गुरुवार, 23 मई 2024

चुनाव में नेताओं के इन दावों को कैसे देखें


अवधेश कुमार

चुनाव के दौरान पक्ष और विपक्ष द्वारा विजय एवं सीटों के आंकड़ों को लेकर अपने अनुसार दावा किया जाना अस्वाभाविक नहीं है। ऐसा ही इस चुनाव के दौरान हो रहा है। नेताओं और पार्टियों के दावों से आम मतदाता एक सीमा तक प्रभावित होते हैं। इसलिए तथ्यों ,आंकड़ों तथा चुनाव के माहौल के आधार पर इनका विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। मतदान जब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है हमारे सामने अलग-अलग दावे आ गए हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि उन्हें 79 सीटें प्राप्त हो रही है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि 4 जून के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे और भाजपा की सिटें डेढ़ सौ तक सिमट जाएंगी। ममता बनर्जी ने भाजपा को 200 से 220 सीटों तक सिमटा दिया है। अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं सरकार आईएनडीआईए की बनेगी क्योंकि भाजपा की सिटें उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ , कर्नाटक,  महाराष्ट्र,  झारखंड सब जगह घट रही है। इतने राज्यों में अगर भाजपा की सीटें काफी संख्या में घट जाए तो वाकई उसका सरकार  बनना मुश्किल होगा। क्या वाकई अब तक के हुए मतदान , उसके वातावरण , पिछले आंकड़े आदि को आधार बनाकर इस तरह का निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

सबसे पहले उत्तर प्रदेश को ही देखें। सपा को सबसे ज्यादा 2004 में 35 सीटें मिली थीं। तब उसे 26.74 प्रतिशत वोट मिला था। न उसके पहले न उसके बाद कभी वह यह प्रदर्शन दोहरा सकी। उस समय बसपा 24. 6 7 प्रतिशत मत पाकर 19 सीटें जीती , जबकि भाजपा 22.5 प्रतिशत के साथ 10 सीटों पर सिमट गई। वह समय उत्तर प्रदेश में विखंडित राजनीति का था। तब सपा, बसपा और भाजपा मुख्य शक्ति थी और कांग्रेस हाशिये।1993 से उप्र राजनीतिक अस्थिरता और बहुमतविहीनता के दौर से गुजर रहा था जो 2007 में मायावती के नेतृत्व में बसपा को बहुमत मिलने के साथ समाप्त हुई। तब से अब तक प्रदेश की जनता एक पार्टी को बहुमत देने के लिए मतदान कर रही है। सन 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण सपा के पक्ष में हुआ तब उसे 32.06 प्रतिशत मध्य एवं 111 सिटें प्राप्त हुई। 2019 लोकसभा चुनाव में सपा बसपा के साथ मिलकर लड़ी तब भी भाजपा ने 49.6 प्रतिशत मत और 62 सीटें प्राप्त किया। सपा को 18.11 प्रतिशत मत एवं पांच सीट और बसपा को 19.4 3 प्रतिशत मत एवं 10 सीटें मिली। कांग्रेस 6.36 प्रतिशत मत के साथ एक सीट तक सिमट गई थी। प्रश्न है कि जब पहले उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हुआ तो आज क्या बदल गया है कि भाजपा को लोग पूरी तरह ध्वस्त कर देंगे और उनकी जगह सपा और कांग्रेस के गठबंधन को सिर पर उठा लेंगे?

 कांग्रेस इस समय उत्तर प्रदेश में व्यवहार में प्रभावहीन पार्टी है। विधानसभा चुनाव में उसे केवल दो प्रतिशत से थोड़ा अधिक वोट मिला था। भाजपा को जिन कारणों से विधानसभा चुनाव एवं लोकसभा में वोट मिलते रहे हैं वो कारण क्या खत्म हो गए? लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और विधानसभा में योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व, फिर हिंदुत्व, कानून और व्यवस्था, विकास, समाज के निचले तबके तक सरकारी कल्याण कार्यक्रमों का लाभ पहुंचाना आदि प्रमुख कारण रहे हैं। यह कारण आज भी विद्यमान हैं। दूसरी ओर सपा ने प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे प्रदेश के बहुमत को लगे कि राष्ट्रीय राजनीति और सत्ता का दायित्व ही उन्हें ही सौंपना चाहिए। इसके उलट माफियाओं की मृत्यु पर पूरे सपा का रवैये से जनता के बड़े वर्ग का निष्कर्ष यही है की योगी आदित्यनाथ है अपराधियों माफियाओं और गुंडो के विरुद्ध कार्रवाई कर सकते हैं सपा या अन्य दल नहीं। इसलिए इस दावे को कोई भी व्यावहारिक और विवेकशील व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता। अगर इसी पहलू को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करें तो मूल प्रश्न यही उठेगा कि जिन कारणों और सामूहिक मनोविज्ञान के तहत देश के लोगों ने 2014 में स्थापित राजनीतिक नेताओं और शक्तियों को उखाड़ कर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बहुमत दिया क्या वे कारण और उसे तरह के मनोविज्ञान खत्म हो गए?  निस्संदेह , 10 वर्षों के शासन के बाद घनघोर समर्थकों, उत्साही कार्यकर्ताओं - नेताओं के अंदर भी कई प्रकार का असंतोष, निराशा और उदासीनता आती है। क्षेत्र के सांसद अगर लगातार चुनाव लड़ रहे हैं और उनका प्रदर्शन लोगों की उम्मीद के अनुरूप नहीं हो,  जिन विचारधारा के आधार पर समर्थन मिला उसके प्रतिरूप वे नहीं दिखते हैं तो उससे भी असंतोष और क्षोभ पैदा होता हैं।

 2014 में भाजपा को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता का नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रकार का मत मिला था।

तत्कालीन शासन, उत्तर, पश्चिम और पूरब के राज्यों की  पार्टियों, नेताओं की राजनीति और सत्ता के विरुद्ध लोगों का विद्रोह था तो विचारधारा व व्यवहार के आधार पर मोदी एवं भाजपा को व्यापक समर्थन। आप देखेंगे कि यूपीए सरकार के दौरान राष्ट्रीय एवं प्रदेशों के स्तर पर सरकारों के निराशाजनक प्रदर्शनों नेताओं के अस्वीकार्य व्यवहारों, अतिवादी अल्पसंख्यकवाद, सेक्युलरवाद के नाम पर अलग प्रकार का कट्टरवाद,आतंकवादी हमले का उचित उत्तर न दिया जाना, विदेश नीति पर भारत की कमजोरी, अर्थ के क्षेत्र में निराशाजनक प्रदर्शनों आदि के साथ हिंदुत्व, हिंदुत्व अभिप्रेरित राष्ट्र चेतना तथा नरेंद्र मोदी के एक नेता के रूप में गुजरात में प्रदर्शन और उनका व्यक्तित्व लोगों के लिए आकर्षण का कारण बना। 2019 में मतदाताओं की सोच ज्यादा सशक्त हुई और परिणामस्वरूप भाजपा को ज्यादा सीटें मिलीं । 2024 में वे सारे कारण खत्म नहीं हुए हैं। विपक्षी पार्टियां नए सिरे से अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा दे रही है। साथ ही उनके पास एक देश के रूप में भारत के विकास, इसकी सुरक्षा,  विदेश नीति को लेकर दूरगामी लंबी विचारधारा और नीति सामने नहीं है। हिंदुत्व और हिंदुत्व अभिप्रेरित राष्ट्रवाद की विचारधारा पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा की प्रदेश सरकारों ने काफी काम किया है। इसलिए उम्मीदवारों , गठबंधन के साथियों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं -नेताओं की अभिप्सायें पूरी होने के मामले में कमजोर होते हुए भी ऐसा नहीं लगता कि राष्ट्रव्यापी स्तर पर इसके समानांतर दूसरे विकल्प  के हाथों देश सौंपने का निर्णय मतदाता करेंगे। एक दो राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर हो सकता है किंतु कुछ राज्यों पश्चिम बंगाल , उड़ीसा और तेलंगाना में भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर हो सकता है। 

विरोधी पार्टियां भाजपा के लिए तो बता रही हैं कि उन्हें बहुमत से कम सीटें मिलेंगी लेकिन वो कितनी सीटें प्राप्त करेंगे यह कोई नहीं बता रहा। सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को ही लीजिए।  2014 और 2019 के चुनावों में उसे 19 और 20 प्रतिशत के बीच वोट मिले थे। 2023 के विधानसभा चुनावों में कर्नाटक और हिमाचल में उसे सफलता मिली लेकिन गुजरात ,राजस्थान , मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा जैसे राज्यों में वह बुरी तरह विफल रही है। उसका वोट प्रतिशत और सीट अचानक किस आधार पर इतना बढ़ जाएगा कि वह भाजपा के निकट पहुंच जाएगी? दक्षिण के तीन राज्यों केरल,  तेलंगाना और कर्नाटक में उसे कितनी सीटें मिले मिल सकती है जिससे यह मान लिया जाए कि कांग्रेस 150 या उससे ज्यादा स्थान प्राप्त कर लेगी? केरल में उसे पहले ही सर्वाधिक 15 और गठबंधन को 19 सीटें प्राप्त है। कर्नाटक में भाजपा अभी भी एक बड़ी शक्ति है और कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के रहते उसे पूरी तरह पराजित करना संभव नहीं दिखता। दिल्ली की ओर लौटे तो विधानसभा चुनावों में जबरदस्त प्रदर्शन करने के बावजूद अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप मतों के मामले में कभी भी भाजपा के आसपास नहीं पहुंच सकी। कांग्रेस22.51 प्रतिशत और आप 18.11 प्रतिशत मत मिलाकर भी पिछले चुनाव में भाजपा के 56.86 प्रतिशत से काफी कम है। अरविंद के केजरीवाल को प्रचार के लिए जेल से अंतरिम जमानत मिलने के बाद उनके उम्मीदवारों, नेताओं, कार्यकर्ताओं में थोड़ा उत्साह है किंतु इसका चुनाव पर व्यापक असर पड़ेगा और वह भी स्वाति मालीवाल के विरुद्ध मुख्यमंत्री आवास पर हिंसा के बाद ऐसी कल्पना आसानी से नहीं की जा सकती। बिहार में वर्तमान गठबंधन 2019 में भी था लेकिन राजग ने 39 सीटें प्राप्त की। नीतीश कुमार की वापसी को भाजपा, उसके समर्थकों, कार्यकर्ताओं और राजग के मतदाताओं ने बहुत सकारात्मक रूप से नहीं लिया है। बावजूद वो प्रतिशोध के भाव में आकर राजद, कांग्रेस व अन्य दलों के गठबंधन के लिए भारी संख्या में मतदान करेंगे ऐसे भी जमीनी हालात नजर नहीं आते। राष्ट्रीय स्तर पर लगभग तीन प्रतिशत कम मतदान एवं कई राज्यों गुजरात मध्य प्रदेश आदि में मतदान में भारी गिरावट अवश्य हुई है पर अभी तक चुनाव में ऐसी प्रवृत्तियां नहीं दिखी हैं जिनके आधार पर निष्कर्ष निकाल दिया जाए की आम जनता गुस्से में नरेंद्र मोदी भाजपा और राजग के विरुद्ध तथा आईएनडीआईए के पक्ष में एकमुश्त मतदान कर रही है।

पता– अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर,  पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल- 9811027208



सोमवार, 20 मई 2024

अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन दिल्ली प्रदेश का स्थापना दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया

संवाददाता

नई दिल्ली। अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष श्री देशबंधु गुप्ता जी की अध्यक्षता में संगठन का 12वां स्थापना दिवस 19 मई रविवार को साइ 5:00 से 9:00 बजे तक शाह ऑडिटोरियम में बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हमारे प्रेरणा स्तोत्र श्री सत्य प्रकाश गुप्ता जी, चेयरमैन वीपी ग्रुप उद्धघाटन करता श्री विपिन गुप्ता जी, मैनेजिंग डायरेक्टर वीपी क्रिएशन, मुख्य अतिथि श्री प्रमोद गुप्ता जी, वर्ल्ड फा ग्रुप दीप प्रज्वलनकर्ता श्री संजीव सिंगला जी, विशिष्ट अतिथि और प्रमुख समाजसेवी श्री भीमसेन मित्तल जी, दिनेश गुप्ता जी, श्री अनिल गुप्ता जी, श्री ललित अग्रवाल जी, श्री सोहित जैन जी, श्री वेद प्रकाश जैन जी, श्री सतीश राम कुमार गोयल जी, श्री अनिल गोयल जी, श्री शिव कुमार गुप्ता जी, श्री राजेश दवे जी, श्री रमेश गर्ग जी सभी ने मिलकर दीप प्रज्वलित कर महाराजा अग्रसेन जी के चित्र पर पुष्प चढ़कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । कार्यक्रम में आए हुए सभी अतिथियों का संगठन के अध्यक्ष श्री देशबंधु गुप्ता जी महामंत्री सुभाष चंद्र गुप्ता जी, चेयरमैन महावीर गोयल जी, कोष अध्यक्ष अशोक सतोडिया जी, युवा चेयरमैन रविंदर गर्ग जी, मुख्य सलाहकार श्री पवन सिंघल जी ने दुपट्टा एवं माला और श्री राम जी का मोमेंटो देकर सम्मानित किया।

दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष श्री देशबंधु गुप्ता जी ने स्थापना दिवस के पावन पर्व पर खचाखच भरे ऑडिटोरियम में अग्रवाल समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा की सेवा का दूसरा नाम अग्रवाल संगठन है जो दिन रात जरूरतमंदों की सेवा में निस्वार्थ भाव से लगा हुआ है। संगठन द्वारा छात्रों को मुफ्त कंप्यूटर शिक्षा, महिलाओं को फ्री ब्यूटी पार्लर कोर्स, फ्री मेहंदी कोर्स कराया जाता है, योगा टीचर ट्रेनिंग देकर बच्चों को योगा टीचर बनाया जाता है और उन्हें नौकरी से लगवाया जाता है गरीब कन्याओं का विवाह करना यूपीएससी एग्जाम में स्कॉलरशिप प्रदान करना और इसके अलावा संगठन द्वारा समाज हित के अनेक कार्य चलाए जा रहे हैं। महामंत्री सुभाष चंद्र गुप्ता जी ने बताया की अग्रवाल संगठन ने सेवा के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में अपनी पहचान बनाई है इस अवसर पर मौजा मौजा ग्रुप द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर सोने की लंका कैसे बनी, माता शबरी की राम के प्रति अनंत भक्ति, महाराणा प्रताप की वीरगाथा, दुर्गा महिषासुर नृत्य नाटिका और देशभक्ति के भी अनेक गीत प्रस्तुत किए गए इस कार्यक्रम में संगठन की सभी पदाधिकारी मौजूद थे । दिल्ली प्रदेश की महिला चेयरमैन श्रीमती मंजू सिंघल जी, महामंत्री करुणा गोयल जी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्रीमती सुदेश मित्तल जी एवं सभी महिला पदाधिकारी उपस्थित थी। संगठन के महामंत्री सुभाष चंद्र गुप्ता जी ने बताया की अग्रवाल संगठन तन मन धन से समाज के लोगों से जुड़ा हुआ है इतना भव्य आयोजन सभी के सहयोग से ही संभव हो पा रहा है मंच का संचालन श्री गुलशन जगा जी और पवन सिंघल जी के माध्यम से हुआ संगठन का अगला कार्यक्रम 4 अगस्त 2024 को हरियाली तीज के रूप में मनाया जाएगा।

शुक्रवार, 17 मई 2024

सिर्फ मार्क्स प्रतिशत को सफलता की गारंटी न माने

बसंत कुमार

पिछले सप्ताह सीबीएसई की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के परिणाम आये हैं और तब से पूरा सोशल मीडिया इस तरह की पोस्टों से भरा पड़ा है कि मेरे बच्चे ने इतने प्रतिशत अंकों से पास किये है और उसे शुभकामनाएं दें। इन शुभकामना की पोस्ट डालने वाले पैरेंट्स जिनके बच्चे, 95 प्रतिशत या इससे अधिक अंक लाये हैं वो तो खुश हैं पर जिनके बच्चे कड़ी मेहनत के बावजूद, 90 प्रतिशत ही ला पाए हैं वे बहुत दुखी दिख रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे से 95 प्रतिशत या इससे अधिक की उम्मीद की थी और पैरेंट्स की इस बात ने बहस को जन्म दे दिया कि क्या सिर्फ परीक्षा में अच्छा प्रतिशत ही सफलता की गारंटी का मापदंड होना चाहिए। अभी-अभी जो रिजल्ट आये हैं उससे उन बच्चों के पैरेंट्स हताश नजर आ रहे हैं जो दिन-रात कड़ी मेहनत करने के बाद भी 70-80 प्रतिशत नंबर ही ला पाए हैं पर क्या उन्हे अपने बच्चों की दिन-रात की मेहनत नजर नहीं आती।
हर व्यक्ति अपने बच्चों से 100 प्रतिशत की उम्मीद लगाए बैठा है पर बच्चों के 80-90 प्रतिशत अंक प्राप्त करने के पश्चात भी पैरेंट्स का निराश होना बच्चों के मन में बहुत असर डालता है और इसका दुष्परिणाम यह है कि हर साल परीक्षा का परिणाम आने के पश्चात कई बच्चे आत्महत्या तक का प्रयास करते हैं या कर लेते हैं।
इस तरह के पनपते बैर का मुख्य कारण सोशल मीडिया है। आज हर पैरेंट्स सोशल मीडिया के दबाव में जी रहा है। रिजल्ट आते ही फेसबुक पर हाई स्कोर करने वाले बच्चों की फोटोस् से पूरा सोशल मीडिया भरा होता है कोई लिखता है मेरे बपिछले सप्ताह सीबीएसई की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के परिणाम आये हैं और तब से पूरा सोशल मीडिया इस तरह की पोस्टों से भरा पड़ा है कि मेरे बच्चे ने इतने प्रतिशत अंकों से पाच्चे के 99 प्रतिशत आये है और कोई लिखता है कि मेरे बच्चे के 95 प्रतिशत आये हैं। इस काम में मोटी फीस लेकर प्राइवेट स्कूल के प्रबंधक भी पीछे नहीं रहते वे इस बात से बेखबर रहते हैं कि कुछ ऐसे भी छात्र हैं जो अत्यंत प्रतिभाशाली होने के बावजूद अच्छे नंबर नहीं ला पाए है, ऐसा करके हम बच्चों के व्यक्तित्व का विकास करने के स्थान पर उन्हे किताबी कीडा बना रहे है। वस्तविकता यह है कि मार्क्स अब शो की चीज हो गई है और हम हाई मार्क्स को तमगा मानने लगे हैं और धीरे-धीरे यह समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को हाई मार्क्स न ला पाने के बाद पैरेंट्स का व्यवहार उन्हें डिप्रेशन की ओर ढकेल रहा है।
अधिकांश पैरेंट्स मार्क्स के आधार पर बच्चों की इंटेलिजेंस का अंदाजा लगाते हैं जबकि एक परीक्षा में मार्क्स के आधार पर इंटेलिजेंस का अंदाजा लगाना सरासर गलत है। प्रायः यह देखा गया है कि अच्छे मार्क्स वाले छात्र जीवन के अन्य क्षेत्रों में उतने कारगर सिद्ध नहीं कर पाते हैं क्यांेकि 10वीं या 12वीं में अच्छे मार्क्स ले लेना बच्चे के इंटेलिजेंट होने की गारंटी नहीं है। अच्छे मार्क्स बच्चे की तैयारी और स्ट्रैटेगी पर निर्भर करती है, उसने किस तरह से पेपर अटेम्प्ट किया, कैसे जबाब दिया जैसी अनेक बातों पर निर्भर करता है। इसलिए कुछ कम मार्क्स के आधार पर किसी को कम और किसी को अधिक इंटेलिजेंट आंकना गलत है। इस विषय में स्कूल प्रशासन और शिक्षकांे का दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
इस विषय में अपने उपर बीती हुई कहानी बताना बहुत ही प्रासंगिक मानता हूँ। 1995 के आस-पास मेरे दोनों बेटे दिल्ली के मशहूर स्कूल एमिटी इंटरनेशनल साकेत में भर्ती हुए और कुछ वर्षाें तक दोनों अच्छे प्रतिशत वाली श्रेणी में शामिल रहे और स्कूल में पुरस्कृत होते रहे। इसी समय भारतीय खेल प्राधिकरण के एक कोच स्कूल में आये और बड़े बेटे अजीत रंजन को क्रिकेट कोचिंग में डालने की सलाह दी और कहा कि यह बच्चा आगे चलकर बड़ी क्रिकेट खेल सकता है और उनकी बात सच साबित हुई। उसने एमिटी में शिक्षा प्राप्त करते हुए विजय मर्चेंट ट्रॉफी, सीके नायडू खेली और मात्र 16 वर्ष की उम्र में रणजी कैंप किया और दिल्ली के अग्रणी कॉलेज सेंट स्टीफन कॉलेज का छात्र बना और वहां से इंग्लिश काउंटी खेली। पर इस दौरान उसका प्रतिशत 80-90 से गिरकर 50-60 प्रतिशत आ जाने पर मुझे स्कूल प्रिंसिपल और शिक्षकों से जितनी प्रताड़नाएंे झेलनी पड़ी थी वह बात मैं आज भी नहीं भूल पाता। एक बार तो उनकी क्लास टीचर ने उसका स्कूल से नाम कटवाकर प्राइवेट स्टूडेंट के तौर पर बोर्ड की परीक्षा देने की सलाह दी, पर जब उसने दिल्ली की क्रिकेट टीम में जगह बना ली तो सारी परिस्थितियां बदल गई और एमिटी एजुकेशन फ़ाउण्डेशन की अध्यक्षा श्रीमती अमिता चौहान के हस्तक्षेप के कारण उसे फ्रीशिप मिली और उसे स्कूल मैग़ज़ीन में पूरी कवरेज मिली और दशकों बाद भी उसे स्कूल में याद किया जाता हैं पर उसे भी स्कूल में कम मार्क्स की प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
इसलिए 10वीं और 12वीं के मार्क्स को ही बच्चों के इंटेलिजेंट होने की गारंटी न माने और उन्हें सोशल मीडिया पर दिखाकर अपना स्टेट्स सिम्बल न बनायें बल्कि बच्चों को अपने व्यक्तित्व के विकास का पूरा मौका दें।

गुरुवार, 16 मई 2024

चार चरणों के मतदान में उभरी प्रवृत्तियां काफी संकेत दे रही है

 


अवधेश कुमार

लोकसभा चुनाव के चार चरण पूरे होने के बाद कुल 543 स्थानों में से 379 का मतदान संपन्न हो चुका है। वस्तुत: अब तक तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, असम, गोवा, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, पुद्दुचेरी , लक्षद्वीप ,अंडमान, दमन और दीव, दादरा एवं नगर हवेली में मतदान समाप्त हो गया है। इस तरह कुल 18 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में मतदान खत्म है। इनमें आठ राज्यों तथा दो केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी कभी शक्तिशाली नहीं रही । पहले चरण में 102, दूसर में 88, तीसरे में 93 तथा चौथे चरण में 96 सीटों पर मतदान हुआ। अब केवल 164 स्थान का ही मतदान बाकी है । हालांकि अभी पंजाब,हरियाणा , दिल्ली जैसे राज्यों का मतदान बाकी है। बावजूद चुनाव से संबंधित मुद्दे, पार्टियों की रणनीतियां, मतदान की प्रवृत्तियां आदि काफी हद तक हमारे सामने आ चुके हैं। इसलिए लोकसभा चुनाव के अभी तक के मतदान के आधार पर कुछ स्पष्ट दिखती तस्वीरें तथा संकेतों और संदेशों को समझाना ज्यादा आसान हो गया है।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा मतदान प्रतिशत गिरने की प्रवृत्तियों का हुआ है। चौथे चरण का अंतिम मतदान प्रतिशत आने में समय लगेगा । चुनाव आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार तीसरे चरण में 65.68% मतदान हुआ, जबकि 2019 में इस चरण में 68.4% मतदान हुआ था । इसमें असम में सर्वाधिक 85.45 प्रतिशत, गोवा में 76.00 6%, बिहार में 59.15% और उत्तर प्रदेश में 57.55% मतदान हुआ। पहले चरण में 66.14% तथा दूसरे में 66.71% मतदान हुआ था। 2019 के लोकसभा चुनाव में पहले चरण में 69.4 3% और दूसरे में 69.6 4% मतदान हुआ था। इस तरह देखें तो पहले चरण में 3.3 प्रतिशत, दूसरे में करीब 2.9% एवं तीसरे चरण में 2.72% की कमी आई है। कुल मिलाकर मोटा - मोटी 2019 की तुलना में 3% मतदान राष्ट्रीय स्तर पर कम हुआ है। सामान्यतया राष्ट्रीय स्तर पर तीन प्रतिशत मतदान कम होना बहुत ज्यादा नहीं लगता, किंतु राज्यों के अनुसार देखें तो इनमें काफी उतार - चढ़ाव है। मसलन महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश, केरल जैसे राज्यों में मतदान का प्रतिशत ज्यादा कम रहा। दूसरी ओर पूर्वोत्तर के लोगों ने भारी मतदान किया। पश्चिम बंगाल का लगभग 73 -744% मतदान भी अभी तक अच्छा है लेकिन यह पिछले चुनाव से काफी कम है। राज्यों के अंदर भी अलग-अलग क्षेत्र में कम और ज्यादा मतदान हुआ है।  इसमें सबसे सबके दिमाग में यह प्रश्न कौंध रहा है कि किसके मतदाता कम संख्या में निकले?

 परिणाम के पूर्व कोई भी भविष्यवाणी जोखिम भरी है। महिला मतदाताओं की संख्या के आधार पर पिछले लोकसभा चुनाव और राज्य विधानसभा चुनावों में माना जा रहा था कि जहां भी भाजपा है वहां इनका ज्यादातर मत उसे ही मिलता है। इस चुनाव में महिला मतदाताओं  की संख्या असम और पश्चिम बंगाल में 83% से अधिक रही, आए जो देश में सबसे ज्यादा है। शेष जगह महिलाओं का मतदान सामान्य रहा और पुरुषों की तुलना में ज्यादातर जगह कम। इन सबके निश्चय ही निहितार्थ हैं । क्या हैं निहितार्थ? विपक्ष के दावों के बावजूद देश भर में यह नहीं देखा गया कि कहीं भी व्यापक स्तर पर जनता के अंदर नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से हर हाल में उखाड़ फेंकने का सामूहिक वातावरण है। इसी तरह विपक्ष को केंद्र की सत्ता में स्थापित करना है ऐसा सामूहिक प्रखर भाव भी कहीं देखा नहीं गया। स्थानीय स्तरों पर भाजपा के नेताओं -कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक समूह में कई कारणों से उदासीनता और असंतोष दिखा है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा के साथ बना हुआ स्वाभाविक अभूतपूर्व वातावरण निश्चित रूप से कमजोर पड़ा और चुनाव की अंतर्धारा में यह सशक्त रूप से सब जगह कायम नहीं रहा। ऐसा नहीं था कि लोगों ने 500 वर्षों के बाद मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा से भावनात्मक रूप से स्वयं को जोड़ा नहीं लेकिन उसे बनाए रखने के लिए उम्मीदवार, गठबंधन तथा अन्य सरकारी सम्मानों के लिए चयनित व्यक्तियों का व्यक्तित्व उसके अनुरूप होना चाहिए। अगर इनमें राममंदिर, हिंदुत्व और प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व की झलक नहीं होगी तो कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध समर्थक चुनाव में करो या मरो के भाव से काम नहीं कर पाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मतदान करना है तो चाहे बीजेपी हो या गठबंधन उनमें भी उस तरह की प्रखरता सामने दिखने चाहिए थी। बावजूद भाजपा के नेता ,कार्यकर्ता और प्रतिबद्ध समर्थक गुस्से और प्रतिशोध के भाव में एकमुश्त उसके विरुद्ध मतदान कर देंगे ऐसा मानने का ठोस आधार नहीं दिखता है। भाजपा विरोधी जितना प्रचार करें चार चरणों के चुनाव में इस तरह की व्यापक प्रवृत्तियों की रिपोर्ट नहीं है। हां, अप्रतिबद्ध मतदाता इधर से उधर जाते हैं और इस चुनाव में गए हैं। किंतु अभी तक की प्रवृत्तियों में ऐसा नहीं दिखा है कि दो लोकसभा चुनावों से भाजपा के साथ खड़े होने वाले मतदाताओं का बहुत बड़ा समूह बिल्कुल विपक्ष के साथ भाजपा को हराने की मानसिकता से चला गया।

 चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने के बाद कांग्रेस से निकले नेताओं ने जिस तरह पार्टी को हिंदुत्व और राम मंदिर विरोधी घोषित किया उसका इतना अर्थ तो है ही कि यह मुद्दा मूर्त रूप में विद्यमान है। विपक्ष वैसे मुद्दों पर सरकार को घेरे जिनमें तथ्य हों और वे सच भी हों तो आम लोग प्रभावित होंगे। अभी तक के चुनाव में विपक्ष ने उन मुद्दों को सबसे ऊपर लाने की कोशिश की है जिनमें ज्यादातर सच नहीं है। उदाहरण के लिए भाजपा ने 400 सीटों का नारा इसलिए दिया कि वह संविधान और आरक्षण को खत्म कर सके। इसी तरह यह कि नरेंद्र मोदी सत्ता में आ गए तो आगे चुनाव नहीं होगा। यानी यह फासिस्ट और उच्च जातियों की मानसिकता वाली पार्टी है जो लोकतंत्र के अनुकूल व्यवस्था को रहने नहीं देगी । ये सब वही आरोप हैं जो संघ परिवार और भाजपा पर वर्षों से लगाए जाते रहे और हमेशा गलत साबित हुए। ऐसा नहीं है कि लगातार इस दुष्प्रचार से मतदाता बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए लेकिन 10 वर्षों के शासनकाल में ऐसा नहीं हुआ जबकि पहले भी यही आरोप लगाया गया था । तो आगे होगा इस पर मतदाताओं का व्यापक समूह विश्वास नहीं कर सकता। लोगों के सामने यह सच भी है कि भाजपा ने सत्ता में आने के बाद आरक्षण व्यवस्था को ज्यादा सुसंगत और तार्किक बनाया है। आर्थिक रूप से कमजोर की सूची में आरक्षण के लिए मुसलमान सहित सभी को शामिल किया है। संविधान दिवस की शुरुआत करने वाली पार्टी संविधान को खत्म कर देगी इस पर सहसा कौन विश्वास करेगा?

 आप देखेंगे कि पहले चरण के साथ विपक्ष ने प्रकट और अप्रकट अल्पसंख्यकों के नाम पर मुसलमान से जुड़े उन मुद्दों को उभारा जिनके विरुद्ध प्रतिक्रिया में भाजपा की ताकत बढ़ती रही है। इस चुनाव का यह दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है कि स्वयं मुसलमानों के अंदर पढ़े -लिखे और अगुवा वर्ग ने चुनाव को इस्लाम मजहब का विषय बनाया, इसके आधार पर पूरे समुदाय से भाजपा के विरुद्ध वोट करने  कि सार्वजनिक अभियान चलाया है,पर किसी भी विपक्ष के नेता ने इसका विरोध नहीं किया। पहले चरण के बाद दूसरे,  तीसरे और चौथे चरण तक यह विषय चरम पर पहुंचा और स्वयं प्रधानमंत्री एवं भाजपा की इसके विरुद्ध प्रतिक्रियाओं ने निश्चय ही मतदान को प्रभावित किया होगा। कुछ राज्यों विशेषकर तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना , आंध्रप्रदेश ,पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में साफ दिख रहा है कि सनातन, हिंदुत्व, राम मंदिर मतदाताओं को प्रभावित करने वाला बड़ा कारक है और वहां की सत्तारूढ़ दलों के विरुद्ध प्रतिक्रिया में भाजपा को वोट मिला है। संदेशखाली बंगाल चुनाव को प्रभावित कर रहा है । बंगाल,  उड़ीसा और तेलंगाना में भाजपा शानदार प्रदर्शन करें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसी तरह केरल और तमिलनाडु में भी उसका प्रदर्शन संतोषजनक हो सकता है।

वस्तुत: सभी पार्टियों को चुनाव में परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवहार का परिचय देना चाहिए था।‌ महान सभ्यता -संस्कृति वाले इस देश के चरित्र को केंद्र में रखते हुए अर्थनीति, विदेश नीति ,रक्षा नीति, सामाजिक- सांस्कृतिक नीति आदि पर गंभीर बहस से चुनाव को सही पटरी पर लाया जा सकता था। प्रधानमंत्री ने स्वयं चुनाव अभियान की शुरुआत 2047 तक भाजपा को विकसित देश बनाने, अगले 5 वर्ष से लेकर सरकार में आने पर 100 दिन के एजेंडे की बात की। लेकिन संविधान और आरक्षण खत्म करने, लोकतंत्र का अंत करने, अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के मजहबी अधिकार समाप्त कर देने के साथ अलग-अलग जातियां के समर्थन और विरोध जैसे आरोप इतने हाबी हो गए कि अंततः ये चुनाव का मुख्य मुद्दे हो गये। जो स्थिति हो गई है उसमें यह मानने का कोई कारण नहीं कि शेष तीन चरणों में ये मुद्दे नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अयोध्या में श्रीरामलला का दर्शन और रोड शो वास्तव में चुनाव को इनके साथ जातीय, स्थानीय और छोटा स्वार्थों वाले मुद्दों से निकालकर व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की पटरी पर लाने की कोशिश थी। 




बुधवार, 15 मई 2024

सर्वोदय बाल विद्यालय बुलन्द मस्जिद स्कूल का 12वीं का 100% और 10वीं का 96.10% रहा रिजल्ट

 -पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 12वीं में 10% और 10वीं में 41% बढ़ा रिजल्ट

-12वीं में जुनैद (79.6%) प्रथम, मीर हमजा (72.4%) द्वितीय, फैजान अंसारी (62.6%) तृतीय स्थान पर रहे

-10वीं में मुर्शीद  प्रथम,  मो. शोएब  द्वितीय, मो. इरशादे अमन तृतीय स्थान पर रहे

-सभी विषयों में बच्चों ने अच्छे अंक प्राप्त कर अध्यापकों का नाम रोशन किया

मो. रियाज़

उत्तर-पूर्वी दिल्ली। सर्वोदय बाल विद्यालय, बुलन्द मस्जिद शास्त्री पार्क स्कूल का रिजल्ट लगातार बढ़ रहा है। स्कूल का पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 12वीं में 10% और 10वीं में 41% रिजल्ट बढ़ा है। इस वर्ष स्कूल का 12वीं का 100% और 10वीं का 96.10% रहा है।

स्कूल का 12वीं का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत रहा। जहां स्कूल का रिजल्ट पिछले वर्ष 90 प्रतिशत था वहीं इस बार यह 100 प्रतिशत हो गया है।

इसी तरह 10वीं का परीक्षा परिणाम 96.10 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष से 41 प्रतिशत अधिक है। जिसका श्रेय यहाँ के प्रधानाचार्य चाँद बाबू व उनके स्टाफ (अध्यापकों) को जाता है जिनकी मेहनत से स्कूल का रिजल्ट बढ़ रहा है। उन्हीं की मेहनत से इस वर्ष 12वीं का 100% और 10वीं का 96.10% रहा है।

इस वर्ष 12वीं में जुनैद (79.6%) प्रथम, मीर हमजा (72.4%) द्वितीय, फैजान अंसारी (62.6%) तृतीय स्थान पर रहे वहीं 10वीं में मुर्शीद  प्रथम,  मो. शोएब  द्वितीय, मो. इरशादे अमन  तृतीय स्थान पर रहे।

इस परीक्षा परिणाम पर स्कूल के प्रधानाचार्य चाँद बाबू का कहना है कि हमारा स्कूल लगातार अपना शानदार प्रदर्शन कर रहा है जिसमें अध्यापकों की मेहनत रंग ला रही है जिसका परिणाम आपके सामने है। मैं अध्यापकों, छात्रों व उनके अभिभावकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने कम सुविधा होने पर मुझ पर विश्वास किया। मैं आशा करता हूं कि आने वाले वर्ष में भी ऐसा रिजल्ट आएगा और हमारा स्कूल भी दिल्ली के टॉप स्कूलों में गिना जाएगा।

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