शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

निगम पार्षद हाजी समीर की लापरवाही का हर्जाना भर रहे हैं बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क निवासी

असलम अल्वी

गांधी नगर विधानसभा के शास्त्री पार्क वार्ड नंबर 213 जिसके निगम पार्षद कांग्रेस पार्टी के हाजी समीर मंसूरी हैं। यहां की जनता ने भाजपा व आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों को अपना निगम पार्षद नहीं चुना बल्कि कांग्रेस के प्रत्याशी हाजी समीर को निगम पार्षद चुना ताकि यह शास्त्री पार्क वार्ड के ही निवासी हैं तो यह शास्त्री पार्क की ओर ज्यादा ध्यान देंगे पर उन्हें क्या बता था कि जिसे वह निगम पार्षद बना रहे हैं वह ही उनके साथ सौतेला व्यवहार करेंगे।
इन्हें सबसे ज्यादा वोट बुलंद मस्जिद कॉलोनी के निवासियों ने दिया था ताकि मुस्लिम बहुल इलाका होने की वजह से यह मुस्लिम प्रत्याशी इनकी परेशानी को कम करने में मील का पत्थर बनेंगे पर उन्हें क्या पता था कि जो वह सोच रहे हैं उसके उल्ट वह उनके लिए ही नुकसानदायक साबित होंगे।

हाजी समीर से पहले यहां से भाजपा से निगम पार्षद रोमेश गुप्ता थे जिन्हें यहां से मात्र 351 वोट मिले थे पर उन्होंने बुलंद मस्जिद कॉलोनी को कभी अकेला नहीं छोड़ा। उनके कार्यकाल में सफाई व्यवस्था कभी खराब नहीं हुई। मगर अब यहां चारों ओर आप गंदगी का ढेर देखें और उनके बीच जीवन गुजरते लोगों को। यहां की सफाई व्यवस्था से यहां के निगम पार्षद को कोई लेना देना नहीं। उनसे यहां के लोग कई बार सफाई व्यवस्था दुरूस्त करवाने के लिए कह चुके हैं पर वह निगम में आम आदमी पार्टी की सरकार को ही दोषी ठहरा देते हैं, वह कहते हैं कि हमारे पास फंड नहीं तो हम काम कैसे करवाएं। सफाई कर्मचारी बढ़ाएं नहीं जा रहे हैं तो मैं क्या करूं।

जब तक हाजी समीर को वोट चाहिए था तो उन्होंने यहां की सफाई व्यवस्था और भाजपा व आप को ही निशाना बना रखा था कि यह लोग काम नहीं कर रहे हैं। आप लोग मुझे जीताकर लाओ मैं आपकी कॉलोनी को चमन बना दूंगा पर अब हाल यह है कि डी-ब्लॉक में सरकारी स्कूल, कब्रिस्तान, बाबा जलालुद्दीन की दरगाह, डीडीए पार्क व गौसिया मस्जिद है पर यहां पर आने जाने वाले लोगों को काफी परेशानी होती है क्योंकि जब नाला ओवरफलो होता तो सारा पानी रोड पर आ जाता है जिसकी वजह से यहां आना जाना मुश्किल हो जाता है।

जब यहां के लोगों से बात करने की कोशिश की लोगों ने कैमरे पर बात करने से मना कर दिया मगर दबी जुबान में निगम पार्षद व निगम कर्मचारियों को वह बुरा-भला ही कहते नजर आए। उन्होंने ने कहा आप हमसे यहां की सफाई व्यवस्था के बारे में सवाल करोगे उसके बाद निगम के कर्मचारी या निगम पार्षद के लोग आकर हमें परेशान करेंगे।

इसी बीच हमें यहां कांग्रेस के कार्यकर्ता मिले उन्होंने भी कैमरे पर कुछ बोलने से मनाकर दिया मगर कांग्रेस कार्यकर्ता व समाजसेवी इजहार सलमानी ने हमसे बात की और यहां की परेशानी के बारे बताया।








 




गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

क्यों बिखर रही है कांग्रेस और इंडिया गठबंधन

बसंत कुमार

अभी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य मंत्री व कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक चवहा न को कांग्रेस से त्याग पत्र देकर भाजपा जॉइन किये कुछ ही घंटे नही बीते की कांग्रेस के सचिव और पूर्व प्रधान मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र विभाकर शास्त्री कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा मे शामिल हो गए, भाजपा जॉइन करने के तुरंत बाद अशोक चवहान को महाराष्ट से राज्य सभा का टिकट भी मिलगया और हो सकता है विभाकर शास्त्री को उत्तर प्रदेश से लोकसभा का टिकट भी मिल जाये। वर्ष 2024 के आम चुनावो मे नरेंद्र मोदीजी को सत्ता से हटाने के लिए कांग्रेस ने कई दर्जन दलों के साथ मिलकर इंडिया  गठबंधन तैयार किया और उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस इस महा गठ बंधन के साथ सत्ता पार्टी को मजबूत चुनौती देगी, पर ऐसा नहीं हुआ महागठबंधन के प्रधानमंत्री पद के दावेदर नितीश कुमार रातोरात पलटी मारते हुए एन डी ए मे शामिल होकर सरकार बना ली। टी एम सी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने बंगाल में कांग्रेस और महागठबंधन के साथियों के लिए कोई भी सीट छोड़ने के बजाय अकेले ही लड़ने का फैसला किया है और ऐसा ही फैसला उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ सीट बटवारे पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कर लिया है और रही सही कसर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पंजाब और दिल्ली में सभी सीटो पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़ी करने की घोषणा कर के पूरी कर दी है अर्थात इंडिया गठबंधन बनने से पहले ही टूटता नजर आ रहा है। पर कांग्रेस के लिए महा गठबंधन को बचाने से पहले अपनी पार्टी को बचाना ज्यादा महत्व पूर्ण है क्योकि हर रोज उनके एक न एक कद्दावर नेता पार्टी छोड़कर भाग रहे है। 

लोक सभा चुनाव में जुटी कांग्रेस को रोजाना एक न एक झटका लग रहा है यह पता ही नहीं चल पाता कि कौन नेता कब पार्टी का साथ छोड़ दे, क्या महाराष्ट्र, क्या मध्य प्रदेश, क्या कर्नाटक सहित सभी राज्यो मे कांग्रेस नेताओ का पार्टी छोड़ने का सिल सिला जारी है 10-12 वर्ष पहले तक कांग्रेस के किसी बड़े समारोह में राहुल गाँधी के पहुँचते ही उन्हे ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवडा, आर पी एन सिंह, जितिन प्रसाद समेत नेता उन्हे घेर लेते थे पर आज ये सभी नेता कांग्रेस और राहुल गाँधी दोनों का साथ छोड़ चुके हैं। अभी यह स्थिति है कि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के तीन नेताओ ने पार्टी छोड़ दी है। कांग्रेस पार्टी के अंदर जो हल चल चल रही है वह नई नही है यह अंतरकलह कई सालों से चल रही है जिसको सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और मल्लिकारजून खड़गे तक रोकने मे असफल दिखाई दे रहे है।

सोनिया गाँधी के करीबी माने जाने वाले गुलाम नबी आजाद, कैपटन अमरिंदर सिंह, रीता बहुगुणा जोशी आदि कांग्रेस छोड़कर या तो अपनी पार्टी बना चुके है या भाजपा का दामन पकड़ चुके है। इतना ही नहीं राहुल गाँधी के करीबी माने जाने वाले उनके सिपहसलार सुश्मिता देव, प्रियंका चतुर्वेदी, जितिन प्रसाद, अशोक तंवर, हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर, अशोक चौधरी, हेमंत विश्व शर्मा, सुनील झाखड, अश्वनी कुमार जैसे बड़े नेता पार्टी को अलविदा कह चुके है। इससे पहले कांग्रेस के दिग्गज नेता जो चार दशको से पार्टी के थिंक टैंक का हिस्सा रहे कपिल सिब्बल  कांग्रेस छोड़कर, सपा के टिकट पर राज्य सभा सांसद बने। यदि देखा जाए तो लालू प्रसाद यादव की आर जे डी और सिब्बु सोरेन की झार खण्ड मुक्ति मोर्चा ही कांग्रेस के विष्वशनिय साथी के रूप में बचे है और इंडिया गठबंधन के अन्य साथी मौके की नजाकत के अनुसार कांग्रेस के साथ व दूर खड़े रहते है।

जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो उनके पास नरेंद्र मोदीजी जैसा नेतृत्व है जिसने अपनी कड़ी मेहनत और दूर दर्शिता से अपने 9 वर्षो के कार्यकाल में देश को विश्व की 5वीं आर्थिक महाशक्ति के रूप में खड़ा कर दिया है और निकट भविष्य में देश के किसी भी दल मे उनके नेतृत्व को टक्कर देने वाला कोई नजर नही आ रहा और भाजपा बगैर अपना कुनबा बढ़ाये वर्ष 2024 के चुनावो मे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली है फिर अशोक चव्हाण जैसे नेता जिन्हे आदर्श घोटाले के आरोप के चलते मुख्यमन्त्री के पद से त्याग पत्र देना पड़ा था को पार्टी मे इतनी गर्मजोशी से लेकर राज्य सभा का टिकट क्यो दे दिया गया, ऐसे विवादित लोगो को पार्टी मे लेने से भाजपा की पार्टी विथ ए डिफ्रेंस वाली छवि पर धक्का लगेगा, जो लोग विगत कुछ वर्षो मे कांग्रेस छोड़कर भाजपा की शरण मे आये है उनमे से अधिकांश कांग्रेस मे लंबे समय तक रहे है और कांग्रेस शासन में पद और प्रतिष्ठा पाते रहे है।

आज जो नेता कांग्रेस को डूबता हुआ जहाज मानकर पार्टी को छोड़कर भाग रहे है और भाजपा की शरण में आ रहे है क्या भरोषा है कि भविष्य मे दुर्भाग्य से भाजपा सत्ता से हटने लगे तो ये पुन: भाग खड़े हो क्योकि इनमे से अधिकांश चुनाव के समय भाजपा मे टिकट मिलने और सांसद बनने के लोभ मे आ रहे है और पार्टी भी दशकों से परत के लिए काम कर रहे कार्य कर रहे कर्मठ कार्यकर्ताओं को नजर अंदाज कर के इन भगोड़े अवसर वादियों को उपकृत कर रही है। इससे पार्टी के लिए काम कर रहे समर्पित कैडर कार्य कर्ताओ का वह वर्ग जो पार्टी की रीतियों और नीतियों के लिए मर मिटता है समाप्त हो जायेगा। इस तथ्य पर पार्टी नेतृत्व को सोचना होगा।

स्वतंत्र भारत के 7 दशक के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस एक बार नही तीन तीन बार सत्ता से बाहर हुई है और हर बार पार्टी नेतृत्व ने अपनी संगठन क्षमता के बल पर शानदार वापसी की है और कभी भी इतने बड़े पैमाने पर कांग्रेस के बड़े बड़े नेता पार्टी छोड़कर नही भागे है। इस समय कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपने गठबंधन इंडिया और कांग्रेस को बिखरने से रोकना है, इसके लिए कांग्रेस नेताओ को आत्मावलोकन करना होगा कि क्या कारण है कि डेढ़ सौ वर्ष पुरानी पार्टी इस प्रकार बिखर रही है अगर यह रोका नही गया तो नरेंद्र मोदी जैसे कुशल और मेहनती नेता के नेतृत्व मे भाजपा को तीसरी बार सत्ता मे आने से रोकना विपक्ष के लिए असंभव होगा।

समान नागरिक संहिता प्रगतिशील और न्यायपूर्ण समाज की दिशा का बड़ा कदम है

अवधेश कुमार

उत्तराखंड सरकार द्वारा कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक संहिता विधेयक पारित करना कायदे से ऐतिहासिक घटना मानी जानी चाहिए। गोवा में समान नागरिक संहिता की पृष्ठभूमि तथा प्रकृति अलग है। संविधान की स्वीकृति के समय से राष्ट्रीय स्तर पर जिस समान नागरिक संहिता की मांग की जा रही थी उस दिशा में कदम बढ़ाने वाला उत्तराखंड पहला राज्य बना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके उत्तराधिकारी सत्तारूढ़ भाजपा, समान नागरिक संहिता की बात अवश्य करते थे किंतु  उसकी रूपरेखा सामने नहीं थी। पहली बार भाजपा की एक राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता का प

प्रारूप रख दिया है। इसके बाद अन्य भाजपा शासित राज्य और केंद्र द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता पारित कर लागू करने की संभावना बलवती हुई है।

 विरोधियों की बात मानें तो यह भाजपा द्वारा अपना एजेंडा लागू करना है जिसका मूल उद्देश्य एक धर्म और उसकी मान्यताओं के अनुरूप समाज और व्यवस्था का निर्माण है। भाजपा के एजेंडा की बात समझ में आती है, पर इसे किसी रीलिजन, पंथ या मजहब को जोड़ने जैसे आरोप किसी दृष्टिकोण से सत्यापित नहीं होते। कुल 192 पृष्ठ और 392 धाराओं वाली इस संहिता में कहीं नहीं लिखा गया है कि फलां रीलिजन या पंथ के लोग ऐसा नहीं कर सकते या कर सकते हैं।  किसी भी धार्मिक, पंथिक, मजहबी, सांस्कृतिक मान्यताओं ,परंपराओं ,रीति -रिवाजों  पर इसका असर नहीं होगा। इनमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं जिससे खान-पान, पूजा - पाठ , इबादत, वेशभूषा, रहन -  सहन पर कोई प्रभाव पड़े। इसी तरह कोई किस तरीके से शादी करे, शादी- विवाह- निकाह कौन कराए इसके प्रावधान नहीं है। कहने का तात्पर्य कि समान नागरिक संहिता को लेकर अभी तक किया गया प्रचार झूठा साबित हुआ है कि इससे हिंदुओं के अलावा दूसरे रिलिजन के लोग अपनी परंपरा, रीति - रिवाज के अनुसार शादी - विवाह या अन्य कर्मकांड नहीं कर पाएंगे।

वास्तव में यह प्रगतिशील व्यवस्था और समाज निर्माण की दिशा का बड़ा कदम है। कोई प्रगतिशील व्यवस्था किसी की धार्मिक- सांस्कृतिक मान्यताओं ,परंपराओं और रीति-रिवाजों को प्रतिबंधित करने या उन पर अंकुश लगाने जैसा विधान स्वीकार नहीं कर सकती। ऐसी कट्टरवादी संकीर्ण सोच के लिए सभ्य समाज में स्थान नहीं हो सकता। इसलिए मुस्लिम संगठनों , मजहबी नेताओं , या राजनीतिक दलों का विरोध केवल विरोध के लिए है। विरोधियों को परंपरागत दुराग्रह से बाहर आकर संहिता से वैसे प्रावधान सामने लाने चाहिए जिनसे वाकई संविधान प्रदत्त धार्मिक अधिकारों पर आघात किया गया हो। सारे विरोध और आरोप तबके हैं जब  सामने  ड्राफ्ट नहीं था। अब तो बात केवल प्रावधानों पर होनी चाहिए।

समान नागरिक संहिता जीवन के केवल पांच क्षेत्रों- विवाह, तलाक ,गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार और गोद लेना या दत्तकग्रहण के लिए है। उत्तराखंड समान नागरिक संहिता के चार खंड हैं, विवाह और विवाह विच्छेद या तलाक, उत्तराधिकार, सहवासी संबंध या लीव इन रिलेशनशिप और विविध। इसमें विवाह के लिए लड़कियों की न्यूनतम आयु 18 व लड़के की न्यूनतम 21 वर्ष रखी गई है तो बहु विवाह व बाल विवाह का निषेध है। सगे रिश्तेदारों से संबंध निषेध तो है पर यह उन पर लागू नहीं होगा जिनकी प्रथा या रूढ़ियां ऐसे संबंधों में विवाह की अनुमति देती है। इन सबसे किसका विरोध होगा और क्यों? 

हम जन्म और मृत्यु का पंजीकरण कराते हैं तो विवाह के पंजीकरण की अनिवार्यता क्यों नहीं होनी चाहिए? इसके ज्यादातर प्रावधान आपको सभी धर्म की महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता पर आधारित न्यायपूर्ण प्रगतिशील समाज के निर्माण का ही संदेश देते हैं। उदाहरण के लिए पुरुष और महिला दोनों को तलाक के समान अधिकार होंगे तो पति या पत्नी में से किसी के जीवित रहने पर दूसरे विवाह की अनुमति नहीं होगी और महिला के द्वारा विवाह में कोई शर्त नहीं होगी। किसी को एक से अधिक विवाह करने का उन्माद हो या पुरुषों के समान महिलाओं को तलाक के अधिकार से समस्या तो उनको समान नागरिक संहिता से समस्या होगी। 

 तलाक की याचिका लंबित रहने पर भरण पोषण और बच्चों की अभिरक्षा से संबंधित प्रावधानों पर उन्हें ही आपत्ति हो सकती है जो सामाजिक न्याय नहीं चाहते। धार्मिक मान्यताओं से परे किसी व्यक्ति को पुनर्विवाह या तलाक के मामले में स्वच्छंदता नहीं दी जा सकती।

समान नागरिक संहिता की प्रगतिशील प्रकृति का एक प्रमाण संपत्ति में पुरुषों के समान महिलाओं को समान अधिकार दिया जाना है। इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि किसी भी परिवार  के जीवित बच्चे, पुत्र अथवा पुत्री संपत्ति में बराबर के अधिकारी होंगे।

 हालांकि लिव इन रिलेशनशिप संबंधित प्रावधानों से भाजपा एवं संघ परिवार के अंदर थोड़ी असहजता भी महसूस हुई है। लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकरण कराने और न करने पर दंड तथा उस अवधि में पैदा होने वाले बच्चों को वैध संतान की मान्यता या पुरुष द्वारा लिव इन की महिला को छोड़ने पर महिला को भरण पोषण की मांग के अधिकार से आशंका पैदा हुई है कि ऐसे संबंध विस्तारित हो सकते हैं। समाज और परिवार के मान्य बंधन कायम रहे इस दृष्टि से विवाह के समान ही  संबंधों पर लिविंग में रहने की अनुमति नहीं दी गई है। हां जहां की रुढ़ियां या प्रथाएं ऐसे संबंधों में विवाह की अनुमति देते हैं उन पर लागू नहीं होगा पर ये रूढ़ियां और प्रथाएं लोक नीति और नैतिकता के विपरीत नहीं होने चाहिए। हाल के वर्षों में देखा गया है की परिवार और रिश्तेदारी के ऐसे संबंधों में लिव इन या शादी के मामले बढ़े हैं जिनको मानता नहीं थी और इससे समस्याएं पैदा हुई है। परिवार व्यवस्था की मर्यादा को बनाए रखने के लिए यह प्रावधान आवश्यक है। वैसे लिव इन प्रावधान भी महिलाओं के पक्ष में हैं। लव जिहाद की बढ़ती घटनाओं की दृष्टि से ऐसे कानून की मांग की जा रही थी जिनकी शिकार लड़कियों और महिलाओं तथा उनसे पैदा हुए बच्चों को सुरक्षा और संरक्षण प्राप्त हो। पर इसके खतरों को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। 

 कुल मिलाकर समान नागरिक संहिता स्वतंत्रता के बाद समाज के सभी अंगों पुरुष स्त्री बच्चों के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करती है। यह प्रगतिशील लोकतांत्रिक और परस्पर सम्मान पर आधारित समाज के निर्माण के सपने को पूरा करने का विधान है। यह कहना भी गलत है कि इसे अचानक लाया गया है। धामी सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति रंजना देसाई समिति ने इस पर विस्तार से कार्य किया है। अन्य देशों की संहिताओं, संविधान सभा में हुई बहस आदि का अध्ययन किया गया, लोगों से सुझाव मांगे और  जगह-जगह बैठकें की। राज्य स्तर पर लोगों से मिलने के बाद जिला स्तर तक गए और करीब 75 सभायें की। समिति को ढाई लाख से अधिक सुझाव‌ प्राप्त हुए। किसी भी व्यक्ति, समूह, संगठन या संस्था को समिति से मिलकर राय देने का निषेध नहीं था। इनमें राजनीतिक दल और नेता भी शामिल हैं। 

 संविधान निर्माण के समय से ही समान नागरिक संहिता पर बहस चलती रही है। इसके विरोध का कारण झूठ और दुष्प्रचार तथा मजहब के नाम पर गैर मजहबी पुरुष मनमानी व्यवस्था को बचाए रखने की मानसिकता रही है जिसका कोई उपचार नहीं। इसे संघ और भाजपा का एजेंडा बताने वाले भूल रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियों तथा समाजवादियों के घोषित एजेंडा में समान नागरिक संहिता लागू करना शामिल रहा है। डॉ राम मनोहर लोहिया इसके प्रबल पैरोकार थे। विडंबना देखिए कि आज कम्युनिस्टों और समाजवादियों की मुखर आवाज भी इसके विरुद्ध है। इससे साबित होता है कि विरोध के पीछे ईमानदारी और नैतिकता नहीं है। संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में संपूर्ण भारत के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता देने की क्या कदम बढ़ाने की अपेक्षा की गई है। तो उसे अपेक्षा को पूरा करने की शुरुआत हो गई है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 , मोबाइल -9811027208

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

किसान आंदोलन के परिपेक्ष्य में समय का चक्र

अरूण सेहरावात 
अगर समाज की सबसे छोटी परिभाषा दी जाए। तो इसका एक उदाहरण है। कि एक बार एक जंगल में एक लंगड़ा और एक अंधा व्यक्ति फंस गए और जंगल में आग लग गई।  दिक्कत यह है की लंगड़ा देख सकता है, कहीं चल कर जा नहीं सकता। और अंधा कही चलकर जा सकता है पर वह देख नहीं सकता। यानी एक के पास देखने की काबिलियत है और दूसरे के पास कहीं चल कर जाने की ताकत। 
तो वो दोनों एक दूसरे के साथ एक समझौता करते हैं या कहें कि सहयोग करते हैं। और इस सहयोग की नींव भरोसा है। जिसके पैर मजबूत है। वो लंगड़े को अपने कंधों पर बिठा लेता है और लंगड़ा व्यक्ति जो देख सकता है। वो अंधे को दिशा दिखाता है और वो दोनों आपसी सहयोग से जंगल की आग से बचकर निकल जाते हैं। तो यह है समाज की सबसे छोटी परिभाषा और सबसे आसान भी।
अपने आप में कोई परिपूर्ण नहीं है और सहयोग से ही हम पूर्ण बन सकते हैं। यह ‘मैं’ से ‘हम’ का रास्ता है जो सभी को तय करना है।
पर मैं इस कहानी को और आगे बढ़ाता हूँ। अब होता ये हैं। जिसके पास आंख है वह समाज के उस तबके का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास दर्शन है। वो समाज को दिशा दिखाता है। ओर और जिसने कंधे पर बैठाकर दर्शन वाले व्यक्ति को आग से बचाया। वह व्यक्ति प्रतिनिधित्व करता है समाज के उस तबके का जो कि कहलाता है कमेरा वर्ग। जो समाज को अपने कंधों पर बैठाकर आगे बढ़ाता है। एक समय आता है। जब वो दार्शनिक वर्ग। ये समझने लगता है की कमेरा वर्ग तो जो मैं कहता हूँ वही करता है और मानने लग जाता है की कमेरे वर्ग को आगे जो भी कहा जाएगा। वह उसे वैसा ही मानेगा और इसके रास्ते की दिशा भी मैं ही तय करूँगा। और दार्शनिक वर्ग, कमेरे वर्ग को मूर्ख समझने लग जाता है।
दार्शनिक वर्ग कमेरे वर्ग को उस दिशा में ले कर जाता है जहाँ पर रास्ता ठीक नहीं है। शुरुआत में कमेरा वर्ग बताता है कि यार मेरे को दर्द हो रहा है, मेरी सुन लो, यह रास्ता ठीक नहीं है क्योंकि मुझे दर्द हो रहा है। पर दार्शनिक वर्ग कहता है कि नहीं मेरे को दिखाई दे रहा है, यही रास्ता ठीक है। पर कमेरा वर्ग फिर भी चलता रहता है। कमेरे वर्ग के पैर धीरे धीरे लहूलुहान होने लगते हैं। फर्क ये आ गया कि अब जिसके पास दर्शन है और उसे कमेरे वर्ग का दर्द महसूस नहीं हो रहा। पर फिर भी वो उसे थोड़ा और आगे तक ढोता है।
एक परिस्थिति ऐसी आती है।  जहाँ पर कमेरे वर्ग को लगता  है कि मैं तो मर गया। और वो दार्शनिक वर्ग को अपने कंधों से उठाता है और  पथरीली और कांटों भरी जमीन पर पटक देता है। इसे कहते है, सामाजिक क्रांति। अब दोनों दर्द में जब कराहते हैं। तब एक नया दार्शनिक वर्ग खड़ा होता है। वो फिर दोबारा से एक वादा करता है की यार देखो इस बार मैं आपका ध्यान रखूँगा, इस बार आपको मैं गलत रास्ते में नहीं लेके जाऊंगा। और आपके सुख दुःख का ध्यान रखूँगा क्योंकि दोनों के पास सहयोग के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। समय का चक्र दोबारा शुरू हो जाता अपने आप को दोबारा दोहराने के लिए।
अगर हमें आगे बढ़ना है और समय के इस दुष्चक्र को तोड़ना है। तो हमें मिल जुलकर काम करना होगा। और यही एक रास्ता है। यही एक व्यवस्था है। तो मैं उस वर्ग को कहूंगा जिसके पास दर्शन है। एक बेहतर रास्ता चुनें। और वो एकमात्र बेहतर रास्ता है। ग्राम सभा के प्रति जागरूकता और ग्राम सभा का सशक्तिकरण। यही एक व्यवस्था है।
“गाम राम” एक देहाती सोच। है।
“गाम राम” की जय।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

ज्ञानवापी व्यास तलघर पर न्यायिक आदेश के मायने

अवधेश कुमार 

वाराणसी के ज्ञानवापी व्यास तलगृह या तहखाना में फिर से विधिपूर्वक पूजा पाठ शुरू होना कायदे से स्वागतयोग्य और राहतकारी घटना मानी जानी चाहिए। किंतु देश में कुछ लोग और संगठन हर हाल में झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखने पर उतारू हैं तो विवाद बिल्कुल स्वाभाविक है। कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने इसे इस तरह प्रस्तुत किया है मानो न्यायालय ने बिल्कुल गलत तरीके से हिंदू पक्ष की अपील को स्वीकार कर पूजा पाठ का आदेश दिया है। ज्ञानवापी मस्जिद वाकई मस्जिद ही था या आदि विश्वेश्वर का मूल स्थान इस पर न्यायालय में सघन बहस चल रही है। प्रदेश और विश्व भर में फैले भारतवंशी न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बावजूद क्या वाकई व्यास तहखाना में पूजा पाठ का आदेश जल्दीबाजी में दिया गया और  एकपक्षीय है?

जिन लोगों ने वाराणसी के जिला न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में ज्ञानवापी संबंधित मामलों की बहस पर दृष्टि रखी है उन्हें पता है कि इस एक सामान्य आदेश के लिए भी कितना परिश्रम करना पड़ा है। न्यायालय कभी बिना तथ्यों और साक्ष्यों के कोई आदेश नहीं दे सकता। ऐसा कोई आदेश देगा तो ऊपर के न्यायालय में वह निरस्त  हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार गठित होने तक ज्ञानवापी व्यास तलगृह में पूजा पाठ हो रही थी। अचानक उसे प्रशासन ने बंद कर दिया। क्यों बंद कराया इसका कोई उत्तर सरकार और प्रशासन के पास नहीं था। वास्तव में सरकार ने न कोई लिखित आदेश दिया और न कभी इसके बारे में कोई स्पष्टीकरण। हां, 15 अगस्त, 1993 को मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव का एक संबोधन था जिसमें वह कह रहे थे कि सांप्रदायिक शक्तियों पर नियंत्रण करना जरूरी था। सांप्रदायिक शक्तियों से उनका तात्पर्य उस समय उन हिंदू संगठनों से था जो अयोध्या में श्रीराम मंदिर आंदोलन में शामिल थे। 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी विध्वंस के बाद देश का माहौल ऐसा बना दिया गया था जिसमें सरकारें हिंदू धर्म स्थलों के विरुद्ध जाकर भी अल्पसंख्यकों में मुसलमान के हित के नाम पर कोई कदम उठाएं सबल प्रतिकार संभव नहीं था। गैर भाजपा दलों में इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा थी कि कौन कितना अल्पसंख्यकों या मुसलमान के पक्ष में तथा भाजपा,  संघ और अन्य हिंदू संगठनों के विरुद्ध जा सकता है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के कारण मुलायम सिंह यादव उस समय अल्पसंख्यकों के हीरो बने थे, क्योंकि उन्होंने इसके पूर्व कारसेवकों पर गोलियां भी चलवाई थी। प्रदेश के मुसलमानों का वोट पूरी तरह उनके पक्ष में ध्रुवीकृत था और इसीलिए कांग्रेस हाशिए में चली गई थी। इसमें मुलायम सिंह यादव सरकार ने कई फैसले किए जिनमें व्यास तहखाने के साथ मां श्रृंगार गौरी की पूजा अर्चना को प्रतिबंधित करना भी शामिल था।

सच यह है कि अगर ठीक से इसके विरुद्ध आवाज उठती तथा न्यायालय में उस समय भी मुकदमा लड़ा गया होता तो पूजा आरंभ हो जाता। पर वह समय ऐसा नहीं था कि कोई राजनीतिक दल इसके विरुद्ध आवाज़ उठाए या न्यायालय मेन प्रभावी लोग इस विषय को लेकर जाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि पर प्रतिबंध लगा चुका था। दूसरे छोटे बड़े हिंदू या सनातनी संगठनों में क्षमता नहीं थी कि वो सरकार के विरुद्ध उठ खड़े हों। अब समय बदल चुका है। लोग ऐसे मामलों को ढूंढ - ढूंढ कर सामने ला रहे हैं जिनके पीछे कोई मान्य कानूनी आदेश नहीं था या कानून और संविधान को परे रख आदेश दिए गए या विधान बनाए गए। 1991 पूजा स्थल कानून या फिर वक्फ संपत्ति कानून आदि का विरोध हमारे सामने है। स्वतंत्रता के बाद सात दशक से ज्यादा के कानूनी संघर्ष के बाद 2019 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अयोध्या मामले में मंदिर के पक्ष में दिए गए फैसले से लोगों को उम्मीद जगी कि अब अन्य ऐसे धर्म स्थलों के संदर्भ में भी न्याय होगा। इसलिए अब सारे मुकदमे प्रभावी तरीके से लड़े जा रहे हैं। वास्तव में सच्चाई तो यही है कि चाहे अयोध्या हो काशी या मथुरा या ऐसे कुछ अन्य क्षेत्र इन मामलों में मुस्लिम पक्ष का दावा हर दृष्टि से कमजोर है। आम सनातनी या हिंदू के संस्कार में यह है ही नहीं कि किसी दूसरे मजहब के मान्य स्थलों के विरुद्ध आवाज़ उठाए या उन्हें कब्जे में लेने की कोशिश करे। हमारे संस्कार में सभी पंथों, मजहबों को सम्मान देना, उनके प्रति श्रद्धा बनाए रखना शामिल है। इसलिए यह आरोप गलत है कि मस्जिदों या दूसरे धर्म स्थलों पर कब्जे की होड़ चल रही है। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं होगा जहां जबरन दूसरे धर्म स्थलों पर कब्जे की कोशिश हुई हो। अगर कोई ऐसा करता है तो देश उसके विरुद्ध उठ खड़ा होगा।

काशी और मथुरा का मामला बिल्कुल अलग है। अगर व्यास तहखाना पहले से पूजा अर्चना नहीं हो रही होती तो कोई न्यायालय जाता ही नहीं। यही बात मां श्रृंगार गौरी के संदर्भ में भी है। व्यास तहखाना में पूजा अर्चना अंग्रेजों के समय भी होती थी। जब-जब इस पर विवाद हुए, न्यायालयों में या सरकारी विभागों में मामले गए उनके भी दस्तावेज उपलब्ध हैं। जिला न्यायालय में वे सारे प्रस्तुत किए गए। सारे तथ्यों को देखकर ही न्यायालय ने 17 जनवरी, 2024 को वाराणसी के जिला अधिकारी को उस स्थान का रिसीवर नियुक्त किया। इसके आधार पर जिलाधिकारी ने 23 जनवरी को ज्ञानवापी परिसर को अपने कब्जे में लिया। जब न्यायालय ने पूजा पाठ का आदेश दिया तो उसको पूरा करने में कोई समस्या नहीं थी। कई सौ वर्षों से पूजा पाठ की कर्मकांडीय पद्धति विकसित है। व्यास परिवार में तलगृह के पूजा का उत्तराधिकारी विषय में पारंगत होता है। स्वाभाविक ही तालगृह में पूजा बंद होने के बालजूद अलग प्रतीक के रूप में उसी पद्धति से पूजा होती रही थी। इसलिए जैसे ही आदेश हुआ पूजा पाठ शुरू हो गया। इतनी जल्दी पूजा पाठ शुरू करने पर प्रश्न उठाने वाले नहीं जानते कि किसी स्थान को कब्जे में लेने के बावजूद  भक्त अपने तरीके से पूजा पाठ कहीं न कहीं जारी रखते हैं। साकार और निराकार दोनों उपासनाएं हमारे यहां मान्य हैं। अगर विग्रह साकार उपलब्ध नहीं है तो फिर ध्यान में उनको सामने लाना और पूजा करना सनातन में एक सामान्य स्थिति है। नए सिरे से केवल उस जगह की साफ- सफाई या विग्रहों का श्रृंगार भर करना था।‌ वर्षों से पूजा पाठ के लिए तरस रहे भक्तों के अंदर वेदना तो थी ही। वे पूरे भाव और संसाधन के साथ खड़े हो गए। चूंकि सनातन समाज अब अपने धर्म स्थलों को लेकर जागरूक व सतर्क है, इसलिए शेष व्यवस्थाओं में कहीं कोई समस्याएं नहीं आती।

इसमें आदेश को चुनौती देने की याचिकाएं ऊपर के न्यायालय स्वीकार कर सकते हैं किंतु सच्चाई से फैसला कोई न्यायालय नहीं दे सकता। जिस पूजा पाठ के लिए व्यास परिवार के पिछले कई सौ वर्षों के पूजआरइयओं के नाम तक उपलब्ध हैं उनको झुठलाने की कोशिश दिल दहलाने वाली है। आज की पीढ़ी को पूर्व में किए गए किसी अपराध के लिए दोषी नहीं माना जा सकता। किंतु इतिहास में जिनने ऐसे स्थलों पर कब्जा कर ध्वस्त कियामनमाना निर्माण कराया , कुछ संगठन और मजहबी या अन्य व्यक्ति उस पर इस दावा करते हैं या उनसे अपने को जोड़ते हैं तो यह हर भारतीय के लिए क्षोभ और चिंता का विषय बनता है। काशी और मथुरा के मामले को गलत दिशा देने के दुष्प्रयास हो रहे हैं। व्यास तलघर में पूजा आरंभ होने के बाद हिंदुओं या सनातनियों की उमड़ती भाव विह्वल भीड़ समझ में आती है। इनमें अनेक की आंखों से छलकते हुए आंसू कोई भी देख सकता है। इसके समानांतर भारी संख्या में वहां अलग-अलग जगहों से नमाज के लिए लोगों को एकत्रित करना दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के दुरगामी हित में यही है कि न्यायालय में मामले हैं तो उनके आदेश को स्वीकार करने का संस्कार सभी विकसित करें। इन स्थलों के हो रहे सर्वे और न्यायालयों के आदेश बता रहे हैं कि अतीत में मजहब के आधार पर कुछ ऐसे बड़े अपराध और अन्याय हुए जिनका परिमार्जन आवश्यक है।

अवधेश कुमार, ई -30, गणेश नगर, पांडव नगर कम्प्लेक्स , दिल्ली -110092,  मोबाइल -981102 7208

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