गुरुवार, 18 नवंबर 2021

इस हिंसा को गंभीरता से लेना जरूरी

अवधेश कुमार

महाराष्ट्र के कई शहरों की डरावनी हिंसा ने फिर देश का ध्यान भारत में बढ़ रहे कट्टरपंथी तंजीमों की ओर खींचा है। 12 नवंबर को मुस्लिम समुदाय के अलग-अलग संगठनों द्वारा आयोजित जुलूस, धरने व रैलियों से कुछ समय के लिए हिंसा का जैसा कोहराम मचा सामान्यतः उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। देशभर में अलग-अलग संगठन समय-समय पर अपनी मांगों के समर्थन में या किसी घटना पर धरना, प्रदर्शन, रैली, जुलूस आदि के रूप में विरोध जताते हैं। अपने मुद्दों पर प्रशासन की अनुमति तथा उनके द्वारा निर्धारित मार्ग एवं समय सीमा में किसी को भी धरना प्रदर्शन करने का अधिकार है।  अगर प्रदर्शन लक्षित हिंसा करने लगे और उसके पीछे कोई तात्कालिक उकसाने वाली घटना नहीं हो तो मानना चाहिए कि निश्चय ही सुनियोजित साजिश के तहत सब कुछ हो रहा है। महाराष्ट्र में वैसे तो अनेक जगह मुस्लिम संस्थाओं व संगठनों के आह्वान पर विरोध प्रदर्शन आयोजित हुए लेकिन अमरावती, नांदेड़, मालेगांव, भिवंडी जैसे शहर हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार हुए। अमरावती में कर्फ्यू तक लगाना पड़ा।

 हिंसा की थोड़ी भी गहराई से विश्लेषण करेंगे तो साफ दिख जाएगा की वह अचानक या अनियोजित नहीं था । उदाहरण के लिए अमरावती में पुराने कॉटन मार्केट चौक में पूर्व मंत्री जगदीश गुप्ता के किराना प्रतिष्ठान पर पत्थरों से हमला हुआ। हमलावरों को मालूम था कि यह किसका प्रतिष्ठान है। पुराने वसंत टॉकीज इलाके मे जिन प्रतिष्ठानों व दुकानों पर हमले हुए वे सब हिंदुओं के थे। पूर्व मंत्री व विधायक प्रवीण पोटे के कैंप कार्यालय पर पथराव किया गया। मालेगांव में जुलूस के रौद्र रूप ने गैर मुस्लिमों को अपने घर में बंद हो जाने या फिर दुकानें बंद करने के लिए मजबूर कर दिया । जहां भी हिंदुओं से जुड़े संस्थान, दुकानें खुली मिली वही भीड़ का पथराव हुआ। पूरा माहौल भयभीत करने वाला बना दिया गया था। रैपिड एक्शन फोर्स पर हमला किया गया। हालांकि महाराष्ट्र के गृह मंत्री और पुलिस महानिदेशक स्थिति को इतना गंभीर नहीं मान रहे हैं तो यह सब पुलिस के रिकॉर्ड में आएगा नहीं। किंतु जो लोगों ने  आंखों से देखा, भुगता उन सबको भुलाना कठिन होगा। 

यह सवाल भी उठेगा कि किस आधार पर इस तरह के बंद एवं विरोध प्रदर्शनों की अनुमति मिली? कहा गया कि त्रिपुरा हिंसा का विरोध करना था। पिछले कुछ समय से देश में तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों के एक समूह ने सोशल मीडिया पर त्रिपुरा में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा की जो खबरें और वीडियो वायरल कराए वो पूरी तरह झूठी थी। बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा पंडालों, हिंदू स्थलों तथा हिंदुओं पर हमले के विरोध में त्रिपुरा में शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया था।  हल्के फुल्के तनाव हुए लेकिन कुल मिलाकर आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो गया। अफवाह फैलाई गई कि जुलूस ने मुसलमानों पर और मस्जिदों पर हमले कर दिए। न कोई घायल हुआ न कहीं किसी मस्जिद को कोई क्षति पहुंची। उच्च न्यायालय ने खबर का संज्ञान लिया। वहां  त्रिपुरा के एडवोकेट जनरल सिद्धार्थ शंकर डे ने दायर शपथ-पत्र में कहा कि बांग्लादेश में दुर्गा पूजा पंडालों और मंदिरों में हुई तोड़फोड़ के खिलाफ विश्व हिंदू परिषद ने 26 अक्तूबर को रैली निकाली थी। इसमें दोनों समुदायों के बीच कुछ झड़पें हुई थीं। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए। तीन दुकानों को जलाने, तीन घरों और एक मस्जिद को क्षतिग्रस्त करने का आरोप लगा। शपथ पत्र में भी केवल आरोप की बात है। पुलिस की जांच में इसका कोई प्रमाण नहीं मिला। आयोजकों ने भी अपने जुलूस पर हमले करने का आरोप लगाया।

जरा सोचिए जहां कुछ बड़ी घटना  हुई ही नहीं वहां के बारे में इतना बड़ा दुष्प्रचार करने वाले कौन हो सकते हैं और उनका उद्देश्य क्या होगा? त्रिपुरा में जांच के लिए एक दल पहुंच गया जिसमें पत्रकार तथा कथित मानवाधिकारवादी व वकील शामिल थे। इनका तंत्र देशव्यापी नहीं विश्वव्यापी है। पुराने वीडियो डालकर सोशल मीडिया तथा मुख्यधारा की मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार होता रहा। असामाजिक तत्वों ने इसका लाभ उठाकर पूरे देश में मुस्लिम समुदाय को भड़काया है। त्रिपुरा पुलिस ने जांच करने के बाद ट्विटर से ऐसे 100 लोगों का अकाउंट बंद करने तथा इनकी पूरी जानकारी की मांग की। कुछ लोगों पर जब कठोर धाराओं में मुकदमा दायर हुआ तो बचाव के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गए। कहने का तात्पर्य कि महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसको केवल वही की घटना मत मानिए । पता नहीं देश में कहां-कहां ऐसे ही उपद्रव की प्रकट परोक्ष तैयारियां चल रही होंगी। महाराष्ट्र में विरोध प्रदर्शन व बंद का आह्वान वैसे तो रेजा अकादमी ने किया था किंतु अलग-अलग जगहों पर कुछ दूसरे संगठन भी शामिल थे । मालेगांव में बंद का आह्वान सुन्नी जमातुल उलमा, रेजा अकादमी और अन्य संगठनों ने किया था।  भिवंडी में भी रजा अकादमी ने बंद का आह्वान किया था लेकिन बंद को एमआईएम, कांग्रेस, एनसीपी और सपा का समर्थन था। तो जो कुछ भी हुआ उसके लिए इन सारे संगठनों को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। हालांकि इसके विरोध में सड़कों पर उतरने वाला चाहे भाजपा के हो या अन्य संगठनों के लोग,उन्हें भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहिए था। अमरावती में उन्होंने हिंसा की और पुलिस को इनके विरुद्ध कार्रवाई का अवसर मिल गया। आप देख सकते हैं कि इनकी हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी के वीडियो प्रचुर मात्रा में चारों और प्रसारित हो रहा है वैसे ही महाराष्ट्र में मुस्लिम समूहों के द्वारा की गई हिंसा के वीडियो इतनी मात्रा में नहीं मिलेंगे। इसलिए विरोध करने वालों को भी अपने ऊपर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र पुलिस ने जिस तत्परता से इनको नियंत्रित किया वैसा ही वह 12 नवंबर को करती तो स्थिति बिगड़ती नहीं।

यहां यह प्रश्न भी उठता है कि किसी देश में हिंदुओं, सिखों आदि के विरुद्ध हिंसा हो तो  भारत के लोगों को उसके विरोध में प्रदर्शन करने का अधिकार है या नहीं? यह मानवाधिकार की परिधि में आता है या नहीं? त्रिपुरा की सीमा बांग्लादेश से लगती है और वहां आक्रोश स्वाभाविक था जिसे लोगों ने प्रकट किया। अगर किसी ने कानून हाथ में लिया तो पुलिस का दायित्व है उनको संभालना। जिन लोगों के लिए त्रिपुरा फासीवादी घटना बन गई उनके लिए बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा मामला बना ही नहीं। बांग्लादेश की हिंसा का भी एक सच जानना आवश्यक है। बांग्लादेश की मीडिया में यह समाचार आ चुका है कि दुर्गा पूजा पंडाल तक पवित्र कुरान शरीफ इकबाल हुसैन ले गया। इकराम हुसैन ने 999 फोन नंबर पर पुलिस को सूचित किया तथा फयाज अहमद ने उसे फेसबुक पर डाला। इन तीनों का संबंध किसी न किसी रूप में जमात-ए-इस्लामी या अन्य कट्टरपंथी संगठनों सामने आया है। वहां आरंभ में पुलिस ने पारितोष राय नामक एक किशोर को गिरफ्तार किया था। इससे क्या यह साबित नहीं होता कि कट्टरपंथी मुस्लिम समूह किस मानसिकता से काम कर रहे हैं? इसलिए महाराष्ट्र की घटना को उसके व्यापक परिपेक्ष्य में पूरी गंभीरता से लेना चाहिए। जिन्होंने हिंसा की केवल वे ही नहीं जिन लोगों ने देशव्यापी झूठ प्रचार कर लोगों को भड़काया उन सबको कानून के कटघरे में खड़ा किया जाना जरूरी है।

 अवधेश कुमार, ई 30 ,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स,  दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मोदी और पोप मुलाकात को कम न आंकें

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेटिकन में पोप फ्रांसिस के साथ मुलाकात और बातचीत कई मायनों में जितनी महत्वपूर्ण थी उतनी उस पर चर्चा नहीं हुई। वस्तुतः भारत में इसका जितना और जिस तरीके से विश्लेषण होना चाहिए वह नहीं हो पाया है।  पोप की दो प्रकार की भूमिका रही है। एक,  विश्व के सबसे ज्यादा धर्म को मानने वाले कैथोलिकों के शीर्ष धार्मिक नेता हैं ।और दूसरे, वेटिकन को एक संप्रभु राष्ट्र राज्य का दर्जा प्राप्त है इसलिए वे एक देश के प्रमुख भी  हैं। भारत ने 1948 में ही वेटिकन को देश के रूप में मान्यता दी थी। इसलिए भारत और वेटिकन एवं पोप के साथ संबंध नया नहीं है। जिन लोगों ने मोदी और पोप की मुलाकात की लाइव तस्वीरें देखी होंगी वे  मुस्कुराते हाथ मिलाने के लिए बढ़ते और गला लगाते भंगिमा को भूल नहीं पाएंगे। नरेंद्र मोदी विदेशी नेताओं से गले मिलते हैं और उनकी या तस्वीरें मीडिया की सुर्खियां बनती है। पोप से इतने सहज ढंग से हंसते हुए गले मिलना इस मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि नरेंद्र मोदी की छवि भारत और विश्व में एक बड़े समूह ने कट्टर हिंदू नेता की बनाई है। उनके बारे में प्रचार यह किया जाता है कि दूसरे धर्मावलंबियों को महत्व नहीं देते या उनके विरुद्ध सरकार कार्रवाई करती है। इसलिए भारत एवं विश्व के छोटे हलकों में पोप के साथ उनकी मुलाकात पर आश्चर्य व्यक्त किया गया। कइयों के लिए तो यह भी आश्चर्य का विषय था कि दोनों की मुलाकात का समय केवल 20 मिनट था लेकिन वह एक घंटे तक चली। जो प्रेस वक्तव्य आया उसके अनुसार इसमें कोई विवादास्पद मुद्दा नहीं उठा । विश्व के कल्याण सैसंबंधित जलवायु परिवर्तन महामारी, आर्थिक विकास आदि विषय में बातचीत के बीच रहे । मोदी ने पोप को भारत आने का निमंत्रण दिया और उन्होंने स्वीकार भी कर लिया । इस तरह 1999 के बाद भारत आने वाले पहले होंगे।

 उनके  आगमन से भारत वेटिकन- पोप  के संबंध ज्यादा बेहतर होने की कल्पना की जा सकती है।  पोप फ्रांसिस के पहले  पोक पाॅल-4  1964 में एक बार तथा पोप जाॅन पाॅल द्वितीय 1986 एवं 1999 में यानी दो बार भारत आए थे। इस तरह पोप फ्रांसिस के रूप में पोप की चौथी भारत यात्रा होगीभारत में लगभग दो करोड़ कैथोलिक ईसाई हैं और यह संख्या छोटी नहीं है। एशिया में कैथोलिक ईसाइयों की आबादी के मामले में फिलीपींस का नंबर पहला है तो भारत दूसरे स्थान पर है। इसाई समुदाय के लोग को किस दृष्टि से देखते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। मोदी वेटिकन में पोप से मिलने वाले पहले नेता नहीं है। इसके पहले 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वेटिकन में पोप पायस12 से मिले थे। उस समय पुर्तगालियों के विरुद्ध गोवा मुक्ति का आंदोलन चरम पर था। नेहरू पर पुर्तगाल की ओर से ईसाइयों के विरुद्ध कार्रवाई का आरोप लगाया गया। नेहरू जी ने जो वक्तव्य दिया उसके पोप संतुष्ट हुए और दुनिया के कैथोलिक ईसाई भी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पुर्तगाल की लड़ाई से ईसाइयों का कोई लेना देना नहीं है, देश के दूसरे क्षेत्र में भी ईसाई रहते हैं और सबको पूरी धार्मिक स्वतंत्रता है। यही बात भारत के संदर्भ में पहले भी सच थी आज भी है ।उसके बाद इंदिरा गांधी 1981 तथा इंद्र कुमार गुजराल 1997 में एवं अटल बिहारी वाजपेई सन 2000 में पोप से मिले थे। 2005 में पोप जॉन पॉल द्वितीय का निधन होने के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत अंत्येष्टि में भाग लेने गए थे ।  हालांकि तब  यूपीए सरकार थी एवं शेखावास भारत सरकार के प्रतिनिधि थे, पर थे तो भाजपा के ही नेता।

निस्संदेह ,इतिहास के लंबे कालखंड में पोप और चर्चों के कार्यों का अध्याय अच्छा नहीं रहा। आम नागरिक तो छोड़िए राजाओं तक को सजा देने का अधिकार इन्होंने अपने हाथों रख लिया था। यूरोप के कई क्रांतियों के पीछे कैथोलिक चर्च की निरंकुश ,अतिवादी ,अंधविश्वास फैलाने वाली, जनता के अधिकारों को अस्वीकार करने वाली नीतियों के विरुद्ध रहा। फ्रांस की क्रांति केवल लुई 14 वें के खिलाफ नहीं थी, कैथोलिक चर्चों के विरुद्ध भी जनता के अंदर उतना ही गुस्सा था। यूरोप में जिसे पुनर्जागरण काल कहते हैं वह भी एक प्रकार से कैथोलिक नियंत्रित राज्य ,समाज व धर्म के बंदिशों से बाहर आना था। वैज्ञानिक दृष्टि से खोज और अध्ययन करने वाले चर्च मान्यताओं और नीतियों को ही तो चुनौती दे रहे थे। इसलिए इतिहासकारों के एक बड़े समूह ने लंबे कालखंड को डार्क एज यानी अंधकार युग की संज्ञा दी है। आप सोच सकते हैं कि पृथ्वी गोल है या अपनी गति से घूमती है इतना भी चर्च स्वीकार करने को तैयार नहीं था तो कैसे स्थिति रही होगी। यूरोप में दार्शनिकों के लंबी श्रृंखला है जिन्होंने पोप और चर्च के विरुद्ध सोच और विचारों से अभियान चला दिया। वॉल्तेयर, रूसो, विक्टर ह्युगो, जैसे दार्शनिक इसी श्रेणी के थे । रूसो, माॅटेस्क्यू और वॉल्तेयर जैसे दार्शनिकों के विचारों की फ्रांस की क्रांति में बहुत बड़ी भूमिका थी। धीरे - धीरे पोप ने पुरानी मान्यताओं और नीतियों में संशोधन परिवर्तन करते हुए वैज्ञानिक अध्ययनों खोज विचारों तथा मानवीय अधिकारों की मांगों को स्वीकार करना आरंभ किया। इससे पोप की प्रतिष्ठा विश्व भर में बड़ी। पोप फ्रांसिस तथा इनके पूर्व पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मानवाधिकारों के नाम पर ऐसी कई बातों को स्वीकार किया जिसकी पहले कल्पना तक नहीं थी। आज पोप विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठित धर्म एवं राज्य प्रमुख माने जाते हैं । विश्व के सभी प्रमुख ईसाई देश उनका सम्मान करते हैं तथा वेटिकन से निकली आवाज को पूरा महत्व देते हैं। इस नाते भी विचार करें तो मोदी और पोप की यह मुलाकात काफी महत्वपूर्ण जाएगी। 

यह कहना आसान है कि मोदी ने इसके माध्यम से अपने राजनीतिक लक्ष्य को भी सादने की कोशिश की है। मसलन, गोवा ,केरल तथा पूर्वोत्तर में राजनीति करने के लिए कैथोलिक ईसाइयों का साथ आना जरूरी है। भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में गोवा में पुनर्वापसी चाहती है तो केरल में राजनीति की मुख्यधारा में आना। संभव है मुलाकात के पीछे राजनीतिक सोच भी हो । केरल के कई बड़े नेता पोप से मुलाकात कर चुके हैं। इसमें वर्तमान मुख्यमंत्री पी विजयन भी शामिल हैं। कुछ केरल के एक बड़े कार्डिनल ने मुलाकात का स्वागत भी किया है।  जिन हलकों में मोदी की पोप से मुलाकात को लेकर थोड़ा नाक भौं सिकोड़ा गया उनके कारण राजनीतिक ज्यादा हैं। हो सकता है भाजपा को इसका कुछ चुनावी लाभ मिले। ऐसा नहीं भी हो सकता है। किंतु इस दृष्टि से मोदी मुलाकात तथा पोप की भावी यात्रा को देखना इसके व्यापक आयामों को संकुचित कर देता है। भारत बहुपंथी देश है। हार पंथ और मजहब को उनकी मान्यताओं के अनुसार धार्मिक क्रियाकलापों के लिए शत प्रतिशत स्वतंत्रता देने वाला भारत विश्व के सभ्य देशों में गिना जाता है। इस सफल मुलाकात के बाद पोप की भावी यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हो गई तो आर्थिक और सामरिक दृष्टि से विश्व में महाशक्ति की ओर अग्रसर भारत का कद बढ़ेगा ही ,इसके प्रति विश्व भर के ईसाई समुदाय का भावनात्मक लगाव भी थोड़ा मजबूत होगा। बताने की आवश्यकता नहीं कि इनमें विश्व के प्रमुख देश भी शामिल हैं। मोदी के सत्ता में आने के बाद छोटी-छोटी घटनाओं को बड़ा बनाकर ऐसे पेश किया गया मानो यहां ईसाइयों के लिए दुर्दिन आ गए हो। इस दुष्प्रचार में भारत के साथ विश्व के अनेक संगठन तथा व्यक्ति शामिल हैं। अमेरिका जैसे देश से जारी होने वाले धार्मिक स्वतंत्रता की वार्षिक रिपोर्ट में भी इसकी आलोचना है। कई देशों की मीडिया से संसद तक में आवाज उठी। भाजपा की राज्य सरकारों द्वारा धर्म परिवर्तन विरुद्ध बने और  बनाये जा रहे कानूनों की भी विश्व भर के ईसाई संगठन आलोचना करते हैं। भले मोदी और पोप के बीच बातचीत का यह मुद्दा नहीं रहा हो लेकिन भारत ने राजनीयिक स्तर पर निश्चित रूप से वेटिकन को सच्चाई से अवगत कराया होगा। तो यह मानने में हर्ज नहीं है कि मोदी पोप मुलाकात से विरोधी दुष्प्रचार और आलोचना के स्वर धीमै और कमजोर होंगे। यह भारत के हित में है। 1999 में पोप की यात्रा के दौरान भी भाजपा नेतृत्व वाली सरकार थी पर उस समय संघ परिवार के संगठनों सहित कई हिंदू संगठनों और व्यक्तियों ने विरोध किया था। भारत में धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है। वेटिकन धर्म परिवर्तन को मान्यता देता है। अलग-अलग क्षेत्रों में और कई बार देश स्तर पर भी धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर विरोध हम देखते रहे हैं। अभी तक इन संगठनों की ओर से किसी तरह की विरोधी प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसका मतलब यह है कि पोप फ्रांसिस की यात्रा बिना बड़े विरोध और बाधा के संपन्न हो जाएगी। धर्म परिवर्तन का विरोध करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन राजकीय यात्रा में मेहमान के साथ जिस तरह का सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए वही व्यवहार होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है। हां इसमें सरकार की ओर से बुद्धिमत्ता पूर्वक यह संदेश अवश्य निकलना चाहिए की पॉप का सम्मान करते हुए भी भारत लोभ, लालच या बल से धर्म परिवर्तन के विरुद्ध है।

अवधेश कुमार,ई 30,गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 98110 27208

बुधवार, 3 नवंबर 2021

शाह ने कश्मीर में नए दौर को सशक्त करने का ही संदेश दिया

 

अवधेश कुमार

गृह मंत्री अमित शाह की जम्मू कश्मीर यात्रा ऐसे समय हुई जब प्रदेश को उनकी आवश्यकता थी तथा देश भी जानना चाहता था कि सरकार की नीति रणनीति क्या है। ऐसे समय जब हिंदुओं ,सिख ,गैर कश्मीरियों तथा भारत की बात करने वालों पर आतंकवादी हमले हो रहे हों, आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच लगातार मुठभेड़ जारी हो, कोई गृह मंत्री शायद ही जाने का फैसला करता। इसके पूर्व केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर था नहीं और न 370 से विहीन था। इस नाते उनकी यात्रा की तुलना किसी से की भी नहीं जा सकती। अगर तुलना हो सकती है तो स्वयं अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पैदा की गई उम्मीदें और दिए गए बयानों से। 

जिन लोगों को भी किंचित आशंका रही होगी कि अमित शाह या मोदी सरकार जम्मू कश्मीर की वर्तमान स्थिति को लेकर थोड़े निराश होंगे या कुछ अनिश्चय भरी बातें करेंगे निश्चित रूप से उन्हें धक्का लगा होगा। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकारी अधिकारियों एवं पुलिस सहित सुरक्षा बलों के उच्चाधिकारियों के साथ बैठक में क्या बातें हुईं वह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो सकता। बावजूद जितनी बातें सामने आई उनसे सुरक्षा अभियान को ज्यादा सघन और व्यापक रूप से लक्षित किया जा रहा है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि अमित शाह बगैरआगामी सुस्पष्ट योजना के आए होंगे। उनके हाव भाव और शब्दों में आत्मविश्वास और ओजस्विता की वही झलक थी जो लंबे समय से देश उनके अंदर देख रहा है।

आप हम अमित शाह की राजनीति से सहमत असहमत हो सकते हैं, किंतु निष्पक्ष होकर विचार करेंगे तो मानना होगा कि जम्मू कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो कदम उठाया उसने इतिहास न केवल बदला, बल्कि नया अध्याय लिख दिया। 5 अगस्त, 1919 को जब वे संसद परिसर में हाथों में कुछ प्रश्नों का कागज लिए प्रवेश कर रहे थे तो क्या किसी को रत्ती भर भी उम्मीद थी कि आज जम्मू कश्मीर और देश के लिए नासूर बने अनुच्छेद 370 की लीला समाप्त हो जाएगी? देश के जेहन में उसके पूर्व उठाए गए सुरक्षा के सख्त कदमों के साथ राज्यसभा औरलोकसभा में हुई बहस तथा मतदान के दृश्य लंबे समय तक ताजा रहेंगे। जिस ढंग से अमित शाह ने पूरे मामले को हैंडल किया, विपक्ष के सारे आरोपों का एक-एक कर उत्तर दिया तथा योजनानुसार 370 की मृत्यु का विधेयक पारित करा लिया वह अभूतपूर्व था।

निश्चय ही देश और जम्मू कश्मीर में रुचि रखने वाले पाकिस्तान सहित कई देश प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब जम्मू-कश्मीर आते हैं। सबकी गहरी दृष्टि उनकी यात्रा पर लगी हुई थी।नरेंद्र मोदी सरकार, जम्मू-कश्मीर, देश तथा स्वयं अमित शाह के लिए यह यात्रा सामान्य नहीं हो सकती क्योंकि 370 निरस्त कराने के बाद वे पहली बार कदम रख रहे थे। यहां उन आंकड़ों में जाने की आवश्यकता नहीं है और न उन सबको गिनाना संभव है कि उनकी सरकार ने वहां समेकित विकास के लिए क्या क्या कदम उठाए हैं। कृषि से लेकर व्यापार, उद्योग ,निवेश, स्वास्थ्य, शिक्षा,कला-संस्कृति ,खेलकूद आदि सभी क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से प्रयास हुआ है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा सारी नीतियों को न केवल क्रियान्वित करने में लगे हैं, बल्कि जमीनी अनुभव के अनुरूप अपने अधिकारों के तहत उसमें संशोधन परिवर्तन करते हैं या फिर आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार से ऐसा कराते हैं। जम्मू कश्मीर में पिछले दो - ढाई वर्षो में आया परिवर्तन कोई भी देख सकता है। पाकिस्‍तान, सीमा के इस पार बैठे भारत विरोधी तथा आतंकवादी इसे ही  सहन नहीं कर पा रहे हैं। नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी आदि की बेचैनी इसीलिए है क्योंकि बदलाव जारी रहा तो राजनीतिक वर्णक्रम पूरी तरह बदल जाएगा। 

अमित शाह गृह मंत्री हैं तो भाजपा के नेता भी। बगैर राजनीतिक लक्ष्य कोई सरकार काम नहीं करती। उनका राजनीतिक लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब भाजपा और संघ के मुख्य लक्ष्य आतंकवाद का खात्मा ,कश्मीर में भारतीय राष्ट्र का उद्घोष, जम्मू के साथ कश्मीर में भी हिंदुओं, सिखों तथा अन्य गैर मुस्लिमों का पूरे भ्रमित माहौल में अपने धार्मिक सांस्कृतिक क्रियाकलापों के साथ सहज रूप में निवास करना पूरी होती दिखे। सुरक्षा को लेकर वर्तमान कठिन समय में गृह मंत्री इस दृष्टि से संकेत देने में अगर सफल रहे तो मान लेना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में बदलाव की धारा वाकई अपने मुकाम तक पहुंचेगी। तो क्या माना जाए?

ध्यान रखिए, जब वह जम्मू राज्य की एक सभा को प्रतिकूल मौसम में संबोधित कर रहे थे उसी समय पूंछ से लेकर दूसरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ जारी थी। गृह मंत्री ने उसी स्वर को प्रतिध्वनित की जिसे उन्होंने 5 अगस्त ,2019 को राज्यसभा में गुंजित किया था। मोदी सरकार की जम्मू-कश्मीर नीति बहुआयामी है। सुरक्षा का माहौल,  हिन्दुओं, सिखों सहित गैर मुस्लिमों को भी विश्वास दिलाना कि रहने की स्थिति बन गई है,अलगाववाद और आतंकवाद की गतिविधियों से विरत करने के लिए शिक्षा ,संस्कृति, खेलकूद ,उद्यमिता आदि के लिए प्रोत्साहित करना, पंचायत स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सशक्त कर आम लोगों को सच्चाई का एहसास कराना, प्परंपरागत राजनीतिक दलों को चुनौती देना, राजनीति की नई धारा को प्रोत्साहित करना, सुरक्षा का विश्वास दिलाना, जम्मू कश्मीर के बीच आर्थिक व प्रशासनिक संतुलन कायम करना आदि इनमें शामिल है।

सीमा पर भारत की आखिरी पोस्ट मकवाल सीमा पर अग्रिम इलाकों का दौरा और  बीएसएफ के बंकर में जाना, सीमा के गांव में बैठकर जनता से संवाद करना तथा श्रीनगर की सभा में बुलेट प्रूफ शीशा हटाकर लोगों कहना कि मैं आपके बीच बात करने आया हूं डरिए नहीं आदि सुरक्षा के प्रति सरकार की कठोरता और प्रतिबद्धता का संदेश देने तथा लोगों के अंदर सुरक्षा का विश्वास जगाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। गांदेरबल के प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में पूजा अर्चना का संदेश भी स्पष्ट था।शाह ने सरकार के प्रयासों से गठित 4500  युवा क्लब के युवाओं से बातचीत करते हुए कहा कि विकास की जो यात्रा शुरू हुई है उसमें किसी को खलल नहीं डालने देंगे तथा आपको सहयात्री बनाने आया हूं। यहां उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का नाम लेने वालों को मैं बहुत कुछ कह सकता हूं लेकिन कहूंगा नहीं केवल यही कहूंगा कि बगल में ही पीओके है जाकर देख लें कि वहां क्या स्थिति है और यहां क्या। वास्तव में पाकिस्तान का राग अलापने वालों के लिए यही सीधा जवाब था और इसका वहां के युवाओं और लोगों पर कुछ न कुछ असर हुआ होगा। उसकी तुलना वहां शुरू होगी। जम्मू की सभा में अमित शाह अपने सहज रूप में थे जब उन्होंने वहां के राजनीतिक दलों पर हमला करते हुए कहा कि तीन दल मेरे से पूछ रहे थे कि क्या दोगे ,मैं तो हिसाब लेकर आया हूं लेकिन आपने 70 सालों में क्या दिया है उसका हिसाब जनता मांग रही है वह तो दीजिए। 3 परिवार से उनका मतलब जम्मू कश्मीर में शासन करने वाली कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी। फिर उन्होंने वो सारी बातें दोहराई जिनसे वहां के राजनीतिक दल और परंपरागत प्रशासन कटघरे में खड़ा होता है। यानी आम महिलाओं को पूरा अधिकार नहीं मिला ,शरणार्थी नागरिक नहीं बने, बाल्मीकि समुदाय, परंपरागत रूप से रहने वाले गुज्जर और दूसरी जातियों को जमीन तक खरीदने का अधिकार नहीं था और वह सब अब मिल रहा है। भाजपा और सरकार की नीति के अनुरूप उनकी यह घोषणा महत्वपूर्ण थी कि अब तीन परिवार से नहीं गांव में जीतने वाला सरपंच और पंच भी मुख्यमंत्री बन सकता है। उन्होंने गुर्जर लोगों की ओर देखते हुए कहा कि आप भी यहां के मुख्यमंत्री बन सकते हो। इसके साथ उन्होंने अपने दो वायदे प्रखरता से दोहराया - एक -एक व्यक्ति यहां सुरक्षित होगा तथा जम्मू के साथ होने वाला अन्याय अब कभी नहीं दिखेगा।यानी दोनों क्षेत्रों का विकास समान होगा, दोनों को समान महत्व मिलेगा। उनके द्वारा यह साफ करना भी महत्वपूर्ण था कि परिसीमन के बाद चुनाव होंगे तथा आने वाले समय में पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाएगा। यानी जो परिसीमन का विरोध करते हैं उनका असर नहीं होने वाला है और जो गलतफहमी फैला रहे हैं कि स्थाई रूप से केंद्र शासित प्रदेश रहेगा वह भी झूठ है। 

इस तरह उन्होंने वहां के लोगों को संदेश दिया कि आप डरिये नहीं, राजनीति में आइए ,आपको सुरक्षा मिलेगा , यहां के नेता आप बन सकते हैं। मीडिया में ये बातें चल रही थी लेकिन राष्ट्रीय स्तर के किसी नेता ने जम्मू-कश्मीर में आकर इस तरह की बातें नहीं की थी। इस नाते अमित शाह की यात्रा का महत्व जम्मू कश्मीर की दृष्टि से तो व्यापक होता ही है ,पाकिस्तान और उनके समर्थकों के लिए भी इसमें सीधा संदेश है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 1100 92, मोबाइल 98910 27208

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

हिंदुओं को बचाने के लिए आगे आए विश्व समुदाय

 अवधेश कुमार

भारत सहित पूरी दुनिया में इस्कॉन के बैनर से बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध जारी हिंसा का विरोध किया जाना बिलकुल स्वाभाविक है। सभी समुदाय के लोगों को विश्व भर में इस हिंसा के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए ।लेकिन हिंदुओं के विरुद्ध कुछ भी हो जाए दुनिया के लिए यह तभी चिंता का कारण बनती है जब भारत की कूटनीति सक्रिय होती है। भारत में स्वयं को सेकुलर मानने वाला खेमा ऐसे खामोश है मानो बांग्लादेश में हिंदुओं के विरुद्ध हमला स्वाभाविक घटना हो। बांग्लादेश में 13 अक्टूबर, 2021 को कोमिल्ला के नानुआर दिधी के दुर्गा मंडप से आरंभ हमले ने देशव्यापी एकपक्षीय दंगे का रूप ले लिया। एक तस्वीर फेसबुक पर वायरल हो रही थी जिसमें कहा गया था कि पवित्र कुरान को दुर्गा के पैरों के नीचे रख अपवित्र किया गया। सात दर्जन से ज्यादा पूजा पंडाल तहस-नहस किए गए,  पूजा में लगे लोग घायल हुए और कोमिल्ला से तब दो शव बरामद हुए। धीरे -धीरे चांदपुर, नोआखाली, रंगपुर, चटगांव, कॉक्स बाजार, मौलवीबाजार, गाजीपुर, फेनी जैसे क्षेत्र भयानक हिंसा की चपेट में आ गए। आज 64 में से 22 प्रशासकीय जिलों में दंगा रोधी पुलिस तैनात है। हालांकि हिंदुओं के विरुद्ध हमलों के काफी मामले दर्ज हुए, गिरफ्तारियां भी हुई है। बावजूद हिंदुओं और हिंदू धर्म स्थलों पर हमले नहीं होनेकी स्थिति नहीं बनी। हिंसा में वे सारे जघन्य कांड हुए जिसके विवरण पुस्तकों में पढ़ते हैं। महिलायें व  बच्चियों से दुराचार से लेकर जघन्य हत्या तक। रंगपुर के पीरगंज से 16 वर्ष के उस किशोर परितोष राय को गिरफ्तार किया गया जिस पर फेसबुक तस्वीर डालने का आरोप था। गिरफ्तारी के बावजूद रंगपुर में शांति स्थापित नहीं हुई। एक तरफ गिरफ्तारी तो दूसरी ओर हमलावरों ने उस क्षेत्र के दो दर्जन से ज्यादा घरों को आग लगा दी और करीब 100 जगहों पर लूटपाट की। 

 नोआखाली के इस्कॉन मंदिर पर बर्बर हमला हुआ।  अबुल अला मौदुदी  द्वारा स्थापित कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी  सहित अन्य मुस्लिम संगठनों का हाथ इसके पीछे माना जा रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा था कि जमात वही स्थिति लाना चाहती है जिसमें खुलेआम कत्लेआम हो। जमात और ऐसे दूसरे संगठन हिंदुओं पर हमले करते रहे हैं, मंदिर और हिंदू घर तोड़े और जलाए जाते रहे हैं। शेख हसीना उदारवादी हैं किंतु इन कट्टरपंथियों के सामने वह भी कमजोर नजर आई हैं।  बांग्लादेश के अखबार ब्लिट्ज ने आबादी का विश्लेषण कर बताया है कि1947 में पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में 30 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू थे। 2011 की जनगणना में हिंदुओं की आबादी 8 प्रतिशत रह गई।  बांग्लादेश की मीडिया पर नजर रखें तो साफ दिखाई देगा कि हिंदुओं को अपमानित तथा हिन्दू महिलाओ के साथ बदतमीजी की घटनाएं आम हैं। बांग्लादेश की ही संस्था ऐन ओ सालिश सेंटर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है 2013 के आरंभ से इस वर्ष सितंबर तक हिंदुओं पर 3679  हमले हो चुके हैं। नोआखाली में स्थिति भयावह है। बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल ने चांदपुर एवं नोआखाली हमलों में जान-माल की क्षति की भयावह तस्वीर पेश की है। 

नोआखाली और कोमिल्ला दोनों महत्वपूर्ण जगह है। नोआखाली वह स्थान है, जहां  15 अगस्त, 1947 के पूर्व और बाद में हुए भीषण दंगों के बाद महात्मा गांधी को जाना पड़ा था। कोमिल्ला वह जगह है जहां आठवीं सदी में त्रिपुरा के देव राजवंश का शासन था। 1400 के बाद माणिक वंशी राजाओं ने शासन किया। किंतु 16 वीं सदी से स्थितियां बदलने लगी। 1764 में शमशेर गाजी के नेतृत्व में वह बड़ा आंदोलन हुआ और राजवंश का अंत हो गया। कुछ लोग उसे काजी नज़रुल इस्लाम की कर्मभूमि के रूप में याद करते हैं जहां उन्होंने प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने के विरुद्ध अपनी चर्चित कविता की रचना की थी। वहां 1931मालगुजारी के खिलाफ भी किसान आंदोलन हुआ था और उसमें भी कुछ मजहबी अंश थे। तब महात्मा गांधी और रविन्द्रनाथ टैगोर दोनों वहां गए थे। नोआखाली का दंगा कोई भूल नहीं सकता। 1946 का यही अक्टूबर महीना था जब वहां हिन्दुओं पर हमले आरंभ हुए थे। गांधीजी वहां नवंबर 1946 में पहुंचे थे। उस समय के बंगाल के कांग्रेस के नेता डॉ बिधान चंद्र राय ने गांधी जी को हिंसा का जो विवरण दिया था वह दिल दहलाने वाला था। उन्होंने कहा था कि हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है और हिंदू महिलाओं के साथ लगातार दुष्कर्म किया जा रहा है। मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के बाद कोलकाता से लेकर बंगाल की कई जगहों पर  खुलेआम कत्लेआम हुआ था ।उसकी चपेट में नोआखाली था। गांधी जी के साथ प्यारेलाल नैयर, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, उनकी सहयोगी आभा ,मनु आदि गए थे। उन्होंने सात सप्ताह तक पैदल क्षेत्र का यात्रा की। रिकॉर्ड बताते हैं कि वे करीब 115- 16 मील चलकर47-48 गांव तक पहुंचे । उस समय 10 अक्टूबर, 1946 का दिन था, जिसे कोजागरा पूर्णिमा कहा जाता है। हिन्दुओं की सामूहिक हत्याओं के साथ हजारों को मुसलमान बनाया गया था। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी ने गांधीजी को नोआखाली छोड़ने की चेतावनी दी थी। उनके रास्ते अनेक बाधाएं मुस्लिम लीग और उनके कट्टरपंथियों ने खड़ी की। गांधी गांव-गांव घूमते रहे।

काफी लोग इस समय नोआखाली और गांधी को याद कर रहे हैं। क्या आज वही स्थिति बांग्लादेश या पाकिस्तान में है कि कोई गांधी जैसा व्यक्ति वहां जाए, यात्राएं करें और हमलों को शांत करे? कतई नहीं ।  बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों को देखते हुए देश के विरुद्ध कुछ बोलना राजनयिक दृष्टि से विपरीत परिणामों वाला माना जा रहा है। मरणासन्न हो चुकी पार्टी  बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट सक्रिय हो गई। उसने दंगों की जांच के लिए दो समानांतर कमेटियों का गठन कर दिया। सब जानते हैं कि बेगम खालिदा जिया के शासन में किस तरह हिंदुओं पर हमले हुए, कट्टरपंथ और आतंकवाद तेजी से फैला। उन्हें लगता है कि मजहबी उन्मादियों के साथ खड़े होकर वोअपना समर्थन वापस पा सकती हैं। इसलिए भारत सरकार अंदर भले सक्रिय हो स्पष्ट बोलने से बच रही है। 

वास्तव में इस प्रकार की हिंसा अपने आप नहीं होती। इसकी जड़ें गहरी हैं। लंबे समय से हिंदुओं और अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध पैदा की गई घृणा तथा बांग्लादेश को सम्पूर्ण इस्लामिक राज बनाने का प्रचार चलता रहा हूं । यह इन सबकी परिणति तो है ही, पाकिस्तान की भूमिका से भी इनकार करना कठिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी साल में 26 27 मार्च को बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे और उन्होंने हिंदू मंदिरों में पूजा-पाठ की थी जिससे बेहतर वातावरण बना था। तब शेख मुजीबुर रहमान यानी बंगबंधु की याद में भारत-बांग्लादेश के संबंधों में भावुकता और संवेदनशीलता देखी गई था। पाकिस्तान को यह स्वीकार नहीं हो सकता था। शेख हसीना ने भारत के हिंदुत्ववादी शक्तियों से संयम बरतने की कुछ दिनों पहले अपील की थी। ऐसी घटनाओं में संयम बनाए रखना कठिन है। बांग्लादेश के 4096 किलोमीटर सीमा से लगने वाले पूर्वोत्तर के 5 राज्यों असम, त्रिपुरा ,मिजोरम, मेघालय और पश्चिम बंगाल में इसका असर है। अक्टूबर के नोआखाली तथा मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन को पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के कट्टरपंथी हमेशा याद करते हैं। यानी यह छिटपुट हिंसा या अचानक हो गई वारदात नहीं है।  इसके पीछे एक विचार और योजना है। यह यूंही खत्म नहीं होगी।अमेरिका में हिन्दुओं की सक्रियता के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी संज्ञान लिया और शेख हसीना सरकार से रोकने को कहा। अमेरिका ने भी निंदा की। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि धर्म चुनने की आजादी मानवाधिकार है। दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी धर्म या पंथ को मानने वाला है उसको अपने महत्वपूर्ण पर्व बनाने के लिए  विश्वास दिलाना जरूरी है कि वह सुरक्षित है। लेकिन हिंसा रुकी नहीं। वास्तव में इसके लिए बांग्लादेश सरकार को तो जो कुछ संभव हो सकता है करना ही चाहिए, भारत सहित संपूर्ण दुनिया के हिंदू, सिख, जैन ,बौद्ध ,ईसाई यहां तक कि मुसलमानों को भी प्रतिरोध करना चाहिए अन्यथा एक दिन वहां से गैर मुस्लिमों का नामोनिशान खत्म हो जाएगा ।  

अवधेश कुमार, ई- 30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 98910 27208

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

सावरकर और गांधी के संबंधों पर प्रश्न उठाने वाले सच्चाई देखें

अवधेश कुमार

वीर सावरकर या उनके जैसे दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके देश के लोग ही कभी उनके शौर्य, वीरता और इरादे पर प्रश्न उठाएंगे। वीर सावरकर के साथ त्रासदी यही है कि वैचारिक मतभेदों के कारण एक महान स्वतंत्रता सेनानी, योद्धा, समाज सुधारक, लेखक ,कवि ,इतिहासकार को कायर और अंग्रेजों का भक्त साबित करने की ह्रदय विदारक कोशिश हो रही है।यह समझ से परे है कि अगर सावरकर के बारे में सच्चाई देश के सामने आ जाए तो उससे क्या समस्या आ जाएगी? क्या सावरकर का कद बढ़ेगा उससे महात्मा गांधी या अन्य मनीषियों का कद छोटा हो जाएगा? कतई नहीं। जिन लोगों ने शोध नहीं किया, इतिहास ठीक से नहीं पड़ा वे भी सावरकर का नाम आते ही कूद जाते हैं जिसमें असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोग हैं। अजीब- अजीब प्रश्न उठाए जा रहे हैं। कोई कहता है कि गांधीजी तो 1915 में भारत आए और सावरकर ने 1913 में माफीनामा लिखा फिर गांधी जी ने उनको कब सलाह दे दिया? ये लोग एक बार गांधी वांग्मय के उन अंशों को पढ़ लेते तो समस्या नहीं होती।  सच यही है कि महात्मा गांधी स्वयं सावरकर के प्रति सम्मान और स्नेह का भाव रखते थे तथा उन्होंने अपनी ओर से दोनों सावरकर बंधुओं को अंडमान सेल्यूलर जेल से रिहा कराने की भरपूर कोशिश की।

जो लोग एक माफीनामा ,दो माफीनामा की बात कर रहे हैं उनको यह ध्यान दिलाना आवश्यक है की वीर सावरकर ने 6 बार रिहाई के लिए अर्जी दायर की। इसमें 1911 से 1919 तक  पांच बार तथा महात्मा गांधी के सुझाव पर 1920 में एक बार। 30 अगस्त, 1911 को सावरकर ने पहला माफीनामा भरा जिसे अंग्रेज सरकार ने तीन दिनों बाद ही खारिज कर दिया। दूसरी याचिका उन्होंने 14 नवंबर, 1913 को लगाई वह भी खारिज हो गई। इस तरह उनकी चार याचिकाएं खारिज हुई।  1919 में अंग्रेजों ने जॉर्ज पंचम के आदेश पर भारतीय कैदियों की सजा माफ करने की घोषणा की। अंग्रेजों ने कहा कि चूंकि प्रथम विश्व युद्ध में भारत के लोगों ने उनका पूरा साथ दिया है इसलिए वे राजनीतिक कैदियों की रिहाई कर रहे हैंं। यह अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को दिया गया तोहफा था ।कालापानी यानी अंडमान जेल से भी काफी कैदी रिहा हुए लेकिन इसमें विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर का नाम नहीं था।  इस पर उनके छोटे भाई नारायणराव सावरकर ने महात्मा गांधी को लिखे पत्रों में से 18 जनवरी ,1920 के अपने पहले पत्र में सरकारी माफी के तहत अपने भाइयों की रिहाई सुनिश्चित कराने के संबंध में सलाह और मदद मांगी थी।  इसमें लिखा था, ‘कल (17 जनवरी) को मुझे सरकार की ओर से सूचना मिली कि रिहा किए गए लोगों में सावरकर बंधुओं का नाम नहीं है। स्पष्ट है कि सरकार उन्हें रिहा नहीं कर रही है। कृपया, आप मुझे बताएं कि ऐसे मामले में क्या करना चाहिए? वे पहले ही अंडमान में 10 साल की कठोर सजा काट चुके हैं। उनका स्वास्थ्य भी गिर रहा है। आप इस मामले में क्या कर सकते हैं, उम्मीद है अवगत कराएंगे…।’ एक सप्ताह बाद यानी 25 जनवरी, 1920 को गांधी जी ने उत्तर में  लिखा था, ‘प्रिय डॉ. सावरकर, मुझे आपका पत्र मिला। आपको सलाह देना कठिन लग रहा है, फिर भी मेरी राय है कि आप एक विस्तृत याचिका तैयार कराएं जिसमें मामले से जुड़े तथ्यों का जिक्र हो कि आपके भाइयों द्वारा किया गया अपराध पूरी तरह राजनीतिक था।….जैसा कि मैंने आपसे पिछले एक पत्र में कहा था मैं इस मामले को अपने स्तर पर भी उठा रहा हूं। 

 गांधी जी ने 26 मई, 1920 को यंग इंडिया (महात्‍मा गांधी : कलेक्‍टेड वर्क्‍स, वॉल्‍यूम 20, पृष्ठ 368) में लिखा, 'भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों के चलते, कई कैदियों को शाही माफी का लाभ मिला है। लेकिन कई प्रमुख राजनीतिक अपराधी हैं जिन्‍हें अब तक रिहा नहीं किया गया है। मैं इनमें सावरकर बंधुओं को गिनता हूं। वे उसी तरह के राजनीतिक अपराधी हैं जैसे पंजाब में रिहा किए गए हैं और घोषणा के प्रकाशन के पांच महीने बाद भी इन दो भाइयों को अपनी आजादी नहीं मिली है।' एक और पत्र (कलेक्‍टेड वर्क्‍स ऑफ गांधी, वॉल्‍यूम 38, पृष्ठ 138) में गांधी जी ने लिखा, 'मैं राजनीतिक बंदियों के लिए जो कर सकता हूं, वो करूंगा। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं डर की वजह से चुप रह गया हूं। राजनीतिक बंदियों के संबंध में, जो हत्‍या के अपराध में जेल में हैं, उनके लिए कुछ भी करना मैं उचित नहीं समझूंगा। मैंइस  बिंदु पर बहस नहीं करूंगा। हां, मैं भाई विनायक सावरकर के लिए जो बन पड़ेगा, वो करूंगा।' गांधी जी और सावरकर के बीच भी पत्र व्यवहार के प्रमाण हैं। ये बताते हैं कि दोनों के बीच संपर्क और संबंध थे। सावरकर के बड़े भाई के निधन के बाद 22 मार्च, 1945 को सेवाग्राम से लिखे एक पत्र (कलेक्टेड वर्क्‍स ऑफ गांधी, वॉल्‍यूम 86, पृष्‍ठ 86) में गांधी जी ने लिखा, 'भाई सावरकर, मैं आपके भाई के निधन का समाचार सुनकर यह पत्र लिख रहा हूं। मैंने उसकी रिहाई के लिए थोड़ी कोशिश की थी और तबसे मुझे उसमें दिलचस्‍पी थी। आपको सांत्‍वना देने की जरूरत कहां हैं? हम खुद ही मौत के पंजों में हैं। मैं आशा करता हूं कि उनका परिवार ठीक होगा।'

जो लोग यह मानने को तैयार नहीं कि गांधीजी ने सावरकर के लिए कोशिश की होगी उन्हें यंग इंडिया का लेख पूरा पढ़ना चाहिए। इसमें सावरकर जी के बारे में गांधी जी लिखते हैं, 'दूसरे भाई को लंदन में कैरियर के लिए जाना जाता है। पुलिस हिरासत से भागने की सनसनीखेज कोशिश और फ्रांसीसी समुद्री सीमा में पोर्टहोल से कूदने की बात अभी तक लोगों के जेहन में ताजा है। उसने फर्ग्‍युसन कॉलेज से पढ़ाई की, फिर लंदन में  बैरिस्‍टर बन गया। वह 1857 की सिपाही क्रांति के इतिहास का लेखक है। 1910 में उसपर मुकदमा चला था और 24 दिसंबर, 1910 को भाई के बराबर ही सजा मिली। 1911 में उसपर हत्‍या के लिए उकसाने का आरोप लगा। उसके खिलाफ हिंसा का कोई आरोप साबित नहीं हुआ। वह भी शादीशुदा है, 1909 में एक बेटा हुआ। उसकी पत्‍नी अब भी जिंदा है।' गांधी जी ने लिखा कि वायसराय को दोनों भाइयों को उनकी आजादी देनी ही चाहिए अगर इस बात के पक्‍के सबूत न हों कि वे राज्‍य के लिए खतरा बन सकते हैं।  गांधीजी का कहना था कि जनता को यह जानने का हक है कि किस आधार पर दोनों भाइयों को कैद में रखा जा रहा है।

 जो लोग आज प्रश्न  उठा रहे हैं वे एक बार सोचे कि गांधीजी ने क्यों इतनी कोशिश की और यह सब लिखा? सावरकर और महात्मा गांधी लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे। गांधीजी की लंदन में 1906  तथा1909 में सावरकर से मुलाकात हुई थी।  तब सावरकर वहां इंडिया हाउस हॉस्टल में रहकर बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी कर रहे थे। गांधी जी से उनकी अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्र आंदोलन तथा बाद की व्यवस्था पर गंभीर चर्चा हुई थी। सावरकर मांसाहारी थे और उन्होंने गांधीजी के लिए वही भोजन बनाया था। गांधीजी वैष्णव थे इसलिए मांस देखकर परेशान हो गए। सावरकर ने उन्हें कहा था कि  इस समय तो ऐसे भारतीय चाहिए जो अंग्रेजों को कच्चा खा जाएं और आप तो मांस से ही घबराते हैं। हिंसा और अहिंसा को लेकर दोनों की बहस हुई थी। गांधीजी ने वहीं से गुजरात वापसी के दौरान समुद्री जहाज पर हिंद स्वराज की रचना की जिसमें वे स्वयं संपादक और पाठक के रूप में प्रश्न करते हैं और उत्तर भी देते हैं। इसमें अन्य लोगों से भी उनकी मुलाकात का योगदान होगा लेकिन सावरकर से बहस का भी इसमें बड़ा योगदान था। बाबा साहबअंबेदकर भी वीर सावरकर का नाम सम्मान से लेते थे।  वास्तव में यह बताता है कि वर्तमान राजनीति और वैचारिक खेमेबंदी के विपरीत  उस समय व्यापक वैचारिक मतभेद होते हुए भी नेताओं के बीच एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव था। सावरकर गांधी जी की अहिंसक नीति के आलोचक थे, उनके कई निर्णयों पर उन्होंने प्रश्न उठाया लेकिन कभी उनके विरुद्ध  अपमानजनक टिप्पणी नहीं की। एक उन्मादी और सिरफिरे द्वारा गांधी जी की हत्या में उनका नाम घसीटा गया। उस समय भीड़ ने उनके छोटे भाई पर हमला किया, पत्थर मारे। इससे उनको इतनी चोट आई कि आगे उनकी मृत्यु हो गई।  जरा सोचिए, कितनी बड़ी त्रासदी थी। न सुप्रीम कोर्ट ने उनको दोषी माना, न कपूर आयोग ने। अगर वे दोषी थे तो फिर रिहा कैसे हो गए? नाथूराम गोडसे हिंदू महासभा का सदस्य रह चुका था लेकिन वह सावरकर को लानत भरे पत्र भेजता था। ये पत्र इस बात के प्रमाण थे कि सावरकर  का गांधीजी की हत्या से दूर-दूर तक लेना नहीं था। जिस व्यक्ति से उनके ऐसे पत्र व्यवहार हो रहे हो उसकी वे हत्या कराने की कोशिश करेंगे ऐसी सोच ही शर्मनाक है। सावरकर को एक 11 जुलाई 1911 को अंडमान जेल लाया गया और उनकी रिहाई 6 जनवरी 1924 को हुई। जिस व्यक्ति ने 12 वर्ष से ज्यादा काला पानी में बिताया तथा 23 वर्ष तक अंग्रेजों की निगरानी झेली उसका सम्मान होना ही चाहिए । जिसे माफीनामा कहा जा रहा है वह एक फार्म था जिसका उपयोग स्वतंत्रता सेनानी रिहाई के आवेदन के रूप में करते थे। सावरकर का मानना था कि अंग्रेजों की जेल में रहकर सड़ने से किसी का भला नहीं है। इसलिए हर हाल में बाहर आकर जितना संभव हो राष्ट्र, धर्म और समाज के लिए काम किया जाए।आखिर उन्हें दो काला पानी की सजा मिली थी जो इतिहास में दुर्लभ है। 

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