शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

हिजाब मामला: उच्चतम न्यायालय का जल्दी फैसला आना सबके हित में होगा

अवधेश कुमार


 हिजाब मामले पर उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ का खंडित फैसला इसलिए चिंताजनक है क्योंकि ऐसे विवादों का न्यायिक निपटारा जल्दी होना आवश्यक है। अब चूंकि यह बड़ी पीठ के पास जाने वाला है तो अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है। दो न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया जबकि न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने स्वीकार करते हुए कहा कि यह अंततः पसंद का मामला है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शिक्षालयों में हिजाब पर प्रतिबंध का निर्णय खत्म करने से इनकार करते हुए कहा था कि हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। इसके विरुद्ध 26 याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में आई थी। न्यायमूर्ति गुप्ता ने अपने फैसले में लिखा कि हमने 11 प्रश्न तैयार किया और उनके जवाब याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध गए हैं। उनके अनुसार इस सूची में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं के अधिकार की परिधि और गुंजाइश संबंधी सारे प्रश्न शामिल है। दूसरी ओर न्यायमूर्ति धूलिया ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के एप्रोच को गलत बताते हुए कहा कि उच्च न्यायालय को कुरान की व्याख्या की दिशा में जाना ही नहीं चाहिए था। उनके अनुसार इसमें लड़कियों की शिक्षा सबसे अहम मामला है।

 इन दोनों न्यायमूर्तियों ने जिस तरह का फैसला दिया है उससे इसमें व्यापक संवैधानिक एवं मजहबी अधिकारों के प्रश्न निहित हो गए हैं। हालांकि इसके आधार पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कर्नाटक सरकार से शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने पर रोक से जुड़े आदेश वापस लेने की मांग उचित नहीं मानी जा सकती। जब कोई फैसला आया नहीं तो जाहिर है कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला अभी तक लागू है। जब उच्चतम न्यायालय में अंतिम फैसला हुआ ही नहीं तो फिर उच्च न्यायालय के फैसले को अमान्य करार देने का आधार हो ही नहीं सकता। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया द्वारा इसमें धार्मिक प्रथाओं की पूरी अवधारणा को निस्तारण के लिए आवश्यक नहीं मानने के तर्क का उदाहरण देना और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता के तर्कों को खारिज कर देना बिल्कुल गलत होगा। न्यायमूर्ति गुप्ता ने स्पष्ट कहा है कि उन्होंने मौलिक अधिकार से लेकर निजी स्वतंत्रता का अधिकार, हिजाब पहनना अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं, स्कूल में हिजाब पहनने के अधिकार की मांग छात्र कर सकते हैं या नहीं आदि सभी संबंधित प्रश्नों के जाने और सभी याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध हैं। वास्तव में न्यायमूर्ति गुप्ता ने मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद पर भी विचार किया । मसलन क्या अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार परस्पर अलग है या वे एक दूसरे के पूरक हैं? इनका उत्तर भी याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नहीं गया।

वास्तव में जब कर्नाटक ने अक्टूबर 2021 में शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर पाबंदी लगाई थी तो कई प्रकार के तर्क दिए गए थे लेकिन सबसे प्रबल मजहबी अधिकार का विषय ही था। यद्यपि कानूनी और संवैधानिक पहलुओं के जानकारों ने इसे उस दृष्टि से पेचीदा बनाया पर एक बड़ा वर्ग मुसलमानों के अंदर यही धारणा बैठाने में कामयाब रहा था कि लड़कियों को शिक्षालय में हिजाब पहनने की अनुमति न देना उनके मजहबी अधिकारों को छीनना है। सच कहा जाए तो ऐसे विषय न्यायालय में जाने ही नहीं चाहिए थे। अगर कोई शिक्षण संस्थान अपने यहां ड्रेस कोड बनाता है तो जो उसे स्वीकार करेगा वह वहां अध्ययन करेगा जो नहीं करेगा वहां नहीं जाएगा। किसी मजहब, जाति, संप्रदाय के छात्र-छात्राओं के लिए किसी शिक्षालय का ड्रेस कोड बदल दिया जाए यह खतरनाक प्रवृत्ति पैदा करेगा। आज मुस्लिम छात्राओं का मामला है, कल हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई, यहूदी किसी का मामला आ सकता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में अनेक जातियों समूहों का विषय उभर सकता है। अगर इस तरह सबको मौलिक अधिकार व निजी स्वतंत्रता आदि के दायरे में ला दिया जाए तो किसी संस्थान में अनुशासन, नियम आदि लागू हो ही नहीं सकता। कल्पना करिए फिर कैसी अराजकता की स्थिति पैदा होगी।

आज चाहे संवैधानिक अधिकारों की जितनी बात किए जाए, जितनी धाराओं का उल्लेख हम कर दें सच यही है की सामान्य ड्रेस पहनकर स्कूल आने वाली छात्राओं को निश्चित रूप से कुछ गलत इरादे वाले लोगों ने हिजाब पहना कर कॉलेज भेजा था। इसके पीछे कट्टर मजहबी मनोवृति के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता। यह साफ हो गया कि किस तरह कट्टर मजहबी तत्वों ने हिजाब को एक हथियार बनाकर कर्नाटक में अशांति पैदा करने का षड्यंत्र रचा। इसे नजरअंदार कर केवल संवैधानिक, कानूनी, निजी अधिकार, शिक्षा के अधिकार जैसे विषयों में उलझाया जाए तो यह सच की अनदेखी करना होगा जिसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकते। अगर पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग ने हिजाब के पक्ष में आवाज उठाई  उसके पीछे कोई एक सोच है तो वह इस्लाम है। इसलिए इससे अलग करके इस मामले को नहीं देखा जा सकता। न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा है कि छात्र अपने धार्मिक विश्वास से सेक्यूलर संस्थान में लागू नहीं कर सकते तथा ड्रेस कोड तय करने का अधिकार देने वाला सरकारी आदेश कानून का उल्लंघन नहीं है। इसके पीछे हिजाब को इस्लाम से जुड़ा हुआ बताया गया था जबकि न केवल जस्टिस गुप्ता ने बल्कि कर्नाटक उच्च न्यालय ने स्पष्ट किया और अनेक इस्लामी विद्वान भी कहते हैं कि हिजाब कभी भी इस्लाम का अपरिहार्य नहीं रहा। न्यायमूर्ति गुप्ता का यह तर्क भी गलत नहीं है कि अगर हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा मान लिया जाए तो भी सेक्यूलर शिक्षण संस्थान में इसे पहनने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। सेक्यूलरवाद सभी नागरिकों पर लागू होना चाहिए। किसी एक मजहबी समुदाय को उसके मजहब के रिवाजों के अनुसार खास पहनावे की छूट देना सेक्यूलरवाद की अवधारणा के विपरीत होगा।

न्यायमूर्ति धूलिया के इस तर्क को हम खारिज नहीं कर सकते कि देश में लड़कियों की शिक्षा अहम मामला है। किंतु आखिर वही लड़कियां, जो कल तक सामान्य ड्रेस में आती थी अंततः हिजाब पहनने की जिद पर क्यों आ गई? हिजाब पहने तभी हम शिक्षा ग्रहण करें इस प्रकार की जबकि  के पीछे मजहब की गलत अवधारणा के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। यह भी न भूलिए हिजाब पहनने वाली लड़कियों ने अल्लाह हो अकबर का भी नारा लगाया था।

यह देश के लिए चिंताजनक स्थिति है कि किसी शिक्षालय का एक सामान्य आदेश पूरे देश में मजहबी अधिकारों से लेकर मौलिक अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शिक्षा के अधिकार और न जाने मानवाधिकार के किन-किन पहलुओं का विषय बन गया। इतने बड़े-बड़े वकील उच्चतम न्यायालय में हिजाब पहनने के पक्ष में खड़े हो गए जिससे लगा कि अगर लड़कियों ने हिजाब नहीं पहना तो देश पर पहाड़ टूट जायेगा। था कि लड़कियां हिजाब पहनकर नहीं आए तो उन्हें नहीं आना चाहिए था और बात खत्म हो जानी चाहिए। इतना छोटा विषय अगर संविधान की व्याख्या तक चला जाए और मजहब के शीर्ष नेताओं सहित भारत के नेता ,बुद्धिजीवी ,पत्रकार, संविधानविद सभी कूद पड़े तो मान लेना चाहिए कि समाज की सोच ज्यादा समस्या ग्रस्त हो चुकी है।  मुस्लिम समुदाय के ही कुछ तत्वों ने आम मुसलमानों में डर पैदा करने की कोशिश की है कि भाजपा सरकार मुसलमानों एवं इस्लाम के विरुद्ध काम कर रही है। यानी हिजाब विवाद पर हम झुक गए तो फिर आगे हमारे अनेक मजहबी अधिकार ऐसे ही खत्म कर दिए जाएंगे। 

तीन तलाक पर उच्चतम न्यायालय के फैसले तथा सं इसके विरूद्ध पारित कानून को इस्लाम के विरुद्ध बताकर लगातार दुष्प्रचार किया गया है। जाहिर है, ऐसे ही तत्वों ने जानबूझकर हिजाब को इतना बड़ा मुद्दा बनाया और आज स्थिति यह हो गई है कि काफी संख्या में लड़कियां विद्यालय नहीं आ रही। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो ही नहीं सकता। अच्छा हो कि अभी भी इस की लड़ाई लड़ने वाले लोगों को सुविधाएं तथा इसे यहीं समाप्त कर दें। हालांकि इसकी उम्मीद कम है पुलिस ने तो फिर माननीय उच्चतम न्यायालय ही जल्दी इसका फैसला कर दे। जो भी फैसला है उसे सभी शिरोधार्य करें। ऐसा न हो कि उच्चतम न्यायालय ने अगर अनुकूल फैसला नहीं दिया तो उसे पलटने के लिए फिर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश हो।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

धर्म परिवर्तन आस्था का विषय है लेकिन राजनीतिक रैलियों वाली आक्रामकता चिंता पैदा करती है

 अवधेश कुमार

टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों पर एक साथ कुछ हजार लोगों को यह कहते सुनें कि हम राम, कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भगवान नहीं मानेंगे और उनकी पूजा नहीं करेंगे तो भ अंतर्मन में एक साथ गुस्सा और हैरत के भाव पैदा होंगे। 7 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली के अंबेडकर भवन का यह दृश्य निश्चित रूप से हमारे आपके जेहन में लंबे समय तक कायम रहेगा। आयोजकों का दावा है कि 10 हजार दलितों ने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया है। हमारा संविधान व्यक्ति को अपने इच्छानुसार किसी भी धर्म को त्यागने, अपनाने और उपासना करने की स्वतंत्रता देता है। इस नाते जिन लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया यह उनके व्यक्तिगत आस्था का मामला है। किंतु इसके साथ कुछ दूसरे पहलू भी जुड़े हैं। दो चार लोग या परिवार धर्मांतरण करते हैं तो बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं होता। हालांकि अंदर प्रश्न उठता रहता है कि इन्होंने अपना धर्म त्याग कर अचानक जिस धर्म से इनका वास्ता नहीं रहा उसे कैसे स्वीकार लिया होगा? वर्तमान धर्म परिवर्तन में भी यह प्रश्न उठ रहा है कि एक साथ इतनी संख्या में लोगों को कैसे हिंदू धर्म अस्वीकार्य लगा और बौद्ध धर्म के प्रति उनकी आस्था घनीभूत हो गई? आयोजन में दिल्ली प्रदेश के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम की सक्रियता ने मामले को ज्यादा विवादास्पद बना दिया है।आयोजन में दिल्ली प्रदेश के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम गौतम की सक्रियता ने मामले को ज्यादा विवादास्पद बना दिया। हालांकि कार्यक्रम के तीसरे दिन उन्हें इस्तीफा देना पड़ा लेकिन गौतम ने पहले अपना बचाव किया और बाद में कहा कि हम किसी धर्म के विरुद्ध टिप्पणी नहीं कर सकते।

कुछ बातें यहां ध्यान रखना जरूरी है।

एक,  पंथ और उपासना पद्धति व्यक्तिगत आस्था का मामला है। किंतु क्या वाकई इस आयोजन को व्यक्तिगत आस्था का मामला मान लिया जाए।

दो, हमारे आपके विश्लेषण पर निर्भर है कि राम कृष्ण ब्रह्मा विष्णु महेश को देवता नहीं मानने और उसकी पूजा न करने की शपथ किसी धर्म धर्म और उपासना पद्धति का अपमान है या नहीं?

तीन, हिंदुओं के बड़े समूह ने इसे अपने धर्म और देवी-देवताओं का अपमान माना है।

चार, हिंदू धर्म इतना उदार और व्यापक है कि इसके अंदर अनेक मत मतांतर रहे हैं और सब को सम्मान प्राप्त हुआ है। शिव के उपासकों ने विष्णु की आलोचना की तो विष्णु के उपासकों ने शिव की और इन दोनों ने काली और दुर्गा की आलोचना की। किसी ने इन सबका सम्मान किया और सब के बीच समन्वय स्थापित किया। इस नाते विचार करें तो हमें इनकी भावना का सम्मान करना चाहिए।

पांच,आयोजकों की भाषा इतनी हैं उदार और विनम्र नहीं है। समारोह में डॉ. अंबेडकर के पड़पोते राजरत्न अंबेडकर ने लोगों को शपथ दिलाई। शपथ के रूप में बाबा साहेब की 22 प्रतिज्ञाओं को दोहराया जिनमें हिंदू देवी- देवताओं को न मानने और उनकी पूजा करने की बात थी। उनके वक्तव्य में हिंदू धर्म और भारतीय समाज व्यवस्था को लेकर आक्रामकता भरी हुई है। इनका कहना है कि बाबा साहब अंबेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 को स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद चंद्रपुर में सामूहिक धर्म परिवर्तन के कार्यक्रम में जो 22 शपथ दिलवाए थे वही हमने दिलवाया है तो इसमें गलत क्या है? हमारे देश में अपने किसी कदम को सही ठहराने के लिए कोई न कोई महापुरुष सामने ला रख दिया जाता है। बाबा साहब ऐसे महापुरुष हैं जिनके नाम पर कुछ भी करो का माहौल हो गया है।

यहां भी कुछ तथ्य देखें।

•बाबा साहब ने 1935 में हिंदू धर्म त्यागने की घोषणा की थी। किंतु उन्होंने 20 वर्ष बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया। 

  •इसके बाद 1 साल से थोड़ा ही ज्यादा जी सके और 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई। 

•यानी वे जिंदा होते तो अपने धर्म परिवर्तन पर उनका क्या मत होता और अभियान को क्या स्वरूप देते यह कहना मुश्किल है।

•बाबा साहब एक राजनीतिक व्यक्ति थे धार्मिक महापुरुष या बौद्ध भिक्षु नहीं। 

उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और अपने साथ लोगों को कराया लेकिन यह धर्म बदलने का मार्ग या आधार नहीं हो सकता। धार्मिक कार्य धर्म क्षेत्र के व्यक्तियों के विचारों और व्यवहारों के द्वारा ही हो सकता है।

• बाबा साहब ने जो प्रतिज्ञाएं दिलाई वो बौद्ध धर्म के अंग नहीं थे। मूल बौद्ध धर्म में तीन ही प्रतिज्ञाएं स्वीकार्य हैं -

बुद्धम शरणम गच्छामि। धर्मं शरणं गच्छामि। संघम शरणम गच्छामि। कोई धर्म बदलेगा तो वह यही तीन प्रतिज्ञाएं स्वीकार करेगा। अंतिम प्रतिज्ञा केवल बौद्ध भिक्षुओं के लिए है।

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू से बौद्ध, जैन, सिख आदि बनने को धर्म परिवर्तन नहीं मानती है। इन पर आपत्ति भी नहीं जताती हैं। कारण, इन्हेः हिंदू धर्म के उपांग के रूप में ही देखती है। किंतु जब यह स्वाभाविक धन परिवर्तन का आयोजन नहीं लगता तो इस पर प्रश्न उठाया जाना चाहिए। ऊंच-नीच छुआछूत निश्चित रूप से हमारे समाज की कोढ है। बावजूद यह नहीं कहा जा सकता है कि डॉ आंबेडकर के समय की तरह ही जाति भेद की खाई आज भी बनी हुई है तथा सामाजिक आर्थिक रूप से दलितों की दशा बिल्कुल वैसी ही है। धर्म परिवर्तन राजधानी दिल्ली में हुआ है। यहां आसानी से पता भी नहीं चलता कि हमारे आस पास बैठा हुआ व्यक्ति किस जाति का है। किसी मंदिर में पूजा करने वाले से उसकी जाति नहीं पूछी जाती और पता लगने पर भी उसके साथ अछूत जैसा व्यवहार नहीं होता। दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुसार संसद राज्य विधायिका स्थानीय निगाहें से लेकर नौकरियों में आरक्षण मिला है। कहने का तात्पर्य कि बहुत कुछ बदला है। अंबेडकर द्वारा धर्म बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे बड़ा कारण यही था कि हिंदू धर्म को उन्होंने समाज व्यवस्था के साथ जोड़ा और माना कि इसमें रहते हुए दलित समानता का दर्जा नहीं पा सकते। वह प्रयोग सफल नहीं हुआ क्योंकि बौद्ध बनने के बाद भी आम समाज में वे दलित ही बने रहे। आज ऐसी स्थिति नहीं कि इतनी संख्या में दलितों को समाज व्यवस्था से तंग आकर समानता के लिए बौद्ध धर्म अपनाने की आवश्यकता पड़े। हिंदू धर्म के अंदर ही भारी संख्या में दलितों का सामाजिक उत्थान हुआ है और वह सवर्णों के साथ बराबरी और कहीं-कहीं तो उनसे बेहतर स्थिति में हैं । इस नाते यह आयोजन कई प्रकार के प्रश्न और संदेह पैदा करता है।

 •पिछले कुछ समय की इससे संबंधित गतिविधियां चिंता पैदा करने वाली रही है।

  •हाल के समय में हिंदू धर्म के विरुद्ध दलित आक्रामकता की जैसी आवाज निकली है उनमें समाज को जोड़ने का भाव कम और तोड़ने का ज्यादा है। 

• हिंदू मुस्लिम एकता की जगह दलित मुस्लिम गठजोड़ की कोशिश संदेह पैदा करती है।

•दलित मुस्लिम गठजोड़ की आक्रामक धारा पैदा करने की कोशिश हो रही है। 

•यह बाबा साहब के विचार के बिल्कुल विरुद्ध है। उन्होंने इस्लाम धर्म की जैसी तीखी आलोचना की वैसे दूसरे जगह देखने को नहीं मिलती। 

•आजादी के पहले मुस्लिम लीग के साथ दलितों के गठजोड़ को इसका इसी आधार पर उन्होंने विरोध किया था तथा बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले जाने वाले दलितों की दुर्दशा पर भी वह लगातार मुखर रहे।

 कहने का तात्पर्य यह बाबा साहब का नाम अवश्य लें इस समय वर्तमान दलितवाद चाहे और राजनीतिक हो, गैर राजनीतिक या  धार्मिक बाबा साहब के विचारों और व्यवहारों से इनका रिश्ता न के बराबर है । इनकी भाषा आम समाज के प्रति उग्रता और लताड़ से भरी है। समाज सुधार की भाषा ऐसी नहीं हो सकती। इसमें समाज को जोड़ने का भाव नहीं दिखता जो चिंताजनक है। 

वास्तव में आक्रामक दलितवाद और मुस्लिमों के साथ गठजोड़ का मूल उद्देश्य राजनीतिक है। केंद्र से नरेंद्र मोदी और राज्यों से भाजपा सरकार को सत्ता से हटाने के लिए दलित मुस्लिम समीकरण की बात ज्यादा हो रही है। जब उद्देश्य राजनीतिक हो तो उसके पीछे धार्मिक आस्था केवल बहाना हो सकता है। इसके पीछे कुछ अवांछित शक्तियां भी भूमिका निभा रहीं हैं। राजधानी दिल्ली के अंबेडकर भवन के धर्मांतरण समारोह के भाषणों में राजनीति के स्वर ज्यादा थे और धर्म के कम। राजेंद्र पाल  यह कार्यक्रम कराने वाली संस्था द बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया और जय भीम मिशन के राष्ट्रीय संरक्षक हैं। उनके स्वर में भाजपा के विरुद्ध आलोचना ज्यादा हैं। बौद्ध धर्म सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश देता है। अगर आपकी सोच भाषा और व्यवहार में सत्य, अहिंसा ,करुणा नहीं है तो कहा जाएगा कि बौद्ध धर्म अपना भले लिया लेकिन यह कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना का ही विषय है। बौद्ध के अष्टांग मार्ग में सम्यक सोच, सम्यक व्यवहार ,सम्यक समझ, सम्यय भाषा की बात है। 

इतनी बड़ी संख्या में लोगों का हृदय परिवर्तन कर देना असंभव है। इस बात की जांच होनी चाहिए कि आयोजन की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई और किन बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों ने इनके ह्रदय बदलने के लिए काम किया? वर्तमान दलित एक्टिविज्म ऐसी तिथियों का उल्लेख करता है जो पहले कभी सुना नहीं गया। इस कार्यक्रम की तिथि के रूप में अशोक विजयादशमी लिखा था। इनका मानना है कि अशोक ने जिस दिन कलिंग पर विजय की उसी दिन उसका हृदय परिवर्तन हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकारा। साफ है कि लोगों को लुभाने के लिए ऐसे शब्द गढे जाते हैं। 

आस्था परिवर्तन हृदय का विषय है। आप राजनीतिक भाषा शैली और ऐसे प्रतीकों को अपनाकर किसी के अंतर्मन नहीं बदल सकते। गांधी जी इसी कारण धर्म परिवर्तन के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि समाज सुधार के काम में धर्म परिवर्तन की भूमिका नहीं है। जाहिर है,  धर्म परिवर्तन के पीछे दिए गए तर्कों को स्वीकार करना कठिन है। यह हैरत का विषय है कि सामान्य विवाद व आरोपों पर पत्रकार वार्ताओं द्वारा अपना मत रखने वाली आम आदमी पार्टी इस मामले पर खामोशी बरतती रही। क्यों? क्या गुजरात चुनाव को देखते हुए वह दिल्ली से दलितवाद की ऐसी तस्वीर पेश करना चाहते थे जिनसे दलित मुस्लिम गठजोड़ का एक बड़ा संदेश जाए? केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की राजनीति को समझने वाले इस पहलू को खारिज नहीं कर सकते। कोई अपनी इच्छा से किसी दूसरे धर्म को अपनाए यह उसका विषय है लेकिन सामूहिक रूप से लोगों को भड़का कर धर्म परिवर्तन को आक्रामक रैली में परिणत करना भयावह दृश्य उत्पन्न करता है । इससे समाज और देश का केवल अहित ही होगा । कुल मिलाकर यह क्षोभ और चिंता का विषय है। धर्म मानव को कर्तव्यों के द्वारा मनुष्यता के उच्चतम शिखर पर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है उसे इस तरह राजनीतिक शैली की रैलियां न बनाया जाए यही सबके हित में है। वैसे आर्य समाजी राम, कृष्ण को भगवान नहीं मानते लेकिन महापुरुष मानते हैं। हमारे इतिहास के अनुसार श्री राम इच्छ्वाकू वंश की 65 वीं पीढी थे और महात्मा बुद्ध 123 वीं पीढ़ी। इस नाते वंशावली से भी राम को अपना पूर्वज मानने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अश्वघोष ने महात्मा बुध की जीवनी लिखी है और उसमें वंशावली मिल गई तो फिर इसको अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं। आखिर अश्वघोष बौद्ध मुनि थे।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर काम्प्लेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया ने लालू प्रसाद को सम्मान पत्र दे ईश्वर से उनके स्वस्थ की कामना की


मो. रियाज़

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से दिल्ली के पंडारा पार्क स्थित उनकी बेटी सांसद मीसा भारती के निवास पर मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया का एक दल राष्ट्रीय अध्यक्ष मेहंदी हसन मंसूरी व नेशनल जनरल सेक्रेटरी नियाज़ अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी के साथ मिलने पहुंचा। 

मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया का यह दल लालू प्रसाद यादव के घर इसलिए पहुंचा था क्योंकि मंसूरी समाज की शान इस्राइल मंसूरी को बिहार सरकार में राजद ने अपने कोटे से सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया है।

इस्राइल मंसूरी को बिहार सरकार में मंत्री बनाए जाने पर मंसूरी फेडरशन ऑफ इंडिया ने लालू प्रसाद यादव से मिल उन्हें धन्यवाद देकर एक सम्मान पत्र दिया।

सम्मान पत्र में लालू प्रसाद यादव के लिए लिखा कि महाशय आप देश के महान नेता हैं और आपसे बड़ा कोई सेकुलर नेता नहीं है, आपने वंचित समाज को हमेशा न्याय दिलाया है, साथ ही सत्ता में हिस्सेदारी दी है। हमारे मंसूरी समाज की पूरे देश में 5% और मुस्लिम कौम में 20% की हिस्सेदारी है। इसके चलते आपने पहली बार मंसूरी बिरादरी के जनाब इस्राइल मंसूरी को कांटी विधानसभा से टिकट दिया और उन्हें आपकी वजह से जीत तो मिली ही आपने उन्हें बिहार सरकार में सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री भी बनाया जिसके लिए मंसूरी समाज आपका बहुत आभारी है और हमेशा आभारी रहेगा। मंसूरी फेडरेशन ऑफ इंडिया आपके जज्बे को सलाम करता है और आशा करता है की भविष्य में आपका साथ सदैव मिलता रहेगा।

मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव नियाज अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी ने कहा कि लालू प्रसाद जी की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण उनसे लंबी बातचीत नहीं हो सकी पर उन्होंने पूरे मंसूरी समाज को ऐसे ही कार्य करने के लिए कहा जैसे इस्राइल मंसूरी आपने कार्यक्षेत्र के साथ ही अपने समाज के लोगों को लेकर चल रहे हैं।

पप्पू मंसूरी ने आगे बताया कि इस मौके पर मंसूरी समाज की
आन बान शान इस्राइल मंसूरी भी साथ थे। इस दल का नेतृत्व मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया के नेशनल प्रेसिडेंट महेंदी हसन ने किया। उनके साथ नेशनल जनरल सेक्रेटरी नियाज़ अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी, दिल्ली प्रदेश मीडिया प्रभारी यूसुफ मंसूरी, सेक्रेटरी अब्दुल रहमान, इनाम मंसूरी, जनाब आर डी खान साहब, संगम बिहार टीम से बशारत मंसूरी, रशीद मंसूरी, इशाक मंसूरी। गांधी नगर विधान सभा से इसाक मंसूरी, नौशाद मंसूरी, नबीजन मंसूरी, दीपक शर्मा, सदरे आलम, मंसूरी के अलावा काफी तादात में मंसूरी समाज के लोग शामिल थे।

मंसूरी फैडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष मेहंदी हसन मंसूरी ने लालू प्रसाद यादव को इस्राइल मंसूरी को कांटी विधानसभा से टिकट देने और उन्हें बिहार सरकार में सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बनने के लिए आभार जताया और उनके जल्द स्वस्थ होने की ऊपर वाले से प्रार्थना की।



सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

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