सोमवार, 30 अक्टूबर 2023
नेताजी : एक स्वाधीन आत्मा
शनिवार, 28 अक्टूबर 2023
फूल वालों की सैर 29 अक्टूबर से 4 नवंबर 2023 तक
नई दिल्ली। मुगल काल से चला आ रहा साप्रदायिक सौहार्द व राष्ट्रीय एकता का संदेश वाहक मेला फूल वालों की सैर इस साल 29 अक्टूबर 2023 को रंगारंग उत्सव का रूप लेगा। इस दिन सुबह 10:30 बजे सर्वोदय को एड सीनियर सेकेंडरी विद्यालय कुतुब महरौली में की चित्रकला प्रतियोगिता होगी। मेने की समारोह की विस्तृत जानकारी देते हुए मेले की आयोजन समिति अजुमन सर ए गुल फरोसा की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि इस वर्ष यह मेला 29 अक्टूबर 2023 से प्रारंभ होगा। 30 अक्टूबर 2023 को फूलों का पखा दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान विनय कुमार सक्सेना जी को उनके निवास स्थान पर पेश किया जाएगा और साथ ही शहनाई वादन भी होगा फिर इसके बाद फूलों के पंखे दिल्ली के डिवीजनल कमिश्रर को पेश किए जाएंगे और फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री यो अरविंद केजरीवाल जी व मुख्य सचिव को पंखे पेश किए जाएंगे और इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्रर श्री संजय अरोड़ा जी को पंखा पेश किया जाएगा।
दिनांक 31 अक्टूबर 2023 को दोपहर 3:00 बजे सद्भावना वाला फूलों के शहनाई ढोलताशा के साथ इंडिया गेट पर निकल जाएगी. जिनमें सभी समुदायों के लोग वह सदस्य शामिल होंगे और इसके बाद सद्भावना यात्रा फूलों के पचे शहनाई और ढोल ताशा के साथ चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर में से टाउन हॉल होते हुए पुन गौरी शंकर मंदिर पर समाप्त होगी। इस वर्ष साहित्य कला परिषद द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए जाएंगे।
दिनाक 1 नवंबर 2023 को दोपहर से कुश्ती कवडी आदि खेलों का आयोजन महरौली के डीटीए आम बाग पर होगा जिसमें विधायक श्री सोमनाथ भारती जी और नरेश यादव जी मुख्य अतिथि होंगे।
दिनांक 2 नवंबर 2023 की शाम 4:00 बजे महरौनी स्थित महान सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की दरगाह पर दोनों समुदाय के लोग परंपरा के मुताबिक मिलजुल कर फूलों की चादर चढाएंगे। दिल्ली बालों के इस दल का नेतृत्व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब करेंगे। नागरिक और उपराज्यपाल के हाथों चादरपोशी के बाद अगले दिन 3 नवंबर 2023 को शाम 6:00 बजे दोनों समुदाय के लोग व माननीय उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना साहब मिलजुल कर पांडव कालीन श्री योगमाया मंदिर महरौली में फूलों का पखा और छत्र चढ़ाएंगे।
फूल वालों की सैर का समापन दिनांक 4 नवंबर 2023 को महरौली के ऐतिहासिक जहाज महल के प्रांगण में होगा। इसमें हमारे देश की विविधता और राष्ट्रीय एकता और अखंडता का भव्य और समृद्ध स्वरूप दर्शाने वाले समारोह होगे। उल्लेखनीय है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल इस समारोह में अपने लोक कथा लोक कलाओं की अलक पेश करते हैं और दरगाह व मंदिर के लिए सजा ध्वज पथा लाते हैं। यह पंखा उसके राज्य के अनुभवी शिल्पकार और दस्तकार तैयार करते हैं। इसके बाद साहित्य कला परिषद द्वारा कल्चर प्रोग्राम व पूरी रात भर कव्वाली का दिलकश मुकाबला होगा।
फूल बालों की सैर के लिए भारत सरकार द्वारा आयोजन समिति बंजुमन सैर ए गुप्त फरोसा को राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भावना पुरस्कार से भी नवाजा है। समिति को यह पुरस्कार भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा 12 अगस्त 2009 को प्रदान किया गया था। समिति की महासचिव श्रीमती उषा कुमार ने बताया कि सन 1812 से 1842 तक हर साल लगने वाले इस मेले को अंग्रेजा ने भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध में तथा अपने विभाजन कार्य नीति के तहत फूट डालो राज करो के अंतर्गत बंद कर दिया। था। इसे दोबारा 1961 में दिल्ली वासियों की अपील पर भारत सरकार ने दोबारा से शुरू कराया था।
शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023
कुछ भ्रांतियों को तोड़ गए स्पिन के सरदार ‘बिशन सिंह बेदी’
बसंत कुमार
इस समय देश में पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और वोटरों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हर राजनीतिक दल चुनावी रेवड़ियां बांटने के चुनावी वायदों की झड़ी लगा रहा है। ऐसे चुनावी वातावरण में छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी कि देश के 81 करोड़ गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त अनाज वितरण योजना पांच वर्ष तक जारी रहेगी। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने ट्वीट करके वाहवाही लूटने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे चुनावी रेवड़ी मानकार इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करने का फैसला किया। इसके बाद आर्थिक जानकारों के बीच यह बहस छिड़ गई कि विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति का दावा करने वाले देश में 81 करोड़ से अधिक जनसंख्या बीपीएल कार्ड धारक हैं और मुफ्त अन्न वितरण योजना का लाभ उठाने के हकदार हैं अर्थात जिस देश की आबादी 141 करोड़ हो और उसमें से 81 करोड़ (58%) लोग अपना पेट भरने के लिए मुफ्त अन्न वितरण योजना पर निर्भर करते हो तो उस देश को विश्व की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति कैसे माना जा सकता है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार ऐसे लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 81.35 करोड़ हो गई है और नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट की शुरुआत वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने की थी। इस योजना के तहत बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपए किलो गेहूँ और तीन रुपए किलो चावल देने की बात की गई थी। इसके तहत प्रति व्यक्ति को हर माह 5 किलो अनाज मिलता था फिर नरेंद्र मोदीजी की सरकार अंत्योदय योजना लेकर आई जिसमें 35 किलो अनाज की सीमा निर्धारित की गई, फ्री राशन योजना इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने वाली थी जिसे अब प्रधानमंत्री ने इसे पांच वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। पौने दो लाख करोड़ की राहत से यह योजना शुरू की गई थी, निश्चित तौर पर यह योजना कोरोना काल में गरीब परिवारों को मुसीबत की घड़ी में बहुत कामयाब रही परंतु इस योजना के चलते अधिकांश लोगों के घर बैठने की प्रवृत्ति के कारण मजदूरों की कमी से छोटे और मझोले उद्यमों को बहुत झटका लगा है तब इस योजना की उपयोगिता पर प्रश्न खड़ा करना जायज लगता है।
प्रश्न यह है कि देश के मध्यम वर्ग के बूते पर करोड़ों लोगो को फ्री राशन मिलेगा। भोजन की गारंटी देना किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की अहम् जिम्मेदारी है पर उसके लिए मध्यम वर्ग की जेब काटना कोई भी समझदारी नहीं है। फ्री राशन और हर चीजों पर सब्सिडी देने से करोड़ों की आबादी नकारा बन जाती है पर हमारे देश में सरकारों द्वारा वोट पाने के लिए फ्री राशन और फ्री भोजन की योजनाएं चलाई जा रही हैं जबकि होना यह चाहिए कि सबको शिक्षा और स्वास्थ के साथ-साथ रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इस बारे में मुगलकाल में उप्र की राजधानी लखनऊ स्थित इमाम बाड़ा के निर्माण की कहानी से प्रेरणा ली जानी चाहिए, इसका निर्माण 1784 में अवध के नवाब आसिफउद्दौला ने अकाल के दौरान इसलिए कराया था कि लोगों को रोजगार मिल सके, दिन में इसका निर्माण होता और रात में इसे गिरा दिया जाता, कहते हैं कि इस इमाम बाड़ा का निर्माण और अकाल, 11 साल तक चला, इमाम बाड़े के निर्माण में करीब 20000 श्रमिक शामिल थे और इसके निर्माण में उस जमाने में 8 से 10 लाख रुपए की लागत आई पर नवाब ने अकाल के समय काम दिया पर खैरात नहीं दी।
अब राजनीतिक दलों के लिए यह नुस्खा बन गया है कि मुफ्त राशन, सस्ते भोजन की घोषणाएं करो और जब किसी को मुफ्त भोजन मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा। देश में पहले विकसित देशों की कंपनिया आकर कारखाने लगाती थीं इससे मजदूरों को बेहतर रोजगार मिलता था और उनके जीवन का स्तर ऊपर उठता था क्योंकि विकसित देशों में आबादी कम होने के कारण मजदूर बहुत महंगे मिलते थे इसलिए ये कंपनियां भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की तरफ रुख करती थीं परंतु अब भारत में मुफ्त राशन मिलने से यहां के मजदूर कामचोरी करने लगे हैं। अब उनके लिए काम हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें अब मुफ्त का राशन मिल ही रहा है। अब तो शहरों के छोटे कारखाने के लिए मजदूर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग कोरोना काल में शहरों को छोड़कर गांवों में पलायन कर गए थे वे फिर वापस नहीं आये।
दुर्भाग्य यह है कि मुफ्त राशन और फ्री बिजली बांटने का काम हर राजनीतिक दल कर रहा है, इस समय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान सभी पार्टियों में परस्पर होड़ मची हुई है कि कि मुफ्त बिजली, मुफ्त भोजन बांटने की घोषणा में कौन किससे आगे दिख रहा है। दिल्ली में तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तर भारतीय वोटरों को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त डीटीसी बस कि ऐसी आदत डाली कि उसके बुते पर वे दो बार से लगातार एकक्षत्र राज कर रहे हैं। उनकी देखा-देखी कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ्तखोरी की लालच से वोटरों को पटाया जाए। अब वोटरों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं क्योंकि जनता को फ्री की रेवड़ी खाने की आदत पड़ गई है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग गांव के कोटेदार के यहां अपनी चौपहियां गाड़ी से बीपीएल कार्ड पर मुफ्त राशन लेने जाते हैं। ये तथ्य हमारी व्यवस्था में भारी पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं और इसी कारण देशभर में गरीबों के लिए प्रारंभ की गई योजनाओं का लाभ लाखों की गाड़ियों में घूमने वाले और करोड़ों के घरों में रहने वाले लोग उठाते हैं। फिर भी गरीबों को दी जाने वाली मुफ्त राशन वितरण कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या 81 करोड़ से अधिक हो जाना सचमुच चिंता की बात है आखिर देश में मुफ्त रेवड़ी बांटने की प्रथा कब खत्म होगी।
(लेखक भारत सरकार में उप सचिव पद पर रह चुके हैं।)
गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023
समलैंगिकों पर न्यायालय के फैसले के निहितार्थ
अवधेश कुमार
समलैंगिकों को विवाह की कानूनी अनुमति देने संबंधी याचिका का उच्चतम न्यायालय द्वारा अस्वीकृत करना संपूर्ण समाज के लिए राहत लेकर आया है। यह लाखों वर्षों की सभ्यता संस्कृति वाले देश की प्रमाणित जीवन शैली एवं चिंतन की रक्षा करने वाली है। यह पहली दृष्टि में उस पूरी लौबी के लिए धक्का है जिसने लगातार एक गैर मुद्दे को मुद्दा बनाकर समलैंगिकों के पक्ष में माहौल बनाया तथा न्यायालय से भी अनुकूल फैसले पाए। उच्चतम न्यायालय ने सन 2018 में समलैंगिकता को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को खत्म कर दिया था। इससे उस लौबी के अंदर यह भावना पैदा हुई कि लंबी लड़ाई के बाद हम ऐसे स्थान पर पहुंच गए हैं जहां से अब समलैंगिकों के विवाह को मान्यता देने के लिए भी पूरी ताकत से न केवल माहौल बनाना चाहिए बल्कि न्यायालय से भी आदेश पारित करने की कोशिश करनी चाहिए। भारत में लंबे समय से मीडिया, सोशल मीडिया से लेकर गोष्ठियों, सेमिनारों में इसके पक्ष में माहौल बनाने की का अभियान चलता रहा। अलग-अलग तरीके के ऐसे-ऐसे तथ्य और तर्क दिए गए जिनसे लगता था कि वाकई समलैंगिकता विज्ञान एवं प्रकृति की कसौटी पर सही है तथा इनके जोड़ों को शादी करके व साथ रहने की मान्यता न देना ही मानवता विरोधी व्यवहार है। जिन लोगों ने उच्चतम न्यायालय में इस मामले पर जारी बहस तथा न्यायमूर्तियों की टिप्पणियां सुनी है , पढीं है उन्हें पता है कि इसके पीछे कितनी बड़ी लौबी लगी हुई थी। नामी वकील इस मामले को ऐसे लड़ रहे थे मानो इससे बड़ा कोई मुद्दा देश के सामने हो ही नहीं। जरा सोचिए, लाखों - करोड़ों में फीस लेने वाले इन वकीलों का भुगतान काम कहां से कर रहा था?
इसके विपरीत देश की बहुमत आबादी ने अलग-अलग तरीकों से अपना मत प्रकट किया और ऐसा लग रहा था की आम भारतीय उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई को ही उचित नहीं मानता है। तो तत्काल इससे राहत मिल गई है। किंतु कोई यह न मान ले कि समलैंगिकता को विपरीत लिंगी यानी स्त्री पुरुष संबंधों के समानांतर खड़ा करने वाली लौबी शांत हो जाएगी। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि भले अभी अनुमति नहीं मिली लेकिन उन्हें संतोष है कि उनके तर्कों तथ्यों को स्वीकार किया गया है। वास्तव में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में यह तीन और दो का आदेश है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हिमा कोहली, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति रविंद्र भट और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी। यहां दोनों न्यायाधीशों की अंतिम फैसले से पूरी सहमति नहीं है। अभी इस मामले को पुनर्विचार याचिका के रूप में ले जाया जा सकता है और उच्चतम न्यायालय ने बड़ी पीठ गठित कर दी तो फिर एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। अगर पूरे आदेश को देखें तो साफ हो जाएगा कि न्यायालय ने समलैंगिकता के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की है। केवल यह कहा है कि समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। न्यायालय सिर्फ कानून की व्याख्या कर उसे लागू करा सकता है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट या विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों में बदलाव की जरूरत है या नहीं, यह तय करना संसद का काम है। सभी 21 याचिकाकर्ताओं ने संबंधित विवाह को विशेष विवाह अधिनियम के तहत निबंधित करने की अपील की थी। न्यायालय का फैसला मुख्यत: दो आधारों पर टिका है। एक, शादी विवाह मौलिक अधिकार के तहत आता है या नहीं तथा, दो, न्यायालय इसमें बदलाव कर सकता है या नहीं? पीठ का कहना है कि विवाह मौलिक अधिकार नहीं है तथा न्यायालय कानून में परिवर्तन नहीं कर सकता है क्योंकि कानून बनाना यह संसद का विशेषाधिकार है।
सच यह है कि न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर केंद्र सरकार ने जो उत्तर दिया उसमें ऐसे सारे तर्क दिए गए थे जिनसे समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने का कानूनी, संवैधानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक हर स्तर पर विरोध होता था। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि सरकार बाध्य नहीं है कि हर निजी रिश्ते को मान्यता दे। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि नए मकसद के साथ नई श्रेणी बना दी जाए। इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। अगर ऐसा किया गया तो भारी संख्या में कानून में बदलाव लाने पड़ेंगे जो संभव नहीं होगा।
बावजूद न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट ने जो लिखा उसकी कुछ पंक्तियां देखिए, सरकार को इस मसले पर कानून बनाना चाहिए, ताकि समलैंगिकों को समाजिक और कानूनी मान्यता मिल सके। न्यायालय समलैंगिक जोड़ों के लिए कोई कानूनी ढांचा नहीं बना सकती है और यह विधायिका का काम है, क्योंकि इसमें कई पहलुओं पर विचार किया जाना है। सभी समलैंगिक व्यक्तियों को अपना साथी चुनने का अधिकार है, लेकिन राज्य को ऐसे समूह को मिलने वाले अधिकारों को मान्यता देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक ऐसी समिति बनाने का भी निर्देश दिया जो राशन कार्ड में समलैंगिक जोड़ों को परिवार के रूप में शामिल करने, समलैंगिक जोड़ों को संयुक्त बैंक खाते के लिए नामांकन करने में सक्षम बनाने और उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी आदि से मिलने वाले अधिकार का अध्ययन करेगी। समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया और केंद्र और राज्य सरकारों को समलैंगिकों के लिए उचित कदम उठाने का आदेश भी दिया। कहा कि सरकार, समलैंगिक समुदाय के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए सकारात्मक कदम उठाए। यही नहीं केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि समलैंगिकों के लिए सेफ हाउस और डॉक्टर की व्यवस्था करे। साथ ही एक फ़ोन नंबर भी हो, जिसपर वो अपनी शिकायत कर सकें। यह भी सुनिश्चित करें कि उनके साथ किसी तरह का सामाजिक भेदभाव न हो, पुलिस उन्हे परेशान न करे और जबरदस्ती घर न भेजे, अगर वो घर नहीं जाना चाहते हैं तो।तो उनकी सामाजिक स्वीकृति तथा जन कल्याणकारी कार्यक्रम में समान हिस्सेदारी का आधार तो न्यायालय ने दे ही दिया है। इस पूरे मामले में विवाह संस्था से लेकर समलैंगिकता, विपरीत लिंग आदि पर खूब बहस हुई। न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि विवाह की संस्था बदल गई है जो इस संस्था की विशेषता है, सती और विधवा पुनर्विवाह से लेकर अंतरधार्मिक विवाह में बदलाव हुए हैं और ऐसे कई बदलाव संसद से आए हैं। इसलिए यह कोई स्थिर या अपरिवर्तनीय संस्था नहीं है। न्यायालय ने यह तर्क दिया कि हम विशेष विवाह अधिनियम को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक नहीं ठहरा सकते क्योंकि यह समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता है।
इस तरह पूरे फैसले को देखें तो न्यायालय ने भले समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी लेकिन उसे अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक या कुछ लोगों तक सीमित नहीं माना है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने समलैंगिक संबंधों को शहरी और अभिजात्य वर्ग तक सीमित बताने के तर्कों पर कहा कि यह विचित्रता यानी क्विर्नेस शहरी या अभिजात्य वर्ग की चीज नहीं है। उनके अनुसार भारत में यह प्राचीन काल से जाना जाता है और प्राकृतिक है। विवाह की अवधारणा कोई सार्वभौमिक अवधारणा नहीं है और न ही यह स्थिर है। अगर संविधान के अनुच्छेद 245 और 246 को सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची की पांचवी प्रविष्टि के साथ पढ़ा जाए तो क्वियर यानी एलजीबीटी की शादी को मान्यता और उस पर कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास है। उन्होंने यह भी लिखा है कि संविधान के भाग तीन यानी मौलिक अधिकार में क्विअर लोगों सहित सभी को एक साथ रहने का संरक्षण मिला हुआ है। राज्य का दायित्व है कि वह संघ यानी साथ संबंध रखने वाले, बनाने वाले उन सभी की तरह क्विर को भी वही लाभ दे। ऐसा नहीं होने से समलैंगिक जोड़ों पर असमान प्रभाव पड़ेगा जो कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में शादी नहीं कर सकते। इन पंक्तियों को देखने के बाद निश्चित रूप से समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं मिलने पर प्रसन्न होने वाले पूरी तरह राहत की सांस नहीं ले सकते। मुख्य न्यायाधीश की इन पंक्तियों से अन्य न्यायाधीशों ने भी सहमति जताई है। जिसकी मूल पंक्ति यही है कि अगर स्पेशल मैरिज एक्ट को खत्म कर दिया जाता है तो यह देश को आजादी से पहले के समय में ले जाएगा। अगर न्यायालय दूसरी अप्रोच अपनाता है और इसमें नई बातें जोड़ता है तो वह विधानपालिका का काम करेगा। इस तरह जो नहीं चाहते कि समलैंगिक विवाह को मान्यता दिया जाए उन्हें संगठित होकर सामाजिक, धार्मिक एवं न्यायिक स्तरों पर ज्यादा सक्रिय होना होगा। इसकी लॉबी काफी मजबूत और प्रभावी है। अवधेश कुमार, ई-30 ,गणेश नगर , पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल - 9811027208
सोमवार, 23 अक्टूबर 2023
बाल्मीकि के राम: विविध आयाम
डा. मीना शर्मा
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