत्नी के प्रति गहन कृतज्ञता और आदर को दर्शाता है।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद लिखते हैं कि उनका विवाह बहुत कम उम्र में (लगभग 13 वर्ष की आयु में, सन् 1897 में) हो गया था।मेरा विवाह बहुत छोटी अवस्था में हो गया था। मेरी पत्नी का नाम राजवंशी देवी था। वे मेरी माँ के समान थीं।

स्वाधीनता आंदोलन में जेल जाने पर उन्होंने अपनी पत्नी के धैर्य और त्याग की प्रशंसा की है।जब मैं जेल जाता था, घर की सारी जिम्मेदारी मेरी पत्नी पर होती थी। वे कभी शिकायत नहीं करती थीं। बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, घर चलाना, गाँव की देखभाल – सब कुछ वे अकेले संभालती थीं। मैं जब बाहर निकलता तो देखता कि सब कुछ व्यवस्थित है। उनके त्याग और सहनशीलता का मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

राजवंशी देवी का देहांत 9 सितंबर 1962 को हुआ।  डॉ.  राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा:मेरी जीवन-संगिनी मेरे से पहले चली गई। सारा जीवन उन्होंने मेरे लिए समर्पित कर दिया। मैं अकेला रह गया।

राजवंशी देवी की मृत्यु के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद पूरी तरह टूट गए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन छोड़कर पटना में सादा जीवन बिताया और 28 फरवरी 1963 को उनका भी देहांत हो गया। दोनों का अंतिम संस्कार पटना के गांधी घाट पर हुआ।

राजवंशी देवी उस दौर की उन अनगिनत भारतीय महिलाओं की प्रतीक हैं जिन्होंने बिना कोई नाम या पुरस्कार लिए अपने पति के बड़े सपनों को साकार करने में अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। वे कभी अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बनीं, न कोई भाषण दिया, पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्ति के पीछे उनकी त्यागमयी छवि ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति-दंपति की गरिमा को और ऊँचा करती है। आज जब हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति को याद करते हैं, तो उनके साथ राजवंशी देवी का मौन लेकिन अटूट सहयोग भी स्वतः ही याद आता है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सिमटते गांव चिंता का विषय

बसंत कुमार

पहले यह कहा जाता था कि भारत देश गांवों में बसता है और यदि हम भारत देश की संस्कृति और परम्परा को जानना चहते हैं तो गांवों में जाकर देखें पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं और गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। आज के चार दशक पहले तक गांवों में गन्ना की बुवाई से लेकर छप्पर उठाने तक के कार्य बिना मजदूरी दिए सहकारिता के आधार पर हो जाते थे पर जब से लोगों का शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है तब से गांव में आदमी न मिलने के कारण गन्ना बोना और छप्पर बनाना ही छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 81% आबादी अब शहरों में रहने लगी है और केवल 19% आबादी विशुद्ध रूप से गांवों में बची है।

यह आंकड़ा इस कारण भी चौंकाने वाला इसलिए है कि वर्ष 2018 यानि सात वर्ष पूर्व यह आंकड़ा मात्र 55% था, यूएस की वर्ल्ड आर्गोनाइजेशन प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल शहरी आबादी में से 45% लोग बड़े शहरों में रहते हैं और 36% आबादी कस्बों में रहती है। इस पलायन और विकास के कारण गांवों में मात्र 19% लोग रह गए हैं। अनुमान है कि 2050 तक 83% लोग शहरों में पहुंच जाएंगे। शहरीकरण की यह रफ्तार दर्शाती है कि लोग गांवों की मेहनतकश जिन्दगी को छोड़कर शहरों की आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं जहां शारीरिक श्रम कम से कम हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियां की वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने इस बीमारी को और बढ़ा दिया है। जहां युवा प्रातः उठकर तैयार होकर 5-10 किलोमीटर की दूरी तय करके अपने कार्य स्थल पर जाते थे पर अब तो वर्क फ्रॉम होम कल्चर ने सुबह उठना तैयार होना सब कुछ बंद कर दिया है। युवाओं की सारी दिनचर्या एक कमरे में कम्प्यूटर के सामने कैद होकर बन्द हो गई है। आर्थिक सुधार युग के पहले यानि 1970 और 1980 के दशक की गांवों की जिंदगी पर निगाह डाले तो पता लगता है कि इस शहरीकरण से जहां हमने सुख-सुविधा के नाम पर बहुत कुछ पाया है वहीं स्वास्थ पर्यावरण और सामाजिकता के मामले में हमने खोया बहुत है, जहां गाय-बैल और अन्य पालतू जानवर हमारे लिए पूंजी होते थे आज मशीन पर आधारित खेती शुरू हो जाने के कारण ये हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। इनके खुला लावारिश घूमने के कारण अब किसान खरीफ और जायद कि फसलें बोना छोड़ चुके हैं और खेती के नाम पर गेहूं और धान की फसल बो रहे हैं और राज्य सरकारों को गौशाला के रखरखाव पर बहुत मोटा फंड देना पड़ रहा है। जो पैसा देश के विकास के लिए लगना चाहिए़ था वो इन चीजों पर लग रहा है।

यदि हम आज के चालीस पचास के गांवों की जिन्दगी देखें तो वहां कृषि स्वाबलंबन पर होती थी। कृषि का मुख्य आधार पशु और श्रम होते थे यदि घर में कोई चीज घट जाए तो बाज़ार भागने के बजाय पड़ोस से मांगकर काम चला लिए जाता था। यद्यपि उस समय माचिस प्रयोग में आ गई थी उसका प्रयोग मन्दिर में दिया जलाने में होने लगा था पर घर का चूल्हे जलाने के लिए बोरसी में 24 घंटे सुलगती आग को ही शुभ माना जाता था और शाम के समय महिलाओं का पड़ोस के घर आग मांगने जाना आम दिन का कार्य होता था। उस बहाने वे 10-15 मिनट बैठकर सारा हाल चाल जान लेती थी और पड़ोस में क्या हो रहा है यह सब पता कर लेती थी। शाम को सारे बड़े लोग एक घर पर अलाव के पास बैठकर रामायण महाभारत के कथानकों के संबंधित कहानियां सुनाया करते और बच्चों का काम बुजुर्गों के लिए तम्बाकू की चिलम भरना होता था उसके बदले में उन्हें किस्से और कहानियां सुनने को मिल जाती थी। आज की तरह मैरिज ब्यूरो नहीं होते थे। लोगों को लड़की-लड़कों की शादी के लिए खोज उनके अलावा या गांव की चौपाल पर पूरी हो जाती थी। अगर गांव में किसी की लड़की की शादी होती थी तो बर्तन और चरपाई के लिए टेंट हाउस के चक्कर लगाने के बजाय गांव में ही आपसी सहयोग से हो जाता था। बारात की स्वागत से लेकर बिदाई तक गांव के युवा एक पैर पर खड़े रहते थे पर आज ये चीजें नदारत हो गई है। आज गांव में भी शहरों की ओर भागने की लालसा ने ये सब छीन लिया है, सामाजिकता का स्थान घर-घर फैले मोबाइल ने छीन लिया है। आज सभी युवा और बड़े शाम होते ही या तो शराब के ठेकों पर मिलते हैं या फिर घरों में कैद होकर मोबाइल पर आंखे गड़ाए रहते हैं। आस-पड़ोस में क्या हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

जब बोर्ड के दसवीं कक्षा के परिणाम आते थे तो गांवों में एक उत्सव का माहौल होता था जब रिजल्ट अखबार में आ जाता था तो कस्बे में रहने वाले अखबार वाले के पास रिजल्ट देखने की लाइन लगाती थी और जो पास हुए वे अड़ोस पड़ोस में लड्डू या बताशे जरूर बांटता था। गांव की अशिक्षित महिलाओं को भी पता लग जाते था कि फलां का बेटा 10वीं पास हो गया है पर आज-कल की चकाचौंध की दुनिया में लोग अपने घर के बच्चों के बारे में भूल जाते हैं कि किस कक्षा में है। बस बच्चों को जुगाड़ लगाकर अच्छे स्कूल में पढ़ा दिया और ट्यूशन लगा दिया जिम्मेदारी खत्म। गांव में किसी के यहां कोई मेहमान आ जाता था तो अड़ोस-पड़ोस इस बात का ध्यान रखते थे कि मेहमान अकेले ही बैठा है पर आज कल यह सामाजिकता गायब है।

आखिर क्या कारण है कि लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं इसका आत्मावलोकन आवश्यक है। आर्थिक सुधार युग और मशीनीकरण के कारण गांवों में परम्परागत रोजगार समाप्त हो गए हैं। आधुनिक मशीनों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले दोना पत्तल, मिट्टी के बर्तन, कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले हल, फावड़ा, कुदाल सभी का उपयोग समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव में बसने वाले लोहार, कोहार, बढ़ई, सुनार, मुसहर, डोम धीमर सभी बेरोजगार हो गए तो उनके लिए शहरों में भागकर लेबर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्पों नहीं बचा था। यद्यपि महानगरों में उनकी जिंदगी नर्क से बेहतर नहीं है। एक-एक कमरे में 10-10 लोगों का रहना। पानी के लिए और नित्य कर्म के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना और 10-12 घंटे की ड्यूटी करना पड़ता है फिर भी वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते। इसके अतिरिक्त गांवों में व्याप्त जाति वादी मानसिकता और ऊंच-नीच का भाव भी गांवों से पलायन का कारण है। दलित व उपेक्षित समाज के पढ़े-लिखे युवा गांव की सड़ी गली जाति वादी मानसिकता से पीछा छुड़ाने के लिए शहरों में जाकर अपनी जाति छुपाकर काम करते हैं और इज्जत के साथ गुजर-बसर करते हैं। महानगरों में उनका दलित या पिछड़ा होना उन्हें तंग नहीं करता पर ज्यों वे साल दो साल बाद गांव जाते हैं तो स्टेशन से उतरते ही उनकी जाति उनके पीछे चिपक जाती है और वे गांव वापस जाने के बजाय शहर की नरकीय जिंदगी में वापस चले जाते हैं। यह ऐसी समस्या है जिसके विषय में सरकार और समाज को सोचना होगा।

यदि सरकार शहरों में इस तरह की बढ़ती हुई भीड़ को रोकने का प्रयास नहीं करेगी तो निकट भविष्य में महानगरों सहित अन्य शहर रहने लायक नहीं रह पाएंगे और ये गैस चैंबर के रूप में बदल जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि गावों में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसी चीजें उपलब्ध कराई जाएं। गांवों में महिलाओं की स्वास्थ्य-चिकित्सा एक बड़ी समस्या है, इसके अलावा गांवों में रोजगार की समस्या भी है, सरकार ने गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया पर उसमें भी अभी वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है क्योंकि एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहा है पर भारत में मंडल और कमंडल की राजनीति के चक्कर में युवाओं के रोजगार का मामला गौड़ हो गया है और हर राजनीतिक दल को पार्टी लाइन से हटकर इस समस्या के विषय में सोचना चाहिए।

यदि इस प्रकार से शहरों की ओर पलायन को नहीं रोका गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहां वायु गुणवत्ता (AQI) 300 से 450 तक पहुंच गया है, जहां लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष करते हैं वहीं प्रशासन को एक्यूआई स्तर को नीचे लाने के लिए सुबह शाम गाड़ियों से पानी का छिड़काव करना पड़ रहा है और लोग सांस संबंधित बीमारियों के कारण बड़ी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। अब सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रयास करना होगा कि लोग गांवों की ओर वापस जाएं विशेषकर काम धंधे से रिटायर होने के बाद शहरों में बोझ बनकर जीने के बजाय अपनी मांटी में वापस जाएं और सम्मानपूर्वक अपना बचा खुचा जीवन बिताएं।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

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