मंगलवार, 2 अप्रैल 2024
आलमी उर्दू फाउंडेशन ने किया 'महफिले ज़िक्रे अली' एवं दावत-ए-इफ़्तार का आयोजन
सुप्रीम कोर्ट ने AAP नेता संजय सिंह को दी जमानत, आम आदमी पार्टी को बड़ी राहत
सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने भी जमानत का विरोध नहीं किया
संवाददाता
नई दिल्ली। दिल्ली शराब घोटाले मामले में संजय सिंह को सुप्रीम कोर्ट से 6 महीने के बाद अब जमानत मिल गई है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जमानत की शर्तें तय करेगा. इस जमानत को मिसाल नहीं माना जाएगा। ईडी ने भी जमानत का विरोध नहीं किया और कहा कि उन्हें जमानत दी जा सकती है। अब संजय सिंह राजनीतिक गतिविधियां कर सकेंगे। पिछली सुनवाई में संजय सिंह के लिए पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय के मुख्य गवाह दिनेश अरोड़ा ने पहले अपने 9 बयानों में संजय सिंह का नाम नहीं लिया था। संजय सिंह को डेढ़ साल बाद गिरफ्तार किया गया।
सिंघवी ने कोर्ट में कहा था कि अप्रूवर की गवाही तब तक विश्वसनीय नहीं होती, जब तक उसकी पुष्टि न हो जाए। 19 जुलाई 2023 को अप्रूवर बने दिनेश अरोड़ा के बयान में पहली बार संजय सिंह का नाम आया। यहां तक कि 164 के बयान में भी नाम नहीं लिया था. संजय सिंह ने ईडी के खिलाफ (मानहानि) शिकायत की, और फिर ईडी ने बिना किसी समन के उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
हाई कोर्ट ने सात फरवरी को सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन निचली अदालत को सुनवाई शुरू होने पर इसमें तेजी लाने का निर्देश दिया था। सिंह दिल्ली से राज्यसभा के लिए फिर से चुने गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने संजय सिंह को मामले में 4 अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार किया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली शराब नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में तिहाड़ जेल में पहुंच गए हैं।
मनीष सिसोदिया और के. कविता पहले से ही इस मामले में जेल में कैद हैं। केजरीवाल को 21 मार्च को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था और वह 10 दिनों तक उसकी हिरासत में रहे। प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत खत्म होने के बाद उन्हें विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की अदालत में पेश किया गया। ईडी ने उनकी 15 दिन की न्यायिक हिरासत का अनुरोध करते हुए कहा कि उन्होंने 'बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया। अदालत ने ईडी की याचिका मंजूर कर ली थी।
सोमवार, 1 अप्रैल 2024
प्रधानमंत्री की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत डॉ. बिंदेश्वर पाठक
बसंत कुमार
पूरा समाज पद्म विभूषण डॉ. बिंदेश्वर पाठक की जयंती 2 अप्रैल को मना रहा है। लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं पर शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि उन्होंने अपने 5 दशक के अधिक समय के अथक प्रयास से समाज को स्कैवेंजर फ्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश में सिर पर मैला ढोने वाले लाखों लोगो को इस अमानवीय प्रथा से मुक्ति दिलाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देवालय से पहले शौचालय की पहल के प्रेरणास्रोत बने। देश के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हे महात्मा गांधी, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री के गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व थ्री इन वन की संज्ञा दी थी। सामाजिक समता का जूनुन उनमें कितना अधिक था कि अपनी मृत्यु से एक घंटा पूर्व 15 अगस्त 2023 को अपने सुलभ प्रांगण में झंडारोहण भगवती नाम की उस महिला से कराया जो वर्ष 2003 तक सिर पर मैला ढोती थी, उसी कार्यक्रम में उनकी तबियत खराब हुई और एक घंटे के अंदर ही वह सब को छोड़कर चले गए। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उस महापुरुष के जीवन के अंतिम कार्यक्रम में उनके साथ विशिष्ठ अतिथि के रूप में मंच साझा करने का अवसर मिला।
डॉ. पाठक को आधुनिक भारत में जहां प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रेरणास्रोत कहा जाता है वहीं उन्हें गांधी और आंबेडकर के विचारों का संवाहक माना जाता है। उन्होंने 1969 में युवा के रूप में बिहार में गांधी शताब्दी समिति के लिए काम करते समय अछूतों की बहाली के लिए काम करने का निर्णय लिया क्योंकि गांधी जी सदैव स्वच्छता की वकालत किया करते थे और हरिजनों विशेषकर मैला ढोने वाले के अधिकारों और उन्हें समाज में सम्मान दिलाने के हिमायती थे और ऐसे समाधान के लिए प्रयत्नशील थे जो घरों में सूखे शौचालयों का स्थान ले सकें।
डॉ. पाठक गांधी जी के उद्देश्य से प्रेरित थे और उनके स्वयं के अनुभवों से अपने मिशन की ओर अग्रसर होने का फैसला किया। वे एक तकनीक लेकर आये जो सूखे शौचालयों का विकल्प बन सकती थी जिसे टू पिट फोर सिस्टम कहा जाता है। उन्हें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि यह तकनीक अंततः भारत में अछूतों के समुदाय के द्वारा बाल्टी शौचालय की समस्या को समाप्त कर देगी। उनके विचार में यह मात्र समाधान नहीं था अपितु रूढ़िबधिता व अमानवीय शोषण में कैद समाज को आजाद कराना था जिससे सिर पर मैला ढोने वाले समाज की गरिमा को ऊपर उठाया जा सके।
उन्होंने सिर पर मैला ढोने वालों को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का संकल्प लिया और अपने इस उद्देश्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने दो गड्ढो वाले पोर फ्लश शौचालय की स्थायी तकनीक का अविष्कार किया जिसने बाल्टी शौचालयों की जगह ली जो समाज को स्कैवेंजर बना सकी और 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक जहां महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वच्छता और समाज को स्कैवेंजर मुक्त बनाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के मिशन के अनुरूप समाज में अछूतों की स्थिति सुधारने और उनके मानवधिकारों के लिए भी कृतसंकल्प रहे। वे भेदभावपूर्ण उन सामाजिक संरचनाओं को बदलने के लिए दृढ़ संकल्प थे जो मैला ढोने वालों को मंदिरों में प्रवेश को रोकते थे। वर्ष 1988 में प्रसिद्धनाथ द्वारा मन्दिर में अछूतों के साथ उनके संस्कार और अनुष्ठान हेतु मन्दिर पहुंचे जहां ब्राह्मणों द्वारा उन्हें रोक दिया गया पर डॉ. पाठक ने टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय गांधी के सुझाए अनुनय विनय का रास्ता अख्तियार किया और पुजारियों को अपने अछूत साथियों के साथ मन्दिर में प्रवेश के लिए राजी कर लिया। इस सफलता पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने टिप्पणी की कि जब तक ये चीजे हासिल नहीं की जाती है तब तक भारत को विकास की राह पर नहीं कहा जा सकता है। वर्ष 1991 मे टू पोर फ्लश शौचालय विकसित करके पर्यावरण प्रदूषण रोकने के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और मोदी सरकार ने इस वर्ष उनके अनोखे योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उन्होंने मैला ढोने वालो को समर्थन व प्रेरणा दी जिससे उन्हें सामाजिक गतिशीलता के पथ पर ले जाया जा सके और उन्होंने राजस्थान के टोंक शहर में पूर्व में मैला ढोने वालो का पुनर्वास किया।
उन्होंने सुलभ के माध्यम से उनके लिए ब्यूटिशियन, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, कढ़ाई के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिलवाया और उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए पाठ्यक्रम प्रारंभ किये, इन कारकों ने उन्हे बड़े पैमाने पर उनके आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान किया। उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और उन्हे सम्मान के साथ जीने में सहायता प्रदान की। इसके अलावा डॉ. पाठक ने नई दिल्ली में सुलभ काम्पलेक्स में पूर्व में मैला ढोने वालों के आश्रितों के लिए 12वीं कक्षा तक स्कूल और एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया। उनका यह कार्य डॉ. भीमराव आंबेडकर के वंचितों के सशक्तिकरण मिशन के अनुरूप है। उनकी संस्था सुलभ को अंतर्राष्ट्रीय गौरव उस समय प्राप्त हुआ जब संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद द्वारा सुलभ इंटरनेशनल को विशेष सलाहकार का दर्जा प्रदान किया गया।
डॉ. पाठक जहां गांधी जी के अस्पश्यृता उन्मूलन से प्रभावित थे वहीं दूसरी ओर डॉ. आंबेडकर के आर्थिक विकास के मंत्र से दलितों और वंचितों को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने को उत्सुक थे। उन्होंने अस्पश्यृता जैसी कुरीति में बदलाव लाकर इसे विकास का माध्यम बना दिया। उन्होंने सुलभ शौचालय के अपशिष्ट से बिना दुर्गंध वाली बायोगैस का निर्माण किया, इस तकनीक का उपयोग करके भारत समेत अनेक विकासशील देश ऊर्जा के साथ साथ कंपोष्ट खाद के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। इसी कारण उन्हे आजाद भारत के गांधी के सामाजिक सुधार और डॉ. आंबेडकर के आर्थिक सुधार और महिला सशक्तिकरण के ध्वज वाहक की संज्ञा दी जाती हैं।
वर्ष 2012 में सर्वाेच्च न्यायालय ने वृंदावन में रह रही विधवाओं की दयनीय स्थिति पर बड़ी तल्ख टिप्पणी की थी और इनके पुनर्जीवन का उत्तरदायित्व सुलभ इंटरनेशनल को दिया था। अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए डॉ. पाठक ने अनूठी पहल की और इन्हें गुजारे के लिए 2000 रुपए प्रतिमाह पेंशन की शुरुआत की और सदियों पुरानी रुढिवादी परंपरा से हटकर अनूठे अंदाज में होली मनाने के लिए प्रेरित किया और होली के पावन अवसर पर इन विधवाओ को राधा की सहचरी बन कर श्याम से होली खेलने के लिए प्रेरित किया।
वास्तव में डॉ. पाठक ऐसे योद्धा थे जो मैला ढोने वाली महिलाओं के उत्थान से लेकर वृन्दावन की विधवाओं के कल्याण की जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार करते थे। वे गाँधी जी और डॉ. आंबेडकर के विचारों के सच्चे ध्वज वाहक थे और उनकी सोच से प्रेरणा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी आधुनिक सोच से स्वच्छ भारत मिशन को मूर्त रूप दिया।
गुरुवार, 28 मार्च 2024
संघ की प्रतिनिधि सभा : जन भावना को समझ कर काम करने से हो रहा विस्तार
अवधेश कुमार
नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा के दौरान संपूर्ण भारत और भारत में अभिरुचि रखने वाले विश्व भर के मीडिया का एकत्रीकरण था। सामने लोकसभा चुनाव के कारण ऐसा लग रहा था कि वहां से इसके संबंध में कुछ रणनीति ऐसी बनेगी, ऐसा वक्तव्य आएगा जो समाचार , बहस और विचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे। लंबे अनुभव के बावजूद पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की अवधारणा बदली नहीं है कि चुनाव या राजनीतिक दल या सरकार को फोकस करके संघ के आयोजन होते नहीं। यह संभव नहीं कि चुनाव हो और इसमें संघ की अभिरुचि नहीं हो या उसमें उनकी कोई भूमिका हो ही नहीं। यह भूमिका किस रूप में हो सकती है ? इस बारे में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का वक्तव्य ध्यान देने योग्य है- चुनाव देश के लोकतंत्र का महापर्व है। देश में लोकतंत्र और एकता को अधिक मजबूत करना और प्रगति की गति को बनाए रखना आवश्यक है। संघ के स्वयंसेवक सौ प्रतिशत मतदान के लिए समाज में जन-जागरण करेंगे। समाज में इसके संदर्भ में कोई भी वैमनस्य, अलगाव, बिखराव या एकता के विपरीत कोई बात न हो, इसके प्रति समाज जागृत रहे।
राजनीति और चुनाव को सर्वोपरि मान लेने वाले इस माहौल में सहसा विश्वास करना कठिन है कि देश का सबसे बड़े स्वयंसेवकों का संगठन केवल मतदाता जागरूकता या समाज में सौमन्स्य आदि की दृष्टि से ही चुनाव के दौरान काम करेगा। यह पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की जिम्मेवारी है कि वे देखें कि ऐसा होता है या नहीं? ऐसे सभी संगठनों की जो सीधे दलीय चुनावी राजनीति में शामिल नहीं है, यही यथेष्ट भूमिका हो सकती है। मतदान में किसी दल या उम्मीदवार को अवश्य सहयोग करिए, लेकिन संगठन के रूप में चुनावी भूमिका नहीं होनी चाहिए। आप मतदाताओं के बीच जाएं, उन्हें मुद्दों के प्रति जागरूक करें , मतदान के लिए प्रेरित करें तथा इस बीच राजनीतिक दलों के परस्पर आक्रामक तीखे बयानों, आरोपों तथा समाज के अंदर मतदान के लिए वैमनस्य फैलाने वाले या तनाव और हिंसा पैदा करने वालों के असर को कम करने की कोशिश करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को अगर समाज में एक संगठन की जगह समाज का संगठन मानता है तो उसके लिए कोई राजनीतिक दल दुश्मन नहीं हो सकता। हां, राजनीतिक दलों की नीतियां उसके विरुद्ध हैं, यानी उसके अनुसार देश हित में नहीं है तो तात्कालिक विरोध किया जा सकता है।
प्रतिनिधि सभा ऐसी बैठक होती है जिसमें संघ के सभी शीर्ष पदाधिकारी, प्रांत स्तर के पदाधिकारी और 36 अनुषांगिक संगठनों के प्रमुख या प्रतिनिधि उपस्थित होते हैं। इस नाते 1500 वैसे प्रमुख प्रतिनिधियों की एक जगह उपस्थिति, विमर्श और निर्णय अत्यंत महत्व के होंगे। इसमें सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का पुनर्निर्वाचन हुआ और वे अगले 3 वर्ष यानी 2027 तक पद पर रहेंगे। संघ पर निष्पक्षता से अध्ययन करने वाले इसका खंडन करते हैं कि यहां चुनाव होता ही नहीं। चुनाव नियमित होते हैं किंतु ज्यादातर अन्य संगठनों या राजनीतिक दलों की तरह पदों की होड़ न होने के कारण नकारात्मक प्रतिस्पर्धा नहीं होती। प्रतिनिधि सभा से घोषित कार्यक्रमों में अहिल्याबाई होल्कर के जन्म के 300 वर्ष को मई, 2024 से अप्रैल 2025 तक मनाया जाना है। कितने राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती के महत्व का आभास है? कौन राष्ट्रीय संगठन समाज विशेषकर महिलाओं को प्रेरणा देने की दृष्टि से इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करेगा? इसके अलावा जो विषय वहां चर्चा में थे उनमें संघ के स्वयंसेवकों द्वारा वर्ष में किए गए मुख्य कार्य,श्रीराम मंदिर निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का राष्ट्रीय जागरण की दृष्टि से प्रभाव, संदेशखाली की भयावाहक घटना और मणिपुर, पंजाब आदि शामिल थे। अगर दत्तात्रेय होसबोले कहते हैं कि स्वतंत्र भारत में संदेशखाली जैसी घटनाएं लोगों को झकझोर देने वाली हैं, दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा इसमें सभी दलों को अपनी राजनीतिक स्वार्थों को छोड़कर महिला सुरक्षा और समाज के इस विषय पर एक मत से ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए कि भविष्य में ऐसा करने को कोई सोच नहीं सके तो इससे कौन असहमत हो सकता है? स्वतंत्रता, समानता और समता पर आधारित समाज के लक्ष्य रखने वाले हर संगठन और व्यक्ति को संदेशखाली चिंतित करने वाला होना चाहिए। दुर्भाग्य से राजनीतिक, बौद्धिक एवं आंदोलनात्मक एक्टिविस्टों की दुनिया में इतना तीखा विभाजन है कि यह सोचकर कहीं भाजपा को इसका चुनावी लाभ न मिल जाए अनेक दल, संगठन, बुद्धिजीवी और पत्रकार इसे बड़ा मुद्दा बनाने से बचते हैं। यह शर्मनाक है। ऐसे लोग संघ पर कोई टिप्पणी करेंगे तो समाज उसे स्वीकार नहीं कर सकता।
स्वाभाविक है कि 2025 की विजयदशमी को संघ का 100 वर्ष पूरा हो रहा है तो उसकी चर्चा होगी और उसके अनुसार योजनाएं बनेंगी। हालांकि संघ यही कह रहा है कि उसे जब तक यह संसार है तब तक काम करते रहना है, उसमें अनेक 100 वर्ष आएंगे। तो 100 वर्ष का कोई ऐसा विशेष महत्व नहीं है किंतु उसका ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा शाखा और संपर्क विस्तार हो यही लक्ष्य सामने आ रहा है और उसी की पुष्टि प्रतिनिधि सभा में भी हुई। संघ द्वारा दिए आंकड़ों के अनुसार 2023 के 68,651 शाखाओं के मुकाबले संघ की शाखाओं की संख्या बढ़कर 73,117 पर पहुंच गई। जिन स्थानों पर शाखा लगती है, उनकी संख्या 42,613 से बढ़कर 45,600 हो गई। प्रतिनिधि सभा में तय हुआ कि, वर्ष 2025 की विजयादशमी से पूर्ण नगर, पूर्ण मंडल तथा पूर्ण खण्डों में दैनिक शाखा तथा साप्ताहिक मिलन का लक्ष्य पूरा होगा। शाखाओं की संख्या 1 लाख करने का लक्ष्य है। श्रीराममंदिर के उद्घाटन समारोह से पहले अयोध्या से लाए गए पूजित अक्षत को घरों में बांटने के दौरान संघ एवं समवैचारिक संगठनों के 44 लाख 98 हजार कार्यकर्ता 5 लाख 98,778 गांवों तक पहुंचे थे। 19 करोड़ 38 लाख परिवारों तक अक्षत पहुंचाया गया और 22 जनवरी को पांच लाख 60 हजार स्थानों पर 9.85 लाख कार्यक्रम हुए। अन्य अनेक संगठनों की समस्या है कि भारत के जनमानस को न समझने के कारण उचित भूमिका नहीं निभाते या विपरीत चले जाते हैं। दूसरी ओर संघ उसे समझ कर उसके अनुसार भूमिका निभाती है और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की कोशिश करता है। आप संदेशखाली को इसलिए महत्व नहीं देंगे कि इससे भाजपा को लाभ हो जाएगा तो जनमानस, जो उनकी आवाज उठाएगा उसके साथ जाएगा। श्रीराम मंदिर का उदाहरण लीजिए। राम मंदिर के निर्माण के लिए चंदा एकत्रित करने के लिए संघ के कार्यकर्ता 10 करोड़ से अधिक घरों में पहुंचे थे। प्राण प्रतिष्ठा से संबंधित कार्यक्रमों में 27.81 करोड़ लोगों की हिस्सेदारी का आंकड़ा दिया गया है। जरा सोचिए विरोधियों को कल्पना थी कि प्राण प्रतिष्ठा उत्सव के लिए संघ अपने संपूर्ण परिवार के साथ इतना व्यापक अभियान चला रहा है? संघ ने अयोध्या आंदोलन को सामान्य मंदिर निर्माण का नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण के आंदोलन के रूप में लिया और इसके लिए समाज के सभी वर्गों के साथ संपर्क और उनका मंदिर से किसी न किसी रूप में जोड़ने के लिए हरसंभव प्रयत्न किया। प्रतिनिधि सभा में श्रीराम मंदिर राष्ट्रीय पुनरुत्थान की ओर नामक शीर्षक से पारित प्रस्ताव को देखने के बाद आभास हो जाता है कि संघ नेतृत्व ने पहले तथा वर्तमान एवं भविष्य की दृष्टि से फोकस कर दूरगामी दृष्टि से योजनाएं बनाई हुई है। उसी का परिणाम है कि अभी तक श्रीराम मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ बनी हुई है।
वास्तव में श्री राम मंदिर भारत के मानस और व्यवहार में परिवर्तन का स्वतंत्रता के बाद अभी तक का सबसे बड़ा कारक बन रहा है।श्रजिन लोगों तक श्रराम मंदिर के चंदे के लिए या पूजित अक्षत आदि को लेकर स्वयंसेवक -कार्यकर्ता गए उनमें विरोधियों या तटस्थ लोगों की बड़ी संख्या होगी, किंतु उन तक भी पहुंचने का यह श्रेष्ठ माध्यम था, क्योंकि भारतीय समाज में श्रीराम का विरोध नहीं तथा अयोध्या में ध्वस्त किए गए स्थान पर मंदिर बनना चाहिए यह भावना सामूहिक रही है। यह विरोधियों के लिए भी ठहरकर अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करने का समय है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208
मंगलवार, 26 मार्च 2024
मैं हुआ रिटायर
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