रविवार, 5 जनवरी 2025
मुंबई पुलिस ने स्वीकारा फेक दादासाहेब फाल्के पुरस्कार
शुक्रवार, 3 जनवरी 2025
भागवत के वक्तव्य का इतना विरोध क्यों
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत द्वारा वर्तमान मंदिर- मस्जिद उभरते विवादों पर दिए वक्तव्य को लेकर अनेक धर्माचार्यों और हिंदू संगठनों के नेताओं की विरोधी प्रतिक्रियायें लगातार आ रहीं हैं। इस संदर्भ में सबसे कड़ा बयान जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी का आया। उन्होंने कहा कि मैं भागवत के बयान से पूरी तरह असहमत हूं। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि भागवत हमारे अनुशासक नहीं है, बल्कि हम हैं। बाद में उन्होंने एक टेलीविजन पर बात करते हुए ऐसा कुछ बोला जो उनके अंदर व्याप्त नाराजगी को साफ दर्शा रहा था । वैसे रामभद्राचार्य जी ने कहा कि संभल में अभी जो कुछ हो रहा है वह बहुत बुरा है। हालांकि सकारात्मक पहलू यह है कि चीज हिंदुओं के पक्ष में सामने आ रही हैं। हम न्यायालय में मतदान और जनता के समर्थन से इसे सुरक्षित करेंगे। वैसे अनेक संगठनों, बुद्धिजीवियों, नेताओं आदि ने डॉक्टर भागवत के बयान का समर्थन भी किया है। विडंबना यह है कि पहले जब सरसंघचालक ने ऐसे वक्तव्य दिए तब उसे झूठ, पाखंड और आंखों में धूल झोंकने वाला तक कहा गया। इसलिए विरोधियों की प्रतिक्रियाएं इन संदर्भों में न नैतिक है, न विश्वसनीय और न इनका कोई अर्थ है। हमें पूरे विषय को सही संदर्भों में देखना और निष्कर्ष निकालना होगा।
पिछले वर्षों में यह पहली बार नहीं है जब भागवत के वक्तव्य पर विरोधी तीखी प्रतिक्रियाएं हिंदू संगठनों, नेताओं और कुछ धर्माचार्यों की ओर से आया है। 2 जून, 2022 को नागपुर में जब उन्होंने कहा था कि अयोध्या, काशी और मथुरा की मान्यता रही है लेकिन हर मस्जिद में मंदिर क्यों तलाशें तब भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं थी और उसके पूर्व धर्म संसदों में दिए गए आक्रामक वक्तव्यों के संदर्भ में भी उनके विचारों का कुछ पक्षों ने विरोध किया था। ऐसा नहीं है कि संघ प्रमुख या संघ के शीर्ष नेतृत्व को इसका आभास पहले से नहीं होगा। बावजूद उन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया और पहले भी देते रहे हैं तो निश्चित रूप से इसके पीछे गहरी सोच, अतीत और वर्तमान का विश्लेषण तथा भविष्य की दृष्टि होगी। हम संघ के विचारों या कुछ कार्यों से सहमत असहमत हो सकते हैं लेकिन निष्पक्ष होकर विश्लेषण और विचार करने वाले मानते हैं कि शीर्ष स्तर से दिया गया हर वक्तव्य और भाषण काफी सोच -समझकर ही सामने आता है। वैसे भी सरसंघचालक का वक्तव्य संगठन परिवार के लिए अंतिम शब्द माना जाता है। स्वाभाविक ही जब ऐसा बोल रहे थे तो देश में बने वातावरण और आम हिंदू समाज की उस पर हो रही प्रतिक्रियाएं सब उनके सामने थे और हैं। तो फिर ऐसा उन्होंने क्यों कहा होगा?
पहले उनके भाषण की उन पंक्तियों को देखें। 19 दिसंबर को पुणे के सहजीवन व्याख्यानमाला में ‘ इंडिया द विश्व गुरु’ विषय पर उनका भाषण था और उन्होंने मराठी में बोला। बोलते हुए डॉक्टर भागवत ने कहा ’ हम लंबे समय से सद्भावना से रह रहे हैं। अगर देश में सौहार्द्र चाहिए तो इसकी मिसाल हमारे देश में होनी चाहिए, हमारे देश में आस्था का सम्मान होना चाहिए । हिंदुओं का मानना है कि राम मंदिर बनना चाहिए, क्योंकि यह आस्था का स्थान है। लेकिन ऐसा करने से आप हिंदुओं के नेता बन जाएंगे ऐसा नहीं है या किसी हिंसक अतीत के फलस्वरुप अत्यधिक नफरत, द्वेष ,शत्रुता, संशय से हर दिन एक नया मामला उठाना यह कैसे काम कर सकता है।’ स्वाभाविक है कि संभल से लेकर बदायूं ,दिल्ली का जामा मस्जिद, कानपुर ,वाराणसी आदि में नए मंदिरों का मिलना, पहले से चल रहे वाराणसी के ज्ञानवापी और मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यायिक विवादों के बीच बने हुए वातावरण में सहसा इन पंक्तियों को पचा पाना आसान नहीं हो सकता। विचार करने वाली बात यह है कि क्या संघ जैसा संगठन, जिसने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाई तथा मथुरा और काशी को लेकर भी उसके मत उन दिनों से स्पष्ट रहे हैं जब दूसरे संगठनों का प्रभाव नहीं था, या वे थे नहीं तो वह ऐसा कैसे बोल सकते हैं? वह भी उन स्थितियों में जब संभल से लेकर बदायूं वाराणसी दिल्ली भोजशाला आदि सभी जगह ऐतिहासिक रूप से घटनाएं और वर्तमान स्थिति हिंदुओं के पक्ष में जातीं है। मुस्लिम काल में इन मंदिरों को ध्वस्त किया गया और उनमें निहित प्रतिमाओं को अपमानित करने के लिए अनेक उपक्रम हुए स्वतंत्रता के बाद भी अपने ही मूल शहर से हिंदुओं को दूसरी जगह पलायन करना पड़ा उनके मंदिरों में पूजा पाठ करना, लोगों का जाना कठिन हुआ, बंद हुए और कई जगहों पर बेदर्दी से स्थलों को कब्जा करने के उपक्रम भी हुए। स्थानीय स्तरों पर इनमें से ज्यादातर स्थानों को प्राप्त करने की भावनायें या उन मुद्दों को उठाने और कहीं-कहीं संघर्ष करने का भी लंबा अतीत है। इसमें अगर व्यक्तिगत रूप से किसी हिंदू समूह या पूरे समाज को लगता है कि हमें वह स्थल वापस मिलने चाहिएं और जहां प्रतिमाओं का अपमान हुआ उनका निराकरण भी हो और इसके लिए वे सामने आते हैं, न्यायालय में जाते हैं तो यह स्वाभाविक है। भागवत जिस विषय पर बोल रहे थे वह भारत के विश्व गुरु बनने पर था और उनका पूरा भाषण 1 घंटे से ज्यादा का है। इसमें वह प्राचीन भारत से लेकर मुस्लिम काल, अंग्रेजों की गुलामी आदि के प्रभाव, वर्तमान में भारत किस तरह विश्व दृष्टि से कम कर रहा है आदि सभी बातें शामिल हैं जिनकी लोग अपेक्षा रखते हैं। फिर भविष्य की दृष्टि है और उसी में लगभग अंत में केवल एक कुछ पंक्तियां हैं। किसी देश को पूरा संसार अपना आदर्श तभी मानेगा और उसका अनुसरण भी करेगा जब वह देश अपने अंदर विवादों को सही तरीके से सुलझाने, सभी पंथो, मजहबों के बीच के तनावों को तरीके से समाप्त करने और सहजीवन के साथ रहते हुए आदर्श देश की मिसाल रखेगा। यानी उठाए जा रहे मुद्दों के अन्य पहलुओं पर गहराई से नहीं विचार होगा तो समस्यायें सुलझने के बजाय उलझेंगी और फिर इनका समाधान भी संभव नहीं होगा। कोई भी विवेकशील व्यक्ति कह नहीं सकता कि जो अतीत में अन्याय , अत्याचार, ध्वंस और कब्जे हुए वो वैसे ही रहे और लोगों की भावनाएं दमित हों। इनसे भविष्य में हिंसा व तनाव बढ़ाने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। समस्या यह है कि संपूर्ण देश में ऐसे हजारों स्थान है। कल्पना करिए धीरे-धीरे पूरे देश में ऐसे विषय उठ जाएं और स्थिति संभल जैसी पैदा हों तो क्या होगा? क्या देश की इन विवादों के अंतिम समाधान की अभी तक तैयारी है? क्या हिंदू समाज इनके विरुद्ध होने वाली अनेक तरह की विपरीत प्रतिक्रियाओं का सफलतापूर्वक सामना करने की अवस्था में पहुंच गया है? क्या जो लोग इन विषयों को न्यायालय में ले जा रहे हैं उनकी ऐसी क्षमता है कि वो इनका सामना भी कर सकें? क्या उन सब की विश्वसनीयता भी है? क्या धर्माचार्य और अन्य हिंदू संगठनों ने उन स्थितियों के लिए अपनी तैयारी कर रखी है? अभी तक ज्यादातर धर्माचार्ययों ने संगठित होकर किसी ऐसे विषय के समाधान की न पहल की न वे लोगों के बीच गए। संभल में ही समस्या पैदा होने पर कितने समाधान या संघर्ष के लिए आगे आए इन पर अवश्य दृष्टि रखिए। सारे प्रश्नों का उत्तर भारत के व्यापक राष्ट्रीय वैश्विक लक्ष्यों का ध्यान रखते हुए शांतिपूर्वक तलाश से जाने की आवश्यकता है। सच यह है कि लगभग 1000 वर्षों की हिंदू मुस्लिम विवादों के समाधान पर देश के राजनीतिक, धार्मिक और बौद्धिक नेतृत्व ने कभी लंबा विचार ही नहीं किया और जब विचार नहीं होगा तो फिर रास्ता निकालेगा कौन? इसके विपरीत राजनीतिक दलों ने वोट के लिए अपने बयानों और नीतियों से अतीत या वर्तमान के अन्यायों का ही समर्थन किया और जो इन विषयों को उठा रहे हैं उन्हें आज भी उन्हें ही निंदा आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ता है। इस सच को स्वीकार करना होगा कि ऐसी नीतियों और आचरणों से सनातनी समाज के अंदर व्यापक असंतोष और क्षोभ पैदा हुआ जिसकी परिणति इन छिटपुट विवादों के रूप में सामने आ रहीं हैं। दूसरी ओर जब इन विवादों से समस्याएं बढ़तीं हैं या प्रतिक्रियाएं विकराल रूप में सामने आतीं हैं तो न कोई संगठन दिखता है और न ही हमारे धर्माचार्य। संभल में सर्वे के सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध जितनी सुनियोजित तरीके से हिंसा हुई और उसकी आलोचना की जगह जिस दिशा में पूरे मुद्दे को व्याप्त इकोसिस्टम ले गया उनका सामना कौन करेगा? विरोधी इन सारे विवादों के लिए किस संगठन को जिम्मेदार ठहराते हैं? संघ और भाजपा। संघ की प्रकृति कभी ऐसी नहीं दिखी कि वह आरोपों का खंडन करने या विवादों पर स्पष्टीकरण देने आए। जिस संगठन को दीर्घकालिक दृष्टि से काम करना है वह त्वरित और तात्कालिकता का समर्थन नहीं कर सकता। जिस तरह संभल से कानपुर और अन्य शहरों में स्वतंत्रता के बाद भी सक्रिय मंदिरों पर कब्जे हुए, बंद किए गए, पवित्र कुएं तक पाटे गए और ऐसे स्थान काफी संख्या में सामने आ रहे हैं,उनकी आवाज उठाने और प्रशासन की मदद से उनके समाधान की,कोशिशें हो रहीं हैं, सतर्अतापूर्वक होनी चाहिए। संघ प्रमुख ने उन पर बात नहीं की है। संघ का रुख यही रहा है कि हम हिंदू समाज के संगठन है लेकिन सभी हिंदू हमारे साथ है ऐसा नहीं है। गहराई से देखें तो डॉक्टर भागवत का वक्तव्य भविष्य दृष्टि से सभी के लिए सुझाव और सलाह की तरह है और इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। संघ या कोई संगठन धर्माचार्यों का अनुशासक या उनका मार्गदर्शक न हो सकता है और न उनके अंदर ऐसा भाव होगा। लेकिन सभी को समस्याओं के स्थायी समाधान,भारत के वर्तमान और भविष्य की दूरगामी दृष्टि से विचार कर आगे बढ़ना चाहिए।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027288
गुरुवार, 2 जनवरी 2025
सीरिया और इस्लामिक स्टेट: सावधानी और सतर्कता की ज़रूरत
प्रो बंदिनी कुमारी
सीरिया में हाल ही में महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य परिवर्तन हुए हैं। 8 दिसंबर 2024 को विद्रोही गुटों ने राष्ट्रपति बशर अल-असद के 24 वर्षीय शासन को समाप्त कर दिया, जिससे वे रूस भागने पर मजबूर हुए। इस तख्तापलट के बाद, हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) विद्रोही गुट ने मोहम्मद अल-बशीर को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। चिंताजनक बात यह है कि कुछ कट्टरपंथियों द्वारा इन घटनाओं को इस्लामिक स्टेट (ISIS) की जीत के रूप में चित्रित करने या उन्हें व्यापक, दैवीय स्वीकृत अभियान के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है और मध्य एशिया के युवाओं से अपील की जा रही है कि वे इस अभियान में शामिल हों ।यह व्याख्या झूठी ,भ्रामक और एक खतरनाक जाल है, जो युवाओं और संवेदनशील दिमाग के व्यक्तियों को गुमराह करने के लिए बना जा रहा है। मध्य पूर्व में कई अन्य लोगों की तरह, सीरियाई संघर्ष बहुआयामी है, जिसमें विभिन्न गुट नियंत्रण, प्रभाव और अस्तित्व के लिए होड़ कर रहे हैं। आईएसआईएस के अवशेषों सहित कुछ चरमपंथी समूह इन घटनाक्रमों को अपने तथाकथित "खिलाफत" के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं,और उसकी व्याख्या अपने कुत्सित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कर रहे हैं जो उनकी कट्टरपंथी विचारधारा में निहित एक अवधारणा है।
गौरतलब है कि ‘इस्लामिक शासन’ और ‘खिलाफत’ की वास्तविक अवधारणा को विकृत करके मध्य एशिया के तमाम कट्टरपंथी समूह अपने अपने राजनीतिक मंसूबों के लिए युवाओं को बलि का बकरा बना रहे हैं ।इस्लामिक शासन की अवधारणा इस्लाम के धार्मिक और सामाजिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसे आमतौर पर “इस्लामी राज” या “खिलाफत” के रूप में जाना जाता है। इस्लामिक शासन प्रणाली में परामर्श का सिद्धांत लागू होता है। इसे “शूरा” कहा जाता है, जहां शासक और प्रजा के बीच विचार-विमर्श किया जाता है।यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का आधार है। ISIS के तहत तथाकथित "इस्लामिक स्टेट" विनाश, उत्पीड़न और आतंकवाद पर बनाया गया था। यह एक राजनीतिक इकाई थी जिसने इस्लाम के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन किया- जैसे न्याय, दया और मानवीय सम्मान के लिए सम्मान। मुसलमानों में शांति और समृद्धि लाने के बजाय, ISIS ने पीड़ा, रक्तपात और विभाजन लाया। इस्लाम के नाम पर आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा और क्रूरता की इसकी रणनीति ने न केवल आस्था को कमजोर किया है, बल्कि दुनिया भर के कई मुसलमानों का मोहभंग भी किया है। कुछ कट्टरपंथी और चरमपंथी अब सीरिया में हो रहे घटनाक्रम को तथाकथित इस्लामिक स्टेट की जीत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य भावनाओं को भड़काकर और खुद को इस्लाम के “सच्चे” रक्षक के रूप में पेश करके मुस्लिम युवाओं को अपने साथ जोड़ना है। वे विजयी खिलाफत के पुनर्जन्म की तस्वीर पेश करने के लिए लड़ाई, नारे और यहां तक कि “जिहाद” के संदर्भों का उपयोग कर सकते हैं। हालाँकि, यह कथा इस्लाम क्या सिखाता है और जिहाद की अवधारणा का वास्तव में क्या अर्थ है, इस बारे में गलत समझ पर आधारित है। इस्लामी परंपरा में जिहाद मुख्य रूप से व्यक्तिगत सुधार और समाज में न्याय और धार्मिकता को बनाए रखने का प्रयास है। यह बेवजह हिंसा या आतंकवाद के माध्यम से सत्ता स्थापित करने का आह्वान नहीं है। सच्चा जिहाद उत्पीड़न, अन्याय और अत्याचार से लड़ने के बारे में है, और यह कई रूपों में किया जा सकता है- शिक्षा, दान, शांतिपूर्ण प्रतिरोध या अपने समुदाय को आक्रामकता से बचाने के माध्यम से। यह कभी भी ऐसे समूह में शामिल होने के बारे में नहीं है जो धार्मिक कर्तव्य की आड़ में हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देता है।
सीरियाई संघर्ष और इसी तरह के संकटों को खिलाफत की स्थापना के रूप में पेश करने का कट्टरपंथी प्रयास बेहद भ्रामक है। ऐसे आंदोलनों में शामिल होने वाले युवा खुद को एक वैचारिक जाल में उलझा हुआ पा सकते हैं जो हिंसा, विनाश और व्यक्तिगत नुकसान की ओर ले जाता है, यह सब इस्लाम की विकृत समझ के नाम पर होता है। इस्लाम का सच्चा मार्ग वह है जो शांति, न्याय और मानवता की भलाई को बढ़ावा देता है, न कि निरर्थक संघर्ष या सांप्रदायिक हिंसा को। मुस्लिम युवाओं को खुद को शिक्षित करने, ज्ञानी विद्वानों से मार्गदर्शन प्राप्त करने और इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं को समझने की आवश्यकता है। इस्लाम ज्ञान प्राप्त करने, न्याय के लिए प्रयास करने और समाज में सकारात्मक योगदान देने को प्रोत्साहित करता है। इस्लाम में हिंसा या विनाश का महिमामंडन नहीं किया गया है। शांति को बढ़ावा देना और सभी रूपों में चरमपंथ के खिलाफ खड़ा होना हर मुसलमान की जिम्मेदारी है। मुस्लिम युवाओं को याद रखना चाहिए कि सफलता का सच्चा मार्ग कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं का पालन करने, न्याय और धार्मिकता की दिशा में काम करने और हर इंसान की गरिमा को बनाए रखने में निहित है। इस तरह, वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकते हैं, अपने विश्वास की रक्षा कर सकते हैं और उन लोगों द्वारा बिछाए गए खतरनाक जाल से दूर रह सकते हैं जो अपने चरमपंथी एजेंडे के लिए उनका शोषण करना चाहते हैं।
लेखिका समाज शास्त्र की प्रोफेसर हैं और उत्तर प्रदेश के डिग्री कॉलेज में कार्यकर्ता हैंI
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रविवार, 29 दिसंबर 2024
संभल में मंदिरों का बंद होना
संभल में 46 वर्षों से बंद मंदिर खुलने के बाद वहीं दूसरे मोहल्ले में भी बंद मंदिर मिलने तथा अनेक कुयें और एक अद्भुत लगभग 200 मीटर की बावरी सामने आने के बाद पूरे देश आश्चर्य में है। लोगों के अंदर स्वाभाविक गुस्सा है कि मोहल्लों में एक समुदाय की जनसंख्या बढ़ने के बाद ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि पूजा करना तक संभव नहीं रहा। सेक्यूलरवाद की रट लगाने वाले नेताओं, एक्टिविस्टों और बुद्धिजीवियों के पास इसका क्या उत्तर होगा? संयोग कहिए कि संभल में हिंसा के बाद प्रशासन वहां कई स्तरों पर काम कर रही है जिनमें बिजली चोरी पकड़ना, अवैध अतिक्रमण समाप्त करना तथा धर्मस्थलों के लाउडस्पीकरों की ध्वनि को निर्धारित सीमा में किए जाने के नियम का कठोरता से पालन कराना शामिल है। संभल के खग्गू सराय मोहल्ले में इसी अभियान में 46 वर्ष से बंद मंदिर मिला। दूसरा मंदिर वहां से लगभग साढ़े तीन किलोमीटर दूर सरायतरीन क्षेत्र के कायस्थान मोहल्ले में मिला। पहला 1978 के दंगे के बाद तो दूसरा 1992 के बाद बंद हो गया था। खग्गू सराय मंदिर को मकान से सटाकर और दीवार खड़ा कर काफी हद तक कब्जा लिया गया था। यह मंदिर सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के घर से 200 मीटर और जिस शाही मस्जिद के सर्वे पर इतना बड़ा विवाद हुआ उससे 500 मीटर दूर है। मंदिर के दरवाजों पर पड़े ताले खुलवाए गए तो अंदर हनुमान जी की मूर्ति और शिवलिंग मिला। सभी हैरत में थे। स्वाभाविक ही इस सूचना के साथ पूरे शहर में हलचल मच गया। लोग वहां आने लगे और कई वरिष्ठ जनों ने बताना शुरू किया कि यहां क्या-क्या हो सकता है। किसी ने बताया कि सामने दिखते रैंप के नीचे अमृतकूप था। जब जेसीबी से खुदाई की गई तो वाकई उसके नीचे कुआं मिला। इसकी खुदाई में भी कुछ मूर्तियां मिली है जिनमें गणेश जी और पार्वती जी की खंडित मूर्तियां हैं । अभी जितनी जानकारी आ रही है उसके अनुसार मंदिर काफी पुराना है। इसका सत्यापन कार्बन डेटिंग के बाद ही संभव है। दूसरे मंदिर में राधा कृष्ण और हनुमान जी की मूर्तियां हैं जिसकी देखरेख सैनी बिरादरी के लोग कर रहे थे। आप सोचिए, अगर भारत के उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के एक प्रमुख शहर में ऐसी स्थिति बनी तो उसके कारण क्या हो सकते हैं? प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार नहीं होती तो न पुलिस प्रशासन यहां कार्रवाई करने का साहस करता और न कब्जा करके धीरे-धीरे अस्तित्व मिटा देने की अवस्था में पहुंचे मंदिर का खुलना संभव होता।
जितनी जानकारी आई है उसके अनुसार 29 मार्च , 1978 को संभल में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। उसके बाद मोहल्ले के सारे हिंदू पलायन कर गए। उन दंगों पर काम करने वाले, भुगतने वाले ,आंखों देखने वाले बता रहे हैं कि उस दौरान खग्गू सरय मोहल्ले में अनेक हिंदू घरों में आग लगा दी गई थी और लोग ऐसे बेसहारा हो गए कि उनके पास वहां से भगाने के अलावा कोई चारा नहीं रहा। जानकारी मिली है कि वहां डिग्री कॉलेज में सदस्यता न मिलने पर मंजर अली नाम के प्रभावी व्यक्ति ने हिंसा का षड्यंत्र किया था। दूकानें जबरदस्ती बंद कराई गई, मारपीट, पथराव लूटपाट हुआ , गोलियां चलीं। यह ज्यादातर जगह एकपक्षीय था जिसमें कफी हिंदुओं की मृत्यु की बात बताई गई है। यही कायस्थान में हुआ जब हिंसा के बाद हिंदुओं के करीब 100 परिवारों को वहां से पलायन करने को विवश होना पड़ा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 1978 के दंगे के बारे में विधानसभा में बताया कि 184 हिंदू उसमें मारे गए थे जिनमें काफी संख्या में लोगों को जिंदा जलाया गया था। तब दो माह तक शहर सहित जिले के अलग-अलग क्षेत्र में कर्फ्यू लगा रहा। पता चल रहा है कि उसमें कुल 171 पंजीकृत मुकदमे हुए जिनमें तीन पुलिस की ओर से लिखे गए थे। उनका परिणाम क्या हुआ अभी पता नहीं। संभल में सांप्रदायिक हिंसा का पुराना इतिहास है और अभी तक रिकॉर्ड के अनुसार 16 बार शहर में सांप्रदायिक दंगे हुए। अगर मिले वर्तमान मंदिर और विवादास्पद जामा मस्जिद की कहानी को ही ध्यान में रखें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि सारी हिंसा के पीछे कौन लोग हो सकते हैं तथा किन्हें इसका खामियाजा ज्यादा भुगतना पड़ा होगा। आज खग्गू सरय मोहल्ले में किसी हिंदू का मतदाता सूची में नाम तक नहीं है।
आसपास के कुछ मुसलमानों का वक्तव्य है कि मंदिर बंद करने के लिए कोई दबाव नहीं डाला गया बल्कि लोग अपना मकान बेचकर चले गए और पूजा करने वाला ही कोई नहीं रहा। इनका कहना है कि जब हिंदू पारिवार वहां रहता ही नहीं तो पूजा नहीं होती। मुस्लिम नेता और बुद्धिजीवियों का वक्तव्य है कि मंदिर बंद था तो उसे खोलना ही चाहिए लेकिन लोग वहां से क्यों चले गए? आज तक योगी सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया? यह किस तरह का क्रूर बयान है? इसकी जगह मामला किसी मस्जिद का होता तो क्या ये लोग ऐसे ही वक्तव्य देते? ध्यान रखने की बात है कि यहां से 200 - 300 मीटर दूर हिंदू आबादी है। उनमें से कोई वहां आने तक का भी साहस नहीं जुटा पाता था। मंदिर संभालने वाले परिवार का बयान है कि पुजारी रखकर नियमित पूजा अर्चना की कोशिश की गई लेकिन डर इतना था की कोई जाने का साहस नहीं जुटा सका। धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय ने मंदिर के स्थानों को कब्जाना शुरू कर दिया। वहां जल डालने के लिए स्थित पीपल का पेड़ भी काट दिया गया। हमारे यहां पीपल का पेड़ काटना कितना बड़ा पाप माना जाता है।
नक्शा देखकर पुलिस प्रशासन मंदिर के अतिक्रमित स्थान को बुलडोजर से ध्वस्त कर रहा है। बदले माहौल का असर देखी लोगों ने खुद भी अतिक्रमण हटाना शुरू कर दिया और कमरे पर आकर बोल रहे हैं कि उन्हें इससे कोई समस्या नहीं। लोग साहस करके मंदिर पर कब्जा करने वालों का नाम भी बता रहे हैं। कितनी भयावह स्थिति रही होगी कि जानते हुए भी हिंदू समाज वहां मंदिर में पूजा करने का साहस इतने लंबे समय तक नहीं दिखा पाया। सरायतरीन कायस्थान मोहल्ले की घटना तो 32 वर्ष की है लेकिन खग्गू सराय के मामले में इतना लंबा समय गुजरने के बाद जिनकी उम्र आज 50 - 55 की होगी उन्हें पता भी नहीं होगा कि कोई मंदिर था। इस बीच तीन पीढियां हुई होंगी। धीरे -धीरे मंदिर ही विस्मृति के गणित में चला गया। किंतु ऐसे धर्मस्थलों का संस्कार स्मृतियां कभी समाप्त नहीं होने देता। पुराने लोग अपने परिवारों में या अन्य जगह इसकी चर्चा करते हैं और जब विषय सामने आता है तब लोग उन बातों को बताने लगते हैं। एक- दो लोगों ने पूरे मंदिर का नक्शा तक बता दिया। यह भी बताया कि खुलने पर दीवारों पर छह दीपक रखने का स्थान मिलेगा और वाकई मिला।मंदिर में बंद होने के समय चढ़ाए गए सिक्के भी मिले। मंदिर के एक कक्ष में मूर्तियां है और एक कमरा खाली है। इसके दो दरवाजे हैं। किस तरह उसे चारों तरफ से ढंका गया होगा इसकी कल्पना की जा सकती है। पूरब में स्थित मुख्य प्रवेश द्वार को लगभग 30 वर्ष पहले 4 फीट दूरी पर दीवार खड़ा कर बंद कर दिया गया। निकासी द्वार उत्तर और दक्षिण की ओर है जिन पर ताला लगा हुआ था। पाटा गया कूप दक्षिण द्वार के सामने था। सरायतरीन वाला मंदिर 15 फीट ऊंचा और 25 मीटर में बना है। इस पर पधान बुद्धसैन 1982 लिखा जा रहा है। शायद 1982 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया।
धार्मिक पुस्तकों में संभल को सनातनियों या हिंदुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। आज वहां अनेक मंदिरों का अस्तित्व नहीं है। यहां तक की श्मशान घाट को भी कब्जाए जाने की जानकारी आई है। स्कंदपुराण, विष्णु पुराण से लेकर कई ग्रंथों के उदाहरण दिए जा रहे हैं जिनमें कलयुग में भगवान विष्णु के कल्की अवतार वहां होने का उल्लेख है। जिस हरि मंदिर की महत्ता के विवरण अंग्रेजों के सर्वे से लेकर आईने अकबरी और बाबरनामा में है उसका अस्तित्व नहीं है। इस्लामी आक्रमण के काल में बाबर से लेकर मोहम्मद बिन तुगलक आदि द्वारा हिंदू स्थलों को ध्वस्त करने के विवरण उपलब्ध हैं। स्वतंत्रता के बाद भी वहां मंदिर कब्जाए गए और लगभग 21 कूपों को बंद करने या कब्जा करने की बात सामने आई है। यह स्थिति जारी है तो मानना पड़ेगा कि उस मानसिकता के लोग आज भी हैं। योगी आदित्यनाथ द्वारा पिछले दिनों संभल से बांग्लादेश तक हिंसा करने वालों के अंदर बाबर का डीएनए बताने वाले बयान पर हंगामा मचा है। उन्होंने किसी आम मुसलमान के बारे में बात नहीं की। जो आज भी धर्मस्थलों पर कब्जा करना मजहबी दायित्व मानते हैं और कब्जे किए जगह की छानबीन तक पर मरने-मारने को उतारू हैं उन्हें क्या माना जाए? दुर्भाग्य है कि सेक्यूलरवाद के नाम पर नेता, एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी जानते हुए भी कटु सच के विपरीत इसकी बात करने वाले या पीड़ित पक्ष को ही दोषी ठहराते हैं। संभल हिंसा में मृतकों के लिए छाती पीटने वाले हिंसा करने वालों के विरुद्ध कोई बोलने को तैयार नहीं है।
इस कारण किसी समुदाय के लोगों का दुस्साहस कितना बढ़ता है इसका प्रमाण संभल में ही मिल रहे बिजली के अवैध कनेक्शन, मंदिरों के बंद होने और अतिक्रमणों से मिलता है। खग्गू सराय मोहल्ले में पांच मस्जिदों और इसके आसपास के लगभग ढाई सौ घरों में बरसों से कटिया लगाकर बिजली का उपयोग किया जा रहा था। संभव नहीं कि इसकी जानकारी प्रशासन या बिजली विभाग को नहीं हो। बावजूद वातावरण ऐसा था कि कोई इनको पकड़ने, रोकने और प्रत्यक्ष कानूनी कार्रवाई का साहस नहीं कर पाया। मस्जिद मजहबी स्थान है और पांच मस्जिदों में कटिया लगाकर बिजली लिए जा रहे थे तथा करीब ढाई सौ अन्य घरों में बिजली आपूर्ति हो रही थी। एक मस्जिद में चोरी की बिजली से 59 पंखे ,फ्रिज, वाशिंग मशीन, एसी, कूलर , और 25 अन्य बिजली के प्वाइंटों के उपयोग का मामला दर्ज हुआ है। कोई इसके विरुद्ध बोलने का साहस तक नहीं दिख रहा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 1978 के दंगों के न्याय को लेकर जैसा कड़ा बयान दिया है तथा सरकार की जैसी प्रतिबद्धता दिखी है उससे उम्मीद पैदा हुई है मुकदमों के बंद फाइलें खुलेंगी, नए सिरे से न्याय होगा और केवल संभल नहीं पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसे उपासना या अन्य स्थलों का भी उद्धार होगा क्योंकि यह अकेली घटना नहीं है। जगह-जगह ऐसे मंदिरों के समाचार आने लगे हैं।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 ,मोबाइल- 9811027208
मंगलवार, 24 दिसंबर 2024
सर गंगा राम अस्पताल ने रॉयल केयर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के साथ मिलकर पार्किंसंस और आवश्यक कंपन उपचार में MRgFUS तकनीकी का उपयोग कर एक नई क्रांति की शुरुआत की
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