दिल्ली में जहां निगम चुनाव की तिथि का अभी कोई पता नही है वही कांग्रेस ने इस महोल में नए ब्लॉक अध्यक्ष बना कर नयी शक्ति का संचार किया है बाबरपुर में संजय गौड़ advocate क़ो अध्यक्ष बना कर पार्टी ने यहाँ के युवाओं में नया जोश भर दिया है संजय गौड़ छात्र राजनीति में Nsui के जिलाद्यक्ष, प्रदेश उपाध्यक्ष युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव भी रह चुके है अभी वर्तमान में ये विश्वास नगर कांग्रेस के प्रभारी भी थे ! बाबरपुर निगम चुनाव में भी जो जोश संजय गौड़ ने दिखाया उससे भी यह के कांग्रेस में जान आ गयी थीं ! संजय गौड़ ने कहा की मुझे अध्यक्ष बनाने के लिए अनिल चौधरी जी , जय प्रकाश अग्रवाल ज़ी, संदीप दीक्षित , मतिन अहमद जी, मुदित अग्रवाल जी , चौधरी जुबेर अहमद , कैलाश जैन, अब्दुल अलाम तवर , मंगल गौड़ व अन्य शीर्ष नेतृत्व का दिल से आभार हैं पार्टी को मैं विश्वास दिलाता हूँ कीं आने वाले समय बाबरपुर में पूरा ब्लॉक कोंग्रेस मय होगा ! सभी को मान सम्मान देते हुआ साथ ले कर चलना होगा ! इस मोके पर मैं महेश गौड़, दीपक शर्मा मनोज यादव, सूरिंदर शर्मा, संजीव किसान , विकी पंडित , होरी लाल शर्मा, श्याम लाल भारद्वाज, कुंवर पाल राकेश कुमार जैन, नैन सिंह , क्षितिज शर्मा , सोनू पाल, अनिल जैन, रितिक जैन, विजेंदर गुप्ता, प्रमोद, सचिन जैन, आशीष तोमर, सतीश शर्मा, अज्जु चोधरी, आमिर ,ज़फ़र, संजय कपूर, शंकर शर्मा , दीपांशु सागर, अमित जस्टिन, वेद शर्मा, पंकज शर्मा, शुभम दीक्षित , कृष्णा शर्मा, जलालूदिन, आरिफ़, अक्षित गौड़, वैभव शर्मा , भव्य शर्मा, कुणाल शर्मा , कुणाल कैन, सभी का धन्यवाद करता हूँ !
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022
भव्य समारोह से भाजपा ने कई लक्ष्य साथे
अवधेश कुमार
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह को जैसी असाधारण भव्यता प्रदान की गई वह यूं ही नहीं थी। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग पार्टियां शपथ ग्रहण समारोह को भव्य स्वरूप प्रदान करने की कोशिश करती हैं। प्रभावी संख्या में जनता की उपस्थिति भी हम लोग देखते रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह इसका प्रमाण है। अरविंद केजरीवाल स्वयं कार्यक्रम और मंच प्रबंधन के माहिर नेता हैं । भगत सिंह के पैतृक गांव में आयोजित समारोह को उत्सव का रूप दिया गया और दिल्ली का पूरा मंत्रिमंडल, सारे विधायकों एवं अन्य नेताओं के साथ प्रदेश भर के कार्यकर्ता समर्थक भारी संख्या में उपस्थित रहे। लेकिन योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह की व्यापकता, भव्यता और प्रभाविता के समक्ष यह कहीं नहीं ठहरता। वास्तव में अभी तक हुए मुख्यमंत्रियों के सारे शपथ ग्रहण समारोहों को याद करें तो लखनऊ के अटल बिहारी वाजपेई स्टेडियम का कार्यक्रम सबको काफी पीछे छोड़ गया। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि आखिर किसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह को इतना बड़ा स्वरूप प्रदान करने की आवश्यकता क्यों हुई? इसे फिजूलखर्ची मानने वालों की भी संख्या होगी। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने ऐसा किया तो इसके इसके पीछे निश्चित कारण होंगे। तो क्या हो सकते हैं वे कारण?
ध्यान रखिए, विभिन्न क्षेत्रों के वे लोग, जिनके चेहरे जाने पहचाने हैं या जो जनता को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते या कर सकते हैं, जिनके नाम, समुदाय या वर्ग से कुछ निश्चित संदेश निकलते हों उनमें से काफी लोग वहां उपस्थित थे। अभिनेता, गायक, संगीतकार, खिलाड़ी, एक्टिविस्ट, संस्कृतिकर्मी आदि तो थे ही, पहली बार इतनी संख्या में उद्योगपति कारोबारी तथा साधु-संत उपस्थित थे। कह सकते हैं कि साधु-संत भाजपा की पहचान रहे हैं लेकिन इतने ज्यादा लोगों को इसके पहले किसी शपथ ग्रहण समारोह में नहीं बुलाया गया था। उद्योगपतियों एवं कारोबारियों में तो वे ही शपथ ग्रहण में बुलाए जाते रहे जिनके व्यक्तिगत संबंध हो। इस मायने में योगी आदित्यनाथ का शपथ ग्रहण समारोह बिल्कुल अलग माना जाएगा। जाहिर है, संख्या के साथ व्यक्तित्व एवं उनके कार्यों ,पेशे और विधाओं से भी स्पष्ट संदेश देने की रणनीति अपनाई गई।
वास्तव में पिछले वर्ष पश्चिम बंगाल में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद से विरोधियों ने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की मानो अब भाजपा के सत्ता में रहने के दिन पूरे हो गए। ममता बनर्जी की तरह दूसरी पार्टियों ने भी अगर ठीक रणनीति बनाकर आप पर आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ा तो भाजपा को पराजित किया जा सकता है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता एवं प्रशासन द्वारा संघ भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विरुद्ध हिंसा से पार्टी के मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर हुआ। साफ दिख रहा था कि भाजपा आक्रामक तरीके से उसका जवाब देने में सक्षम नहीं हो रही है। दूसरी ओर विरोधियों ने अगला लक्ष्य उत्तर प्रदेश को बनाया था। संपूर्ण भाजपा विरोधी मतों का समाजवादी पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई गई। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को प्रमुख चुनौती देने का दावा करने वाली ममता बनर्जी तक भी 2 दिनोंके लिए वहां पहुंच गई। ऐसी कोई विर नहीं जिन्होंने उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के पराजय की भविष्यवाणी न की। आरंभ में चुनाव में आगे दिख रही पार्टी के बारे में मीडिया से आ रही खबरें बता रही थी कि धीरे-धीरे चुनाव कठिन संघर्ष में परिणत होता जा रहा था। पूरे देश के विरोधी किसी न किसी तरह भाजपा के पराजित होने की भविष्यवाणी करते रहे। इसी दौरान विपक्षी एकता की भी कवायदें हुईं। चुनाव अभियान के बीच ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव विपक्षी एकता की धुरी बनने के लिए अलग-अलग जगह जाने लगे। सबकी नजर उत्तर प्रदेश पर थी। भाजपा को इसी वर्ष गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्य के चुनाव का सामना करना है तथा अगले वर्ष मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे प्रदेशों के चुनाव है। कोरोना के प्रभाव ने भाजपा को कोई बड़ा आयोजन लंबे समय से करने नहीं दिया। कृषि कानून विरोधी आंदोलन को आधार बनाकर बनाए गए माहौल का भी भाजपा करारा प्रति उत्तर नहीं दे सकी थी। कोरोना काल के टूल किट को भी मिला दें तो कहना होगा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा के अंदर अपने चरित्र के अनुरूप इन सबके सम्मिलित प्रत्युत्तर न देने की कथा लंबे समय से कायम थी। पूरे माहौल में ऐसा कुछ नहीं था जिससे भाजपा के समर्थक और कार्यकर्ताओं के अंदर उत्साह का संवेग पैदा हो सके।
उत्तर प्रदेश चुनाव परिणाम ने यह अवसर प्रदान किया जिससे वह एकबारगी शक्तिशाली तरीके से प्रतियोगिता दे सके तथा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अंदर उत्साह का संचार करने के साथ आम जनता की नजर में विरोधियों को कमजोर दिखा सके।
कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें भाजपा को व्यापक सफलता मिली है। महा विजय जैसे उत्सव के स्वरूप ,भाजपा एवं सहयोगियों द्वारा शासित सभी प्रदेश के मुख्यमंत्रियों, हर वर्ग, पेशे ,समुदाय के लोगों की भारी संख्या में उपस्थिति के माध्यम से उसने संदेश दिया है कि इस समय भारत में भाजपा ही एकमात्र दल है जो सर्वाधिक शक्तिशाली होने के साथ देश के सबसे ज्यादा क्षेत्रों तक विस्तारित है तथा सभी क्षेत्र के लोगों का इसके साथ जुड़ाव है। दूसरे शब्दों में दूर-दूर तक आमने सामने कोई ऐसा दल है ही नहीं जो भारत के जनसांख्यिकीय, भौगोलिक, पेशावर, सांस्कृतिक सभी प्रकार की विविधताओं का प्रतिनिधित्व कर सकें।उद्योगपतियों एवं कारोबारियों के अंदर भी है भाव गहरा हुआ होगा कि उन्हें कोई पार्टी अगर खुलकर अपने बीच बुलाती है और महत्व देती है तो भाजपा ही है। यह सब किसी पार्टी को कितना सहयोग दे सकते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं।
इनके अलावा योगी आदित्यनाथ संदर्भ में भी इसके मायने महत्वपूर्ण है । भाजपा और संघ उन्हें एक बड़े राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में उभारने के कोशिश करती रही है। भगवाधारी होने के साथ उनकी प्रशासनिक क्षमता तथा कानून और व्यवस्था को लेकर दृढ़ संकल्पित चरित्र को लगातार प्रचारित किया गया है। कुछ हलकों से यह प्रचारित किया जा रहा था कि योगी को भाजपा चाहे जितना बड़ा बना दे, हिंदुत्व पर उनकी आक्रामकता के कारण उद्योग, व्यापार , अभिनय, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान ,खेल आदि क्षेत्रों का बड़ा समूह उन्हें पसंद नहीं करता। शपथ ग्रहण से बड़ा अवसर इसे गलत साबित करने का नहीं हो सकता। इन सभी क्षेत्रों से ऐसे लोगों की उपस्थिति से भाजपा ने संदेश दे दिया है कि योगी सर्व स्वीकृत नेता बन चुके हैं। अगर संत महात्माओं का उन्हें समर्थन है तो उद्योगपतियों, कारोबारियों, फिल्मी कलाकारों और खिलाड़ियों का भी। पार्टी एवं संघ परिवार के अंदर तो उन्हें व्यापक समर्थन है ही। भाजपा के संदर्भ में इसके मायने कहीं ज्यादा गहरे हैं। वास्तव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा तथा मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ किस दिशा में आगे बढ़ रहा है योगी आदित्यनाथ को उसका समुच्चय प्रतीक के रूप में खड़ा किया गया है। देश में हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद को लेकर इस समय जैसा मुखर माहौल है वैसा लंबे समय से नहीं देखा गया। भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को इतना महत्व देकर इस व्यापक समूह को बताया है कि वह उनकी सोच के अनुसार ही आगे बढ़ रही है।उस तरह के रंग-बिरंगे कार्यक्रम और भव्य तस्वीरों से जनता रोमांचित होती है। यह सच भी है कि आज भाजपा के अलावा किसी दल में ऐसे आयोजन की क्षमता नहीं बची है। ज्यादातर दलों की हैसियत नहीं कि इस तरह अनेक क्षेत्रों के प्रमुख लोगों को वे इतने कम समय में अपने समारोह में बुला सकें तथा इतना इतनी भारी संख्या के बावजूद वैसा व्यवस्थित और प्रभावी आयोजन कर सकें। ऐसे माहौल का चुनाव पर निश्चित रूप से असर होता है।
हां,राजनीति के दूसरे दलों के प्रमुख चेहरों की उपस्थिति नगण्य अवश्य थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का भाग होने के कारण वहां पहुंचे थे। राजनेताओं के बड़े चेहरों की अनुपस्थिति के भी अपने मायने हैं। भाजपा ने ही मीडिया को खबर दी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं अखिलेश यादव, मायावती, मुलायम सिंह आदि विपक्षी नेताओं को आने का निमंत्रण दिया था। वे नहीं आए। भाजपा की ओर से राज्य के बाहर के भी अलग-अलग दलों के कुछ नेताओं को निमंत्रण भेजा गया था। उन सबकी अनुपस्थिति से भाजपा को अपने अनुकूल यह संदेश देने में सफलता मिली कि उसके विरुद्ध सारे एकजुट हैं और उनकी विजय को पचा नहीं पा रहे। चूंकी उनकी क्षमता चुनाव में मुकाबला कर विजय पाने की है नहीं तो उन्होंने अघोषित रूप से कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। हो सकता है भाजपा गाहे-बगाहे इसकी चर्चा करे। हम जानते हैं कि इस तरह की रणनीति भी बेअसर नहीं रह सकती।
इस तरह एक कार्यक्रम से भाजपा ने हमें लक्ष्य प्राप्त करने की कहानी कोशिश की । अपनी चुनावी संभावनाओं को सशक्त किया तो विचारधारा के पायदान पर भी उठाए जाने वाली आशंकाओं को ध्वस्त करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है। योगी को सर्वाधिक महत्व मिलना अपने आप में इन दोनों लक्ष्यों पर स्पष्ट संदेश देना ही है।
अवधेश कुमार, ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल - 9811027208
गुरुवार, 24 मार्च 2022
हिजाब पर कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला सतर्क करने वाला
अवधेश कुमार
शिक्षालयों में हिजाब पहनने का विवाद इतनी आसानी से नहीं निपटेगा यह स्पष्ट था। कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला आया नहीं कि सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हो गई। जाहिर है पहले से इसकी तैयारी हो चुकी थी और उच्च न्यायालय के आदेश का अनुमान भी लगा लिया गया था। किंतु कर्नाटक उच्च न्यायालय कह रहा है इस्लाम मजहब में हिजाब पहनना मजहब प्रथा का अनिवार्य हिस्सा नहीं है तो उसने उसका आधार भी दिया है। जब यह धार्मिक प्रथा का अनिवार्य अंग नहीं है तो संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं हो सकता। इस तरह उच्च न्यायालय ने विद्यालयों, महाविद्यालयों समेत शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर रोक के आदेश को सही ठहरा दिया है। जो लोग इसे जबरन मजहबी अधिकार मनवाने पर तुले हैं वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। वे इसे मजहबी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन साबित कर रहे थे और उच्च न्यायालय कह रहा है कि नहीं यह धार्मिक मामला है ही नहीं तो मौलिक अधिकार का उल्लंघन कैसे हो गया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट लिखा है कि राज्य सरकार द्वारा विद्यालयों में ड्रेस का निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत छात्रों के अधिकारों पर तर्कसंगत नियंत्रण है और 5 फरवरी का कर्नाटक सरकार का आदेश अधिकारों का उल्लंघन नहीं है । ध्यान रखिए , उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित सदस्य पीठ का सर्वसम्मति फैसला है। इस्लाम के जानकारों में भी ऐसे लोग थे जो बता रहे थे कि हिजाब कभी भी मजहब के आईने में इस्लाम की अनिवार्य व्यवस्था रही नहीं। लेकिन देश में ऐसा बहुत बड़ा वर्ग पैदा हो गया जो किसी सामान्य आदेश को भी अपने मजहब अधिकारों पर उल्लंघन मानकर इस्लाम के विरुद्ध साबित करने पर तुल जाता है । कितना तनाव कर्नाटक में पैदा हुआ और उसका असर अलग-अलग राज्यों में कैसा हुआ इसे याद करिए तो आपके सामने इसके पीछे की चिंताजनक इरादे स्पष्ट हो जाएंगे। कट्टरपंथी तत्व मुस्लिमों के बहुत बड़े समूह के अंदर यह बात गहरे बिठा चुके हैं कि जिस तरह भाजपा सरकारें काम कर रही हैं और न्यायालयें फैसला दे रही हैं उससे देश में मुसलमानों के लिए मजहबी रीति-रिवाजों, परंपराओं का पालन करना कठिन हो जाएगा। इस झूठ ने आम मुसलमानों के अंदर गहरी शंकायें पैदा की है और वे उनके आह्वान पर सड़कों पर उतर उग्र बन जाते हैं। इससे केवल कट्टरता बढ़ रहा है । ये बार-बार पराजित होते हैं लेकिन इन पर असर नहीं है।
उच्च न्यायालय के सामने इस्लामिक आस्था या धार्मिक प्रथा के प्रश्न के साथ यह भी था कि छात्रों को इस पर आपत्ति करने का अधिकार है या नहीं ।उसने साफ कहा है कि नहीं है। उसने इस प्रश्न का भी उत्तर दिया है कि सरकार का 5 फरवरी का आदेश गलत, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 यानी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। वास्तव में पूरे फैसले को गहराई से देखें तो यह कई मायनों में दूरगामी महत्व वाला तथा इस्लाम के नाम पर लादी गई प्रथाओं को गलत साबित कर हर वर्ग के जागरूक और सच्चे आस्थावान लोगों की आंखें खोलने वाला है । उदाहरण के लिए मजहबी स्वतंत्रता के अधिकार पर न्यायालय की टिप्पणी है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के संरक्षण का सहारा लेने वाले को न केवल अनिवार्य मजहबी प्रथा साबित करनी होती है बल्कि संवैधानिक मूल्यों के साथ अपना जुड़ाव भी दर्शना होता है। यदि प्रथा मजहब का अभिन्न हिस्सा साबित नहीं होती तो मामला संवैधानिक मूल्यों के क्षेत्र में नहीं जाता । यह ऐसी टिप्पणी है जिसका आने वाले समय में बार-बार उल्लेख किया जाएगा। हालांकि हमें उच्चतम न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए लेकिन अगर उच्च न्यायालय को यह प्रमाण मिल जाता कि हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है और छात्राएं न पहनने के बाद मजहब से खारिज हो जाएंगी तो वह ऐसा फैसला कतई नहीं देता। ऐसा है ही नहीं और स्वयं इस्लामी देशों में भी इसके प्रमाण हैं तो कोई न्यायालय अलग फैसला कैसे दे सकता है।
आम मुसलमानों और देश को यह बताया जाना आवश्यक है कि न्यायालय ने फैसले में स्पष्ट कहा है कि प्रथमदृष्टया रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री पेश नहीं की गई जिससे साबित होता है कि हिजाब पहनना इस्लाम में मजहब का अभिन्न हिस्सा है और याचिकाकर्ता छात्राएं शुरू से ही पहन रही हैं। उन छात्राओं की तस्वीरें आ चुकी हैं जिसमें वो पहले कॉलेज यूनिफॉर्म में जाती थी। अनेक मुस्लिम छात्राएं यूनिफॉर्म में जातीं रहीं। अचानक उन्होंने हिजाब पहन लिया और इसे भी न्यायालय ने उद्धृत किया है। न्यायालय की टिप्पणी है कि ऐसा नहीं है कि अगर हिजाब पहनने की परंपरा नहीं निभाई गई या जिन्होंने हिजाब नहीं पहना वे गुनाहगार होंगी, इस्लाम अपना गौरव खो देगा और मजहब के तौर पर उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। जरा सोचिए, तर्क यही दिया जाता था और है कि महिलाएं मजहब के अनुसार गुनाहगार साबित हो जाएंगी, इस्लाम पर खतरा उत्पन्न हो जाएगा और इसका अस्तित्व मिट सकता है। जाहिर है, कट्टरपंथी समाज में विद्वेष पैदा करने के इरादे से झूठ फैला रहे थे। न्यायालय ने फैसला इससे जुड़े सभी पहलुओं को ध्यान रखते हुए दिया है, जिसमें शिक्षा, विद्यालय, शिक्षक, वस्त्र आदि की अवधारणा, महत्व आदि का विश्लेषण है। विद्यालय की अवधारणा शिक्षक, शिक्षा और यूनिफार्म के बगैर अपूर्ण है और यह सब मिलकर एकीकरण करते हैं। स्कूल में यूनिफार्म की अवधारणा नई नहीं है। अनेक मुस्लिम देशों में भी इस तरह के स्कूल चलते हैं और वहां मुस्लिम लड़कियां हिजाब पहनकर नहीं जाती। एक याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि यूनिफॉर्म पहली बार अंग्रेजों के समय लाया गया था। न्यायालय ने तथ्यों के आधार पर स्पष्ट कर दिया है कि यह अवधारणा पुराने गुरुकुल काल से चली आ रही है। भारतीय ग्रंथों समवस्त्र, शुभ्रवेश आदि का जिक्र है, उसके विवरण हैं। एक याचिकाकर्ता ने बड़ी चालाकी से अपील की थी कि यूनिफार्म के रंग की हिजाब की इजाजत दे दिया जाए। जाहिर है, न्यायालय ऐसा कर देता तो स्कूल के यूनिफॉर्म का कोई मतलब नहीं रह जाता। निश्चित रूप से इससे छात्राओं की दो श्रेणियां हो जातीं जिनमें एक हिजाब के साथ यूनिफार्म पहनने वाली और दूसरी बगैर हिजाब के। इससे यूनिफॉर्म का उद्देश्य विफल हो जाता। न्यायालय की इन पंक्तियों पर ध्यान दीजिए- नियम का उद्देश्य एक सुरक्षित स्थान बनाना है जहां ऐसी विभाजन कारी रेखाओं का कोई स्थान नहीं होना चाहिए और समतावाद के आदर्श सभी छात्रों के लिए समान रूप से स्पष्ट होने चाहिए।
अगर उद्देश्य वाकई अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करनी होती तो ऐसे मामले विवादित नहीं बनते और न न्यायालय में जाते। इनके पीछे उद्देश्य हमेशा गलत होता है। ध्यान रखिए , उच्च न्यायालय ने ही कहा है कि सामाजिक शांति और सौहार्द बिगाड़ने के लिए अदृश्य शक्तियों ने हिजाब विवाद को पैदा किया। ध्यान रखने की बात है कि जब न्यायालय के समक्ष कुछ वकीलों ने इसमें पीएफआई के छात्र संगठन केंपस फ्रंट ऑफ इंडिया तथा कुछ अन्य मुस्लिम संगठनों की भूमिका की ओर इशारा किया तो न्यायालय ने सरकार से जानकारी मांगी। राज्य के महाधिवक्ता की ओर से बंद लिफाफे में न्यायालय को कुछ कागजात दिए गए थे। न्यायालय ने लिखा है कि जो कागजात हमें सौंपे गए थे हमने उसे देखने के बाद वापस कर दिया है और हम उम्मीद करते हैं कि इस मामले में त्वरित और प्रभावी जांच होगी और दोषियों के खिलाफ बिना देर किए कार्रवाई की जाएगी। निश्चय ही ये पंक्तियां उन शक्तियों को नागवार गुजरेंगी जो पुलिस जांच को पक्षपातपूर्ण और मुसलमानों को उत्पीड़ित करने वाला बता रहे थे। साफ है कि न्यायालय की नजर में पुलिस की अभी तक की कार्रवाई गलत नहीं है। तो मान कर चलिए कि आने वाले दिनों में जिन तत्वों ने इस विवाद को भड़काया उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। हालांकि फैसला कुछ भी आ जाए इस देश में इस्लाम के नाम पर छाती पीटने वाले मानेंगे नहीं। उदाहरण के लिए नेशनल कांफ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने कहा कि फैसले से हैरान और हताश हूं। वे हिजाब को महिलाओं के उस अधिकार से जुड़ा बता रहे हैं जो उन्हें उनकी इच्छानुसार कपड़ा पहनने की इजाजत देता है। महबूबा मुफ्ती फैसला को निराशाजनक कह रहीं हैं। उनके अनुसार यह सिर्फ धर्म का मामला नहीं है चयन की स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है । उमर और महबूबा उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। महबूबा की बेटियों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और अगर उन्होंने हिजाब पहना था तो उसकी तस्वीर भी उन्हें सामने लाना चाहिए। इस तरह के दोहरे चरित्र वाले लोग समाज के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। न्यायालय ने इसकी ओर सचेत किया है। उच्चतम न्यायालय का फैसला भी आने दीजिए, पर ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहना और इनका तार्किक विरोध करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का दायित्व बन जाता है।
अवधेश कुमार ,ई -30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -98110 27208
रविवार, 20 मार्च 2022
विधानसभा चुनावों के नतीजे: बहुवाद और प्रजातंत्र की दशा और दिशा
राम पुनियानी
उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए हैं. चार राज्यों में भाजपा को सत्ता मिली है और पंजाब में आप की सरकार बन गयी है. पंजाब में आप की जीत के पीछे कांग्रेस में गुटबाजी और शिरोमणी आकाली दल की गलत नीतियां जिम्मेदार बताई जा रहीं हैं. गोवा में भाजपा को विपक्ष के बिखराव का भी लाभ मिला क्योंकि वहा कांग्रेस के अतिरिक्त आप और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी मैदान में थी. उत्तराखंड और मणिपुर में भाजपा की शक्तिशाली चुनाव मशीनरी के सामने कांग्रेस ठहर नहीं सकी. यह इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा को सत्ता में रहने के कारण स्वाभाविक विरोध का सामना करना पड़ रहा था.
असली लड़ाई उत्तरप्रदेश में थी, जहाँ भाजपा ने शानदार जीत हासिल की. पूरे देश में, और विशेषकर उत्तरप्रदेश में, नोटबंदी, बेरोज़गारी और महंगाई ने जनता की कमर तोड़ दी थी. कोरोना के नाम पर तुरत-फुरत लगाए गए कड़े लॉकडाउन के कारण गरीब प्रवासी मजदूरों को सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर वापस जाना पड़ा था. आक्सीजन की कमी के चलते भारी संख्या में कोरोना पीडि़तों को अपनी जान खोनी पड़ी थी. उत्तरप्रदेश में ही उन्नाव और हाथरस में हुई बलत्कार और हत्या की जघन्य घटनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. यही वह राज्य है जहाँ एक केन्द्रीय मंत्री के पुत्र ने अपनी एसयूवी से किसानों को कुचलकर मार डाला था. यही वह राज्य है जहाँ बीफ और गौरक्षा के मुद्दों को लेकर समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण किया गया था और सरकार की नीतियों के चलते अवारा मवेशी किसानों की फसलें नष्ट कर रहे थे. यही वह राज्य है जहाँ मानव विकास सूचकांकों में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गिरावट आई है .
उत्तरप्रदेश में जातिगत समीकरणों पर भी खूब चर्चा हुई. चुनाव के ठीक पहले कई ओबीसी नेताओं ने भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन का दामन थाम लिया. ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे कई पत्रकारों ने यह दावा किया था कि चुनावों में समाजवादी पार्टी की जीत निश्चित है. फिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा ने बहुत आसानी से समाजवादी पार्टी को पटखनी दे दी?
जहाँ जातिगत समीकरणों और सत्ता-विरोधी लहर का लाभ समाजवादी पार्टी को मिला, वहीं भाजपा के पक्ष में कई कारक काम कर रहे थे. साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तो था ही, आरएसएस का अत्यंत प्रभावी नेटवर्क भी था. हमें यह याद रखना होगा कि भाजपा एक बड़े कुनबे का हिस्सा है, जिसका नेतृत्व हिंदू राष्ट्रवाद के पितृ संगठन आरएसएस के हाथों में है. जब भी कोई चुनाव होता है, संघ के हज़ारों प्रचारक और लाखों स्वयंसेवक भाजपा की ओर से मोर्चा सम्हाल लेते हैं. उत्तरप्रदेश में चुनाव के पहले संघ के सर सहकार्यवाहक अरूण कुमार ने संघ के अनुषांगिक संगठनों के नेताओं की एक बैठक बुलाकर उन्हे यह निर्देश दिया था कि चुनाव अभियान में वे भाजपा की मदद करें.
इस बार तो संघ के मुखिया मोहन भागवत ने भी खुलकर कहा था कि चुनाव अभियान में हिंदुत्ववादी कार्यक्रमों (राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर) व राष्ट्रवादी कार्यवाहियों (बालाकोट) को प्रमुखता से उठाया जाए. चुनाव के दूसरे चरण की समाप्ति के बाद भागवत ने संघ के कार्यकर्ताओं से ज़ोर-शोर से भाजपा के पक्ष में काम करने का निर्देश दिया था क्योंकि ऐसा लग रहा था कि पहले दो चरणों में भाजपा का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था. जहाँ तक जातिगत समीकरणों का प्रश्न है उन्हे साधने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण को और गहरा किया गया. सोशल इंजीनियरिंग के जरिए पार्टी ने पहले ही पददलित वर्गों को अपने साथ ले लिया था. संघ के कुनबे के पास पहले से ही एक विशाल प्रचार तंत्र है जिसके जरिए वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचा सकता है. यह सचमूच अद्भुत है कि संघ ने किस प्रकार बढ़ती हुई कीमतों, युवाओं में बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली और अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की अनेक घटनाओं के बावजूद मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफलता हासिल की .
सन् 2017 के चुनाव में भाजपा गठबंधन ने यह प्रचार किया था कि केवल वही हिन्दुओं के हितों की रक्षा कर सकता है और समाजवादी पार्टी व कांग्रेस मुस्लिम परस्त हैं. इस बार योगी आदित्यनाथ ने गज़वा-ए-हिन्द का डर दिखाया और कहा कि मुसलमान अपनी आबादी बढ़ाकर देश पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं. योगी और मोदी दोनों मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते रहे. मोदी ने कहा कि साईकिल (समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह) का इस्तेमाल बम धमाके करने के लिए किया जाता रहा है. यह दुष्प्रचार भी किया गया कि केवल मुसलमान ही आतंकवादी होते है. योगी, समाजवादी पार्टी को मुसलमानों से और मुसलमानों को माफिया, अपराध और आतंकवाद से जोड़ते रहे. कैराना के नाम पर डर पैदा किया गया और मुज़फ्फरनगर हिंसा के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया गया. आदित्यनाथ ने 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत की बात कहकर समाज को बाँटने का भरसक प्रयास किया. वे मुलायम सिंह यादव को अब्बाजान कहते रहे. इस बार योगी ने भाजपा के विघटनकारी एजेंडे को लागू करने में अपने सभी पिछले रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए.
इन नतीजों का 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा यह कहना अभी मुश्किल है. यद्यपि मोदी ने तो यह कह ही दिया हैं कि 2024 में इन्ही चुनावों के नतीजे दोहराए जाएंगे. यह सही है कि वर्तमान में देश में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई राजनैतिक शक्ति नही है जो विभाजनकारी राजनीति के बढ़ते कदमों को थाम सके, हमारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं में आ रही गिरावट को रोक सके, लोगों के लिए रोज़गार की व्यवस्था कर सके, आर्थिक असमानता को घटा सके और किसानों की बदहालही को दूर कर सके. आज हमारे देश में धार्मिक अल्पसंख्यक डरे हुए हैं और अपने मोहल्लों में सिमट रहे हैं.
देश में प्रजातांत्रिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सूचकांकों में गिरावट आ रहीं है. फिरकापरस्ती ने जनमानस में गहरी जड़ें जमा ली हैं. साम्प्रदायिक ताकतें अत्यंत कुशलतापूर्वक लोगो की राय बदल रहीं हैं. गोदी मीडिया, सोशल मीडिया, आईटी सेल और फेक न्यूज़ साम्प्रादायिक राष्ट्रवादियों को मजबूती दे रहे हैं.
विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह साफ हैं कि भाजपा-आरएसएस की चुनाव मशीनरी अत्यंत शक्तिशाली है और बंटा हुआ विपक्ष उसका मुकाबला नहीं कर सकता. विपक्ष का हर नेता अपने आप को मोदी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. इससे न तो साम्प्रादियक ताकतें पराजित होंगी और ना ही देश संविधान के दिखाए रास्ते पर चल सकेगा. क्या सभी विपक्षी पार्टियां, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और जनकल्याण पर आधारित न्यूनतम सांझा कार्यक्रम तैयार कर एक गठबंधन नहीं बना सकतीं? इस गठबंधन का नेता कौन हो यह चुनाव के बाद तय किया जा सकता है. गठबंधन के जिस घटक के सबसे अधिक सांसद हो, प्रधानमंत्री का पद उसे दिया जा सकता हैं. अब समय आ गया है कि जो लोग गाँधी, अम्बेडकर और भगतसिंह के मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं वे अपने व्यक्तिगत हितों की परवाह न करते हुए देश और उसके नागरिकों के हितों की चिंता करें. यह हमारे नेताओं के लिए परीक्षा की घड़ी है. क्या वे केवल अपनी प्रगति की सोचते रहेंगे या वे देश के करोंड़ों नागरिकों की फिक्र करेंगे? (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)
गुरुवार, 17 मार्च 2022
वह आदिवासी संस्कृति पर हमला था: एल. एस. हरदेनिया
आदिवासियों के ऐतिहासिक भगोरिया उत्सव के दौरान दो आदिवासी महिलाओं के साथ बदसलूकी और उनकी इज्जत लूटने का प्रयास करने की हरकत की जितनी भर्त्सना की जाए कम है। झाबुआ और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह उत्सव अत्यधिक उच्च मर्यादाओं के साथ मनाया जाता है। मुझे स्वयं इस उत्सव में शामिल होने का अवसर मिला है। उत्सव में पुरूष और महिलाएं पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं। उत्सव का माहौल ऐसा होता है कि भाग लेने वाले यह भूल जाते हैं कि वे पुरूष हैं या महिला।
सदियों से मनाए जाने वाले इस उत्सव में कभी भी बदसलूकी की शिकायत नहीं मिली। ‘टाईम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कुछ लोगों ने दो महिलाओं का हाथ पकड़कर उन्हें चूमने का प्रयास किया। जब इन महिलाओं ने भागने की कोशिश की तो पुरूषों की एक भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ बदसलूकी की।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह बदसलूकी होती रही और लोग उसे मौन रहकर देखते रहे। मेरी राय मंे यह हरकत आदिवासियों की संस्कृति पर हमला था। मेरी मांग है कि जिन लोगों ने ऐसी हरकत की है उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए। साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि इस साजिश के पीछे किसका हाथ है और क्या यह योजनाबद्ध तरीके से की गई हरकत है।
(एल एस हरदेनिया, संयोजक, राष्ट्रीय सेक्युलर मं
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