सोमवार, 17 जून 2024
विभिन्न प्रकार की चाय और उसके फायदे
रविवार, 16 जून 2024
मोदी मंत्रिमंडल निरंतरता का द्योतक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल के बारे में यह टिप्पणी उचित नहीं लगता कि इसके पीछे गठबंधन दलों के साथियों का बहुत ज्यादा दबाव है । 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल में शीर्ष स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है। गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और यहां तक कि सड़क परिवहन , रेल तथा शिक्षा मंत्री भी पूर्व सरकार के ही है। विरोधी मोदी को तानाशाह या लोकतंत्र विरोधी की उपाधि देते रहे हैं। उनकी आलोचना अभी भी जारी है और वे कह रहे हैं कि मोदी गठबंधन सरकार नहीं चला पाएंगे क्योंकि उनका स्वभाव ही गैर लोकतांत्रिक है। इस तरह की विरोधी आलोचनाओं पर टिप्पणी करने की जगह हमें समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2001 से अभी तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रुप में कभी बहुमतविहीन सरकार नहीं चलाया । वह जिस तरह बड़े कठोर निर्णय साहस के साथ करते रहे हैं उनका ध्यान करते हुए अनेक लोगों का मानना है कि यह स्वभाव गठबंधन सरकार चलाने के रास्ते की बाधा बन जाएगा। गठबंधन सरकार को लेकर लोग आशंकाएं उठाएंगे लेकिन मोदी के अंदर सरकार चलाने तथा काम करने की इच्छा है। साथी दलों के सामने साथ मिलकर काम करने का जनादेश मिला है तो वो इसका ध्यान बिलकुल रखेंगे। वैसे मंत्रिमंडल गठन से लेकर विभागों के बंटवारे तक यह कहना कठिन है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दबाव में काम कर रहे हैं। थोड़े शब्दों में कहें तो नरेंद्र मोदी का 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल भारत के भविष्य को लेकर उनकी योजनाओं, राजनीतिक आवश्यकताओं , साथी दलों के बीच संतुलन बनाने के साथ अनुभव, उम्र आदि के बीच समन्वय बनाने की कोशिश है। पिछली सरकार के 37 मंत्री इसमें हैं। प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट की संख्या 31 है । पिछली सरकार में कैबिनेट की संख्या 26 थी। 16 सांसदों वाले तेलुगू देशम और 12 वाले जद यू को दो-दो मंत्री मिले हैं। कैबिनेट में 21 चेहरे पुराने हैं। भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की स्वास्थ्य मंत्री के रुप में वापसी हुई है। सहयोगी दलों में हिंदुस्तान आवाम मोर्चा ( हम ) के नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री 78 वर्षीय जीतन राम मांझी, जद यू के राजीव रंजन सिंह, तेलुगू देशम के 36 वर्षीय के राममोहन नायडू, लोजपा के 41 वर्षीय चिराग पासवान और 37 साल की रक्षा खड्से जैसी सरकार की सबसे युवा मंत्री को आधार बनाएं तो कैबिनेट का चेहरा आपकी समझ में आ जाएगा। पिछली सरकार में केवल तीन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के थे। इस बार इनकी संख्या 5 हो गई है। इनमें हरियाणा से रविंदरजीत सिंह , जम्मू कश्मीर से जितेंद्र सिंह और राजस्थान से अर्जुन राम मेघवाल की स्थिति पिछले सरकार के समान है। उत्तर प्रदेश से रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री बनाया गया है। पिछली बार 29 राज्य मंत्री थे, इस बार 36 हैं। मंत्रिमंडल में पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। 33 मंत्री पहली बार केंद्र सरकार का हिस्सा बने हैं जिनमें सात सहयोगी दलों के हैं।
इससे आगे सामाजिक संतुलन की दृष्टि से देखें तो पिछड़ी जातियों के 27 , अनुसूचित जाति के 10, अनुसूचित जनजाति के पांच और अल्पसंख्यक समुदाय के पांच मंत्री बनाए गए हैं। इस तरह पिछड़ा, अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति एवं अल्पसंख्यक समुदाय के 47 मंत्री हुए। देशव्यापी प्रतिनिधित्व की दृष्टि से देखें तो इनमें 24 राज्यों का प्रतिनिधित्व है। पंजाब से भाजपा का कोई सांसद नहीं है लेकिन रवनीत सिंह बिट्टू को राज्य मंत्री बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के परिणाम को देखते हुए माना जा रहा था कि वहां से कम मंत्री होंगे लेकिन 10 मंत्री बनाए गए हैं और बिहार से आठ। सात महिलाएं हैं। केरल में भाजपा की पहली बार विजई हुई है इसलिए सुरेश गोपी को मंत्री पद मिलना ही था। दूसरे नेता केरल भाजपा के महासचिव जॉर्ज कोरियन हैं जिन्होंने 1970 में जनसंघ से लेकर लगातार भाजपा के लिए संघर्ष किया था। बंगाल से दो लोकसभा सदस्यों डॉक्टर सुकांत मजूमदार और मतुआ समुदाय के शांतनु ठाकुर को राज्य मंत्री के रूप में शामिल किया गया है। इनमें सुकांत पहली बार मंत्री बने हैं लेकिन शांतनु पिछली सरकार में जुलाई 2021 से जहाजरानी राज्य मंत्री रहे हैं। सुकांत उत्तरी बंगाल से हैं तो शांतनु ठाकुर दक्षिण बंगाल के मतुआ समुदाय से हैं जो अनुसूचित जाति वर्ग में आते हैं। भाजपा ने उत्तर बंगाल की आठ में से 5 सीट पर जीत दर्ज की है। शांतनु ठाकुर कोलकाता से सटे उत्तर 24 परगना जिले में बनगांव सीट से जीते तो सुकांत उत्तर बंगाल की बालूरघाट सीट से। बंगाल में यदि बेहतर विजय मिली होती तो वहां से और मंत्री बनाए जाते। इस तरह कोई नहीं कह सकता कि यह मंत्रिमंडल कुछ क्षेत्र, समूह, कुछ जातियां या परिवारों तक सीमित है।
इन सबको एक साथ मिलाकर देखें तो पहले निष्कर्ष आएगा कि यह नीतियों और व्यवहार में निरंतरता का मंत्रिमंडल है । सीसीएस यानी सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 2019 से हैं। इसलिए नीति में कोई बदलाव होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। वास्तव में भाजपा के अंदर बहुमत न मिलने से निराशा और चिंता अवश्य होगी किंतु 10 वर्षों के शासन में आंतरिक और बाह्य नीतियों में स्थायित्व आ चुका है। निश्चित रूप से विश्व की दृष्टि मंत्रिमंडल पर रही होगी और संदेश जा चुका है कि रक्षा, सुरक्षा, विदेश, वित्त सहित अन्य प्रमुख मामलों में नीतियां और व्यवहार स्थिर रहने वालीं हैं। सड़क परिवहन एवं अन्य निर्माण के क्षेत्र में नितिन गडकरी की भूमिका की प्रशंसा सभी दलों ने की है और सड़कों के मामले में भारत की विश्व स्तरीय पहचान बन चुकी है। विश्व भर के निवेशक सड़क सहित भारत की आधारभूत संरचना में निवेश करने के लिए खजाना खोल बैठे हैं और मंत्री परिषद की निरंतरता से वे आश्वस्त हुए होंगे । एक पार्टी की बहुमत तथा गठबंधन की सरकार के कार्य व्यवहारों में अंतर रहा है। लेकिन कोई सरकार ऐसी नहीं होगी कि पुलवामा जैसी घटना के प्रत्युत्तर पर गठबंधन में मतभेद की चिंता में उस तरह का कदम न उठाया जाए। देश का आर्थिक विकास ,सड़कों का विस्तार , अंतरिक्ष सुरक्षा तथा रक्षा के मामले में सक्षमता और आत्मनिर्भरता का विरोध कौन पार्टी करेगा ?
जिन्हें विवादास्पद कहा जा रहा है उनमें सर्वोपरि समान नागरिक संहिता है जो भाजपा के चुनावी वादों में शामिल है । इस संदर्भ में मोदी सरकार के कदमों को लेकर दृष्टि रखनी होगी। हालांकि जद यू ने इसका विरोध नहीं किया केवल ठीक प्रकार से विचार कर लाने की बात की थी । भाजपा को बहुमत होता तो समान नागरिक संहिता को संसद के पटल पर लाने और पारित करने में समस्या नहीं होती। क्या मोदी सरकार इस विषय को कुछ समय के लिए एजेंडा से बाहर रखेगी? अगर गठबंधन से 72 में केवल 11 मंत्री हैं तो इसे दबाव में आना तो नहीं कह सकते। इनमें जदयू के ललन सिंह को छोड़कर कोई ऐसा नहीं जो अतिवादी सेक्युलरवाद का प्रतिनिधि कहा जा सके। वैसे भी मंत्रिमंडल में इतने अनुभवी व्यक्ति हैं कि कोई मतभेद या सहमति उभरने पर अपने अनुभव के आधार पर वह समाधान कर लेंगे। 43 ऐसे मंत्री हैं जो तीन या उससे अधिक बार सांसद रह चुके हैं। 39 मंत्रियों के पास पहले भी केंद्र में मंत्री के रूप में काम करने का अनुभव है। सर्वानंद सोनोवाव, मनोहर लाल खट्टर शिवराज सिंह चौहान ,एचडी कुमार स्वामी, जीतन राम मांझी जैसे पांच पूर्व मुख्यमंत्री हैं। मंत्रियों में 23 ऐसे हैं जो राज्य में मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं और 34 के पास राज्य विधानसभा में भागीदारी का अनुभव है। इतने अनुभवी नेताओं के रहते हुए तत्काल यह नहीं मानना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगले 5 वर्षों में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था तथा 2047 तक विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने जैसे लक्ष्य के मार्ग में मंत्रिमंडल आपसी मतभेद के कारण बाधा बन जाएगा।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208
शुक्रवार, 14 जून 2024
विश्व रक्तदाता दिवस पर 27 हस्तियों को गारजियन ऑफ़ लाइफ अवार्ड से किया गया सम्मानित
मोदी 0.3 सरकार में एमएसएमई सेक्टर को और अधिक मजबूत करने पर जोर
बसंत कुमार
वर्तमान समय में एमएसएमई सेक्टर देश की
अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह सेक्टर सकल घरेलू उत्पाद
में 29% से
अधिक योगदान कर रहा है और देश के कुल निर्यात में 50% से अधिक का योगदान कर रहा है।
विनिर्माण के क्षेत्र में एमएसएमई सेक्टर लगभग एक तिहाई उत्पादन करता है। एक
आंकड़े के अनुसार एमएसएमई सेक्टर 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता
है और सरकार आगामी वर्षों में इस लक्ष्य को 15 करोड़ से अधिक तक ले जाने के लिए
प्रतिबद्ध है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात् भारतीय
अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर की भूमिका के महत्व को ध्यान में रखते हुए केंद्र
सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मिलकर एमएसएमई उद्यमियों की मदद के लिए
निम्नलिखित योजनाएं प्रारंभ की--1- एमएसएमई समाधान, 2- उद्योग आधार, 3- मुद्रा, 4- जेडईडी योजना, 5- मेक इन इंडिया, 6- स्टैंड अप इंडिया।
इन योजनाओं की मदद से कोई भी नागरिक अपना कारोबार शुरू कर सकता है, अपना कारोबार बढ़ा सकता है और देश के आर्थिक विकास में योगदान कर सकता है।
यदि पूर्व में एमएसएमई सेक्टर की स्थिति को विचार किया जाए तो देश में इस सेक्टर की स्थिति बड़ी निराशाजनक लगती हैं। 1980 के दशक में जब देश के उद्योग मंत्री के रूप में जार्ज फर्नांडिस और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता हुआ करते थे तो औद्योगिक विकास मंत्रालय के अंतर्गत लघु उद्यामों की देखरेख के लिए डीसी (एसएसआई) का कार्यालय होता था और खादी ग्रामोद्योग, कॉयर बोर्ड, एनएसएसआई की देखरेख के लिए औद्योगिक विकास विभाग के अंतर्गत के वीआईसी, कॉयर सेक्शन और एसएसआई अनुभाग होते थे और लघु उद्योग सेक्टर इतना मजबूत नहीं था जो देश की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान दे पाता।
पहली बार जब अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी, तब देश में लघु उद्योग के विकास पर पूरा जोर दिया गया और स्माल, मीडियम के साथ माइक्रो (सूक्ष्म) उद्यमों को जोड़ा गया और एमएसएमई मंत्रालय अस्तित्व में आया और यह पहला अवसर था जब एमएसएमई सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करने लगा। पर अटलजी की सरकार चले जाने के बाद मनमोहन सिंह जी की सरकार में एमएसएमई मंत्रालय काम करता रहा और इस विभाग के मंत्री के रूप में महाबीर प्रसाद जी जैसे प्रभावहीन मंत्रियों को समायोजित किया जाने लगा और यूपीए सरकार अटल जी की सरकार द्वारा एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए तैयार किए गए ढांचे पर काम तो करती रही पर यूपीए सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल में इस सेक्टर के विकास में कोई प्रगति नहीं हुई।
जब वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने तो वे अपने मंत्रिमंडल के गठन के समय ही एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कृतसंकल्प दिखे और एमएसएमई मंत्रालय के मंत्री के रूप में अपने सबसे अनुभवी सहयोगी कलराज मिश्र को चुना और उनको सहयोग करने के लिए बिहार के तेज तर्रार नेता गिरिराज सिंह को राज्य मंत्री बनाया। यह पहला अवसर था जब एमएसएमई मंत्रालय में एक कैबिनेट मंत्री और दो-दो राज्य मंत्री बनाए गए और इस मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले तीनों उपक्रम के वीआईसी, एनएसआईसी, कॉयर बोर्ड समेत सभी प्रॉफिट मेकिंग उपक्रमों के रूप में उभरे और एमएसएमई सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करने लगा। इसके साथ-साथ देश में करोड़ों युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सफल रहा। मगर इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद एमएसएमई सेक्टर को और अधिक सफल बनाने के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है।
1-एमएसएमई मंत्रालय और इसके उपक्रमों द्वारा नव उद्यमियों के कल्याण हेतु ढेर सारी योजनाएं बनाई गई हैं और इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए विभाग द्वारा ऑनलाइन पोर्टल पर इन सारी योजनाओं का विवरण और आवेदन हेतु फार्म आदि उपलब्ध करा दिए जाते हैं। परन्तु आज भी देश के दूर दराज क्षेत्रों के अशिक्षित गरीब आदिवासी लोग आन लाइन पोर्टल की पहुँच से बाहर हैं और इस कारण ये लोग एमएसएमई की योजनाओ का लाभ उठाकर अपना छोटा-मोटा रोजगार शुरू नहीं कर पाते है, इसलिए सारी योजनाओं को आनलाइन पोर्टल पर डालकर अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेने के बजाय, इन योजनाओं का बड़े पैमाने पर दूर दराज इलाकों में प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए।
2-कहने के लिए सरकार ने अपना उद्यम प्रारंभ करने हेतु सेक्युरिटी के बिना लोन देने की व्यवस्था की है पर वास्तविकता यह है कि बैंक उद्यम शुरू करने के आवेदकों को सिक्योरिटी के अभाव में लोन नहीं देते और इनके प्रति जिला उद्योग केंद्रों के लोगों का व्यवहार बड़ा रूखा होता है, इस समस्या के समाधान का निराकरण बहुत ही आवश्यक है।
3-एमएसएमई मंत्रालय और इसके उपक्रमों में वर्षों से हजारों रिक्तिया खाली पड़ी हैं और अधिकारी इन पदों को भरने की बजाय संविदा पर कर्मचारियों की भर्ती करके अपनी जेबें भर रहे हैं जबकि देश में लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे है। संविदा के कर्मचारी बिना किसी परीक्षा के आते हैं जिससे कार्यालय में काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है और ये कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उत्तरदायी भी नहीं होते हैं। अत: सरकार को इन कमियों को दूर करने की आवश्यता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एमएसएमई सेक्टर को और अधिक मजबूती प्रदान करने के दृढ़ संकल्पित होने का ही परिणाम है कि उन्होंने एमएसएमई मंत्रालय का जिम्मा सबसे अनुभवी मंत्री जीतन राम मांझी को दिया है जो अपने संघर्ष, जीवट, दूरदर्शिता और कड़े फैसले के लिए जाने जाते हैं। मुसहर परिवार में पैदा हुए एक मजदूर के बेटे जीतन राम ने भीषण कठिन परिस्थितियों में 1966 में स्नातक किया और 1980 से लगातार विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह किया। देश में एमएसएमई मंत्रालय के मंत्री बनने के बाद वह इस सेक्टर को इतना मजबूत कर देंगे कि उद्यमिता के माध्यम से देश के युवाओं को बेरोजगारी से मुक्ति मिलेगी। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों से काम की तलाश में दिल्ली और मुंबई के लिए युवाओं को पलायन करना पड़ता है इसे भी रोकने में मांझी जी सफल होंगे क्योंकि वे गरीबों मजदूरों की महानगरों में नारकीय जिंदगी के विषय में भलीभांति जानते हैं। वे महादलितों और आदिवासियों को उनके आर्थिक उत्थान द्वारा राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने में सक्षम होंगे। यह निश्चित है कि वह देश के एमएसएमई मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे।
गुरुवार, 13 जून 2024
मोदी 3.0 सरकार में एमएसएमई सेक्टर को और अधिक मजबूत करने पर जोर
वर्तमान समय में एमएसएमई सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह सेक्टर सकल घरेलू उत्पाद में 29% से अधिक योगदान कर रहा है और देश के कुल निर्यात में 50% से अधिक का योगदान कर रहा है। विनिर्माण के क्षेत्र में एमएसएमई सेक्टर लगभग एक तिहाई उत्पादन करता है, एक आंकड़े के अनुसार एमएसएमई सेक्टर 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है और सरकार आगामी वर्षो में इस लक्ष्य को 15 करोड़ से अधिक तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर की भूमिका के महत्व को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मिलकर एमएसएमई उद्यमियों की मदद के लिए निम्न लिखित योजनाएं प्रारंभ की-
1- एमएसएमई समाधान
2- उद्योग आधार
3- मुद्रा
4- जेड ई डी योजना
5- मेक इन इंडिया
6- स्टैंड अप इंडिया
इन योजनाओं की मदद से कोई में नागरिक अपना कारोबार शुरू कर सकता है, अपना कारोबार बढ़ा सकता है और देश के आर्थिक विकास में योगदान कर सकता है।
यदि पूर्व में एमएसएमई सेक्टर की स्थिति को विचार किया जाए तो देश में इस सेक्टर की स्थिति बड़ी निराशाजनक लगती हैं। 1980 के दशक में जब देश के उद्योग मंत्री के रूप में जार्ज फर्नांडिस और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता हुआ करते थे तो औद्योगिक विकास विकाश मंत्रालय के अंतर्गत लघु उद्यामों की देखरेख के लिए डीसी (एसएसआई) का कार्यालय होता था और खादी ग्रामोद्योग, कॉयर बोर्ड, एनएसएसआई की देखरेख के लिए औद्योगिक विकास विभाग के अंतर्गत के वीआईसी, कॉयर सेक्शन और एसएसआई अनुभाग होते थे और लघु उद्योग सेक्टर इतना मजबूत नहीं था जो देश की अर्थ व्यवस्था में अहम योगदान दे पाता।
पहली बार जब अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी, तब देश में लघु उद्योग के विकास पर पूरा जोर दिया गया और स्माल, मीडियम के साथ माइक्रो (सूक्ष्म) उद्यमों को जोड़ा गया और एमएसएमई मंत्रालय अस्तित्व में आया और यह पहला अवसर था जब एमएसएमई सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करने लगा। पर अतलजी की सरकार चले जाने के बाद मनमोहन सिंह जी की सरकार में एमएसएमई मंत्रालय काम करता रहा और इस विभाग के मंत्री के रूप में महाबीर प्रसाद जी जैसे प्रभावहीन मंत्रियों को समायोजित किया जाने लगा और यूपीए सरकार अटल जी की सरकार द्वारा एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए तैयार किए गए ढाचे पर काम तो करती रही पर यू पी ए सरकार के दश वर्ष के कार्य काल में इस सेक्टर के विकास में कोई प्रगति नहीं हुई।
जब वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदीजी देशी के प्रधानमंत्री बने तो वे अपने मंत्रिमंडल के गठन के समय ही एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कृतसंकल्प दिखे और एमएसएमई मंत्रालय के मंत्री के रूप में अपने सबसे अनुभवी सहयोगी कलराज मिश्र को चुना और उनको सहयोग करने के लिए बिहार के तेजतर्रार नेता गिरिराज सिंह को राज्य मंत्री बनाया और यह पहला अवसर था जब एमएसएमई मंत्रालय में एक कैबिनेट मंत्री और दो-दो राज्य मंत्री बनाये गए और इस मन्त्रालय के अंतर्गत काम करने वाले तीनो उपक्रम के वी आई सी, एन एस आई सी, कॉयर बोर्ड समेत सभी प्रॉफिट मेकिंग उपक्रमो के रूप में उभरे और एमएसएमई सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करने लगा और इसके साथ साथ देश में करोड़ो युवाओ को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सफल रहा। पर इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद एमएसएमई सेक्टर को और अधिक सफल बनाने के लिए कुछ आवश्यक् कदम उठाने की जरूरत है-
1-एमएसएमई मंत्रालय और इसके उपक्रमों द्वारा नव उद्यमियों के कल्याण हेतु ढेर सारी योजनाएं बनाई गई है और इन योजनाओ का लाभ उठाने के लिए विभाग द्वारा ऑनलाइन पोर्टल पर इन सारी योजनाओ का विवरण और आवेदन हेतु फार्मस आदि उपलब्ध करा दिये जाते है। परन्तु आज भी देश के दूर दराज क्षेत्रों के अशिक्षित गरीब आदिवासी लोग की पहुँच से आन लाइन पोर्टल पहुँच से बाहर है और इस कारण ये लोग एमएसएमई की योजनाओं का लाभ उठाकर अपना छोटा-मोटा रोजगार शुरू नहीं कर पाते है, इसलिए सारी योजनाओ को आनलाइन पोर्टल पर डालकर अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेने के बजाय, इन योजनाओं का बड़े पैमाने पर दूर दराज इलाको में प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए।
2-कहने के लिए सरकार ने अपना उद्यम प्रारंभ करने हेतु सेक्युरिटी के बिना लोन देने की व्यवस्था की है पर वस्तविकता यह है कि बैंक उद्यम शुरू करने के आवेदको को सेक्युरिटी के अभाव में लोन नहीं देते और इनके प्रति जिला उद्योग केंद्रो के लोगों का व्यवहार बड़ा रूखा होता है, इस समस्या के समाधान का निराकरण बहुत ही आवश्यक है।
3-एमएसएमई मंत्रालय और इसके उपक्रमों में वर्षो से हजारो रिक्तिया खाली पड़ी है और आधिकारी इन्हें भरने के लिए आवश्यक करने के बजाय संविदा पर कर्मचारियों की भर्ती करके अपनी जेबे भर रहे है जबकि देश में लाखों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे है। संविदा के कर्मचारी बिना किसी परीक्षा के आते है जिससे कार्यालय में काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है और ये कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उतमयि भी नहीं होते, अत: सरकार को इन कमियों को दूर करने की आवश्यता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का एमएसएमई सेक्टर को और अधिक मजबूती प्रदान करने के दृढ़ संकल्प होने का हो परिणाम है कि उन्होंने एमएसएमई मंत्रालय का जिम्मा सबसे अनुभवी मंत्री जीतन राम मांझी को दिया है जो अपने संघर्ष, जीवट, दूरदर्षिता और कड़े फैसले के लिए जाने जाते है। मुसहर परिवार में पैदा हुए एक मजदूर के बेटे जीतन राम ने भीषण कठिन परिस्थितियों में 1966 में स्नातक किया और 1980 से लगातार विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह किया। देश में एमएसएमई मंत्रालय के मंत्री वे इस सेक्टर को इतना मजबूत कर देंगे कि उद्यमिता के माध्यम से देश के युवाओ को बेरोजगारी से मुक्ति मिलेगी। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े राज्यो से काम की तलाश में दिल्ली और मुंबई जैसे काम के लिए युवाओ को पलायन करना पड़ता है इसे भी रोकने में मांझी जी सफल होंगे क्योंकि वे गरीबो मजदूरों की महानगरो में नारकीय जिंदगी के विषय में भलीभति जानते है वे महादलितो और आदिवासियों को उनके आर्थिक उत्थान द्वारा राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने में सक्षम होंगे। यह निश्चित है कि देश के एमएसएमई मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे।
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