शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

यह परिणति जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी

अवधेश कुमार

कई बार हमारे सामने जो कुछ घटित होता है उसके महत्व को नहीं समझ पाते। बड़ी - बड़ी घटनाएं भी हमें सामान्य लगती है। अतीक अहमद को प्रयागराज के सांसद विधायक न्यायालय द्वारा दी गई उम्र कैद की सजा आज सामान्य लग सकता है। उसने अपराध किया और उसकी सजा हुई। जिन्होंने 80 और 90 के दशक के उत्तर प्रदेश में अतीक और उसके पूरे गैंग या जुड़े हुए लोगों के कारनामे देखे हैं उनके लिए यह कल्पना करना भी कठिन था कि उसके विरुद्ध पुलिस की कोई बड़ी कार्रवाई हो सकती है। जिस व्यक्ति के विरुद्ध थाने में प्राथमिकी लिखवाने का अर्थ अपने साथ परिवार और रिश्तेदारों के नष्ट हो जाने का खतरा मोल लेना था उसकी ऐसी दशा होगी इसकी कल्पना की भी नहीं जा सकती थी। जो मामले पुलिस नहीं सुलझा सकती थी वह भी अतीक के पास जाता था। उसके पास दूसरे को अपने अनुसार बोलने, काम करने को विवश करने के लिए पूरी प्रणाली थी। फोन पर आदेश देकर बुलाना, न आने पर उठा लेना, टॉर्चर करना, मनमाने तरीके से जहां चाहो हस्ताक्षर करवाना और जो चाहो बुलवा लेना अतीक अहमद के तंत्र का सामान्य क्रियाकलाप था। अतीक को साबरमती जेल से प्रयागराज लाने या बुलडोजर की कार्रवाई उसे वापस ले जाने सहित अन्य घटनाक्रमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। इस पर एक ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी कि दुर्दांत अपराधी, जिसने पूरे प्रदेश की सत्ता तक को उंगलियों पर रखा उसके और उससे जुड़े लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। इसकी जगह आपको इतने किंतु परंतु मिलेंगे , संविधान कानून का हवाला दिया जाएगा कि ऐसा लगता है मानो अतीक और उसके लोगों के साथ उपयुक्त व्यवहार नहीं हो रहा और योगी आदित्यनाथ की सरकार ही अन्यायी और अपराधी है।

इसका पहला निष्कर्ष तो यही है कि प्रदेश में यदि योगी सरकार नहीं होती तो अतीक को सजा दिलाना या बुलडोजर से संपत्तियों को ध्वस्त करना तो छोड़िए इतने लंबे समय तक जेल में रखना संभव नहीं होता। सपा के नेता- प्रवक्ता चाहे जितने गुस्से का प्रदर्शन करें सच यही है अतीक अहमद अपने जीवन का 21 वर्ष उसी पार्टी में रहा और सामान्य सदस्य के रूप में नहीं। उसे पांच बार विधायक एवं एक बार सांसद समाजवादी पार्टी ने ही बनाया। क्या सपा के नेतृत्व को अतीक के आपराधिक साम्राज्य का पता नहीं था? सब कुछ जानते हुए उसे विधानसभा और लोकसभा में लाकर आम लोगों का नियति निर्धारक बनाना क्या साबित करता है? 

ध्यान रखिए, उसके विरुद्ध पहला मुकदमा 1979 में दर्ज हुआ । इस तरह उसे सजा तक लाने में 44 वर्ष लगे हैं। उस पर 100 मुकदमे दर्ज होने के आंकड़े हैं। इस समय करीब 50 मामले न्यायालय में चल रहे हैं। इनमें हर प्रकार के जघन्य अपराध शामिल हैं। जो पुलिस प्रशासन अतीक के विरुद्ध आक्रामक होकर कानूनी सीमाओं में इस स्तर की कार्रवाई कर रहा है वही पहले उसके सामने नतमस्तक क्यों था? जो लोग भी भय और भ्रष्टाचार से मुक्त राज व्यवस्था व समाज की कामना करते हैं उन्हें राजनीतिक विचारधारा या समर्थन विरोध से परे हटकर इस प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए। जिन लोगों ने साहस करके मुकदमा दर्ज किया उनकी दशा क्या हुई इसकी छानबीन करेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जिस उमेश पाल अपहरण कांड में अतीक को उम्रकैद की सजा हुई उसमें उसके वकील खान सौलत हनीफ को भी उम्र कैद मिली है। ऐसे मामले विरले होते हैं जिसमें मुख्य आरोपी के साथ उसका वकील भी उतना ही बड़ा अपराधी साबित हुआ हो। उमेशपाल का अपहरण कर लाया गया तो वह पूरे कागजात तैयार करके रखा था जिस पर उसे हस्ताक्षर करना था और यही बयान उसे पुलिस और न्यायालय के समक्ष देना था। ध्यान रखिए, तब सपा का कार्यकाल था और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। उमेशपाल ने अतीक के पक्ष में बयान दिया। कल्पना करिए, जिस उमेशपाल ने मित्र राजूपाल की हत्या की कानूनी लड़ाई का संकल्प किया और उसी में उसकी जान भी गई उसने किन परिस्थितियों में अतीक के पक्ष में गवाही दी होगी! जब मायावती 2007 में मुख्यमंत्री बनी तभी उसके विरुद्ध कार्रवाई नए सिरे से आरंभ हुई। उमेशपाल ने प्राथमिकी दर्ज कराई तथा विरुद्ध बयान दिया। हालांकि मायावती भी अपने शासनकाल में अतीक के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया को मुकाम तक नहीं ले जा सकीं क्योंकि उनके विधायकों और मंत्रियों में भी उससे संपर्क- संबंध रखने वाले थे और जिनका स्वयं भ्रष्टाचार और अपराध का अतीत था। उनके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार में तो कोई उसे स्पर्श करने की सोच भी नहीं सकता था। उस दौरान उसके विरुद्ध मायावती शासन काल में मुकदमा दर्ज करने वालों की हालत क्या रही होगी इसकी कल्पना भी आसानी से की जा सकती है। वह केवल 1999 से 2003 तक अपना दल में रहा। 2004 में सपा ने ही उसे पंडित जवाहरलाल नेहरू के क्षेत्र फूलपुर से उम्मीदवार बनाकर लोकसभा भेज दिया। यह समय केंद्र में यूपीए सरकार का कार्यकाल था। प्रदेश में 3 वर्ष तक मुलायम सिंह यादव की सरकार रहेगी। 2014 में भी अगर नरेंद्र मोदी की लहर नहीं होती तो अतिक्रमण लोकसभा पहुंच जाता।

 चाहे कोई कितना बड़ा अपराधी बाहुबली माफिया हो अगर वह माननीय बन गया तो  विशेषाधिकार हो जाते हैं और सामान्यतः पुलिस प्रशासन उसके विरुद्ध मुकदमे लेने, कार्रवाई करने से तब तक बचता है जब तक राजनीतिक नेतृत्व प्रत्यक्ष परोक्ष हरी झंडी नहीं दे देता। योगी आदित्यनाथ सरकार में भी आरंभ में उसके विरुद्ध कार्रवाई की गति अत्यंत धीमी रही। लंबे समय तक प्रदेश में ऐसे अपराधियों माफियाओं और अंडरवर्ल्ड के लिए हर स्तर का इंफ्रास्ट्रक्चर यानी आधारभूत संरचना सशक्त हो गया। इन सबको तलाश कर ध्वस्त करना आसान नहीं है। सरकार के समक्ष समस्या कानून और उसकी प्रक्रियाओं के पालन करते हुए कार्रवाई की होती है जबकि माफियाओं और अपराधियों के समक्ष अपनी तथा तंत्र की रक्षा करने -छिपाने के लिए कोई बाध्यता नहीं। बावजूद योगी आदित्यनाथ सरकार की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने इतने बड़े माफिया को इस स्थिति में ला दिया कि केवल आदेश पर हत्या और अपहरण कराने वाले की पत्नी और बच्चे को भी स्वयं हत्या करने के लिए सामने आना पड़ा। उनके सामने अब बचने का कोई चारा नहीं है। यानी पूरे परिवार के कानूनी रूप से खत्म होने की आधारभूमि। विधानसभा में जब मुख्यमंत्री ने इस माफिया को मिट्टी में मिला देंगे की घोषणा की उसी समय अतीक और उसके साम्राज्य के अंत का संकेत मिल गया। 

लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि आखिर सड़क से उसे इतनी दूर प्रयागराज लाने की आवश्यकता क्या थी? निस्संदेह, उसे हवाई जहाज या रेल से भी लाया जा सकता था। सड़क से लाने की घोषणा के साथ ही देश भर में चर्चा होने लगी कि या तो गाड़ी पलटेगी या उसको मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। यह भय पूरे रास्ते आने और लौटने तक अतीक के अंतर्मन में रहा होगा, उसके परिवार और रिश्तेदार एवं समर्थक भी हर क्षण इसी चिंता में डूबे रहे होंगे कि पता नहीं कब उसका अंत कर दिया जाए। यह कानूनी भी सही है और इससे अपराध करने वाले के अंदर यह एहसास हुआ होगा कि अगर उसने न किया होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। इससे दूसरे अपराधियों -आतंकवादियों -माफियाओं के अंदर भी संदेश गया होगा कि तुम्हारी भी दुर्दशा ऐसी ही होगी। अपराध उन्मूलन या नियंत्रण के क्षेत्र में डेटरेंट यानी भय निवारक शब्द का प्रयोग होता है। इसका अर्थ है कि ऐसी कार्रवाई करें जिसे देखकर भय से दूसरे अपराधी अपराध करना छोड़ दें और नए अपराधी तैयार नहीं हो हो। उम्मीद करनी चाहिए साबरमती जेल से नैनी जेल लाने और  यहां से ले जाने के प्रसंग का ऐसा ही असर हुआ होगा। न जाने ऐसे लोगों के कितनी संख्या होगी जिन्हें अतीक के कारण परिवार, रिश्तेदार, दोस्त की जान गंवानी पड़ी होगी, संपत्तियां छोड़नी पड़ी होगी या भय से पलायन कर चुप कर रहना पड़ा होगा। इन सबके साथ सही न्याय की शुरुआत हो गई है। इसमें बिना लाग लपेट  कहा जा सकता है कि उमेशपाल हत्याकांड की कानूनी परिणति भी वही होगी जो होनी चाहिए। 

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 9811027208

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

अमेरिकी शिक्षाविद ने लिखा संघ और भाजपा को समझा नहीं गया इनकी बुनियाद गंभीर विचारधारा पर आधारित है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और  भाजपा विश्व के प्रत्येक कोने में गहन चर्चा व बहस का विषय बना हुआ।  इस कारण जब भी कहीं किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त मीडिया में कुछ प्रकाशित- प्रसारित होता है तो देखते-देखते सुर्खियां बन जाता है । हाल में अमेरिका के जाने-माने शिक्षाविद और वॉल स्ट्रीट जर्नल के स्तंभकार वाल्टर रसेल मिड ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के बारे में जो कुछ लिखा उस पर पूरी दुनिया में बहस चल रही है। चूंकि भारत में 2024 लोकसभा चुनाव का माहौल बन रहा है इसलिए इसको भी उस संदर्भ में देखा जा रहा है। मिड ने लिखा है कि वर्ष 2014 और 2019 के आम चुनावों में लगातार भारी जीत के बाद अब भाजपा 2024 में भी सफलता की ओर बढ़ रही है। इसे सुर्खियां बनना ही था। किंतु उनके लेख का महत्वपूर्ण बिंदु 2024 का चुनावी आकलन नहीं है। संघ और भाजपा  की पृष्ठभूमि,विचारधारा ,उसके चरित्र के बारे में जो कुछ उन्होंने लिखा वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। किसी भी सांस्कृतिक राजनीतिक संगठन और उसकी विचारधारा को उसकी सोच तथा  वहां के भौगोलिक सांस्कृतिक धार्मिक राजनीतिक अवधारणाओं के आलोक में ही समझा जा सकता है । वाल्टर मिड ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इस संदर्भ में उनकी तीन बातें महत्वपूर्ण है।

•एक , भाजपा ऐसे अनोखे राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास की बुनियाद पर खड़ा है जिससे भारतीय मूल्य और संस्कृति से परिचित लोग ही समझ सकते हैं।

•दो, भाजपा विश्व की सबसे महत्वपूर्ण विदेशी राजनीतिक पार्टी है पर इसको संभवत सबसे कम समझा गया है।

•  तीन, बुनियाद कौन सी है? उनके लेख का स्वर यही यह भी है कि भाजपा को समझने के लिए संघ को भी समझना होगा।

 उन्होंने संघ के बारे में लिखा है एक समय में हाशिए पर पड़ी विचारधारा के आधार पर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन चलाने वाला या संगठन दुनिया का सबसे मजबूत नागरिक संगठन है। ध्यान रखिए ,दुनिया भर में चर्चा का विषय बना वाल्टर मीट का यह आलेख राहुल गांधी द्वारा लंदन में संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड के समतुल्य बताने के बयान के तुरंत बाद आया है। विश्व में राहुल गांधी की बात पर बहस होगी या मिड की? हालांकि विरोधी इससे खुश हो सकते हैं कि भाजपा की व्याख्या करते हुए मिड ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड का नाम लिया है। उनके अनुसार भाजपा दुनिया की जीन तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियों कीसबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों को साथ लाती हैं वे हैं,इजरायल की लिक्विड पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना और मिस्र की मुस्लिम ब्रदरहुड। हालांकि इसे उन्होंने उस तरह नहीं लिया जैसे राहुल गांधी ने कहा। 

•उन्होंने लिखा है कि मुस्लिम ब्रदरहुड की तरह भाजपा पश्चिमी उदारवाद के कई विचारों और वरियताओं को खारिज करती है, आधुनिकता की प्रमुख विशेषताओं को अपनाती है। 

•चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तरह भाजपा एक अरब से अधिक लोगों वाले राष्ट्र की अगुवाई करती है ताकि वह वैश्विक महाशक्ति बन सके। 

•इजराइल के लिक्विड पार्टी की तरह भाजपा परंपरागत मूल्यों के साथ बाजार उन्मुख की अर्थव्यवस्था अपनाती है। 

इसे केवल अमेरिका और वॉल स्ट्रीट के प्रसार क्षेत्रों के पाठकों को भाजपा आर्य से समझाने की दृष्टि से दिया गया उदाहरण मानना चाहिए। दुनिया में संघ और भाजपा की तरह दूसरा कोई संगठन नहीं है जिससे उसकी तुलना की जाए । जो उदाहरण उनके समक्ष है उसे उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। इसमें भी वह अपने दृष्टिकोण से भाजपा को इन सबसे अलग भी बताते हैं। 

•उन्होंने कहा कि भाजपा उन लोगों को भी आत्मसात करती है जो पश्चिमी संस्कृति और राजनीतिक विशेषता के चलते वर्षों से खुद को उपेक्षित व हाशिए पर महसूस करते थे।

•इस तरह वह संघ और भाजपा के संघ को विश्व का अनोखा संगठन तथा इससे निकली भाजपा को भी सभी उपलब्ध पार्टियों से अलग साबित कर देते हैं।

• वे लिखते हैं,अमेरिकी विश्लेषक विशेष रूप से वामपंथी उदारवादी अक्सर नरेंद्र मोदी के भारत को देखकर पूछते हैं कि यह डेनमार्क जैसा क्यों नहीं है? उसे अल्पसंख्यक विरोधी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन करने वाला मानते हैं। लिखते हैं कि वे यह नहीं समझते कि भारत एक जटिल जगह है। पूर्वोत्तर के ईसाई बहुल राज्यों में भी भाजपा ने उल्लेखनीय राजनीतिक सफलता प्राप्त की है। 

मेग्ने संघ भाजपा के महत्वपूर्ण नेताओं के साथ घोर विरोधियों तथा समर्थकों से मुलाकात करने के बाद अपनी स्थापना दी है । उन्होंने संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी भेंट की और वह सारे प्रश्न पूछे जो दुनिया भर में उठाए जाते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि उन्होंने केवल इनके उत्तर को ही सच मान लिया हो। लेकिन ध्वनि है कि इसे उन्होंने जांच आप रखा है । 

मोहन भागवत के बारे में और कहते हैं कि उन्होंने भारत के बढ़ते आर्थिक विकास पर बातचीत की । अल्पसंख्यक भेदभाव आदि पर भी उनका मत मिलने समझा।  इसके बाद वे कह रहे हैं कि कट्टर नेता माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ किसी तरह के भेदभाव के विचार को सिरे से खारिज कर दिया। उनके अनुसार वे चाहते हैं कि उनके प्रदेश के सभी नागरिक समृद्धि और भारत की समृद्धि में योगदान दें।

 •एक अमेरिकी होते हुए भी उन्होंने इस सच्चाई को रेखांकित किया है कि आरएसएस के यहां तक पहुंचने के पीछे हजारों स्वयंसेवकों की कई पीढ़ियां खपीं है। 

•उन्होंने लिखा है कि स्पष्ट और सीमित सामाजिक आंदोलन के साथ शुरू हुए राष्ट्रीय नवीनीकरण के आंदोलन में सामाजिक विचार को और कार्यकर्ताओं की पीढ़ियों के प्रयास लगे हैं ताकि स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म को आधुनिकीकरण की ओर ले जाया जा सके। 

जब हमारे ही देश के लोग हिंदू धर्म, हिंदुत्व राष्ट्र आदि की सही समझ नहीं रखते तो हम यह कल्पना नहीं कर सकते की पश्चिम का एक व्यक्ति हिंदुत्व, हिंदू धर्म आदि को बिल्कुल सही संदर्भों में समझ ले। बावजूद उन्होंने दुनिया ही नहीं भारत में भी उन लोगों की आंखें खोलने की कोशिश की है जो अभी तक संघ और उससे निकले संगठनों की विकासधारा को समझ नहीं पाए हैं। पीढिय़ां से उनका तात्पर्य क्या है?

•1925 में डॉ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापना के बाद गिनती करना मुश्किल है कि कितनी संख्या में प्रचारकों ने पूरा जीवन संघ और उससे निकले संगठनों के विस्तार तथा सशक्तिकरण में लगा दिया। 

•इस तरह  का चरित्र विश्व के किसी संगठन में नहीं है। विद्वेष, घृणा, उग्रता जैसी विचारधारा वाले संगठन को इस तरह जीवनदानी कार्यकर्ताओं की फौज नहीं मिल सकती। 

अमेरिकी वाल्टर रसेल मिड के इस विश्लेषण के बाद भारत के बाहर भारी संख्या में रुचि रखने वाले संघ और भाजपा तथा इससे जुड़े अन्य संगठनों को पूर्वाग्रह रहित होकर समझने की कोशिश करेंगे। भारत के अंदर भी संघ तथा भाजपा विरोधियों को ठहर कर अवश्य विचार करना चाहिए कि क्या उनकी धारणा  सही है?

आलोचक कह सकते हैं कि मिड ने अमेरिका के रणनीतिक भविष्य की दृष्टि से भी भाजपा और संघ का विश्लेषण किया है। यानी उद्देश्य से की गई व्याख्या है। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी लोग भाजपा और संघ के साथ जुड़ने के निमंत्रण को खारिज करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि चीन के साथ तनाव बढ़ रहा है और अमेरिका को आर्थिक राजनीतिक साझेदार के रूप में भारत की जरूरत बढ़ती जा रही है। उनके विश्लेषण को यहीं तक खारिज करने का मतलब सच को पूरी तरह नकारना हो होगा।

अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों के पत्रकार- लेखक संघ और भाजपा के बारे में अक्सर अपने दृष्टिकोण से ही समझते व लिखते बोलते रहे हैं। भारत में भी ऐसे लोगों की ज्यादा संख्या है जो उनके दृष्टिकोण को ही प्रतिबिंबित करते हैं। नेशन स्टेट, नेशनलिज्म, रिलीजन, रिलीजियस या थियोक्रेटिक स्टेट, कल्चर, स्वदेशी आदि का उनका अनुभव और ज्ञान हमेशा संघ भाजपा के बारे में टिप्पणी करने पर हाबी रहता है। इसलिए राष्ट्र राज्य, हिंदू राष्ट्र, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व आदि को हमेशा उग्र सांप्रदायिक मजहबी और संकीर्ण राष्ट्रीयता के रूप में व्याख्यायित किया गया है। भारतीय संदर्भ में इन शब्दों के मायने बिल्कुल अलग है यह समझने की कोशिश जिन कुछ पश्चिमी विद्वानों ने कि उन्हें अपनी ही दुनिया में मान्यता नहीं मिली। यह नहीं कहते कि वाल्टर रसेल मीट ने संपूर्ण रुप से भारत तथा संघ और भाजपा के दृष्टिकोण के अनुरूप विचार किया है। किंतु उन्होंने संघ और भाजपा के लोगों से मिलने तथा उनके साहित्य के अध्ययन करने के बाद काफी हद तक पूर्वाग्रह से परे हटकर संघ, उससे जुड़े अन्य संगठनों तथा भाजपा को सही परिपेक्ष में समझने की कोशिश की है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल 98110 27208

मंगलवार, 28 मार्च 2023

गुरुवार, 23 मार्च 2023

पंजाब के चिंताजनक हालात पर अधिक सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता

अवधेश कुमार

पंजाब में अमृतपाल एवं उसके साथियों के विरुद्ध कार्रवाई से पूरे देश ने राहत महसूस किया है। अमृतपाल के चाचा सहित उसके प्रमुख साथियों को मिलाकर डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है । इसे पूरी तरह दुरुस्त आयद न कहें  देर आयद कह सकते हैं । पिछले करीब 6 महीने से अमृतपाल की गतिविधियों ने पूरे पंजाब और वहां नजर रखने वाले सभी को भयभीत कर दिया था। अमृतपाल की हरकतों को पहले ही सख्ती से रोक दिया जाता तो नौबत यहां तक नहीं आती। उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए लगाकर लुकआउट सर्कुलर जारी करना पड़ा है। हरियाणा एवं पंजाब उच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणियां मुख्यमंत्री भगवंत मान सहित पंजाब सरकार एवं आम आदमी पार्टी को भले नागवार गुजर रही हो किंतु सच्चाई तो यही है। न्यायालय ने पूछा है कि आखिर 80 बजार पुलिस क्या कर रही थी? वास्तव में 23 फरवरी को अमृतसर जिले के अजनाला थाने का पूरा दृश्य आतंकित करने वाला था। हजारों लोग जिस तरह थाने को बंधक बनाकर पुलिस वालों पर ईंट पत्थर बरसा रहे थे उस पर पहली नजर में यकीन करना कठिन था। ऐसा नहीं है कि अमृतपाल के साथियों के भारी संख्या में पहुंचने और उधम मचाने की सूचना खुफिया एजेंसियों को नहीं थी।  पंजाब सरकार ने खतरे को देखते हुए भी कार्रवाई से बचने की खतरनाक आत्मघाती प्रवृत्ति अपनाई थी। पूरे देश को आश्चर्य हुआ जब थाने पर हमले के बाद पुलिस ने तूफान सिंह को रिहा करने की घोषणा कर दी जिस पर अपहरण कर मारपीट करने का आरोप था। हालांकि बाद में वह न्यायालय के आदेश से ही रिहा हुआ पर पुलिस ने उसकी जमानत का विरोध नहीं किया। स्थानीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का बयान था कि अमृतपाल ने जो जानकारी दी उसके अनुसार तूफान सिंह घटनास्थल पर था ही नहीं। यानी पुलिस के लिए अमृतपाल के साक्ष्य मान्य हो गए थे।

ध्यान रखिए वर्तमान कार्रवाई मुख्यमंत्री भगवान सिंह मान की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद हो रही है। इसका अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं । पुलिस की वर्तमान चुस्ती और सख्ती बताती है कि पहले भी ऐसा हो सकता था।

जम्मू कश्मीर के बाद पंजाब ऐसा सीमावर्ती राज्य है जहां हिंसा व अलगाववाद ने पूरे देश को लंबे समय तक दहलाया है। आतंकवाद ने वहां 70 हजार  से ज्यादा लोगों की जानें ली है। सीमा पार पाकिस्तान से हो रहे षड्यंत्रों एवं अमेरिका यूरोप सहित अन्य देशों से अलगाववादियों मिल रहे सहयोग का ध्यान रखते हुए भगवंत मान सरकार की पहली प्राथमिकता सुरक्षा व्यवस्था ही होनी चाहिए थी। सरकार के व्यवहार से ऐसा कभी झलका नहीं। पूरे देश ने देखा जब खालिस्तानी झंडा लिए लोग सड़कों पर नारे लगा रहे हैं और पुलिस उन्हें सुरक्षा दे रही है। इससे अलगाववादियों - आतंकवादियों सहित पूरी दुनिया में भारत विरोधियों का हौसला बढ़ा होगा। अमृतपाल पिछले वर्ष सितंबर में दुबई से आया और धीरे-धीरे वह इतनी बड़ी हैसियत प्राप्त कर गया तो क्यों? पंजाब के आम लोगों को तो पता था कि वहां स्थिति बिगड़ रही है। क्या सरकार को इसका आभास नहीं था?दमदमी टकसाल में जब अमृतपाल को भिंडरावाले की गद्दी दी जा रही थी तो उसकी सूचना निश्चय ही सरकार के पास पहुंची होगी। वहां का पूरा दृश्य डरावना था। भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक नारों से गूंजता कार्यक्रम हस्तक्षेप की मांग कर रहा था। इसलिए यह प्रश्न तो उठेगा कि सरकार आंखें मुद्दे क्यों रही?

यह संभव नहीं कि प्रदेश और केंद्र की सुरक्षा एजेंसियों ने आप सरकार के मुखिया और शिर्ष पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों को पंजाब के अंदर और बाहर की गतिविधियों से सूचित नहीं किया होगा। विचार करने वाली बात है कि एक ट्रक ड्राइवर अमृतपाल अचानक दुबई से पंजाब लौटता है और धीरे-धीरे हीरो बन जाता है। उसके बोलने का अंदाज, उसकी तर्क शैली आदि स्पष्ट बता रहा था कि उसे पूरी तरह तैयार करके पंजाब भेजा गया। कहा जा रहा है कि वह आनंदपुर टास्क फोर्स बना रहा था। पंजाब पर काम करने वाले जानते हैं कि 1973 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से ही वर्तमान खालिस्तान आंदोलन को हवा मिली थी। इसमें पंजाब को स्वायत्त प्रदेश बनाने की मांग की गई थी। इसमें रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा को छोड़कर सारी शक्तियां राज्य को देने की मांग की गई थी। 24 जुलाई 1985 को पंजाब में उदारवादी लोकप्रिय संत हरचरण सिंह लोंगोवाल एवं राजीव गांधी के बीच समझौता हुआ जिसमें पंजाब की स्वच्छता की बात नहीं थी। उग्रवादियों ने संत लोगोंवाल की एक गुरुद्वारे में ही हत्या कर दी। अमृतपाल के पीछे की शक्तियों ने पंजाब को उसी तरह के आग में झोंकने के षड्यंत्र के तहत ही उसे दुबई से भेजा होगा। उसने योजनाबद्ध तरीके से पंजाब में नशे के विरुद्ध समाज की सोच पर फोकस किया और जगह-जगह नशा मुक्ति केंद्र खोला। इसमें युवाओं को साथ जोड़कर उसने अलग-अलग तरह के कार्यक्रम कराए। युवा उसकी ओर आते गए। नशा विरोधी अभियान के साथ बारिश द पंजाब के संगठन पर उसका नियंत्रण बहुत कुछ कह रहा था। उसके साथ आए युवाओं ने ऐसी हरकतें करनी शुरू की जो कानून के राज में सहन नहीं किया जाना चाहिए। वे सिगरेट पीने से लेकर तंबाकू सेवन करने वाले को सरेआम मारते पीटते थे। अमृतसर में निहंगों ने एक युवक को पीट-पीटकर मार डाला। नशा मुक्ति केंद्र अमृतपाल के लिए निजी सेना तैयार करने का स्थान बन गया। अमृतपाल के कार्यक्रम जगह-जगह लोगों में डर पैदा कर रहे थे क्योंकि उनके साथी हिंसा , तोड़फोड़ और हंगामे के पर्याय बन बन गए थे। इसी महीने आनंदपुर में कनाडा से निहंग बनने आए एक युवक को निहंगों द्वारा मार डालने की खबर आई क्योंकि वह उन्हें हुल्लड़बाजी से रोकने की कोशिश कर रहा था। एक समय था जब किसी निहंग को देख कर लोग अपनी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हो जाते थे। अब स्थिति बदल चुकी है।

वास्तव में पंजाब की स्थिति बिल्कुल चिंताजनक है। अमृतपाल का पकड़ा जाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि उससे पता चलेगा कि देश और विदेश की कौन शक्तियां उसके पीछे हैं। किंतु पंजाब की स्थिति संभालने के लिए इसके साथ काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है। आखिर भगवंत सिंह मान के द्वारा खाली की गई संगरूर लोकसभा सीट से खालिस्तान समर्थक सिमरनजीत सिंह मान की जीत क्यों हुई? वह पंजाब के अंदर उभर रहे खतरनाक मनोवृति की ही परिणति थी। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान खालिस्तान समर्थकों की गतिविधियां दिल्ली से लेकर पंजाब एवं देश के बाहर अमेरिका, कनाडा , ब्रिटेन आदि में साफ दिखाई पड़ रही थी। संगरूर चुनाव प्रचार के बीच आ रहे समाचारों से साफ लग रहा था कि मान को जिताने की पूरी कोशिश हो रही है। आम विश्लेषण यही है कि पंजाब को में नए सिरे से अलगाववाद व हिंसा चाहने वालों ने माना कि सिमरनजीत सिंह मान उम्र के इस पड़ाव पर नेतृत्व देने में सक्षम नहीं हो सकते। इसी से अमृतपाल सिंह की हैसियत बड़ी। जरनैल सिंह भिंडरावाले को भी उभरने में समय लगा था जबकि अमृतपाल दुबई से आने के दो - ढाई महीने के अंदर ही इस धारा का जाना - पहचाना और प्रभावी चेहरा बन गया। यह सब यूं ही तो नहीं हो सकता। अमृतपाल को पहले रोक देते तो उसके साथ युवाओं की इतनी बड़ी फौज नहीं खड़ी होती। हजारों युवक और आम लोग अगर उसके विचारों से प्रभावित हो चुके हैं तो उन सबको मुख्यधारा में कैसे लाया जाएगा यह बड़ा प्रश्न पंजाब के समक्ष खड़ा है। भगवंत मान सरकार अभी तक स्थिर पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति नहीं कर पायी है। अभी तक तदर्थ नियुक्ति से काम चलाया जा रहा है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। जब तक प्रौपर नियुक्त पुलिस महानिदेशक नहीं होगा पुलिस को सही नेतृत्व नहीं मिल सकता।

अमृतपाल के उभार एवं वर्तमान स्थिति से सीख लेकर न केवल भयानक भूल सुधारने बल्कि भविष्य की दृष्टि से पूर्वोपाय करने की आवश्यकता है। वैसे अजनाला में अमृतपाल के लोगों ने जिस तरह पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब को ढाल बनाकर प्रवेश किया उससे पंजाब के अंदर नाराजगी भी है। इस नाराजगी का लाभ सरकार और पंजाब की शांति के लिए कार्यरत सामाजिक - धार्मिक - सांस्कृतिक संगठनों को मिलेगा। पंजाब के बहुसंख्यक लोग न कभी अलगाववाद के साथ थे न हो सकते हैं। किसी भी सरकार के लिए यह बहुत बड़ी ताकत है। किंतु इस ताकत का लाभ तभी मिलेगा जब अलगाववादी,हिंसक, लंपट और हुड़दंग  समूहों के प्रति प्रशासन का बर्ताव हमेशा कठोर रहे। तात्कालिक रूप से अमृतपाल और उसके साथियों के विरुद्ध कार्रवाई का असर होगा पर राजनीतिक नेतृत्व की सोच और दिशा बदलने के बाद ही पुलिस प्रशासन पंजाब की दृष्टि से अनुकूल भूमिका निभा सकेगा।

अवधेश कुमार  ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल 98110 27208

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