बुधवार, 3 मई 2023

अमृतपाल के भिंडरावाले के गांव से गिरफ्तार होने के मायने

 

अवधेश कुमार 

अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ से संबंधित जानकारियां अभी बाहर नहीं आ रही हैं । पंजाब के अंदर भी उसकी गिरफ्तारी के बाद कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन सामने नहीं आया है। यह थोड़ी राहत देने वाली बात है। किंतु 36 दिनों बाद अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी जिस तरीके से हुई उसके संदेश चिंताजनक हैं। आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के गांव रोड़े को अमृतपाल द्वारा चयन बताता है कि उसने अपनी गिरफ्तारी को मनमाफिक मोड़ देने में सफलता पाई। पंजाब पुलिस के महानिरीक्षक (मुख्यालय ) डॉ. सुखचैन सिंह गिल का बयान है कि पुलिस ने 35 दिन से दबाव बनाया था। इंटेलिजेंस विंग के पास रोडे गांव में अमृतपाल की मौजूदगी का इनपुट था। उसे नाका लगाकर घेर लिया गया, लेकिन वह गुरुद्वारा साहिब के अंदर था। मर्यादा को देखते हुए पुलिस अंदर नहीं गई। अमृतपाल से बाहर आने के लिए कहा गया, फिर उसे गिरफ्तार किया गया। क्या इसे सच मान लिया जाए? पुलिस बता रही है कि अमृतपाल बैसाखी के दिन यानी 14 अप्रैल को समर्पण करना चाहता था। उसने बठिंडा में तलवंडी साबो स्थित तख्त दमदमा साहिब में समर्पण करने की योजना बनाई थी । पंजाब पुलिस ने इसका पता चलने पर दमदमा साहिब में सुरक्षा कड़ी कर दी थी। इसके बाद वह 22 अप्रैल को रोडे गांव पहुंचा। 

ठीक है कि पुलिस ने वहां जबरदस्त घेराबंदी की थी। किंतु सच यही है कि उसने हीरो की तरह गिरफ्तारी दी। समाचार यह भी है कि अमृतपाल के करीबियों ने ही पंजाब पुलिस को उसकी आत्मसमर्पण योजना के बारे में बताया था। पुलिस टीम सादे कपड़ों में गुरुद्वारे पहुंची और सुबह ही उसे गिरफ्तार किया। पुलिस दावा कर सकती है कि अमृतपाल की गिरफ्तारी के समय ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे अलगाववादियों को मुद्दा बनाने का मौका मिले। किंतु उसकी गिरफ्तारी पुलिस की योजना से हुई यह नहीं माना जा सकता। रोडे गांव में बने संत खालसा गुरुद्वारे के ग्रंथी का बयान है कि अमृतपाल शनिवार रात को गांव पहुंचा था। उसने गुरुद्वारे में मत्था टेका। रविवार सुबह गिरफ्तारी से पहले उसने पांच ककार (केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा) पहने और लाउडस्पीकर से लोगों को संबोधित किया। प्रश्न है कि उसे इतना मौका कैसे मिला? अगर पुलिस को उसके रोड़े गांव में होने की जानकारी थी तो उसे गुरुद्वारा में प्रवेश के पहले ही गिरफ्तार किया जा सकता था। स 36 दिनों से पुलिस ने सारी ताकत झोंक दी किंतु अमृतपाल को योजना के अनुसार गिरफ्तार करना संभव नहीं हुआ। इस बीच जितनी जानकारियां आई उनमें कितना सच था यह तभी पता चलेगा जब अमृतपाल बताएगा कि इतने दिनों तक वह कहां - कहां रहा। अगर  गांव के ग्रंथि बता रहे हैं कि अमृतपाल शनिवार की रात ही गांव पहुंचा था तो यही सच माना जाएगा। अमृतपाल की गिरफ्तारी के संदर्भ में यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुबई से आने के बाद सरेआम ऐसा सब कुछ कर रहा था जिसे रोका जाना चाहिए था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि एक अनाम व्यक्ति कैसे पंजाब में आकर इतना शक्तिशाली और लोकप्रिय हो गया कि उसके आह्वान पर हजारों लोग इकट्ठे होने लगे। पंजाब पुलिस प्रशासन द्वारा पूरी ताकत झोंकने के बावजूद अगर 36 दिनों तक वह छिपा रहा तो इसी कारण क्योंकि उसके समर्थकों में ऐसे लोग हैं जिन्होंने पुलिस दबाव के बावजूद उसे नहीं छोड़ा। पंजाब पुलिस के लिए उसकी गिरफ्तारी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। पुलिस ने जो स्थिति पैदा कर दी थी उसमें आज न कल उसे पकड़ में आना ही था लेकिन उसने भारत सहित पूरी दुनिया में अपने समर्थकों को संदेश दे दिया कि वह पंजाब में अपने विचारों के साथ पैर जमा चुका है। 

ध्यान रखिए, 29 सितंबर 2022 को रोड़े गांव के गुरुद्वारे में ही अमृतपाल को वारिस पंजाब दे का प्रमुख घोषित किया गया था। उस समय इकट्ठी भीड़ और उसका भाषण बता रहा था कि उसे भारत विरोधी शक्तियों ने पूरी तरह तैयार कर भेजा है। गिरफ्तारी से पहले रोडे गांव के गुरुद्वारे में प्रवचन के दौरान अमृतपाल ने कहा कि गिरफ्तारी अंत नहीं शुरुआत है । यह जरनैल सिंह भिंडरांवाले का जन्म स्थान है। उसी जगह पर हम अपना काम बढ़ा रहे हैं और अहम मोड़ पर खड़े हैं। एक महीने से जो कुछ हो रहा है, वह सभी ने देखा है। हम इसी धरती पर लड़े हैं और लड़ेंगे। जो झूठे केस हैं, उनका सामना करेंगे। इस तरह स्वयं को खालसा के रूप में  प्रस्तुत कर प्रवचन देना कैसे संभव हुआ ? कितनी दयनीय स्थिति है कि खुलेआम खालिस्तान की बात करने वाला व्यक्ति, जिसे पुलिस हर हाल में गिरफ्तार करना चाह रही हो वह सरेआम लोगों के बीच भिंडरावाले की तरह स्वयं को पेश कर भारत विरोधी तकरीरें देने में सफल हो जाता है । जैसी सूचना है वह सुबह से ही अपनी हर गतिविधि की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाता रहा। पंजाब सहित विश्व भर में  रिकॉर्डिंग भेजकर वह संदेश देने की कोशिश करेगा कि जरनैल सिंह भिंडरावाले के खाली स्थान का सपना पूरा करने के लिए वह पूरी तरह लगा हुआ है लेकिन पुलिस ने अन्यायपूर्ण तरीके से उसे पकड़ा। उसने लड़ने की बात की है। 

वास्तव में वह अपने पक्ष में सिखों की भावना भड़काने के उद्देश्य ही सब कुछ कर रहा था। 

18 मार्च को फरार हो जाने के बाद पुलिस जांच से यह पता चला कि अमृतपाल के दुबई से पंजाब लौटने के पीछे एकमात्र उद्देश्य भिंडरावाला भाग-2 बनना था। इसीलिए वह दुबई से पहले जार्जिया गया और वहां भिंडरावाले  जैसा दिखने के लिए सर्जरी कराई। पंजाब आने के साथ उसने भिंडरावाले के कपड़ों से लेकर बोलने के अंदाज तक की नकल की। कल्पना कर सकते हैं कि उसके पीछे कितने लोगों का दिमाग लग रहा होगा।  पंजाब में भिंडरावाले के अलगाववादी विचारों को फैलाने की इतनी व्यापक तैयारी से आने वाले व्यक्ति की जैसी सख्त निगरानी होनी चाहिए थी वैसी होती तो उसकी हैसियत इतनी न बढ़ती। पुलिस प्रशासन राजनीतिक नेतृत्व की दिशा के अनुसार ही भूमिका निभाती है। भगवंथ सिंह मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार गठित होने के बाद पूरा देश यह देखकर भौंचक था कि सड़कों पर खालिस्तानी झंडे लिए खालिस्तान का नारा लगाते लोग जुलूस निकाल रहे थे और पुलिस उनको सुरक्षा दे रही थी। इसमें अमृतपाल को एक बड़े वर्ग का हीरो बनना ही था। अजनाला थाने का घेराव चरम बिंदु था जिसने प्रशासन को अहसास करा दिया इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आगे पंजाब को संभालना मुश्किल होगा। तब भी अमृतपाल पर शिकंजा कसने के कदम नहीं उठाए गए। पुलिस उस दिन भी उसे साथियों के साथ गिरफ्तार कर सकती थी। आज न कल पंजाब की वर्तमान सरकार को इसका उत्तर देना होगा कि आखिर फरवरी 2022 से भारत आने के बाद वह जैसे चाहा खालिस्तान के पक्ष में बोलता अपना समूह गठित करता रहा पर किन कारणों से उसे रोकने की कोशिश नहीं की गई?

हम यह नहीं कहते कि फरार होने के बाद पुलिस का उस पर दबाव नहीं बढ़ा। जहां-जहां उसके छिपने या जिनके बारे में मदद देने की सूचना मिली उन सबको पुलिस पकड़ती रही और काफी लोग उसे शरण देने से भयभीत होने लगे थे। उसके फरार होने के 24 से 48 घंटों के बीच 78 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।  400 से अधिक को हिरासत में लिया गया और 350 से अधिक को छोड़ा जा चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाकर उसके नौ साथियों को डिब्रूगढ़ जेल भेजा जा चुका था। 10 अप्रैल को पप्पलपीरीत सिंह की गिरफ्तारी के बाद लगने लगा था कि वह  पकड़ में आ जाएगा। अमृतपाल के व्यक्तिगत संबंध ज्यादा विकसित नहीं हुए थे कि सीधे किसी के घर चला जाए। पप्पलप्रीत व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर उसे छिपने और पहुंचने में मदद करता रहा। उसके गिरफ्तार होने के बाद अमृतपाल के लिए ठिकाने बदलना जरा कठिन हो गया। हालांकि इसके बावजूद लगभग दो सप्ताह तक पुलिस की पकड़ में नहीं आना असामान्य स्थिति मानी जाएगी। उसके बाद पुलिस को संवेदनशील स्थानों पर उसकी उपस्थिति या गिरफ्तारी देने की संभावनाओं के प्रति ज्यादा सतर्क रहना चाहिए था। पुलिस को ध्यान रखना चाहिए था कि अगर वह भिंडरावाले भाग-2 बनने आया था तो उसके गांव में वह प्रवेश न कर पाए। इस आधार पर विश्लेषण किया जाए तो कहना होगा कि भिंडरावाले के गांव स्थित गुरुद्वारा में आना और गिरफ्तार होना पुलिस की रणनीतिक चूक है। उसे पूरी तैयारी से पंजाब भेजने वाली भारत विरोधी शक्तियां संतुष्ट होंगी कि उसने अंततः भिंडरावाले के नाम और गांव को सुर्खियों में लाकर अलगाववाद की भावना जगा दिया। संतोष का विषय है कि शीर्ष सिख संस्थाओं का सहयोग अमृतपाल को नहीं मिला । उसने फरार होने के बाद दो वीडियो और एक ऑडियो जारी किया। इसमें सिखों की सर्वोच्च संस्था कहे जाने वाले अकाल तख्त के जत्थेदार से तलवंडी साबो में 13-14 अप्रैल को बैसाखी पर सरबत खालसा (सिखों की धर्मसभा) बुलाने की मांग रखी। जत्थेदार ने इसे नकार दिया।  शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति भी खुलकर अमृतपाल के समर्थन में नहीं आई। यह बताता है कि पंजाब में अलगाववादी विचारों को सिखों के बहुमत का समर्थन नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में अमृतपाल का भिंडरावाले के गांव और गुरुद्वारे में पहुंच जाना चिंतित करता है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -1100 92 , मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 2 मई 2023

तारिक फतेह आदर्श मुसलमान थे

श्याम कुमार

इस्लाम का जब भारत में आगमन हुआ तो वह दो धाराओं में अग्रसर हुआ। पहली धारा उन कट्टरपंथी मुसलिम आक्रांताओं की थी, जो आए तो थे भारत की समृद्धि की चर्चा सुनकर यहां की सम्पदा लूट ले जाने के उद्देश्य से, किन्तु यहां का वैभव देख उनकी आंखें चकाचौंध हो गईं तथा धीरे-धीरे वे यहीं रहकर उस सम्पदा का उपभोग करने लगे। चूंकि वे इसलाम के कट्टर रूप के अनुयायी थे, इसलिए उन्होंने तलवार के बल पर यहां के लोगों को मुसलमान बनाना शुरू किया और हिंदुओं पर भीषण अत्याचार किए। औरंगजेब उसी कट्टरपंथी धारा का प्रतिरूप था। 

दूसरी उदारपंथी धारा उन मुस्लिमों की थी, जिन्होंने दिल से भारत और भारतीय संस्कृति को अपना समझा तथा उसे आत्मसात किया। इस धारा का पुरोधा औरंगजेब का ही बड़ा भाई दाराशिकोह था, जिसकी निर्मम हत्या कर औरंगजेब ने राजगद्दी हथिया ली थी। दारा षिकोह की उदारपंथी एवं भारतीय संस्कृति को अपना समझने वाली परम्परा में मलिक मुहम्मद जायसी, डॉ. अब्दुल कलाम आदि हुए। डॉ. अब्दुल कलाम ऐसे उदारवादी मुसलमान थे, जो शाकाहारी थे तथा गीता पाठ करते थे।  

तारिक मुहम्मद डॉ. अब्दुल कलाम की ही अनुकृति थे। वह जाने-माने स्तम्भकार एवं लेखक थे। तारिक मुहम्मद का जन्म 20 नवम्बर, 1949 को कराची में हुआ था तथा 73 वर्श की आयु में गत 24 अप्रैल, 2023 को उनका कनाडा में निधन हो गया। वह लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्हें भारत से इतना प्रेम था कि कहा करते थे कि वह ऐसे हिन्दुस्तानी हैं, जिसका जन्म पाकिस्तान में हुआ था। वह पाकिस्तान के कटु आलोचक थे तथा भारत का जो विभाजन हुआ, उसकी निंदा करते थे। अपने विचारों के कारण जब पाकिस्तान में उनकी जान को खतरा उत्पन्न हो गया था तो वर्ष 1987 में वह कनाडा चले गए थे और वहां की नागरिकता ले ली थी। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। मूलतः पाकिस्तानी होने के बावजूद वह अपने को पूरी तरह भारतीय कहा करते थे। वह कहते थे कि कट्टरपंथियों ने इसलाम को भीषण क्षति पहुंचाई है तथा ‘मुल्ला के इस्लाम’ के बजाय ‘अल्ला के इस्लाम’ का अनुसरण किया जाना उचित है।

डॉ. अब्दुल कलाम चूंकि महान वैज्ञानिक थे तथा भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे, इसलिए कट्टरपंथी मुसलमान उनका उस प्रकार खुलकर विरोध करने का साहस नहीं कर सके, जैसा उन्होंने तारिक फतेह के खिलाफ अपनी भड़ास निकालकर किया। कट्टरपंथियों ने बंगलादेश की प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ भी इसी प्रकार मोर्चा खोला था। तसलीमा नसरीन से कट्टरपंथी मुसलमानों की नाराजगी इस बात से थी कि उन्होंने अपने ‘लज्जा’ उपन्यास में बंगलादेश के कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा वहां हिंदुओं पर किए गए रोंगटे खड़े कर देने वाले अत्याचारों की सच्ची घटनाओं का चित्रण किया था। उन ह्रदयविदारक घटनाओं में एक घटना यह थी कि कट्टरपंथी मुसलिम एक परिचित हिंदू परिवार के घर में घुसकर मां के सामने उसकी बच्ची से सामूहिक बलात्कार करने लगते हैं। लाचार मां सामूहिक बलात्कार कर रहे उन परिचित मुसलमानों से बच्ची की जान की भीख मांगते हुए कहती है कि वे धीरे-धीरे बलात्कार करें, अन्यथा बच्ची मर जाएगी। चूंकि हमारे देश में सत्ता पर काबिज नेहरू वंष हमेषा कट्टरपंथी मुसलिमों का सरपरस्त रहा, इसलिए उसने तसलीमा नसरीन को भारत में षरण व संरक्षण देने के बजाय कट्टरपंथी मुसलिमों के पक्ष में काम किया। 

जिस प्रकार उदारवादी इसलाम को दारा षिकोह की हत्या से भारी क्षति पहुंची थी, तारिक फतेह के निधन से वैसी ही भारी क्षति उदारवादी इसलाम को पहुंची है। तारिक फतेह कट्टरपंथी मुसलिमों की बातों का तर्कपूर्ण उत्तर दिया करते थे। लेकिन अधिकतर मुसलिमों के दिमाग में बचपन से ही मजहबी कट्टरता इतनी कूट-कूटकर भर दी जाती है कि वे तारिक फतेह की बातों को तर्क की कसौटी पर समझने के बजाय उनसे घृणा करते थे और उन्हें अपना बहुत बड़ा दुश्मन मानते थे। टीवी की परिचर्चाओं में ऐसे उदाहरण कई बार देखने को मिले। एक बार तो एक मुस्लिम महाशय तारिक फतेह को अपशब्द कहते हुए परिचर्चा से उठकर चले गए थे। 

जब योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया था तो टीवी पर एक मुस्लिम महिला ने आलोचनात्मक स्वर में इसका उल्लेख करते हुए तारिक फतेह से सवाल किया था। उत्तर में तारिक फतेह ने कहा था कि इलाहाबाद का मूल नाम प्रयागराज ही था, जिसे अकबर ने जानबूझकर बदलकर इलाहाबाद कर दिया था। इसलिए विरोध तो अकबर के उस कृत्य का किया जाना चाहिए, जिसने प्रयागराज को उसके असली नाम से वंचित कर दिया था।  
एक बार रजत शर्मा के प्रसिद्ध टीवी कार्यक्रम ‘आप की अदालत’ में तारिक फतेह पेष हुए थे। उस प्रसारण में जज की कुरसी पर षायर मुनव्वर राना बैठा हुआ था। उसे उस कुरसी पर बैठे देखकर प्रसारण देखने वालों ने माथा पीट लिया था कि रजत षर्मा ने ‘अवार्ड वापसी गिरोह’ के इस कम्युनल सदस्य को अपने कार्यक्रम में जज क्यों बना दिया! लोगों की आषंका सही निकली और तारिक फतेह की उचित बातों की मुनव्वर राना ने जिस घटिया रूप में भर्त्सना की थी, उसे सुनकर मुनव्वर राना के प्रति जनमानस का विरोध-भाव घृणा-भाव में बदल गया था। 

हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां आजादी से पहले तो इसलाम का कट्टरपंथी रूप प्रभावी रहा ही, आजादी के बाद भी जिन लोगों के हाथ में सत्ता आई, वे कट्टरपंथी इसलाम का पोषण करने में लगे रहे। मोदी एवं योगी सरकारों के आगमन से पूर्व हमारे देश के सत्ताधारियों द्वारा कट्टरपंथी मुसलमानों को हमेशा जमकर संरक्षण व बढ़ावा दिया गया। जिन्ना तथा उसके अनुयायियों की यह मांग थी कि हिंदू व मुसलमान दो अलग कौमें हैं, जो एक साथ नहीं रह सकतीं और इसलिए मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान का निर्माण किया जाय। मुसलमानों की वह मांग मानकर मजहब के आधार पर देश का बंटवारा कर दिया गया, जिसके बाद भारत स्वाभाविक रूप से अपनेआप हिंदू राष्ट्र हो गया। लेकिन टांग अड़ाकर जवाहरलाल नेहरू ने भारत को ‘सेकुलर’ घोषित करा दिया। परिणाम यह हुआ कि बंटवारे के बाद बड़ी संख्या में कट्टरपंथी मुसलमान हमारे यहां बने रह गए, जो अभी भी देश के लिए भारी सिरदर्द बने हुए हैं। इसी कट्टरता के कारण तारिक फतेह के निधन पर हमारे यहां कुछ लोगों ने जश्न मनाया। सच्चाई तो यह है कि तारिक फतेह के निधन से वस्तुतः इसलाम का ही नुकसान हुआ है, क्योंकि इसलाम का कल्याण उसके उदारवादी रूप में ही होगा, न कि कट्टरतावादी रूप में। 

श्याम कुमार, सम्पादक, समाचारवार्ता, ईडी-33 वीरसावरकर नगर (डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ, मोबाइल-09415002458, 7905405266     ईमेलःkshyam.journalist@gmail.com दिनांकः 3 मई, 2023  



02-05-2023 To 08-05-2023 (15.51)









 

सोमवार, 1 मई 2023

गांधीनगर विधायक अनिल बाजपेई ने एमसीडी के मुख्य अभियंता अनिल त्यागी से गांधीनगर विधानसभा में विकास कार्यों को ले चर्चा की

आज गांधीनगर के विधायक श्री अनिल बाजपेई ने दिल्ली नगर निगम के मुख्य अभियंता श्री अनिल त्यागी जी से गांधीनगर विधानसभा में विकास कार्यों को लेकर चर्चा की।
1.गांधीनगर के विधायक श्री अनिल बाजपेई जी ने बताया कि मुख्य अभियंता जी ने कहा कि विधायक फंड से  शंकर नगर एक्सटेंशन की गली नंबर 1 में 1 करोड़ 35 लाख की लागत से कार्य का वर्क ऑर्डर हो गया है और शीघ्र ही इसका कार्य शुरू हो जायेगा।
2.चंद्रपुरी नाले की सफाई का भी टेंडर पास हो गया वहां पर भी जल्दी काम शुरू होगा।
3.अजीत नगर की जिन गलियों का विधायक फंड से काम होना था उसका भी वर्क ऑर्डर हो गया है जल्दी ही इन गलियों का काम शुरू हो जायेगा।
4.गांधीनगर विधानसभा के अन्तर्गत जितने MCD के पार्क आते हैं उन सभी का रखरखाव किया जाएगा।
 

'रत्ती' की वास्तविकता, यह आम बोलचाल में आया कैसे?

"रत्ती" यह शब्द लगभग हर जगह सुनने को मिलता है। जैसे - रत्ती भर भी परवाह नहीं, रत्ती भर भी शर्म नहीं, रत्ती भर भी अक्ल नहीं...!!
आपने भी इस शब्द को बोला होगा, बहुत लोगों से सुना भी होगा। आज जानते हैं 'रत्ती' की वास्तविकता, यह आम बोलचाल में आया कैसे?
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रत्ती एक प्रकार का पौधा होता है, जो प्रायः पहाड़ों पर पाया जाता है। इसके मटर जैसी फली में लाल-काले रंग के दाने (बीज) होते हैं, जिन्हें रत्ती कहा जाता है। प्राचीन काल में जब मापने का कोई सही पैमाना नहीं था तब सोना, जेवरात का वजन मापने के लिए इसी रत्ती के दाने का इस्तेमाल किया जाता था।
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस फली की आयु कितनी भी क्यों न हो, लेकिन इसके अंदर स्थापित बीजों का वजन एक समान ही 121.5 मिलीग्राम (एक ग्राम का लगभग 8वां भाग) होता है।
तात्पर्य यह कि वजन में जरा सा एवं एक समान होने के विशिष्ट गुण की वजह से, कुछ मापने के लिए जैसे रत्ती प्रयोग में लाते हैं। उसी तरह किसी के जरा सा गुण, स्वभाव, कर्म मापने का एक स्थापित पैमाना बन गया यह "रत्ती" शब्द।
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