शनिवार, 16 मार्च 2024
जहां अंधेरा वहां उजाला कार्यक्रम के अंतर्गत 28 पोलों पर विधायक अनिल वाजपेयी ने लगवाई स्ट्रीट लाइटें
शुक्रवार, 15 मार्च 2024
जामिया ने किया सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर ग्लोबल कॉन्क्लेव का आयोजन
मैं हूं मोदी का परिवार नारा विपक्ष के लिए पड़ सकता है भारी
अवधेश कुमार
मैं हूं मोदी का परिवार टैगलाइन 2024 के चुनाव का एक प्रमुख नारा बन गया है। यह वैसे ही है जैसे 2019 लोकसभा चुनाव में में मैं हूं चौकीदार एक बड़ा नारा बना और सर्वे बताते हैं कि उसका असर लोकसभा चुनाव पर हुआ। आम धारणा यही है कि मैं हूं मोदी का परिवार 2024 लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मतदान करने की प्रक्रिया निर्धारित करने का एक कारक बन सकता है। 3 मार्च को बिहार की राजधानी पटना में गठबंधन की रैली में लालू प्रसाद यादव जी ने कल्पना नहीं की होगी कि वह जो कुछ बोल रहे हैं उसकी ऐसी प्रतिक्रिया हो सकती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परिवारवाद पर हमला करने का अपने तरीके से जवाब ही दिया था। उसमें यह पूछने की क्या आवश्यकता थी कि मोदी बताएं कि उनका कोई परिवार क्यों नहीं है ,संतान क्यों नहीं है? वह यहां तक चले गए कि कह दिया कि नरेंद्र मोदी हिंदू भी नहीं है। माता-पिता की मृत्यु पर उनके बच्चे अपने बाल दाढ़ी सब साफ करवाते हैं जबकि उन्होंने नहीं किया। ऐसे हमले पर प्रतिहमला बिलकुल स्वाभाविक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे हमले का आक्रामक और लोगों के दिलों को स्पर्श करने वाली भाषा शैली में प्रत्युत्तर देने में प्रवीण है। इसलिए उन्होंने कहा कि आज इंडी गठबंधन के लोग, जो परिवारवाद, भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, वह मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछते हैं, 140 करोड़ भारतीय ही मेरा परिवार है। इस तरह भाजपा के पास विरोधियों विशेषकर आईएनडीआईए गठबंधन के विरुद्ध एक बड़ा मुद्दा हो गया है।
2019 आम चुनाव के पहले से राहुल गांधी राफेल विमान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी तरह निशाने पर ले रहे थे। उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा लगाया था। चौकीदार चोर है के समानांतर प्रधानमंत्री ने मैं भी चौकीदार का नारा दिया और देखते-देखते भाजपा नेताओं कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने सोशल मीडिया पर मैं भी चौकीदार में अपना परिचय लिख दिया। राहुल गांधी और पूरे विपक्ष के लिए यह उल्टा पड़ गया। प्रश्न है कि क्या मैं हूं मोदी का परिवार नारा भी विपक्ष के लिए फिर उल्टा पड़ जाएगा?
यह ऐसा भावनात्मक विषय है जो लोगों के दिलों पर सीधा असर डालता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब कहते हैं कि हमने देश के लिए अपना जीवन लगाया है और अंतिम सांस तक देश हित में लगा दूंगा तो एक बड़ा समूह इसे स्वीकार करता है।
अगर चुनाव को कुछ समय के लिए परे रख दें तब भी यह विचार करना चाहिए कि क्या किसी व्यक्ति पर इस तरह की टिप्पणी उचित है? हमारे देश में अविवाहित रहकर यानी परिवार न बसा कर या परिवार का त्याग कर देश, समाज, धर्म की सेवा या आत्म साधना में जीवन लगाने वालों की बड़ी संख्या है। राजनीति में सभी विचारधाराओं में ऐसे लोग रहे हैं जिनका सम्मान समाज में हमेशा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार इस मामले में इसलिए शीर्ष पर हैं क्योंकि वहां जीवनदानी प्रचारकों की सबसे ज्यादा संख्या है और भाजपा सहित सभी संगठनों में ऐसे लोग हैं। समाजवादियों में भी ऐसे लोग रहे हैं। समाजवादी नेताओं ने भी अपने जीवन काल में वंशवाद और परिवारवाद को बड़ा मुद्दा बनाया, पर प्रत्युत्तर में इस तरह उनके परिवार न होने पर किसी ने प्रश्न नहीं उठाया। उठाया भी नहीं जाना चाहिए।
नरेंद्र मोदी आज प्रधानमंत्री हैं तो लगता है कि उनके पास सारे सुख साधन हैं और इसलिए हमला करने पर लोग प्रभावित हो जाएंगे। उन्होंने जब परिवार से परे होकर संघ का प्रचारक बनकर अपनी विचारधारा के अनुरूप राष्ट्र सेवा का व्रत लिया होगा तो इसकी कल्पना नहीं रही होगी की राजनीति में किसी समय में शीर्ष पर जा सकते हैं। उस समय जनसंघ या बाद में भाजपा की हैसियत इतनी बड़ी नहीं थी और जितनी थी उनमें बड़े कद के नेताओं की भी इतनी लंबी कतार थी कि देश एवं अनेक राज्यों की सत्ता में आने पर शीर्ष नेता होने का सपना संजोए जाए। सैंकड़ों की संख्या में ऐसे जीवन दानी संघ परिवार के साथ-साथ अनेक गैर राजनीतिक राजनीतिक संगठनों में लोग पहले भी थे और आज भी हैं। या देश का दुर्भाग्य है कि हम राजनीतिक तू तू मैं मैं इस विषय को घसीटते हैं। वह भी इसलिए क्योंकि नेताओं के द्वारा अपने परिवार के लोगों को राजनीति में शीर्ष पर स्थापित करने, बनाए रखने और आगे बढ़ाने के अपकर्म पर प्रश्न उठाया जा रहा।
वास्तव में आज पार्टियों में एक ही परिवार से निकले हुए लोगों के हाथों नेतृत्व और निर्णय की मुख्य कमान रहने राजनीति का सबसे बड़ा रोग बना हुआ है। इसके कारण योग्य, ईमानदार, सक्षम और समर्पित लोगों का उनकी क्षमता के अनुसार राजनीति में अवसर मिलना बाधित है। व्यवस्था में ऐसे लोग भी परिवारवादी नेतृत्व के समक्ष नतमस्तक होकर हां में हां मिलाने और अपने को उनके साथ एडजस्ट करने को विवश हैं। ज्यादातर परिवारवादी नेतृत्व ने सत्ता का हर स्तर पर दुरुपयोग किया है। देख लीजिए इनमें ज्यादातर के परिवार या वे स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। लालू प्रसाद यादव को तो चारा घोटाले के तीन मामलों में सजा भी मिल चुकी है।
किसी राजनीतिक परिवार से अगली पीढ़ी का राजनीति में सक्रिय होना और परिवार के हाथों ही नेतृत्व सिमटे रहने में मूलभूत अंतर है। परिवारवादी नेतृत्व वालों पर हमला होगा या उनकी आलोचना होगी तो निश्चित रूप से वे तिलमिलाएंगे। इसका उत्तर यह नहीं हो सकता जो लालू प्रसाद यादव जी ने दिया है। यह राजनीतिक विरोधियों की आलोचना आलोचना के संदर्भ में स्थापित मर्यादाओं का दुर्भाग्यपूर्ण अतिक्रमण है। हालांकि लालू यादव के वक्तव्य का सही अर्थ समझना भी कठिन है। वे कहते हैं कि जिनके ज्यादा बच्चे हैं उन पर वह प्रश्न उठते हैं और कहते हैं कि परिवारवाद को बढ़ावा दे रहा है तो वह बताएं कि उनके परिवार क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तरीके से बता दिया कि उनका परिवार क्यों नहीं है। उनके पार्टी और समर्थकों ने बता दिया कि उनका एक बड़ा परिवार है। लगातार वह बोल रहे हैं कि देश ही मेरा परिवार है और जिसका कोई नहीं है उसका मैं हूं और वह मेरा है। इसका लालू प्रसाद यादव और उनके समर्थकों के पास क्या उत्तर हो सकता है? जो उत्तर वह देंगे या दे रहे हैं क्या वह लोगों के अंतर्मन को वाकई छु पाएगा? कतई नहीं।
सच यही है कि परिवारवादी नेतृत्व या परिवार के कारण योग्य अक्षम लोगों का राजनीति में प्रभावी होने जैसी दुष्प्रवृत्ति का कोई सकारात्मक उत्तर दिया ही नहीं जा सकता है। जिस मंच पर लालू जी ने प्रधानमंत्री पर हमला किया उसी से उन्होंने अपनी बेटी रोहिणी आचार्य को राजनीति में लॉन्च भी किया। लालू जी का नरेंद्र मोदी पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण व दुखद है। लोकसभा चुनाव में यह उल्टा पड़ जाए तो उसमें किसी को आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। भाजपा के पास आज भी अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की लंबी फौज है जो कहीं न कहीं अपने इर्द-गिर्द भाजपा सहित अलग-अलग संगठनों में जीवनदानी परिवारविहीन लोगों को काम करते देखते हैं और उनके प्रति सम्मान रखते हैं। वे लोग इस तरह के हमले को आसानी से सहन नहीं कर सकते। तो यह मोदी के साथ-साथ लाखों लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाने जैसा है जिसकी प्रतिक्रिया जगह-जगह दिखाई देनी स्वाभाविक है।
आज किसी भी पार्टी की यह हैसियत नहीं की इतनी बड़ी संख्या के प्रति हमले का समान रूप से सामना कर सके। जिस तरह 2019 में जगह-जगह भाजपा के नेता , समर्थक और कार्यकर्ता मैं हूं चौकीदार का नारा लगाते थे और आम लोग भी उनके साथ आ जाते थे ठीक वही दृश्य इस चुनाव में आने वाले समय में दिखाई पड़ेगा। कार्यकर्ता लोगों के बीच जाएंगे और कहेंगे कि देखिए मोदी जी ने तो देश के लिए अपना जीवन लगा दिया, अपने लिए या अपने रिश्तेदारों के लिए कुछ किया नहीं और लालू प्रसाद यादव तथा आईएनडीआईए गठबंधन के नेता उनके उनको बिना परिवार का बताकर हमला कर रहे हैं तो लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092
गुरुवार, 14 मार्च 2024
नागरिकता संसोधन अधिनियम (सीएए) डॉ. अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास
बसंत कुमार अभी केंद्र सरकार ने सीएए का नोटिफिकेशन जारी किया है और कांग्रेस सहित विपक्षी दल इसे चुनावी स्टंट कह रहे है पर यह डा अंबेडकर के सपनो को मूर्त रूप देने का प्रयास है, जैसा सभी जानते है कि जब देश का धार्मिक आधार पर बटवारा हुआ तो डा अंबेडकर पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण की बात करते रहे पर नेहरू और गाँधी के मुस्लिम प्रेम ने डा आंबेडकर के इस सपने को पूरा नही होने दिया। परंतु उसके 75-76 साल बाद प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी ने डा आंबेडकर के पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण के मूल सुझाव को समझते हुए नागरिकता संसोधन (सीएए) के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्प संख्यक समुदाय (हिंदू) को भारत मे नागरिकता देने का प्रावधान किया तो मुस्लिम वोट बैंक के खातिर सभी विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे है। विभाजन की स्थिति में जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण के लिए डा आंबेडकर ने एक विस्तृत कार्ययोजना बनायी थी, जो उन्होंने अपनी पुस्तक' पाकिस्तान ऐंड पार्टिसन ऑफ इंडिया' के माध्यम से से वर्ष 1940 मे ही सबके सामने रख दी थी। डॉ. आंबेडकर की योजना थी कि आटोमन सम्राज्य के पश्चात जिस प्रकार से ग्रीक, टर्की और बुल्गारिया के बीच जनसंख्या का स्थानांतरण हुआ, ठीक उसी प्रकार से यह भारत में भी हो सकता था। उन्होंने अपनी योजना मे सम्पति, पेंसन आदि के अधिकारों की अदला बदली की कार्ययोजना भी सामने रखी थी जिसे कांग्रेस ने असंभव कहकर ठुकरा दी, क्योंकि कांग्रेस के नेता हिंदू मुस्लिम गठजोड़ की झूठी कल्पनाओ मे भटक रहे थे। डा आंबेडकर ने एक साफ- सुथरे एवम स्थायी समझौते का स्वरूप सामने रखा पर महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू ने दिवस्वप्न जैसी सुंदर दिखने वाले हिंदू मुस्लिम एकता को छोड़ने से मना कर दिया साथ ही साथ भारत विभाजन के द्वीराष्ट्र के सिद्धांत को पूरी तरह से स्वीकारने के पश्चात् जनसंख्या के पूरी तरह से स्थानांतरण के सिद्धांत को डॉ. आंबेडकर ने यह बता दिया था कि बगैर जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण के पाकिस्तान बनने पर हिंदू (दलित) पाकिस्तान मे घिर जायेंगे इसलिए विभाजन से पूर्व इन्हे सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था होनी चाहिए, तमाम प्रयासो के बावजूद डा आंबेडकर की योजना व प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया और 1947 के बटवारे के पश्चात पाकिस्तान के अंदर बड़ी संख्या मे अनुसूचित जातियों के अलावा अन्य हिंदू आबादी वहा पर रुक गयी, लेकिन कुछ दिन बाद ही हिंदू मुस्लिम एकता का चेहरा सामने आने लगा, हिंदुओ को धर्म परिवर्तन कराकर मुस्लिम बनाने व उनके साथ मारपीट करने से उनका जीवन दूभर हो गया, देश विभाजन के समय जनसंख्या की पूर्ण अदला बदली न होने से आधे से अधिक मुसलमान भारत में रुक गए जिनकी संख्या बढ़कर 18 करोड़ से उपर हो गयी है और वही पाकिस्तान मे रहने वाले हिंदुओ की संख्या एक करोड़ से घटकर महज चंद हजार रह गयी है। डॉ. आंबेडकर ने यह सुझाव दिया था कि जनसंख्या के इस स्थानांतरण के लिए एक आयोग का गठन हो जो लोगो की चल अचल संपत्ति, पेंसन नौकरी आदि कि विस्तृत जानकारी तैयार करके लोगो को स्थानांतरित करने मे सहयोग करेगा। उनका मानना था कि जनसंख्या की पूर्ण अदला बदली ही हिंदुस्तान को एक राज्य बना सकती हैं और जब तक यह नही किया जाता तब तक देश मे अल्प संख्यक और बहु संख्यक का कोई समाधान नही निकलेगा, पाकिस्तान मे अल्पसंखक हिंदू हिकारत की जिंदगी जीते रहेंगे और भारत में गरीब मुस्लिम-दलित मुसलमान अलायंस के बल पर सत्ता मे वापसी का सपना देख रहे लोगो द्वारा भ्रमित किये जाते रहेंगे पर दुर्भग्यवश उस समय गाँधी, नेहरू और अन्य कांग्रसी नेताओ ने डॉ. आंबेडकर की बात नहीं मानी और धर्म निरपेक्षता के नाम पर विभाजन के समय लाखों लोगो का नर संहार देखते रहे। आजादी के सात दशक बाद जब पाकिस्तान मे प्रताड़ित अल्प संख्यक हिंदुओ को सम्मान का जीवन देने के लिए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी द्वारा एक सकरात्मक पहल शुरू की गयी तो बमपंथियो और कांग्रेस के लोगो ने जगह जगह विरोध शुरू कर दिया तथा सीएए की अधिसूचना के खिलाफ जामिया यूनिवर्सीटी और जे एन यू मे भ्रमित युवको द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। जामिया के गेट पर लेफ्ट संगठन आइसा, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एस एफ आई), स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गजेसन ऑफ इंडिया (एस ओ आई) समेत कई संगठन इसका विरोध कर रहे हैं वही दूसरी ओर पाकिस्तान और अफगनिस्तान से आये शरणार्थियों ने सी ए ए लागू होने पर खुशी से होली मनाई और अब ये कह रहे है हम अब गर्व से कह सकते है कि हम भी इस महान देश के वासी है अब इनके बच्चे स्कूल भी जा सकेंगे और आम हिंदुस्तानी की तरह जीवन जी सकेंगे और डा आंबेडकर के इस सपने को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदीजी द्वारा मूर्त रूप देना सचमुच स्वागत योग्य है। (लेखक राष्ट्रवादी चिंतक और लेखक हैं।)
बुधवार, 13 मार्च 2024
सी.ए.ए. को एक स्वतंत्र अधिनियम के रूप में देखा जाना चाहिए
अल्ताफ मीर
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) एक बार फिर चर्चा में है। यह अधिनियम संसद द्वारा दिसंबर 2019 में पारित किया गया था। सीएए का उद्देश्य पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करना है। इसका उद्देश्य उन्हें दुनिया के एकमात्र हिंदू देश में एक सुरक्षित आश्रय देना है, जो दुनिया भर में हिंदू अधिकारों की रक्षा के लिए भारत के नैतिक दायित्व को दर्शाता है।
अतीत में, सीएएए ने इसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रर (एनआरसी) से जोड़ने के बाद विवाद खड़ा कर दिया था। एनआरसी का उद्देश्य सभी भारतीय नागरिकों की पहचान कर उनके विवरण को सत्यापित करना है ताकि उनकी कानूनी स्थिति का पता लगाया जा सके और अवैध अप्रवासयिों को बाहर किया जा सके। यह अनिवार्य रूप से भारतीय नागरिकता का दावा करने के लिए दस्तावेजी प्रमाण प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है। हालाँकि, सीएए को एक स्वतंत्र अधिनियम के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि यह किसी भी समूह विशेषकर मुसलिमों की नागरिकता की स्थिति को खतरे में नहीं डालता है। जल्दबाजी किए बिना, मुसलमानों को यह स्वीकार करना चाहिए कि सीएए के कार्यान्वयन से उन्हें कोई खतरा नहीं होगा, भले ही वे इसके दायरे में न आए हों। वास्तव में, इसका एक मजबूत कारण यह भी है कि यदि मुसलमानों को इस कानून के तहत शामिल किया जाता है, तो संभावना है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अन्य जगहों के मुसलमान भारतीय नागरिकता प्राप्त करेंगे। आर्थिक ठहराव और राजनीतिक तिरस्कार के कारण पाकिस्तान में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है जिससे कई पाकिस्तानी असुरक्षा के कारण भारत के नागरिक बनने की इच्छा रखते हैं। यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि सीएए हिंदुओं और सिखों, जैनों और बौद्धों जैसे अन्य अल्पसंख्यकों के लिए केवल भारत का विकल्प खुला रखता है। यह तर्क इस धारणा पर आधारित है कि दुनिया भर में मुसलमानों के पास हिंदुओं की तुलना में अधिक राज्य हैं, जो उन्हें अपने नागरिकों में शामिल कर सकते हैं।
यह कहने के बाद कि यदि दे देश के मुसलमानों से संबंधित अधिनियम के साथ कोई मुद्दा है, तो वे कानूनी सहारा लेने के लिए स्वतंत्र हैं, जैसा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं से स्पष्ट है। हालाँकि, उन्हें इस विरोध संस्कृति की एक श्रृंखला में नहीं पड़ना चाहिए। इस मुद्दे पर मीडिया के अति-संवेदनात्मकता ने अधिनियम को एक सांप्रदायिक मामले में विनियोजित करके, मुसलमानों और हिंदुओं के बीच सामाजिक अंतर को चौड़ा करने में विभाजनकारी भूमिका निभाई है। सीएए मुख्य रूप से मुसलमानों सहित स्थापित समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाले कानूनों और विनियमों को नजरअंदाज किए बिना उत्पीड़ित व्यक्तियों के समावेश और आश्रय पर जोर देता है। जब तक संविधान मुसलमानों को विशेषाधिकार प्राप्त नागरिकों के रूप में मान्यता देता है, कोई भी नया कानून उनके मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता है। इसलिए, मुसलमानों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से टकराव का सहारा न लें, जो उन्हें केवल अलगाव और अन्पता की ओर धकेल देगा। सरकार को इन कृत्यों से जुड़े डर को कम करने की दिशा में काम करना होगा और मुसलमानों को आश्वस्त करना होगा कि वे अपने ही देश में असुरक्षित या अतिसंवेदनशील नहीं हैं। यह दृष्टिकोण सद्भाव और आपसी समझ को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।
(लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली के पीएचडी स्कॉलर हैं)
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