शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

पहलगाम हमले से सन्न देश

अवधेश कुमार

निस्संदेह , पहलगाम के बायसरन घाटी हमले पर पूरा देश क्षुब्ध हैं। चुन-चुनकर 26 निहत्थे हिन्दू पर्यटकों की हत्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के अंदर जम्मू कश्मीर के स्पष्ट दिख रहे परिवर्तित हालात की दृष्टि से असामान्य और सन्न करने वाली घटना है। सन 2000 के बाद पहलगाम क्षेत्र का यह सबसे बड़ा हमला है जिसमें 30 लोग मारे गए थे। पहलगाम जम्मू कश्मीर का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है और वहां से लगभग 10 किलोमीटर दूर बायसरन घाटी में पर्यटक पिकनिक मनाने आनंद लेने जाते हैं। हरियाली और पूरा वातावरण गर्मी में जम्मू कश्मीर जाने वाले पर्यटकों को खींचता है। कहने वाले इसे स्विट्जरलैंड का प्रतिरूप भी बताते हैं। लोग घुड़सवारियों से लेकर अलग-अलग किस्म का आनंद लेते हैं।  ट्रैकिंग का एक कैंप साइड है जो तोलिया झील तक पर्यटकों को ले जाता है। पहलगाम से टट्टुओं के जरिए इस क्षेत्र तक पहुंचा जा सकता है और रास्ते में पहलगाम शहर और लीडर घाटी का मनोरम दृश्य है। वायसरन नमक घास का मैदान चारों ओर घने देवदार के जंगलों और पर्वतों से घिरा है। चूंकि जम्मू कश्मीर की स्थिति पिछले 5-6 वर्षों में काफी हद तक सामान्य हो गई है इसलिए भारी संख्या में लोग अपने परिवार के साथ निर्भय होकर चारों ओर घूमते हैं। स्थानीय लोगों की दुकानें और अन्य कारोबार चल निकले हैं। यह घटना भी एक सामान्य चाय नाश्ते की दुकान पर हुई। इस तरह की दुकानें कश्मीर घाटी से नदारत हो गए थे। आतंकवादियों के लिए ऐसी जगह अंधाधुंध गोलीबारी कठिन नहीं है। घटना का विवरण और इसकी पृष्ठभूमि हमें कई बातों पर विचार करने के लिए बाध्य करता है। आखिर यह कौन सी सोच है जिसमें आतंकवादियों ने मजहब प्रमाणित करके लोगों को मारा?

प्रधानमंत्री मोदी ने घटना को इतनी गंभीरता से लिया कि सऊदी अरब की यात्रा बीच में रोक वापस लौटे, विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ बैठक की तथा गृहमंत्री अमित शाह सीधे कश्मीर पहुंचे। इसके साथ गृह मंत्री शाह का घटनास्थल तक जाना आतंकवाद के विरुद्ध ही नहीं जम्मू कश्मीर को हर दृष्टि से सामान्य, शांत और समृद्ध बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को प्रमाणित करता है। ऐसी भूमिका से लोगों को सुरक्षा का आश्वासन मिलता है तथा आतंकवादियों एवं उनको प्रायोजित करने वाली शक्तियों को सख्त संदेश। चूंकि यह घटना अमरनाथ यात्री निवास नुनवान बेस कैंप से महज 15 किमी. दूर हुआ और 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है तो यह मानने में भी समस्या नहीं है कि पर्यटकों के साथ तीर्थयात्रियों के अंदर भय पैदा करने के लिए हमला हुआ। इसके साथ अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की यात्रा तथा प्रधानमंत्री की सऊदी अरब जैसे प्रमुख मुस्लिम देश के दौरे से भी इसका संबंध जोड़ा जा सकता है।

आतंकवादी संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (टीआरएफ) ने हमले की जिम्मेदारी ली है। इसके बारे में जानकारी यही है कि जब पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने और नियंत्रित करने का दबाव बढ़ा तो लश्कर ए तैयबा और अन्य संगठनों ने टीआरएफ नाम कर लिया। इसका प्रमुख शेख सज्जाद गुल पाकिस्तान में है। प्रधानमंत्री सऊदी अरब से लौटते समय पाकिस्तानी वायु मार्ग का इस्तेमाल नहीं करते तथा साढ़े पांच घंटे लगाकर भारत आते हैं तो इसके निहितार्थ भी स्पष्ट हैं। सरकार को पाकिस्तान की भूमिका की सटीक सूचना नहीं होती तो ऐसा नहीं होता। जो जानकारी है उसके अनुसार आतंकवादी पाकिस्तान से निर्देश ले रहे थे। आंतरिक संकटों से ग्रस्त पाकिस्तान और छवि सुधारने के लिए संघर्षरत सेना-आईएसआई के पास एकमात्र रास्ता जम्मू कश्मीर ही बचता है। जिस तरह सेना का उपहास उड़ाया जा रहा है, लोग सेना के विरुद्ध सड़कों पर उतरे हैं, उसके भ्रष्टाचार और विफलता के विवरण मीडिया, सोशल मीडिया में सामने आए हैं उनसे सेना की चिंताएं बढ़ीं हुईं हैं। सेना प्रमुख जनरल आसिफ मुनीर का घृणाजनक और मुस्लिमों को भड़काने वाला भाषण इसी कड़ी का अंग था। 

वस्तुत: जनरल मुनीर ने नए सिरे से इस्लामी जेहाद की बात की। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते क्योंकि हम दो अलग कौम हैं। हमने पाकिस्तान के निर्माण के लिए लंबा संघर्ष किया है इसे मत भूलना। हालांकि सच यह है कि मुस्लिम लीग को पाकिस्तान निर्माण के लिए कोई आंदोलन नहीं करना पड़ा। उन्होंने जम्मू कश्मीर की चर्चा की। यह संकेत था कि सेना ने जम्मू कश्मीर में हिंसा करने की कुछ दीर्घकालीन तैयारियां की है। पाकिस्तान की आम जनता के विद्रोह से बचने के लिए यही एकमात्र रास्ता उनके पास बचा था। देश में जब भी आतंकवाद के संदर्भ में पाकिस्तान का नाम लिया जाता है कुछ लोग इसके विरुद्ध खड़े होते हैं और कहते हैं कि आर्थिक दृष्टि से विपन्न देश भारत के विरुद्ध हिंसा कैसे कर देगा। भूल जाते हैं कि हिंसा करने के लिए शक्तिशाली होना आवश्यक नहीं है। जम्मू कश्मीर में इस्लाम के नाम पर भड़काना और पहले से व्याप्त आतंकवादियों के इंफ्रास्ट्रक्चर को केवल सक्रिय करना है। जनरल मुनीर ने यही किया है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ दिनों पहले रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो भी शेयर हो रहा है, जिसमें एक आतंकवादी जनसभा में खुलेआम भारत को लहूलुहान करने की धमकी दे रहा है। 

इनकी सोच और रणनीति देखिये। घायल पुणे की आसाबरी जगदाले बता रहीं हैं कि आतंकवादी आए तो उनका परिवार डर से टेंट के अंदर छिपा था। उन्होंने उनके 54 वर्षीय पिता संतोष जगदाले से कहा कि वे बाहर आकर कलमा पढ़ें और जब वे ऐसा नहीं कर पाए, तो उन्हें तीन बार गोली मारी। उनके चाचा को भी गोली मारी। एक महिला बता रही है कि मैं और मेरे पति भेल खा रहे थे तभी आतंकी आये और बोले कि ये मुस्लिम नहीं लग रहे, इन्हें मार दो और मेरे पति को गोली मार दी। वे मुस्लिम हैं या हिंदू यह जानने के लिए लोगों को नंगा किया गया। जम्मू कश्मीर में आतंकवाद एवं अलगाववाद के पीछे सोच इसे इस्लामी राज्य में बदलना रहा है। इस्लाम के नाम पर ही आतंकवादी वहां अपनी जान देकर हमले करते रहे हैं। जनरल आसिफ मुनीर ने केवल इसे सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त कर दिया। सेना प्रमुख के बयान का अर्थ है कि लंबे समय से इस पर काम किया जा रहा था। आतंकवादियों की योजना यही है कि वह कश्मीर के स्थानीय मुस्लिम निवासियों को संदेश दें कि हम मुसलमान होकर आपके हैं और गैर मुसलमान हमारे साझा दुश्मन हैं।

 हालांकि आतंकवादी संगठन, अलगाववादी तथा पाकिस्तान भूल रहा है कि भारत, जम्मू कश्मीर और वैश्विक अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां भी बदली हुई है। जम्मू कश्मीर के स्थानीय लोगों को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद बदली स्थिति का लाभ मिला है। वे खुलकर हवा में सांस लेने लगे हैं, बच्चे पढ़ने लगे हैं, खेलकूद व सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग ले रहे हैं और सबसे बढ़कर विकास उनके घर तक पहुंच रहा है। पहले की तरह वहां आतंकवादियों से मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्रदर्शन, पत्थरबाजी और नारा नहीं लगता। यह तो नहीं कह सकते कि आतंकवादियों का स्थानीय समर्थन बिल्कुल खत्म हो गया है क्योंकि ऐसा होने के बाद उनका वहां रहना मुश्किल हो जाता। सारे अनुभव, लोगों की प्रतिक्रियायें एवं खुफिया जानकारियां बतातीं हैं कि स्थिति पहले की तरह तो नहीं है। पुराने मंदिर एवं अन्य गैर मुस्लिम धर्मस्थल धीरे-धीरे खुले हैं। कभी पाकिस्तान को अमेरिका या कुछ यूरोपीय देशों की अंतरराष्ट्रीय नीति के कारण शह मिल जाता था किंतु अब वह अकेला है। अफगानिस्तान तक उसके विरुद्ध खड़ा है तथा अंदर बलूचिस्तान , सिंध,  वजीरिस्तान आदि में विद्रोह का झंडा बुलंद है। ज्यादातर प्रमुख मुस्लिम देश भी पाकिस्तान का साथ देने को तैयार नहीं। भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछले 10 वर्षों में काफी बदली है और दो बार सीमा पार कार्रवाई करके प्रदर्शित भी किया गया है कि हम प्रायोजित आतंकवाद का मुंह तोड़ जवाब देने वाले देश बन चुके हैं। अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश ही नहीं कई मुस्लिम देशों ने इस घटना में भारत के साथ होने का बयान दिया है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी अगर दोषियों को बख्शे नहीं जाने की बात कर रहे हैं और अमित शाह मोर्चा संभाले हैं तो आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के लिए अब तक का सबसे बुरा समय होगा। देश के अंदर भी मोदी सरकार को बार-बार इस्लाम विरोधी और मुसलमान विरोधी बताने वाले समझें कि वे क्या कर रहे हैं। आतंकवादियों ने पुरुषों को मारकर महिलाओं को छोड़ते हुए कहा कि जाओ मोदी को बता दो क्योंकि वह हमारे मजहब का दुश्मन है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली -110092, मोबाइल -981027208


गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

क्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश के राष्ट्रपति को आदेश देना उचित है?

बसंत कुमार

अभी हाल ही में अपने एक निर्णय में इस अध्यादेशों को मंजूरी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को समय-सीमा के अंदर करने और संविधान के अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल करने पर विवाद गहरा गया है। भारत के एक सांसद निशिकांत दुबे ने अपने बयान से इस विवाद को और अधीक गहरा दिया है उन्होंने कहा कि यदि कानून बनाना सर्वोच्च न्यायालय का काम है तो संसद को बंद कर दिया जाना चाहिए। दर असल देश के उपराष्ट्रपति जो जाने माने वकीलों भी रहे हैं श्री जगदीप धनखड़ ने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारों पर सवाल उठाए, जिसके बाद भाजपा के दो सांसदों निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा की तीखे प्रतिक्रिया आई। इसके बाद इन बयाने पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट कपिल सिब्बल, पूर्व प्रेसिडेंट दुष्यन्त दवे और पूर्व जस्टिस जे चेलमेश्वर की प्रतिक्रिया से इस मामले में तल्खी और बढ़ गई है आखिर इस विवाद की शुरुआत कैसे हुई।

सर्वोच्च अधिकारी ने 8 अप्रैल 2025 को एक ऐहितासिक फैसले से राज्यपाल के राज्यविधान मण्डल द्वारा पारित विधायकों पर कार्यवाही करने के लिए समय-सीमा निर्धारित कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के लिए भी उन विधेयकों पर समय-सीमा निर्धारित कर दी जिन्हें राजयपाल ने राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए निर्धारित किया हो। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन पर सुनवाई के दौरान सरकार से सीधे सवाल किए। इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट को लेकर अप राष्ट्रपति और अन्य नेताओं ने भी विवादित टिप्पणी की जिससे इस मामले में विवाद काफी गहरा हो गया। राज्यसभा इंटर्नस को संबोधित करते हुए उप राष्ट्रपति ने न्याय पालिका द्वारा राष्ट्रपति के निर्णय लेने के लिए समय-सीमा तय किए जाने पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा की सुप्रीम कोर्ट लोकतांत्रिक ताकतों पर परमाणु मिसाइल नहीं दाग सकता। उनका कहना था कि संविधान के तहत के कोर्ट के पास एक मात्र अधिकार है कि अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करने का। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और संसद के प्रति जवाबदेह होती हैं और सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के कोई आदेश नहीं दे सकता।

हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है और यह राजनीतिक विचारक मोंटस्क्यू के शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करता है और संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों का अपना अपना रोल होता है। तीनों एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते, हां न्यायपालिका कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा कर सकती है। अगर कोई कानून संविधान के दायरे में नहीं है और किसी के मौलिक अधिकारों का हनन करना है तो न्यायपालिका उसे निरस्त कर देता है। केशवानंद भारतीय केस में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन वह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर से छेड़छाड़ नहीं कर सकते।

प्रश्न यह है कि सर्वोच्च न्यायालय संसद द्वारा बनाए गए नियमों की समीक्षा तो कर सकता तो है पर क्या वह देश के संवैधानिक हेड यानि राष्ट्रपति को अपनी शक्ति के उपयोगी के लिए समय-सीमा का निर्देश दे सकता है। राष्ट्रपति को अपनी शक्तियों की गाइडलाइंस संविधान के अंदर ही निहित है उसे किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्देश नहीं दिया जा सकता। संसद द्वारा पारित विधेयक जब राष्ट्रपति की मंजूरी ले लेता है तो वह कानून बन जाता है परंतु यह भी प्राविधान है कि यदि राष्ट्रपति चाहे तो संसद द्वारा पारित विधेयक को संसद को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है पर यदि यह बिल संसद में पुनर्विचार के पश्चात फिर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया जाता है तो तो महामहिम को इस बिल पर हस्ताक्षर ही करने होते हैं। कहने का मतलब यह है कि राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख होता है और उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली शक्तियों के उपयोग भी संविधान के अंदर ही होता है और अन्य संस्था द्वारा निर्देश दिए जाएंगे तो देश में संसदीय लोकतंत्र का ढांचा ही बिगड़ जाएगा।

जहां तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के लिए संसद द्वारा पारित विधेयक को अपनी मंजूरी देने की समय-सीमा का निर्देश देने का प्रश्न है तो सर्वोच्च न्यायालय को अपने आधीन न्यायालयों का केसों का निपटाने का निर्देश दे। देश की अदालतों में करोड़ों केस दशकों से लम्बित पड़े हैं और यदि कोई व्यक्ति ट्रायल कोर्ट द्वारा किसी आपराधिक मामले में दोषी करार दिया जाता है तो उसकी अपील का निस्तारण हाई कोर्ट द्वारा बीस साल तक नहीं हो पाया और अपील कर्ता कनविक्ट का ठप्पा लगाए इस दुनिया से बिदा हो जाता है देश के अधिकांश अपील आम अपील कर्ता के लिए बेमानी होती है क्योंकि वह महंगे वकील की फीस दे नहीं सकता जो मेंशन करके उसको अपील लगवा सके। यदि संसद कानून बनाकर इन अपीलों का निस्तारण करने की समय-सीमा तय कर दे तो क्या न्याय पालिका इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं मानेगी। जब संसद ने न्यायपालिका में जज की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने के लिए एन जे ए सी बनाने के लिए कानून बनाया तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप माना और इसे स्टे कर दिया, इसलिए देश में संसदीय लोक तंत्र सुचारू रूप से चले यह सुनिश्चित करने के लिए कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका को अपने अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर चलना होगा।

कुछ वर्ष पूर्व एक हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर बीस जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की बात की इसे सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की अवमानना माना और उन्हें 6 माह को जेल कर दी। वहीं एक हाईकोर्ट के जज जस्टिस वर्मा के घर से करोड़ों रुपए का काला धन मिला पर इस मामले में एक एफआईआर तक भी हुई और जस्टिस वर्मा को सिर्फ ट्रांसफर कर दिया गया। देश की न्यायपालिका पर लोग अटूट आस्था रखते है और यह बरकरार रहनी चाहिए।

यह सही है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं संसद (विधायिका) तीनों ही अपने अपने क्षेत्रों में सुप्रीम है पर भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति को आदेश देकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्रों को लांघने का काम किया है। सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का आत्मावलोकन करना होगा कि देश के विभिन्न न्यायलयों में करोड़ों केस कई दशकों से पेंडिंग पड़े हैं और न्याय की आस लगाए लोगों कि पीढ़ियां गुजर जाती है इस कारण हमारे लोक तंत्र के सभी स्तंभों को अपनी अपनी सीमा में रहकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

धर्म के नाम पर हिंसा नहीं सहेंगे: सैयद जैनुल आबेदीन, अजमेर शरीफ प्रमुख

अजमेर, (एजेंसी)। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। इस हमले को लेकर अजमेर शरीफ दरगाह के प्रमुख सैयद जैनुल आबेदीन की भी प्रतिक्रिया सामने आई है. न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए बयान में उन्होंने भी इस आतंकी हमले की तीखी आलोचना की है. उन्होंने कहा, “इस कायराना हरकत की इस्लाम में कोई जगह नहीं है. हमारे मजहब की जो तालीम है, शिक्षा है, उसके अनुसार अगर एक भी मासूम का कत्ल किया जाता है, तो वह इंसानियत का अपमान है. इस तरह की घटनाओं से धर्म और इस्लाम बदनाम होते हैं, जबकि इस्लाम ऐसी हिंसा सिखाता ही नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, “हमारे पूर्वजों ने कभी ये नहीं सिखाया. बेगुनाहों का जो खून बहा दे, वो मेरी नजर में मुसलमान कहलाने लायक नहीं है. कौन सा मजहब सिखाता है कि धर्म पूछ कर उसके ऊपर गोलियां चलाओगे? कम से कम ऊपरवाले के कहर से डरो. मासूमों की जान लेना पाप है. जो भी इस तरह की कायराना हरकत करता है, वो मुसलमान कहलाने लायक नहीं है."

मजहब के नाम पर बेगुनाहों का कत्ल करना एक ऐसा जुर्म है जो माफ करने लायक नहीं : सैयद अहमद बुखारी , शाही इमाम दिल्ली जामा मस्जिद

नई दिल्ली, (एजेंसी)। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है. इस हमले को लेकर दिल्ली जामा मस्जिद के का बयान सामने आया है. उन्होंने हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि 'पहलगाम में बेगुनाह लोगों की हत्या ने हमारी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. पूरा देश इस जघन्य वारदात की एक स्वर में निंदा करता है।'
शाही इमाम ने कहा, "मजहब के नाम पर बेगुनाहों का कत्ल करना एक ऐसा जुर्म है जो माफ करने लायक नहीं है। उन्होंने इसे ‘नाकाबिल-ए-माफी जुर्म’ करार देते हुए कहा कि ऐसे दरिंदों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। इमाम बुखारी ने हमले में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और कहा, “मैं उनके गम में उनके साथ खड़ा हूं।"
अहमद बुखारी ने ये भी कहा कि आगे आने वाले जुमे को इस हवाले से जामा मस्जिद से ऐलान भी करूंगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि मजहब के नाम पर की गई ऐसी हिंसा न केवल धर्म का अपमान है, बल्कि इंसानियत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध है।

मजदूर का बेटा शकील बना आईपीएस, यूपीएससी में हासिल की 506वीं रैंक, परिवार में जश्न का माहौल

असलम अल्वी 

शाहजहांपुर। हौसले बुलंद हो तो सपने भी सच हो जाते हैं। ऐसी ही कहानी शाहजहांपुर के तिलहर कस्बा के इमली मोहल्ले निवासी शकील अहमद की है, जिनके पिता कभी अपने बच्चों को पालने के लिए मजदूरी करते थे। आज बेटे ने आईपीएस बनकर बुलंदी के शिखर को छुआ है। शकील ने यूपीएससी में 506 रैंक हासिल की है। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने मंगलवार को सिविल सेवा परीक्षा 2024 का अंतिम परिणाम घोषित किया तो शकील के परिवार में जश्न का माहौल हो गया। 

तिलहर के मोहल्ला इमली निवासी हाजी तसव्वुर हुसैन मंसूरी के बेटे शकील मंसूरी का यूपीएससी में चयन होने पर घर में खुशी का माहौल है। शकील की इस उपलब्धि ने परिवार और नगर को गौरवान्वित किया है। हाजी तसव्वुर हुसैन ने बताया कि उनके छह बेटों में शकील सबसे छोटे हैं। 

शकील की मेहनत रंग लाई है। यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन का रिजल्ट आने पर जैसे ही परिवार में खबर आई कि उनके बेटे ने 506 रैंक हासिल की है। घर ही नहीं इमली मोहल्ले और मंसूरी समाज में खुशी की लहर दौड़ गई। तमाम लोगों ने उनके घर जाकर बेटे शकील मंसूरी की इस उपलब्धि पर खुशी का इजहार किया। वहीं हाजी तसव्वुर हुसैन व उनके बेटे कदीर मंसूरी, सगीर मंसूरी आदि ने आने वालों का मुंह मीठा कराया।

हाजी तसब्बर हुसैन के छह बेटे और तीन बेटियां हैं। बड़ा परिवार होने के चलते तसब्बर कभी पोटरगंज मंडी में पल्लेदारी किया करते थे। धीरे-धीरे बेटे बड़े हुए और परिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। परिवार बैटरी का कारोबार करता है। 

शकील के भाई सगीर ने बताया कि पूरे परिवार का सपना था कि उन लोगों में से कोई एक पढ़-लिखकर बड़ा मुकाम हासिल करे। सभी भाई-बहन ने पढ़ाई तो की लेकिन सबसे होशियार शकील ही था। इसी वजह से उसकी पढ़ाई कराने में सभी ने ताकत लगा दी। 

कक्षा आठ तक की पढ़ाई शकील ने तिलहर के कैंब्रिज स्कूल से की। इसके बाद नौंवी और दसवीं की पढ़ाई शाहजहांपुर के तक्षशिला पब्लिक स्कूल से की। अलीगढ़ में रहकर 12वीं की परीक्षा पास की। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई करने के बाद शकील दिल्ली चले गए। 

शकील ने जामिया कैंपस में रहकर यूपीएससी की तैयारी करने लगे। शकील को चौथे प्रयास में सफलता मिली है। दो बार मेंस और एक बार इंटरव्यू में फेल होने के बावजूद शकील ने हार नहीं मानी। चौथे प्रयास में उन्हें आईपीएस बनने में सफलता मिली है। 

शकील ने दिल्ली से जब फोन पर परिवार को बताया कि वह आईपीएस बन गए हैं तो परिजनों की आंखों में आंसू छलक आए। जैसे ही जानकारी लोगों को हुई तो परिवार को बधाई देने वालों को तांता लग गया। सगीर ने बताया कि शकील हमेशा से देश की सेवा करना चाहता था। आज उसका सपना सच हुआ है।

शकील अहमद, जो उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से हैं, ने इस साल 506वीं रैंक प्राप्त की वहीं  है. वह 2021 से जामिया के आरसीए में तैयारी कर रहे थे. शकील ने इस सफलता को साझा करते हुए कहा कि यह मेरी कड़ी मेहनत और जामिया की उत्कृष्ट कोचिंग का नतीजा है. मैं इस सफलता को अपने परिवार और संस्थान को समर्पित करता हूं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ और कुलसचिव प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिजवी ने आरसीए के सभी चयनित छात्रों को बधाई दी। प्रो. आसिफ ने कहा कि यह सफलता हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि हम समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों को सशक्त बनाते हैं. विशेष रूप से हमारी महिला उम्मीदवारों ने असाधारण प्रदर्शन किया है।
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