शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

गुजरात दंगे पर उच्चतम न्यायालय का फैसला, मोदी के विरुद्ध चलता रहा झूठा अभियान

अवधेश कुमार 


गुजरात दंगों पर उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ का फैसला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को  दंगों की साजिश रचने के आरोपों से बरी किए जाने पर मुहर लगी है तथा इसके विरुद्ध अभियान चलाने वाले को झूठा कहा गया है। न्यायालय के फैसले में स्पष्ट लिखा है कि विशेष जांच दल यानी एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट के विरुद्ध दायर याचिका आधारहीन ही नहीं, गलत बयानों और तथ्यों से भरी थी। याचिका में कहा गया था कि गोधरा घटना के बाद राज्य में हुई हिंसा के पीछे उच्चस्तरीय साजिश थी और यह पूर्व नियोजित थी। जैसा हम जानते हैं लंबे समय तक नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगा का खलनायक साबित करने के लिए अनेक एनजीओ, राजनीतिक पार्टियां, नेता, एक्टिविस्ट, पत्रकार, कानूनविद, कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीश अभियान चलाए हुए थे। सबका लक्ष्य एक ही था कि किसी तरह साबित करो कि  मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने साजिश रच कर मुसलमानों के विरुद्ध दंगे कराए और मंत्री ,नेता ,कार्यकर्ता, पुलिस, प्रशासन सब उनके निर्देश पर काम कर रहे थे । 451 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा है इस तरह के आरोपों को प्रमाणित करने के लिए एक भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। न्यायालय ने इससे आगे बढ़कर कहा है कि मामले को गर्म बनाए रखने के लिए याचिकाकर्ताओं ने कानून का दुरुपयोग किया। इसी आधार पर न्यायालय ने मामले को सनसनीखेज बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई की अनुशंसा की है। क्या इसके बाद अलग से कुछ कहने की आवश्यकता रह जाती है कि गुजरात दंगों को लेकर किस तरह के झूठे और एकपक्षीय अभियान चलाए गए?

तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर गुजरात के पूर्व डीजीपी श्री कुमार आदि की गिरफ्तारी तथा आगे अन्यों की संभावित गिरफ्तारी पर भी छाती पीटने वाले लोग हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने यूं ही तो नहीं उन सबके विरुद्ध कानून सम्मत कार्रवाई की बात कही है। उच्चतम न्यायालय के फैसले को इस रूप में लिया गया है कि दंगा कराने के आरोपों से वर्तमान प्रधानमंत्री एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बेदाग और निर्दोष साबित हुए हैं। सच यह है कि विशेष जांच दल यानी सीट ने उन्हें बरी किया था और इस पर न्यायालयों की मुहर भी लग गई थी। जिनका एजेंडा दंगों की सिहरन भरी यादों को बार-बार कुरेद कर जिंदा रखने में था, जिन्होंने देश और दुनिया में पूरा झूठ फैलाया और उसके आधार पर काफी कुछ प्राप्त किया वे कैसे इसे स्वीकार कर चुप बैठ सकते थे। तीस्ता सीतलवाड़ ने जाकिया जाफरी को हथियार बनाया और उनके माध्यम से बार-बार अपील दायर करवाई। न्यायालय ने इसका विवरण देते हुए कहा है की 8 जून, 2006 को 67 पृष्ठ की शिकायत दी गई थी। इसके बाद 15 अप्रैल, 2013 को 514 पृष्ठों की प्रोटेस्ट पिटिशन दाखिल की गई। इसमें उन सभी लोगों की निष्ठा पर सवाल उठाया गया था, सबको झूठा बेईमान बताया गया जो प्रक्रिया में शामिल थे।

जरा सोचिए , 2002 के फरवरी-मार्च में दंगे हुए और हफ्ते भर के अंदर शांत भी हो गए।  जिनका एजेंडा हर हाल में मुसलमानों के अंदर भय पैदा करना, हिंदू मुसलमानों के बीच विभाजन की खाई पैदा कर नरेंद्र मोदी, भाजपा, संघ आदि को मुसलमानों का खलनायक साबित कर अपना स्वार्थ साधना था वे हर प्रकार के सनसनी के झूठे तथ्य सामने लाकर अभियान चलाते रहे। उस समय की कानूनी स्थितियों पर को याद करिए। मानवाधिकार आयोग, उच्चतम न्यायालय ,निचले न्यायालय, उच्च न्यायालय और अंततः दंगों से जुड़े मामलों को गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में स्थानांतरित करवाना….क्या क्या नहीं हुआ। प्रचारित यही होता था कि चुके मोदी ने दंगे करवाए इसलिए वह हर प्रकार की कानूनी कार्रवाई व न्यायिक प्रक्रिया को बाधित  कर रहे हैं। एसआईटी ने क्लीन चिट दे दी तो उस पर भी प्रश्न इन लोगों ने उठाना शुरू कर दिया। न्यायालय ने सीट के रिपोर्ट के बारे में जो कहा है उस पर नजर डालिए—एसआईटी की फाइनल रिपोर्ट जैसी है वैसी ही स्वीकार होनी चाहिए। न्यायालय ने इसकी रिपोर्ट को तथ्यों और ठोस तर्को पर आधारित कहा है,जिसमें और कुछ करने की जरूरत नहीं है।

दंगे हुए यह सच है और उसमें दिल दहलाने वाली घटनाएं हुई। समस्या यह है कि विरोधियों ने दंगों की एकपक्षीय ऐसी तस्वीर बनाई जिससे लगता था कि 27 फरवरी, 2002 को अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस से लौट रहे 59 कारसेवकों को गोधरा स्टेशन पर दो कोच में आग लगा कर जिंदा जलाने की घटना से इनका कोई लेना-देना नहीं हो। ये ऐसे वक्तव्य देते थे मानो ट्रेन में जिंदा जलाए जाने वाले लोग मनुष्य थे ही नहीं। गोधरा कांड को अलग कर देंगे तो गुजरात दंगा समझ ही नहीं आएगा। रेल दहन के विरुद्ध आक्रोश पैदा हुआ और लोगों ने मुसलमानों पर हमला शुरू कर दिया। 26 मार्च ,2018 को उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में विशेष जांच दल का गठन किया था। 8 मार्च, 2012 को क्लोज रिपोर्ट में मोदी और 63 लोगों को बरी किया गया। इसे न्यायालय में चुनौती दी गई।  

उच्चतम न्यायालय की मॉनिटरिंग में दंगों से संबंधित सारे मामलों की छानबीन करने वाले विशेष जांच दल यानी सीट को पूरी बुद्धि लगाकर भी मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी तथा अन्य लोगों द्वारा मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा कराने की साजिश नजर नहीं आई, मजिस्ट्रेट न्यायालय और फिर उच्च न्यायालय ने भी इसे सही माना लेकिन तीस्ता सीतलवाड को ये सब दोषी नजर आते रहे। इसका मतलब जानबूझकर गलत उद्देश्य से अभी तक मामले को खींचा गया था। ऐसा नहीं है कि उस दंगे के लिए कोई दोषी नहीं हो। अब तक कई नेताओं सहित अधिकारियों और पुलिस के लोगों को सजा मिल चुकी है। उच्चतम न्यायालय ने यही कहा है कि कुछ अधिकारियों की निष्क्रियता या विफलता को राज्य प्रशासन की पूर्व नियोजित आपराधिक साजिश नहीं कहना चाहिए। अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति इसे राज्य प्रायोजित अपराध भी नहीं कहा जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय के फैसले का एक महत्वपूर्ण पक्ष गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां तथा कानूनी कार्रवाई की मुखर अनुशंसा है। पीठ ने लिखा है कि इनमें गलत उद्देश्य के लिए मामले को जारी रखने की बुरी मंशा नजर आती है। इसमें लिखा है कि जो प्रक्रिया का इस तरह से गलत इस्तेमाल करते हैं उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके खिलाफ कानून के दायरे में कार्रवाई की जानी चाहिए।  अगर ये नहीं होते तो गुजरात दंगों के घाव कब भर जाते। लेकिन कुछ राजनीतिक इरादे वाले एनजीओ, एक्टिविस्टों, पत्रकारों और नेताओं के लिए वह इस कारण भी मुख्य एजेंडा था क्योंकि इसके कारण उनको सम्मान के साथ धन भी प्राप्त हो रहा था। जाहिर है ,इनके खिलाफ व्यापक जांच की आवश्यकता है ताकि यह तलाश किया जा सके कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया और कहीं भारत विरोधी शक्तियां भी तो इनके साथ नहीं लगी हुई थी। इसमें कुछ अधिकारियों का नाम लिखा गया है जिसमें संजीव भट्ट, हरेन पांड्या, आरबी श्रीकुमार आदि शामिल है। इसमें लिखा है कि राज्य सरकार के इस तर्क में दम नजर आता है कि भारतीय पुलिस सेवा के तत्कालीन अधिकारी संजीव भट्ट, गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी आरबी श्रीकुमार की गवाही केवल मुद्दे को सनसनीखेज और राजनीतिक बनाने के लिए थी। तो  न्यायालय ने अपना जो निष्कर्ष दिया है वह महत्वपूर्ण है। उसने लिखा है कि अंत में हमें ऐसा लगता है कि गुजरात के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का प्रयास गलत बयान देकर सनसनी पैदा करना था। विरोधी इसे राज्य प्रायोजित मुस्लिम हत्या की ही संज्ञा देते रहे हैं। 

दुनिया भर में इसे राज्य द्वारा मुस्लिम नरसंहार के रूप में प्रचारित किया गया और इस अभियान का कितना नकारात्मक असर हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं। लंबे समय तक विदेश यात्रा करने वाले भारत के नेताओं से इस पर प्रायोजित प्रश्न पूछे जाते रहे। कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे उठाया। अमेरिका ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में घोषणा कर दी कि उन्हें वहां आने का वीजा नहीं दिया जाएगा। पूरी दुनिया में केवल नरेंद्र मोदी की बदनामी नहीं नहीं हुई बल्कि भारत की छवि कलंकित हुई। 2002 के बाद से भारत में पकड़े गए कई आतंकवादियों ने कहा कि गुजरात दंगों के बारे में जो बताया गया उससे वह आतंकवादी बना। कल्पना किया जा सकता है कि झूठे प्रचार से देश को कितनी हानि हुई होगी। तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ,दोषी या अपराधी माना जाए ? कानूनी एजेंसियों की छानबीन से ही इस साजिश का पूरा सच सामने आएगा और हो सकता है ऐसे तथ्य भी हाथ लगे जिनसे हम आप वाकिफ नहीं है। इनको सजा मिलने के बाद ही गुजरात दंगों से संबंधित कानूनी कार्रवाई और प्रक्रियाएं पूर्ण होंगी। अभी तक यह अधूरी है। उच्चतम न्यायालय ने इसका रास्ता प्रशस्त कर दिया है। 

अवधेश कुमार,ई- 30 ,गणेश नगर ,पांडव नगर कंपलेक्स ,दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



रविवार, 3 जुलाई 2022

मां की गुहार सुन हिंदू राव अस्पताल पहुंचे अमनदूत के अध्यक्ष संजीव जैन ने किया बच्चे के लिए रक्तदान

आज अमनदूत एनजीओ के अध्यक्ष संजीव जैन ने हिंदू राव हॉस्पिटल में इलाज करा रहे एक जरूरतमंद मरीज को ब्लड डोनेट किया। जानकारी के अनुसार, उन्हें हिंदू राव हॉस्पिटल से एक मां का फोन आया कि मेरे बच्चे की तबीयत खराब है और उसे खून की जरूरत है तो संजीव जैन तुरंत हिंदू राव हॉस्पिटल पहुंचे और बच्चे के लिए ब्लड डोनेड किया। 

महिला ने संजीव जैन से कहा कि मेरे बच्चे को खून की जरूरत है परंतु मुझे कोई भी ब्लड डोनर नहीं मिल रहा है। यह सुनने के बाद संजीव जैन ने स्वयं ही ब्लड डोनेट करने का फैसला किया। इस पर महिला ने ब्लड डोनेट कर ब्लड उपलब्ध कराने पर संजीव जैन को धन्यवाद दिया। इसके बाद संजीव जैन ने संवाददाताओं से कहा कि मैं पहले इंसान हूं। मैंने एक बच्चे की जान बचाने के लिए अपना कर्तव्य निभाया। संजीव जैन इससे पहले भी परोपकार के कार्य कर चुके हैं।

इस्लाम को कलंकित करती है कन्हैया की हत्या

तनवीर जाफ़री

मंहगाई, बेरोज़गारी, भय, भूख, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातिवाद, लोकतांत्रिक, आर्थिक व सीमावर्ती चुनौतियों जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहे हमारे देश में आये दिन कोई न कोई ऐसा  'भूचाल' आ जाता है या जानबूझकर लाया जाता है जिससे देश की यह वास्तविक समस्यायें नेपथ्य में चली जाती हैं। ऐसा ही एक विषय जिसे लेकर विगत एक महीने से भी अधिक समय से पूरा देश उद्वेलित हो रहा है वह है भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता के रूप में एक भाजपाई नेत्री नूपुर शर्मा द्वारा गत 27 मई को ज्ञानवापी मस्जिद के मुद्दे पर एक टीवी चैनल पर डिबेट के दौरान पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद साहब पर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी। नूपुर शर्मा द्वारा पैग़ंबर मोहम्मद साहब पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद मुस्लिम समुदाय के लोग देश के कई राज्यों में सड़कों पर प्रदर्शन करने उतर आए थे। इस दौरान कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों के उग्र हो जाने के चलते हिंसा भी भड़क उठी थी। कई इस्लामिक देशों ने भी इस टिप्पणी पर भारत सरकार से नाराज़गी दर्ज कराई थी। परिणाम स्वरूप भाजपा ने नूपुर शर्मा को प्रवक्ता पद व पार्टी से हटाते हुए यह भी कहा था कि नूपुर शर्मा का बयान भारत सरकार का मंतव्य नहीं है। परन्तु दो कट्टरपंथी लोगों ने इसी प्रकरण के चलते पिछले दिनों उदयपुर में नुपुर शर्मा समर्थक कन्हैया नामक एक दर्ज़ी की बेरहमी से गला रेत कर हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि हत्यारों में से एक कुछ समय पूर्व पाकिस्तान भी गया था अतः इस हत्याकांड में पाकिस्तान की कथित साज़िश की भी पड़ताल की जा रही है।

इन सब के बीच इसी प्रकरण में पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जेबी परदीवाला की अवकाशकालीन बेंच ने नुपुर शर्मा की एक अर्ज़ी पर सुनवाई करते हुए उसे कड़ी फटकार लगाई और कहा कि शर्मा के बयान ने पूरे देश में अशांति फैला दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान नुपुर शर्मा की टिप्पणियों को "तकलीफ़देह" बताया और कहा कि "उनको ऐसा बयान देने की क्या ज़रूरत थी?" सर्वोच न्यायालय ने ये सवाल भी किया कि एक टीवी चैनल का एजेंडा चलाने के अलावा ऐसे मामले पर डिबेट करने का क्या मक़सद था, जो पहले ही न्यायालय के अधीन है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने शर्मा की बयानबाज़ी पर सवाल किया और कहा, "अगर आप एक पार्टी की प्रवक्ता हैं, तो आपके पास इस तरह के बयान देने का लाइसेंस नहीं है." सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें टीवी पर जाकर पूरे देश से माफ़ी मांगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "जिस तरह से नुपुर शर्मा ने देशभर में भावनाओं को उकसाया, ऐसे में देश में ये जो भी हो रहा है उसके लिए वह अकेली ज़िम्मेदार हैं। माननीय अदालत ने यह भी कहा, "जब आपके ख़िलाफ़ एफ़आईआर हो और आपको गिरफ़्तार नहीं किया जाए, तो ये आपकी पहुँच को दिखाता है। उन्हें लगता है उनके पीछे लोग हैं और वो ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देती रहती हैं"। अदालत ने इसके अतिरिक्त भी अनेक तल्ख़ टिप्पणियां कीं।

उपरोक्त अदालती टिप्पणियों से एक बार फिर यह ज़ाहिर हो गया कि देश में सत्ता अपने निजी एजेंडे पर चलने के लिये भले ही बेलगाम क्यों न हो परन्तु इसके बावजूद देश में क़ानून का राज है और देश की अदालतों के फ़ैसले ही सर्वमान्य हैं। परन्तु यदि कोई भी पक्ष भावनाओं को भड़काने के नाम पर हिंसा का सहारा ले या निर्मम हत्या का सहारा लेने लगे तो उसे किसी भी क़ीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता। वैसे भी यदि पूरे विश्व में 'भावनाओं को भड़काने' के नाम पर हत्याएं होने लगें और क़ानून के बजाये हिंसा का सहारा लिया जाने लगे फिर तो पूरा संसार ही सुलग उठेगा। आज इस दुनिया में जहां हज़रत इमाम हुसैन के मानने और उनपर अपनी जान तक न्योछावर करने वाले करोड़ों लोग हैं वहीं दुनिया में यज़ीद समर्थक भी मौजूद हैं। राम को आराध्य मानने वाले हैं तो रावण के समर्थक भी मिल जायेंगे। जहां हमारे ही देश में गाँधी को महात्मा कहने व उन्हें अपना आदर्श मानने वाले हैं वहीं उनके हत्यारे गोडसे के चाहने वालों की भी कमी नहीं। तो क्या वैचारिक मतभेद के चलते लोगों की 'भावना आहत' हो और लोग एक दूसरे की हत्या और हिंसा पर उतारू हो जायें ?

कोई भी व्यक्ति किसी के भी विचारों से सहमत या असहमत हो सकता है। अकेले कन्हैया लाल ही नुपुर शर्मा का समर्थक नहीं बल्कि लाखों लोग उसके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। यदि उदयपुर जैसी घटना हर जगह घटित होने लगे फिर तो न क़ानून बचेगा न देश न ही इंसानियत। वैसे भी क्रूर हत्यारों ने जिस तरह कन्हैया की हत्या कर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को धमकी दे डाली और हत्या की वीडीओ बनाकर सोशल मीडिया पर डालने जैसा दुस्साहस किया वह निश्चित रूप से न केवल अक्षम्य अपराध है बल्कि यह किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा भी प्रतीत होता है। इस्लाम धर्म वैसे भी बदले से अधिक क्षमा करने की प्रेरणा देता है। अपने उद्भव काल से लेकर आज तक पूरे विश्व में इस्लाम की बदनामी व रुस्वाई का कारण ही कट्टरपंथी व अतिवादी मुसलमानों के हिंसक कारनामे रहे हैं। करबला से लेकर तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान तक इसके अनेक उदाहरण नज़र आते हैं। नुपुर शर्मा के आपत्तिजनक बयान से दुनिया के मुसलमानों में जितना उबाल आया था वैसी ही स्थिति कन्हैया की बेरहमी से की गयी हत्या के बाद खड़ी हो गयी है। मुसलमानों के विरोध के मौक़े की तलाश में बैठे लोगों को एक बार फिर 'ऊर्जा ' मिल गयी है जिसके ज़िम्मेदार कन्हैया के हत्यारे तथा ' धार्मिक भावनाओं ' के नाम पर हिंसा भड़काने वाले अतिवादी प्रवृति के लोग हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम और इंसानियत दोनों को ही कलंकित करती है कन्हैय्या की नृशंस हत्या।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

कन्हैया लाल के अपराधी केवल हत्यारे नहीं

अवधेश कुमार

उदयपुर के कन्हैयालाल दर्जी की दिनदहाड़े गला काटकर हत्या करने की भयानक घटना से देश का बड़ा समूह उद्वेलित है। न तो कन्हैयालाल को जिबह करने वाला रियास अख्तरी और गौस मोहम्मद इस सोच के दो ही है और न कन्हैयालाल उनके निशाने पर एकमात्र व्यक्ति। न जाने कितने रियास और गौस मजहब के नाम पर ऐसे ही अनेक कन्हैयालालों को जिबह करने के लिए तैयार बैठे हैं। कन्हैयालाल की हत्या ठीक वैसे ही है जैसे फ्रांस में 16 अक्टूबर, 2020 को सैमुअल पेटी शिक्षक का एक चेचेन मुसलमान जेहादी आतंकवादी ने सिर कलम कर दिया था। हत्यारा अब्दुलाख अबौयदोविच  अंजोरोव को बताया गया था कि पेटी ने अपनी कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बोलते हुए छात्रों को शार्लो हेब्दो के 2012 के कार्टून दिखाए थे ,जिसमें पैगंबर मोहम्मद साहब की आपत्तिजनक छवि दिखाई गई थी। उसके बाद पेटी के विरुद्ध इसी तरह अभियान चलाए गए, जिस तरह इस समय भाजपा की नूपुर शर्मा, नवीन जिंदल और उनके समर्थकों को लेकर चलाया जा रहा है। बाद में पता चला कि जिस दिन पेटी द्वारा शार्लो  हेब्दो का कार्टून दिखाने की बात थी उस दिन वो स्कूल गए ही नहीं थे। कन्हैयालाल को नूपुर शर्मा के पक्ष में एक फेसबुक पोस्ट लिखने के कारण जान गंवानी पड़ी। उस घटना के तुरंत बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि यह विशिष्ट इस्लामी आतंकवादी हमला है और हम इसके सामने झुकेंगे नहीं। पूरे फ्रांस में लोगों ने बाहर निकलकर इसका विरोध किया और लाखों लोगों ने कहा कि हम भी सैमुअल पेटी हैं। हमारे यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ।  उस समय फ्रांस की मस्जिदों के अनेक इमामों, मौलानाओं ने हत्या की निंदा की और कहा कि इस्लाम में इसके लिए कोई स्थान नहीं है।

वैसा ही दृश्य भारत में है। जो नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को गुस्ताख ए रसूल घोषित कर रहे थे वो सब हत्या की निंदा में लग गए हैं। एक दिन पहले मोहम्मद जुबेर की गिरफ्तारी को मोदी सरकार की मुस्लिम विरोधी सोच का प्रमाण बताने वाले मुस्लिम चेहरे भी इसकी निंदा कर रहे हैं। प्रश्न है कि अगर ये सारे लोग इस तरह की हिंसा व हत्या के विरोधी हैं तो ऐसी स्थिति पैदा क्यों हुई जिसमें कन्हैयालाल की बलि चढ़ गई और अनेक की जान खतरे में हैं?

सच यह है कि सिर कलम करने का वातावरण बनाने और रियाज एवं गौस जैसों की जिहादी कट्टरता को परवान चढ़ाने के पीछे उन सारे मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों , स्वयं को सेकुलर- लिबरल मानने वाले हिन्दू बुद्धिजीवियों ,पत्रकारों एक्टिविस्टों की भूमिका है जिन्होंने न केवल नूपुर शर्मा नवीन जिंदल प्रकरण को विकृत तरीके से पेश किया बल्कि लंबे समय से यह प्रचारित करते रहे हैं कि भारत में मुसलमानों के साथ शासन -प्रशासन दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहा है , उनकी धार्मिक गतिविधियों तक को बाधित की जा रही है। क्या ऐसी संख्या हजारों लाखों में नहीं है जिन्होंने  लंबे समय से दुष्प्रचार किया मानो मुसलमान इस देश में मजहबी अल्पसंख्यक होने के कारण उत्पीड़ित हैं? 

क्या ज्ञानवापी पर न्यायालय के फैसले के बाद यह शोर नहीं मचाया गया कि हमारी सारी मस्जिदें छिन जाएंगी, नमाज पढ़ने पर बंदिशें लग जाएंगी? एक टीवी डिबेट की बहस में यह कहे जाने को कि आप हमारे देवी देवताओं के बारे में इस तरह बोलते हो अगर मैं आपको इस तरह कहूंगी तो कैसा लगेगा मोहम्मद साहब और इस्लाम के अपमान का इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया कि दुनिया भर में जिहादी सोच वालों को खाद पानी मिल गया। इस घटना की निंदा करने वाले में वे लोग भी हैं, जो उन विरोध प्रदर्शनों के नेतृत्वकर्ताओं में थे या भागीदार थे जिनमें बाजाब्ता बैनर लगे थे कि गुस्ताख ए रसूल की एक ही सजा सिर तन से जुदा सिर तन से जुदा और यही नारे भी लग रहे थे।

जब आप ऐसा माहौल बनाएंगे ,इस तरह के पोस्टर लेकर सड़कों पर निकलेंगे ,नारे लगाएंगे तो उसका हस्र यही होगा। सेकुलरवाद की विकृत सोच और वोट बैंक के कारण अनेक सरकारें ऐसी नीतियां अपनातीं हैं,जो व्यवहार में मुस्लिमपरस्त हो जाती हैं। कन्हैयालाल को धमकियां मिलती रही, पुलिस में शिकायत की गई, पर वह इतना अरक्षित था कि जेहादी सिर कलम कर चले गए। बाद में आप उसे पकड़कर सजा दे ही दीजिए इससे क्या होगा? ऐसी सोच वाले मजहब का फर्ज मान दुनिया भर में अपराध को अंजाम देते हैं और कभी ऐसे अपराधियों को अफसोस प्रकट करते नहीं देखा गया। अशोक गहलोत सरकार अपने राज्य में बढ़ते मुस्लिम कट्टरवाद, जिहादी सोच के विस्तार की कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं। हिंदू शोभा यात्राओं पर हमले हुए,  करौली में दंगे हुए और उसका रवैया बदला नहीं। गहलोत मानने को तैयार नहीं कि राजस्थान में इस्लामी कट्टरवाद जड़ जमा चुका है। उल्टे वे भाजपा - संघ को दोषी ठहराते हैं और इस मामले में तो उन्होंने स्वयं को दोषी मानने की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से ही देश को हिंसा के विरुद्ध संबोधित करने की मांग कर दी। इससे ऐसे कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ता है। 

उत्तर प्रदेश में भी राजधानी लखनऊ में कमलेश तिवारी की ऐसी ही हत्या हुई थी। योगी आदित्यनाथ सरकार उसके बाद से सतर्क रहते हुए ऐसी कार्रवाइयां कर रही है जिनसे जिहादी कट्टरपंथियों का मनोबल कमजोर रहता है। 10 जून को जुम्मे की नमाज के बाद सड़कों पर उतर कर की गई हिंसा पर आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाइयां सबके सामने है। लिबरल चेहरा लगाए इनके देश भर के समर्थकों द्वारा हाय तौबा मचाने तथा योगी आदित्यनाथ के मुस्लिम विरोधी होने के दुष्प्रचारों के बावजूद सरकार अपने रुख पर कायम है। गहलोत और दूसरी सरकारों के सामने भी यह एक उदाहरण है। लेकिन कोई इसका अनुसरण करने को तैयार नहीं।

पाकिस्तान के एक मुस्लिम पत्रकार ने तो यह कह दिया कि उन्हें पूरा वीडियो नहीं मिला लेकिन जितना वीडियो उन्होंने देखा उसके आधार पर सच यही है कि पहले मुसलमान डिबेटर ने हिंदू देवताओं को अपमानित कर भाजपा की प्रवक्ता को उकसाया। उसके अनुसार भाजपा की प्रवक्ता कह रही है कि मैं ऐसा कहूंगी तो आपको कैसा लगेगा और यह बताता है कि कैसे उसको उकसाया गया। लेकिन भारत के किसी मुस्लिम नेता, बुद्धिजीवी, मौलाना ने यह बात नहीं कही। उल्टे जुबेर की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं मोदी सरकार के मुस्लिम विरोधी सोच का परिचायक बताया गया। 7 जनवरी, 2015 को शार्लो पत्रिका और उसकी जगह सुपर मार्केट में दो आतंकवादी हमलों में 17 लोगों के मारे जाने के बाद की डिबेट में भी मुस्लिम प्रवक्ता हमले की निंदा कर रहे थे लेकिन कार्टून छापने के बारे में वक्तव्य ऐसे दे रहे थे जिससे हमला न्यायसंगत साबित होता था। यही इस मामले में भी है।

कैसे इनकी भूमिका से देश में मजहबी कट्टरता बढी और हमें खून व विध्वंस का शिकार होना पड़ा इसके कई उदाहरण है। उच्चतम न्यायालय ने अभी गुजरात दंगों के मामले में स्पष्ट कर दिया कि उसके पीछे तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उच्च स्तरीय प्रशासन का किसी प्रकार का षड्यंत्र नहीं था। पिछले 20 वर्षों से यही प्रचारित किया गया कि गुजरात सरकार ने साजिश रचकर जानबूझकर मुसलमानों का नरसंहार कराया तथा प्रशासन को कोई कार्रवाई नहीं करने दी। सितंबर 2002 में गांधीनगर के अक्षरधाम पर हुए आतंकवादी हमले के बाद से अनेक वर्षों तक के हमलों में पकड़े गए आतंकवादियों का बयान यही होता था कि गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम से उनके अंदर गुस्सा था और  बदला लेने के लिए उन्होंने ऐसा किया है। बाटला हाउस मुठभेड़ को झूठा करार देने वाले लेख, वीडियो, तकरीरें हजारों की संख्या में देश और दुनिया भर में गई। इसके प्रतिशोध में मुस्लिम युवकों के एक समूह ने इंडियन मुजाहिदीन संगठन बनाया तथा अनेक आतंकवादी हमले किए।

इसलिए इनकी आलोचना या निंदा के मायने तब तक नहीं होंगे जब तक ये स्वयं को दोषी मानकर अपना व्यवहार पूरी तरह नहीं बदलते। ऐसा होना नहीं है। दुर्भाग्य से नूपुर शर्मा प्रकरण को भाजपा ने भी बिल्कुल गलत तरीके से हैंडल किया। अपने सारे प्रवक्ताओं को टीवी पर भेजना बंद कर दिया। ठीक यही व्यवहार भाजपा का कन्हैयालाल हत्या प्रकरण में भी रहा। फ्रांस हमारे सामने एक उदाहरण है जो अनेक आतंकवादी हमला झेलने के बावजूद नहीं झुका। यह तभी हुआ जब वहां की जनता खुलकर ऐसी जिहादी सोच और आतंकवाद के विरुद्ध सड़कों पर आई। भारत की समस्या यह है विरोध करने वाले स्वयं को सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने तक सीमित है। कुछ लोग गुस्से में आकर तोड़फोड़ ,आगजनी, हिंसा करने लगते हैं। तोड़फोड़, आगजनी, हिंसा से हम उन्हीं आतंकवादियों और अपने कट्टर इस्लामी सोच के ऊपर लिबरलवाद का चेहरा लगाए लोगों के कुत्सित इरादों को ही सफल करेंगे।

फ्रांस के लोगों ने विरोध में हिंसा नहीं की। साहस के साथ जब भी हमले हुए  सड़कों पर उतरे, अहिंसक प्रदर्शन किया। यही भारत में किये जाने की जरूरत है। अहिंसक आक्रोश प्रदर्शनों के द्वारा इनका प्रतिकार भी होगा एवं सरकारों पर कठोर कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा तथा सेकुलर लिबरल चेहरे लगाए हिंदू मुस्लिम नेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्टों, मौलानाओं आदि के अंदर भी व्यापक जन विरोध का डर पैदा होगा। अवधेश कुमार,ई- 30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

शुक्रवार, 24 जून 2022

सामान्य नहीं यह हिंसा

अवधेश कुमार

 अग्निपथ के विरोध में हुई हिंसा और आगजनी ने पूरे देश को चौंकाया है। आप किसी भी दृष्टिकोण से अग्निवीर को देख लीजिए विरोध के नाम पर ऐसी हिंसा और अराजकता का कोई कारण नजर नहीं आएगा। कुछ समय के लिए अग्निवीर के तथ्यों को अलग रख दीजिए। जरा सोचिए,  इसमें ऐसा क्या है जिसके सामने आते ही विरोध के नाम पर भीषण आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा होने लगे? 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब पिछड़ों के लिए आरक्षण की योजना केंद्र की सेवाओं में भी लागू की तो इस तरह का विरोध हुआ था। उसमें गैर दलित व गैर पिछले पिछड़ी जातियों के छात्रों को लगा था कि आरक्षण से उनके लिए नौकरियों के अवसर कितना जाएंगे। इस कारण विरोध में व्यापक हिंसक हुआ और छात्रों द्वारा आत्मदाह करने तक की घटनाएं हुई। अग्निवीर योजना में किसी का कुछ जाना नहीं है। यह योजना अनिवार्य नहीं है। जिसे पसंद होगा वह योजना में आवेदन करेगा और जाएगा जिसे नहीं पसंद होगा नहीं जाएगा। विरोधियों ने देश और दुनिया में ऐसे प्रस्तुत कर दिया है मानो हजारों -लाखों लोग सेना में भर्ती होने वाले थे जिनको इस योजना से वंचित कर दिया गया है। यही नहीं भविष्य के लिए उनके रास्ते अवरुद्ध कर दिए गए हैं तथा केवल 4 वर्ष की अवधि के लिए निश्चित वेतनमान पर सेवा लेकर उन्हें जीवनभर के लिए निराश्रित और बेरोजगार छोड़ दिया जाएगा। यानी कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार की छवि ऐसी बनाई गई है कि यह रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं और छात्रों की दुश्मन है। उन्हें सेना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के रोजगार से वंचित रखना चाहती है। ध्यान रखने की बात है कि जिस दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस योजना की घोषणा की उसके कुछ ही देर बाद से इसका विरोध आरंभ हो गया जो धीरे-धीरे भारी हिंसा आगजनी तोड़फोड़ से बढ़ता चला गया। क्यों? अग्निवीर योजना की पूरी जानकारी इतनी जल्दी विरोध करने वालों के पास कैसे पहुंच गई?

यद्यपि हिंसा कई राज्यों में हुए लेकिन सबसे ज्यादा शिकार बिहार हुआ है। तो यह प्रश्न भी उठेगा कि आखिर बिहार में सबसे ज्यादा हिंसा क्यों? अगर सेना में भर्ती से वंचित होने का ही सवाल है तो हिंसा देखकर निष्कर्ष यही निकलेगा कि बिहार से भारी संख्या में नौजवान हर वर्ष भर्ती होते हैं। सच यह है कि प्रतिवर्ष बिहार से सेना में जाने वाले युवाओं की संख्या औसत ढाई हजार है। उत्तर प्रदेश की भी औसत संख्या 6500 है। इतनी कम संख्या में जहां लोग सेना में जाते हो वहां इतनी बड़ी हिंसा अग्निवीर के कारण तो नहीं हो सकती। बिहार से ज्यादा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से लोग सेना में जाते हैं। जाहिर है, ऐसी हिंसा का मूल कारण कुछ और है। यह नहीं कह सकते कि इस आंदोलन में छात्र और नौजवान नहीं है लेकिन आंदोलन केवल उनका नहीं है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। हिंसा के आ रहे विजुअल की थोड़ी गहराई से समीक्षा करेंगे तो साफ दिख जाएगा कि अनेक जगह आग लगाने वाले बिल्कुल पारंगत है। जिस तरह रेलवे की बोगी में पेट्रोल डालकर आग लगाया जा रहा है इससे पता चलता है कि इसका ज्ञान उनको है। सामान्य आंदोलनों की आगजनी में थोड़ा जला ,थोड़ा रह गया, कहीं आग लगा फिर बुझ गया। इस आंदोलन में ज्यादातर जगहों की आगजनी में संपत्तियां पूरी तरह खाक हो गई। एक विजुअल में साफ दिखा कि बिहार के तारेगाना रेलवे स्टेशन में स्टेशन मास्टर का केबिन व्यवस्थित तरीके से जल रहा है । तारेगना रेलवे स्टेशन में पुलिस के साथ मोर्चाबंदी में प्रदर्शनकारियों की ओर से गोलियां चलीं। गोलियां चलाने वाले क्या सामान छात्र और नौजवान थे? ये तो कुछ उदाहरण हैं। आप देखेंगे कि चेहरे पर कपड़ा बांधे हुए हाथों में लाठी ,डंडे, पेट्रोल के कनस्तर लिए ऐसे लोगों की बड़ी संख्या इस हिंसा में चारों तरफ नजर आ रही है। बिहार में 8 बजे रात से सुबह 4 बजे तक ट्रेनों का चालन निश्चित किया गया क्योंकि पुलिस का ने बताया 5 बजे सुबह से पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। इतने पत्थरबाज कहां से आ गए? कश्मीर से निकलकर पत्थरबाजी उत्तर प्रदेश से बिहार और झारखंड तक पहुंची है।

 

ऐसे अनेक डरावने तथ्य हैं जिनके आधार पर आप मोटा -मोटी अनुमान लगा सकते हैं कि विरोध और आंदोलन के नाम पर कैसी शक्तियां इसके पीछे हैं।

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ,कांग्रेस सभी कम्युनिस्ट पार्टियों ने आंदोलन और दूसरे दिन आयोजित बंद का समर्थन किया था।  जब आंदोलन के नाम पर इतनी हिंसा होने लगी राजनीतिक पार्टियों का दायित्व था कि अपने को अलग होने की घोषणा करते। इसकी जगह इन्होंने दूसरे दिन बंद का समर्थन किया और राजद, कांग्रेस जनाधिकार पार्टी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ता जगह-जगह स्वयं जबरन बंद कराते देखे गए । 18 जून के दिन टेलीविजन में ज्यादातर बायट राजद नेताओं के आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे यह आंदोलन उस पार्टी का है । राजद कहती है कि हिंसा से उसका कोई लेना-देना नहीं तो फिर इसकी जिम्मेवारी किसके सिर जा सकती है ? राजद बिहार की बड़ी राजनीतिक शक्ति है ।उसके सहयोग और साथ के बिना सरकार के विरुद्ध इतना बड़ा आंदोलन संभव नहीं था। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री सहित कई नेताओं के घरों पर हमले हुए और तीन जिलों में कार्यालय जला दिए गए। यह सब किसी सामान आंदोलन का उदाहरण तो नहीं हो सकता।

 वास्तव में देखा जाए तो 2018 के बाद से भारत में केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में होने वाले अभियान ऐसे ही हिंसक होते गए हैं। नागरिकता कानून संशोधन के दौरान जामिया मिलिया से आरंभ हिंसा कई जगह गया। कृषि कानून विरोधी आंदोलन में लाल किले की हिंसा सबको याद है। पिछले दिनों एक परीक्षा को लेकर व्यापक पैमाने पर इसी तरह हिंसा हुई। ज्ञानवापी और भाजपा के एक प्रवक्ता के टेलीविजन डिबेट मेंदिए गए जवाब विरोध के नाम पर प्रदर्शन और हिंसा सबसे ताजा है।10 जून जुम्मे की नमाज के बाद की हिंसा भुला नहीं जा सकता। कई मुस्लिम नेताओं ने अगले जुम्मे को भी बंद और विरोध की घोषणा की थी । ध्यान रखिए ,17 जून के मुख्य विरोध प्रदर्शन का दिन भी जुम्मा का ही था। देश में और बाहर ऐसी बड़ी शक्तियां किसी भी मुद्दे को लेकर विरोध के नाम पर हिंसा, आगजनी तथा उसके दुष्प्रचार के लिए पूरी तैयारी से काम करता है। इन शक्तियों की पूरी कोशिश भारत में केवल अशांति, अराजकता और हिंसा ही पैदा करना नहीं, दुनिया को संदेश देना है कि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की भाजपा सरकार से शासन संभल नहीं रहा, देश में उनके विरुद्ध आक्रोश है, इसलिए लोग सड़कों पर उतर कर आगजनी कर रहे हैं, कानून व्यवस्था विफल है। दूसरी ओर सरकार के स्तर पर कभी इनसे कड़ाई से निपटने और इनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का कदम नहीं उठाया गया। पहली बार उत्तर प्रदेश विरोध प्रदर्शन में हिंसा करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो रही है। चाहे शाहीनबाग का नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध अवैध धरना हो या जामिया मिलिया की हिंसा या फिर किसी कानून विरोधी आंदोलन में लाल किले की भयानक हिंसा, इनके पीछे की ताकतों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो ऐसा देश के सामने नहीं आया। इससे हिंसा पकरने वालों का हौसला बढ़ता है कि हम कुछ भी करेंगे हमारे विरुद्ध कार्रवाई नहीं होगी। दूसरे ,कृषि कानूनों की वापसी से इनका हौसला बढ़ा। इतने मान लिया कि हमने सरकार पर दबाव बनाया तो चाहे उसकी योजना जितनी सही हो वह वापस ले लेगी। विरोधियों की समस्या यह भी है कि वे नहीं चाहते कि 2024 तक मोदी सरकार की लोकप्रियता बनी रहे। इसलिए ऐसी योजनाओं को हर हाल में विफल करना चाहते हैं जिनसे मोदी सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि हो। अग्निवीर योजना में अगर प्रति वर्ष 60 हजार के आसपास दसवीं से बारहवीं पास नौजवान ,जिनके लिए रोजगार नहीं होता, जाते हैं तो वे जो कुछ सीखेंगे, नौकरी से निकलने के बाद उन्हें जो अवसर और लाभ मिलेंगे वह सब उनको मोदी सरकार का समर्थक बना सकती है। तो यह भाव भी विरोधियों के अंदर काम कर रहा है ।इसलिए विपक्षी दल हिंसा, उपद्रव और अराजकता देखते हुए साथ दे रहे हैं और केवल औपचारिक घोषणा करते हैं कि हिंसा नहीं होनी चाहिए। 

सच कहा जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे धीरे-धीरे देश उस दशा में जा रहा है जहां सरकार के विरोध के नाम पर ऐसी हिंसा और तोड़फोड़ सामान्य घटना बन जाएगा। इसमें पहली आवश्यकता तो लोगों के सामने सच लाने की है ताकि भ्रमित होने की गुंजाइश न रहे। हिंसा जब जहां हो वहां कुछ कार्रवाई करने की रणनीति के परे मोदी सरकार पिछले 3 वर्ष के ऐसे आंदोलनों की समीक्षा कर एक समग्र रणनीति बनाए ताकि उन तत्वों की पहचान कर उन से निपटा जाए और भविष्य में इस तरह के साजिश करने वालों से देश सुरक्षित रहे।

अवधेश कुमार,ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 1100 92, मोबाइल 98210 27208



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