मंगलवार, 9 जनवरी 2024
उपराज्यपाल ने नए भर्ती किए गए 398 सरकारी कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र सौंपे
सोमवार, 8 जनवरी 2024
डायरेक्टर प्रियदर्शन के साथ मैं 'जय श्री राम' कर रहा हूँ: गगनदीप सिंह डिडयाला
दिसंबर
में अयोध्या में रियल लोकेशन पर शूट करने के बाद अब फिल्म का बाकी शूट
गगनदीप सिंह डिडयाला टीम के साथ केरल में करेंगे। वर्तमान में फिल्म का
शूट रामोजी फिल्म सिटी हैदराबाद में चल रहा है जहाँ पर बाबरी मस्जिद का सेट
लगाया गया है। इसके बाद कुछ दिन नोएडा में भी शूट करेंगे। यूनिट दिसंबर
में ही लखनऊ की कई लोकेशन जैसे कि लखनऊ यूनिवर्सिटी, केकेसी कॉलेज, कुड़िया
घाट जैसी अन्य लोकेशन पर शूट कर चुकी हैं।
इम्तियाज
अली, रंजन चंदेल, तरुण डुडेजा, सृष्ठा गुहा ठाकुर्ता जैसे इंडस्ट्री के
नामचीन डायरेक्टर्स के साथ काम कर चुके गगनदीप सिंह डिडयाला बताते हैं कि
प्रियदर्शन के साथ काम करना उनके लिए बहुत ही सौभाग्य और खुशनसीब की बात
है। गगनदीप बताते हैं कि प्रियदर्शन बहुत ही सौम्य और सरल स्वभाव के
डायरेक्टर हैं वह सीन को बहुत अच्छे से समझते हैं और अपने नज़रिए को एक्टर
के सामने बहुत ही स्पष्ट और सुलझे हुए तरीके से सामने रखते हैं जिससे कि
कलाकार उस सीन को पर्दे पर बहुत ही नेचुरल तरीके से उतार देता है। गगनदीप
कहते हैं कि हमें पूरा विश्वास है कि यह सीरीज सिर्फ नॉर्थ के लोगों को ही
नहीं बल्कि पूरे देश और पूरा विश्व, जो लोग राम से प्यार करते हैं उनको
बेहद पसंद आएगी। प्रमुख बाद यह है कि ये सीरीज किसी एक मजहब की तरफ झुकाव
की सीरीज नहीं है। हमारे लेखक तुषार उपरीति ने इसे बहुत ही प्यारे ढंग से
लिखा है और यह सीरीज मजहबी एकता का प्रतीक सिद्ध होगी जो की सभी धर्मों को
एकजुट करेगी।
रविवार, 7 जनवरी 2024
नामी डोगरी संस्था ने पर्यावरण पर विशेष बहुभाषी कवि गोष्ठी का किया आयोजन
शुक्रवार, 5 जनवरी 2024
हिट एंड रन के नये कानून के विरोध मे राजनीति
हिट और रन के नये कानून के खिलाफ पूरे देश में कुछ दिनों से चल रही हड़ताल दिल्ली सहित पूरे देश मे महसूस की जा रही है, देश भर मे ड्राई वरो के विरोध प्रदर्शन और हड़ताल के कारणों से कई शहरों मे पेट्रोल और डीजल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। देश की राजधानी दिल्ली मे भी लोगो को पैनिक मे डाल दिया है और लोग ऐसी स्थिति से उबरने के लिए पेट्रोल पम्पो पर लंबी लाइन लगाए खड़े है, इससे डीजल पेट्रोल की खपत मे (जमा खोरी) बढ़ने की आशंका है, यही नही इस नये कानून के कारण ड्राईवर काम छोड़कर भाग रहे है यद्यपि ड्राईवर के संगठनो ने अभी हड़ताल की घोषणा नही की है। फिर भी ड्राईवरो की हड़ताल का असर अब बाजारों पर दिखने लगा है, स्थिति यह है कि चावल से लेकर दाल समेत सभी खद्यानो की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दिल्ली मे नया बाजार से लेकर सदर बाजार नरेला अनाज मंडी में रोजाना सैकड़ो ट्रक अनाज लेकर आते है लेकिन ट्रक ड्राई वरो की हड़ताल की वजह से कई मंडियों मे सप्लाई ठप हो गयी है, गल्ला व्यापारियों की शिकायत है कि हड़ताल की वजह से उनका लाखों का माल अटका हुआ है और पुराना स्टाक भी खत्म होने वाला है यदि सप्लाई की स्थिति यथा शीघ्र समान्य नही हुई तो बाजार मे दिक्कत आने की पूरी संभावना है।
आखिर हिट एंड रन के मामले मे कानून मे ऐसा क्या बदलाव हुआ है कि ड्राईवरो को हड़ताल पर जाना पड़ा है और वे जगह जाम कर रहे है. भारतीय दण्ड संहिता की नयी धारा 106(2) के तहत की लापरवाहि या तेज गाड़ी चलाने से किसी की मौत हो जाती है और चालक बिना पुलिस/ मजिस्ट्रेट को बिना सूचना दिये भाग जाता हैं तो ड्राईवर को 10 साल की कैद और सात लाख का जुर्माना लगाया जाता है, इस नये कानून से ड्राई वरो को यह चिंता है कि हादसे के बाद यदि वे मौके पर पाए गए तो भीड़ की हिंसा का शिकार हो सकते हैं और ड्राईवरो की आय इतनी नही होती की इतना अधिक जुर्माना भर सके। लापरवाही से से गाड़ी चलाने से मौत के कारण दी जाने वाली सजा के पहले के कानून के बारे मे जानना आवश्यक है। पहले भारतीय दण्ड संहिता की धारा 279 के तहत लापर वाही से गाड़ी चलाने और 304( ए) के तहत लापरवाही से ड्राइविंग से मौत और धारा 338 के तहत जान जोखिम मे डालने से केश होता था और अधिक तम सजा दो वर्ष की होती थी पर अब यह मामला राजनीतिक हो गया है, गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी हादसे के बाद यदि हालात विपरीत है तो आरोपी गाडीवाला कुछ दूर जाकर सूचना दे सकता है या पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर सकता हैं और पुलिस की जांच मे सहयोग करेगा तो ऐसे मामलों मे केश 10 साल नही अधिकतम, 5 साल वाली सजा मे दर्ज होगा, फिर भी कांग्रेस ने हड़ताल के समर्थन में उतरने का फैसला किया है। इस मामले में राजनीतिक दल राजनीति कर रहे है और इस हड़ताल के कारण मात्र दो दिनों में 10 राज्यो मे, 2000 से अधिक पेट्रोल पंप सूखे पड़े हैं,
प्रश्न यह है कि सरकार ने हिट एंड रन मामले में कानून बना कर इतनी सख्त सजा क्यो कर दी कि ड्राईवरो को हड़ताल पर जाना पडा, इसकी दोषी अपरोक्ष रूप से सरकार ही है, कुछ वर्षो पहले सरकार ने कानून मे बदलाव करके ड्राईवर के लिए न्युनतम शैक्षिक योग्यता ही समाप्त कर दी अब सवाल यह है कि निरक्षर व्यक्ति कैसे रोड सेफ्टी नियम और साइन बोर्ड पढ़ेंगे। दर असल हिट एंड रन कानून को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच अब रोड सेफ्टी अब चर्चा का विषय बन गया है। आम तौर पर रोड पर हो रही सड़क दुर्घटनाओ के आंकड़े आंकड़े आने के बावजूद इसके असली कारण जानने की कोशिश नही की जाती। पता होना चाहिए कि हिट एंड रन मामले मे सालाना 25 से 30 हजार लोगो की जान जाती है वही रोड एक्सीडेंट में हर साल औसतन डेढ़ लाख लोग अपनी जान गंवा देते है। सरकार को हिट एंड रन मामलो पर कड़े कानून बनाने के स्थान पर कुछ ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे सड़को पर दुर्घटना की संख्या मे कमी लायी जा सके।
ट्रक ड्राईवरो की हड़ताल और प्र दरशनो के साथ रोड सेफ्टी के मामले मे छिड़ी बहस के बाद दिल्ली पुलिस का एक नया विश्लेषण सामने आया है इसमें खुलाशा हुआ है कि दिल्ली मे पिछले तीन सालों में सड़क दुर्घटना के मामलो मे 30 से 40% मामले हिट एंड रन के है, गंभीर बात यह है कि हिट एंड रन के मामलो मे 47% लोगो की मौत हुई। देश मे बड़े पैमाने पर एसिडेंट्स की वजह है ड्राईवरो की लापरवाही या उसका ध्यान भटकना, इस तरह के हादसो को रोकने के लिए सबसे जरुरी हैं कि ड्राईवरो की प्रापर ट्रैनिंग हो जिससे वे सड़क पर चलते हुए नियमो का पालन तो करे साथ ही साथ वे सड़क दुर्घटनाओ को लेकर संवेदन शील बने।
इस समय देश मे सबसे अधिक कोई चीज नजर अंदाज' की जा रही है तो वह है सड़क पर चलने वाले वाहनो को चलाने वाले ड्राईवरो की ट्रेनिंग और सबसे अधिक चिंता का विषय है इनको मिलने वाला लाइसेंस जो 2 से 5 हजार मे बड़े आसानी से मिल जाता है। हमारे सिस्टम में लोगो को लाइसेंस तो आसानी से मिल जाता है पर ड्राईवरो को स्किल नही मिलती जबकि मनको के हिसाब से हर एक लाख आवादी पर कम से कम एक ड्राइविंग सेंटर होना चाहिए, इस हिसाब से इस समय देश मे 14 लाख ड्राइविंग सेंटर होने चाहिए पर अभी देश में ड्राइविंग सेंटर्स की संख्या मात्र कुछ हजार है जिनमे गिनती के कुछ ऐसे ही है जिनमे ट्रेन्ड इंस्ट्रॅक्चर और आधुनिक इंफ्रेस्ट्रॅक्चर है, कई ट्रेनिंग स्कूल तो ट्रेनिंग के नाम पर र
स्म अदायगी करते है पर ये ड्राइविंग लाइसेंस दिलाने के काम मे खूब पैसा बना रहे है।
कायदे से सरकार को सबसे पहले ड्राइविंग ट्रेनिंग के लिए जिला स्तर तक इंफ्रेस्ट्रॅक्चर विकसित करना चाहिए जिससे को ड्राईवरो को अच्छी ट्रेनिंग देकर सड़क दुर्घटना के खतरे को कम करना चाहिए, हमारे सिस्टम में लाइसेंस का जुगाड़ तो हो जाता है पर ड्राइविंग का स्किल नही मिलता। विशेषज्ञों के अनुसार कायदे से एक कॉमर्शियल ड्राईवरो की न्युनतम शैक्षिक योग्यता हायर सेकेंडरी होनी चाहिये पर सरकार ने कुछ साल पहले कानून बदल कर ड्राईवरो की शैक्षिक योग्यता ही खत्म कर दिया। इसी तरह लंबी दूरी तक ट्रक चलाने के लिए दो ड्राईवर अनिवार्य होते थे जिससे एक ड्राईवर के थकने या नीद आने पर दूसरा गाड़ी चला ले पर सरकार ने ये अनिवार्यता भी समाप्त कर दी और इसे स्वैक्षिक बना दिया। सड़क दुर्घटना हिट एंड रन पर सख्त कानून बनाने से नही कम नही होंगी बल्कि ड्राईवरो की ट्रेनिंग पर फोकस करने और इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने से कम होंगी, सरकार ड्राईवरो के लिए सोसल सेक्युरिटी का इंतजाम करे और ऐसे कदम उठाये कि ड्राईवरो को सम्मान के नजरिये से देखा जाए।
गुरुवार, 4 जनवरी 2024
श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से विपक्ष दूर क्यों
अवधेश कुमार
अनेक विपक्षी दलों के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वो निमंत्रण मिलने के बावजूद अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे। कुछ लोगों ने तो इस कार्यक्रम का ही तीखा विरोध कर दिया है। हालांकि इसके परे आम लोगों में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तथा लोकार्पण को लेकर उत्साह का माहौल साफ दिखाई पड़ता है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा को लेकर देश में कायम यह वातावरण अस्वाभाविक नहीं है। हमारे देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या रही है जो श्रीराम मंदिर आंदोलन के महत्व और उसके प्रभाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। यह देखते हुए भी कि अयोध्या आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी को देश के एक बड़े वर्ग का चहेता बना दिया ऐसे लोग आज तक सच्चाई स्वीकारने को तैयार नहीं है। उनका यही मानना रहा है कि भाजपा और संघ ने जानबूझकर अपनी राजनीति के लिए श्रीराम मंदिर के मुद्दे को उठाया, देश में सांप्रदायिक विभाजन किया तथा हिंदुओं का ध्रुवीकरण करके अपना वोट बैंक बढ़ाया। कुछ नेताओं का बयान भी है कि आखिर लोकसभा चुनाव के पहले ही इसका इसकी प्राण प्रतिष्ठा क्यों हो रही है? उनके अनुसार यह सीधे-सीधे राम मंदिर का राजनीतिकरण है। कोई पार्टी राजनीति में है, केंद्र की सत्ता में है तो उसकी भूमिका के पीछे राजनीति होगी। किंतु क्या यह मान लिया जाए कि प्राण प्रतिष्ठा का पूरा कार्यक्रम केवल भाजपा की राजनीति है और वह इसका 2024 की दृष्टि से लाभ लेना चाहती है?
इसके उत्तर के लिए यह प्रश्न करना होगा कि फिर मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम कब रखा जाना चाहिए था? जिन लोगों के लिए आज भी मंदिर कोई मुद्दा नहीं है उनके वक्तव्य की इस संदर्भ में कोई प्रासंगिकता नहीं है। उनकी बात छोड़ दीजिए। उन सारे हिंदुओं के बारे में विचार करिए जिनके मन में यह आकांक्षा थी कि करीब 500 वर्ष पहले जिस पवित्र मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाया गया वहां मंदिर का निर्माण हो। इस मंदिर को बचाने और फिर बाद में उस जगह को प्राप्त कर पूजा पाठ करने के लिए संघर्ष का लंबा इतिहास है। अनेक इतिहासकारों ने उसे महत्व देने की कोशिश नहीं की। न्यायालयों में दोनों पक्षों की हुई बहस तथा पैसों से साफ हो गया कि इसके लिए संघर्ष सतत चलता रहा। इसमें हिंदुओं के साथ सिख, बौद्ध ,जैन सबकी भूमिका रही है। इतने संघर्ष और स्वतंत्रता प्राप्ति के बावजूद लगभग 72 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद इसका फैसला आया। क्या उसे फैसले को साकार करने के लिए समय सीमा का संकल्प नहीं होना चाहिए था? हमारे देश में किसी भी निर्माण में समय सीमा का संकल्प नहीं दिखाते हैं तो वह कितना आगे खींच जाएगा इसकी कल्पना हम आप सबको है। एक निर्माण कार्य शुरू होने के बाद वह कब पूरा होगा इसकी गारंटी नहीं होती। वैसे भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के कुछ समय बाद धीरे-धीरे यह समाचार आने लगा था कि आम लोगों के दर्शन और पूजन के लिए 2023 के अंत या 2024 के आरंभ में श्रीराम मंदिर खुल जाएगा। निश्चित रूप से इसे हर हाल में पूरा किया ही जाना चाहिए था। कौन सा चुनाव कब है, इसका प्रभाव उन चुनावों पर क्या पड़ेगा इसकी दृष्टि से विचार करना अनुचित होता। संसदीय लोकतंत्र में चुनाव अपने समय पर आयोजित होते हैं और उसके लिए ऐसे ऐतिहासिक सांस्कृतिक आयोजन को टाला नहीं जा सकता।
संकल्पबद्धता और इसका ध्यान रखते हुए दिन रात एक नहीं किया जाता तो 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा संभव नहीं होती। संपूर्ण मंदिर और उससे संबंधित अन्य निर्माण कार्य आगे भी जारी रहेंगे। ऐसा सामान्यतः होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब सरदार वल्लभभाई पटेल , कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, डा राजेंद्र प्रसाद जैसे महान नेताओं ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की योजना बनाई तब भी उसका विरोध हुआ था। हालांकि तब देश में न मीडिया का इतना प्रसार था और न राजनीति में ऐसा तीखा विभाजन और वोट की रणनीति की दृष्टि से ही हर मुद्दे पर अपना स्टैंड लेने का माहौल था। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा और निर्माण की पूरी कथा जिन्हें पता है वो किसी तरह का प्रश्न नहीं उठा सकते। 8 मई , 1950 को मन्दिर की आधारशिला रखी गई तथा 11 मई ,1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मन्दिर में ज्योतिर्लिंग स्थापित किया। तब तक मंदिर का संपूर्ण निर्माण नहीं हो पाया था। एक मुहूर्त तय हो गया था और भावना यही थी कि लंबे समय से बंद ज्योतिर्लिंग का दर्शन पूजन जितनी जल्दी आरंभ हो जाए उतना ही अच्छा। दूरदर्शी नेताओं का मानना था कि ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा के साथ धीरे-धीरे देश का वायुमंडल बदलेगा और भारत फिर 15 अगस्त, 1947 के पहले की दुर्दशा को प्राप्त नहीं होगा। ध्यान रखिए, वर्तमान सोमनाथ मंदिर का निर्माण 1962 में जाकर पूरा हुआ। इसलिए आधे-अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठाने वाले सोमनाथ मंदिर के इतिहास को अवश्य पढ़ ले।
वास्तव में इस तरह का प्रश्न उठाने वाले लोगों की सोच को समझना कठिन नहीं है। इनमें कुछ ऐसे हैं जिनको मंदिर से ही समस्या रही है और जिनकी राजनीति इससे बुरी तरह प्रभावित हुई। कुछ संघ और भाजपा के स्थायी विरोधी हैं। किसी संगठन या राजनीतिक दल का विरोध करने में समस्या नहीं है पर हर विषय में हमारा विरोध का ही स्टैंड रहे यह अपनी नकारात्मकता और कुंठा को प्रमाणित करता है। राम मंदिर केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं है, भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण, एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में भारत के उद्भव तथा विश्व कल्याण के लिए समर्पित भावना वाले देश के उदय की दृष्टि से इसका महत्व है। मंदिर की मूर्तियां पत्थरों या धातुओं की हो, प्राण प्रतिष्ठा एवं नियमपूर्वक पूजन के साथ वह संपूर्ण वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करने का केंद्र बनता है। संघ परिवार या अन्य हिन्दू संगठनों के लिए यह आंदोलन किसी एक मंदिर के निर्माण तक ही सीमित नहीं था। वह भारत की अंत:शक्ति- आध्यात्मिक -सांस्कृतिक -सभ्यतागत पराभव एवं मानहरण के साथ संपूर्ण देश को व्याप्त पराजय व हीनग्रंथि से निकाल कर भारत को उसके गौरव पर पुनर्स्थापित करने की साधना का अंग था। किसी की संघ या अन्य संगठनों से जितना भी मतभेद हो, श्रीराम मंदिर आंदोलन ने भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और एक सांस्कृतिक पहचान के साथ राष्ट्र के उद्भव का संपूर्ण संकेत दिया। धीरे-धीरे इसके पीछे विरोध में कमी आई और ऐसे लोग भी अंदर से मानने लगे कि वहां मंदिर निर्माण ही होना चाहिए जो पहले यह स्वीकार नहीं करते थे। राजनीतिक दलों के सामने समस्या यह हो गई कि राम मंदिर का विरोध करेंगे तो एक बड़े वर्ग के वोट से वंचित हो जाएंगे। इसलिए अनेक दल और नेता न चाहते हुए भी इसके विरोध में खड़े होने से बचने लगे। यह बदले हुए भारत का ही परिणाम था जो आज तक कायम है। इसलिए राम मंदिर का सार्वजनिक विरोध करने वाले नेताओं की संख्या काफी कम हो गई।
चूंकि लंबे समय तक आपने आंदोलन का विरोध किया, मंदिर के अस्तित्व को भी नकारने का अभियान चलाया और कुछ तो इससे आगे बढ़कर श्रीराम को ही एक मिथक साबित करते रहे। ऐसे लोग न्यायालय में भी गए। हालांकि उन्हें लगातार मुंह की खानी पड़ी क्योंकि तथ्य इसके विपरीत थे। लगातार विरोध करने और नकारने के बाद उन सबके लिए मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना कठिन है और इसे आसानी से समझा जा सकता है। आखिर कल तक विरोध करने वालों को लगता होगा कि वह किस मुंह से वहां जायें। इनकी समस्याओं के कारण मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं रुक सकती। हालांकि इन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ इसका लाभ ले जाएंगे तो इन्हें अवश्य शामिल होना चाहिए।
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