सोमवार, 10 जून 2024

कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री... किसमें कितना अंतर?

संवाददाता

नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं। रविवार को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ-साथ 72 सांसदों ने भी मंत्री पद की शपथ ली। मोदी सरकार में ये सबसे बड़ा मंत्रिमंडल है। 2014 में जब मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उनके साथ 46 सांसद ही मंत्री बने थे। 2019 में उनके मंत्रिमंडल में 59 मंत्री शामिल थे।
2024 में एनडीए की सरकार में प्रधानमंत्री को मिलाकर 72 मंत्री शामिल हैं। मोदी 3.0 में 30 कैबिनेट मंत्री, 5 राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 36 राज्य मंत्री बनाए गए हैं.
अभी मोदी कैबिनेट में 9 सांसद और मंत्री बन सकते हैं, क्योंकि संविधान में 81 मंत्रियों की सीमा तय है। संविधान के 91वें संशोधन के मुताबिक, लोकसभा के कुल सदस्यों में से 15% को ही मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं, इसलिए कैबिनेट में 81 मंत्री ही हो सकते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत, प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति मंत्रिमंडल का गठन करते हैं। मंत्रिमंडल में तीन तरह के मंत्री होते हैं, जिनमें कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और राज्य मंत्री होता है।
मंत्रिमंडल में सबसे ताकतवर कैबिनेट मंत्री होता है। उसके बाद राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और फिर राज्य मंत्री होता है। जिन्हें भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जाता है, उन्हें बाकी सांसदों की तुलना में हर महीने अलग से भत्ता भी मिलता है।

तीनों में क्या होता है अंतर?

- कैबिनेट मंत्रीः ऐसे मंत्री सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती हैं। इन्हें जो भी मंत्रालय दिया जाता है, उसकी पूरी जिम्मेदारी उनकी ही होती है। कैबिनेट मंत्री को एक से ज्यादा मंत्रालय भी दिए जा सकते हैं। कैबिनेट मंत्री का बैठकों में शामिल होना जरूरी होता है। सरकार अपने सभी फैसले कैबिनेट बैठक में ही लेती है।
- राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): कैबिनेट मंत्री के बाद स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री होते हैं। इनकी भी सीधी रिपोर्टिंग प्रधानमंत्री को ही होती है। इनके पास अपना मंत्रालय होता है। ये कैबिनेट मंत्री को रिपोर्ट नहीं करते। स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्रियों कैबिनेट बैठक में शामिल नहीं होते।
- राज्य मंत्रीः कैबिनेट मंत्री की मदद के लिए राज्य मंत्री बनाए जाते हैं. इनकी रिपोर्टिंग कैबिनेट मंत्री को होती है. एक मंत्रालय में एक से ज्यादा भी राज्य मंत्री बनाए जा सकते हैं। कैबिनेट मंत्री की गैरमौजूदगी में मंत्रालय की सारी जिम्मेदारी राज्य मंत्री की होती है। राज्य मंत्री भी कैबिनेट बैठक में शामिल नहीं होते।

मंत्री पद मिलते ही बढ़ जाती है सुविधाएं

वैसे तो लोकसभा के हर सदस्य की सैलरी और भत्ते तय हैं. लेकिन जो सांसद प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री या राज्य मंत्री बनते हैं, उन्हें हर महीने बाकी सांसदों की तुलना में एक अलग से भत्ता भी मिलता है.
सांसदों को मिलने वाली सैलरी और भत्ते सैलरी एक्ट के तहत तय होती है. इसके मुताबिक, लोकसभा के हर सदस्य को हर महीने 1 लाख रुपये की बेसिक सैलरी मिलती है. इसके साथ ही 70 हजार रुपये निर्वाचन भत्ता और 60 हजार रुपये ऑफिस खर्च के लिए अलग से मिलते हैं. इसके अलावा जब संसद का सत्र चलता है तो दो हजार रुपये का डेली अलाउंस भी मिलता है.
प्रधानमंत्री और मंत्रियों को हर महीने सत्कार भत्ता (Sumptuary allowance) भी मिलता है। प्रधानमंत्री को 3 हजार रुपये, कैबिनेट मंत्री को 2 हजार, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) को 1 हजार और राज्य मंत्री को 600 रुपये का सत्कार भत्ता हर महीने मिलता है। ये भत्ता असल में हॉस्पिटैलिटी के लिए रहता है और मंत्रियों से मिलने आने वाले लोगों की आवभगत पर खर्चा होता है.
इसे ऐसे समझिए कि एक लोकसभा सांसद को सैलरी और भत्ते मिलाकर हर महीने कुल 2.30 लाख रुपये मिलते हैं. जबकि, प्रधानमंत्री को 2.33 लाख, कैबिनेट मंत्री को 2.32 लाख, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) को 2.31 लाख और राज्य मंत्री को 2,30,600 रुपये मिलते हैं।

क्या सांसदों को टैक्स भी देना पड़ता है?

चाहे सांसद हो या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति, सभी को इनकम टैक्स देना पड़ता है. हालांकि, इन्हें सिर्फ सैलरी पर ही टैक्स देना होता है।
नियमों के मुताबिक, लोकसभा-राज्यसभा के सांसद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति सिर्फ सैलरी पर ही टैक्स भरते हैं. बाकी जो अलग से भत्ते मिलते हैं उन पर कोई टैक्स नहीं लगता।
मतलब, सांसदों की हर महीने की सैलरी एक लाख रुपये है। इस हिसाब से सालाना सैलरी 12 लाख रुपये हुई. इस पर ही उन्हें टैक्स देना होता है।
सांसदों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की सैलरी पर 'अन्य स्रोतों से प्राप्त आय' के अंतर्गत टैक्स लगाया जाता है।

क्यों आया ऐसा परिणाम

 

अवधेश कुमार 

आप जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार गठित हो चुकी है चुनाव परिणाम का संतुलित विश्लेषण किया जाना आवश्यक है । कुछ राजनीतिक दलों के दावों को छोड़ दें तो इस तरह के संघर्ष की उम्मीद ज्यादातर लोगों को नहीं थी। कई राज्यों विशेषकर उप्र, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बंगाल आदि में जबरदस्त लड़ाई हुई। यदि लंबे समय तक 100 से ज्यादा सीटों पर यह अनुमान लगाना कठिन हो कि कौन जीतेगा तो यह साधारण स्थिति नहीं हो सकती। स्वयं बहुमत नहीं पाना भाजपा के लिए बहुत बड़ा धक्का है। कांग्रेस के लिए सीटों और मतों में हुई बढ़ोतरी पार्टी के अंदर आशा और उत्साह पैदा करने वाला है। हालांकि लोकसभा में महत्व बहुमत के आंकड़ों का होता है और वह अभी राजग के पास है। भाजपा और मोदी सरकार के विरुद्ध असंतोष और नाराजगी थी इसको नकारा नहीं जा सकता। किंतु क्यों थी? चुनाव परिणाम ऐसा नहीं है जिसे सामान्य विश्लेषण से समझा जा सके। कांग्रेस सहित  भाजपा विरोधी जो कारण दे रहे हैं उनमें ज्यादातर उन्हीं पर लागू होते हैं जो भाजपा, उसकी विचारधारा या संघ परिवार के विरोधी हैं। भाजपा को कमजोर करने और स्वयं के मजबूत होने का विश्लेषण करने का उनका अधिकार है। लंबे समय से कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने भाजपा के विरुद्ध जो प्रचार किया है, नरेंद्र मोदी सरकार को लेकर जनता के मन में जो नकारात्मक भाव बिठाने की कोशिश की उनका असर हुआ है। उदाहरण के लिए आरक्षण और संविधान खत्म करने का झूठा नैरेटिव कुछ हद तक चला। सोशल मीडिया और नैरेटिव में भाजपा कमजोर पड़ रही थी यह साफ था। मतदान के पीछे ये सारे कारक थे। किंतु मुख्य कारण इनसे अलग है और उनको समझने की आवश्यकता है। भाजपा को लोग वोट क्यों देते हैं,इसे समझकर ही इसका विश्लेषण हो सकता है।

आगे बढ़ने के पहले इस सच को स्वीकार करना पड़ेगा कि भाजपा अभी भी सबसे बड़ी, सबसे ज्यादा वोट पाने वाली मजबूत पार्टी है। जिन स्थानों पर वह जीत नहीं सकी वहां अनेक में उसका प्रदर्शन ठीक रहा है। बावजूद भाजपा के लिए असाधारण धक्का है। सामान्य विश्लेषण यह है कि 10 वर्षों तक सत्ता में रहने के कारण आम जनता ही नहीं कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भी कई प्रकार के असंतोष पैदा होते हैं। यह विश्लेषण भी सरलीकरण होगा। एक तर्क यह है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार अपने नेतृत्व में पार्टी को बहुमत दिलाने का करिश्मा कोई नहीं दिखा सका। लेकिन भाजपा ने कांग्रेस के अलावा अकेली पार्टी के पक्ष में बहुमत प्राप्त किया, ऐसा दो बार करने का रिकॉर्ड बनाया तो आगे भी ऐसा होना चाहिए था।भाजपा ऐसी पार्टी है जिसका एक आधार वोट बैंक सुदृढ़ हो चुका है। वह एक आधार वोट से शुरुआत करती है। इसमें उसे बहुमत न मिलना सामान्य घटना नहीं है। असंतोष पैदा हुआ तो इसे सामान्य कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। आप चाहे 10 वर्ष शासन करें या 20 वर्ष, शासन को हमेशा जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए। 

चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने के पूर्व पूरे देश का माहौल भाजपा और सहयोगियों के अनुकूल दिख रहा था। 22 जनवरी को अयोध्या के श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर देश भर में उत्सव का माहौल था और लाखों स्थानों पर कार्यक्रम हुए।  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात में भाजपा लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है। 1995 से बीच की छोटी अवधि को छोड़कर लगातार भाजपा की सरकार है। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बीच के 15 महीना को छोड़कर 2003 से है। यही स्थिति केंद्र में क्यों नहीं हो सकती? भाजपा के लिए हिंदुत्व और  हिंदुत्व अभिप्रेरित राष्ट्रीय चेतना व इससे जुड़े अन्य विषयों के कारण पिछले 10 वर्षों में उसका एक निश्चित वोट आधार सुदृढ़ हो चुका है। जहां भाजपा शक्तिशाली नहीं है वहां ऐसी सोच रखने वाले मतदाता किसी अन्य को वोट देते हैं लेकिन जहां भाजपा है वहां उसे ही। जिन विधानसभा चुनावों में भाजपा पराजित हुई वहां भी उसका वोट प्रतिशत संतोषजनक रहा। जब आप 2047 तक भारत को विकसित देश , अगले 5 वर्ष में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का वायदा करते हैं, उसके अनुरूप काम करते हैं तो देश को भारी जनादेश देना चाहिए था। प्रश्न है कि ऐसा क्यों नहीं हुआ?

ऐसा भी नहीं है कि विचारधारा को लेकर घोषणाएं नहीं हुई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  गृहमंत्री मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ या अन्य नेताओं ने विचारधारा को मुखरता से नहीं रखा। नागरिकता संशोधन कानून लागू हुआ तथा पाकिस्तान से आए हिंदुओं को नागरिकता भी दी गई। प्रधानमंत्री ने अगली सरकार में समान नागरिक संहिता लागू करने की घोषणा की। कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप बड़ा मुद्दा बनाया गया। राम जन्मभूमि को लेकर राहुल गांधी पर लगाया गया यह आरोप कि उन्होंने एक बैठक में कहा था कि हमारी सरकार आई तो इस निर्णय की समीक्षा के लिए आगे बढ़ेंगे , को भी व्यापक स्तर पर उठाया गया। चुनाव के अंतिम चरण में देश के सकल घरेलू उत्पाद का आया आंकड़ा 8% से ऊपर था। भारतीय रिजर्व बैंक ने वार्षिक रिपोर्ट में महंगाई नियंत्रित होने और विकास एवं अच्छी अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश की। विपक्ष राष्ट्रीय स्तर पर संगठित भी नहीं था। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस तथा वाम मोर्चा एवं कांग्रेस आमने-सामने था। आम आदमी पार्टी एवं कांग्रेस दिल्ली में साथ थी, पंजाब में लड़ रही थी। केरल में वाम मोर्चा एवं कांग्रेस आमने-सामने था। इन सबके बावजूद भाजपा अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी तो इसके कारणों की गहराई से छानबीन करनी होगी। यह विश्लेषण भी सतही होगा कि भाजपा के 5 किलो अनाज के समानांतर विपक्ष द्वारा 10 किलो, महिलाओं के खाते में पैसे भेजना, बिजली, पानी, मुफ्त देने के फायदे आदि ने लोगों को लुभाया। अक्टूबर नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों में इसके आधार पर कांग्रेस को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सफलता नहीं मिली। 

भाजपा अपनी भूलों और कारणों से ऐसी चुनावी अवस्था में पहुंची है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के विषय को आगे बढ़ाने की न कोशिश हुई न इसे राजनीति, अर्थव्यवस्था के साथ भारत के भविष्य से जोड़ने के कार्यक्रम हुए‌। चुनाव की घोषणा के लगभग एक महीना पहले से सरकार की ओर से ऐसे कदम उठाए गए,  घोषणाएं की गई जिनसे रामलला की प्राण प्रतिष्ठा लोगों की स्मृतियों में पीछे चली गई। सारा डिबेट प्रतिदिन की होने वाली घोषणाओं पर केंद्रित हुई। कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने के पीछे सकारात्मक सोच रही होगी। किंतु इनके सामने आते ही पिछड़ा , दलित, जाति और आरक्षण विषय बना और ऊपर उठता चला गया। श्रीरामजन्मभूमि नैरैटिव में पीछे चला गया। पिछड़ों और  दलितों का हितैषी कौन, आरक्षण का कौन समर्थक और कौन विरोधी यह इतना प्रबल हो गया कि भाजपा के लिए इससे निकलना कठिन था। प्रधानमंत्री को बार-बार आरक्षण और संविधान पर सफाई देनी पड़ी। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा और हिंदुत्व पर फोकस होने से जाति और अन्य कारक कमजोर पड़ जाते। हालांकि दो चरण के बाद प्रधानमंत्री का अयोध्या का कार्यक्रम सफल दिखा। बावजूद भाजपा ने फिर उसे शीर्ष पर लाने की रणनीति अपनाई हो ऐसा लग नहीं। दूसरा सबसे बड़ा कारण गठबंधन और उम्मीदवार बने। कुछ गठबंधनों को समर्थकों के साथ-साथ भाजपा के कार्यकर्ता नेता मन से स्वीकार नहीं कर सके। यही स्थिति स्वयं भाजपा के उम्मीदवारों को लेकर थी। पहले चरण के उम्मीदवारों की घोषणा के साथ असंतोष और नाराजगी दिखने लगी थी जो अंतिम चरण तक बनी रही। चुनाव के दौरान दिखता रहा कि भाजपा के कार्यकर्ता, नेता और समर्थक ,अपनी ही सरकार पर निष्ठावान लोगों की अनदेखी करने, सत्ता का वैध लाभ भी उन तक नहीं पहुंचाने और कठिन समय में साथ न खड़ा होने का आरोप लगाते थे। कई अंदर एवं बाहर से आए नेताओं को राज्यसभा भेजना, लोकसभा उम्मीदवार बनाना , पार्टी अध्यक्ष व पदाधिकारी बनाना नेताओं -कार्यकर्ताओं को स्वीकार नहीं हुआ। लोग सामान्य नेताओं के हाव-भाव में अहं और कार्यकर्ताओं को मिलने तक का समय नहीं देने की बात करते थे। इन सब कारणों से कुछ भाजपा कार्यकर्ता, नेता और समर्थक  मुखर होकर मतदान करवाने में सक्रिय नहीं रहे तो कुछ उदासीन और कुछ ने विरोध भी किया । कार्यकर्ता जब सक्रिय होते हैं तो विरोध में बनाए गए नैरेटिव का प्रत्युत्तर देते हैं। लोगों के बीच बहस में वो अपनी बात रखते हैं, आरोपों का खंडन करते हैं , सच्चाई बताते हैं और इन सबका मतदान पर असर पड़ता है। उदासीन और विरोधी हो जाए तो परिणाम ऐसा ही आता है। पार्टी अगर इस अवस्था में पहुंची तो जाहिर है बड़ी संख्या में लोगों के लिए सत्ति सर्वोपरि हो गई विचारधारा, संगठन और कार्यकर्ता गौण।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

रविवार, 9 जून 2024

परिणामविहीन है कथित भविष्यवक्ताओं का शब्द दंगल

भविष्य की आहट 

डा. रवीन्द्र अरजरिया

लोकसभा चुनावों में मतदान थमते ही भविष्य वक्ताओं की बाढ सी आ गई है। सात चरणों में हुई रायसुमारी के परिणाम मशीनों में बंद हो गये हैं। कुछ ही  घंटों बाद वास्तविकता सामने आ जायेगी। राजनैतिक गठबंधन स्वत: सुखाय को लेकर जीत के नाहक दावे कर रहे हैं जबकि व्यवसायिक प्लेटफार्म एग्जिट पोल के नाम पर जबरजस्ती का शब्द दंगल आयोजित करके धनार्जन में जुटे हैं। देश की आवास के मन-मस्तिष्क में मनमाने आंकडों की फसलें बोई जा रहीं हैं। मृगमारीचिका के पीछे दौडाने की कोशिशों में लगे मुगेरी लाल अब भी अपने हसीन सपनों को कुछ घंटों और जीवित रखने के लिए माथ पच्ची कर रहे हैं। राष्ट्रवाद, विकासवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषावाद, स्वार्थवाद, लालचवाद, सम्प्रदायवाद, आस्थावाद के साथ-साथ शून्यवाद भी इस बार के चुनावों में बडे मुद्दे बनाकर सामने आते रहे। अतीत के मनमाने आंकडों को सोशल मीडिया के अनगिनत देशी-विदेशी प्लेटफार्म से निरंतर प्रसारित किया जाता रहा। 
अमेरिकन रिपोर्ट को सही मानें तो इजराइल की एक फर्म ने तो योजनाबध्द ढंग से भारत के चुनावों को प्रभावित करने के लिए एआई यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंसी जैसी तकनीक का भरपूर उपयोग किया। इस कारक को भविष्य की आहट में विदेशी षडयंत्रकारियों के व्दारा लोकसभा चुनावों में कूदने के रूप में पहले भी रेखांकित किया जा चुका है, जिसकी पुष्टि अब अमेरिकन रिपोर्ट ने अब हुई है। चैटजीपीटी बनाने वाली कम्पनी ओपन एआई ने अपनी रिपोर्ट में घोषित किया है कि भारत के लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने के लिए उसके प्लेटफार्म को चीन, इजराइल, ईरान और रूस की धरती से भाजपा के विरुध्द उपयोग करने का प्रयास किया गया है। इन प्रयासों के अधिकांश भाग को उसने बहुत ही सजगता के साथ असफल कर दिया। इस षडयंत्र को एक अभियान के रूप में चलाया गया था। इसकी शुरूआत इजराइल स्थित एक नेटवर्क ने भारत की मौजूदा सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की आलोचना तथा विपक्षी कांग्रेस पार्टी की प्रशंसा के रूप में वातावरण निर्मित करने हेतु किया। यह कुकृत्य मई माह में सामने आया और कम्पनी ने तत्काल इसे रोकने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिये। योजना के अनुसार इजराइल से संचालित अकाउण्ट्स के एक समूह का उपयोग गुप्त अभियानों के लिए कन्टेन्ट बनाने, एडिटिंग करने तथा उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के लिए किया गया। इन कन्टेन्ट्स को एक्स, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम, यूट्यूब सहित विभिन्न लोकप्रिय साइट्स पर शेयर किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस नेटवर्क ने मनगढन्त नामों से अकाउण्ट बनाये तथा उनका उपयोग भारत के लोकसभा चुनावों को सत्ताधारी दल के विरोध में करके कांग्रेस को लाभ पहुंचाने की नियत से किया गया। इस रिपोर्ट के खुलासे के पहले ही रेखांकित किया जा चुका था कि किस तरह से चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति के स्वामित्व वाले ग्लोबल टाइम्स व्दारा चुनाव काल में जहर उगला जा रहा है। ऐसे ही प्रयास अमेरिका के अनेक राजनायिकों, कनाडा की सरकार, आतंकवाद के संरक्षक देशों एवं शत्रुभावी भूभाग व्दारा होते रहे। यह सब पूर्व निर्धारत कार्ययोजना का अंग था, जिसे विदेशी दौरों के दौरान राष्ट्रविरोधियों ने सुनिश्चित किया गया था। इसी कडी में संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर अमेरिका सहित विभिन्न देशो में वहां के कथित पत्रकारों व्दारा भारत विरोधी मुद्दे उठवाये जाते रहे। विपक्षी दलों के अनेक चर्चित चेहरों ने विदेशी दौरों में राष्ट्रविरोधी एवं घातक प्रचार किया ताकि अन्तर्राष्ट्रीय दबाव दिखाकर देश के मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके। चुनावों में मतदान की समाप्ति के बाद अब जबरजस्ती की माथा पच्ची करने का सिलसिला शुरू हो गया है। कुछ घंटों बाद ही वास्तविक परिणाम सामने आने वाले हैं तब भी संभावनाओं की भंवर में देश की आम आवास को डुबोने की कोशिशें की जा रहीं हैं। 
जीत के आंकडे, सीटों की संख्या, मुद्दों का रेखांकन, भावी योजनायें, सत्ता पर काबिज होते ही कामों की सूची जैसे अनेक बिन्दुओं पर चल रही चल रही बहस कथित भविष्य वक्ताओं के शब्द दंगल से अधिक अस्तित्व नहीं रखता। कथित बुध्दिजीवियों के मनमाने वक्तव्यों को प्रवचन की तरह परोसने का क्रम साइबर जगत के साथ-साथ चौराहों से लेकर चौपालों तक चल निरंतर चल रहा है। अनेक स्थानों पर पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के मध्य वाक्य युध्द से लेकर हाथापाई तक की स्थितियां भी देखने को मिल रहीं हैं। चुनावी दौर मेें हिंसा का खुला खेला धीरे-धीरे नेपथ्य में चला गया। लोकतंत्र के हत्यारों की फाइलों पर धूल डालने की कोशिशें अभी से शुरू हो गई हैं। 
बंगाल तो देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है जहां की सरकार आरोपी को बचाने के लिए उच्चतम न्यायालय तक के दरवाजे पर दस्तक देने में गर्व महसूस करती है। संवैधानिक व्यवस्था की कीमत पर मनमानियों को संरक्षण देने की दिशा में निरंतर बढोत्तरी देखी जा रही है। सब कुछ खुलेआम होने के बाद भी स्वत:संज्ञान जैसी स्थिति निर्मित न होने पर अनेक प्रश्न चिन्ह अंकित होना स्वाभाविक ही है। कभी एक गुमनाम पत्र पर उच्चतम न्यायालय संवेदनशील हो जाता है तो कभी लोकतांत्रिक संविधान की रीढ पर हो रही निरंतर चोट को भी अनदेखा किया जाता है। देश के संवैधानिक ढांचे के अनेक स्तम्भ निरंतर निरंकुशता की ओर बढते जा रहे हैं। अधिकारों के अतिक्रमण की बाढ सी आ गई है। तीनों कारक वर्चस्व की जंग में कूद पडे हैं। सामंजस्य, संतुलन और सहयोग को तो किस्तों में कत्ल किया जा चुका है। अब तो केवल उसकी लाश को वैन्टीलेटर पर रखकर जबरजस्ती आक्सीजन देने का ढोंग ही किया जा रहा है। ऐसे में राष्ट्र के सामने मुंह खोले खडी वास्तविक चुनौतियों को रेखांकित करने के स्थान पर कथित भविष्यवक्ताओं, बुध्दिजीवियों और विशेषज्ञों की चिरपरिचित जमात के मध्य शब्दों का दंगल आयोजित करना कदापि सुखद नहीं कहा जा सकता। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
Dr. Ravindra Arjariya
Accredited Journalist
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शनिवार, 8 जून 2024

उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा का इतना बुरा प्रदर्शन क्यों

बसंत कुमार

वर्ष 2024 के आम चुनावो के परिणाम आ चुके है और एनडीए को तीसरी बार सरकार बनाने का जनादेश मिल चुका है पर जिस दल न लगातार दो टर्म तक शासन किया हो और सीएए, ट्रिपल तलाक़, अनुच्छेद 370 जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर महत्वपूर्ण फैसले लिए हों तथा देश को विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई हो वह इस चुनाव में 240 सीटों पर सिमट गई और 273 का जादुई आंकड़ा प्राप्त करने के लिए जनता दल (यू) और तेलगु देशम पार्टी जैसे सहयोगियों पर आश्रित होने को मजबूर है।

सबको आशा थी कि मोदी सरकार अपने तीसरे टर्म में कॉमन सिविल कोड, जनसंख्या नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसला ले सकेगी, पर जिस तरह का जनादेश आया है उस पर राष्ट्रीय महत्व के इन मुद्दों पर फैसला लेना अब सरकार के लिए लेना मुश्किल हो जाएगा। चुनाव के समय जो विपक्षी दल सरकार पर संविधान नष्ट करने और आरक्षण समाप्त करने जैसे अनर्गल आरोप लगा रहे थे वे वास्तव में भाजपा के प्रगतिशील कदमों जैसे कामन सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण को रोकना चाहते थे और इसी कारण देश की जनता के सामने इस प्रकार के झूठे प्रचार किये गए। परन्तु भाजपा के लिए आत्मचिंतन का विषय है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता बनाने वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा 2019 के 66 सीटों के मुकाबले 33 सीटों पर ही क्यों सिमट गई और सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि भाजपा अयोध्या में 500 वर्षों से लंबित अयोध्या में भव्य राम मन्दिर के निर्माण के बावजूद फैजाबाद(अयोध्या) की सीट भी नहीं बचा पाई।

प्रदेश में मोदी और योगी की डबल इंजन सरकार की अनेका नेक उपलब्धियों के बावजूद प्रदेश में भाजपा की इतनी दुर्गति क्यों हुई। इस विषय में प्रदेश लोकसभा के लिए प्रत्याशियों के चुनाव के लिए बनाई गई हाई कोर कमेटी को दिल्ली प्रदेश भाजपा से सीख लेनी चाहिए थी जिन्होंने अपने गौतम गंभीर, डॉ. हर्ष वर्धन, मीनाक्षी लेखी जैसे बड़े नाम वाले 6 सांसदों के टिकट काटकर उन लोगों को टिकट दे दिये जिनके विरुद्ध जनता में नाराजगी न हो और ऐसा करके उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गठबंधन होने के बावजूद 7 की सातों सीट पर कब्जा कर लिया। परंतु उत्तर प्रदेश भाजपा में टिकट वितरण का उत्तरदायित्व उन लोगों को दिया गया जो मूल रूप से भाजपाई होने के बजाय बसपा जैसी पार्टियों से आये थे और पहली बार भाजपा में टिकट बंटवारे में बसपा वाली पद्धति अपनाई गई और पार्टी द्वारा समय-समय पर विभिन्न स्रोतों द्वारा कराए गए सर्वे रिपोर्टों को दरकिनार कर उन सांसदों को पुन: टिकट दे दिये गए जिनके खिलाफ क्षेत्र की जनता में आक्रोश था और पार्टी नेतृत्व इस बात को जानता था और कार्यकर्ता इस कृत्य से इतने नाराज थे कि पार्टी मीटिंगों में शक्ल दिखाने के बावजूद पार्टी प्रत्याशी को वोट दिलाने के लिए घर से बाहर नहीं निकले।

उत्तर प्रदेश भाजपा में मनमानी टिकट बटवारे के साथ साथ प्रदेश में अपेक्षित परिणाम न आने का कारण संगठन में लगे नेताओ और मंत्रियों का घमंड तथा कार्यकर्ताओं के प्रति उनका उदासीन रवैया रहा है जब भी कोई कार्यकर्ता अपनी कोई बात कहने की कोशिश करता तो उसे यह कहकर डांट दिया जाता कि तुम बस मोदी और कमल का निशान देखो बाकी कुछ मत सोचो। यह सही है कि श्री नरेंद्र मोदी जी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं तो क्या उनका नाम लेकर संगठन हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाए और इन दोयम दर्जे के नेताओं ने सब कुछ मोदी, योगी और भगवान् राम भरोसे छोड़ दिया और अबकी बार 400 के पार नारे लगाते रहे। किसी नेता या प्रत्याशी न सरकार की उपलब्धियों और अपने द्वारा क्षेत्र में किये गए काम की चर्चा करना जरूरी नहीं समझा और पार्टी के बड़े नेताओं के समक्ष सही बात कहने का साहस किया तो उसे छड़ दिया गया। किसी भी नेता ने विपक्ष द्वारा संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने के दुष्प्रचार का जबाब देना जरूरी नहीं समझा। पर मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली की प्रदेश इकाइयों ने सब कार्यकर्ताओं को मिलाकर काम किया और वहां पर भाजपा के पक्ष में 100% परिणाम आए।

इस चुनाव में एक और बात सामने आई कि भारतीय जनता पार्टी 11 राज्यो में 11 अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटों में से मात्र 30 सीटों पर विजय प्राप्त कर पाई जबकि वर्ष 2019 में पार्टी ने ऐसी 49 सीटों पर कब्जा किया था और इसमे अधिकांश सीटें उत्तर प्रदेश में जीती गई, वहां पर 17 आरक्षित सीटों में से 15 भाजपा के खाते में गई थी जबकि इस बार पूरे प्रदेश में मात्र 7 सीटे ही भाजपा के खाते में आई, परिणाम बताते है कि देश की 131 आरक्षित सीटों में से भाजपा की झोली में मात्र 55 ही भाजपा की झोली में आई और बाकी 71 सीटे विपक्षी दलों को मिली। सबसे अधिक ध्यान देने की बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी का वोट शेयर 19% से गिरकर मात्र 9% ही रह गया है अर्थात संविधान की सुरक्षा के नाम पर मायावती की पार्टी के मुख्य वोटरों जाटवों ने बसपा के पक्ष में अपना वोट देकर खराब करने के बजाय अपना वोट उस दल या गठबंधन को देना चाहते थे जो भाजपा को हरा सके और इसी कारण उत्तर प्रदेश में उन्होंने सपा और कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशियों को वोट दिया।

उत्तर प्रदेश में जाटव वोटरों का भाजपा से नाराजगी का एक और कारण प्रदेश की सभी आरक्षित सीटों पर एकाध अपवाद को छोड़कर सभी जगह जाटव चमारों को टिकट न देकर सभी सीटों पर पासी और खटिक जाति के लोगों को टिकट दिया, भाजपा ने एक राष्ट्रीय महामंत्री को विशेष रूप से 2019 में हारी 18 सीटों को जीत में बदलने के लिए विशेष अधिकार के साथ भेजा पर वे जाटवों के प्रति अपने पूर्वगृह के कारण 18 हारी सीटों को तो जीत में नहीं बदल पाए अपितु जीती हुई सीटे भी हार गए। यदि जाटवों और अन्य दलितों को कांग्रेस की ओर पुन: जाने से रोकना है तो पार्टी को जाटवों के प्रति बसपा का वोट बैंक वाले पूर्वग्रह को छोड़ना होगा क्योंकि वे अब बसपा के अतिरिक्त किसी अन्य दल में अपना विकल्प तलाश रहे है और नगीना सीट से चंद्र शेखर रावण की विजय इस बात का प्रमाण है यदि पार्टी ने मछली शहर से कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नजर अंदाज करके बीपी सरोज को टिकट न देकर वहां से किसी जाटव को टिकट दिया होता तो तो पूर्वांचल की दर्जनों भर सीटों पर स्थिति अलग होती और जाटव दलितों का वोट सपा और कांग्रेस की झोली में नहीं जाता।

यह निर्विवाद सत्य है कि आज भी नरेंद्र मोदीजी देश के सबसे लोकप्रिय नेता है और एनडीए की तीसरे टर्म की वापसी उनकी रात दिन की मेहनत का नतीजा है और भाजपा की सीटों में वर्ष 2019 के मुकाबले 60-65 सीटों का कम आने का मुख्य कारण गलत प्रत्याशियों का चयन और सांसदों एवं मंत्रियों द्वारा भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान न देना रहा है। यदि पार्टी को वर्ष 2014 और 2019 की तरह परिणाम पाना है तो पार्टी को विभिन्न सर्व रिपोर्ट को दरकिनार कर मनमाने ढंग से टिकट देने की प्रवृत्ति को बदलना होगा और संगठन में उन लोगों को शामिल करना होगा जो बड़े नेताओ की हां में हां मिलाने के बजाय उनके सामने सच्चाई से अपनी बाते कह सके।

शुक्रवार, 7 जून 2024

खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियो के प्रति आंखे बंद कर लेनी चाहिए...

एक आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की। शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी। वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था। लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्म रोग (skin Disease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी। खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी।

 इस बीच एकदिन पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। काम ख़त्म कर जब वह घर वापस लौट रहा था, उसका accident हो गया। Accident में उसने अपनी दोनो आँखें खो दी। लेकिन इसके बावजूद भी उन दोनो की जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ती रही। समय गुजरता रहा और अपने चर्मरोग के कारण लड़की ने अपनी खूबसूरती पूरी तरह गंवा दी। वह बदसूरत हो गई, लेकिन अंधे पति को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। इसलिए इसका उनके खुशहाल विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

 वह उसे उसी तरह प्यार करता रहा। एकदिन उस लड़की की मौत हो गई। पति अब अकेला हो गया था। वह बहुत दु:खी था. वह उस शहर को छोड़कर जाना चाहता था।

 उसने अंतिम संस्कार की सारी क्रियाविधि पूर्ण की और शहर छोड़कर जाने लगा. तभी एक आदमी ने पीछे से उसे पुकारा और पास आकर कहा, “अब तुम बिना सहारे के अकेले कैसे चल पाओगे? इतने साल तो तुम्हारी पत्नितुम्हारी मदद किया करती थी.” पति ने जवाब दिया, *“दोस्त! मैं अंधा नहीं हूँ। मैं बस अंधा होने का नाटक कर रहा था। क्योंकि यदि मेरी पत्नि को पता चल जाता कि मैं उसकी बदसूरती देख सकता हूँ, तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता।*

 इसलिए मैंने इतने साल अंधे होने का दिखावा किया. वह बहुत अच्छी पत्नि थी. मैं बस उसे खुश रखना चाहता था.” .. ...

सीख-- *खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियो के प्रति आखे बंद कर लेनी चाहिए.. और उन कमियो को नजरन्दाज कर देना चाहिए...*
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