गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

संदेशखाली का सच स्वीकार करें ममता

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली कांड ने पूरे देश को सन्न कर दिया है। जिस तरह की घटनाएं सामने आ रहीं हैं उन पर सहसा विश्वास करना कठिन है। आखिर किसी कानून के शासन वाले राज्य में ऐसा कैसे संभव है कि कोई , कुछ या कुछ लोगों का समूह जब चाहे जितनी संख्या में चाहे महिलाओं को बुला ले और उनका शोषण करें? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहतीं हैं कि संदेशखाली घटना के पीछे भाजपा का हाथ है। उन्होंने कहा कि संदेशखाली में सबसे पहले ईडी को भेजा गया। फिर ईडी की दोस्त भाजपा कुछ मीडियावालों के साथ संदेशखाली में घुसी और हंगामा करने लगी। ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस या सरकार के अन्य प्रवक्ता ऐसी घटना को नकारने की जितनी कोशिश करते हैं उतना ही सच सामने आ रहा है। राजनीतिक दलों के बयानों और मांगों को कुछ समय के लिए छोड़ दीजिए, टेलीविजन कैमरों पर जितनी संख्या में महिलाएं आकर आपबीती सुना रहीं हैं उनसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल दहल जाएगा। राजनीतिक दलों में भी केवल भाजपा आवाज उठाती या आंदोलन करती तो माना जाता कि शायद आरोपों में उतनी सच्चाई नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है। सारी वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस भी संदेशखाली पर एक ही स्वर में बात कर रहे हैं। राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने संदेशखाली में अशांत क्षेत्रों का दौरा कर  कहा कि मैंने जो देखा वह भयावह, स्तब्ध करने वाला और मेरी अंतरात्मा को हिला देने वाला था। उन्होंने कहा कि विश्वास करना कठिन है कि रविंद्र नाथ टैगोर की धरती पर ऐसा हुआ है। यह भी पहली बार होगा जब राज्यपाल ने राजभवन का नंबर जारी करते हुए कहा कि किसी महिला को डरने की आवश्यकता नहीं है और उन्हें समस्या है तो राजभवन में शरण ले सकती हैं। राज्यपाल ने स्थानीय महिलाओं से कहा कि चिंता मत कीजिए, आपको न्याय जरूर मिलेगा। 

यदि मामले की गंभीरता नहीं होती तो कोलकाता उच्च न्यायालय इसका स्वत: संज्ञान नहीं लेता। पहले उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अपूर्ब सिंह राय की एकल पीठ ने सुनवाई की और बाद में इसे दो सदस्यीय पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया। उच्च न्यायालय इनमें दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई कर रही है। पहले स्थानीय लोगों की जमीन हड़पने का है और दूसरा स्थानीय महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने का।

उच्च न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने के बाद उम्मीद करनी चाहिए कि मामले का सच सामने आएगा तथा दोषियों को उपयुक्त सजा मिलेगी। किंतु स्वयं ममता बनर्जी और उनके लोग जब तक यह मानने को तैयार नहीं होंगे कि स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे जघन्य और शर्मनाक घटना उनके राज्य में घटित हुई है तब तक सच होते हुए भी इसे साबित करना मुश्किल होगा। पुलिस प्रशासन का रवैया देखिए तो साफ हो जाएगा कि संदेशखाली कांड की सही तरीके से जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी करना सामान्य तौर पर संभव नहीं हो सकता। शाहजहां शेख इतने लंबे समय तक गिरफ्तार नहीं हुआ है तो क्यों? उच्च न्यायालय का दबाव नहीं होता तो शायद उसकी गिरफ्तारी नहीं होती। मामले के दो प्रमुख आरोपी शिबू हाजरा और उत्तम सरदार सहित 18  गिरफ्तार हो चुके थे।‌ हालांकि ये भीज्ञआसानी से गिरफ्तार नहीं हुए। महिलाओं के प्रदर्शन और बवंडर के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उत्तम सरदार को उत्तर 24 परगना जिला परिषद सदस्य और तृणमूल के अंचल अध्यक्ष के पद से 6 साल के लिए निलंबित कर दिया। उसके बाद ही पुलिस उसे गिरफ्तार करने का साहस कर सकी। लोग बता रहे हैं की तृणमूल कांग्रेस के लोग घर-घर जाकर देखते थे और जिस घर में सुंदर लड़कियां या महिलाएं होती उन्हें बुला लिया जाता था या उठाकर ले जाया जाता था। पार्टी कार्यालय में भी उनका यौन शोषण किया जाता था। शाहजहां शेख का आतंक इतना था कि कोई आवाज उठाने का साहस नहीं कर पाता था। 5 जनवरी को जब ईडी द्वारा राशन घोटाले से जुड़े मामले में शाहजहां शेख के संदेशखाली स्थित आवास पर छापेमारी के दौरान भारी संख्या में लोगों ने एड की टीम के साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवानों पर पर हमले कर दिए और शहर से लगभग 74 किमी दूर गांव से भागने तक मारपीट की। शाहजहां के फरार होने की खबर से लोगों का साहस बढ़ा और वे सड़कों पर उतरकर विरोध करने  लगे जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। वस्तुत: 5 जनवरी को हुए हमलों के 33 दिनों बाद 7 फरवरी को संदेशखाली में फिर से हंगामा हुआ।केंद्र द्वारा बंगाल को बकाया फंड से वंचित करने का आरोप लगाकर तृणमूल ने संदेशखाली के त्रिमोहानी बाजार में जनजाति समुदाय के एक वर्ग के साथ एक रैली निकाली थी। इसमें शेख शाहजहां के जयकारे लगाने के बाद ही हंगामा शुरू हुआ‌ और लोग तृणमूल के विरुद्ध नारे लगाने लगे। शाहजहां और उनके समर्थकों पर जमीन हड़पने तथा लंबे समय से महिलाओं के यौन उत्पीड़न सहित अनेक प्रकार की प्रताड़नाओं का आरोप लगाने लगे। आक्रोशित महिलाओं ने  शिबू हाजरा के खेत और पॉल्ट्री फॉर्म में आग भी लगा दी। लोग बता रहे हैं कि पॉल्ट्री फॉर्म गांव के लोगों की जमीन छीनकर अवैध तरीके से बनाया गया जहां अनेक तरह की अवैध गतिविधियां चलती थी। उसे क्षेत्र में जाने के बाद कोई भी व्यक्ति महसूस कर सकता है कि तृणमूल कांग्रेस, शाहजहां और उनके लोगों का किस तरह का आतंक और दबदबा रहा होगा। शाहजहां के घर पर गई ईडी की टीम और सशस्त्र पुलिस बल पर हुआ हमला इस बात का प्रमाण था कि वहां पुलिस और प्रशासन का नहीं शेख शाहजहां और उसके नेतृत्व में चलने वाले तृणमूल कांग्रेस के नाम पर खड़े किए गए साम्राज्य का शासन था। 

ममता बनर्जी ने विधानसभा में बोलते हुए इसमें भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घसीटा। ममता ने कहा कि संदेशखाली आरएसएस का गढ़ है। वहां पहले भी दंगे हुए थे। क्या आरएसएस में वहां शाहजहां शेख और तृणमूल के लोगों को सत्ताबल की बदौलत जमीन हड़पने और महिलाओं के वीभत्स यौन उत्पीड़न के लिए रास्ता तैयार किया?  वहां जाकर कोई भी देख सकता है कि 24 परगना का संदेशखाली ही नहीं आसपास बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाके में रहने वाले भारी आबादी होने के बावजूद अनुसूचित जनजाति के लोग किस तरह की स्थितियों का सामना कर रहे हैं। संदेशखाली एक दर्जन से ज्यादा उन विधानसभाओं की श्रेणी में है जो भारत-बांग्लादेश से लगा है जहां अवैध घुसपैठियों की संख्या हमेशा रही है और वे वहां के लिए समस्या भी रहे हैं। पहले वाम मोर्चा और उसके बाद तृणमूल सरकार ने इनके विरुद्ध कार्रवाई करने की बात तो दूर इन्हें पूरी तरह संरक्षण और पोषण दिया। क्षेत्र के अपराध का विश्लेषण करें तो उनमें गौ तस्करी से लेकर मादक पदार्थों और हथियारों के साथ मानव बिक्री के कारोबार शामिल हैं और इनमें एक समुदाय के लोग सबसे ज्यादा आरोपी और अभियुक्त हैं। यह बात सही है कि पिछले कुछ वर्षों में वहां के लोगों का आरएसएस की ओर आकर्षण बढ़ा है तो इसलिए कि सरकार उन्हें सुरक्षा देने में सफल नहीं रही। लेकिन आरएसएस के कार्यकर्ताओं को भी शाहजहां जैसे बाहुबलियों के उत्पीड़न और अपराध का सामना करना पड़ा है और पुलिस प्रशासन उनका सुरक्षा देने में विशाल रही है। सत्तारूढ़ घटक से जुड़े अपराधी और बाहुबली महिलाओं को जबरन उठाकर अपनी हवश का शिकार बनाते रहे हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार और उत्पीड़न की पहले भी अनेक घटनाएं सामने आई जिनमें ज्यादातर पुलिस में दर्ज नहीं हुई और आवाज उठाने के कारण आरएसएस के कार्यकर्ताओं को भी हमलों, हत्याओं और मुकदमों का शिकार होना पड़ा है। यह बात सही है कि 2007 में वहां भीषण दंगा हुआ था जिसमें सीमा सुरक्षा बल को बुलाना पड़ा था। उसमें भी ज्यादातर आरोपी एक ही समुदाय के थे जिनमें अवैध घुसपैठिए भी शामिल थे।

 जो सच स्थानीय लोगों को और निष्पक्षता से वहां जांच करने वालों को दिखाई देता है अगर सरकार और प्रशासन उसे स्वीकार नहीं करेंगे तो संदेशखाली जैसी घटनाएं लगातार होती रहेगी। पुलिस ने हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए डीआइजी स्तर की एक महिला अधिकारी के नेतृत्व में 10 सदस्यीय टीम का गठन किया है। किंतु  पुलिस कह रही है कि उसे केवल चार शिकायतें मिलीं जिनमें बलात्कार का आरोप है ही नहीं। इसके बाद पुलिस प्रशासन से कोई क्या उम्मीद कर सकता है। पुलिस की घेराबंदी के कारण संदेशखाली में किसी व्यक्ति के लिए प्रवेश कर पाना असंभव है। यहां तक कि राजनीतिक दलों के नेताओं को वहां जाने के लिए उच्च न्यायालय का सहारा लेना पड़ा है और वो भी सीमित क्षेत्र में जा पा रहे हैं। सरकार और प्रशासन अपनी खीझ पत्रकारों पर उतार रह है। एक पत्रकार को गिरफ्तार ही किया गया है। पुलिस के लिए इससे शर्मनाक क्या हो सकता है कि शाहजहां आज तक कानून के शिकंजे से बाहर है। उच्च न्यायालय ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या उसे संरक्षण मिल रहा है? अभी भी समय है ममता बनर्जी सरकार कानून के शासन कायम करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करें तथा उस क्षेत्र की स्थिति को स्वीकार कर अपराधियों और बाहुबलियों की पूरी सफाई के लिए अभियान चलाएं। चूंकि इसकी संभावना नहीं दिख रही, इसलिए यह लंबे जन संघर्ष का विषय हो चुका है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

भारतीय कृषि एवं खाद्य परिषद् की तीन दिवसीय कार्यशाला/प्रदर्शनी "उत्तर प्रदेश एग्रोटेक- 2024" का आज से शुभारंभ

लखनऊ। भारतीय कृषि एवं खाद्य परिषद अपनी सालाना कार्यशाला व प्रदर्शनी "एग्रोटेक 2024 डेवलपमेंट मीट ऑन उत्तर प्रदेश एग्रीकल्चर" का आयोजन एक मार्च से करने जा रहा है। प्रदर्शनी और कार्यशाला आयोजन भारतीय कृषि खाद्य परिषद, उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के सहयोग से आयोजित कर रहा है। कार्यक्रम के प्रायोजक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और सह प्रायोजक आईपीएल बायोलोजिकल्स लिमिटेड है।
उक्त प्रदर्शनी व कार्यशाला का शुभारंभ माननीय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) उद्यान श्री दिनेश प्रताप सिंह जी करेंगे। प्रदर्शनी शुभारंभ कार्यक्रम के दौरान राज्य सभा के सांसद श्री अशोक बाजपेयी जी, वरिष्ठ आईएएस व एडिशनल चीफ सेक्रेटरी कृषि विभाग डॉ देवेश चतुर्वेदी, नाबार्ड के सीजीएम श्री एस के डोरा, डॉ अनीस कुमार शर्मा डायरेक्टर टेक्निकल इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड भी प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे।
तीन दिवसीय कार्यक्रम के प्रथम चरण में प्रदर्शनी का शुभारंभ होने के साथ साथ विभिन्न सत्र का आयोजन भी होगा। जिसमे प्रदेश के आला अधिकारी सहित कृषि विशेषज्ञ शामिल रहेंगे और प्रतिभागियों से विषय सम्बंधित संवाद कर उनको कृषि नवाचार से अवगत कराएँगे। विभिन्न सत्रों में प्रमुख रूप से कृषि सम्बंधित विषयो पर सारगर्भित चर्चा और संवाद का आयोजन प्रस्तावित है। कार्यक्रम के अंत में प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन द्वारा "यूपी इनोवेटिव अवार्ड्स 2024 का वितरण तमाम कृषको को किया जायेगा। साथ ही साथ प्रदर्शनी के बेस्ट स्टाल अवार्ड भी वितरित किया जायेगा।

कार्यक्रम की रूपरेख

कार्यक्रम स्थल: भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, तेलीबाग

कार्यक्रम तिथि: 1 मार्च से 3 मार्च 2024

समय : प्रातः 10:30 से सांय 5: 30 तक

बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

मोदी चुनाव का नहीं विकास का बिगुल फूंकते हैं!

फिरोज़ बख़्त अहमद 
मोदी के प्रतिद्वंदी प्रायः यह कहते सुने जाते हैं कि वे मंदिरों को प्राथमिकता इस लिए देते हैं कि वे चुनाव जीतना चाहते हैं। बहुत छोटी बात बोलते हैं ये लोग और लगता है कि अक्ल के पीछे डंडा ले कर दौड़ रहे हैं क्योंकि मोदी जैसे इन्सान को चुनाव से कोई लेना देना नहीं, न ही राजनीति से मिलने वाले लाभों व शान-ओ-शौकत से कोई सरोकार और न ही अरबों-खरबों की संपत्ति एकत्र करने की इच्छा है, बल्कि ज़मीन से जुड़े इस प्रधानमंत्री के रूप में सेवक को भारत माता को विश्व गुरु बना, ऐसी ऊंचाइयों पर ले जाना है, जहां अमेरिका, ब्रिटेन, चीन आदि के मुक़ाबले में भारत कोसों आगे हो! रही बात राम मंदिर के नाम में चुनाव जीतने की, तो इस शुभ कार्य को इन विपाक्षी दलों ने क्यों नहीं कराया? अपने ही देश में हिंदू तबके को  अदालत से 500 वर्ष संघर्ष कर अपने सबसे बड़े आराध्य की प्राप्ति मोदी ने चुनाव जीतने हेतु नहीं बल्कि इस कार्य को पूर्ण करने के लिए किया कि जिन लोगों के निकम्मेपन के कारण यह रह गया था, क्योंकि वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को काल्पनिक मानते हैं और राम सेतु को भी नहीं मानते!
वैसे भी भारत माता इतना विशाल देश है कि हर समय कहीं न कहीं चुनाव चलते रहते हैं और जो लोग जनता की नजर में मोदी की भांति हर प्रकार से दमदार, दिलदार, जानदार, शानदार, वफादार, सेवादार, कामदार और ईमानदार नहीं होते, जानते हैं कि चुनाव जीतना आसान नहीं, अपनी असफलता का ठीकरा मोदी पर फोड़ देते हैं। बात यह नहीं कि मोदी विजयी हों अन्यथा नहीं, देश की बागडोर जिम्मेदार हाथों में रहनी चाहिए और यह पब्लिक है, सब जानती है!
भारत वर्ष को प्रगति व उन्नति के मार्ग पर दौड़ा दिया है, उससे उनके विपक्षी दलों में खलबाली मची हुई है कि यह बंदा किस मिट्टी का बना हुआ है कि न तो रुकता है, न थकता है और न ही झुकता है कि जिस तरक्की से इस व्यक्ति ने अपने दौर में भारत को रु बरु किया है, वह अति विलक्षण है व चमत्कारिक है, जिसे पिछले किसी प्रधानमंत्री के कार्य काल में पूर्ण नहीं किया गया! मोदी को नापसंद करने वाले, गलियां बकने वाले, कोसने वाले और झोलियां फैला कर बददुआ देने वाले भली भांति जानते हैं कि मोदी जो कहते हैं, करते हैं। उन्हों ने कभी नहीं कहा, " हम देख रहे हैं, है देखेंगे। वे देखने वालों में नहीं, करने वालों में हैं।यही बात उन्हें अन्य प्रधानमंत्रियों से भिन्न करती हैं। जनता सही जज है, न कि विपक्षी, वामपंथी दल आदि।
मोदी ही वह आदमी है जो आने वाले समय मे भारत को एक स्वस्थ, सुंदर (कूड़ा, गंदगी के ढेर विहीन) देश बना सकता है। यही वो व्यक्ति है जो पूरी तरह ईमानदार है और आगे भी ईमानदार रहेगा। यही वो आदमी है जो अपने परिवार के लोगों को हमारे सिर पर नही थोपेगा।
बतौर एक वोटर, मुझे मोदी पर 100 प्रतिशत विश्वास है कि यह व्यक्ति देश के लिए कितना भी कठिन निर्णय हो उसे लेने में कभी नहीं हिचकेगा व पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकता है।चुनाव जीतेगा तो सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की सेवा के लिए 10 साल में, यह व्यक्ति एक दिन भी खाली नहीं बैठा, कुछ न कुछ करता ही रहा, चाहे वह वंदे भारत रेल हो या काश्मीर में सबसे ऊंचा पुल बनाना हो, या दुश्मन के घर में जा कर सर्जिकल स्ट्राइक करनी हो, जिस पर विपक्षियों ने सवाल उठाए! मोदी से पूर्व जीडीपी 1.8 ट्रिलियन थी और आज 3.7 ट्रिलियन है। 
मोदी से पूर्व प्रति व्यक्ति आय 78 हज़ार थी तो आज यह 1 लाख 15 हज़ार है। मोदी से पूर्व हम 10वें आर्थिक स्थान पर थे और आज 5वें आर्थिक स्थान पर हैं। मोदी से पूर्व हमारे देश ने 200 बिलियन का व्यपार किया था और आज यह संख्या 800 बिलियन के लग हग है। मोदी से पहले हमारे पास 5  मेट्रो शहर थे, आज 21 हैं। मोदी से पूर्व हमारे पास 74 एयर पोर्ट थे और आज 160 हैं। मोदी से पूर्व केवल 40 प्रतिशत गाँवों में बिजली थी, आज 95 प्रतिशत गाँवों में बिजली है। 
मोदी से पूर्व केवल 7 एम्स थे, आज 22 हैं। मोदी से पूर्व ई-वे की लंबाई  680 किलो मीटर थी, आज 4067 मीटर है। मोदी से पूर्व रेलवे ट्रैक 25,700 किलो मीटर था, आज, 5,7,700 किलो मीटर है। मोदी से पूर्व सड़क गुणवत्ता में हम 88वें स्थान ओर थे, आज 42 वें स्थान पर है।चूंकि लेखक अपनी इसलामी जड़ों से जुड़ा मुसलमान, एक संस्कारी व राष्ट्रवादी मुस्लिम है, सिवाय भारत माता से जुड़े होने के, किसी अन्य पार्टी या संगठन से नहीं जुड़ा है, अपने मुस्लिम दीन भाईयों से गुजारिश करता है कि भले ही वे मोदी को वोट दें या न दें, मोदी से अंध रंजिश और दुश्मनी का त्याग कर, इस वासुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखने वाले प्रधानमंत्री के बाजुओं को मज़बूत करें, क्योंकि यह वही मोदी है, जिसने कहा है कि वह हर मुस्लिम के एक हाथ में कुरान और दुसरे में कंप्यूटर देखना चाहता है और यह कि वह मुस्लिमों को अपनी संतान की भांति समझता है व उनके साथ बराबरी का सुलूक करना चाहता है। यह वही मोदी है, जिस ने विज्ञान भवन में विश्व की सबसे बड़ी सूफ़ी संगोष्ठी की थी। या वही मोदी है जिसे छः इस्लामी देशों ने अपने सर्वोच्च इनाम दिए थे और यह वही मोदी है, जिसके सम्मान में सऊदी अरब के बादशाह सलमान ने रामायण को अरबी में अनुवाद कर भेंट किया था! इस मोदी का ही दम था जिसने अबु धाबी में मंदिर की स्थापना करे दोनों देशों में हर प्रकार से प्रगाढ़ रिश्ते बनाए!
एक सामान्य भारतवासी और दिल्ली नागरिक होने के नाते, मेरा ये दृढ़ विश्वास है कि आज के समय में यही सबसे उपयुक्त व्यक्ति है जो भारत को विश्वगुरु बना सकता है।यही वह व्यक्ति है जो भारत को आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बना सकता है, यही वो आदमी है जो हमको तीसरी दुनिया, विकासशील देश से एक विकसित देश बना सकता है। भारत माता की जय! जय हिंद!  
(लेखक पूर्व कुलाधिपति, भारत रत्न, मौलाना आज़ाद के वंशज और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

विश्वास के सिंहासनों से षड्यंत्रों का शंखनाद

डा. रवीन्द्र अरजरिया
देश को धर्म के नाम पर बांटकर स्वार्थ पूर्ति के प्रयास निरंतर तेज होते जा रहें। लोकसभा के चुनावों की बयार चलते ही विश्वास के सिंहासनों से षडयंत्रों का शंखनाद होने लगा है। कहीं कल्कि पीठ के पीठाधीश्वर कलयुग की काल गणना करके  परमात्मा के अवतरण की घोषणा कर रहे हैं तो कहीं कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मंदिरों पर टैक्स लगाने के लिए कर्नाटक हिन्दू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती संशोधन विधेयक 2024 को विधान सभा में पास करती है। कहीं असम की भाजपा सरकार मुस्लिम मैरिज एण्ड डिवोर्स एक्ट 1935 को समाप्त करती है तो वहां के मुस्लिम नेता शरीयत कानून के अनुसार ही सामाजिक व्यवस्था मानने की घोषणा करते हैं। कहीं मुस्लिम लीग के फरमान जारी होते हैं तो कहीं खुलेआम गजवा-ए-हिन्द को इस्लाम का अभिन्न अंग मानने के फतवे जारी होते हैं। कहीं हिन्दू राष्ट्र की मंचीय घोषणा होती है तो कहीं मिशनरी के द्वारा लालच के सब्जबाग दिखाये जाते हैं। चौराहों से लेकर चौपालों तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।
कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरु में बैठकर मुख्यमंत्री सिध्दारमैया ने कांग्रेस के आलाकमान के इशारे पर हिन्दू मंदिरों को मुगुलकालीन जरिया कर जैसे चाबुकों से लहूलुहान करने हेतु विधान सभा में विधेयक  पेश किया और संख्या बल के आधार पर पास भी कर लिया परन्तु विधान परिषद में भाजपा के पास अधिक सदस्य होने के कारण उसे अन्तिम रूप नहीं दिया जा सका। यह वही पार्टी है जिसके आलाकमान राहुल, सोनिया, प्रियंका गांधी चुनावी काल में दर-दर गली-गली मंदिरों में माथा टेककर हिन्दू मतदाताओं के वोट बटोने के लिए प्रयास कर रहे हैं। वहीं असम की राजधानी दिसपुर में आसन जमाये मुख्यमंत्री डा. हेमंत विस्वा ने अपनी पार्टी के मुखिया के संकेत पर मुसलमानों के विवाह और तलाक की परम्परागत व्यवस्था की कानूनी मान्यता समाप्त कर दी। इस हेतु वहां के मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने घोषणा करते हुए कहा कि अब मुस्लिम विवाह और डिवोर्स से जुडे सभी मामले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत सुलझाये जायेंगे।
दूसरी ओर इसका विरोध करते हुए असम में आल इण्डिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के मुखिया बदरुद्दीन अजमल ने मोर्चा खोल दिया जिसे आगे बढाते हुए समाजवादी पार्टी के सांसद एसटी हसन ने कहा कि मुस्लिम सिर्फ शरीयत कानून को ही मानेगा। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद शहर में स्थापित दारुल उलूम मदरसा ने गजवा-ए-हिन्द को डंके की चोट पर मान्यता देते हुए फतवा जारी किया है। फतवे में कहा गया है कि भारत पर आक्रमण करने के दौरान मरने वाले महान शहीद कहलाए जायेंगे और उन्हें जन्नत नसीब होगी। यह सब कुछ देश के अन्दर बैठकर दबंगी से सोशल मीडिया की साइट पर किया जा रहा है ताकि मुसलमानों के अन्दर धार्मिक उन्माद भडकाया जा सके। इस हेतु सुन्न-अल-नसा नामक पुस्तक का जिक्र करते हुए हजरत अबू हुरैरा की हदीस का हवाला दिया गया। उसमें कहा गया कि अल्लाह के संदशवाहक ने भारत पर हमले का वायदा किया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैं जिन्दा रहा तो इसके लिए अपनी खुद की और अपनी संपत्ति की कुर्बानी दे दूंगा। मैं सबसे महान शहीद बनूंगा। वहीं अनेक स्वयं भू हिन्दू धर्मगुरुओं के व्दारा भी हिन्दू राष्ट्र की घोषणा खुले मंचों से की जा रही है। लोगों की निजिता को सार्वजनिक करके हाल ही में लोकप्रियता की ऊंचाइयों पर पहुंचने वाले ऐसे धर्मगुरु अक्सर अपने विवादास्पद कृत्यों, वक्तव्यों और संवादों  से विष पौध ही रोपते रहते हैं। हिन्दू राष्ट्र का प्रचार भी गजव-ए-हिन्द की तरह ही माना जा रहा है। अन्तर केवल सोच का है।
हिन्दुओं की आस्था केवल समस्या के समाधान तक ही सीमित होती है जिसे अस्थाई कहा जा सकता है परन्तु मुस्लिम आस्था को कट्टरता के रूप मे स्थापित करने के निरंतर प्रयास होते रहते हैं। नेटवर्किंग की चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था के कारण ही हल्व्दानी काण्ड के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को लम्बे समय तक हथकडी पहनाना सम्भव नहीं हुआ। वह सुरक्षित इस्लामिक नेटवर्क के कारण ही अनेक राज्यों में अपने लोगों के घरों में न केवल ठहरा बल्कि पैसे, वाहन और अन्य संसाधन प्राप्त करता रहा। ऐसा ही कृत्य एक हिन्दू गायक ने विवादास्पद बयान देने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए बुंदेलखण्ड में नव प्रचारित धार्मिक स्थान के समीप आश्रय लेकर किया था। देश के गरीब इलाकों में मिशनरी द्वारा लालच का सहारा लेकर निर्धन परिवारों को धर्म परिवर्तन की ओर बढाया जा रहा है। गोरों के शासनकाल के मनमाने आवंटन आज तक यथावत मालिकाना हक के रूप में स्थापित हैं जिन्हें स्वाधीनता के अनुबंध के आधार पर तत्कालीन कथित नेताओं ने मूर्त रूप देने का काम किया था। 
अनेक स्थानों पर तो चिकित्सालय, शिक्षालय जैसी संस्थायें आज भी आम लोगों पर लागू होने वाले कानून नहीं मानतीं हैं। विशेषाधिकारों की दुहाई पर काम करने वाले कभी मानवाधिकरों की ढाल खडी कर देते हैं तो कभी अभिव्यक्त की आजादी पर संसद में बाबरी मस्जिद जिन्दाबाद के नारे बुलंद करते हैं। यह कारक लोक सभा के चुनाव काल में सुनामी की तरह ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं ताकि अंध श्रध्दा को प्रचारित करके वोट बैंक पर डाका डाला जा सके। इन प्रयासों को असफल करने के लिए आम आवाम को स्वयं आगे आना पडेगा अन्यथा आस्था के मनगडन्त मायनों को सत्ता की परिभाषा बनाने वाले अपने षडयंत्र से भाई-भाई के बीच खूनी जंग छिडवाने का मंसूबा पूरा कर लेंगे। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

भर्ती परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार युवाओं के साथ घोर अत्याचार

 बंसत कुमार

17-18 फ़रवरी को उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में अनुचित संसाधनों का इस्तेमाल करने के आरोप में 244 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस खबर के खुलासे के बाद समाजवादी पार्टी समेत सभी विपक्षी दलों ने सरकार पर भर्ती परीक्षा में हो रही गड़बड़ी में संलिप्त होने का आरोप लगाते हुए इस परीक्षा को निरस्त करके दुबारा से भर्ती परीक्षा आयोजित करने की मांग की है। यह सिर्फ एक परीक्षा में धांधली का मामला नहीं है बल्कि विगत कुछ वर्षो में आयोजित होने वाली अधिकांश परीक्षाओं में इस तरह की धांधली सामने आ रही है। इसी कारण से दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान परीक्षाओं में सफल होने के लिए अभ्यर्थियों द्वारा की जा रही धांधली को अफ़सोसजनक बताया। न्यायालय ने आगे कहा कि इस धांधली का परिणाम यह है कि निर्दोष और ईमानदार छात्र अपने साथ के लोगों के अव्यस्थित और अमर्यादित आचरण का शिकार बन रहे हैं। ऐसी स्थिति में राज्य और उनकी एजेंसियों के पास परीक्षा को पूरी तरह रद्द करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता है।

न्यायालय की पीठ ने आगे कहा कि यह देखा गया है कि ऐसी परीक्षाएं आयोजित करने वाली एजेंसियों के लिए यह निर्धारित करना और पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता है कि कितने छात्र इस तरह के तरीको और अनियमितताओं में शामिल हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली कौशल उद्यमिता विश्वविद्यालय द्वारा अधिसूचित रिक्ति में जूनियर सहायक के पद के लिए कई उम्मीदवारों की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कानून का सुव्यवस्थित सिद्धांत यह है कि चयन प्रक्रिया को दागदार नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रकार की परीक्षा आयोजित करते समय चयन प्रक्रिया की पवित्रता बनाये रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। मजे की बात यह है कि इस तरह की गड़बड़ी के लिए देश में एक सॉल्वर गैंग काम कर रहा है जिससे असली अभ्यर्थी के स्थान पर किसी और को बैठाकर प्रश्न पत्र हल कराए जाते हैं। यद्यपि पुलिस एवं प्रशासन दावा कर रही है कि दो दिन चली उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती परीक्षा में धांधली रोकने के कड़े इंतजाम किये गए थे।

पारंपरिक पुलिस के साथ-साथ सीसीटीवी, ड्रोन कैमरे, जैमर और बायोमैट्रिक संसाधनों का इस्तेमाल कर फर्जी अभ्यर्थियों, पेपर लीक और साल्वर गैंग पर नजर रखी गई। कई जगहों पर छात्राओं के जूड़े तक चेक किये गए। इसके लिए पुलिस के साथ आरएएफ और पीएसी को भी लगाया गया, साथ ही एसटीएफ भी लगातार निगरानी करती रही थी। इसके बावजूद प्रदेश भर में तमाम सालवर और अनुचित संसाधनों का प्रयोग करने वाले अनेक अभ्यर्थी गिरफ्तार किए गए। कहने का अभिप्राय यह है की सरकार की ओर से इतने भारी भरकम इंतजाम के बावजूद फर्जीवाड़ा रोकने में सरकार कामयाब नहीं हो पाई। नकल की कोशिश में लगे लोगों के पास से भारी संख्या में नकल सामग्री, माइक्रोफोन, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, फर्जी एडमिट कार्ड, फर्जी आधार कार्ड आदि बरामद किए गए। अभ्यर्थियों को नकल कराने के एवज में लाखों रूपए की नगद राशि वसूली गई। कहीं-कही तो सालवर ब्ल्यूटूथ डिवाइस से नकल कराते हुए पकड़े गए।

इस परीक्षा में पेपर लीक का मुद्दा भी बहुत गरमाया हुआ है। सोशल मीडिया के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी इसे खूब उछाला। एक ओर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखकर इस परीक्षा को निरस्त कर दुबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग की। वहीं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने कहा कि जो युवा रोजगार चाहते हैं वे इसके लिए परीक्षा की तैयारी करते हैं और पेपर देने जाते हैं पर इससे पहले ही पेपर लीक हो जाता है। पेपर लीक हो जाने से लाखों युवा निराश हैं और उनके मन में आक्रोश है। यह पहली बार नहीं हो रहा है, पेपर लीक होने की घटनाएं पूरे देश में वर्षों से हो रही हैं। उत्तर प्रदेश में ये घटनाएं तब भी हो रही थी जब प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव थे। लगभग एक दशक पहले जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव जी मुख्यमंत्री थे तब सिपाहियों की भर्ती हुई जिसमें रिश्वत लेकर और अन्य अनियमितताओं के आरोप लगे फिर भी इस परीक्षा से चुने हुए अभ्यर्थी ड्यूटी भी जॉइन कर लिए गए पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद उन्हें घर बैठा दिया गया पर उसके बाद मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके न्यायालय के आदेश आने के बाद दुबारा ड्यूटी पर बुला लिया गया। इस प्रकार की घटनाओ से युवा जो रात-दिन एक करके परीक्षा की तैयारी करते हैं उनमें निराशा व्याप्त होती हैं।

यह हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का ही नहीं है। देश के अधिकांश भर्ती बोर्डों का यही हाल है, दो वर्ष पूर्व रेलवे में ग्रुप डी की भर्ती प्रक्रिया हुई और इसमें भारी पैमाने पर सालवर्स के इस्तेमाल होने की खबरे आई और रेल प्रशासन को युवाओ का विरोध झेलना पड़ा। कई जगह गाड़ियां रोकी गई, अगर इसी प्रकार सरकारी नौकरियों में धांधलियां चलती रही तो सरकार पर, न्यायालय और प्रशासन पर से लोगों का भरोसा उठ जायेगा। इस तरह की भर्ती भी हमारी सरकार की सेवाओ की दक्षता पर भी असर डालेंगी। आज हमारे गांवों में रहने वाले मध्यम वर्ग के युवाओं के मन में यह भ्रांति उठने लगी है कि रसूक और पैसे के बगैर सरकारी नौकरी मिलना मुश्किल है। युवाओं के मन से यह भ्रम निकालने के लिए हमें अपनी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शिता पूर्ण बनाना होगा और तभी हम अपने प्रशासनिक इकाइयों से बेहतर परिणाम की आशा कर सकेंगे। गलत रास्ते से चुनकर आए लोग धनवान बनने के लिए गलत ही करेंगे और हमें यह बात समझ लेना चाहिए। सरकार को भी भर्ती प्रक्रिया को निरंतर चलने वाली सामान्य प्रक्रिया के स्थान पर इवेंट के रूप में आयोजित करने से बचना चाहिए जितने बड़े पैमाने पर भर्ती प्रक्रिया होगी उतना ही गड़बड़ी की आशंका रहेगी।

सभी राजनीतिक दल और विभिन्न सामाजिक संगठन जाति के आधार पर आरक्षण के लिए पक्ष-विपक्ष आपस में टकराते हैं पर सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती प्रक्रिया में चल रही धांधली पर कोई भी आवाज़ नहीं उठाता। यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि विगत कुछ वर्षों में चाहे कोई भी दल सत्ता में हो सरकारी नौकरियों में चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और संदेह से परे नहीं रही है। इन परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर साल्वरों का पकडा जाना इसका प्रमाण है यदि हम सरकारी नौकरी मिलने को पूर्व की भांति योग्यता और मेहनत का परिणाम स्थापित करना चाहते हैं तो हमें इस समस्या का समाधान करना होगा।

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