बुधवार, 31 जनवरी 2024

नीतीश जी लें सम्मानजनक विदाई

अवधेश कुमार 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब राजभवन में अपना त्यागपत्र सौंपने जा रहे थे तो वहां किसी तरह की कोई हलचल नहीं थी। आम जनता की तो छोड़िए यहां उनकी पार्टी जनता दल - यू का भी कोई कार्यकर्ता झंडा लेकर उनका स्वागत करने या उनके पक्ष में नारा लगाने के लिए नहीं था। जिस राष्ट्रीय जनता दल से वे गठबंधन तोड़ रहे थे उसका भी कोई वहां विरोध करने के लिए नहीं था। पत्रकारों पर आम लोगों तक समाचार पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है इसलिए वे वहां उपस्थित थे। अगर पत्रकार वहां नहीं होते तो लगता ही नहीं कि कोई मुख्यमंत्री वाकई त्यागपत्र देने जा रहा है। यह स्पंदनहीन स्थिति ही प्रमाणित करती है कि एक समय सुशासन बाबू का विशेषण पाने वाले नीतीश कुमार ने अपनी भूमिका से स्वयं की कैसी दयनीय अवस्था बना लिया है।

इसमें सामान्य राजनीति तो यही होती कि नीतीश दूसरे दलों के साथ अपने दल में भी अकेले पड़ जाते। किंतु 2013 से वह जब चाहे गठबंधन तोड़ते हैं और दूसरा पक्ष उनका साथ लेने के लिए तैयार रहता है। वे फिर दूसरे पक्ष को छोड़ते हैं और पहला पक्ष उनके साथ आ जाता है। सन् 2005 से बिहार में सत्ता के शीर्ष केंद्र बिंदु वही है। वास्तव में वह अगर स्वयं पलटी मारते हैं तो दूसरे को पलटवाते भी हैं। पलटने और पलटवाने का यह चक्र ऐसा हो गया है जिससे समान्य व्यक्ति के अंदर नीतीश कुमार की राजनीति को लेकर एक ही भाव पैदा होता है, वह है जुगुप्सा का। बावजूद अगर वह राजनीति में आज भी स्वीकार्य हैं तो इसे उनका राजनीतिक कौशल कहें या वर्तमान विशेषकर बिहार की राजनीति की विडंबना। अब यह बताने की भी आवश्यकता नहीं कि नीतीश और आज भी हृदय से उनके साथ बने हुए नेताओं की न कोई विचारधारा है, न सिद्धांत, न उनकी राजनीति के किसी भी मान्य व्यवहारों के प्रति प्रतिबद्धता ही। वे जिसको छोड़ेंगे उसकी आलोचना करेंगे और यह भी कहेंगे कि दोबारा लौटकर उनके साथ नहीं आऊंगा। अगली बार फिर जिनके साथ जाएंगे उनकी आलोचना करेंगे और यही कहेंगे। अगस्त, 2022 में जब वह भाजपा को छोड़ राजग गठबंधन के साथ गए तो उन्होंने कहा कि मैं मर जाऊंगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं आऊंगा। तो क्या यह मान लिया जाए कि अब उन्होंने मृत्यु को प्राप्त कर पुनर्जन्म लिया है? बिहार के दोनों मुख्य दलों भाजपा और राष्ट्रीय जनता दल उनकी आलोचना सुनकर और स्वयं घोषणा कर कि अब उनके लिए दरवाजे बंद है, फिर दरवाजे खोल देते हैं। राजनीति में रुचि रखने वाले देश के लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा?

सच कहूं तो बिहार और संपूर्ण देश की राजनीति की तस्वीर ऐसी है जिसमें किसी न किसी कारण से पलटने और पलटवाने के चक्र को गति मिल जाती है। इस समय की स्थिति देखिए, सामने लोकसभा चुनाव है और विपक्ष भाजपा के विरुद्ध एकबद्ध होने की कवायद कर रहा है। इस समय भाजपा का मुख्य लक्ष्य स्वाभाविक ही किसी तरह विपक्ष कमजोर करना तथा लोकसभा चुनाव में बड़ी विजय प्राप्त करना है। नीतीश कुमार को अस्वीकार करने के तीन परिणाम आते।  एक, बिहार में लालू प्रसाद यादव परिवार के नेतृत्व में राजद गठबंधन की सरकार बनती। दूसरा, बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू होता, या तीसरा, हारकर नीतीश कुमार फिर राजद गठबंधन के भाग होते। ये तीनों स्थितियां भाजपा के लिए प्रतिकूल होती।  राजद के साथ नीतीश की सरकार के बने रहने का अर्थ आईएनडीआईए गठबंधन का जीवित रहना होता। यह स्पष्ट है कि राजद ने अंतिम समय तक सरकार बनाने की कोशिश की। अगर नीतीश को भाजपा समर्थन नहीं देती तो उन्होंने जिस लचर अवस्था में अपने दल को पहुंचा दिया है उसमें उनके विधायक छोड़कर राजद के साथ जा सकते थे। चूंकि नीतीश कुमार ने ही विपक्षी एकता की शुरुआती कोशिश की और उन्हीं के प्रयासों से बिहार की राजधानी पटना में ज्यादातर विपक्षी दल एक साथ बैठे, इसलिए उनके अलग होने के बाद आम आदमी भी यही मानेगा कि आईएनडीआईए खत्म हो गया। राजनीति में इससे बढ़िया मुंहमांगा अवसर और कुछ हो ही नहीं सकता। यह स्थिति नहीं होती तो शायद भाजपा इस बार उनकी पलटी को अपने समर्थन की ताकत नहीं देती। हालांकि अयोध्या की आभा ने बिहार के वातावरण को बदला है और नीतीश सहित दूसरी पार्टियां और दल भी उससे प्रभावित हुए।

राजनीति की त्रासदी देखिए। 2005 से 2014 तक बिहार की जनता ने राष्ट्रीय जनता दल और लालूप्रसाद यादव परिवार को पांच बार पराजित कर दिया। लालू परिवार के एक-एक सदस्य चुनाव हार गए। राजद विधानसभा में 22 सीटें और 18 प्रतिशत मत तक पार्टी सीमित हो गई। विपक्ष की रिक्तता में यह संभावना बनी कि बिहार में भाजपा और जद- यू के समानांतर कोई नई राजनीतिक शक्ति खड़ी होगी। नीतीश कुमार ने अपनी तथाकथित सेक्युलर राजनीति में नरेंद्र मोदी विरोधी राष्ट्रीय चेहरा बनाने की मानसिक ग्रंथि के कारण बिहार की सकारात्मक राजनीतिक संभावना को उदित होने के पहले ही ग्रहण लगा दिया। अगर नीतीश ने नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए भाजपा का साथ छोड़कर राजग के साथ गठबंधन नहीं किया होता तो इस पार्टी का पूनर्उद्भव की कोई संभावना नहीं थी। परिणाम देखिए इस समय राजद विधानसभा में बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है और नीतीश कुमार की जद-यू तीसरे नंबर की। हालांकि पहली बार भी नीतीश कुमार राजद के साथ 2 वर्ष से ज्यादा नहीं चल सके। उन्हें इस बात का अनुभव हो गया था कि लालू प्रसाद यादव परिवार के साथ मुख्यमंत्री की अथॉरिटी का पालन करते हुए सरकार चलाना असंभव है। उनकी पार्टी मंडलवादी होते हुए भी राजद के साथ असहज थी।बावजूद अगर दूसरी बार उन्होंने यही किया तो इसे भूल नहीं अपराध मानना चाहिए। उन्होंने पिछले दिनों विधानसभा में पति-पत्नी संबंधों पर दिए गए वक्तव्य को लेकर कहा कि मैं स्वयं अपनी निंदा करता हूं। इसी तरह उन्हें अपने इस राजनीतिक अपराध की सजा देने की स्वयं तैयारी करनी चाहिए । वे कह रहे हैं कि कुछ ठीक नहीं चल रहा था और इसीलिए हमने बोलना भी बंद कर दिया था। तो क्या ऐसा पहली बार हुआ? 

बिहार की जनता ने आपकी गलतियों को ठुकरा कर फिर से भाजपा जदयू को बहुमत दिया। हालांकि आपसे नाराजगी थी तभी जदयू की सीटें 43 तक सिमट गई। इस भावना को समझते हुए अगर वो सरकार चलाना जारी रखते तो बिहार की राजनीति इस तरह दयनीय तस्वीर नहीं बनती। तेजस्वी यादव ने अपने सधे हुए वक्तव्य में भी कहा है कि 2024 में ही उनकी पार्टी खत्म हो जाएगी।  इतना सच है कि नीतीश कुमार की  मानसिक अस्थिरता के कारण उनकी पार्टी ही दिल से उनके साथ नहीं थी और वैचारिक रूप से पार्टी का बहुमत उनसे अलग हो चुका था। अस्वाभाविक गठबंधन में जाने के कारण उनका मानसिक संतुलन कितना गड़बड़ हो गया था इसके प्रमाण उनके वक्तव्यों और व्यवहारों से लगातार मिलने लगा था। अनेक गंभीर विश्लेषकों ने भी कहना शुरू कर दिया था कि नीतीश कुमार को अब पद से अलग कर मानसिक उपचार के लिए तैयार किया जाना चाहिए । त्यागपत्र देने एवं नए सिरे से शपथ ग्रहण करने पर लंबे समय बाद उनके चेहरे पर हंसी दिखाई दी। उम्मीद करनी चाहिए कि अब यह हंसी बरकरार रहेगी और आगे जब तक शासन में हैं, सकारात्मक राजनीति करेंगे । भाजपा के लिए आवश्यक है कि एक ओर नीतीश कुमार को सम्मानपूर्वक विदाई का रास्ता तैयार करे तो दूसरी ओर पार्टी को अपने पैरों पर खड़ा करे। 

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साथ जो वातावरण संपूर्ण देश और बिहार में बना है उसमें यह कार्य कठिन नहीं होगा। यह बदला हुआ वातावरण ही है जहां शपथग्रहण समारोह में जय श्रीराम के नारे तो लगे लेकिन नीतीश जिंदाबाद के नहीं । नीतीश के लिए भी एक ही रास्ता है कि वे सम्मान के साथ स्वयं को बिहार के नेतृत्व से आने वाले समय में अवसर तलाश कर अलग करें।

साम्यवाद: अराजकता और अशांति का पूरक

सिद्धार्थ पाराशर

साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसे सरल शब्दों में समझे तो यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो वर्गविहीन हो, जिसमें निजी आधिपत्य न हो, न कोई जाति व्यवस्था हो समाज में केवल एक जाति मानवता हो, समाज मे उत्पादन सामूहिक तरीक़े से हो, व्यक्ति पर किसी भी प्रकार की कोई पाबंदी न हो, राज्य की तरफ से कोई अंकुश न हो तथा समाज राज्यविहीन। पहली नजर में तो यह विचारधारा देखने में सभी को आकर्षित करती है। अब यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इतनी  लोक लुभावन विचारधारा होने के बावजूद भी आज इसका अस्तित्व शून्य क्यों है? क्योंकि वास्तव में साम्यवादी सरकारों और इस विचारधारा के समर्थकों ने समाज में जितनी हिंसा और अशांति फैलाई है उतनी हिंसा शायद ही किसी अन्य तानाशाही सरकार ने की होगी। विश्व में जहाँ भी साम्यवादी सरकारें बनी उन्होंने सबसे अधिक जिस चीज पर अंकुश लगाया वो है "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता", सभी सरकारों के कार्यकाल में सबसे अधिक नरसंहार हुए और चीजों को छुपाया गया।

अक्टूबर क्रांति जिसमें असंख्य लोगों ने अपनी जान गँवायी और जारशाही का पतन हुआ फिर लेनिन ने रूस में साम्यवादी सरकार की नींव रखी। सत्ता हासिल करने के बाद लेनिन ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए एक बड़ी सेना का गठन किया और फिर जिसने भी उसके विरुद्ध आवाज उठाई उसका दमन किया। इसमे सबसे अधिक दमन उसी सर्वहारा समाज का हुआ जिसको लेनिन ने सबसे अधिक सपने दिखाए थे, सत्ता को बचाने के इस खेल में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई। 9 अगस्त 1918 को लेनिन ने सामूहिक रूप से अपने 100 विरोधियों को फाँसी दी। इसके कुछ महीने बाद ही उसने एक गुप्त सेना"चेका" बनाई, उसके सैनिकों ने एक बार में 800 किसानों की हत्या कर दी थी। इनका एक ही कार्य था लेनिन के खिलाफ उठी आवाज को खत्म करना। एक आकड़े के अनुसार 1918-1922 के बीच लेनिन के सैनिकों द्वारा 2 लाख लोगों की हत्या कर दी गयी थी ये वही लोग थे जिन्होंने सेना को अनाज नहीं दिया था।

1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन ने सत्ता संभाली। स्टालिन अर्थात वह इंसान जिसका हृदय इस्पात (स्टील) का बना हो, वो अपने नाम की भाँति ही कठोर था। स्टालिन ने सत्ता हासिल करने के लिए अपनी ही पार्टी के लोगों का दमन किया। सत्ता हासिल करने के बाद अपने खिलाफ उठी हर आवाज को समाप्त करना उसकी फितरत थी। उसने मजदूर संघ, सरकार के सभी विभागों, कला और साहित्य को अपने अधीन किया ताकि कोई उसके विपरीत चीजों को प्रदर्शित न कर सके। 1932-1939 के बीच उसके गलत फैसलो के कारण अकाल पड़ा और 7 लाख से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।  सोवियत संघ मे कारखानों के विकास के लिए स्टालिन एक बड़ा टारगेट देता था जिसे पूरा ना करने पर देश का दुश्मन कह कर जेल में डाल देता था। आवाज उठाने पर पार्टी के सेंट्रल कमेटी के 139 में से 93 लोगों को मरवा दिया, सेना के 103 जनरल और एडमिरल में से 81 को मरवा दिया। शासनकाल में साम्यवाद का विरोध करने पर तीस लाख लोगों को ज़बरदस्ती साइबेरिया के गुलाग इलाक़े में रहने के लिए भेज दिया गया था एवं क़रीब साढ़े सात लाख लोगों को मरवा दिया गया था। उसके गलत नीतियों के कारण 50 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई।

माओ त्सेतुंग साम्यवाद के एक महत्वपूर्ण विचारक जिसने मार्क्सवादी तथा लेनिनवादी दोनों विचारों को सैनिक नेतृत्व से जोड़कर एक नए विचार माओवाद का प्रतिपादन किया। माओ की नीतियों के कारण कई बार चीन की जनता को अपनी जान गँवानी पड़ी जिसमे सबसे महत्वपूर्ण नीति थी 1958-1962 के दौरान की ग्रेट लीप फॉरवर्ड और साँस्कृतिक क्रांति नामक राजनैतिक और सामाजिक नीति जिसके कारण देश में भयंकर अकाल पड़ा और इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में लाखों चीनी लोगों की मौत हुई । फोर पेस्ट कैम्पेन इसी का एक भाग था जिसमें 4 जीवों(मच्छर, मक्खी, चूहा और गौरैया) को मारना था जिसका दाव उल्टा पड़ा और पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ा जिसके कारण पेस्टिसाइड्स की मात्रा में भारी वृद्धि हुई और फसलों का नुकसान हुआ परिणामस्वरूप 1 करोड़ 50 लाख से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी।

ऐसे ही यदि चीन के एक और घटना की चर्चा करें जिसमे साम्यवादी सरकार ने जनता की स्वतंत्रता की धज्जियाँ उड़ा दी थी, 4 जून 1989 के चीन के राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का दमन। प्रदर्शन को दबाने के लिए चीन की सरकार ने पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) को उतार दिया था। सेना ने गोली बारूद के द्वारा इस प्रदर्शन को समाप्त किया, इस प्रकरण में 10 हज़ार से अधिक लोगों की जान गयी। आज भी सरकार ने इस प्रकरण से संबंधित किसी भी लेख, डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने लोकतंत्र की प्रतिमा को थियानमेन चौक पर स्थापित की थी, जिसे सरकार ने हमेशा के लिए हटा दिया। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करें तो चीन में प्रेस सरकार के अधीन है और हाल ही में Reporters Without Borders नाम की एक संस्था ने बताया है कि चीन में प्रेस की स्वतंत्रता का परिदृश्य काफी चिंतनीय है और उसने चीन को नीचे से चौथे स्थान पर जगह दी।

सलोथ सार जिसे पॉल पॉट के नाम से जानते है ने 1975 के मध्य में कंबोडिया में एक साम्यवादी सरकार का गठन किया तथा 1976-79 के मध्य कंपूचिया का प्रधानमंत्री रहते हुए कंबोडिया को शुद्ध करने का प्रयास किया जिसके कारण 17 से 25 लाख लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा । उसने सामूहिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए जबरन लोगों को शहरो से गाँवों की ओर धकेला और बेगार की परियोजनाओं में कार्य करने के लिए बाध्य किया।  इस दास श्रम, कुपोषण, मूलभूत सुविधाओं की कमी, खराब चिकित्सा व्यवस्था और भारी मात्रा में मृत्यु दंड के कारण कंबोडिया की लगभग 21% आबादी को अपनी जान गँवानी पड़ी थी।

इन सभी बातों का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि हर बात पर संविधान की दुहाई देने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को पहले ये जानना होगा कि वो जो बार-बार संविधान खतरे में है, आजादी अभी अधूरी है, तानाशाही, लोकतंत्र खतरे में है जैसी तमाम बातें किस हक से बोलते है जबकि वे जिसे अपना आदर्श मानते हैं उन्होंने लोकतन्त्र और जनता के फैसलों का दमन सबसे अधिक किया है। मतलब पाखंड की भी सीमा होती है। खैर चीजों को नकारना, अस्वीकरना साम्यवाद की पुरानी आदत रही है। सभी बातों से यह अवश्य ही कहा जा सकता है कि साम्यवाद अशांति और अराजकता की जननी है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में परास्नातक में अध्ययनरत हैं।)


मंगलवार, 30 जनवरी 2024

दिल्ली गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन (DGHMOWA) के जनरल बॉडी के चुनाव हुए

नई दिल्ली(संवाददाता)। दिल्ली गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन (DGHMOWA) का वर्ष 2024-2026 के लिए आज दिनांक 28 जनवरी 2024 को जनरल बॉडी इलेक्शन हुआ।
जिसमें सर्व सहमति से डॉ बाबू लाल मीणा को अध्यक्ष, डॉ देवेंद्र सिंह सोलंकी को उपाध्यक्ष, डॉ राम कुमार को जनरल सेक्रेटरी, डॉ कोमल शर्मा को जॉइंट सेक्रेटरी एवं डॉ सईद अक्खतर को ट्रेजरार नियुक्त किया गया। इसके अतरिक्त अन्य बारह डॉ को एग्जीक्यूटिव मेंबर की शपद दिलाई गई। यह संस्था दिल्ली सरकार के अधीन कार्यरत समस्त सरकारी डॉक्टर्स के वेलफेयर के लिए कार्य करती है।
आज निवर्तमान समस्त सदस्यों का चयन एक इलेक्शन कमेटी जिसका नेतृत्व डॉ साहू, डॉ प्रशांत, डॉ रवि, डॉ अमित, डॉ शिरीन आदि कर रहे थे, की उपस्थित एवमं अन्य डॉक्टर्स की देखरेख में हुआ।

रविवार, 28 जनवरी 2024

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत हादसा या हत्या, परिवार ने हत्या की आशंका जताई

असलम अलवी

बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में स्थित एक घर के कमरे में दंपति समेत पांच लोगों के शव रविवार को संदिग्ध हालात में मिले हैं। सभी शव जले हुए थे। हैरत की बात यह है कि कमरे के बाहर ताला लगा हुआ था। परिवार के लोगों ने हत्या की आशंका जताई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संबंधित अधिकारियों को इस घटना की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं।

आईजी डॉ० राकेश सिंह और एसएसपी घुले सुशील चंद्रभान ने मौके पर पहुंच कर जांच पड़ताल की। एसएसपी चंद्रभान ने पत्रकारों को बताया कि हलवाई का काम करने वाला अजय कुमार गुप्ता उर्फ टिंकल (35) किराये के मकान में पत्नी अनिता (32), बेटे दिव्यांश (09) एवं दक्ष (03) और बेटी दिव्यंका (06) के साथ रहते थे। स्थानीय लोगों ने रविवार सुबह देखा कि अजय के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है और कमरे से धुआं निकल रहा है। इस पर उन्होंने फौरन पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने दरवाजा तोड़कर देखा तो कमरे में पूरा धुआं भरा हुआ था और पांच शव जले पड़े थे। इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

 इधर घटना की जानकारी पर पहुंचे परिवार के लोगों ने हत्या की आशंका जाहिर की है। एसएसपी चंद्रभान ने बताया कि फिलहाल पुलिस घटनास्थल का जायजा लेकर आग लगने के कारणों का पता लगा रही है। सभी शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

क्या चुनावी वर्ष के बजट मे सार्वजनिक उपक्रमो को मिलेगी राहत

बसंत कुमार
कुछ दिन पूर्व हमारे एक मित्र का चयन भारत सरकार के एक उपक्रम मे प्रबंध निदेशक के रूप मे हो गया और सारे मित्र बहुत प्रसन्न हुए और सब ने कहा इस अवसर पर एक ग्रैंड पार्टी तो बनती हैं पर हमारी मित्र मंडली मे अर्थ शास्त्र के जानकर सदस्य ने बता कर कि यह उपक्रम घाटे मे चल रहा है और स्टाफ को कई महीनों से पूरा वेतन नही मिल रहा है, यद्यपि हमे अपनी मित्र की क्षमता और दक्षता पर पूरा भरोसा है कि वे अपनी मेहनत और दूर दर्शित से कम्पनी को इस स्थिति से निकाल लेंगे। पर इस घटना क्रम से हमे चर्चा करने का मुद्दा मिल गया कि इस प्रति स्पर्धि युग मे सरकारी उपक्रमो की प्रसंगीकता क्या है और जो सरकारी उपक्रम इस समय घाटे मे चल रहे है और देश का चुनावी वर्ष का बजट जो फरवरी 2024 मे आने वाला है तो क्या मोदी सरकार इन उपक्रमो को पटरी पर लाने के लिए विशेष सहायता राशि देकर कोई सकरात्मक कदम उठायेगी।
जैसा कि हम सभी जानते है देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो ने अपनी स्थापना के बाद से देश के उच्च विकाश और समान समाज और आर्थिक विकास प्राप्त करने के उद्देश्य को साकार करने मे महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है। देश के आर्थिक और आर्थिक विकास मे उनका निरंतर योगदान वैश्वीकरण की वर्तमान परिस्थितियों में और भी अधिक प्रासंगीक हो गया है, कुछ दिन पूर्व सरकार की ओर से  घाटे मे चल रही सार्वजनिक उपक्रमो का घाटा कम करने के लिए कहा गया कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है और सरकार का प्रयास रहता है कि इन कंपनियों की स्थिति को कैसे सुधारा जाए। यद्यपि इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि सरकार सरकारी उपक्रमो का घाटा कम करने और विनिवेश को बढ़ाने हेतु पी पी पी मॉडल के तहत उनकी हालत सुधारने का प्रयास कर रही है जैसा की पिछले कुछ वर्षो मे भारतीय रेल को पी पी पी मॉडल के सहारे लाभकारी लाभकारी संस्थान बनाने मे सफलता मिली है वही कुछ उपक्रमो को वित्तीय सहायता देकर फिर से खड़ा करने के प्रयास किये जा रहे है।
हाल में सरकार ने निर्णय किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उप क्रमो की संख्या कम करने और निजी क्षेत्र कर लिए अवसर खोले जाए ऐसे निर्णय ने देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो की प्रसागिकता पर ही बहस छेड़ दी है अगर हम भारत के औद्योगिक विकाश पर नजर डाले तो पाएंगे कि सार्वजनिक उपक्रमो ने अर्थ व्यवस्था के साथ साथ उद्योगों के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान किया है, इसके अलावा सार्वजनिक उप क्रमो ने को सामाजिक अपेक्षा के साथ स्थापित किया गया था और उनका एक मात्र उद्देश्य लाभ कामना नही अपितु इनका दायित्व देश के लिए अर्थ व्यवस्था हेतु एक ढांचा तैयार करना था जो उन्होंने किया इसके अतिरिक्त इनकी स्थापना के और भी लाभ है।
1-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम औपचारिक क्षेत्र मे रोजगार उत्पन्न करते है और उनके द्वारा निर्मित रोजगार स्थायी और सुरक्षित होते है वही निजी कंपनियों के द्वारा मुहैया किये गए रोजगारो की कोई गारंटी नही होती और अधिकांश रोजगार संविदा पर होते हैं और कब उन्हे हटा दिया जाए पता नही होता।
2-स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शुरु के दशकों मे संपत्ति के निर्माण में सार्वजनिक उपक्रमो का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है, खासकर उन क्षेत्रों में जहा निजी क्षेत्रों द्वारा निवेश को उच्च जोखिम और कम रिटर्न वाला माना जाता हैं।
3- वैश्विक विस्तार के क्षेत्र मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो का योगदान महत्व पूर्ण रहा है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम काफी समय से ही मध्य पूर्व, अफ्रिका, यूरोप, एशिया, लैटिन अमेरिका और उत्तरी अमेरिका जैसे क्षेत्रों मे दुनिया भर मे मौजूद हैं और आज भी सर्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो को वैश्विक विस्तार की जबरजस्त संभावनाये है ऐसे मे उन सरकारी उपक्रमो जो घाटे मे चल रहे हैं उन्हे वित्तीय समर्थन देकर खड़ा करने की जरूरत है। इन कंपनियों को सीधे सीधे बन्द करके निजी क्षेत्र को दे देना बिल्कुल अनुचित है, इसके लिए सरकार को अन्य वैकल्पिक उपायों पर सोचने की अवश्यकता है जिससे ये उपक्रम अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सके।
घाटे मे चल रहे उपक्रमो को को पटरी पर लाने के लिए निम्न विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए-
1- जिन उपक्रमो मे आम आदमी की जीविका और रोजगार की जरूरते पूरी होती है उन उपक्रमो को विशेष आर्थिक ग्रांट देकर पुन: खड़ा किया जाना चाहिए जैसे वर्ष 1956 मे स्थापित सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि जो घाटे मे चल रही है की पुनर्स्थापना की स्थापना इसलिए आवश्यक है क्योकि इसके द्वारा कश्मीर, भदोही और प्रधानमन्त्री जी की लोक सभा वाराणसी के बुनकर  व गलीचा (कालीन) बनाने के काम मे लगे कारीगरों की रोजी रोटी चलती है।
2- सरकारी उपक्रमो पर घोषित नीति पर सरकार को पुन: विचार करने की अवश्यकता है, इन सरकारी उपक्रमो को एक पेसेवर बोर्ड द्वारा संचलित करके पुन: खड़ा किया जाना चाहिए यानो इन सार्वजनिक उपक्रमो को पी पी पी मॉडल के तहत संयुक्त उद्यम के रूप मे भी चलाया जा सकता है!
3- सार्वजनिक उपक्रमो के भविष्य के विकाश के लिए कुछ मानव कल्याण के प्रमुख उद्यमो को चिंहित कर तत्काल सहायता प्रदान करने की अवश्यकता है,
कहने का तात्पर्य यह है कि देश की अर्थ व्यवस्था के विकाश, मानव कल्याण, रोजगार मुहैया कराने के क्षेत्र में मे सार्वजनिक उप क्रमो ने बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही उदारीकरण, निजीकरण, वैश्विक रण की ओर बढ़ते विश्व मे सार्वजनिक उपक्रमो को कम किये जाने की नीति बहुत हानिकारक है, इसलिए सरकार को चाहिए कि आँख मूंद कर इन उपक्रमो को बंद करने के बजाय इन्हे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाये।
कहने को तो हम विश्व की पांचवे नंबर् की आर्थिक महाशक्ति है और अपने पिछले नौ वर्षो के कार्यकाल में मोदी सरकार ने आर्थिक विकास के क्षेत्र मे और इंफ्रास्ट्रॅक्चर, विकसित करने मे आभूत पूर्व हासिल की है पर वही टेक्सटाइल सहित अनेक सेक्टरों मे कई उपक्रम घाटे मे चल रहे है और कई उपक्रमो मे कर्मचारियो को कई माह से वेतन न मिलना दुर्भाग्य पूर्ण है ऐसे में सरकार को एक वेलफेयर स्टेट की तरह अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए चुनाव वर्ष के आखिरी बजट मे पर्याप्त फंड देकर सुचारु रूप से काम करने और मुनाफा कमाने का अवसर देना चाहिए जिससे ये संस्थान भी निजी क्षेत्र के मुकाबले कड़ी स्पर्धा पेश कर सके। माना कि अर्थ व्यवस्था के विकाश मे निजी क्षेत्र की महत्व पूर्ण है।

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