शनिवार, 7 मई 2022

जोधपुर की हिंसा प्रशासन की विफलता का परिणाम

अवधेश कुमार

राजस्थान में पहले करौली और अब जोधपुर की हिंसा ने पूरे देश में चिंता पैदा की है। जोधपुर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह नगर भी है । वे कह रहे हैं कि उन्होंने संपूर्ण जीवन धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए लगाया है। आखिर ऐसी सफाई देने की नौबत उनके समक्ष आई है क्यों? वे यह भी कह रहे हैं कि अपराधी किसी भी धर्म के हो उनको हमने बख्सा नहीं है और पुलिस कार्रवाई कर रही है। गहलोत और उनके समर्थकों की नजर में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या है इसे भी उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। करौली में नव संवत्सर के अवसर पर निकाली गई शोभायात्रा पर हमले और उसके बाद कीकार्रवाईयों निर्भीक निष्पक्षता अभी तक नहीं दिखी है। सच यही है कि अगर करौली घटना के बाद पुलिस प्रशासन ने पूरी सख्ती दिखाई होती,शोभा यात्रा के हमलावर और इसके पीछे के षड्यंत्रकारी पकड़े जाते तथा इनसे पूछताछ करके राज्य भर में ऐसे लोगों की धरपकड़ होती तो जोधपुर की हिंसा देखने को नहीं मिलती । करौली हिंसा का पूरा सच सामने था लेकिन सरकार भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाने में ज्यादा शक्ति खर्च करती रही है। इसका एक छोटा हिस्सा भी मजहबी कट्टरपंथी जिहादियों पर फोकस होता तो राजस्थान की तस्वीर बदल जाती।

वास्तव में करौली हिंसा पूरे राजस्थान में सतह के अंदर व्याप्त स्थिति का एक प्रकटीकरण मात्र था। निश्चय ही उसके बाद खुफिया रिपोर्टों का अध्ययन सरकार ने किया होगा। यह संभव नहीं कि एक ही दिन ईद और परशुराम जयंती होने के कारण तनाव, हिंसा व आगजनी आदि की संभावनाएं खुफिया रिपोर्टों में नहीं होगा। इसे ध्यान में रखते हुए निश्चित रूप से संवेदनशील स्थानों पर सख्त सुरक्षा व्यवस्था व हिंसा रोकने के उपाय के कदम उठाए जाने चाहिए थे। यही नहीं देशभर में हिंदू धर्म तिथियों से जुड़े शोभा यात्राओं पर हुए हम लोगों ने यह भी साफ कर दिया कि बड़ी संख्या में भारत विरोधी तत्व देश में सांप्रदायिक हिंसा फैला कर एकता अखंडता को बाधित करना चाहते हैं। उम्र में पकड़े गए लोगों से पूछताछ के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जो भय पैदा करते हैं। जाहिर है उसके बाद ज्यादातर राज्य सरकारों ने स्थिति की समीक्षा कर उसके अनुसार सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव किए हैं। राजस्थान हिंसा का शिकार हो गया था इसलिए वहां की सरकार की भी जिम्मेदारी थी कि पूरी स्थिति की समीक्षा कर नए सिरे से सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करें। प्रश्न है कि गहलोत सरकार ने इसे ध्यान में रखते हुए क्या कदम उठाए?अशोक गहलोत सरकार के गृह मंत्री कह रहे हैं पुलिस की सभी संवेदनशील स्थानों पर पुख्ता व्यवस्था की गई थी। तो फिर घटना क्यों घटी?

परशुराम जयंती पर शोभायात्रा निकालने की घोषणा हो चुकी थी। निर्धारित रूट पर यात्रा के आयोजकों ने जगह-जगह भगवे झंडे लगाए थे। चूंकि प्रशासन ने शोभा यात्रा की अनुमति दी थी, इसलिए यह जिम्मेवारी उसकी ही थी कि कहां झंडे लगें और कहां नहीं लगे। यदि आरंभ में उसने  शर्त लगाई होती कि कहीं झंडे नहीं लगेंगे तो नहीं लगता। हालांकि सच यह भी है कि बाद में प्रशासन ने यात्रा के आयोजकों से बातचीत की और ज्यादातर जगहों से भगवा झंडे हट गए। भारी संख्या में लगे होने पर 2-4 झंडे का छुट जाना अस्वाभाविक नहीं था। उन्हीं में से एक स्थान स्वतंत्रता सेनानी बालमुकुंद बिस्सा की प्रतिमा वाला सर्किल था। यहां आधी रात के बाद कुछ मुस्लिम युवक आए, उन्होंने भगवा झंडा निकाल कर फेंक दिया तथा उसकी जगह सफेद कपड़े पर हरे रंग से चांद सितारे बने झंडे लगाने लगे। इसका विरोध होना ही था। झंडा लगाने का विरोध करने वालों की संख्या कम थी तो झंडा लगाने वालों ने जवाब हमले से दिया। बताया गया कि उन्होंने न केवल झंडे लगाए बल्कि प्रतिमा के मुख पर एक टेप लगा दिया।  सच जो भी हो लेकिन इससे तनाव बढ़ गया। यहां पुलिस प्रशासन को न केवल त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी बल्कि स्थिति न बिगड़े इसके पूर्वोपाय के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए थी । ऐसा नहीं हुआ। आरोप तो यह भी है कि पुलिस ने हिंदुओं के विरुद्ध भी कार्रवाई शुरू कर दी। जब दोनों समुदायों के लोग एकत्रित थे तो पुलिस की भूमिका क्या होनी चाहिए? हैरत की बात देखिए कि मुस्लिम समुदाय के कुछ घरों से पत्थर चलाए गए जिनमें हरे रंग से रंगे पत्थर भी थे। है न अजीब स्थिति। इसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। एक जगह शांति होती तब तक दूसरी और तीसरी जगह पत्थरबाजी शुरू हो गई। कोई चारा न होने पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

लेकिन ऐसा होने के बाद भी पुलिस की आंखें शायद पूरी तरह नहीं खुली। दूसरे दिन जो कुछ हुआ उसे हर दृष्टि से एक समुदाय के कुछ लोगों के बढ़े हुए मनोबल तथा पुलिस  कमजोरी का ही परिणाम माना जाएगा। ईद की नमाज के लिए भारी संख्या में लोग एकत्रित हुए। नमाज खत्म होने के साथ ही धार्मिक नारे लगने लगे। अनेक हाथों में तलवारें लहराने लगी। इसके साथ पत्थरबाजी शुरू। एक युवक को चाकू घोंप दिया गया। अनेक वाहनों को तोड़ा गया तथा दो दर्जन से ज्यादा वाइको को आग के हवाले कर दिया गया। 10 एटीएम मशीनों में भी तोड़फोड़ की सूचना है। इस तरह  की हिंसा का मतलब पहले से थोड़ी बहुत तैयारी थी। कुछ लोग हिंसा करने के लिए तैयार बैठे थे ,अन्यथा ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसकी प्रतिक्रिया में लोगों ने तोड़फोड़ हिंसा या आगजनी की। स्थानीय भाजपा विधायक सूर्यकान्ता व्यास के घर पर हमला हुआ और मोहल्ले में तेजाब की बोतलें तक फेंकी गई। स्थिति बिगड़ने के बाद प्रशासन को मजबूर होकर कर कर्फ्यू लगानी पड़ी।

कहने की जरूरत नहीं कि प्रशासन स्थिति का सही आकलन न कर पाने के कारण छोटे-मोटे उपाय करके मानता रहा है कि कुछ बड़ा नहीं होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रशासन ने  घटना घट जाने का इंतजार किया। सामान्यतः ईद के पूर्व प्रशासन शांति और एकता समितियों की बैठक करता है। खुफिया इनपुट के आधार पर हर स्तर की सुरक्षा तैयारी होती है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ लोगों को हिरासत में लिया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है। ऐसा भी राजस्थान में देखने को नहीं मिला। वास्तव में पुलिस प्रशासन सरकार यानी राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश या उसकी सोच के अनुसार ही काम करता है। उत्तर प्रदेश इसका उदाहरण है कि अगर राजनीतिक नेतृत्व कानून और व्यवस्था के प्रति संकल्पबद्ध हो तो इस स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हो सकता है। 1947 के बाद पहला अवसर है जब उत्तर प्रदेश में अलविदा का कोई नमाज सड़क पर अता नहीं किया गया। सड़क पर नमाज अता न करने का अर्थ है कि अभी तक जानबूझकर ऐसा होता रहा। यानी मस्जिदों में इतनी जगह थी कि नमाज आराम से अता किए जा सकते थे। संभल में छोटी घटना हुई । उसके बाद पुलिस प्रशासन ने जैसी सख्ती की वह सामने है। पूरे रमजान के महीने में कोई एक अवांछित घटना नहीं घटी। हर तरह की शोभा यात्राएं निकलीं और शांतिपूर्वक संपन्न भी हो गईं। उत्तर प्रदेश में कई हजार धर्म स्थानों से अवैध लाउडस्पीकर हटाए गए और भारी संख्या में लगे लाउडस्पीकरों की आवाजें कम की गई। कहीं किसी ने इसके विरोध में आक्रमता या हिंसक प्रतिक्रियाएं देखी? इससे दूसरे राज्य सरकारों को भी सीख लेनी चाहिए। जो उत्तर प्रदेश में हो सकता है वह कहीं हो सकता है। बस, राजनीतिक नेतृत्व के अंदर सकल्प होना चाहिए कि हमें कानून क् शासन की अवधारणा कायम रखनी है।

इसके उलट राजस्थान में जगह-जगह सड़कों पर नमाज़ पढ़े गए और यातायात कई घंटे पूरी तरह ठप रहा। लाउडस्पीकरों की गूंज वैसे ही रही जो पहले थी। मुख्यमंत्री गहलोत चाहे स्वयं को धर्मनिरपेक्षता के प्रति जितना प्रतिबद्ध बताएं या कानून की सख्ती का दावा करें सच्चाई सामने है । जब आप किसी समुदाय की गलतियों, कानून के उल्लंघनों की लगातार अनदेखी करते हैं तो उनसे असामाजिक कट्टरपंथी तत्वों का मनोबल बढ़ता है और वे इसका अपने तरीके से लाभ उठाते हैं। करौली मैं शोभायात्रा पर हुआ हमला इसी का परिणाम था। राजस्थान की इस मायने में स्थिति का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि वहां के अखबार वैसे लेख तक छापने से बचते हैं  जिनमें कहीं तार्किक दृष्टि से भी मुस्लिम समुदाय के रवैये पर प्रश्न खड़ा किया किया गया हो। पूछने पर बताया जाता है कि वे लोग कार्यालय में धमक जाते हैं, हल्ला करते हैं। राजस्थान में काम करने वाले ज्यादातर पत्रकारों या वहां के अखबारों में लिखने वालों को इसका अच्छी तरह पता है। कोई पूरा समुदाय आक्रामक नहीं होता लेकिन वहां कुछ सक्रिय तत्वों का मनोबल इतना बढ़ जाए तो यह प्रशासन के इकबाल का परिचायक नहीं हो सकता। अच्छा हो कि ना केवल राजस्थान की गहलोत सरकार बल्कि दूसरी भी राज्य सरकारें इस से सीख ले और उसके अनुसार प्रशासनिक व्यवहार करें।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092 , मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 3 मई 2022

स्वामी विवेकानंद, गांधी और गौभक्त

एल. एस. हरदेनिया

अत्यधिक दुःखद समाचार है कि गौहत्या के सिर्फ संदेह के आधार पर दो भोले-भाले आदिवासियों की हत्या कर दी गई. हमारे देश में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है. पिछला अनुभव यह है कि कुछ मामलों में जिन व्यक्तियों की गौहत्या के नाम पर हत्या कर दी गई थी जांच-पड़ताल के बाद वे हत्या के अपराधी नहीं पाए गए. इसी तरह जिन घरों से गौमांस मिलने का आरोप लगाकर उन घरों में रहने वालों के साथ हिंसा की गई, बाद में उनके घरों से मिला मांस गौमांस नहीं निकला.

इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि गौहत्या का समाचार मिलने पर गौभक्तों को गुस्सा आना स्वाभाविक है. और गुस्से की स्थिति में संदेही गौहत्यारों पर हिंसक हमला करना भी स्वाभाविक माना जा सकता है. परंतु हमारे शासकों, राजनीतिक नेताओं को इस बात को प्रचारित करना चाहिए कि गौहत्या का समाचार मिलते ही गौभक्त पुलिस को सूचित करें और यदि किसी मांस के गौमांस होने का संदेह है तो उसकी जांच करवाएं. 

पुष्टि होने के बाद ही कानूनी प्रावधानों के मुताबिक पुलिस या अन्य अधिकारियों के माध्यम संबंधित आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करवाएं. यदि वे आक्रोश में तथाकथित गौहत्यारों की हत्या कर देते हैं तो उन्हें आजीवन कारावास या मृत्युदंड भुगतना पड़ेगा. 

बताया गया है कि सिवनी जिले में हुई हत्याओं में बजरंग दल से जुड़े लोगों का हाथ है. अधिकृत रूप से बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन है. संघ को चाहिए कि अपने से जुड़ी संस्थाओं के सदस्यों को आदेश दे कि वे भविष्य में हिंसक गतिविधियों से दूर रहें. 

अभी कुछ दिनों पहले संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश में बढ़ती हुई हिंसा पर चिंता प्रगट की थी। संघ का अनुशासनबद्ध संस्था होने का दावा करता है. अतः यदि डॉ भागवत पूरी दृढ़ इच्छा से हिंसा के त्यागने का आदेश देंगे तो शायद ही संघ से जुड़ा कोई व्यक्ति उनके आदेश का उल्लंघन करने का दुस्साहस दिखाएगा.

परंतु हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश के अनेक व्यक्ति जिनके नाम के आगे संत-महंत-बाबा आदि जुड़ा है वे सार्वजनिक रूप से मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा भड़काने की बात करते हैं. अभी हाल में ऐसे संतों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं. यदि इस तरह के भड़काऊ भाषणों पर सख्ती से प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो देश में अराजक स्थिति निर्मित हो सकती है. घृणा फैलाने वाली इन गतिविधियों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी चिंता प्रगट की है. 

गौमाता को लेकर देश में आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं. गौमाता की सुरक्षा पर महात्मा गांधी को भी चिंता थी। कोई भी व्यक्ति स्वामी विवेकानंद से बड़ा गौभक्त होने का दावा नहीं कर सकता. मैं यहां इस विषय पर इन दोनों महान व्यक्तियों के विचार उद्धत कर रहा हूं.

स्वामी विवेकानंद के विचार

गौरक्षा एवं इंसान की रक्षा के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार हमने रामकृष्ण मठ, नागपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘विवेकानंदजी के संग में’’ से लिया है. इस पुस्तक के लेखक श्री शरच्चन्द्र चक्रवर्ती हैं.

गोरक्षण सभा के एक उद्योगी प्रचारक स्वामीजी के दर्शन के लिए साधु-सन्यासियों का सा वेष धारण किए हुए आए. उनके मस्तक पर गेरूए रंग की एक पगड़ी थी. देखते ही जान पड़ता था कि वे हिन्दुस्तानी हैं. इन प्रचारक के आगमन का समाचार पाते ही स्वामीजी कमरे से बाहर आए. प्रचारक ने स्वामीजी का अभिवादन किया और गौमाता का एक चित्र उनको दिया. स्वामीजी ने उसे ले लिया और पास बैठे हुए किसी व्यक्ति को वह देकर प्रचारक से निम्नलिखित वार्तालाप करने लगे.

स्वामीजी - आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है?

प्रचारक - हम लोग देश की गौमाताओं को कसाई के हाथों से बचाते हैं. स्थान-स्थान पर गोशालाएं स्थापित की गई हैं जहां रोगग्रस्त, दुर्बल और कसाईयों से मोल ली हुई गोमाता का पालन किया जाता है. 

स्वामीजी- बड़ी प्रशंसा की बात है. सभा की आय कैसे होती है?

प्रचारक - आप जैसे धर्मात्मा जनों की कृपा से जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से सभा का कार्य चलता है.

स्वामीजी- आपकी नगद पूंजी कितनी है?

प्रचारक- मारवाड़ी वैश्य सम्प्रदाय इस कार्य में विशेष सहायता देता है. वे इस सत्कार्य में बहुत सा धन  प्रदान करते हैं.

स्वामीजी- मध्यभारत में इस वर्ष भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा है. भारत सरकार ने घोषित किया है कि नौ लाख लोग अन्नकष्ट से मर गए हैं. क्या आपकी सभा ने इस दुर्भिक्ष में कोई सहायता करने का आयोजन किया है?

प्रचारक- हम दुर्भिक्षादि में कुछ सहायता नहीं करते. केवल गोमाता की रक्षा करने के उद्देश्य से यह सभा स्थापित हुई है. 

स्वामीजी- आपके देखते-देखते इस दुर्भिक्षादि में आपके लाखों भाई कराल काल के चंगुल में फंस गए. आप लोगों के पास बहुत नगद रूपया जमा होते हुए भी क्या उनको एक मुट्ठी अन्न देकर इस भीषण दुर्दिन में उनकी सहायता करना उचित नहीं समझा गया?

प्रचारक - नहीं, मनुष्य के कर्मफल अर्थात पापों से यह दुर्भिक्ष पड़ा था. उन्होंने कर्मानुसार फलभोग किया. जैसे कर्म हैं वैसा ही फल हुआ है.

प्रचारक की बात सुनते ही स्वामीजी के क्रोध की ज्वाला भड़क उठी और ऐसा मालूम होने लगा कि उनके नयनप्रान्त से अग्निकण स्फुरित हो रहे हैं. परंतु अपने को संभालकर वे बोले, “जो सभा-समिति मनुष्यों से सहानुभूति नहीं रखती, अपने भाईयों को बिना अन्न मरते देखकर भी उनकी रक्षा के निमित्त एक मुट्ठी अन्न से सहायता करने को उद्यत नहीं होती तथा पशु-पक्षियों के निमित्त हजारों रूपये व्यय कर रही है, उस सभा-समिति से मैं लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं रखता. उससे मनुष्य समाज का विशेष कुछ उपकार होना असंभव सा जान पड़ता है. “अपने कर्मफल से मनुष्य मरते हैं” इस प्रकार की बातों में कर्मफल का आश्रय लेने से किसी विषय में जगत में कोई भी उद्योग करना व्यर्थ है. यदि यह प्रमाण स्वीकार कर लिया जाए तो पशु-रक्षा का काम भी इसी के अंतर्गत आता हैं.  तुम्हारे पक्ष में भी कहा जा सकता है कि गोमाताएं अपने कर्मफल से कसाईयों के पास पहुंचती हैं और मारी जाती हैं - इससे उनकी रक्षा का उद्योग करने का कोई प्रयोजन नहीं है."

प्रचारक कुछ  लज्जित होकर बोला - “हां महाराज, आपने जो कहा वह सत्य है, परंतु शास्त्र में लिखा है कि गौ हमारी माता है”.

स्वामीजी हंसकर बोले- “जी हां, गौ हमारी माता है यह मैं भलीभांति समझता हूं. यदि यह न होती तो ऐसी कृतकृत्य संतान और दूसरा कौन प्रसव करता?”

प्रचारक इस विषय पर और कुछ नहीं बोले. शायद स्वामीजी की हंसी प्रचारक की समझ में नहीं आई. आगे स्वामीजी से उन्होंने कहा, “इस समिति की ओर से आपके सम्मुख भिक्षा के लिए उपस्थित हुआ हूं.”

स्वामीजी- मैं साधु-सन्यासी हूं. रूपया मेरे पास कहां है कि मैं आपकी सहायता करूं? परंतु यह भी कहता हूं कि यदि कभी मेरे पास धन आए तो मैं प्रथम उस धन को मनुष्य सेवा में व्यय करूंगा. सब से पहले मनुष्य की रक्षा आवश्यक है - अन्नदान, धर्मदान, विद्यादान करना पड़ेगा. इन कामों को करके यदि कुछ रूपया बचेगा तो आपकी समिति को दे दूंगा."

इन बातों को सुनकर प्रचारक स्वामीजी का अभिवादन करके चले गए. तब स्वामीजी ने कहा, “देखो, कैसे अचम्भे की बात उन्होंने बतलायी! कहा कि मनुष्य अपने कर्मफल से मरता है, उस पर दया करने से क्या होगा? हमारे देश के पतन का अनुमान इसी बात से किया जा सकता है. तुम्हारे हिन्दू धर्म का कर्मवाद कहां जाकर पहुंचा? जिस मनुष्य का मनुष्य के लिए जी नहीं दुखता वह अपने को मनुष्य कैसे कहता है?” इन बातों को कहने के साथ ही स्वामीजी का शरीर क्षोभ और दुःख से सनसना उठा.

गो वध के मुद्दे पर गांधी के विचार

गो वध के मुद्दे को गांधीजी दोनों धर्मों (हिन्दू और मुसलमान) बीच शत्रुता का सबसे बड़ा कारण बताते हैं. यह समस्या किसी भी रूप में हिंसा की शक्ल न ले इसके लिए गांधी दोनों पक्षों को समझाते हैं. वह हिन्दुओं से कहते हैं कि वह अपने मुसलमान भाइयों को अपने धर्म में गाय के महत्व के बारे में समझाने का प्रयास करें और कहें कि वो इसका वध न करें, यदि फिर भी कोई मुसलमान यह मानने को तैयार न हो तो गांधी कहते हैं,'' यदि मैं गाय के प्रति अतिरिक्त करुणा भाव से भरा हुआ हूं तो मैं उसकी रक्षा के लिए अपनी जान दे दूंगा पर अपने भाई की जान नहीं लूंगा.''

- एल. एस. हरदेनिया,
पत्रकार एवं संयोजक, राष्ट्रीय सेक्युलर मंच
मोबाईल 9425301582

रविवार, 1 मई 2022

पंचायती राज की सफलता तो हमारे व्यवहार पर निर्भर है

 अवधेश कुमार

24 अप्रैल को पंचायत दिवस आया गया जैसा हो गया। अगर नरेंद्र मोदी सरकारी इस दिवस पर पंचायतों के लिए पुरस्कारों की घोषणा न करें तो किसी को याद भी नहीं होगा कि पंचायत दिवस कब आता है।

जब पी वी नरसिंह राव सरकार ने 24 फरवरी, 1992 को संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज कानून पारित किया तथा इसके एक वर्ष बाद  लागू हुआ तो इसे स्थानीय स्वशासन प्रणाली की दृष्टि से लोकतांत्रिक अहिंसक क्रांति नाम दिया गया। वास्तव में आजाद भारत की सबसे बड़ी विडंबना थी कि महात्मा गांधी को स्वतंत्रता आंदोलन का अपना नेता घोषित करने के बावजूद आजादी के बाद शासन में आई सरकार ने  ग्राम स्वराज के उनके सपने को संविधान के तहत अनिवार्य रूप से संपूर्ण राष्ट्र में साकार करने का कदम नहीं उठाया । पंडित जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में ही 1957 में बलवंत राय मेहता समिति ने जिस त्रीस्तरीय पंचायत प्रणाली की अनुशंसा की उसके अनुसार गांव में ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद को तभी संविधान का अनिवार्य भाग बना दिया जाना चाहिए था। उसने विकेंद्रित लोकतंत्र शब्द भी प्रयोग किया। ध्यान रखिए, स्वतंत्रता के बाद संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संघ, समवर्ती और राज्य सूची के आधार पर ही किया गया जिनमें पंचायतों को अधिकार नहीं मिल सका। 1992 का संशोधन ही था जिसके तहत पंचायतों को कुल 29 विषयों पर काम करने का संवैधानिक अधिकार मिला।  इस व्यवस्था ने 29 वर्ष पूरा कर 30 वें वर्ष में प्रवेश किया है। किसी भी व्यवस्था के मूल्यांकन के लिए इतना समय प्राप्त है। प्रश्न है कि क्या हम पंचायत प्रणाली की वर्तमान स्थिति को संतोषजनक मान सकते हैं? क्या यह कहा जा सकता है कि गांवों तक सत्ता का सहज विस्तार करने तथा स्वशासन की अवधारणा को साकार रूप देने में यह व्यवस्था सफल हुई है?

आज दुनिया के विकसित देश औपचारिक रूप से यह मानने को विवश हैं कि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में पंचायती राज के माध्यम से सत्ता को नीचे तक पहुंचाने का काम अद्भुत है। विकसित देशों में विश्व का शायद ही कोई महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय, शोध संस्थान या थिंकटैंक हो जो सत्ता के विकेंद्रीकरण या निचले स्तर पर स्वायत्तता के बारे में अध्ययन या विचार करते समय भारत की पंचायती प्रणाली का उल्लेख न करें। विश्व में सबसे ज्यादा शोध यदि किसी एक प्रणाली पर हुआ है तो वह है, भारत की पंचायती राज व्यवस्था। हमें अपने देश में भले यह सामान्य काम लगे लेकिन विश्व के लिए अद्भुत है। इस आधार पर स्वाभाविक निष्कर्ष यही निकलेगा कि अगर विश्व में इस व्यवस्था ने धाक जमाई है तो निश्चित रूप से सफल है। जाति और लिंग के आधार पर सत्ता में भागीदारी की दृष्टि से विचार करें तो इसने समानता के सिद्धांत को साकार किया है। 1992 के संशोधन में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण था जिसे बाद में 50% कर दिया गया। यानी इस समय करीब 2.6 लाख ग्राम पंचायतों में आरक्षण के अनुसार सत्ता की आधी बागडोर महिलाओं के हाथों में है। दूसरे ,दलितों ,आदिवासियों, पिछड़ी जातियों एवं अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधियों की संख्या 80% से ज्यादा है। विधानसभाओं एवं लोकसभा में अनुसूचित जाति -जनजाति एवं अति पिछड़ी जातियों के सांसदों और विधायकों के निर्वाचित होने से जमीनी स्तर पर सामाजिक असमानता में अपेक्षित अंतर नहीं आया। पंचायतों में इनके निर्वाचन से व्यापक अंतर आया है। एक समय स्वयं को उपेक्षित माने जाने वाला वर्ग अब गांवों और मोहल्ले में फैसले करता है तथा ऊंची जाति की मानसिकता में जीने वाले ने लगभग इसे स्वीकार कर समन्वय स्थापित किया है। बाहर से भले लोगों को दिखाई न दे तथा आज भी तीन-चार दशक पहले की जातीय व्यवस्था को याद करते हुए क्रांतिकारी विचार दिए जाएं, धरातल की स्थिति पंचायती राज व्यवस्था के कारण काफी हद तक बदली है। आप किसी जाति के हों, काम के लिए ग्राम प्रधान, मुखिया, सरपंच या वार्ड सदस्य के घर जाना होता है, उसके दरवाजे पर बैठना है। इन सबसे ऊंच-नीच की मानसिकता बदल रही है। इस तरह कहा जा सकता है कि पंचायती राज ने सामाजिक समानता को मनोवैज्ञानिक स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया है। 

हां ,महिलाओं के मामले में अभी यह लक्ष्य प्राप्त होना शेष है। ज्यादातर जगह निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पति व्यवहार में ज्यादा सक्रिय हैं और मुख्य भूमिका उनकी होती है। किंतु अनेक जगह महिलाएं स्वयं भी सक्रिय हैं। चुनाव के दौरान  महिलाएं अपने लिए लोगों से वोट मांगने जाती हैं और इस प्रकार उनका पुरुषों एवं अन्य महिलाओं से आमना- सामना होता है जो बड़ा बदलाव है। पढ़े-लिखे युवाओं में भी निर्वाचित होकर काम करने की ललक बढ़ी है। चुनाव आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की दृष्टि से देखें तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत सतत जागरूकता का साकार होना है।

किंतु यह सब एक पक्ष है। इसके दूसरे पक्ष चिंताजनक और कई मायनों में डरावने हैं। सत्ता यदि शक्ति, संपत्ति और प्रभाव स्थापना का कारक बन जाए तो वह हर प्रकार की मानवीय विकृति का शिकार होता है। हालांकि लोकसभा और विधानसभाओं के अनुरूप शक्ति का विकेंद्रीकरण तुलनात्मक रूप से पंचायती राज में कम है। बावजूद पंचायती राज के तीनों स्तरों के अधिकार और कार्य विस्तार के साथ जितने काम आए और उसके अनुरूप संसाधनों में बढ़ोतरी हुई उसी अनुरूप इनके पदों पर निर्वाचित होने की लालसा भी बढी। वर्तमान वोटिंग प्रणाली अनेक प्रकार के भ्रष्ट आचरण की जननी है। इसे आप पंचायती चुनाव में ज्यादा देख सकते हैं। प्रशासन के लिए पंचायतों का चुनाव कराना विधानसभाओं और लोकसभा चुनावों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।  मतदान केंद्रों पर सामान्यतः कब्जा नहीं होता लेकिन मत खरीदने के लिए हरसंभव हथकंडे अपनाए जाते हैं। नैतिक गिरावट इतनी है कि हर गांव में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपना मत बेचने को तैयार बैठे हैं। पंचायत प्रमुख एवं जिला परिषद अध्यक्ष आदि के चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों की बोली लगती है। पैसे के साथ-साथ ताकत का बोलबाला भी है और जातीय समीकरण तो है ही। जो भारी निवेश कर चुनाव जीतेगा वह उसी अनुरूप में कमाई भी करेगा। यह कल्पना व्यवहार में सफल नहीं है कि पंचायतों को अगर अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन तथा विकास के लिए योजनाएं बनाने और क्रियान्वित करने की ताकत मिल जाए तो आदर्श व्यवस्था स्थापित हो सकती है। विकास और कल्याण की शायद ही कोई योजना है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं हो। राशि लाभार्थी के खाते में सीधे जाती है,पर चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो या स्वच्छता के तहत शौचालय या ऐसी कोई योजना वार्ड प्रतिनिधि तक हस्ताक्षर करने के एवज में कमीशन लेते हैं। मनरेगा भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कार्यक्रम बन चुका है। एक बार निर्वाचित होने के बाद सत्ता,शक्ति, संपत्ति और प्रभाव का स्वाद मिल जाने के बाद सामान्यत: कोई पद जाने देना नहीं चाहता। इसलिए हर चुनाव में हम ही जीते इस मानसिकता ने पंचायत प्रणाली को प्रभावी लोगों के गिरफ्त में डाला है।  राशन वितरण में बायोमेट्रिक प्रणाली ने चोरी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया है लेकिन गांव में अच्छी खेती बारी करने वाले खुशहाल परिवार भी सस्ते अनाज लेते हैं। जानते हुए भी ग्राम प्रधान उस पर रोक नहीं लगाते क्योंकि मामला वोट का है। यह इतना बड़ा भ्रष्टाचार है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। स्वयं सोचने वाली बात है कि क्या भारत में आज भी 80% लोगों को पूर्णा काल में मुफ्त राशन की आवश्यकता थी?

कुछ -कुछ जगहों में अपने स्तर पर अवश्य संस्कार और चरित्र से निर्वाचित ग्राम प्रधानों, मुखियाओं और सरपंचों ने बेहतर कार्य से व्यवस्था को आकर्षक बनाया है। इनकी संख्या काफी कम है। और पंचायतों की कुछ व्यवस्था तो ठीक से लागू ही नहीं है। उदाहरण के लिए न्याय पंचायत। अगर न्याय पंचायतें कल्पना के अनुरूप सही ढंग से लागू हो तो न्यायालय में बढ़ते मुकदमों का बोझ काफी हद तक कम हो जाए। ऐसा तभी संभव होगा जब समाज के अंदर अपने दायित्व और उससे संबंधित नैतिक चेतना तथा भावी पीढ़ी के भविष्य संवारने का वास्तविक बोध हो। वास्तव में यही किसी व्यवस्था की सफलता का मूल है । समय की मांग पूरी राजनीतिक व्यवस्था की गहरी समीक्षा और उसके अनुरूप व्यापक संशोधन और परिवर्तन का है । हममें से शायद ही किसी के अंदर इसकी तैयारी हो । गांधीजी ने भारत की प्राचीन प्रणाली के अनुरूप मतदान की अति सामान्य व्यवस्था दी थी। लेकिन उनके विचार के केंद्र में परस्पर एक दूसरे का हित चाहने वाला नैतिक और जिम्मेदार व्यक्ति है। तो व्यवस्था में बदलाव की कल्पना के साथ समाज में ऐसे व्यक्तियों का बहुतायत कैसे हो इस पर काम करने की आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, ई-30, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

सुनियोजित हिंसा की नई सुरक्षा चुनौती

अवधेश कुमार

हिंदू धर्म की शोभा यात्राओं पर हमले का क्रम राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया । जहांगीरपुरी में हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर भीषण हमला और आगजनी ठीक वैसे ही है जो हम मध्य-प्रदेश के खरगोन से गुजरात के खंभात तक देख चुके हैं । राजस्थान के करौली से लेकर देश के कई क्षेत्रों  में  धार्मिक शोभा यात्राओं पर भीषण हमले और उत्पन्न हिंसा की छानबीन के बाद जो तथ्य सामने आ रहे हैं उसमें दिल्ली के हिंसा भयभीत जरूर करती है लेकिन आश्चर्य में नहीं डालती। छह राज्यों के अलग-अलग स्थानों में एक ही तरह की हिंसा अनायास और छिटपुट घटनाएं हो ही नहीं सकती। वास्तव में हमले और हिंसा की घटनाएं अलग-अलग नहीं थी। दिल्ली के पहले गुजरात, झारखंड ,पश्चिम बंगाल ,कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि राज्य धार्मिक शोभायात्राओं के दौरान हुई हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार हुए। इन सभी राज्यों की हिंसक घटनाओं के बीच कुछ समानताएं आपको दिखाई देंगी। पहले शोभा यात्रा पर हमले, पूरी तैयारी के साथ आगजनी और हिंसा। ये सब सुनियोजित तरीके से की गई और एक कड़ी के अंग हैं। सभी राज्यों में जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं उनमें कुछ या कोई  किसी न किसी का नाम ले रहा है। वैसे भी पेट्रोल बम, तलवार, पिस्तौल के साथ अनगिनत पत्थरों, कांच की बोतलों का चलना, लक्षित आगजनी आदि अचानक नहीं हो सकता। इतनी संख्या में पत्थरों, बोतलें, टूटे कांच आदि एकाएक नहीं आ सकती । 

 सबसे पहले  इसके पीछे की सोच को समझना जरूरी है।  जरा सोचिए, वर्षों से अलग-अलग स्वरूपों में निकलतीं शोभायात्राएं जिन लोगों को सहन नहीं हो वो कैसी मानसिकता रखते होंगे? खरगोन से गुजरात के खंभात तक की हिंसा स्पष्ट कर रही है कि कैसे इन सबके बीच अंतर्संबंध था । हिंसा का भयावह सच वीडियो और सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है। दिल्ली का वीडियो देख लीजिए । इसमें शोभायात्रा में लोग गाते नारा लगाते चल रहे हैं और अचानक उन पर भारी संख्या में लोग हमला कर देते हैं । पूरा वातावरण डरावना है। शोभायात्रा में शामिल लोग अपनी गाड़ियां तक छोड़कर जान बचाने के लिए भाग रहे हैं । 10 अप्रैल को खरगोन में अचानक हुए हिंसा और हमले से लोग इतने डरे थे कि उन्होंने छुपकर वीडियो बनाए और उसे तब बाहर किया जब महसूस हुआ कि उन्हें कोई खतरा नहीं होगा। तवड़ी मोहल्ले का एक वीडियो है जिसमें पेट्रोल बम फेंककर जबरदस्त आगजनी करते देखा जा रहा है। स्पष्ट लगता है कि पहले से तय करके पेट्रोल बम फेंके गए और आग लगाए गए। ईंट और पत्थरों की तो बारिश हो रही है। एक वीडियो ऐसा भी है, जिसमें एक युवक अपनी छत से सीसीटीवी कैमरे को दूसरी तरफ घुमा रहा है और उसके ठीक पीछे से दूसरे पक्ष पर जमकर पथराव किया जा रहा है। खरगोन के गौशाला मार्ग का दृश्य भी ऐसा ही है। शाम 5:45 बजे सैकड़ों लोग एकत्रित हुए और हथियारों, डंडों, पत्थरों व अन्य सामानों से  लगातार हमले कर रहे हैं। कई हमलावर यहां भी सीसीटीवी निकालते दिख रहे हैं।शीतला माता मंदिर में तोड़फोड़ का दृश्य पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर होने वाले हमले की तरह है। जितनी संख्या में हिंसा करते लोग दिख रहे हैं वह एकाएक इकट्ठे हो ही नहीं सकते। जाहिर है, पहले से पूरी तैयारी करके इकट्ठे थे। तो ये कौन है जिन्होंने देशव्यापी हिंसा की साजिशें रच कर उन को अंजाम तक पहुंचाने में सफलता पाई?

इसका कुछ उत्तर गुजरात के आणंद जिले के खंभात इलाके में 5 अप्रैल को एक धार्मिक जुलूस पर हुए हमले के आरोप में   पकड़े गए लोगों से पूछताछ के बाद मिल रहा है। गिरफ्तार लोगों से पता चला है कि उस हिंसा के पीछे का मुख्य मस्तिष्क मौलवी रजक पटेल है।  मौलवी रजक घटना को अंजाम देने के लिए जिले के बाहर और कुछ विदेशी लोगों से आवश्यक धन की व्यवस्था को लेकर भी संपर्क में था।  फंड जुटाने का काम मतीन नाम के शख्स को दिया गया था।  जैसे ही इन्हें पता चला कि रामनवमी जुलूस की अनुमति मिल गई है इन्होंने तीन दिन के अंदर  पूरी व्यवस्था कर ली। जाहिर है, तैयारी पहले से हो रही होगी। कब्रिस्तान से पत्थर फेंकने की योजना इसलिए बनाई गई ताकि पत्थरों की कमी न पड़े।आणंद के अलावा साबरकांठा और द्वारिका में भी शोभा यात्राओं को निशाना बनाया गया। झारखंड के बोकारो और लोहरदगा में पहले शोभायात्रा ऊपर हमले हुए और फिर आगजनी की गई। 

 अभी तक की छानबीन का निष्कर्ष है कि इन लोगों ने शोभा यात्राओं पर इसलिए हिंसा किया ताकि इनके अंदर भय पैदा हो और आगे से यात्रा न निकालें। यही मानसिकता दिल्ली से लेकर अन्य जगहों में थी। यह मानसिकता जुनूनी मजहबी घृणा से ही पैदा होती है और विश्व स्तर पर यह जिहादी आतंकवाद के रूप में हमारे सामने है। जिस तरह से कोई आतंकी मॉड्यूल योजना बनाकर हमला करता है लगभग वैसा ही तौर तरीका इनका भी था। यानी पहले बैठकें करना, उसमें शोभा यात्राओं को कहां-कहां किस तरह निशाना बनाना है उन पर चर्चा करना, योजना बनाना ,उन्हें अंजाम देने के लिए संसाधन जुटाना, मुख्य लोगों को तैयार करना या बाहर से बुलाना, लोगों को भड़का कर इसके लिए तैयार करना,  शोभायात्रा आने के पहले घात लगाकर बैठना और अचानक हमला कर देना…..।

 तो इन हमलों के संदेश क्या है?आमतौर पर माना जाता है कि केंद्र से लेकर अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारों के कारण जिहादी और सांप्रदायिक तत्व कमजोर पड़ गए हैं। वे  बड़ी साजिशों को नहीं सफल कर पा रहे। आतंकवादी हिंसा को अंजाम देने वाली ताकतें भी निराश हैं। इस कारण सीधे आतंकवादी हमले करने की जगह इन शक्तियों ने तरीका बदलने की शुरुआत की है। खुफिया एजेंसियां वर्षों से रिपोर्ट दे रही हैं कि जिहादी आतंकवादी तत्व प्रमुख हिंदू पर्वों त्योहारों के साथ प्रसिद्ध धर्मस्थलों पर हमले की साजिशें रच रहे हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी कार्रवाइयों में ऐसे अनेक हमलों को साकार होने के पहले ही विफल किया है। बावजूद रामनवमी की शोभायात्राओं पर इस तरह के सुनियोजित हमले सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल अवश्य खड़ी करती हैं।  संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा की पहले से व्यवस्था की गई होती तो ऐसा नहीं होता। यह कैसे संभव है कि इतनी भारी मात्रा में ईट, पत्थर, डंडे, तलवारें, आगजनी के सामान इकट्ठे हो जाएं , बाहर से लोगों को बुलाया जाए और पुलिस प्रशासन को इसकी जानकारी न मिले? जितने खुलासे अब हो रहे हैं उनसे लगता है कि राष्ट्रव्यापी साजिश रचने के पीछे पीएफआई जैसे संगठनों का हाथ हो सकता है। इसमें सच्चाई है तो यह दो मायनों में ज्यादा चिंताजनक है। एक,पीएफआई पहले से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है। बावजूद वह एकपक्षीय सांप्रदायिक हिंसा की साजिशों को अंजाम देने में सफल हो गया। क्या इनकी गतिविधियों पर नजर रखने में हाल के महीनों में ढिलाई बरती गई? दूसरे , आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के विकल्प के तौर पर इस प्रकार की एकपक्षीय हिंसा और दंगा हमारे लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है।

वास्तव में इन घटनाओं  की सीख यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें तथा सभी सुरक्षा एजेंसियां देश विरोधी जेहादी ताकतों को लेकर सतर्कता और चौकन्नापन में थोड़ी भी ढिलाई न बरतें। योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में रामनवमी के जुलूस 800 स्थानों से निकले लेकिन कहीं हिंसा की घटना नहीं हुई। यह सोचने की बात है कि उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य में कहीं हिंसा नहीं हुई वह भी उस स्थिति में जब विरोधियों के लाख न चाहने के बावजूद भाजपा की सरकार बहुमत से वापस आई है। स्वाभाविक ही इन शक्तियों के अंदर गुस्सा और असंतोष होगा। अगर वहां वे हिंसा करने में कामयाब नहीं हुए तो इसके पीछे सख्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ यह भय भी मुख्य कारण है कि अगर पकड़े गए तो अपने सहित परिवारों, रिश्तेदारों के साथ पुलिस प्रशासन किसी सीमा तक जा सकती है। घटना के बाद मध्यप्रदेश सरकार उन लोगों की संपत्तियां बुलडोजर से ध्वस्त करवा रही हैं जिनके चेहरे साफ तौर पर वीडियो फुटेज में दिख रहे हैं। इससे भय वहां भी पैदा हुआ है। आगे इसका असर होगा। किंतु खरगोन की हिंसा बता रही है कि पुलिस प्रशासन अनुमान लगाने में विफल था और इस कारण त्वरित निपटने की तैयारी नहीं थी। धार्मिक आयोजनों पर  हमले और बाद में हिंसा को अंजाम देने वाले आतंकवादी ही हो सकते हैं। इनके साथ उसी तरह की कार्रवाई होनी चाहिए। तो इन नई श्रेणी के आतंकवादियों से इस तरह निपटा जाए कि आगे ऐसा करने की सोचने वालों की कंपकंपी छूट जाए। विडंबना देखिए कि देश में सेक्यूलरवाद और लिबरलवाद का झंडा उठाए पत्रकारों ,बुद्धिजीवियों ,नेताओं और एक्टिविस्टों के मुंह पर इन मामलों ताले लगे हुए हैं। यही हिंसा मुस्लिम धार्मिक जुलूस पर होती तो तूफान खड़ा हो चुका होता, संभव है टूल किट भी बन जाता और दुनिया भर में प्रचार होता कि भारत में फासिस्ट शक्तियों का राज आ गया है जो हिंदू धर्म के अलावा हर मजहब को हिंसा की बदौलत नष्ट करना चाहते हैं। एक मस्जिद पर कुछ युवकों द्वारा भगवा झंडा लगाने का कितना प्रचार हुआ इसे याद करिए। यकीनन यह गलत है। उन्हें भी रोका जाना चाहिए। किंतु उस घटना पर आप आवाज उठाएं और इतनी बड़ी हिंसा पर चुप्पी साधे रहें तो आपको झूठा और पाखंडी मानना ही होगा। जो भी हो हम सबको इन घटनाओं के बाद ज्यादा गहराई से अपने विचार और व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता है। अच्छा होगा कि केंद्र सरकार एनआईए को संपूर्ण हिंसा की जांच सौंप दे ताकि राष्ट्रव्यापी साजिशों का खुलासा हो सके।

अवधेश कुमार,ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल- 98210 27208

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

पाकिस्तान में अभी बहुत कुछ हो सकता है

अवधेश कुमार

पाकिस्तान में पीएमएलएन के नेता शाहबाज शरीफ 34 वें प्रधानमंत्री बन चुके हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद साफ हो गया था कि इमरान खान को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ेगा। स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली का तकाजा था कि इमरान खान विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना करते। संसद में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते तो संसदीय प्रणाली की अच्छी परंपरा शुरु होती। इसके विपरीत उन्होंने संसद की जगह टेलीविजन को जवाब देने का हथियार बनाया था। जिस ढंग से नेशनल असेंबली में विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ वह लोकतंत्र की दृष्टि से हास्यास्पद था। सत्ता पक्ष का कोई एक व्यक्ति सदन में नहीं। नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असद कैसर ने कह दिया कि इमरान खान से उनकी 30 साल की दोस्ती है ,इसलिए वे अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग नहीं कराएंगे। डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी पहले ही अविश्वसनीय हो चुके थे। उच्चतम न्यायालय की टेढी नजर देखते हुए दोनों को इस्तीफा देना पड़ा। संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में अध्यक्ष सत्तारूढ़ पार्टी का होता है और उसके संबंध नेताओं से होते ही हैं। अध्यक्ष चुनने के बाद वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करता है न की पार्टी की वफादारी और दोस्ती निभाता है। किंतु पाकिस्तान का लोकतंत्र इसी तरह चलता है। आप देखिए डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कारण बताया कि यह विदेश की साजिश है। राष्ट्रपति ने इमरान खान की सलाह मानकर नेशनल असेंबली भंग कर दिया था। उच्चतम न्यायालय 48 घंटे के अंदर अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग कराने का आदेश न देता तो वहां चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी। 

हालांकि पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय पर सेना, राजनीतिक सत्ता और मजहबी तत्वों का प्रभाव रहा है। इस बार या तो उस पर दबाव नहीं आया या फिर किसी अन्य कारण से उसने ऐसा फैसला किया। पाकिस्तान के लिए यह सामान्य स्थिति नहीं थी कि उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश की अवहेलना होती देख रात में ही सुनवाई के लिए न्यायालय खोल दिया था। राजनीतिक तनाव को देखते हुए केवल सुप्रीम कोर्ट ही नहीं इस्लामाबाद हाईकोर्ट भी खोला गया था ताकि कोई याचिका आए तो उसकी तत्क्षण सुनवाई की जा सके। अविश्वास प्रस्ताव पर ऐसे परिदृश्यों की कल्पना शायद ही किसी स्वस्थ लोकतंत्र में की जा सकती है। पूरे देश में टकराव जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। लेकिन जिस तरह चारों और सुरक्षा व्यवस्था थी वह भी हैरत में डाल डाल रही थी। इस्लामाबाद के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। हवाई अड्डों की भी सुरक्षा बढ़ा दी गई। अस्पतालों को हाई अलर्ट पर रख दिया गया। पुलिसकर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई। पुलिस अधिकारियों को इस्लामाबाद में ही रहने का आदेश दिया गया। जब इमरान सरकार का जाना निश्चित था तो ये सारी व्यवस्थायें कि किसने? सामान्यतः ऐसी स्थिति में उच्चाधिकारियों की भूमिका बढ़ जाती है। लेकिन इतना सब कुछ यूं ही नहीं हो सकता। आने वाले समय में इन सबका खुलासा होगा। ऐसा लगता है कि इमरान ने पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान में अपने विरोधियों की संख्या ज्यादा ही बढ़ा लिया था।

तत्काल विपक्ष की एकता से सरकार भले बन जाए लेकिन इसे पाकिस्तान के राजनीतिक संकट के टल जाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पीएमएल क्यू और एमक्यूएम जैसी पार्टियां सेना के प्रभाव में रही हैं। उन्होंने सेना के प्रभाव में ही 2018 में इमरान खान सरकार के गठबंधन में शामिल होना स्वीकार किया था। आगे भी वे किसी दिशा में जा सकते हैं। बिलावल भुट्टो जरदारी की पीपीपी और नवाज शरीफ की पीएमएलएन के बीच दोस्ती स्वाभाविक नहीं। इसलिए वह कितने दिन साथ रहेंगे कहना मुश्किल है। इमरान आए तो सत्ता में सेना और कट्टरपंथियों के समर्थन से लेकिन अपने को बाहर स्वतंत्र दिखाने की बेवकूफी में उन्होंने सेनाध्यक्ष को नाराज कर दिया। सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा के सेवा विस्तार के बारे में कह दिया कि अभी उस पर विचार नहीं किया। आई एस आई प्रमुख की नियुक्ति में भी उन्होंने सेना की अनुशंसा को स्वीकार करने में देर कर दी। देश की आर्थिक हालत खराब हो ही रही थी। अमेरिका ही नहीं एक समय के मित्र इस्लामी देशों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की 

नाराजगी के कारण इमरान की स्थिति खराब हो रही थी। विपक्ष के नेताओं के विरुद्ध कानून एजेंसियों ने जैसी बेरहमी की उससे उनके बीच एकजुटता पैदा हो गई। ऐसा लगता है कि परिवर्तन कराने में सेना ने प्रत्यक्ष न सही परोक्ष भूमिका अवश्य निभाई है। इमरान खान के इस्तीफा के पहले कमर जावेद बाजवा ने उनसे मुलाकात की। उसके पहले पाकिस्तानी मीडिया के एक समूह में खबर चल गई कि इमरान बाजवा को बर्खास्त करने वाले हैं। इमरान ने इसका खंडन करते हुए कहा कि वे सेना के मामले में हस्तक्षेप नहीं करते। बाजवा की मुलाकात का अर्थ यही लगाया जा रहा है कि उन्होंने उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा होगा। इसमें आगे होगा क्या इसके बारे में निश्चित आकलन नहीं किया जा सकता। यह पाकिस्तान है जहां कब क्या हो जाए कहना कठिन है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा वहां की राजनीति में भी महसूस की जा सकती है।

शहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं और प्रशासन का उन्हें अनुभव है। किंतु उनकी सरकार भी पीपीपी और अन्य दलों के समर्थन पर टिकी होगी। इनके अंदर इमरान के विरुद्ध इतना गुस्सा है कि वे प्रतिशोध में विरोधी नेताओं के दमन की पाकिस्तानी परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं। आज पाकिस्तान का कोई पूर्व प्रधानमंत्री अपने देश में नहीं है। या तो वे विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे हैं या मार दिए गए। इमरान ने अंतिम समय में यही समझौता करने की कोशिश की कि उनके और मंत्रिमंडल के उनके साथियों के विरुद्ध मुकदमा न किया जाए। उन्होंने कहा भी कि उन्हें जेल में डाला जा सकता है। ऐसा हो सकता है। इमरान के शासनकाल में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जेल में डाले गए।  एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने पिछले दिनों खुलासा किया कि उनके विरुद्ध बिल्कुल गलत फैसला दिया गया। परवेज मुशर्रफ लंबे समय से निर्वासित जीवन जी रहे हैं। आम धारणा यही है कि उनके विरुद्ध न भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित होने वाला है न अपराध का। उन पर मुख्यतः संविधान के गला घोंटने का आरोप है और वह भी आपातकाल लगाने के कारण। वे न्यायालय का सामना करना चाहते थे लेकिन परिस्थितियां ऐसी बना दी गई कि उनके पास देश छोड़कर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। उनके कार्यकाल के प्रधानमंत्री सब बाहर है। नवाज शरीफ के शासनकाल में ही बेनजीर भुट्टो को लंदन में निर्वासित जीवन जीना पड़ा और उनके पति आसिफ अली जरदारी तथा अनेक अन्य नेता जेल में बंद रहे। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी तब पीपीपी नेता के रूप में जेल में रहे। हालांकि इस समय वहां का न्यायालय जितना एक्टिव है उसमें पहली नजर में कोई उम्मीद कर सकता है कि अगर सरकार ने इमरान और उनके साथियों के विरुद्ध गलत तरिके से कानूनी कार्रवाई की तो न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिल सकता है। किंतु न्यायपालिका की भूमिका ही वहां संदिग्ध रही है। विपक्ष ने भ्रष्टाचार का आरोप सरकार पर लगाया है तो और उसकी जांच के लिए कदम उठाए जाएंगे और संभव है मुकदमे दर्ज हो। अगर इमरान खान गिरफ्तार नहीं होते और संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उपस्थित रहते हैं तो पाकिस्तान की राजनीति में नई शुरुआत हो सकती है क्योंकि किसी पूर्व प्रधानमंत्री ने वहां विपक्ष के नेता की भूमिका नहीं निभाई है। तो देखना होगा कि वहां की अगली तस्वीर कैसी बनती है। 

भारत के लिए घटनाओं पर नजर रखने और भविष्य की दृष्टि से चौकस रहने का ही एकमात्र विकल्प है। शाहबाज शरीफ ने प्रधानमंत्री बनने के पहले ही कह दिया कि कश्मीर मसला जब तक नहीं सुलझता तब तक भारत से बातचीत नहीं होगी। ऐसा लगता है जैसे भारत ने पाकिस्तान से बातचीत की दरख्वास्त की हो। इमरान खान ने अंतिम समय में भारत की विदेश नीति की काफी प्रशंसा की तो मरियम नवाज ने कहा कि उन्हें भारत में ही बस जाना चाहिए। जब नई सरकार आने के पहले ही भारत विरोधी अलाप शुरू हो गया है तो आगे क्या करेंगे। इमरान हो या शाहबाज या अन्य कोई भारत की अनुकूलता की दृष्टि से तत्काल मौलिक अंतर आने की संभावना नहीं दिखती । 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल- 98110 27208



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