गुरुवार, 6 मार्च 2025

मुनव्वर राना के लिखे वो 20 शेर जो ज़ुबान पर चढ़ गए

1. इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए

2. ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए

3. बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग

इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी

4. एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया

इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे

5. भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है

मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है

6. ताज़ा ग़ज़ल ज़रूरी है महफ़िल के वास्ते

सुनता नहीं है कोई दोबारा सुनी हुई

7. हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं

जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं

8. अँधेरे और उजाले की कहानी सिर्फ़ इतनी है

जहाँ महबूब रहता है वहीं महताब रहता है

9. कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा

तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा

10. किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

11. मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ

मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ

12. मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं

किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं

13. मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता

अब इस से ज़यादा मैं तेरा हो नहीं सकता

14. मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी

माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी

15. वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है

रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है

16. मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन

मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है

17. तेरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में

हमारा घर तेरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा

18. ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं

सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं

19. ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया

मैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया

20. उस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर

ये पेड़ सिर्फ़ बीच में आने से कट गया।

सुचारू रूप से संचालित हुई सीनियर सैकेण्डरी व डी.एल.एड. की परीक्षा, प्रदेशभर में नकल के 09 मामले दर्ज

संवाददाता

भिवानी। हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड के सचिव डॉ० मुनीश नागपाल, ह.प्र.से. ने आज यहाँ जारी एक प्रेस वक्तव्य में बताया कि प्रदेशभर में आयोजित करवाई गई सीनियर सैकेण्डरी (शैक्षिक) ललित कला व डी.एल.एड. विषय की परीक्षा नकल रहित सुव्यवस्थित ढ़ंग से संचालित हुई तथा प्रदेशभर में अनुचित साधन प्रयोग के कुल 09 केस बनाए गए। आज सीनियर सैकेण्डरी (शैक्षिक) ललित कला विषय की परीक्षा में 17,961 तथा डी.एल.एड. (रि-अपीयर/मर्सी चांस) की Contemporary Indian Society विषय की परीक्षा में 1,249 छात्र-अध्यापक प्रविष्ट हुए।

यह जानकारी देते हुए बोर्ड सचिव डॉ० मुनीश नागपाल ने बताया कि बोर्ड अध्यक्ष के उडऩदस्ते द्वारा जिला-हिसार के विभिन्न परीक्षा केन्द्रों का औचक निरीक्षण किया गया, जहां नकल का 01 मामला दर्ज किया गया।

बोर्ड सचिव के स्वयं के उडऩदस्ते द्वारा जिला-रोहतक के  विभिन्न परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण किया गया, जहां अनुचित साधन प्रयोग के 02 केस पकड़े। उन्होंने बताया कि नकल पर अकुंश लगाने के प्रदेश में गठित अन्य उडऩदस्तों द्वारा अनुचित साधन के 06 मामले दर्ज किए गए।

उन्होंने बताया कि कल संचालित होने वाली सैकेण्डरी (शैक्षिक/मुक्त विद्यालय) हिन्दी विषय की परीक्षा में 2,74,295 परीक्षार्थी तथा डी.एल.एड. (रि-अपीयर/मर्सी चांस) की Pedagogy of Hindi Language विषय की परीक्षा में 442 छात्र-अध्यापक प्रविष्ट होगें।

कांग्रेस द्वारा बसपा को भाजपा की बी टीम कहना कितना गलत

बसंत कुमार

इधर लगातार चुनाव हारती हुई कांग्रेस ने यह कहना शुरू कर दिया है कि बसपा चुनावों में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है और वह भाजपा की बी टीम के रूप में काम कर रही है। अभी हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में बेशक कांग्रेस को एक भी सीट न मिली हो पर पर उनके वोट शेयर में मामूली इजाफा होने के कारण उत्साहित कांग्रेस ने वर्ष 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में दलितों को जोड़ने की कवायत शुरू कर दी है और इसी को ध्यान में राहुल गांधी ने कह दिया कि वर्ष, 2024 के लोकसभा चुनाव में हम चाहते थे कि मायावती जी हमारे साथ मिलकर चुनाव लड़ें और यदि मायावती जी की पार्टी बसपा इंडिया गठबंधन का हिस्सा बन जाती तो चुनाव में भाजपा को हराया जा सकता था। उन्होंने कहा कांग्रेस, सपा और बसपा चुनाव में एक साथ आ जाते तो चुनाव का परिणाम कुछ और होता, कांग्रेस के इस कथन के जवाब में बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि जिन राज्यो में कांग्रेस की सरकार है वहां बसपा व उनके अनुयायियों के साथ द्वेषपूर्ण, जातिवादी रवैया अपनाया जाता है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य जहां कांग्रेस अपने अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है वहां बसपा के साथ गठबंधन करना कांग्रेस का दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है?

राहुल गांधी की परेशानी को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 के नतीजों से समझा जा सकता है, इन चुनावों में सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसका वोट शेयर 33.8% रहा और कांग्रेस 9.5% वोट शेयर के साथ 6 सीटें जीतने में कामयाब रही अर्थात दोनों दलों का वोट शेयर 43.3% रहा। बसपा ने कुल 79 सीटों पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के बराबर 9.5% वोट शेयर प्राप्त किये। यदि बसपा का वोट शेयर इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के साथ ट्रांसफर हो गया होता तो गठबंधन का वोट शेयर 52% के करीब हो गया होता और गठबंधन की सीटें और बढ़ गई होती। मायावती जी को लेकर राहुल गांधी की टीस के पीछे दो प्रमुख कारण समझे जा सकते हैं। एक यह कि बसपा को गठबंधन में शामिल करने की पहल कांग्रेस ने सपा की नाराजगी के बावजूद की थी, जिसमे गांधी परिवार ऐक्टिव था और प्रियंका गांधी ने गठबंधन को लेकर मायावती जी से बात की थी। तब इंडिया ब्लॉक की बैठक में बसपा को लेकर स्टैंड क्लीयर करने की मांग करते हुए अखिलेश यादव ने गठबंधन से निकलने की धमकी तक दे दी थी। इस कारण बसपा के अलग उम्मीदवार उतारने से लगभग 16 सीटों का नुकसान भी हुआ। उत्तर प्रदेश में जिन 33 सीटों पर भाजपा जीती थी उनमे से 16 सीटों पर बसपा को इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार के हार के अंतर से ज्यादा वोट मिले थे अर्थात यदि बसपा गठबंधन का हिस्सा होती तो ये 16 सीटें भाजपा के बजाय इंडिया गठबंधन को जाती।

अभी मायावती जी और राहुल गांधी के बीच बयानों का बवाल खत्म हुआ ही नहीं था कि कांग्रेस नेता उदित राजा द्वारा मायावती जी का गला घोटने जैसे गैर जिम्मेदाराना बयान और गंभीर बवाल खड़ा हो गया, जबकि उदित राज की राजनीतिक यात्रा पर नजर डाली जाए तो पता लग जायेगा कि उन्होंने सदैव दलित/बहुजन वोटरों को बसपा खेमे में जाने से रोका, वे रामराज के नाम से जेएनयू के छात्र रहे और और इसी नाम से भारतीय राजस्व सेवा में नियुक्त हुए और सरकारी सेवा से त्याग पत्र देकर अपना नाम उदित राज रखा। बौद्ध धर्म ग्रहण किया और इंडियन जस्टिस पार्टी बनाई। वर्ष 2014 में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी रणनीति के अनुसार जाटव (चमार) वोट, जो बसपा के पारम्परिक वोट बैंक माने जाते थे, को नजर अंदाज करते हुए अन्य दलित जातियों- खटीक, पासी, बाल्मीकि को भाजपा से जोड़ने का अभियान चलाया और इसी रणानिति के तहत खटीक जाति से सम्बंध रखने वाले उदित राज को भाजपा जॉइन कराई और दिल्ली की करोलबाग सीट से टिकट दे दिया और वे सांसद बन गए। पर मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के कारण भाजपा में रहते हुए भाजपा नेतृत्व को कोसने लगे और उनका टिकट कट गया और वे 2019 में कांग्रेस में चले गए और कांग्रेस नेतृत्व को खुश करने के लिए सुश्री मायावती जी का गला घोटने की बात कर रहे हैं।

यह निर्विवाद सत्य है कि बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने पिछले कुछ वर्षों से अपनी अस्थिर स्टैंड के चलते बहुजन समाज पार्टी को वोट कटुआ पार्टी के रूप में बना दिया है। जिस बसपा के 2019 में दस सांसद जीतकर लोकसभा में आये थे, वर्ष 2024 में एक भी सांसद जीत कर नहीं आया। उसी तरह 400 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में उस दल का एक ही विधायक रह गया है और बसपा का कोर वोटर अब प्रधानमंत्री की सबको आवास और घर-घर शौचालय आदि योजनाओं के चलते भाजपा से जुड़ रहा है। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता मान्यवर कांशीराम के सानिध्य में मायावती ने बसपा के झंडे के नीचे बहुजनों/दलितों का एक ऐसा समूह तैयार कर लिया था जो किसी से टकराने को तैयार दिखता था उनमे यह आत्मविश्वास कांग्रेस के पांच दशक के शासन में उनके साथ जुड़ने में नहीं देखा गया, यही कारण था कि भाजपा जैसे सशक्त दल को भी चुनावों में गैर जाटव और गैर यादव रणनीति अपनानी पड़ी।

पिछले कुछ वर्षों से जब मायावती जी की पार्टी कमजोर पड़ गई है तब से कांग्रेस अपने से बिछड़ गए बसपा के मुख्य वोटरों दलितों विशेषकर जाटवों को अपने खेमे में लाने की कोशिश में लगी हुई है और कभी गांधी परिवार मायावती को अपनी ओर लाने की कोशिश करता है और कभी उदित राज मायावती जी का गला घोटने की बात करते हैं। मायावती जी की पार्टी का कमजोर होने का एक और कारण उनका भ्रष्ट चाटुकार नेताओं से घिरा होना और जो लोग बसपा से जुड़ना चाहते हैं उनसे मायावती जी से मात्र मिलवाने के लिए लाखों रुपए का चढ़ावा मांगा जाता है। इसी कारण दलित वर्ग के शिक्षित और सक्षम लोग बसपा में आने से कतरा रहे हैं।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि जब इंडिया गठबंधन में बसपा को शामिल करने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पुरजोर कोशिश कर रहे थे उस समय अखिलेश यादव इसका विरोध कर रहे थे आखिर इस विरोध का कारण क्या था। राजनीति के जानकार यह भलीभाँति जानते है कि सपा का कोर वोटर यादव कभी भी दलित विशेषकर जाटवों को पसंद नहीं करता और न उनके साथ उठना बैठना पसंद करता है। समाज में भी यादवों ने दलितों का शोषण भाजपा समर्थक सवर्ण सनातनियों से अधिक किया है। अखिलेश यादव के पिता श्री मुलायम सिंह यादव ने संसद में एससी/एसटी के प्रमोशन में आरक्षण का विरोध करते हुए कहा था कि यदि प्रमोशन में आरक्षण दिया गया तो भविष्य में काबिल सेक्रेटरी और कैबिनेट सेक्रेटरी मिलने बंद हो जाएंगे और उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के कार्यकाल में उन शिक्षकों को डिमोट कर दिया गया जिन्हें आरक्षण में प्रमोशन मिला था। सपा और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टी में पीडीए का नारा सिर्फ वोट लेने के लिए होता है और इसके अनुसार सत्ता प्राप्त करने के बाद दलित तो पिछड़े वर्ग (यादव व कुर्मी) को अपना नेता स्वीकार कर लेते हैं पर ये पिछड़े वर्ग के नेता दलित को अपना नेता स्वीकार नहीं करते। यही कारण था कि मायावती ने इंडिया गठबंधन में मिलना स्वीकार नहीं किया।

भाजपा को दलित विरोधी कहने वाली कांग्रेस को यह पता होना चाहिए कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पहले दलित मुख्यमंत्री के रूप में एक बार नहीं तीन-तीन बार सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई। वही दलितों के कल्याण का दंभ भरने वाली कांग्रेस न 1980 में जब बाबू जगजीवन राम के रूप में देश को पहला दलित प्रधानमंत्री मिलने वाला था तो इंदिरा गांधी न नीलम संजीव रेड्डी से साठगांठ करके उनको मौका देने के बजाय संसद भंग करवा दी। यदि बाबू जगजीवन राम देश के प्रधानमंत्री बन गए होते तो देश में सदियों से वंचित और शोषित दलितों में विश्वास जागता और वे राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाते और यही आधुनिक भारत की जरूरत है।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

बुधवार, 5 मार्च 2025

वर्तमान बीजेपी सरकार पीडीए समाज को उनके अधिकारों से वंचित करने का काम कर रही है : लखन प्रताप

-सपा नेता लखन प्रताप ने ददरौल के ग्राम पंचायत-सिसोआ में किया पीडीए चर्चा का आयोजन

असलम अल्वी

शाहजहांपुर। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा चलाए जा रहे पीडीए चर्चा कार्यक्रम आज दिनाक 05/03/2025 को 37वें दिन का आयोजन जनपद शाहजहांपुर के विधानसभा क्षेत्र 136 ददरौल विधानसभा शाहजहांपुर में किया गया । विगत 27 जनवरी से लगातार क्षेत्र के ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में सपा नेता लखन प्रताप सिंह द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रमों के क्रम में आज क्षेत्र के ग्राम पंचायत ग्राम पंचायत-सिसोआ में  अध्यक्षता (उस्मान खां) सत्येंद्र यादव जिला उपाध्यक्ष समाजवादी पार्टी असलम खान महानगर उपाध्यक्ष सब्बन खा, आसिफ, वलीशेर, शमशाद, इसरार अली, मोहम्मद खान, मोहसिन, तैरूफ, खान जुनैद, आकिब, तौफीक, अलाउद्दीन, गुड्डू अली, इकरार, आयोजन किया गया कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आए बुजुर्गों महिलाओं और युवाओं का सपा नेता लखन प्रताप ने स्वागत किया इस दौरान पीडीए परिवार में शामिल हुए लोगो का सपा नेता द्वारा फूल मालाएं पहनाकर उनका स्वागत करते अन्य लोगो से भी पीडीए परिवार में शामिल होने को अपील करते हुए कार्यक्रम में भाजपा सरकार के खिलाफ एकजुटता का आवाहन करते हुए आगामी 2027 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही।

कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान सपा नेता लखन प्रताप सिंह ने भाजपा सरकार पर कई आरोप लगाए इस दौरान उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार पीडीए समाज को उनके अधिकारों से वंचित कर रही है। उन्होंने पीडीए समाज से 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत दिलाने का आह्वान किया। सपा नेता लखन प्रताप ने कहा कि सामाजिक एकजुटता से राजनीतिक शक्ति हासिल करनी होगी। इस दौरान उन्होंने जातीय जनगणना का मुद्दा भी उठाया। कहा कि जनगणना से पीडीए समाज को उनकी संख्या के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। अपने संबोधन में उन्होंने प्रदेश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अशिक्षा जैसी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि आज महंगाई चरम सीमा पर है लेकिन बीजेपी नेताओं को महंगाई कही नहीं दिख रही हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है बिना रिश्वत के कोई काम नहीं हो रहा लेकिन भ्रष्टाचार जीरो दिखा रही है शिक्षा का व्यापारीकरण बहुत तेजी के साथ बढ़ने के कारण शिक्षा का ध्रुवीकरण कारण हो जाने के कारण आम जनमानस में अशिक्षा बढ़ रही है क्योंकि आम आदमी शिक्षा पर इतना नहीं खर्च कर सकता हर क्लास की फीस में बढ़ोतरी हुई है इसके अलावा स्टाम्प से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है जो ड्राइविंग लाइसेंस 60 रुपए में बन जाता था आज उसके 15 सौ रुपए खर्च हो जाते है इसके साथ दुश्वारियां अलग से है फिर भी इन्हें सब कुछ अच्छा दिखाई दे रहा है और जनता को दिखा रहे है।

इस मौके पर , महासचिव समाजवादी पार्टी सतेंद्र यादव जिला उपाध्यक्ष असलम खां (महा नगर उपाध्यक्ष) गामा खां (कटिया) गौटिया, सुभाष कुमार आकाश कुमार, शबाब खान, तौसीफ खान, अकरम खान, इमरान खान शहजाद खान, सुनील, श्याम लाल, शकीरा,  नेत्रपाल सिंह, नरसिंह यादव, विजय कुमार, बलवीर, ओमवीर यादव धर्मेंद्र कुमार तरीका खां, मोहसिन खान, नन्हे लाला, शरद शर्मा, दीपक द्विवेदी, सर्वेश यादव अहसान अली, रजनीश कुमार, रामशंकर, राजेंद्र सिंह, ओमपाल, आनंद प्रकाश, आरव सिंह, शिशुपाल आकाश कुमार गौतम, वीरपाल सिंह जमाल भाई, सुनील, मोनू,  आदि मौजूद रहे।

कांशी राम की विरासत और मायावती की तर्ज़-ए-सियासत

निर्मल रानी 

1980 के दशक में बसपा प्रमुख कांशी राम पूरे देश में घूम घूम कर भारतीय समाज को 85 : 15 का जनसँख्या अनुपात समझाते थे और यह बताते थे कि 15 प्रतिशत कथित उच्च जाति के लोग शेष 85 प्रतिशत जातियों व समुदायों के लोगों पर राज कर रहे हैं। और तभी यह नारा प्रचलित हुआ था - वोट हमारा,राज तुम्हारा - नहीं चलेगा,नहीं चलेगा। 
जैसे जैसे कांशी राम के नेतृत्व में यह बहुजन आंदोलन आगे बढ़ता गया वैसे वैसे मनुवाद तथा सनातन व्यवस्था में उल्लिखित वर्ण व्यवस्था पर इनका आक्रमण और तेज़ होता गया। यहाँ तक कि 'तिलक,तराज़ू और तलवार जैसा 'अभद्र नारा भी उन्हीं दिनों में ख़ूब प्रचलित हुआ। यही वह आंदोलन था जिसमें दलित पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के लोग जुड़ते चले गये। यानी कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक धीरे धीरे खिसकना शुरू हो गया। इसी बीच कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी नामक एक नये राजनैतिक दल की स्थापना कर दी। उसी दौरान कांशी राम की भेंट मायावती से हुई जोकि उस समय वकालत व बीएड करने के बाद दिल्ली इंद्रपुरी स्थित जेजे कॉलोनी में एक अध्यापिका के रूप में कार्यरत थीं और साथ ही सिविल सर्विसेज़ परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही थीं। तभी कांशी राम ने मायावती के तेज़ तर्रार व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कहा था कि - "मैं तुम्हें एक दिन इतना बड़ा नेता बना सकता हूं कि एक नहीं बल्कि आईएएस अधिकारियों की पूरी क़तार तुम्हारे आदेशों का पालन करने के लिए लाइन में खड़ी हो जाएगी।" तभी से वे कांशी राम के सहयोगी के रूप में उनके साथ प्रायः देखी जाने लगीं तथा उनके 'क्रन्तिकारी ' व उत्तेजक भाषण भी लोगों को प्रभावित करने लगे।                             

कांशीराम का 9 अक्टूबर 2006 को 72 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। कांशीराम के जीवन के अंतिम दौर में उनकी विरासत को लेकर बसपा के भीतर तथा कांशीराम के परिजनों के द्वारा काफ़ी विवाद भी खड़ा किया गया। परन्तु तेज़ तर्रार मायावती तब तक कांशी राम पर व उनकी विरासत रुपी बसपा पर पूरा नियंत्रण कर चुकी थीं। यही वजह थी कि बौद्ध धर्म के अनुसार हुये कांशीराम के अंतिम संस्कार में उनके परिजनों ने नहीं बल्कि स्वयं मायावती ने ही उनकी चिता को अग्नि दी। अब पार्टी में उन्हें 'बहन जी ' के नाम से बुलाया जाने लगा। 
कांशीराम के नेतृत्व में ही बीएसपी ने 1999 के संसदीय चुनावों में 14 संसदीय सीटें जीतीं थीं। मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर बैठने का भी सौभाग्य हासिल है। परन्तु यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जिस बसपा को कांशीराम ने एक मिशन के रूप में स्थापित किया था और कांशी राम के जिस मिशन से बड़े सामाजिक परिवर्तन की आहट महसूस हो रही थी, पार्टी पर मायावती का वर्चस्व होने के बाद वही मिशन,वही पार्टी अब सत्ता,वैभव,आत्ममुग्धता और परिवारवाद का शिकार होती नज़र आने लगी। यहाँ तक कि केवल सत्ता हासिल करने के लिये बुनियादी विचारों से भी समझौता करने लगीं। जिस 'मनुवादी ' व्यवस्था के विरुद्ध बसपा का जन्म हुआ था, 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उसी ब्रह्मण समुदाय के समर्थन की ज़रुरत महसूस हुई तो तिलक,तराज़ू और तलवार जैसा नारा भी बदल गया। 2007 में बहुजन समाज पार्टी, सर्वजन समाज की बातें करने लगी।  और यह नया नारा लगा - हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है। उस समय उत्तर प्रदेश में 37 प्रतिशत ब्राह्मणों ने पार्टी को वोट दिया था। 

परन्तु चार बार देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद अन्य सत्ताधीशों की ही तरह मायावती भी अहंकार के साथ साथ परिवारवाद का भी शिकार होती चली  गयीं।  कभी अपने को ज़िंदा देवी बतातीं तो कभी अपने भाई व भतीजे के मोह में डूबती नज़र आतीं। कभी अपनी हार का ठीकरा मुसलमानों पर फोड़तीं तो कभी उनपर पार्टी का टिकट बांटने में लोगों से करोड़ों रूपये वसूलने का आरोप लगा। हद तो यह कि अपने जीवनकाल में ही मायावती ने बाबा साहब आंबेडकर व कांशी राम के साथ ही अपनी भी प्रतिमायें लगवा डालीं। जिसतरह कांशी राम को अपने परिवार से अलग उत्तराधिकारी के रूप में मायावती नज़र आयी थीं उस तरह  मायावती को परिवार से बाहर अपनी पार्टी का कोई योग्य नेता नज़र ही नहीं आया। और आख़िरकार मायावती के इन्हीं स्वार्थपूर्ण फ़ैसलों के चलते उनकी पार्टी का जनाधार घटता चला गया।

पिछले लोकसभा चुनावों से पूर्व जब इण्डिया गठबंधन वजूद में आया तो मायावती उस विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनीं। उसी समय यह अंदाज़ा लगाया जाने लगा था कि मायावती भाजपा के प्रति नरम रुख़ अपना रही हैं। इसके पीछे के कारणों से भी अनेक राजनैतिक विश्लेषक बखूबी वाक़िफ़ हैं। पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने मायावती पर बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए स्पष्ट रूप से यह कह दिया था कि यदि बीएसपी 'इंडिया' गठबंधन में होती तो पिछले वर्ष हुये लोकसभा चुनावों में एनडीए की जीत नहीं होती। इस आरोप से तिलमिला कर मायावती ने कांग्रेस को ही बीजेपी की 'बी' टीम बता डाला। जबकि देश देख रहा है कि इस समय देश में सत्ता,भाजपा व संघ के विरुद्ध जितना राहुल गाँधी मुखर हैं उतना कोई नहीं जबकि मायावती के रवैये से तो पता ही नहीं चलता की वे विपक्ष में हैं या सत्ता के साथ ?

सच तो यह है कि मायावती के नेतृत्व में बसपा का न केवल समाज में प्रभाव कम होता जा रहा है बल्कि संगठन भी बिखराव के दौर से गुज़र रहा है। पिछले दिनों जिसतरह उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक समेत सभी मुख्य पदों से हटा दिया और दो दिन बाद ही उन्हें पार्टी से निष्कासित भी कर दिया उससे भी यही सन्देश गया कि मायावती को अपने परिवार के बाहर भी कोई उत्तराधिकारी नज़र नहीं आया और जिस भतीजे को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाया भी उससे भी जल्द ही पीछा छुड़ा लिया ? इस तरह के ढुलमुल फ़ैसलों का प्रभाव निश्चित रूप से पार्टी पर ज़रूर पड़ेगा। सच तो यही है कि कांशी राम की विरासत के रूप में मिले व्यापक जनाधार वाले राजनैतिक दल को मायावती की तर्ज़-ए-सियासत के चलते काफ़ी नुक़सान हुआ है।

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/