सोमवार, 22 मई 2023
रविवार, 21 मई 2023
क्या है 'रेवड़ी',क्या है 'ज़रूरत' कौन करेगा तय?
उत्तर प्रदेश के जालौन में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते समय 15 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में सर्वप्रथम उन राजनैतिक पार्टियों पर निशाना साधा था जो चुनाव जीतने मात्र के लिये जनता को लालच देने वाली योजनाओं की घोषणाएं किया करते हैं। प्रधानमंत्री ने इसे 'रेवड़ी कल्चर' का नाम दिया था। उन्होंने कहा था कि -'मुफ़्त की रेवड़ियों का ऐलान कर वोट लेने की कोशिश करने का अभ्यास देश के विकास के लिए हानिकारक है'। चुनावी घोषणाओं में देश की जनता को मुफ़्त की चीज़ों का लालच देकर वोट हासिल करने की साज़िश की है। ये रेवड़ी कल्चर आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक साबित होगा। ऐसे लोगों को लगता है कि मुफ़्त की रेवड़ी के बदले उन्होंने जनता जनार्दन को ख़रीद लिया है'। यही बात प्रधानमंत्री ने गत 26 अप्रैल को कर्नाटक में भी एक चुनावी जनसभा के दौरान दोहराते हुये कहा कि - ‘मुफ़्त की रेवड़ी की राजनीति की वजह से कई राज्य बेतहाशा ख़र्च अपनी दलगत भलाई के लिए कर रहे हैं। राज्य डूबते चले जा रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों का भी ये खा जा रहे हैं। देश ऐसे नहीं चलता, सरकार ऐसे नहीं चलती।'
परन्तु इसी के साथ प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार द्वारा दी जा रही 'मुफ़्त सेवाओं ' की पैरवी इन शब्दों में की - उन्होंने कहा कि -' कुछ तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के लिए देश के ग़रीब परिवारों को हर संभव सहायता दी जा रही है और ये सरकार का दायित्व है। कोरोना के समय हमें ज़रूरत लगी तो हमने मुफ़्त वैक्सीन दिया देश को… क्योंकि जान बचानी थी’ ‘मुफ़्त राशन देने की ज़रूरत पड़ी तो दिया गया क्योंकि देश में कोई व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिए। लेकिन देश को आगे बढ़ाना है तो हमें इस 'रेवड़ी कल्चर' से मुक्त होना ही पड़ेगा। ’ आज सरकार के प्रतिनिधि बड़े गर्व से बताते रहते हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कोरोनाकाल में ग़रीब लोगों को 5 किलो अनाज मुफ़्त दिये जाने की जो योजना शुरू की गयी थी उसका फ़ायदा देश के 80 करोड़ लोग उठा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि कोरोना काल ख़त्म हो जाने के बावजूद इस मुफ़्त राशन योजना को फ़िलहाल दिसंबर 2023 तक बढ़ाये जाने कभी ख़बर है।
जहां तक कोविड के दौरान मुफ़्त वैक्सीन लगाये जाने का प्रश्न है तो देश में अभी तक जितनी भी महामारी सम्बन्धी वैक्सीन लगाई गयी हैं कभी भी किसी भी सरकार द्वारा जनता से उसके पैसे वसूले नहीं गये। हाँ कोविड वैक्सीन से पहले किसी सरकार के मुखिया ने अपनी फ़ोटो युक्त प्रमाणपत्र ज़रूर नहीं बांटे जोकि राजनैतिक प्रचार के सिवा और कुछ नहीं था। दुनिया के कई देशों में इसका मज़ाक़ भी उड़ाया गया। रहा सवाल मुफ़्त राशन बांटने का तो पिछले लोकसभा चुनाव में तो भारतीय जनता पार्टी ने मुफ़्त राशन हासिल करने वाले मतदाताओं की अलग श्रेणी ही बना डाली जिसका नाम 'लाभार्थी ' रखा गया। कोई आश्चर्य नहीं कि यह योजना दिसंबर 23 के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव तक भी बढ़ा दी जाये। रहा सवाल देश के लोगों की भूख की फ़िक्र करने की तो यहाँ यह भी याद रखना ज़रूरी है कि पेट तो राशन से भरता है न कि प्रधानमंत्री के चित्र छपे उन मज़बूत थैलों से जिनकी क़ीमत उन थैलों में पड़े राशन से भी अधिक थी। भूख मिटाने के नाम पर किया जाने वाला इसतरह का पार्टी प्रचार सरकारी ख़र्च पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का तरीक़ा नहीं तो और क्या है ?
कर्नाटक में मोदी को इसलिए 'रेवड़ी' फिर याद करनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस ने भाजपा द्वारा अपने चुनाव प्रचार में परोसे गये विभाजनकारी एजेंडे के मुक़ाबले में राज्य की जनता से पांच ऐसे वादे किये थे जो सीधे तौर पर कांग्रेस को फ़ायदा पहुँचाने वाले तो ज़रूर थे परन्तु सरकार के राजस्व पर निश्चित रूप से भरी बोझ साबित होने वाले थे। इनमें एक वादा था 'गृह लक्ष्मी योजना, इसके अंतर्गत महिलाओं को हर महीने 2000 रुपये की सहायता राशि देने की बात है जबकि 'युवा निधि योजना' के तहत स्नातक की पढ़ाई करने वाले युवाओं को दो साल तक 3 ,000 रुपये और डिप्लोमा होल्डर्स को दो साल तक 1500 रुपये प्रति माह बेरोज़गारी भत्ता दिए जाने का वादा किया गया है। इसी प्रकार 'अन्न भाग्य' योजना में ग़रीब परिवारों को हर महीने 10 किलो चावल की गारंटी देने की बात कही गयी है तो 'सखी योजना' के तहत महिलाओं को सरकारी बसों में फ़्री बस पास उपलब्ध कराने का घोषणा की गयी है। इसी तरह ' गृह ज्योति' योजना में हर घर को 200 यूनिट फ़्री बिजली देने का वादा किया गया है। कर्नाटक की नई सिद्धारमैया सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद सबसे पहले इन्हीं वादों को पूरा करने की घोषणा भी कर दी है।
इसके पहले हिमाचल प्रदेश में गत वर्ष हुये विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जनता से जो अनेक वादे किये थे उनमें सत्ता संभालते ही बेरोज़गार युवाओं को एक लाख सरकारी नौकरियां देने,ग्रामीण सड़कों के लिए भू-अधिग्रहण क़ानून लागू कर भू-स्वामियों को चार गुना मुआवज़ा देने,महंगाई से निपटने के लिए लोगों की जेबों में पैसा डालने,पुरानी पेंशन योजना (OPS ) लागू करने, महिलाओं को 1500 रुपए प्रति माह देने और 300 यूनिट बिजली मुफ़्त देने जैसे वादे प्रमुख थे। ऐसे ही वादों ने कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश व कर्नाटक में सत्ता दिलाई। इसी प्रकार दिल्ली में बिजली पानी शिक्षा व स्वास्थ्य की मुफ़्त घोषणा कर अरविंद केजरीवाल सत्ता में आये।और यही 'रेवड़ी वितरण फ़ार्मूला' पंजाब में भी लागू किया गया। पूर्व में भी किसानों का क़र्ज़ मुआफ़ करने, किसानों का बिजली बिल मुआफ़ करने के नाम पर विभिन्न पार्टियां वोट मांगती रही हैं।कहीं मुफ़्त तीर्थ यात्रा करने के नाम पर वोट तो कहीं मुफ़्त शौचालय बनाने के नाम पर,कहीं मुफ़्त आवास देने के नाम पर, कहीं मुफ़्त राशन के नाम पर तो कभी मुफ़्त वैक्सीन के नाम पर वोट माँगा जाता रहा है। मध्य प्रदेश में भी ऐसी कई 'रेवड़ी 'योजनायें चल रही हैं। गोया रेवड़ियां बांटने में कोई भी दल किसी से पीछे नहीं है। ऐसे मे यह तय करने का अधिकार आख़िर किसे है और यह कौन तय करेगा कि कौन सी योजना 'रेवड़ी वितरण ' की श्रेणी में आती है और कौन सी योजना जनता की वास्तविक ज़रुरत है ? परन्तु यह तो तय है कि चाहे वह 'रेवड़ी' हो या ज़रुरत की घोषणायें, सभी राजनैतिक दल इनसे चुनावी लाभ ही हासिल करना चाहते हैं।
तनवीर जाफ़री संपर्क - 9896219228
शुक्रवार, 19 मई 2023
जिम के नाम पर पार्काें का विनाश
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| श्याम कुमार |
शहरों में हरियाली से भरे पार्क फेफड़ों का काम करते हैं, क्योंकि उस हरियाली से क्षेत्र के लोगों को ऑक्सीजन मिलती है तथा इलाके में प्रदूशण कम होता है। लेकिन आजादी के बाद दीर्घकालीन कांग्रेसी षासन में नलकूप आदि लगाकर पार्काें की हरियाली को विनश्ट किया गया। तमाम अच्छे-भले आकर्शक पार्क उजाड़ दिए गए। जलापूर्ति के लिए पार्काें में नलकूप आदि लगाने के बजाय अन्यत्र जगहें तलाष की जानी चाहिए थीं तथा अन्य उपायों का सहारा लिया जाना चाहिए था। अब एक नया फितूर पार्काें में जिम लगाए जाने के नाम पर सामने आया है। इसके परिणामस्वरूप हमारे पार्क हरियाली से परिपूर्ण पार्काें के बजाय अब ‘जिम पार्क’ का रूप ले लेंगे। यह कुकृत्य इस बात का भी ज्वलंत उदाहरण है कि अहंकार में चूर हमारी अफसरषाही षासन को बरगलाकर टैक्स के रूप में जनता से प्राप्त हुए धन की किस प्रकार बरबादी करती है!
अफसरषाही द्वारा सरकार को बरगलाकर षहरों के पार्काें को ‘जिम पार्क’ में बदल देने की जो योजना इस समय कार्यान्वित की जा रही है, उससे पार्काें में हरियाली को तो क्षति पहुंचेगी ही, पार्काें में जिम की कसरतें करने के लिए षोहदों को इकट्ठा होने का अवसर भी मिल जाएगा। इस समय जो प्राइवेट जिमों का प्रचलन है, उनमें भारी षुल्क देकर लोग षरीर को हश्टपुश्ट रखने के उद्देष्य से जाते हैं। उनमें षुल्क दे सकने वाले वे षोहदे भी होते हैं, जो अपने हश्टपुश्ट षरीर से लड़कियों को रिझाने में समय लगाया करते हैं। लेकिन पार्काें में लगे जिम-उपकरणों के निःषुल्क इस्तेमाल की सुविधा हो जाएगी तो वहां अधिकतर गुंडेषोहदों का ही वर्चस्व हो जाएगा। अभी पार्काें में जो स्त्री-पुरुश टहलने जाते हैं, उनके सामने गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी। वहां उनकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होगी। थानों की पुलिस का यह हाल है कि जब से जहां भी पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू हुई है, वहां पुलिस में सुनवाई और भी मुष्किल हो गई है तथा पुलिस का रूप बिलकुल बेलगाम हो गया है। पुलिस अधिकारी भी अफसरी अंदाज में डूबे रहते हैं।
गत 17 मार्च को सवेरे नौ बजे के लगभग अचानक कुछ लोग हमारी डायमंडडेरी कॉलोनी में आए और यहां स्थित नेताजी सुभाश पार्क में लगे हुए पेड़ों को उखाड़ने लगे। चूंकि मैं डायमंडडेरी कॉलोनी कल्याण समिति का अध्यक्ष हूं, इसलिए कॉलोनी के लोग भागे हुए मेरे पास आए और मुझे वहां ले गए। वहां मैंने पार्क में लगे पेड़ों को नश्ट किए जाने का विरोध किया। जो लोग पेड़ उखाड़ रहे थे, उनका मुखिया एक युवक सरदार था, जिसने बताया कि उसकी कंपनी को लखनऊ नगर निगम ने षहर के पार्काें में जिम बनाने के लिए ठेका दिया है, इसलिए वे लोग जिम के चौदह बड़े उपकरण लगाने के वास्ते पार्क के पेड़ों को हटाकर वहां जिम हेतु जमीन बना रहे हैं। जब उन्होंने जिद पकड़ ली कि उन्हें जिम के लिए जगह बनानी ही है तो मैंने उन्हें पार्क में कुछ ऐसी जगहें दिखा दीं, जहां वे अपने उपकरणों को लगा सकेंगे। उसके बाद मैं विधानसभा व लोकभवन चला गया और जब वहां से लौटा तो देखा कि उन लोगों ने किसी की नहीं सुनी तथा अपने अनुसार पार्क में तमाम जगह पेड़ों को नुकसान पहुंचाते हुए जिम के उपकरण लगाने के उद्देष्य से छोटे-छोटे प्लेटफॉर्म बना दिए हैं। जहां प्लेटफॉर्म बना दिए गए हैं, वहां पर पेड़ लगाने के लिए मैं अनगिनत पत्र लिखकर लखनऊ नगर निगम, उत्तर प्रदेष उद्यान निदेषालय एवं वन विभाग से अनुरोध कर चुका हूं। किन्तु नए पेड़ तो लगाए नहीं गए, जिम के नाम पर पार्क में वर्तमान हरियाली को भी नश्ट करने का कुत्सित कदम उठाया गया। अभी तो मौजूदा पेड़ों को ही क्षति पहुंचाई गई है, जब सारे उपकरण लग जाएंगे तो यह पार्क हरियाली से भरा हुआ पार्क लगने के बजाय मात्र ‘जिम पार्क’ होकर रह जाएगा। पार्क में लोगों के टहलने के लिए जो भ्रमणपथ(पाथवे) बना हुआ है, वह भी निरर्थक हो जाएगा।
षहर के पार्काें में जिम-उपकरण लगाने की योजना भले ही अच्छे उद्देष्य से बनाई गई हो, लेकिन उस योजना के दुश्परिणामों पर बिलकुल विचार नहीं किया गया है। आष्चर्य नहीं कि उक्त योजना के पीछे लूटखसोट एवं कमीषनखोरी की भावना निहित हो। बाद में जब इस योजना के कार्यान्वय की जांच होगी तो उसका हश्र भी वैसा ही होगा, जैसा अब तक हुई तमाम भ्रश्ट योजनाओं की जांच का हुआ है। जो लोग भ्रश्टाचार से मालामाल हो चुके होंगे, वे मूंछों पर ताव देते हुए निर्द्वंद घूमते रहेंगे।
उपर्युक्त जिम-योजना के बजाय पार्काें में योगासन सिखाए जाने से योजना बनाई जानी चाहिए। योगासन में षोहदों-गुंडों की रुचि नहीं हुआ करती है तथा पार्काें में यदि योगासन-केंद्र बनाए जाते हैं तो उनमें वही लोग आएंगे, जो अपने षरीर को स्वस्थ रखना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के सत्तासीन होने के बाद हमारी जिन प्राचीन विद्याओं को बढ़ावा दिया गया है, उनमें आयुर्वेद, योगासन आदि भी हैं। बाबा रामदेव ने योगासन की जिस विलुप्त होती जा रही प्राचीन विद्या का पुनर्जागरण किया था, उसे मोदी सरकार ने बहुत बढ़ावा दिया। योगासन के प्रति लोगों में बचपन से ही रुचि पैदा की जानी चाहिए। इसी से मैं अनेक वर्शाें से यह मांग कर रहा हूं कि हमारी षिक्षण-संस्थाओं में योगासन को अनिवार्य किया जाना चाहिए। जितना भारीभरकम खर्च जिम के महंगे उपकरणों को लगाने में किया जा रहा है, उतने खर्च पर योगासन के योग्य प्रषिक्षकों की व्यवस्था की जा सकती थी।
डायमंडडेरी कॉलोनी कल्याण समिति की मांग है कि कॉलोनी के नेताजी सुभाश पार्क में जिम के लिए बनाए गए प्लेटफॉर्माें को तत्काल हटाकर वहां पेड़ लगाए जाएं तथा पार्क में योगासन सिखाने की व्यवस्था की जाय। केवल डायमंडडेरी कॉलोनी के पार्क में ही नहीं, अन्य समस्त पार्काें में भी जिम खोलने के बजाय योगासन सिखाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस रूप में एक प्रकार से योगासन-क्रांति की षुरुआत हो जाएगी तथा क्षेत्रवासियों को अपने षरीर को स्वस्थ रखने का अवसर मिल जाएगा। योगासन ऐसी विधा है, जिससे षरीर स्वस्थ रहता है तथा बीमार पड़ने की संभावना कम हो जाती है।
(ष्याम कुमार)
सम्पादक, समाचारवार्ता
ईडी-33 वीरसावरकर नगर
(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।
मोबा0-9415002458, 7905405266
ईमेलः ोीलंउण्रवनतदंसपेज/हउंपसण्बवउ
दिनांकः 19 मई, 2023
सोमवार, 15 मई 2023
अंहकार का नाश ही विनम्रता का जनक
डाॅ. वीरेन्द्र भाटी मंगल
वर्तमान
दौर में चारों तरफ अंहकार बढता ही जा रहा है, जहां अंहकार है वहां
विनम्रता नहीं हो सकती है। भारतीय संस्कृति में विन्रमता का उल्लेख
विशिष्टता के साथ मिलता है। विन्रमता के द्वारा अनेक द्वन्द्वों को पाटा जा
सकता है। बस आवश्यकता इस बात की है कि विन्रमता को जीवन में धारण किया
जाये। जब तक व्यक्ति के आचरण में विनम्र विचारों को समावेश नहीं होता है तब
तक अहं विसर्जन की बात सोची भी नहीं जा सकती है। वर्तमान दौर में बढ रहे
द्वन्द्वों मंे प्रमुख रूप से अंह का हावी होना ही है। सहिष्णुता का अभाव,
अहं का प्रभाव व्यक्ति मंे व्याप्त विन्रमता को खण्डित करने में सहायक होता
है। विन्रमता जीवन का सहज एवं आवश्यक गुण है। विन्रमता ही व्यक्ति के जीवन
का दर्पण है। जिस व्यक्ति में जितनी विन्रमता होती है लोग उस व्यक्ति की
महानता को तत्काल स्वीकार कर लेते है। अंह से पोषित विन्रमता अधूरे ज्ञान
की परिचायक होती है।
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन अपनी विशिष्टता के साथ
गतिशील होता है। वे ही लोग पथभ्रष्ट होते है जो विन्रमता को सहज गुण न
मानकर प्रदर्शन का लबादा मानते है। विन्रमता का प्रदर्शन स्वार्थ का जनक
है। स्वार्थी व्यक्ति परिवार एवं समाज में अपनी सफल पहचान नहीं बना पाता
है। विनम्रता विकास की जननी है। सही मायने में अंह का विसर्जन एवं विन्रमता
को धारण करना ही जीवन विकास का सशक्त माध्यम है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन
में अंह का विसर्जन कर न्रमता के सूत्र को शिरोधार्य किया है वह व्यक्ति
हर क्षेत्र में सफलता के झण्डे गाड सकता है।
भारतीय आध्यात्मिक परम्परा
में गुरू-शिष्य की महत्ता निर्विवाद है। शिष्य का समर्पण, नम्रता ही उसे
गुरू से बढकर योग्यता का वाहक बना देती है। वो इसलिये की शिष्य ने अपने अंह
का विसर्जन कर अपने आप को समर्पित किया। विन्रमता जीवन का सहज गुण है। सही
मायने में व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य व्यक्तित्व का दर्पण है विन्रमता।
विन्रमता का गुण हर किसी व्यक्ति को अपनी ओर आर्कषित कर लेता है। विन्रम
व्यक्ति सब जगह हर किसी से सम्मान पाता है वहीं अपने गुणों के कारण लोगों
का आदर्श भी बन जाता है। व्यक्ति के जीवन का आध्यात्मिक गुण है विन्रमता का
समावेश। विन्रम व्यक्ति के जीवन में प्रदर्शन नाम मात्र का होता है।
प्रदर्शन से परे आत्मा आत्मा के विकास का सूत्र है विन्रम जीवन। वर्तमान
में जीवन से विन्रमता का ह्ास तीव्र गति से हुआ है। विन्रमता का स्थान
चापलूसी लेती जा रही है। चिकनी चुपडी बातों से अपना कार्य निकलवाने का
प्रयास ही विन्रमता बनती जा रही है जबकि विन्रमता में न तो चापलूसी होती है
ओर न ही स्वार्थ। विन्रमता जीवन का आवश्यक अंग बन जाता है किसी ने ठीक ही
कहा है-
झूकते वे ही है जिनमें जान है, मुर्दा दिल क्या खाक झुकेगें।
सचमुच
इस बात में विन्रमता पर करारा आध्यात्मिक पुट मिलता है। झुकते वे ही लोग
है। जिनमें कुछ संस्कार है, गुण है। अंह से आपूरित व्यक्ति टूटना पंसद करते
है लेकिन झूकना नहीं ओर यह भी सच है कि जो अकडते है वे टूटते ही है। जो
व्यक्ति झूकना जानता है संसार उसके सामने स्वयं झूकने लग जाता है। यह है
विन्रमता का प्रभाव। विन्रमता जीवन का स्थायी गुण है जिसे अपनाकर व्यक्ति
अपने जीवन को सुरभित कर सकता है। नम्रता व विनय जीवन को अलग ही पहचान देती
है। नम्रताहीन व्यक्ति बहुत कुछ पाने से वचित रह जाते है। सदियों से भारतीय
संस्कृति में ’’विद्या ददाति विनयम्’’ का समावेश रहा है।
विद्या वही
व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसमें विन्रमता हो। विद्या विनय के विद्या
अर्थात ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। अंह का पूर्ण रूपेण विसर्जन ही
विन्रमता का जनक है। अंहकार से मुक्त जीवन को ही विन्रम जीवन की संज्ञा दी
जा सकती है। आज जरूरत है कि हमारी पीढी विन्रमता जैेसे गुणों को जीवन में
धारण कर जीवन विकास की गति को समझे। आज के दौर में अंहकार युक्त ज्ञान बढा
है जो भले ही रोजगार का माध्यम बन सकता है लेकिन आत्मिक शांति एवं जीवन
विकास के लिए विन्रमता से युक्त ज्ञान ही परिपूर्ण माना जा सकता है।
विन्रमता को धारण करने के लिए व्यक्ति को सहजता, सरलता के साथ धैर्य पूर्वक
सहिष्णुता के साथ आध्यात्मिक विकास की अवधारणा को समझना होगा, तभी विन्रम
जीवन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। विन्रमता को जीवन में धारण कर व्यक्ति
अपने जीवन के साथ साथ परिवार, समाज एवं राष्ट्र के विकास में आध्यात्मिक
चेतना जागरण का वाहक बन सकता है। जीवन में विन्रमता तमाम योग्यताओं की जनक
है। विन्रमता के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन में ज्ञान, दर्शन एवं चारित्र का
समावेश कर सकता है।
विन्रमता को धारण करने के लिए व्यक्ति को
आध्यात्मिक जीवन का अनुशरण करना होगा। जीवन के विविध चरणों में भिन्न भिन्न
स्थितियों के साथ सामन्जस्य एवं सहिष्णुता इसके लिए परम जरूरी है।
विन्रमता एक दिन का परिणाम नहीं हो सकता है विन्रमता के लिये धैर्य एवं
निरन्तर आध्यात्मिक विचारों का समावेश ही जीवन सुरभित बना सकता है।
विन्रमता विकास की जननी है। विन्रम व्यक्ति का जीवन ही सर्वप्रिय व जनप्रिय
हो सकता है। सही मायने मंे विन्रमता के संस्कार ही जीवन को नई दिशा देने
में सक्षम है।
-राष्ट्रीय संयोजक-अणुव्रत लेखक मंच
लाडनूं (राजस्थान)
मोबाइल-9413179329
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