शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

युवा पीढ़ी को बर्बाद करती मोबाइल की लत


बसंत कुमार

कुछ समय पूर्व मुझे एक हास्य कवि सम्मेलन में जाने का अवसर मिला जिसमे देश के कई नामी हास्य कवि हिस्सा ले रहे थे। सम्मेलन में एक हास्य कवि ने मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल पर व्यंग करते हुए पति पत्नी के रिश्तों के बीच आई खटास पर एक किस्सा सुनाया। " पति ने पत्नी से कहा कि मेरी इक्षा है कि मरने से पहले मैं पोते का मुह देख लू, इस पर पत्नी ने कहा कि शुकर करो हमारे जमाने में मोबाइल नहीं था इस कारण बेटे और बेटी का मुह देख लिया अब आज के मोबाइल युग में पोते का मुह देखने की इक्षा मत पालो। यह कथन निश्चित रूप से मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल पर एक व्यंग था पर यह हमारी जिंदगी में असल रूप ले रहा है। आज लोग मोबाइल के इस्तेमाल में इतना घुस गए है कि अपने आस पास की दुनिया को भूल कर हर समय मोबाइल के स्क्रीन पर उंगलिया चलाते रहते है, इसलिए अब यह चर्चा आवश्यक हो गई है कि मोबाइल की इस लत से छुटकारा पाने के लिए क्या प्रयास किए जाए।

वर्ष 1973 में मोबाइल के अविष्कारक मार्टिन कूपर ने मोबाइल के रूप में दुनिया को एक सुंदर उपहार दिया। और हम इसे अपने लोगों से हर समय जुड़े रहने के लिए एक वरदान समझने लगे। यह हमारे संचार का सबसे सस्ता और सबसे सुलभ साधन माना जाने लगा क्योंकि मोबाइल इंटरनेट के जरिये हमे मिनटो में अनेक जनकारिया उपलब्ध करा देता था और लोग कुछ जानने के लिए अपने दिमाग और अपनी स्मरण शक्ति का इस्तेमाल करना भूल गए। पर कुछ वर्षो से हम अपने पास मोबाइल न होने पर असहाय महसूस करने लगे है और अब ऐसा लगने लगा है कि डिजिटल इंडिया का मार्ग मोबाइल की दुनिया से ही गुजरता है और इसके बगैर डिजिटल इंडिया की कंसेप्ट ही अधूरी रह जायेगी। इसकी बढ़ती हुई लत आने वाले समय में हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर देगी। क्योंकि मोबाइल की लत लग जाने से व्यक्ति अपने लोगों से तो दूर हो जाता है पर अपने आप को मोबाइल से दूर नहीं कर पाता है और इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि मोबाइल की लत से छुटकारा पाने के लिए हम घंटो मोबाइल पर ही लगा देते है।

आज व्यक्ति मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से निम्नलिखित समस्याओ से घिर गया है जिनका निदान आवश्यक् हो गया है-

1- अपनो से दूरी- पहले मोबाइल को अपनो से जोड़ने की परिभाषा के रूप में जाना जाता था पर आज के समय में मोबाइल अपनो से दूरी का मोबाइल बन गया है। व्यक्ति एक कमरे में एक साथ बैठे होने के बावजूद एक दूसरे में रुचि नहीं दिखाता और अपने अपने मोबाइल स्क्रीन को रोल करता रहता है और उसकी इस लत से उनके अपनो के साथ रिश्ते कमजोर हो रहे है, यहा तक की पति पत्नी के के मधुर रिश्तों में युवा अवस्था में ही कड़वाहट आ रही है और उनकी शादी शुदा जिंदगी में तलाक़ तक की नौबत आ रही है और मोबाइल युग के बाद समाज में तलाक़ के मामलो में वृद्धि हो रही है।

2- स्वास्थ पर बुरा प्रभाव- मोबाइल के लगतार इस्तेमाल से उससे निकलने वाले रेडिएशन से व्यक्ति को हृदय से संबंधित बीमारी हो सकती है और इसके अतिरिक्त आँखों की रोशनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे बच्चो को छोटी आयु में ही चश्मे लग रहे है, साथ ही सिरदर्द, नीद न आना, चिड़चिड़ापन, याददाश्त कमजोर होना और अन्य स्वास्थ संबंधित बीमारिया घेर रही है। विधार्थी हर समय मोबाइल में खोये रहते है और इस तरह खुद अपने आप से दूर होते जा रहे है और बीमारियों का शिकार होते चले जा रहे है।

3- मोबाइल की लत के कारण प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाना-- बेशक आज के युग में टेक्नोलॉजी के माध्यम से विकास के दौड़ में विश्व के अन्य देशों को टक्कर दे रहे है और टेक्नोलॉजी मुहैय्या कराने में मोबाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है पर आज मोबाइल की लत के कारण हम घंटो मोबाइल के साथ बैठे रहते है जिससे हमारे अन्य काम पीछे छूट जाते है, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता और हम अपने काम और व्यवसास में अपना पूरा ध्यान नहीं लगा पाते है।

4- मोबाइल की लत से लोग नो मोफोबिया के शिकार हो रहे है इस बीमारी में शिकार व्यक्ति मोबाइल न मिलने पर बहुत परेशान और पैनिक हो जाता है और कभी कभी नीद से उठ जाता है तथा मोबाइल को अपने से दूर नहीं रख पाता है और कभी कभी तो उसे मोबाइल पर बार बार काल आने का आभास होने लगता है।

 यह सही है कि मोबाइल के अविष्कार ने मोबाइल के रूप में दुनिया को एक सुंदर उपहार दिया था परन्तु आज व्यक्ति मोबाइल के उपयोग के स्थान पर मोबाइल के इशारे पर चलने लगा है, आज हम अपनी हर समस्या का इलाज मोबाइल पर ढूढ़ रहे है और यही कारण है कि लोगों को अपने आप से दूर करते हुए उन्हें अनेक बीमारियों के नजदीक ला रहा है तथा स्वास्थ, आजीविका और अध्ययन से दूर कर रहा है इसलिए हमे मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए और इसे सूचना के माध्यम के तौर पर ही इस्तेमाल करना चाहिए।

देश में मोबाइल क्रांति का आना सूचना के आदान प्रदान के लिए एक वरदान था पर जिस प्रकार यह हमारे बूढ़े, युवाओ, बच्चो यहाँ तक की 2-3 वर्ष के शिशुओ में एक एडिक्शन के रूप में घर कर चुका है कि लोगों को परिवार और समाज के सदस्यों के लिए समय ही नहीं बचा है, लोग सोते जागते मोबाइल में ही लिप्त पाये जाते है और यहाँ तक की युवा पति पत्नी मोबाइल की लत के आगे एक दूसरे को समय नहीं दे पा रहे है, अगर भविष्य में युवाओ की मोबाइल लत पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में सरकार को जनसंख्या रोकने और जन संख्या नियंत्रण पर कदम उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि यह काम युवाओ में मोबाइल की लत ही पूरी कर देगी।

बुधवार, 10 जुलाई 2024

एक समझदार मां की नसीहत...?

सुबह ही सुबह मियां बीवी के बीच खूब झगड़ा हुआ...
 
बीवी गुस्से मे बोली - बस, बहुत कर लिया बर्दाश्त, अब मज़ीद एक मिनट भी तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।

शोहर भी गुस्से मे था, बोला "मैं भी तुम्हारी शक्ल देख देखकर तंग आ चुका हुं, दफ़्तर से घर आऊ तो तुम मुझे नज़र ना आना घर मे, उठाओ अपना सामान और निकलो यहां से और शोहर गुस्से मे ही दफ्तर चले गया।

बीवी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया के वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चो समेत मायके आ रही है, अब ज़्यादा नही रह सकती इस जहन्नुम में।

मां ने कहा - अल्लाह के बंदे की बेटी बन के आराम से वहीं बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने शौहर से लड़ कर आई थी, और इसी ज़िद्द मे तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तूने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तूने इधर कदम भी रखा तो... सुलह कर ले शौहर से, वो इतना बुरा भी नहीं है।

मां ने जब लाल झंडी दिखाई तो बीवी के होश ठिकाने आए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थकी तो दिल हल्का हो चुका था, शौहर के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी भी काफ़ी गलतियां नज़र आई, हाथ मुंह धोकर फ्रेश हुई और शोहर के पसंद की डिश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को शौहर से माफ़ी मांग लूंगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है।

शौहर शाम को जब घर आया तो बीवी ने उनका अच्छे से इस्तकबाल किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो।

शौहर को भी खुशगवार हैरत हुई, खाना खाने के बाद शौहर जब खीर खा रहे थे तो आँखों में आंसू आ गए और बोले "बेगम, कभी कभार मे भी ज़्यादती कर जाता हुं, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हुं, गुस्सा आ ही जाता है।"

शौहर बीवी का शुक्रिया अदा कर रहे थे, और बीवी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

याद रखो अगर वालिदैन अपनी शादीशुदा औलाद की नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर दे तो रिश्ते बच जाते है।

मंगलवार, 9 जुलाई 2024

नई पेंशन प्रणाली के स्थान पर सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को तत्काल लागू किया जाए: भारतीय पेंशन मजदूर संघ

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय पेंशन मजदूर संघ वर्ष 2004 से एनपीएस को समाप्त कर पुरानी पेंशन योजना अर्थात सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को लागू करने की मांग कर रहा है। महासंघ ने कई बार अपने त्रिवार्षिक सम्मेलनों और केंद्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठकों में इस विषय पर प्रस्ताव पारित कर सरकार से नई पेंशन प्रणाली को समाप्त कर सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को लागू करने की मांग की है।

इस मामले पर कई बार आंदोलन के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है। महासंघ द्वारा 22 नवंबर 2023 को नई दिल्ली में एक विशाल रैली और धरना आयोजित किया गया था और माननीय वित्त मंत्री को ज्ञापन सौंपा गया था। तब माननीय वित्त मंत्री ने बताया था कि भारत सरकार के वित्त सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है।  और इस मामले पर कोई भी निर्णय समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद लिया जाएगा। 

महासंघ को यह नहीं पता कि समिति की रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की गई है या नहीं। इस बीच, सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों को सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) के तहत निर्धारित न्यूनतम पेंशन से बहुत कम पेंशन मिल रही है, और उन्हें समय-समय पर संशोधित महंगाई राहत का लाभ भी नहीं मिल रहा है। इससे कर्मचारियों में भारी असंतोष है। 

भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी 13 जून 2024 को देहरादून में सर्वसम्मति से संकल्प लेती है कि 2004 से पहले लागू पेंशन योजना, सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए तुरंत लागू किया जाना चाहिए, जिसके तहत अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए और उस पर महंगाई राहत भी प्रदान की जानी चाहिए। पहले की तरह वेतन आयोगों में पेंशन संशोधन का लाभ भी दिया जाना चाहिए।  प्रस्तावक: श्री राजेश तिवारी, संगठन सचिव, बी.पी.एम.एस. अनुमोदित: श्री बलकार सिंह, सचिव, बी.पी.एम.एस.
केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए आठवां वेतन आयोग गठित किया जाए-
केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए प्रत्येक 10 वर्ष पर वेतन आयोग गठित किया जाता रहा है।
सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1 जनवरी 2016 से वेतनमान संशोधित किए गए तथा 1 जुलाई 2017 से भत्ते संशोधित किए गए। इस प्रकार अलग-अलग तिथियों से वेतन एवं भत्ते संशोधित करने से कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान होता है तथा उनमें असंतोष पैदा होता है। पिछले वेतन आयोगों में भी ऐसा हुआ था। इसलिए कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार को अविलम्ब आठवें वेतन आयोग का गठन करना चाहिए।
भारतीय श्रमिक मजदूर संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी सर्वसम्मति से संकल्प लेती है कि भारत सरकार द्वारा अविलम्ब आठवें वेतन आयोग का गठन किया जाना चाहिए।  वेतन आयोग की रिपोर्ट जुलाई 2025 से पहले प्रकाशित की जानी चाहिए तथा वेतन एवं भत्ते 01 जनवरी 2026 से संशोधित दरों पर लागू किए जाने चाहिए। 

प्रस्तावकर्ता: श्री पीयूष सिंह परिहार, सीईसी सदस्य, बीपीएमएस, समर्थनकर्ता: श्री रवींद्र कुमार मिश्रा, सचिव, बीपीएमएस, रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत रिक्त पदों को तत्काल भरा जाना चाहिए-
रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न विभागों में कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण कर्मचारियों पर कार्यभार अत्यधिक है, जिससे उनकी कार्यकुशलता प्रभावित हो रही है। लगभग सभी रक्षा प्रतिष्ठानों में बड़ी संख्या में रिक्त पदों को स्थायी कर्मचारियों से भरने के बजाय आउटसोर्स या अनुबंध कर्मचारियों से काम कराया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभाग के लिए यह उचित नहीं है।
देश में बेरोजगारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, रिक्त पदों को भरकर बेरोजगारी को कुछ हद तक दूर अवश्य किया जा सकता है।
भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से संकल्प लिया कि भारत सरकार को रक्षा मंत्रालय के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों को भरने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
प्रस्ताव: श्री शशि भूषण राय, सीईसी सदस्य, बीपीएमएस, अनुमोदन: श्री पी विद्यासागर, सचिव, बीपीएमएस

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

संसद से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदू-मुसलमान की चर्चा

बसंत कुमार

18वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हिंदू सहिष्णु या हिंसक का विवाद थमा ही नहीं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में धार्मिक सभाओं में बड़े पैमाने पर दलित व आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर धर्मांतरण नहीं रुका तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जाएगी। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल एक धर्म परिवर्तन कराने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह बात सामने आई है कि धार्मिक समाग़मों के जरिये दलितों और गरीब लोगों को गुमराह करके ईसाई बनाया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म के प्रचार शब्द का अर्थ बढ़ावा देना है लेकिन इसका अर्थ एक व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। ऐसे आयोजन से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद किसी को भी धर्म मानने, पूजा करने और किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत देता है।" पर यह धर्म किसी को डरा-धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता। अब प्रश्न यह उठता है कि देश के किसी नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए, या जो व्यक्ति जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म ले लिया है उसे जीवन पर्यन्त वही धर्म अपनाना होगा जैसा कि भारत में जन्मा कोई व्यक्ति जीते जी अपनी जाति नहीं बदल सकता।

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सभी सभी धर्मों और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है। शिव जी कहते हैं डरो मत डराओ मत, वह अहिंसा की बात करते हैं। लेकिन जो लोग अपने आपको हिंदू कहते हैं वो लोग 24 घंटे नफरत की बात, हिंसा की बात करते हैं। राहुल गांधी के दिए भाषा को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक रही और उनसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आज हिंदुओं पर झूठा आरोप लगाने की साजिश हो रही है, और कहा जा है कि हिंदू हिंसक होते है और देश इसे शताब्दियों तक नहीं भूलेगा। ये यही लोग है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने की कोशिश की, यह देश इसे माफ नहीं करेगा। सदन में यह दृश्य देखकर अब हिंदू समाज को सोचना पड़ेगा कि क्या यह अपमानजनक बयान कोई संयोग है या बड़े प्रयोग की तैयारी है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धरित करते हुए कहा "मैं उस धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और वैश्विक स्वीकृति सिखाई परंतु यह कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि उसी सहिष्णु और वैश्विक स्वीकृति वाले देश में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष हिंदू धर्म को हिंसक कहने और सहिष्णु कहने पर आमने-सामने खड़े हैं।

लगभग दो वर्ष पूर्व जब दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के विरोध में मुसलमानों ने करीब 6 माह तक सड़क जाम किए रखा तब किसी राजनीतिक दल के नेता ने मुसलमानों को हिंसक कहने का साहस नहीं दिखाया। यह सही है कि कुछ अंधभक्त हिंदू राम के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं और अपने ही धर्म के दलितों और आदिवासियों को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे उन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते, पर क्या धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वालों के कारण हिंदू धर्म की सहिष्णुता और स्विकारिता पर प्रश्न खड़ा कर सकते है, कैसा दुर्भाग्य है कि जिन लोगों को हमारे देश की आर्थिक प्रगति, किसानो की समस्या, युवाओ की बेरोजगारी कि समस्या को सुलझाने के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए वे आपस में नकली और असली हिंदू की बहस पर लड़ रहे है। पर इस देश की जनता सब समझती है और आगे आने वाले चुनावों में किसी भी दल को अब जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले है अब लोग हिंदू मुस्लिम नहीं बल्कि रोजी, रोटी और विकास के नाम पर मिलेगा।

संभवत :पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां संसद से लेकर उच्च न्यायपालिका में गरीब, बेरोजगारी, दशकों से न्यायालयों में करोड़ों लंबित मुकदमे और विकास पर विचार करने और उनके सुलझाने हेतु आवश्यक कदम उठाने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्म विशेष के सहिष्णु या आक्रमक होने के मुद्दे पर बहस करते हैं और उच्च न्यायालय भी दशकों से लंबित मुकदमो को निपटाने और करोड़ों परिवारों को न्याय दिलाने के बजाय धर्मांतरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर अपना फैसला देते है जबकि यह प्रकृति का नियम है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी लोग पर्याप्त रूप से शिक्षित हो जिससे स्वेच्छा से अपने धर्म का चयन कर सकें, हां जिस दिन देश में व्यक्ति को अपनी इच्छा से अपने कर्म और जाति चुनने की आजादी मिल जाएगी तब देश में सही लोकतंत्र होगा।

गुरुवार, 4 जुलाई 2024

संसद से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदू-मुसलमान की चर्चा


 बसंत कुमार

18वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हिंदू सहिष्णु या हिंसक का विवाद थमा ही नहीं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में धार्मिक सभाओं में बड़े पैमाने पर दलित व आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर धर्मांतरण नहीं रुका तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जायेगी। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल एक धर्म परिवर्तन कराने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह बात सामने आई है कि धार्मिक समाग़मों के जरिये दलितों और गरीब लोगों को गुमराह करके ईसाई बनाया जा रहा है, कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म के प्रचार शब्द का अर्थ बढ़ावा देना है लेकिन इसका अर्थ एक व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। ऐसे आयोजन से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद किसी को भी धर्म मानने, पूजा करने और किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत देता है। पर यह धर्म किसी को डरा धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता, अब प्रश्न यह उठता है कि देश के किसी नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिये या जो व्यक्ति जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म ले लिया है उसे जीवन पर्यन्त वहीं धर्म अपनाना होगा जैसा कि भारत में जन्मा कोई व्यक्ति जीते जी अपनी जाति नहीं बदल सकता।

आज के आधुनिक युग में अगर देश के किसी गांव में किसी से पूंछ लिया जाए कि गांव में किस धर्म के मानने वाले कितने लोग रहते हैं तो अमूमन जवाब मिलता है कि इस गांव में इतने घर हिंदू के है, इतने घर मुसलमानो के है और इतने घर हरिजनों (दलितो) के है अर्थात कुछ धर्मांध अभी भी दलितों को हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते और दलित मुसलमानों की हिंसक प्रवृत्ति के कारण अपने आपको उनसे जोड़ नहीं पाते जैसा बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया में लिखा है और उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना और जोगिंदर नाथ मण्डल के दलित मुस्लिम अलायंस का परिणाम भी देखा है। इसी कारण अधिकांश दलित व आदिवासी स्वयंभू हिंदू ठेकेदारों के रवैये से दुखी होकर ईसाई धर्म की ओर उन्मुख हो रहे है। कुछ सनातन के पोषक तो मेरिट की आड़ में संविधान द्वारा दलितों और आदिवासियों को संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का भी विरोध करते है। इसके बावजूद कुछ दलित आदिवासी यह जानते हुए कि उनके ईसाई धर्म अपनाने पर उनको मिलने वाली आरक्षण की सुविधाएं समाप्त हो जायेगी फिर भी वे ईसाई धर्म अपना रहे है। इस विषय पर हिंदू धर्म गुरुओं और नेताओ को इस बात पर विचार करना होगा कि क्या कारण है कि बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासी ईसाई धर्म क्यों अपना रहे है। माननीय उच्च न्यायालय को धर्मांतरण पर अपना विचार देते समय इस तथ्य की ओर अपने विचार भी रखने चाहिए थे।

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा-सभी सभी धर्मो और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है। शिव जी कहते हैं डरो मत डराओ मत, वह अहिंसा की बात करते है। लेकिन जो लोग अपने आप को हिंदू कहते है वो लोग 24 घंटे नफरत की बात, हिंसा की बात करते है। राहुल गांधी के दिये भाषा को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक रही और उनसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आज हिंदुओ पर झूठा आरोप लगाने की साजिश हो रही है, और कहा जा है कि हिंदू हिंसक होते है और देश इसे शताब्दियों तक नहीं भूलेगा। ये यही लोग है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने की कोशिश की, यह देश इसे माफ नहीं करेगा। सदन में यह दृश्य देखकर अब हिंदू समाज को सोचना पड़ेगा कि क्या यह अपमानजनक बयान कोई संयोग है या बड़े प्रयोग की तैयारी है।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धरित करते हुए कहा "मै उस धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और वैश्विक स्वीकृति सिखाई परंतु यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसी सहिष्णु और वैश्विक स्वीकृति वाले देश में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष हिंदू धर्म को हिंसक कहने और सहिष्णु कहने पर आमने सामने खड़े है।

लगभग दो वर्ष पूर्व जब दिल्ली के शाहीनबाग में सीएए के विरोध में मुसलमानों ने करीब 6 माह तक सड़क जम किए रखा तब किसी राजनीतिक दल के नेता ने मुसलमानों को हिंसक कहने का साहस नहीं दिखाया। यह सही है कि कुछ अंध भक्त हिंदू राम के नाम पर हिंसा फैला रहे है और अपने ही धर्म के दलितों और आदिवासियों को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे उन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते, पर क्या धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों के कारण हिंदू धर्म की सहिष्णुता और स्वीकारिता पर प्रश्न खड़ा कर सकते है, कैसा दुर्भाग्य है कि जिन लोगों को हमारे देश की आर्थिक प्रगति, किसानो की समस्या, युवाओं की बेरोजगारी कि समस्या को सुलझाने के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए वे आपस में नकली और असली हिंदू की बहस पर लड़ रहे है। पर इस देश की जनता सब समझती है और आगे आने वाले चुनावों में किसी भी दल को अब जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले है अब लोग हिंदू मुस्लिम नहीं बल्कि रोजी, रोटी और विकास के नाम पर मिलेगा।

संभवत:पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां संसद से लेकर उच्च न्यायपालिका में गरीब, बेरोजगारी, दशकों से न्यायालयों में करोड़ों लंबित मुकदमे और विकास पर विचार करने और उनके सुलझाने हेतु आवश्यक कदम उठाने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्म विशेष के सहिंष्णु या आक्रमक होने के मुद्दे पर बहस करते है और उच्च न्यायालय भी दसको से लंबित मुकदमो को निपटाने और करोड़ों परिवारों को न्याय दिलाने के बजाय धर्मांतरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर अपना फैसला देते है जबकि यह प्रकृति का नियम है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी लोग पर्याप्त रूप से शिक्षित हो जिससे स्वेच्छा से अपने धर्म का चयन कर सके हां जिस दिन देश में व्यक्ति को अपनी इक्षा से अपने कर्म और जाति चुनने की आजादी मिल जायेगी तब देश में सही लोकतंत्र होगा।

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