शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

आज की कलुसित राजनीतिक दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय के मानव दर्शन के सार्थकता

 

बसंत कुमार

आज के राजनीतिक वातावरण में देश और विदेश में हर जगह जाति और धर्म की राजनीति ने पूरे विश्व को अशांत कर रखा है। पूरा विश्व देख रहा है इजरायल, कनाडा में धर्म के नाम पर मार-काट हो रही है। वहीं भारत में देवरिया समेत अन्य जगहों पर जातीय झगड़ों में लोग मारे जा रहे हैं। ऐसे में जनसंघ के संस्थापक सदस्य और जनसंघ के अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता बढ़ जाती है, जिसका केंद्र बिंदु मानव कल्याण है।

90 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्व राजनीति में साम्यवादी समूह का लगभग अंत हो गया और पूरा विश्व आर्थिक उदारवाद और वैश्विकरण की ओर चल पड़ा। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद के इस युग में विश्व आर्थिक विकास एवं पूंजी निर्माण को साध्य मानते हुए विकास की धारणा के इर्द-गिर्द घूम रहा है और हम स्वदेशी विचार धारा से भटकते हुए नजर आ रहे है। हम स्वावलंबन के त्याग और आत्म पूर्ति में लगे हुए है जबकि बहुत पहले आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने स्वावलंबन और आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था "हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें अपने निर्यात से कमाई हुई मुद्रा से आयात करें। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए और आत्म पूर्ति के सिद्धांत पर देश में पर्याप्त उत्पादन हो, हमें किसी प्रकार की कमी न हो। आज हम पाते हैं कि भारत आत्म निर्भरता से हटकर आयात पर निर्भर हो गया है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से बंजर तथा कम उत्पादक हो गई है"। पूज्य गुरुजी ने 1970 में स्वदेशी के अंतर्गत दो अवधारणाओं-आत्म निर्भरता व विकेंद्रीकरण को भारतीय परिस्थिति के लिए उपयुक्त माना। उनके अनुसार देश की आर्थिक नीति हमारे राष्ट्र को प्राचीन व सनातन व अध्यात्मिक मूल्यों के साथ संगत होनी चाहिए। गुरु जी के उस समय के विचार आज भी प्रासंगिक है।

प्राचीन भारत में अर्थव्यवस्था पूर्णतः ग्रामीण उद्योगों और कृषि पर आधारित थी पर देश में गुलामवंश की स्थापना के के पश्चत् विभिन्न सल्तनत के शासन काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का क्षरण होने लगा। बाद में मुगल काल, ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था जिसका मुख्य आधार स्वावलंबन थी, पूरी तरह समाप्त हो गई।

1947 में देश की आजादी के समय पूरा विश्व दो महाशक्तियों के बीच चल रहे शीत युद्ध के कारण आर्थिक व राजनीतिक रूप में साम्यवादी व पूंजीवादी समूहों में बंटा हुआ था, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तित्व पर पश्चात्य सभ्यता का गहरा प्रभाव था, इस कारण महात्मा गांधी की स्वदेशी और सत्ता के विकेंद्रीकरण की अवधारणा के स्थान पर पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित आर्थिक नीतियों को लागू किया गया जिसकी मुख्य विशेषता सत्ता का केंद्रीकरण तथा तंत्र को मजबूत करना था। ऐसे समय में जब हम स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिशा निर्देशित मार्ग से भटक रहे थे तब भारतीय राजनीति में पं. दीनदयाल उपाध्याय का उदय हुआ, जिन्होंने विश्व को ऐसा दर्शन दिया जिसका लक्ष्य मानव का कल्याण था उनका यह दर्शन एकात्म मानववाद के नाम से जाना गया। यह दर्शन जिसका केंद्र बिंदु समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति था, जिसको अंत्योदय के रूप में दीनदयाल जी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने देश की सनातन संस्कृति को युगानुकूल प्रस्तुत करते हुए देश को एक प्रगतिशील व सदैव प्रासंगिक रहने वाली विचारधारा प्रस्तुत की। उन्होंने पश्चिमी आयातित सिद्धांतों से परे इस सिद्धांत का प्रतिपादन कर आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज रचना का ऐसा चतुरंगी धरातल प्रस्तुत किया जो राष्ट्र के विकास एवं मानव कल्याण को सुनिश्चित कर पाए। पंडित जी अपने व्यक्तिगत जीवन में मानव कल्याण को अपना साध्य मानते थे, एक बार पंडित जी झांसी से इलाहाबाद गाड़ी से यात्रा कर रहे थे। जूता पालिश करने वाले एक बच्चे ने सामने बैठी एक सवारी से जूता पालिश करवाने का आग्रह किया, उस सज्जन ने उससे पूछा, "क्या तुम्हारे पास जूता चमकने के लिए कपड़ा है" बच्चे ने कहा नहीं तो सज्जन ने पालिश करवाने से मना कर दिया। यह बात पंडित जी सुन रहे थे। उन्होंने बच्चे को बुलाकर अपने अंगोछे से टुकड़ा फाड़कर बच्चे को देते हुए कहा लो साहब का जूता चमका दो। लोगो ने जब उनसे फटे हुए अंगोछे के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने सहजता से कहा "अंगौछा थोड़ा छोटा होने से मेरा काम नहीं रुक रहा पर उस छोटे टुकड़े ने उस बच्चे के उस दिन खाने का इंतजाम कर दिया"

यह घटना पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मूल भावना को दर्शाती है। यदि समाज के संपन्न लोग अपनी अवश्यकताओं में थोड़ी-सी कटौती कर लें तो कोई भूखा नहीं रहेगा। पंडित जी ने अपने एकात्मवाद में व्यक्ति के जीवन में पूर्णता के साथ-साथ संकलित विचार किया है और सभी की भूख मिटाने की चेष्टा की है किंतु यह ध्यान रखा है कि एक की भूख मिटाने के प्रयत्न में दूसरे की भूख मिटाने का मार्ग न बंद हो जाए। उन्होंने व्यक्ति और समाज को समग्रता में देखा है इसलिए व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए केवल भौतिक अर्थात आर्थिक अवाश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं अपितु उसका आत्मिक और बौद्धिक विकास भी आवश्यक है। बिना इसके व्यक्तित्व का संपूर्ण स्वरूप प्रकट नहीं हो सकता। इसी प्रकार से समाज में भी संपूर्णता के आधार पर विचार करना पड़ेगा।

समाज की भूख मिटाने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक, आत्मिक और बौद्धिक क्षमता का भी निवारण करना पड़ेगा। समाज रूपी शरीर को हर दृष्टि से स्वस्थ रखना पड़ेगा तभी समाज में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जा सकता हैं। इसलिए उन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत करने से पूर्व सिद्धांत और नीति के अंतर्गत अंत्योदय के लिए समाज में अर्थायाम की बात कही अर्थात वितरण प्रणाली ऐसी हो जो पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को लाभांवित कर सके। तभी समाज रूपी शरीर के व्यक्तित्व का भौतिक आत्मिक और भौतिक विकास हो सकेगा। अतएव व्यक्ति और समाज दोनों के बारे में समग्रता से विचार करेंगे तभी समाज का चतुर्मुख विकास सम्भव है यही एकात्म मानववाद की मूल अवधारणा है। पंडित जी ने अपनी इस परिकल्पना को जनसंघ के ग्वलियर अधिवेशन में 10 अगस्त 1964 को प्रस्तुत किया और इससे प्रेरणा लेकर वर्ष 1965 में सिद्धांत और नीति नामक दस्तावेज के अंतर्गत पार्टी का मुख्य लक्ष्य रखा गया। इसके अनुसार हमारी संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए और आज भी यही हमारा मुख्य ध्येय बना हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)

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राहुल गांधी के हिन्दू धर्म लेख को कैसे देखें

अवधेश कुमार 

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में शीर्ष सक्रिय नेता राहुल गांधी की पिछले काफी दिनों से एक बहुआयामी व्यक्तित्व की छवि अंकित कराने की कोशिश हो रही है। हिंदू धर्म से संबंधित उनके दो पृष्ठों का आलेख और फिर हरमंदिर साहिब में माथा टेकना, उसी का अंग है। राजनीति में हर नेता को अपनी छवि निर्मित करने के लिए सभी तरह की रणनीति अपनाने की परंपरा है। चूंकि कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का सामना करना है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में स्थापित बहुआयामी छवि और चरित्र वाले नेता सामने हैं ,इसलिए भी राहुल गांधी के रणनीतिकारों की इन कोशिशें को राजनीति की दृष्टि से गलत नहीं कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की भारत सहित विश्व भर ऐसी छवि लोगों के मन में अंकित है जो हिंदुत्व विचारधारा के प्रति दृढ़ है, भारत की विरासत, इतिहास, धर्म, परंपरा सबको मुखर रूप में रखता है तो दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान -विज्ञान, तकनीक, विकास आदि में भी उच्च श्रेणी का व्यवहार और कल्पनाशीलता साबित करता है। भारत में अकेले कोई एक ऐसा नेता नहीं जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके समक्ष स्वयं को वैसा साबित कर सके। कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह बात समझ में आई तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। तो क्या राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के समानांतर सही दिशा और गति से आगे बढ़ते देखा जा सकता है?

जहां तक राजनीति का प्रश्न है राहुल गांधी सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी हिंदुत्व प्रेरित विचारधारा के विरुद्ध प्रखर तीखे विरोधी के रूप में सामने आते हैं। उन्होंने हिंदुत्व शब्द की न जाने कितनी बार आलोचना की। वीर सावरकर के विरुद्ध वह लंबे समय से आग उगल रहे हैं। हालांकि आईएनडीआईए का ध्यान रखते हुए वे महाराष्ट्र में शिवसेना -उद्धव, शरद पवार के आग्रह पर इन पर खामोशी धारण किए हुए हैं। उनके सलाहकारों और रणनीतिकारों ने उन्हें अहसास कराया कि आप मोदी के समानांतर तभी राष्ट्रीय नेता हो सकते हैं जब इस विचारधारा के बिल्कुल विपरीत ध्रुव पर सबसे ज्यादा प्रखर विरोध करते हुए दिखें। उनकी राष्ट्रवाद से लेकर हर उस विंदु पर विचार सामने लाए गए जिसे संघ, भाजपा या उस संगठन परिवार ने देश के समक्ष रखे हैं। 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव के पूर्व जगह-जगह मंदिरों में गए, उनकी एक जनेऊधारी ब्राह्मण की तस्वीर भी सामने आई और सबसे बढ़कर उन्होंने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की। 2019 लोकसभा चुनाव के साथ वह दौर लगभग खत्म हो गया क्योंकि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में उसका लाभ नहीं मिला।

उसके बाद से राहुल गांधी की नरेंद्र मोदी और भाजपा के समानांतर राजनीतिक रणनीति का दूसरा दौर शुरू हुआ जिसमें भारत जोड़ो यात्रा सबसे बड़ा प्रयास था। उस दौरान उन्होंने वो सारी बातें रखें जो उनकी दृष्टि में लोगों के अंदर यह भाव पैदा कर सकता था कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक ऐसी विचारधारा के प्रति दृढ़ होकर काम कर रही है जो संघ भाजपा विरोधी है। भाजपा के राष्ट्रवाद की काट के लिए उन्होंने चीन की सीमा तक पूरे लद्दाख क्षेत्र की यात्रा की। उनका लेख शायद इसको बताने के लिए है कि हिंदू धर्म को न जानने या हिंदू विरोधी होने कि उनकी छवि झूठी गढी गई है। वैसे हरमंदिर साहिब में राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के बीच भी गए थे। पंजाब की राजनीति में कांग्रेस हाशिए पर है तथा इस समय आईएनडीआईए का भाग होते हुए भी आम आदमी पार्टी के साथ प्रदेश में कांग्रेस का तीखा संघर्ष चल रहा है। यहां इस विषय में विस्तार से जाना जाना प्रासंगिक नहीं होगा।

 राहुल गांधी के हिंदू धर्म पर लिखे लेख की पंक्तियां या शब्दों की कहानी विवेचना भी आवश्यक नहीं है। उन्होंने जो कुछ लिखा है वह सब हिंदू धर्म से ही संबंधित हैं। किंतु कोई कहे कि हिंदू धर्म संपूर्ण रूप से इसमें समाहित हो गया तो उस पर टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। हिंदू धर्म या हिंदुत्व की व्यापकता असीम है। इसकी व्याख्या आप जैसे भी करें उनके बहुतेरे अंश हिंदू धर्म की सोच में फिट होंगे। हिंदू धर्म में आस्तिक - नास्तिक से लेकर संपूर्ण धार्मिक विचारों को नकारने तक की स्वीकृति है। मनुष्य ही नहीं संपूर्ण ब्रह्मांड के चर-अचर, दृश्य -अदृश्य में ऐसा कोई पक्ष नहीं जिस पर किसी न किसी हिंदुत्व के ग्रंथ में गहन चर्चा नहीं है। हिंदू धर्म से संबंधित लेख में उनके विचारों को गलत साबित किया ही नहीं जा सकता। किंतु एक लेख से राहुल गांधी या कोई जनता के अंतर मन में यह छवि स्थापित नहीं कर सकते कि हिंदू धर्म के बारे में उनका ज्ञान सम्पूर्ण है एवं अपने जीवन में उसका शब्दशः पालन करते हैं। इनमें कुछ ऐसे शब्द है जिनका प्रयोग राहुल गांधी के माध्यम से पहली बार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व या हिंदू धर्म पर राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में पदार्पण के बाद कोई लेख लिखा हो यह संज्ञान में नहीं आता। केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारों की नीतियों से यह झलकता है कि वो अपनी हिन्दुत्व विचारधारा पर वर्तमान संविधान एवं राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचे के तहत कुछ कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के समानांतर स्वयं को हिंदू धर्म एवं विचार के प्रति निष्ठावान साबित करने की कोशिश लंबे समय से की है। वर्तमान समय में ही मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में नेताओं के बयान, उनकी वेशभूषा, घोषणाएं, कदमों आदि में यह स्पष्ट दिखाई देता है। बावजूद छवियां बनतीं हैं कि ये बीजेपी की चुनौती में ही ऐसा कर रहे हैं जिसमें स्वाभाविकता का अभाव है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए आवश्यक है कि राहुल गांधी या दूसरे नेता हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू धर्म आदि पर भाजपा की प्रतिक्रिया में चरित्र गढ़ते न दिखें। ऐसा अब तक नहीं हुआ है। संभव है इससे भाजपा विरोधियों का कुछ वोट कांग्रेस को मिल जाए लेकिन हिन्दू धर्म केवल वोट का विषय नहीं है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ की स्थापना की तो वह अपने क्षेत्र के कांग्रेस के प्रतिष्ठित नेता थे। कांग्रेस के अंदर या बाहर नया राजनीतिक दल बनाकर हिंदू राष्ट्र ,हिंदुत्व की राजनीति कर सकते थे। उन्होंने कभी राजनीतिक दल बनाने की बात तक नहीं की। आधार भूमि ऐसी बनाई कि संघ प्रत्यक्ष रूप से कभी राजनीति में न पड़े। आज भी आरोप जितना लगा दें, मैंने संघ के केंद्रीय नेतृत्व का दलीय राजनीति पर बयान कभी नहीं देखी। वे कभी किसी को वोट डालने या न डालने की अपील नहीं करते। मुद्दों पर पक्ष विपक्ष में अपना मत अवश्य रखते हैं। इसी तरह हिंदू राष्ट्र शब्द प्रयोग करने वाले अनेक संगठन सीधे राजनीति में नहीं गए। हिंदू महासभा जैसे संगठन इसके अपवाद रहे। भारतीय राष्ट्र की दृष्टि से हिंदू धर्म, हिंदू, हिंदुत्व आदि के मायने अत्यंत गंभीर है। राहुल गांधी अगर स्वयं को निष्ठावान हिंदू मानते हैं और उनके लेख हिंदू धर्म की व्याख्या हैं तो भारतीय राष्ट्र के संदर्भ में वह इसे चरितार्थ करने के लिए क्या कर रहे हैं, करेंगे यह भी देश के सामने स्पष्ट होना चाहिए। उदयनिधि स्टालिन और उसके बाद सनातन विरोधी दिए गए बयानों पर राहुल गांधी ने अपना मत अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। सबसे बड़ी बात कि राहुल गांधी ने अपने लेख में लिखने का कोई उद्देश्य नहीं बताया है। यानी आपको आज यह लेख क्यों लिखना पड़ा यह भी आना चाहिए था। साधु- संत कभी भी धर्म की व्याख्या कर सकते हैं लेकिन कोई राजनीतिक नेता है तो उसे बताना चाहिए कि वह इस समय क्यों ऐसा कर रहा है? आम धारणा नहीं है कि संघ के देश और विदेश में लंबे समय तक किए गए परिश्रम तथा भाजपा के सत्ता में आने के बाद से हिंदुत्व के पक्ष में निर्मित माहौल को देखकर ही कांग्रेस व दूसरी पार्टियां चुनावी रणनीति की दृष्टि से स्वयं को उसे श्रेणी में उससे अलग सोच के साथ शामिल करने का प्रदर्शन कर रही है। यानी उनका हिंदू धर्म गलत और हमारा सही। इतने गंभीर विषय को केवल राजनीति की प्रतिद्वंद्विता तक सीमित न रहकर उसकी नीतिगत एवं व्यवहारिक स्वीकृति का पक्ष भी सामने लाना चाहिए।



गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

तापसी पन्नू के प्रोडक्शन की पहली फिल्म धक-धक में धमाल मचा रहे लखनऊ के गगनदीप सिंह डिडयाला

शुक्रवार 13 अक्टूबर को बड़े पर्दे पर रिलीज़ हुई फिल्म धक-धक नें दर्शकों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। चार महिलाओं की बाइक ट्रैवल पर आधारित ये फिल्म दर्शकों को बहुत लुभा रही है। यूपी और खास कर के लखनऊ वालों के लिए खास बात यह है कि इस फिल्म में रताना पाठक शाह के पति का किरदार ओमैक्स सिटी, लखनऊ के रहने वाले गगनदीप सिंह डिडयाला नें निभाया है। रोमांच और गंभीरता से भरी इस फिल्म में गगनदीप का किरदार दर्शकों को भावुक कर देता। हंसी, ठहाकों और तालियों के बीच जब बड़े पर्दे पर गगनदीप का किरदार दिखता है तो दर्शकों की आँखें नम सी हो जाती हैं।

वैसे तो गगनदीप सिंह डिडयाला पिछले १२ सालों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की फील्ड से जुड़े हुए हैं और बताते हैं कि वेबसीरीज वेब-सीरीज़ और ऐड्स के बाद यह पहला मौका है जब वो सिल्वर स्क्रीन पर पूरे सिंगल फ्रेम में दिखे हैं। गगनदीप सिंह डिडयाला के आगामी प्रोजेक्ट्स इम्तिआज़ अली की चमकीला है जिसकी प्रमुख भूमिका में वो दिलजीत दोसांज और परिणीति चोपड़ा के साथ नज़र आएंगे। उनकी आने वाली वेबसीरीज़ की बात करें तो Union: Making Of India है जिसमें वो आशुतोष राणा और केके मेनन के साथ दिखाई देंगे जिसमें आशुतोष सरदार पटेल का और के के मेनन वीपी मेनन का किरदार निभा रहे हैं वह गगनदीप ब्रिगेडियर गुरदयाल बने नज़र आएंगे।











शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

देश के सामने असली परीक्षा - गरीबी दूर हो या जातिवादी क्लेश

बसंत कुमार

पिछले दिनों राज्यसभा सांसद मनोज झा द्वारा साहित्यकार ओम प्रकाश बाल्मीकि की कविता "ठाकुर का कुआ" संसद में पढ़े जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप बिहार के बहुबली नेता आनंद मोहन और उनके विधायक बेटे चेतन आनंद की तीखी टिप्पणी के कारण ठाकुर बनाम ब्राह्मण विवाद समाप्त ही नहीं हुआ था कि गांधी जयंती के दिन उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में एक यादव व एक ब्राह्मण परिवार में झगड़े में 6 लोगों की हत्त्या हो गई। इन घटनाओं ने इस बहस को जन्म दे दिया है कि इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहे विश्व में भारत की प्राथमिकता देश को आर्थिक मंदी, गरीबी और बेरोजगारी से निकालें या देश में चल रहे जातीय क्लेश को समाप्त करें। दरअसल मनोज झा ने राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पर बोलते हुए ओम प्रकाश बाल्मीकि की कविता पढ़ी और कहा कि हमें अपने अंदर के ठाकुर रूपी अहम को मारने की जरूरत है, यद्यपि उनके बोलने के बाद उनकी पार्टी की ओर से स्पष्टीकरण आ गया कि मनोज झा द्वारा किसी जाति विशेष को निशाना नहीं बनाया गया है। उन्होंने इस प्रवृत्ति की समाप्त करने की बात कही थी।

इसके बावजूद राजपूत नेता आनंद मोहन ने पूछ लिया कि मनोज झा अपने अंदर के ब्राह्मणत्व को मारने की बात क्यों नहीं करते और उनके बेटे चेतन आनंद ने मनोज झा से माफी मांगने की बात की। इस घटना के बाद आनंद मोहन चर्चा में आ गए। सन् 1990 में गोपाल गंज के तत्कालीन कलेक्टर कृष्णैया जी, जो दलित समुदाय के थे, की हत्त्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आनंद मोहन के अच्छे चाल-चलन के बहाने समय से पहले उन्हें रिहा कर दिया गया है। बिहार सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि आने वाले आम चुनाव के मद्देनजर राजपूत वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु उन्हें जेल से रिहा कराया गया है। गौरतलब है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जिस मण्डल आरक्षण नीति के आधार पर दशकों से राज कर रहे हैं उसी मण्डल कमिशन की रिपोर्ट लागू होने पर आनंद मोहन ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, पर जाति पर राजनीति इतनी प्रभावी हो गई है कि नेता पुरानी घटनाओं को भूल जाते हैं।

इस विवाद के शुरू होते ही कुछ छुटभैये राजनेताओं ने सोशल मीडिया पर ऐसी आपत्तिजनक पोस्ट डाल दी जिससे पूरा समाज जाति द्वेष के जहर से जलने लगा, मानो भगवान राम सिर्फ इन्हीं के रहे हों और भारत गणराज्य में विलीन हुई 560 देशी रियासतें इनके बाप-दादा की रही हो जैसे लगता है कि देश के निर्माण में 3.5% राजपूतों के अलावा और किसी जाति या समुदाय का कोई योगदान ही न रहा हो, इन लोगों से कोई ये पूछे कि अपने जीवन में कितने गरीब राजपूतों की मदद की है तो इनकी बोलती बन्द हो जाएगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि देश में राजपूतों की आबादी के बामुश्किल 10-15% लोग सम्पन्न हों और बाकी दाल-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में इन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के स्थान पर जातिवादी लड़ाई में झोंकना कहां तक उचित है।

जो लोग देशी रियासत पर अपना हक जमाते हुए अपनी सजातीय लोगों के लिए सरकार द्वारा विशेष सम्मान की बात करते हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए इन रियासतों-जागीरों के मालिक उनके वंशज सत्ता में बड़े पदों पर आसीन हैं या विदेशों में रह रहे हैं और पश्चिमी सभ्यता में रम बस गए हैं। फिर जातीय स्वाभिमान का दंभ भरने वाले आम लोगों का इनके लिए सिर फुटैव्वल करने का क्या औचित्य है, जिस संदर्भ में मनोज झा ने ठाकुर का कुआ कविता पढ़ी वह किसी जाति बिरादरी के लिए नहीं है। देश के अनेक हिस्सों में लोग ठाकुर जी के नाम की पूजा करते हैं उनके नाम का दिया जलाते हैं तो क्या उनके ठाकुर जी किसी विशेष बिरादरी के हैं, वृंदावन में भगवान कृष्ण को गाय चराने वाले माखन चोर के रूप में पूजते हैं। वहीं द्वारका में उन्हें ठाकुर जी द्वारकाधीश के रूप में पूजते हैं, इसलिए ठाकुर का कुआ ठाकुर की बावली आदि संबोधनों को किसी जाति विशेष का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। आज के युग में जाति या गोत्र को अपने व्यक्तिगत मामलों शादी-ब्याह तक ही सीमित रखें और धर्म को पूजा पाठ व जीवन पद्धति तक सीमित रखें। इसके लिए देश में गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा करना अनुचित है।

कुछ नेतागण वोट और सत्ता प्राप्त करने के लिए अपनी जाति वालों का चक्कर लगाने में माहिर हैं, बिहार में नीतीश कुमार-लालू यादव, उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल जाति पर आधारित जनगणना की रट लगा रहे हैं और कुछ नेता सनातन खतरे की रट लगा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि देश में धर्म खतरे में नहीं रहा। अगर ऐसा होता तो महाराणा प्रताप का सेनापति मुसलमान और अकबर का सेनापति राजपूत न होता। असल में ये सारा खेल कुर्सी का है और कुछ वर्षों से जाति पर आधारित बहुत तेजी से बढ़ रही है, जातीय जनगणना की मांग बढ़ने के साथ-साथ "जिसकी जितनी है आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात की जा रही है। पर कुछ जातियों के लोग झूठे स्वाभिमान के लिए देश में भय और आतंकवाद का माहौल फैला रहे हैं। ये लोग यह भूल जाते हैं कि इन्हीं के पूर्वज विदेश से आए हुए आक्रांताओं व उनके शासकों के सामने जी-हजूरी करने से नहीं चूकते थे और सारी रियासत और जागीर जिसकी बात की जाती है उसी जी-हजूरी का हिस्सा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में ये देसी राजा व नवाब जिस तरह से अंग्रेज बहादुर के सामने नतमस्तक हुआ करते थे वह किसी से छुपा नहीं है, फिर भी आज आजाद भारत में कभी किसी संदर्भ में किसी जाति का नाम ले लें तो उस जाति के कुछ स्वयंभू नेता बात का बखेड़ा बना देते हैं।

जातीय जनगणना जैसी चीज आज कोई नई नहीं आई है, इसकी चर्चा संविधान सभा में भी हुई थी पर संविधान निर्माताओं ने यह माना था कि जैसे-जैसे हमारा समाज उन्नत होगा शिक्षा का प्रसार होगा तो जातिगत भेदभाव कम होते जाएंगे पर ऐसा दिखाई नहीं देता है। आजादी के सात दशक बाद क्या गांव और क्या शहर सभी जातीय शिकंजे में जकड़े हुए हैं। यह प्रश्न सिर्फ सत्ता की भागीदारी का नहीं है अपितु यह हम लोगों के मन में व्याप्त झूठे जातीय स्वाभिमान का है। जो लोग आजाद भारत में 560 से अधिक देशी रियासतों के भारत में विलय पर ऐसा आभास देते हैं कि इनके लोगों ने रियासतों का विलय करके देश पर कोई उपकार किया है जिसके कारण उन्हें देश के आम नागरिक से श्रेष्ठ माना जाए। जो रियासते इन्हें राजशाही के दौरान मुगलिया सल्तनत और ईस्ट इंडिया कंपनी की अनुकंपा से मिली, वह भारत के गणराज्य बनते ही समाप्त हो गई और अब देश के सभी नागरिक समान हैं और ठाकुर का कुआं जैसी कविताएं पढ़ने पर उत्तेजित होने के बजाय देश के आर्थिक सशक्तिकरण और गरीब उन्मूलन जैसे विषयों पर काम करना चाहिए।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।) M-9718335683

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

जातीय जनगणना की राजनीति

अवधेश कुमार

इसमें दो राय नहीं कि जातीय जनगणना 2024 लोकसभा चुनाव में आईएनडीआईए की ओर से एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को संपूर्ण गठबंधन से वाहवाही मिल रही है। उनके पास कहने के लिए भी है कि मैंने जो कहा उसे कर दिखाया। यानी जो मैं कर सकता हूं वह सभी राज्य कर सकते हैं और देश भी। पहली नजर में यह तर्क सामान्य तौर पर गले उतरता है कि आरक्षण का आधार  जातियां है तो क्यों न देख लिया जाए कि कहां किस जाति की कितनी संख्या है तथा उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थितियां क्या हैं? जातीय जनगणना के पक्ष में सबसे सबल तर्क यही है। बिहार में नीतीश सरकार ने इसके आंकड़े जारी किए हैं तो देश अवश्य देखेगा कि इनका इस्तेमाल वहां किस तरीके से होता है। बिहार सरकार कह रही है कि सरकार की नीतियों में इन आंकड़ों की वास्तविकता दिखाई देगी। इसके मायने क्या हैं? 

क्या गणना में जिस जाति की जितनी संख्या बताई गई है उसके अनुसार ही उन्हें आरक्षण एवं अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा? या फिर उसका उपयोग अलग तरीके से किया जाएगा?

सच यही है कि इन पर बिहार सरकार की ओर से कुछ नहीं कहा गया है। कारण, जब आपकी सोच में व्यापक सामाजिक हित की जगह संकीर्ण राजनीति हो तो आप दूरगामी दृष्टि से विचार नहीं कर सकते। जातीय जनगणना होनी चाहिए, नहीं होनी चाहिए इसको छोड़ भी दें तो इसका उद्देश्य और क्रियान्वयन की परवर्ती रूपरेखा सामने होनी चाहिए थी। यह तभी संभव होता जब सामाजिक न्याय के वास्तविक सिद्धांत की सोच से काम किया जाता। आज यह मानने में कोई समस्या नहीं है कि नीतीश जी ने जब भाजपा से अलग होने का मन बना लिया तभी से उन्होंने जातीय जनगणना की आवाज उठाई अन्यथा इसके पूर्व उनका जोर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने तक सीमित था। क्या इसका कारण यह था कि संपूर्ण भारत में हिंदुओं के जागरण के कारण लोग हिंदुत्व राजनीति की ओर आकर्षित हुये हैं? चुनावी सर्वेक्षण प्रमाणित करते हैं कि जहां भी भाजपा का जनाधार है वहां कुछेक स्थानों को छोड़ दें तो पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों का सर्वाधिक मत इसके खाते जाता है।

 वास्तव में लगभग 100 वर्ष से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य तथा अन्य हिंदू संगठनों की अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रियता से पूरे भारत का माहौल बदला है। हालांकि संघ भारत के दीर्घकालीन भविष्य के लिए काम करता दिखता है। राजनीति में भाजपा किसी हद तक इसको अभिव्यक्त कर रही है तो स्वाभाविक ही वोटों का बड़ा अंश उसी के खाते जाएगा। देश का दुर्भाग्य है कि सामाजिक न्याय और उसके एक पहलू आरक्षण को राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बना लेने के कारण उसका वास्तविक उपयोग ,परिणाम और समीक्षा की विवेकपूर्ण गुंजाइश न के बराबर रह गई है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि पिछड़ों- दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले नेता और पार्टियां इसका उत्तर नहीं दे सकतीं कि उन्होंने अपने लंबे शासन काल में अब तक क्या किया? केंद्र में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद 1990 से लगातार लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार की सत्ता शीर्ष पर हैं। आरंभ के 15 वर्ष लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उसके बाद नीतीश कुमार, कुछ काल के लिए जीतन राम मांझी और फिर नीतीश कुमार लगातार मुख्यमंत्री हैं। ये पिछड़ों- दलितों के मसीहा हैं तो इन तीन दशक से ज्यादा समय में बिहार की दुर्दशा का अंत क्यों नहीं हुआ? बिहार इतना पिछड़ा क्यों है? जीएसटी कर संग्रह में बिहार का स्थान नकारात्मक है। विकास के अन्य मापदंडों विकास दर, गरीबी, प्रति व्यक्ति आय, रोजगार सृजन , निवेश‌ आदि में भी बिहार फिसड्डी राज्यों की सूची में ही पड़ा हुआ है? । इसके विपरीत लंबे समय तक बिहार की दशा का ही शिकार उत्तर प्रदेश ऊंचाइयां छू रहा है। समय है कि बिहार के लोगों को जातीय सीमाओं से परे उठकर इन नेताओं से पूछना चाहिए कि आप सामाजिक न्याय के पुरोधा हैं तो संपूर्ण बिहार आपके ही शासन के परिणामों में अन्याय का शिकार क्यों दिखता है?

 लालू जी के शासनकाल का सच यही है कि बिहार के लोग प्रदेश से बाहर स्वयं को बिहारी कहने में शर्म महसूस करते थे। अशासन और कुशासन का उससे दर्दनाक उदाहरण भारत में दूसरा नहीं? नीतीश जी बड़ी उम्मीद लेकर आए और आरंभ के पांच वर्ष तक उन्होंने सुशासन दिया भी। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण वे उस पार्टी के साथ गए जिस पर उन्होंने ही कुशासन और जंगल राज का आरोप लगाया था। तेजस्वी प्रसाद यादव के नेतृत्व में राजद बदली हुई पार्टी है तो वह व्यवहार में दिखना चाहिए। बिहार के सामाजिक -आर्थिक -सांस्कृतिक उन्नयन की दृष्टि से उम्मीद पैदा करने वाले कदम उठाते हुए दिखें तो विश्वास हो कि वाकई ऐसा है। गणना के आंकड़ों के अनुसार जिन जातियों , परिवारों को आरक्षण का लाभ ज्यादा मिला है उन्हें अलग करके जो वंचित हैं उन तक पहुंचाने की नीति बनाएं, क्रीमी लेयर का कठोरता से पालन हो तो माना जाएगा कि उनका उद्देश्य विवेकपूर्ण था। गणना की इतनी बड़ी कवायद के बावजूद आरक्षण एवं अन्य योजनाएं पहले की तरह ही जारी रहती हैं तो इसे क्या कहा जाएगा? समस्या यह है कि आंकड़ों में अनेक जातियों की संख्या पर प्रश्न उठ रहे हैं। इसके अनुसार 14.27 प्रतिशत यादव एवं 17 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान ही लालू जी और तेजस्वी यादव के एमवाई समीकरण को पूरा कर सत्ता तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त है। नीतीश कुमार की कुर्मी जाति 3 प्रतिशत से नीचे है। जातीय समीकरणों के अनुसार बिहार में  लंबे समय तक  लालू जी के परिवार के नेतृत्व में ही बिहार की सत्ता रहनी चाहिए। अगड़ी जातियों में ब्राह्मणों ,भूमिहारों और राजपूतों सबकी संख्या इतनी कम कर दी गई है कि जातीय समीकरणों की राजनीति में उनकी हैसियत ही नहीं रहेगी। गणना के बाद बिहार में व्यापक हलचल है और अलग-अलग जातियों के अंदर असंतोष है।  एक बड़ा समूह गणना रिपोर्ट को सामाजिक स्थिति की सच्चाई नहीं मानेगा तो इसकी विश्वसनीयता क्या रहेगी? सरकारी स्तर पर आप इसे स्वीकार कर लीजिए,जमीन पर लोग इसे मैनिपुलेटेड मानेंगे। स्वाभाविक ही उसका राजनीति पर भी व्यापक असर होगा। संभव है बिहार की राजनीति में एमवाय समीकरण के विरुद्ध नए जातीय समीकरण खड़े हों। ध्यान रखिए, कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने 2011 में आम जनगणना के समानांतर ही ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत जातियों की गणना कराई थी जिसे आर्थिक सामाजिक गणना कहा गया था। उसने उसे जारी नहीं किया। सिद्धारमैया की पूर्व सरकार ने कर्नाटक में गणना कराई और वैसा ही राजस्थान में हुआ। कांग्रेस ने इन्हें जारी नहीं किया। यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि आपने तब जारी नहीं किया और आज क्यों अपरिहार्य मान रहे हैं? सच यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने यूपीए की गणना को जारी करने का फैसला किया किंतु इसके लिए बनी समिति ने काफी परिश्रम के बाद हाथ खड़े कर दिए क्योंकि लाखों की संख्या में जाती और गोत्र थे। इनमें राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जातियों, गोत्रों की एक संख्या बताना संभव ही नहीं। हिंदुत्व की बात करने वाली शिवसेना के उद्धव ठाकरे समूह ने सुप्रीम कोर्ट में जातीय जनगणना के लिए दरवाजा खटखटाया और केंद्र को कहना पड़ा कि यह व्यावहारिक नहीं है। यही वास्तविकता है लेकिन राजनीति जो न कराये। आईएनडीआईए को नहीं भूलना चाहिए कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अयोध्या आंदोलन के कारण भाजपा के पक्ष में हिंदुओं के हो रहे ध्रुवीकरण की काट का भी ध्यान रखते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया। उम्मीद की गई थी कि इससे पिछड़े दलित आदिवासी जातियां भाजपा के साथ नहीं जाएगी। अगले चुनाव में जनता दल का ही सफाई हो गया और भाजपा ने 1991 में 121 सीटों के साथ अपने चुनावी इतिहास का रिकॉर्ड बना दिया। इसलिए जातीय गणना को लेकर राजनीति लक्ष्य साधने की कामना करने वाले ठहरकर ठंडे दिमाग से विचार करें।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208 



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