गुरुवार, 20 जून 2024
स्वतंत्र पत्रकारों के लिए अपनी आय बढ़ाने के कुछ सुझाव
देश में बढ़ती वीआईपी कल्चर और उसका दुष्प्रभाव
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| बसंत कुमार |
देश की राजधानी दिल्ली में लगभग डेढ़ दशक पूर्व समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया जा रहा था और और इस आंदोलन की आड़ में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, जनरल वीके सिंह, गोपाल राय, संजय सिंह और न जाने कितने नेता आये और मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री. उप राज्यपाल, प्रदेश में मंत्री बनने में सफलता प्राप्त की। उस समय इन सभी नेताओ ने सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक आदर्शों को अपनाने और वीआईपी कल्चर से दूर रहने की बात की थी। अरविंद केजरीवाल ने खुले मंच से ऐलान किया था कि जब मैं जीवन में मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा तो न सरकारी बंगला लूंगा, न सुरक्षा लूंगा और न ही सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल करूंगा। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने किए गए वायदों को झुठलाते हुए करोड़ों रुपए खर्च करके आलिशान बंगला तैयार कराया और इतनी बड़ी सुरक्षा ली कि जब दिल्ली की सड़कों पर उनका काफिला चलता है तो कि यह अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकला एक व्यक्ति नहीं बल्कि किसी स्टेट का महाराजा निकल रहा है और जहां तक शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने की बात है तो शराब घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में स्वयं केजरीवाल, उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और एक मंत्री सतेंद्र जैन जेल में है और एक सांसद जमानत पर जेल के बाहर हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जिस वीआईपी कल्चर को हटाने के वादे पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने तीन-तीन बार मुख्यमंत्री चुना, क्या भारतीय समाज से यह हट सकता है, क्योंकि देश में लाखों वीआईपी लोगों को सुरक्षा उपलब्ध कराने के नाम पर लाखों पुलिस कर्मी लगा दिये जाते है और लोगों की सुरक्षा राम जी के भरोसे चलती है।
इस वीआईपी कल्चर ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व के देशों को प्रभावित किया है। विगत 10-15 वर्षों में जिस प्रकार से इस समस्या ने भारत की अर्थव्यवस्था एवं लॉ एंड ऑर्डर को प्रभावित किया है वह चिंतनीय है। विश्व के सबसे विकसित राज्य अमेरिका में वीआईपी की संख्या 252 है, फ्रांस में कुल 109 वीआईपी है, जापान में कुल 125 वीआईपी है, रूस में 312, जर्मनी में 142 और आस्ट्रेलिया में 205 वीआईपी है परंतु भारत जहां देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजारा करती है वहां पर इन वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है और सरकार को इनकी सुरक्षा, मुफ्त हवाई यात्रा, चिकित्सा आदि पर करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ता है। हमारे देश में कुछ वीआईपी उम्र के ऐसे पड़ाव पर है जिनके पास यम राज के अलावा और कोई नहीं आने वाला पर उनकी सुरक्षा के लिए वाई प्लस और जेड प्लस सुरक्षा के नाम पर दर्जनों पुलिस कर्मी सुरक्षा का घेरा बनाये रखते है।
जिन गुंडों और भूमाफियाओ के आतंक से पूरा समाज डरा और सहमा रहता है और ये लोग जहां खड़े हो जाते हैं तो भय वश लोग उनके पैर छूने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लाइन लगा देते है और इन गुंडों भूमाफियाओ की सुरक्षा में तैनात वर्दीधारी पुलिस कर्मी इनका बैग पकड़े खड़ा रहता है, इन स्वयंभू वीआईपी लोगों की सुरक्षा इतनी आवश्यक होती हैं कि थाने में स्टाफ है या नहीं इसकी परवाह नहीं करते, यदि कही थाने में इमर्जेंसी में पुलिस फोर्स की आवश्यकता पड़ जाए तो थानाध्यक्ष स्टाफ न होने की अपनी लचरि बता देता है, क्योंकि अधिकांश फोर्स तो इन फर्जी वी आई पीयो की सुरक्षा और सेवा में लगी होती है। कैसी त्रासदी है कि जो पुलिस फोर्स आम जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी वह उन नागरिको की सुरक्षा में मौजूद रहने के बजाय क्षेत्र में दौरे पर आये सांसदो और मंत्रियों की सेवा सुसरुशा में खड़ी रहती है। आखिर यह वीआईपी कल्चर भारत जैसे लोकतंत्रिक देश में पूरे सिस्टम का सत्यानाश कर देगी।
सांसदो, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों की बात तो छोड़ दीजिये, उन छुट भैये नेताओ जो जीवन में कभी कभी सांसद, विधायक या पार्षद नहीं बने उन्हें सिर्फ जनता के उपर रोब जमाने के लिए पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराना और वीआईपी स्टेट्स देना कितना हाष्यास्पद् लगता है, मैने अपनी आँखों से ऐसे नेताओ को मिली पुलिस सुरक्षा देखा है जिनके उपर 10-15 क्रिमिनल केस पेंडिंग है अर्थात जिन लोगों को पुलिस कस्टडी में होना चाहिए था उनको पुलिस द्वारा सुरक्षा प्रदान करवाई जा रही है। कहा जाता है ये लोग जुगाड़ करके एल आई यू से फर्जी रिपोर्ट प्राप्त कर लेते है कि इन्हे खतरा है और इस आधार पर इन्हे पुलिस सुरक्षा मिल जाती है और सरकार को इस पर करोड़ो रुपए खर्च करने पड़ते है। यह एक जांच का विषय है कि सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार एलआईयू रिपोर्ट निष्पक्ष रूप से बिना किसी प्रलोभन के दी जाती है, क्योंकि प्राय: यह देखा गया है कि कुछ ऐसे लोगों को वीआईपी सुरक्षा प्रदान कर दी जाती है जिनको इसकी जरूरत नहीं होती।
इस देश में आजादी के बाद राम धारी सिंह दिनकर, सुमित्रा नंदन पंत, बिस्मिला खान, प. हरि प्रसाद चौरसिया जैसे अनेक साहित्यकार और पृथ्वी राज कपूर, दिलीप कुमार जैसे अनेक कलाकार दिये पर इनमे से किसी को भी वीआईपी मानकर कभी वाई या जेड की सुरक्षा नहीं दी गई पर आज शाहरुख खान, सलमान खान या अक्षय कुमार को इतनी सिक्योरिटी क्यों?
आखिर इन लोगों को वीआईपी बनाकर कर सुरक्षा कवच देने का औचित्य क्या है और इन तमाम लोगों को वीआईपी दर्जा देने के लिए करदाताओं के ऊपर करोड़ों का बोझ पड़ता है जो सरासर गलत है, अब समय आ गए है कि सरकार इन वीआईपी सुरक्षा और उनको दिये जाने वाली व अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे और देश में वीआईपी लोगों की लाखों की संख्या सीमित करे। यह सही है कि देश ने आतंकवादियों के हाथों एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री खोया है फिर भी वीआईपी सुरक्षा के नाम पर छुटभैये नेताओ की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए बहाना व्यर्थ है।
भारत विश्व में इकलौता देश है जहां थानों में पुलिसकर्मियों का काम होम गार्ड करते है क्योंकि रेगुलर पुलिस कर्मी अधिकांश समय वीआईपी सुरक्षा में व्यस्त रहते और कुछ पुलिस कर्मी थानों में ड्यूटी करने के बजाय अपने उच्च अधिकारियों के बंगलों पर ड्यूटी लगवा कर साहब के बच्चों को स्कूल छोड़ने, कुत्तों को घुमाने का काम पसंद करते है और सरकारी चिकित्सालयों में मरीजों को फरमैसिस्ट् और वार्ड बॉय देखते है क्योंकि डॉक्टर्स तो इलाके के वीआईपी और नेताओ की देखरेख में व्यस्त रहते हैं आखिर देश में ये वीआईपी कल्चर कब समाप्त होगी।
मंगलवार, 18 जून 2024
पत्रकार आकिल हुसैन के पिता मो. जफर हुसैन हुए सपुर्द-ए-ख़ाक, लोगों में शोक की लहर
सोमवार देर रात अचानक हुआ निधन
शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का लगा तांता
नमाज-ए-जनाजा में हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे
काफी संख्या में सामाजिक व राजनीतिक लोग उनके निवास स्थान पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त करने पहुंचे
गांव में ही उनके अपने निजी कब्रिस्तान में किया गया सपुर्द-ए-ख़ाक
संवाददाता
इजरा। मधुबनी जिले के रहिका प्रखंड के इजरा पंचायत की मुखिया जाहिदा खातुन के पति व आकाशवाणी के जिला संवाददाता आकिल हुसैन के पिता मो. जफर हुसैन (70) का सोमवार रात के आकस्मिक निधन हो गया। निधन की खबर सुनते ही लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
स्वर्गीय मो. जफर हुसैन अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। स्वर्गीय मो. जफर हुसैन के बड़े बेटे मो. आदिल हुसैन गांव के ही मध्य विद्यालय में शिक्षक हैं जबकि छोटे बेटे मो. आकिल हुसैन पेशे से मधुबनी न्यायालय में बतौर अधिवक्ता व आकाशवाणी में जिला संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
स्वर्गीय मो. जफर हुसैन के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों में आरजेडी के राज्यसभा सांसद डॉ. फैयाज अहमद, पूर्व मंत्री विधायक समीर महासेठ, नगर निगम के डिप्टी मेयर अमानुल्लाह खान, मिथिला टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के डायरेक्टर हाफिज नियाज अहमद, क्रिप्स अस्पताल के चेयरमैन इम्तियाज नूरानी, पूर्व प्रमुख अब्दुल सलाम, मुखिया सनाउल्लाह, हेमंत सिंह, मनोज कुमार पूर्वे, हनुमान राउत, ब्रिलिएंट इंटरनेशनल स्कूल के अध्यक्ष अब्दुल हैई, राजद के युवा नेता आरिफ अंबर जिलानी, पत्रकार शैलेन्द्र कुमार, राम शरण साहु, मो. अली, मो. मुन्ना, अखलाक सिद्दीकी, मो. फिरोज, आर नेहाल, अशोक कुमार, अधिवक्ता सैफुल इस्लाम, पवन कुमार, कमरुल हुदा, तमन्ने, महताब आलम, कमालुददीन, मौलाना अनीसुर रहमान, आकिल अंजुम, नजरे आलम, मो. कामिल, असलम अंसारी, इश्तियाक समेत अन्य शामिल रहे।
सोमवार, 17 जून 2024
विभिन्न प्रकार की चाय और उसके फायदे
रविवार, 16 जून 2024
मोदी मंत्रिमंडल निरंतरता का द्योतक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल के बारे में यह टिप्पणी उचित नहीं लगता कि इसके पीछे गठबंधन दलों के साथियों का बहुत ज्यादा दबाव है । 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल में शीर्ष स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है। गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और यहां तक कि सड़क परिवहन , रेल तथा शिक्षा मंत्री भी पूर्व सरकार के ही है। विरोधी मोदी को तानाशाह या लोकतंत्र विरोधी की उपाधि देते रहे हैं। उनकी आलोचना अभी भी जारी है और वे कह रहे हैं कि मोदी गठबंधन सरकार नहीं चला पाएंगे क्योंकि उनका स्वभाव ही गैर लोकतांत्रिक है। इस तरह की विरोधी आलोचनाओं पर टिप्पणी करने की जगह हमें समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2001 से अभी तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रुप में कभी बहुमतविहीन सरकार नहीं चलाया । वह जिस तरह बड़े कठोर निर्णय साहस के साथ करते रहे हैं उनका ध्यान करते हुए अनेक लोगों का मानना है कि यह स्वभाव गठबंधन सरकार चलाने के रास्ते की बाधा बन जाएगा। गठबंधन सरकार को लेकर लोग आशंकाएं उठाएंगे लेकिन मोदी के अंदर सरकार चलाने तथा काम करने की इच्छा है। साथी दलों के सामने साथ मिलकर काम करने का जनादेश मिला है तो वो इसका ध्यान बिलकुल रखेंगे। वैसे मंत्रिमंडल गठन से लेकर विभागों के बंटवारे तक यह कहना कठिन है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दबाव में काम कर रहे हैं। थोड़े शब्दों में कहें तो नरेंद्र मोदी का 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल भारत के भविष्य को लेकर उनकी योजनाओं, राजनीतिक आवश्यकताओं , साथी दलों के बीच संतुलन बनाने के साथ अनुभव, उम्र आदि के बीच समन्वय बनाने की कोशिश है। पिछली सरकार के 37 मंत्री इसमें हैं। प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट की संख्या 31 है । पिछली सरकार में कैबिनेट की संख्या 26 थी। 16 सांसदों वाले तेलुगू देशम और 12 वाले जद यू को दो-दो मंत्री मिले हैं। कैबिनेट में 21 चेहरे पुराने हैं। भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की स्वास्थ्य मंत्री के रुप में वापसी हुई है। सहयोगी दलों में हिंदुस्तान आवाम मोर्चा ( हम ) के नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री 78 वर्षीय जीतन राम मांझी, जद यू के राजीव रंजन सिंह, तेलुगू देशम के 36 वर्षीय के राममोहन नायडू, लोजपा के 41 वर्षीय चिराग पासवान और 37 साल की रक्षा खड्से जैसी सरकार की सबसे युवा मंत्री को आधार बनाएं तो कैबिनेट का चेहरा आपकी समझ में आ जाएगा। पिछली सरकार में केवल तीन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के थे। इस बार इनकी संख्या 5 हो गई है। इनमें हरियाणा से रविंदरजीत सिंह , जम्मू कश्मीर से जितेंद्र सिंह और राजस्थान से अर्जुन राम मेघवाल की स्थिति पिछले सरकार के समान है। उत्तर प्रदेश से रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री बनाया गया है। पिछली बार 29 राज्य मंत्री थे, इस बार 36 हैं। मंत्रिमंडल में पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। 33 मंत्री पहली बार केंद्र सरकार का हिस्सा बने हैं जिनमें सात सहयोगी दलों के हैं।
इससे आगे सामाजिक संतुलन की दृष्टि से देखें तो पिछड़ी जातियों के 27 , अनुसूचित जाति के 10, अनुसूचित जनजाति के पांच और अल्पसंख्यक समुदाय के पांच मंत्री बनाए गए हैं। इस तरह पिछड़ा, अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति एवं अल्पसंख्यक समुदाय के 47 मंत्री हुए। देशव्यापी प्रतिनिधित्व की दृष्टि से देखें तो इनमें 24 राज्यों का प्रतिनिधित्व है। पंजाब से भाजपा का कोई सांसद नहीं है लेकिन रवनीत सिंह बिट्टू को राज्य मंत्री बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के परिणाम को देखते हुए माना जा रहा था कि वहां से कम मंत्री होंगे लेकिन 10 मंत्री बनाए गए हैं और बिहार से आठ। सात महिलाएं हैं। केरल में भाजपा की पहली बार विजई हुई है इसलिए सुरेश गोपी को मंत्री पद मिलना ही था। दूसरे नेता केरल भाजपा के महासचिव जॉर्ज कोरियन हैं जिन्होंने 1970 में जनसंघ से लेकर लगातार भाजपा के लिए संघर्ष किया था। बंगाल से दो लोकसभा सदस्यों डॉक्टर सुकांत मजूमदार और मतुआ समुदाय के शांतनु ठाकुर को राज्य मंत्री के रूप में शामिल किया गया है। इनमें सुकांत पहली बार मंत्री बने हैं लेकिन शांतनु पिछली सरकार में जुलाई 2021 से जहाजरानी राज्य मंत्री रहे हैं। सुकांत उत्तरी बंगाल से हैं तो शांतनु ठाकुर दक्षिण बंगाल के मतुआ समुदाय से हैं जो अनुसूचित जाति वर्ग में आते हैं। भाजपा ने उत्तर बंगाल की आठ में से 5 सीट पर जीत दर्ज की है। शांतनु ठाकुर कोलकाता से सटे उत्तर 24 परगना जिले में बनगांव सीट से जीते तो सुकांत उत्तर बंगाल की बालूरघाट सीट से। बंगाल में यदि बेहतर विजय मिली होती तो वहां से और मंत्री बनाए जाते। इस तरह कोई नहीं कह सकता कि यह मंत्रिमंडल कुछ क्षेत्र, समूह, कुछ जातियां या परिवारों तक सीमित है।
इन सबको एक साथ मिलाकर देखें तो पहले निष्कर्ष आएगा कि यह नीतियों और व्यवहार में निरंतरता का मंत्रिमंडल है । सीसीएस यानी सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2019 से हैं। इसलिए नीति में कोई बदलाव होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। वास्तव में भाजपा के अंदर बहुमत न मिलने से निराशा और चिंता अवश्य होगी किंतु 10 वर्षों के शासन में आंतरिक और बाह्य नीतियों में स्थायित्व आ चुका है। निश्चित रूप से विश्व की दृष्टि मंत्रिमंडल पर रही होगी और संदेश जा चुका है कि रक्षा, सुरक्षा, विदेश, वित्त सहित अन्य प्रमुख मामलों में नीतियां और व्यवहार स्थिर रहने वालीं हैं। सड़क परिवहन एवं अन्य निर्माण के क्षेत्र में नितिन गडकरी की भूमिका की प्रशंसा सभी दलों ने की है और सड़कों के मामले में भारत की विश्व स्तरीय पहचान बन चुकी है। विश्व भर के निवेशक सड़क सहित भारत की आधारभूत संरचना में निवेश करने के लिए खजाना खोल बैठे हैं और मंत्री परिषद की निरंतरता से वे आश्वस्त हुए होंगे । एक पार्टी की बहुमत तथा गठबंधन की सरकार के कार्य व्यवहारों में अंतर रहा है। लेकिन कोई सरकार ऐसी नहीं होगी कि पुलवामा जैसी घटना के प्रत्युत्तर पर गठबंधन में मतभेद की चिंता में उस तरह का कदम न उठाया जाए। देश का आर्थिक विकास ,सड़कों का विस्तार , अंतरिक्ष सुरक्षा तथा रक्षा के मामले में सक्षमता और आत्मनिर्भरता का विरोध कौन पार्टी करेगा ?
जिन्हें विवादास्पद कहा जा रहा है उनमें सर्वोपरि समान नागरिक संहिता है जो भाजपा के चुनावी वादों में शामिल है । इस संदर्भ में मोदी सरकार के कदमों को लेकर दृष्टि रखनी होगी। हालांकि जद यू ने इसका विरोध नहीं किया केवल ठीक प्रकार से विचार कर लाने की बात की थी । भाजपा को बहुमत होता तो समान नागरिक संहिता को संसद के पटल पर लाने और पारित करने में समस्या नहीं होती। क्या मोदी सरकार इस विषय को कुछ समय के लिए एजेंडा से बाहर रखेगी? अगर गठबंधन से 72 में केवल 11 मंत्री हैं तो इसे दबाव में आना तो नहीं कह सकते। इनमें जदयू के ललन सिंह को छोड़कर कोई ऐसा नहीं जो अतिवादी सेक्युलरवाद का प्रतिनिधि कहा जा सके। वैसे भी मंत्रिमंडल में इतने अनुभवी व्यक्ति हैं कि कोई मतभेद या सहमति उभरने पर अपने अनुभव के आधार पर वह समाधान कर लेंगे। 43 ऐसे मंत्री हैं जो तीन या उससे अधिक बार सांसद रह चुके हैं। 39 मंत्रियों के पास पहले भी केंद्र में मंत्री के रूप में काम करने का अनुभव है। सर्वानंद सोनोवाव, मनोहर लाल खट्टर शिवराज सिंह चौहान ,एचडी कुमार स्वामी, जीतन राम मांझी जैसे पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। मंत्रियों में 23 ऐसे हैं जो राज्य में मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं और 34 के पास राज्य विधानसभा में भागीदारी का अनुभव है। इतने अनुभवी नेताओं के रहते हुए तत्काल यह नहीं मानना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगले 5 वर्षों में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था तथा 2047 तक विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने जैसे लक्ष्य के मार्ग में मंत्रिमंडल आपसी मतभेद के कारण बाधा बन जाएगा।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208
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