शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

देश को शिखर पर ले जाने का रास्ता

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लालकिला से स्वतंत्रता दिवस का हर संबोधन व्यापक आकर्षण और बहस का विषय रहा है। जाहिर है, अमृत महोत्सव यानी अंग्रेजों से मुक्ति के 75 वर्ष पूरा होने के अवसर के भाषण को विशिष्ट होना चाहिए था। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का दायित्व है कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध मुक्ति के संघर्षों, बलिदानों की याद दिलाते हुए लोगों के अंदर यह भाव पैदा करें कि हमारे पूर्वजों ने अपनी बलि चढ़ा कर हमें आजादी दिलाई है ताकि हमें स्वतंत्रता के मूल्यों का आभास रहे। दूसरे, भारत राष्ट्र के लक्ष्य की दृष्टि से प्रधानमंत्री स्पष्ट रूपरेखा सामने रखें। तीसरे, स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने एवं राष्ट्र के सर्वोपरि लक्ष्य को पाने की दृष्टि से हमारी चुनौतियां क्या है उन दिशाओं में देश कहां-कहां क्या कर रहा है तथा आम भारतीय का दायित्व क्या हैं आदि पर भी प्रभावी शैली से प्रकाश डालें। इन सारे पहलुओं की दृष्टि से विचार करें तो निष्पक्ष निष्कर्ष यही होगा कि अपने करीब 83 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने उन हरसंभव प्रश्नों का उत्तर दिया जो लाल किला से दिया जाना आवश्यक था।

वास्तव में प्रधानमंत्री ने अगर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों व मनीषियों का स्मरण करते हुए राष्ट्र के प्रति उनका योगदान ,उनके लक्ष्यों का आभास कराया तो यह भी विश्वास दिलाने की कोशिश की कि भारत की अंतःशक्ति इतनी मजबूत है, इसमें वह क्षमता है कि आने वाले समय में यह विश्व का श्रेष्ठतम देश बन सकेगा। हां, इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय के नाते हम अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहें उनका पालन करते रहें।

प्रधानमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार व वंशवाद के विरुद्ध आक्रामक प्रहार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। यह आवश्यक भी है। भ्रष्टाचार ने पूरी व्यवस्था के प्रति लोगों के अंदर वितृष्णा भाव पैदा किया है। लोगों में यह धारणा व्याप्त हो चुकी है कि राजनीति और शासन का चरित्र ही भ्रष्ट होता है और इससे मुक्ति नहीं हो सकती। देखा जाए तो वंशवाद यानी भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार काफी हद तक एक दूसरे से अंतर्संबद्ध हैं।  उनका यह कहना देश के लिए चेतावनी थी कि अगले 25 साल में ये दोनों चुनौतियां विकराल रूप ले सकती हैं अगर समय रहते न चेता गया। प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में वही कहा जो सच है। यानी भ्रष्टाचार के प्रति नफरत तो दिखती है लेकिन कभी-कभी भ्रष्टाचारियों के प्रति उदारता बढ़ती जाती है। यह सच है कि लोग इतनी बेशर्मी तक चले जाते हैं कि दोषी साबित होने व सजा के बावजूद उनका महिमामंडित करते हैं। वास्तव में हम भारतीयों के एक वर्ग में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के प्रति संपूर्ण नफरत का भाव नहीं होता है। हम कई बार अपनी जाति, अपने व्यक्तिगत संबंध, अपनी पार्टी, विचारधारा आदि के आधार पर मूल्यांकन करने लगते हैं। इस नाते उनका यह कहना सही है कि जब तक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के प्रति नफरत का भाव पैदा नहीं होता सामाजिक रूप से उसको नीचा देखने के लिए मजबूर नहीं करते तब तक यह मानसिकता खत्म होने वाली नहीं है।

प्रकारांतर से यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक क्रांति का आह्वान है। यानी हर भारतवासी भ्रष्टाचार के प्रति अपने अंदर शून्य सहिष्णुता का संस्कार पैदा करें और कोई भी हो उसके प्रति समाज में नफरत का भाव, उसके विरोध का मानस तथा उसको समाज से अलग-थलग करने का प्रयास होना ही चाहिए। परिवारवाद ने हमारी पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है। परिवारवाद का यह अर्थ नहीं है कि किसी परिवार से निकला हुआ कोई प्रतिभावान व्यक्ति भी आगे न आए। लेकिन परिवार का है इसी कारण उसे राजनीति में, सत्ता में या जहां जो है वह अपने परिवार को महत्व दे, उनको स्थान दे तो इससे प्रतिभाओं का दमन होता है एवं यह देश को खोखला करता चला जाता है। प्रधानमंत्री का यह कहना बिल्कुल सही है कि हमें हर क्षेत्र और संस्था में परिवारवाद और भाई भतीजावाद को लेकर नफरत और जागरूकता पैदा करनी होगी तभी हम अपनी संस्थाओं को बचा पाएंगे। एक भारतीय के नाते हमें आपको प्रधानमंत्री की इस अपील के आधार पर अपना व्यवहार निर्धारित करना है जिसमें उन्होंने कहा कि लाल किले की प्राचीर से संविधान का स्मरण करते हुए देशवासियों से खुले मन से कहना चाहते हैं कि राजनीति की सभी संस्थाओं के शुद्धिकरण के लिए इस परिवारवादी मानसिकता से मुक्ति दिलाकर योग्यता के आधार पर देश को आगे ले जाना होगा। इसे एक लड़ाई बताते हुए अगर प्रधानमंत्री देश के युवाओं से इसमें आगे आने की अपील करते हैं तो यह समझना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं।

वास्तव में परिवारवाद एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब तक सामाजिक दृष्टि से क्रांति नहीं होगी, इसके विरूद्ध संघर्ष नहीं होगा  इसका अंत नहीं हो सकता है।प्रश्न है कि क्या हम सब इस क्रांति में इस लड़ाई में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं?

अगर अपने देश को दुनिया के शिखर पर ले जाना है जैसा प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में घोषित 5 प्रणों में कहा कि अगले 25 साल यानी 2047 आने तक देश को विश्व के शिखर पर ले जाने के लक्ष्य से काम करना है तो हमें भूमिका निभानी ही होगी। पहले  प्रण के रूप में उन्होंने कहा कि देश बड़े संकल्प लेकर चलेगा और वह बड़ा संकल्प है विकसित भारत।  उन्होंने दूसरे प्रण के रूप में कहा कि गुलामी की छोटी से छोटी चीज भी कहीं नजर आए तो उससे मुक्ति पानी होगे।  व्यक्ति व्यवस्था का गुलाम होने के साथ मन को भी गुलामी की जंजीरों में बांध देता है। हमारे विचार गुलामी को प्रतिबिंबित करने लगते हैं।  गुलामी से मुक्ति का अर्थ हर तरह की गुलाम विचारधारा से मुक्ति है। इसके साथ तीसरा प्रण अपनी विरासत के प्रति गर्व का भाव होना चाहिए। हमें यही पढ़ाया गया कि हम तो हमेशा गुलाम थे, हमारे में कोई अच्छाई थी नहीं जबकि हमारी विरासत ने हमें स्वर्णिम काल दिया था। अपने विरासत पर जब गर्व का भाव होगा तो पता चलेगा कि इस भारत नामक राष्ट्र के मायने क्या हैं इनके लक्ष्य क्या हैं। यहीं से भारत के विश्व की प्रमुख शक्ति होने की संपूर्ण रूपरेखा स्पष्ट होगी। इस दृष्टि से चौथा प्रण एकता और एकजुटता का है। 130 करोड़ आबादी वाले विविधताओं के इस देश की एकता और अखंडता को तोड़ने की शक्तियां लगातार सक्रिय रहती हैं। 

भारत की एकता का सूत्र यहां की संस्कृति, विरासत और जीवन शैली में है। अगर यह भाव पैदा है कि हम सब एक भारत की संतान हैं, हमारी विरासत संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही परम तत्व का मानती है है जहां न कोई अपना है न पराया, हम कण-कण में एक ही तत्व को देखते हैं तो न केवल अंतरिक एकता मजबूत होगी बल्कि इसी से भौगोलिक अखंडता भी सुनिश्चित होगी। इसी से जुड़ा हमारा पांचवा प्रण है अपने कर्तव्य के पालन का। अधिकारों की बहुत बात होती है पर कर्तव्यों की याद शायद ही कोई दिलाता है। हमारा हर अधिकार कर्तव्यों के साथ आबद्ध है। भारत की बड़ी समस्या यह है कि हममें से ज्यादातर अपने दायित्वों के प्रति न सतर्क रहते हैं न सचेष्ट। तो हर व्यक्ति अपने दायित्व को समझें। हमारा अपने परिवार और बच्चे के प्रति दायित्व है तो यह भी ध्यान रखें कि पड़ोसी को कष्ट पहुंचेगा तो हम सुखी नहीं रह सकते हैं। इसी को विस्तारित करें तो देश सुखी रहेगा तभी हम सुखी रहेंगे। बगैर कर्तव्यों के न व्यक्तिगत स्तर पर हमारा उत्थान हो सकता है न परिवार न समाज और देश का।

इस तरह देखें तो प्रधानमंत्री का पूरा भाषण भारतीयों के अंदर भारत बोध कराते हुए सभी प्रकार के गुलामी के अवशेषों और समाज एवं राष्ट्र में व्याप्त विद्रूपताओं से मुक्ति और उनके प्रति अपने दायित्व के पालन का भाव पैदा करना रहा है। पूरे भाषण का एक प्रमुख पहलू महिलाओं के प्रति समाज की दृष्टिकोण में बदलाव संबंधी उनकी अपील भी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं को लेकर हमारे अंदर जो अपमान का भाव है वह हर हाल में दूर होना चाहिए। हमारे यहां जितनी गालियां, मजाक, एक दूसरे का उपहास उड़ाने आदि के लिए शब्दावली, लोकोक्तियां ,कहावतें, मुहावरे हैं उनमें ज्यादातर महिला केंद्रित ही हैं। यह किसी भी समाज के लिए शर्म का विषय है। महिलाओं के सम्मान के बिना कोई भी परिवार सुखी नहीं रह सकता। जब परिवार सुखी संपन्न नहीं होगा तो देश अपने वास्तविक क्षमता के अनुरूप प्रगति नहीं कर सकता। नारी शक्ति और पुरुष शक्ति मिलकर ही देश को शक्तिशाली बना सकते हैं। तो प्रधानमंत्री की इस अपील का असर हो यही कामना सब करेंगे ताकि महिलाओं  और पुरुषों के बीच भारतीय दृष्टि में समानता का भाव साकार हो एवं नर नारी सब मिलकर स्वयं को सुखी करें, देश को सुखी करें और विश्व के कल्याण के लिए काम कर सकें।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 9811027208



शनिवार, 13 अगस्त 2022

इन चुनावों के संदेश महत्वपूर्ण हैं

 

अवधेश कुमार

उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनखड़ निर्वाचित होंगे इसे लेकर किसी को कोई संदेह नहीं था। कुल 780 सांसदों में से राजग के 441 सांसदों एवं पांच मनोनीत सांसदों के अलावा बीजू जनता दल , वाईआरएससी, बसपा, तेलुगूदेशम, अकाली दल और शिवसेना ने भी समर्थन दिया था जिनके कुल 81 सांसद हैं। तृणमूल ने अपने 36 सांसदों के साथ पहले ही मतदान के बहिष्कार की घोषणा कर दिया था। इसलिए कुल मत 734 रह गया था। इनमें भी 725 सांसदों ने मतदान किया। धनखड़ को अपेक्षा के अनुरूप ही 528 वोट मिले। हालांकि मारग्रेट अल्वा को केवल 182 वोट मिलना विपक्ष के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। पूरा विपक्ष  अगर उपराष्ट्रपति चुनाव में एकजुट होकर मतदान नहीं कर सकता तो इसका अर्थ गंभीर है। 1997 यानी 25 वर्ष बाद चुनाव में विजय का यह सबसे बड़ा अंतर है। वास्तव में धनखड़ की विजय महत्वपूर्ण तो है ही लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण उस विजय के पीछे का अंकगणित तथा विपक्ष  के उम्मीदवार को वोट कम मिलना है। यह वर्तमान एवं भविष्य की भारतीय राजनीति की एक बड़ी रूपरेखा है जिसे गहराई से समझने की आवश्यकता है।

वास्तव में उपराष्ट्रपति चुनाव परिणाम के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, राजनीति का संकेत एवं दूसरा , जगदीप धनखड़ की भावी भूमिका। राष्ट्रपति से लेकर उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में वर्तमान और भावी भारतीय राजनीति के दृष्टि से एक बात समान थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ का विरोध करते हुए भी भाजपा विरोधी पार्टियां दयनीय बिखराव का शिकार रहीं। जिन 15 सांसदों के मत अमान्य हुए संभव है कुछ ने जानबूझकर ऐसा किया होगा। उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव को देखें तो ऐसा लगता है जैसे आजादी के बाद से 1977 तक विपक्ष कांग्रेस के सामने  बिल्कुल कमजोर पड़ जाता था थोड़े भिन्न रूप में भाजपा और नरेंद्र मोदी के संदर्भ में वही स्थिति बनती जा रही है। हालांकि आज विपक्षी दलों की संख्या उस समय से ज्यादा है,शक्ति भी अधिक है, मीडिया में उनकी मुखरता भी है। बावजूद ऐसा लगता है जैसे भारतीय राजनीति भविष्य की दृष्टि से भाजपा के एकल वर्चस्व की ओर अग्रसर है। तृणमूल कांग्रेस उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान का बहिष्कार करेगा यह कल्पना से परे था। राज्यपाल के रूप में जगदीप धनखड़ एवं ममता बनर्जी सरकार के संबंध हमेशा तीखे रहे। बावजूद यदि ममता बनर्जी ने मतदान से अलग रहने का फैसला किया तो उसके मायने गंभीर है।

इन दोनों चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष चाहे नरेंद्र मोदीऔर  भाजपा के विरुद्ध अलग-अलग जितना जितनी आक्रामकता प्रकट करें वैचारिकता एवं दिशा का सर्वथा अभाव है। जब आपकी विचारधारा नहीं होती तो दिशा स्पष्ट नहीं होती और फिर आप समझ नहीं पाते कि हमें किस प्रसंग में क्या भूमिका निभानी है।

 विपक्ष इसी दुरवस्था का शिकार है और यह राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों चुनावों में प्रकट हुआ है। तो लोकसभा चुनाव के पहले के ऐसे चुनाव में, जहां उसे एकजुटता से रोकने वाला कारक मौजूद नहीं था, इस तरह बिखरा रहा तो वह मिलजुल कर आगे मोदी के लिए चुनौतियां पेश करेंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा हर प्रकार की सफलता को उत्सव के रूप में प्रतिध्वनि करती है।  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में इस प्रकार का उत्सव जैसा माहौल पहले भारत में नहीं देखा गया। इन सबसे समर्थकों और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है तथा वे सकारात्मक आत्मविश्वास के साथ पार्टी के लिए काम करते रहते हैं। एक तरफ आत्मविश्वास से भरी हुई भाजपा तथा दूसरी तरफ वैचारिक दिशा भ्रम एवं बिखराव का शिकार विपक्ष। उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव ने संपूर्ण भारतीय राजनीति का यही परिदृश्य उत्पन्न किया है।

किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनखड़ के लिए बिल्कुल सुगम और अनुकूल परिस्थितियां होंगी। हमारे देश में उपराष्ट्रपति यद्यपि कार्यकारी पद है लेकिन राज्यसभा का सभापति होने के कारण वे संसद के भी अंग हैं। उपराष्ट्रपति की मुख्य भूमिका राज्य सभा के संचालन में ही होती है। देश में राजनीतिक विरोध जितना तीखा एवं हिंसक होता जा रहा है उसका शिकार भारतीय संसद भी हुआ है। हमने देखा विपक्षी दल किस तरह सभापति के आसन पर कागज फेंकने से लेकर मेज पर चढ़कर हंगामा करते हैं। वेंकैया नायडू जैसे अनुभवी नेता के सामने भी सांसदों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की नौबत आ गई। उन्हें बार-बार अपना क्षोभ प्रकट करना पड़ा है। विपक्ष के ज्यादातर दल अब इस स्थिति में नहीं कि जनता के बीच उनके मुद्दों के आधार पर लोकप्रियता पाने तथा सरकार को दबाव में लाने की स्थिति पैदा करें। वे जमीन पर आंदोलन वगैरह नहीं कर सकते इसलिए उनके पास संसद सत्र  अवसर होता है अपना विरोध प्रदर्शित करने का। ज्यादातर पार्टियों ने संसद को अपने विरोध का शिकार बनाना शुरू कर दिया है। इसमें जगदीप धनखड़ की सूझबूझ और कार्यशैली की परीक्षा होनी है। उन्हें कानून और संविधान का ज्ञाता होने के साथ शांत सहनशील, समझ - बूझ वाला माना जाता है। तृणमूल कांग्रेस के साथ टकराव होते हुए भी कभी उनके चेहरे पर गुस्से और तमतमाहट का भाव नहीं देखा गया। बावजूद वे आक्रामक विपक्ष को संभालने में सफल होंगे ऐसा निश्चयात्मक तौर पर नहीं कहा जा सकता। जिस तरह आम राजनीतिक विरोध भी हिंसा का शिकार हो रहा है उससे देश के वातावरण का आभास होता है। नीतियों या मुद्दों के विरोध में हो रही भयानक हिंसा, आगजनी हमको आपको डरा सकती है लेकिन भारत की वर्तमान स्थिति का यही सच है जिसकी प्रतिध्वनि हमें संसद के अंदर भी सुनाई पड़ती है। 

निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी सरकार सदन में अपने एजेंडे को पूरा करने की कोशिश करेगी और विपक्ष उसके रास्ते लगातार बाधाएं खड़ी करेगा। ऐसे में राज्यसभा के उपसभापति के रूप में धनखड़ के लिए संचालन आसान नहीं होगा। वर्तमान माहौल को देखते हुए आश्चर्य नहीं हो यदि विपक्ष उन पर पक्षपात का भी आरोप लगा दे। तो देखना होगा जगदीप धनखड़ कैसे स्थितियों को संभालते हैं। वेंकैया नायडू के कार्यकाल में राज्य सभा के अंदर कुछ महत्वपूर्ण विधायकों पर हमने ऐसे परिदृश्य देखे जिससे लगता था कि इसका संभालना मुश्किल होगा। तीन तलाक विधेयक, नागरिकता संशोधन विधेयक ,धारा 370 हटाने वाली जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, कृषि विधायक आदि के दौरान संसद के अंदर और बाहर पूरे देश का तीखा विभाजन साफ दिखाई दे रहा था। नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भारत के साथ दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं हुईं। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक को तो गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा से पहले राज्यसभा में ही पेश किया था। उस दौरान वेंकैया नायडू ने जिस सूझबूझ से सदन को संभाला वह अवश्य अविस्मरणीय है। संभव है आने वाले दिनों में सरकार कुछ ऐसे विधेयक लाए जिन पर उसी तरह विभाजन और हंगामे की स्थिति बने। तो धनखड़ के पास वेंकैया नायडू के रूप में उदाहरण है। कृषि कानून को तो उन्होंने विपक्ष के बहिर्गमन के बावजूद पारित घोषित कर दिया था क्योंकि उनकी दृष्टि में अगर मतदान करने के लिए विपक्ष तैयार नहीं हो केवल इसलिए विधायक को लंबित नहीं रखा जा सकता था। वेंकैया नायडू के कार्यकाल में यूक्रेन पर हमले का ऐसा वैश्विक संकट आया जिन्हें लेकर देश में अलग-अलग राय थी। हालांकि सरकार ने जैसा स्टैंड ले लिया उसमें विपक्ष के पास विरोध करने का कोई बड़ा आधार नहीं रहा। लेकिन भविष्य में अगर चीन ताइवान के विरुद्ध आक्रामक कार्रवाई करता है तो भारत के लिए इसी प्रकार से निरपेक्ष रहना संभव नहीं होगा। निश्चित रूप से उसका असर संसद पर पड़ेगा और उस दौरान धनखड़ की परख होगी। 

वैसे उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति अवश्य होते हैं लेकिन वह चाहे तो देश की वर्तमान परिस्थितियों में कई प्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सरकार को कोई सुझाव देने या किसी मंत्री,अधिकारी आदि को बुलाकर बात करने आदि के लिए संविधान उपराष्ट्रपति पर कहीं से रोक नहीं लगाता है। देशभर में अलग-अलग राज्यों में जनप्रतिनिधियों से संवाद करते हुए बेहतर राजनीतिक वातावरण बनाने की भी भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ नवजवानों से संवाद का उदाहरण प्रस्तुत किया है। शैक्षणिक संस्थानों से लेकर वैज्ञानिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संस्थानों के साथ संवाद कर वे भविष्य की दृष्टि से बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092 ,मोबाइल-9811027208



गुरुवार, 4 अगस्त 2022

ममता के लिए बहुत बड़ा आघात

अवधेश कुमार


दक्षिण कोलकाता के टाॅलीगंज पाॅश कॉलोनी के एक घर से जब प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने आलीशान मकान से ट्रक पर बड़े -बड़े बक्से लादना शुरू किया तो देखने वाले भौंचक्क रह गए। वह आलीशान घर मॉडल और अभिनेत्री अर्पिता मुखर्जी का है। पहले दौर में उनके एक घर से 21 करोड़ 20 लाख रुपए नगद, 79 लाख रुपए के सोने व हीरे के गहने, 20 मोबाइल फोन, 54 लाख रुपए मूल्य की विदेशी मुद्रा, 10 जमीनों के दस्तावेज और काफी मात्रा में विदेशी शराब मिले। उनके बेलघरिया स्थित दूसरे घर से 27 करोड़ 90 लाख रुपए नकद, 6 किलो सोना के गहने और चांदी के सिक्के के साथ कई संपत्ति के दस्तावेज तथा नोटबंदी के दौरान रद्द हो चुके 500 एवं1000 के नोट भी मिले। कुल मिलाकर अभी तक ईडी की कार्रवाई में अर्पिता के यहां से 49 करोड़ 20 लाख नगद मिल चुके हैं। बेलघरिया स्थित फ्लैट के टॉयलेट से नोट मिले। रुपए बैग और प्लास्टिक के पैकेट में इस तरह रखे गए थे मानो उनके रखने के लिए ही वो जगह बनी हो। इसका मतलब उस घर का निर्माण ही भ्रष्टाचार से आए नकदी को ठीक से रखने के लिए किया गया था।

जैसा हम जानते हैं बंगाल में स्कूल सेवा आयोग के शिक्षक भर्ती घोटाले में जांच चल रही है। इसी संदर्भ में ईडी ने पार्थ चटर्जी और अर्पिता को गिरफ्तार किया है।  जिस समय  घोटाला हुआ उस समय पार्थ  शिक्षा मंत्री थे। ममता बनर्जी और पूरी तृणमूल कांग्रेस छापेमारी में बरामद इन नोटों को देखकर सन्न हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या प्रतिक्रिया दिया जाए। तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि अर्पिता मुखर्जी का पार्टी से कोई लेना देना नहीं है।  अर्पिता मुखर्जी ने ईडी को बताया है कि सारे रुपए पार्थ के हैं।  उसके अनुसार उसके फ्लैट का रुपए रखने के लिए गोदाम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। पार्थ चटर्जी ने भी बयान दिया है कि उन्हें षड्यंत्र के तहत फंसाया जा रहा है।

पार्थ चटर्जी सामान्य नेता नहीं हैं। वे गिरफ्तार होने के बाद बरखास्तगी तक राज्य के उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी व संसदीय कार्य मंत्री थे।  पार्थ पार्टी में भी महत्वपूर्ण थे। तृणमूल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, प्रदेश महासचिव ,अनुशासनात्मक समिति के सदस्य और पार्टी के मुखपत्र जागो बांग्ला के संपादक थे। थोड़े शब्दों में कहा जाए तो ममता बनर्जी या उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी के बाद या उनके द्वारा अधिकार प्राप्त समानांतर शक्ति रखने वाला पार्टी में वह शीर्ष व्यक्तित्व थे। जाहिर है, ममता बनर्जी ने गिरफ्तारी के 6 दिन बाद भले उन्हें सभी पदों से निलंबित कर दिया, प्रश्नों के दायरे में वो स्वयं भी हैं। आखिरी एक व्यक्ति , जो उनका दाहिना हाथ बना, इतने बड़े भ्रष्टाचार का खलनायक साबित हो रहा है तो इसकी जिम्मेवारी उसकी अकेले नहीं हो सकती। यह संभव नहीं है कि धन का उपयोग पार्थ अकेले करते हो। शिक्षक भर्ती घोटाले के बारे में जितनी जानकारी सामने आई है उससे साफ हो गया है कि शिक्षकों की नियुक्ति में नीचे से ऊपर मंत्री से लेकर अधिकारी कर्मचारी नेता तक शामिल थे।

अर्पिता पार्टी से जुड़ी है या नहीं है यह मायने नहीं रखता।  पार्थ चटर्जी के फेसबुक प्रोफाइल में अर्पिता मुखर्जी का परिचय दिया गया है। नाकतला उदयन संघ की दुर्गा पूजा समिति की अर्पिता ब्रांड अंबेडकर रही है और इसके अध्यक्ष पार्थ चटर्जी हैं। अर्पिता विधानसभा चुनाव मे बेहला पश्चिम सीट पर पार्थ के समर्थन में चुनाव प्रचार करती थी। स्वयं ममता मंच से उसकी प्रशंसा कर चुकी हैं कि वह अच्छा काम कर रही है । उसके घर पर वीआईपी का आना-जाना लगा रहता था। वैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले एवं सत्ता के गलियारों से जुड़े हुए लोग अर्पिता और पार्थ चटर्जी के रिश्ते अच्छी तरह जानते हैं। आखिर तृणमूल कांग्रेस का कौन नेता है जो अर्पिता को नहीं जानता हो?

आरंभ में अवश्य तृणमूल के प्रवक्ताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया। बाद में तृणमूल कांग्रेस सहमी हुई नजर आई। ममता बनर्जी तथा तृणमूल के पहले के ऐसे मामलों में व्यवहार और वर्तमान रवैया में आपको जमीन आसमान का अंतर आएगा। पार्था पर कार्रवाई करने में उन्हें 6 दिन इसीलिए लग गए कि इसके पूर्व वह अपनी पार्टी के नेताओं, मंत्रियों या अधिकारियों तक के विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ मोर्चा मोर्चाबंदी करती थी। सारधा चिटफंड घोटाले में मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी के विरुद्ध ममता सड़कों पर उतर गई थी। 

सीबीआई के साल्टलेक स्थित कार्यालय के सामने बड़ा प्रदर्शन किया गया था। रोज वैली कांड में जब सांसद सुदीप बंदोपाध्याय और तपस पाल की गिरफ्तारी हुई तो ममता उनसे मिलने भुवनेश्वर तक गई थी। सारधा कांड में सबूतों को मिटाने के आरोप में जब सीबीआई फरवरी 2019 में कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने के लिए उनके आवास पर पहुंची तो ममता धरमतल्ला में धरने पर बैठ गई थी। पिछले वर्ष मई में जब नारद स्टिंग कांड में सीबीआई ने दो मंत्रियों फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी तथा विधायक मदन मित्रा को गिरफ्तार किया तो ममता सीबीआई कार्यालय निजाम पैलेस पहुंची और वहां 6 घंटे तक बैठी रही। उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी और उसकी पत्नी से पूछताछ के मामले में भी उनका तेवर आक्रामक था। हर अवसर पर ममता का यही तर्क था कि मोदी सरकार उनके विरुद्ध राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। किंतु  इतने नोटों और अन्य सामग्रियों की बरामदगी के बाद उनके लिए कोई भी तर्क देना संभव नहीं रहा है।

वास्तव में पार्थ के मामले में ममता बनर्जी एवं तृणमूल का पूरा व्यवहार उनके पूर्व के चरित्र के विपरीत है। इसके मायने गंभीर हैं। 2016 में माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा को सत्ता से उखाड़ कर शासन संभालने वाली ममता बनर्जी अपने क्रांतिकारी तेवरों के लिए जानी जाती रही है। धीरे-धीरे उनकी पार्टी, सरकार और नेताओं पर भ्रष्टाचार के इतने आरोप लगे जिनसे निकलना अब आसान नहीं रह गया है। ध्यान रखिए कि जितने भी मामले में ईडी या सीबीआई जांच कर रही है उन सबके लिए हरी झंडी कोलकाता उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय से मिली हुई है।  उनके भतीजे अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी रुचिरा बनर्जी पर भी धनशोधन मामले में मुकदमा दर्ज है। अभिषेक से ईडी 22 मार्च को दिल्ली स्थित मुख्यालय पर लंबी पूछताछ कर चुकी है। ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड में कोयले की चोरी और तस्करी को लेकर सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया हुआ है।

इस सब में वर्तमान प्रकरण ने ममता बनर्जी और तृणमूल को सबसे ज्यादा परेशानी में डाला है। इतने नोटों की गड्डियां तथा सामग्रियां कभी यहां बरामद हुआ नहीं। ममता बनर्जी और उनके रणनीतिकार लगातार मंथन कर रहे होंगे कि से निकला कैसे जाए? किंतु निकलना आसान नहीं है। संभव है आने वाले समय में इस जांच का विस्तार हो और दूसरे लोग भी चपेट में आए। जांच में दूसरे लोग आते हैं तो ममता के लिए राजनीतिक समस्या भी बढ़ेगी। भाजपा आक्रामक हो चुकी है। इससे उसके डरे समय और निराश कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों में नई जान आ सकती है। वाममोर्चा भी उनके विरुद्ध धरना प्रदर्शन कर रहा है। तो विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए ममता इस हालत में कदम नहीं उठा सकती। उनकी सोच में शायद बदलाव आया है। उपराष्ट्रपति चुनाव से उन्होंने अपनी पार्टी को अलग कर दिया है। यह कोई सामान्य निर्णय नहीं है। जो नेत्री विदेशी मोर्चे के नेतृत्व के लिए अभियान चला रही हो वह उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार को वोट ना दें इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी।

राष्ट्रपति चुनाव में भी यशवंत सिन्हा को खड़ा करने के बावजूद ममता क्या उनके दूसरे साथी बिल्कुल सक्रिय नहीं दिखे। सच कहे तो भाजपा के पास ममता व तृणमूल के विरुद्ध पार्था और अर्पिता के रूप में ऐसा हथियार हाथ लगा है जिसके आधार पर वह आक्रामक तरीके से अपनी राजनीति को आगे पढ़ा रही है। इसमें ममता बनर्जी व तृणमूल के पास प्रति आक्रमण का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें केवल अपना बचाव करना है और किसी संघर्ष में बचाव सफलता की रणनीति रणनीति या गारंटी नहीं हो सकती। पार्था अर्पिता प्रकरण बताता है कि सरकार किस ढंग से चल रही है। शिक्षकों की भर्ती में इतना बड़ा भ्रष्टाचार हो सकता है तो अन्य सरकारी भर्तियां पूरी तरह बेदाग होंगी ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। वैसे भी पश्चिम बंगाल जाने आने वाले लोगों को पता है कि भ्रष्टाचार और अपराध वहां कैसे सर्व स्वीकृत हो चुका है। तृणमूल कार्यकर्ता एवं समर्थक मनमाने तरीके से व्यवहार करते हैं। ममता के पास अवसर था कि वे वाम मोर्चे के अपराध और भ्रष्टाचार से पश्चिम बंगाल को मुक्ति दिलाएं लेकिन उन्होंने लेकिन उनकी राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ती चली गई। सत्ता से जुड़े या पार्टी के लालची और बेईमान समर्थकों के लिए तो ऐसा शासन अवसर है किंतु आम कार्यकर्ता, समर्थक और बंगाल की जनता के लिए यह भयानक स्वप्न जैसा बनता जा रहा है। 

अवधेश कुमार, ई-30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



रविवार, 31 जुलाई 2022

ईश्वर के पहरेदार बने बैठे ये 'स्वयंभू धर्म दूत'


तनवीर जाफ़री
इज़राइल के चैनल 13 के एक यहूदी टीवी पत्रकार गिल तामरी ने पिछले दिनों सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में प्रवेश कर वहाँ का एक वीडियो बनाया और उस वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। उसके बाद सऊदी अरब प्रशासन में खलबली मच गयी। सऊदी पुलिस ने इस मामले में पूरी तत्परता दिखाते हुये सऊदी अरब के ही निवासी एक व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लिया गया है। आरोप है कि  इसी  व्यक्ति ने चैनल 13 के इसराइली टीवी पत्रकार गिल तामरी को मक्का में प्रवेश कराने में सहायता की थी। हालांकि अपनी मक्का यात्रा के बाद पत्रकार तामरी ने यह कहते हुये माफ़ी मांगी है कि वे -'धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए मक्का और इस्लाम की सुंदरता दुनिया को दिखाना चाहते थे ' । 
वीडियो में तामरी को स्वयं ये बोलते भी सुना जा सकता है कि  ''सऊदी क़ानून के अनुसार ग़ैर-मुसलमानों का यहाँ आना वर्जित है। मेरे लिए भी यहां पहुंचना असंभव था।  परन्तु मुझे यहां एक बहुत अच्छे व्यक्ति (गाईड ) मिले जिन्होंने अपनी जान ख़तरे में डालकर मुझे यहां ले जाने का फ़ैसला किया ''। इस पूरे प्रकरण में मक्का पुलिस का कहना है कि 'मक्का में प्रवेश करने वाले इसराइली पत्रकार पर आगे क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है। मक्का पुलिस प्रवक्ता ने एक बार फिर पुरज़ोर तरीक़े से यह कहा है कि सऊदी अरब आने वाले लोग यहाँ के नियम-क़ानूनों का पालन करें, ख़ासतौर पर दो पवित्र मस्जिदों और अन्य पवित्र जगहों के मामले में।अन्यथा क़ानूनों का उल्लंघन करने वालों को सऊदी क़ानून के अनुसार सज़ा दी जाएगी। ग़ौर तलब कि मक्का शहर के चारों ओर नगर की एक सीमा निर्धारित की गयी है और इन सीमाओं के प्रवेश द्वार पर बड़े अक्षरों से बोर्ड पर लिखा गया है कि -'ग़ैर मुस्लिमों का मक्का की सीमाओं में प्रवेश वर्जित,केवल मुस्लिम मक्का में दाख़िल हो सकते हैं।'

इस घटना के बाद एक बार फिर वही बहुचर्चित सवाल विश्व स्तर पर पूछा जाने लगा है कि आख़िर हज की रस्म अदा करने के लिये सऊदी अरब के पवित्र मक्का शहर में ग़ैर मुस्लिमों का प्रवेश क्यों वर्जित है। हज के तौर तरीक़ों और हज अदायगी को क़रीब से देखने की उत्सुकता रखने वाले दुनिया के तमाम लोग सऊदी सरकार के इस फ़ैसले से व्यथित हैं। केवल ग़ैर मुस्लिम ही नहीं बल्कि दुनिया के मुसलमानों का भी एक बड़ा वर्ग जो हमेशा से सऊदी सरकार के इस 'ग़ैर मुस्लिम का मक्का प्रवेश निषेध ' नीति का विरोधी रहा है वह भी पुनः मुखरित हो उठा है। ग़ौर तलब है कि हज स्थल मक्का (काबा शरीफ़ ) चूँकि सऊदी अरब में इत्तेफ़ाक़न इसलिये स्थित है क्योंकि इस्लाम धर्म की शुरुआत अरब से ही हुई और यही इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब की जन्म व कर्मस्थली भी रही है। परन्तु चूँकि इस्लाम विश्वस्तर पर फैल चुका है और पूरी दुनिया के लोग हज या उमरा करने मक्का आते जाते रहते हैं इसलिये दुनिया का मुसलमान इन पवित्र धार्मिक स्थलों पर अपना भी समान अधिकार समझता है। कई बार मुस्लिम जगत में यह चर्चा भी हो चुकी कि सऊदी अरब में हज उमरा आदि धार्मिक गतिविधियों के नियम क़ायदे यहाँ तक कि अलग अलग देशों का वीज़ा कोटा निर्धारण करने के लिये इस्लामी देशों की विश्वस्तरीय संयुक्त कमेटी बनायी जाये।परन्तु ठीक इसके विपरीत सऊदी सरकार इन स्थानों पर अपना आधिपत्य समझती है। और इस पवित्र क्षेत्र में अपनी ही सोच विचार के अनुसार नियम क़ानून निर्धारित व लागू  करती है। ग़ैर मुस्लिमों के मक्का प्रवेश निषेध  मामले पर वह यही कहकर पल्ला झाड़ती कि अन्य देशों की तरह किसी भी क्षेत्र या किसी भी व्यक्ति को वीज़ा देना या न देना उसका अपना अधिकार है इसके लिये कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।

परन्तु मक्का के अतिरिक्त भी अनेक इस्लामी धर्मस्थल ऐसे हैं जहां पूरे वर्ष और चौबीस घंटे मक्का और मदीना से भी ज़्यादा दर्शनार्थियों व पर्यटकों की भीड़ रहती है। उदाहरण के तौर पर करबला,नजफ़ सीरिया और इराक़ के अनेक रौज़े हर समय दर्शानार्थियों से भरे रहते हैं। भारत और पाकिस्तान की अनेकानेक विश्व स्तरीय मस्जिदें व दरगाहें हर समय आम लोगों के दर्शन व भ्रमण के लिये  खुली रहती हैं। ऐसी जगहों पर सरकार या धर्मस्थान का प्रबंधन न किसी से किसी का धर्म पूछता है न जाति न नागरिकता। ऐसे में विश्व के सबसे महत्वपूर्ण इस्लामी धर्मस्थल मक्का पर सऊदी सरकार द्वारा थोपा गया 'प्रवेश प्रतिबंध क़ानून ' न केवल समानता जैसे इस्लामी सिद्धांतों को चुनौती देता है बल्कि इस्लाम विरोधी भावना रखने वालों को तरह तरह के निराधार तर्क गढ़ने के भी अवसर देता है।
सऊदी सरकार के इस फ़ैसले में शिया व बरेलवी समुदाय को लेकर भी काफ़ी विरोधाभास है। क्योंकि इन दोनों ही समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हज व  उमरा करने के लिये जाते रहते हैं। और सऊदी सरकार इनको वीज़ा भी देती है। परन्तु अहमदिया मुसलमान अन्य ग़ैर मुस्लिमों की तरह हज करने नहीं जा सकते। इन्हें सऊदी सरकार ग़ैर मुस्लिम की श्रेणी में रखती है। अरब,भारत,बंगलादेश, अफ़ग़ानिस्तान व पाकिस्तान के अनेक सुन्नी वहाबी मुसलमान समय समय पर शिया व बरेलवी समुदाय के विरुद्ध फ़तवे जारी कर इन्हें भी ग़ैर मुस्लिम और मुशरिक (बहुदेववादी ) बताते रहे हैं। क्योंकि यह लोग ताज़ियादारी करते हैं,पीरों फ़क़ीरों की मज़ारों पर दुआएं मांगते हैं,या अली मदद बोलते हैं,और इन सब के सामने हाथ उठाकर दुआएं मांगते हैं। इसलिये वहाबी मतावलंबी इन समुदाय के लोगों को कभी काफ़िर तो कभी मुशरिक की उपाधियों से नवाज़ते रहते हैं। सवाल यह है कि जब सऊदी अरब में भी वहाबी विचारधारा की हुकूमत है तो वह शिया व बरेलवी मुसलमानों पर भी मक्का में प्रवेश वर्जित करने का साहस क्यों नहीं करती ?और अहमदिया मुसलमानों पर क्यों प्रवेश निषेध किया हुआ है ? क्या यह वहाबियों को तय करना है कि एक अल्लाह का कलमा पढ़ने के बावजूद उनकी नज़रों में कौन सा मुस्लिम समुदाय मुसलमान है और कौन मुशरिक या काफ़िर?    
                              
किसी भी धर्म के किसी भी धर्मस्थान में धर्म या जाति के आधार पर किसी भी श्रद्धालु को जाने से मना करने का अधिकार मेरे विचार से किसी भी व्यक्ति,सरकार अथवा शासक को नहीं होना चाहिये। जिस तरह चर्च,गुरद्वारे,इमाम बरगाहें,दरगाहें और विश्व की सुप्रसिद्ध मस्जिदें सभी के लिये खुली हैं उसी तरह मक्का,हज स्थल आदि भी पूर्णतयः प्रतिबंध मुक्त होने चाहिये। भारत में भी अनेक मंदिरों  में महिलाओं,दलितों व मुसलमानों का जाना प्रतिबंधित है। यह प्रतिबंध भी समाप्त होने चाहिये। ऐसे प्रतिबंधों से तो संकीर्णता का ही सन्देश जाता है और यह भी कि गोया -'ईश्वर के पहरेदार बने बैठे ये 'स्वयंभू धर्म दूत'।

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

रुबिया सईद अपहरण मामले की कानूनी परिणति बदले समय का प्रमाण

अवधेश कुमार

समय का चक्र घूमते हुए एक समय न्याय की परिधि तक अवश्य पहुंचता है। क्या किसी ने कल्पना की थी कि 32 वर्ष पहले कश्मीर में स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद की छोटी बेटी रुबिया सईद अपहरण का मामला फिर से खुलेगा और न्यायिक प्रक्रिया मुकाम पर पहुंचने की ओर अग्रसर होगी? पिछले 16 जुलाई को जम्मू के टाडा न्यायालय में रुबिया सईद ने यासीन मलिक समेत चारों आरोपियों की पहचान की। जम्मू-कश्मीर ही नहीं पूरा देश मान चुका था कि रुबिया अपहरण का मामला आया गया हो चुका है। लेकिन जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है उसमें यासीन मलिक सहित शेष  आरोपियों को सजा मिलना निश्चित है। यासीन मलिक आतंक के वित्तपोषण मामले में राजधानी दिल्ली की तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। यह दूसरा मामला होगा जिसमें यासीन को सजा मिलने की संभावना है। जिस दिन नरेंद्र मोदी सरकार ने अलगाववादी नेताओं तथा पूर्व आतंकवादियों से नेता बने लोगों के विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां निवारक कानून के तहत मामला दर्ज किया उसी दिन साफ हो गया था कि कश्मीर में 90 के दशक में हुए भयावह अन्याय के न्यायिक प्रतिकार का रास्ता बन चुका है। आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में लोगों की गिरफ्तारियां हुई और सजा मिलनी शुरू हो चुकी है। जो भी गिरफ्तार हुए जाहिर है उनसे संबंधित सारे मामले खंगाल कर नए सिरे से उन पर कानूनी प्रक्रिया भी आरंभ हुई। इसी के तहत यासीन मलिक से जुड़े मामले भी पुलिस और एनआईए ने खोल दिया।

इस मामले में यासीन मलिक के साथ उन्हीं के संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ के कमांडर मेहराजुद्दीन शेख, मोहम्मद उस्मान मीर और मंजूर अहमद सोफी भी सुनवाई के दौरान न्यायालय में मौजूद रहे। यासीन मलिक ने दिल्ली में होने के कारण वर्चुअली  न्यायिक प्रक्रिया में भाग लिया किंतु उसने खुद जम्मू के न्यायालय में पेश होकर जिरस करने का आग्रह किया। न्यायालय ने यासीन के विरुद्ध प्रोडक्शन वारंट जारी कर दिया है। न्यायिक प्रक्रिया पर हम नजर रखेंगे। रुबिया सईद अपहरण तब सर्वाधिक चर्चित मामला था। केंद्रीय गृह मंत्री की बेटी के अपहरण की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में  गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पर ही कई हलकों में आरोप लगा था कि उन्होंने जेल में बंद आतंकवादियों को छुड़ाने के लिए अपनी बेटी के अपहरण का नाटक रचवाया था। श्रीनगर के सदर पुलिस थाने में 8 दिसंबर, 1989 को रुबिया सईद अपहरण का मामला दर्ज हुआ था। इसके अनुसार रुबिया ट्रांजिट बैन में श्रीनगर के ललदेद अस्पताल से नौगांव अपने घर जा रही थी। तब वह एमबीबीएस के बाद अस्पताल में इंटर्नशिप कर रही थी। जब वह चांदपुरा चौक के पास पहुंची तो उसी में सवार तीन लोगों ने बंदूक के दम पर वैन रोका और रुबिया का अपहरण कर लिया। बाद में उन्होंने अपने साथियों को जेल से छोड़ने की मांग की। ये कुख्यात आतंकवादी थे। अपहरण के मामले में थाने में यासीन मलिक, मेहराजुद्दीन शेख ,मोहम्मद जमाल, अमीर मंजूर अहमद सोफी के अलावा अली मोहम्मद अमीर, इकबाल अहमद, जावेद अहमद मीर, मोहम्मद रफी, वजाहत बशीर और शौकत अहमद बख्शी के नाम शामिल है।

गृह मंत्री की कुर्सी पर बैठे बड़े नेता की बेटी का अपहरण भारत के इतिहास की असाधारण घटना थी। पूरा देश सकते में था। अंततः सरकार ने 13 दिसंबर को पांच आतंकवादियों को रिहा किया, जिसके बाद रुबिया को छोड़ा गया। छोड़े गए आतंकवादियों में शेर खान पाक अधिकृत कश्मीर का रहने वाला था जिसे बाद में सुरक्षा बलों ने मार गिराया। दूसरा भी सुरक्षा बलों के साथ श्रीनगर में मारा गया। जावेद जरगर और नूर मोहम्मद याहिन जेल में हैं। हां, अल्ताफ अहमद तत्काल बेंगलुरु में एक रेस्त्रां चला रहा है। यह सामान्य स्थिति नहीं थी कि इतने बड़े अपहरण के आरोपी खुलेआम घूमते ही नहीं रहे, जम्मू-कश्मीर में सम्मान पूर्वक जीवन जिया। यासीन मलिक हीरो की तरह रहते थे। जिस तरह की कार्रवाई मोदी सरकार आने के बाद हुई वह पहले भी हो सकती थी।

समस्या केवल जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही राजनीतिक सोच तथा इच्छाशक्ति की थी। सही सोच और इच्छाशक्ति के अभाव के कारण ही प्रदेश की स्थिति बिगड़ी, आतंकवादी निर्भय हुए और बड़े समूह के अंदर हीरो माने जाने लगे। अलगाववादियों को सम्मानजनक स्थान भी केंद्रीय राजनीतिक नेतृत्व की गलत सोच के कारण ही प्राप्त हुआ। समय के साथ बहुत चीजें बदली हैं। इस मामले को जम्मू के विशेष टाडा न्यायालय में ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया गया। न्यायालय ने 29 जनवरी ,2021 को रुबिया सईद अपहरण मामले में यासीन व अन्य को आरोपी करार दे दिया। इसमें तीन प्रत्यक्ष गवाह हैं जिनमें रूबिया के अलावा फेस्टिवल डॉक्टर शहनाज हैं।

रुबिया सईद अपहरण मामले का खुलना और यहां तक पहुंचना केवल एक अपहरण की न्यायिक प्रक्रिया भर नहीं है। यह जम्मू कश्मीर और उसके संदर्भ में आए व्यापक बदलाव का प्रमाण है। रुबिया सईद अपहरण कांड जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उससे आतंकवादियों का हौसला बढ़ा और उन्होंने जो कहर बरपाया वह इतिहास का भयानक अध्याय बन चुका है। कश्मीरी हिंदुओं और सिखों का निष्कासन और पलायन परवर्ती घटनाएं हैं। इस एक प्रकरण के बाद आतंकवादी निर्भय होकर वारदातों को अंजाम देने लगे थे। पुलिस प्रशासन का धरातल पर नामोनिशान नहीं रहा। तब फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। उन्होंने बाद में बयान दिया कि रुबिया की रिहाई के प्रयास में केंद्र सरकार से किसी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा था। उनके अनुसार आतंकवादियों को छोड़ने के लिए कहा जा रहा था। सामान्यतः फारूक अब्दुल्लह की बातों पर विश्वास करना कठिन होता है। किंतु इस मामले में वीपी सिंह सरकार में शामिल वर्तमान में केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान ने भी कहा है कि फारुख और उनके अधिकारियों ने कहा था कि रुबिया को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों को रिहा करने की जरूरत नहीं है। आरिफ खान के अनुसार उन्होंने यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह और गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद को बताया। उनका कहना है कि इसके बाद उन्हें उस प्रक्रिया से ही अलग कर दिया गया।

स्पष्ट है कि केंद्र सरकार आतंकवादियों से लोहा लेने को तैयार नहीं थी और घुटने टेक दिए। अगर उस समय संकल्पबद्धता दिखाई गई होती तो जम्मू कश्मीर की स्थिति काफी हद तक अलग होती। आतंकवादियों को रिहा न करने का मतलब होता आतंकवाद के विरुद्ध सख्त अभियान व कार्रवाई। वीपी सिंह के बाद आई नरसिंह राव की सरकार ने भी रुबिया अपहरण मामले को आगे बढाने में रुचि नहीं दिखाई। 

हालांकि उस दौरान आतंकवाद के विरूद्ध कार्रवाई हुई एवं जम्मू कश्मीर में इतनी शांति स्थापित हुई जिससे 1996 में विधानसभा चुनाव कराया जा सका। पहली बार वर्तमान मोदी सरकार ने आतंकवाद, अलगाववाद और हिंसा से संबंधित वारदातों को उसके सही परिप्रेक्ष्य के साथ कानून के कठघरे तक लाने का साहस किया है। इसके द्वारा संदेश दिया गया है कि जो कुछ पहले हुआ वह अब संभव नहीं है तथा जिन्हें आतंकवादी, अलगाववादी और गैर कानूनी गतिविधियों के बावजूद सम्मान मिलता रहा उनको उनकी असली जगह यानी कानून के कटघरे से लेकर जेल तक पहुंचाया ही जाएगा। यह हो भी रहा है। रुबिया सईद का गवाही देने के लिए न्यायालय में आना भी सामान्य घटना नहीं है। इससे पता चलता है कि जम्मू कश्मीर का वातावरण कितना बदल चुका है। स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पुत्री पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इस मामले को खुलवाने के पक्ष में नहीं थे। बावजूद मामला खुला, परिवार की ही सदस्या उस समय अपहृत रुबिया न्यायालय तक आई और उसने वही बोला जो कानून के तहत इन्हें सजा दिलाने के लिए पर्याप्त है। यह प्रदेश के बदले हुए वातावरण में ही संभव हुआ है। पहले माहौल यही था कि यदि मामले को आगे बढ़ाया गया तो रुबिया एवं अन्य गवाह इन्हें पहचानने से इंकार कर दे या न्यायालय में पेश होने से बचें।

तो इसका भी विश्लेषण करना पड़ेगा कि आखिर ऐसी स्थिति कैसे पैदा हो गई कि रुबिया सामान्य तरीके से न्यायालय पहुंची और उन्होंने गवाही दी? वह आगे जिरह में भी उपस्थित होने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि अब आतंकवादियों का भय कम हुआ है तथा बदली हुई आबोहवा का आभास वहां के राजनीतिक परिवारों को हो चुका है। उन्हें पता है कि अगर हमने न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग नहीं किया तो  हमारे साथ भी कानून अपने तरीके से काम करेगा। इसे ही कानून का राज कहते हैं जिसकी आवश्यकता जम्मू कश्मीर में सबसे ज्यादा थी। इस तरह कुल मिलाकर रूबिया सईद अपहरण प्रकरण की कानूनी प्रक्रिया ने साफ संदेश दे दिया है कि यह पहले वाला जम्मू कश्मीर नहीं है। अब उन सभी मामलों में न्याय होगा जिनमें इसकी आवश्यकता थी लेकिन पूरी नहीं की गई।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल- 9811027208

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