रविवार, 4 जुलाई 2021

शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए ने किया डॉक्टरों को कोरोना योद्धा गौरव सम्मान से सम्मानित

मो. रियाज़

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए पूरी ईमानदारी से डाक्टर व उनके सहयोगी लगे रहे। इसी सेवा-निष्ठा के लिए शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने डॉक्टरों के साथ-साथ दिल्ली सिविल डिफेंस के वॉलिंटियर्स को कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया।

अभी कुछ दिन पहले भी शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना काल मे समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों, दिल्ली सिविल डिफेंस के वालंटियर्स, बिजली विभाग के कर्मचारियों, समाजसेवियों आदि को उनकी सेवा-निष्ठा के लिए कोरोना योद्धा गौरव सम्मान देकर सम्मानित किया था।

अब तक शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना महामारी के दौरान अलग-अलग क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहे 400 से अधिक कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर चुकी। आज भी अपने कार्यालय पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन, आरडब्ल्यूए सदस्य मुमताज, विनोद झा, प्रदीप जैन, समाजसेवी जफर हुसैन आदि ने 100 से अधिक डॉक्टरों व दिल्ली सिविल डिफेंस के कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। 

विदित हो दिल्ली ने कोरोना के खिलाफ अपनी सबसे मुश्किल जंग कोरोना योद्धाओं के मजबूत इरादे की वजह से ही लड़ी है। दिल्ली के हीरों ने अपने परिवारों की चिंता ना करते हुए दिन-रात बस दिल्ली को सुरक्षित बनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में कोरोना योद्धाओं को भी कोरोना के संक्रमण का शिकार होना पड़ा फिर भी इन कोरोना योद्धाओं के हौसलों को पस्त नहीं कर पाया। अपने योद्धाओं का जोश, जुनून और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी के समर्पण का तहे दिल से शुक्रिया और सम्मान देने के लिए ही शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए (रजि.) ने कोरोना योद्धाओं को गौरव सम्मान पत्र देने की शुरुआत की।

इस मौके पर शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष संजीव जैन ने कहा कि हमने तो सिर्फ एक शुरुआत की है ताकि कोरोना योद्धाओं को एक छोटा सा सम्मान दे सकें जिससे यह योद्धा इस कोरोना महामारी की लड़ाई में अपने आप को अकेला न महसूस करें। यह सम्मान उन्हें नई ऊर्जा देगा।

उन्होंने कहा कि हमारी आरडब्ल्यूए आगे भी ऐसे कोरोना योद्धाओं को सम्मानित करती रहेगी जिन्होंने इस वैश्विक संकट-काल में समाज और देश को बचाने के लिए अपने जीवन की भी परवाह नहीं की और लोगों की सेवा की और अब भी कर रहे हैं। हमें जैसे-जैसे कोरोना वायरस महामारी के संकटकाल में सेवा करने वाले कोरोना योद्धाओं का पता चल रहा है। वैसे-वैसे हम उन्हें गौरव सम्मान पत्र देकर सम्मानित कर रहे हैं जिससे उनके हौंसलों में कोई कमी न आ सके।

दिल्ली सिविल डिफेंस के वालिंटियर पवन कुमार ने कहा कि यह सम्मान हम जैसे सिविल डिफेंस के वालिंटियरों को एक नई ऊर्जा देगा और हम और अच्छा करने की कोशिश करेंगे। यह कुछ लोगों के लिए कागज का एक टुकड़ा हो सकता है पर यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है। मैं शास्त्री पार्क आरडब्ल्यूए का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मुझे यह सम्मान देकर एक नई ऊर्जा दी है।


 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

शीर्ष न्यायालय के फैसले से तस्वीर स्पष्ट होगी

अवधेश कुमार

पिछले वर्ष हुए दिल्ली दंगों के तीन आरोपियों देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत और इसके लिए की गई टिप्पणियों को उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनवाई के लिये स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। हालांकि शीर्ष न्यायालय ने उनके जमानत को रद्द नहीं किया लेकिन सुनवाई के लिए मामले को स्वीकार करने के संकेत के मायने हैं।  ध्यान रखिए कि तत्काल कोई फैसला या अंतिम मंतव्य न देते हुए भी शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि उच्च न्यायालय के फैसले को देश के किसी भी न्यायालय में नजीर न माना जाए। पूरा मामला गैर कानूनी रोकथाम कानून यानी यूएपीए से जुड़ा है और उच्च न्यायालय ने इस पर भी टिप्पणियां की है। शीर्ष न्यायालय द्वारा ऐसा कहने के बाद अब इस कानून के तहत बंद आरोपियों के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को उद्धृत नहीं किया जाएगा। कभी कोई पक्षकार अवइसका हवाला नहीं दे सकेगा। 15

जून को तीनों आरोपियों को जमानत देने के फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूएपीए, नागरिकता संशोधन कानून, विरोध प्रदर्शन पर पुलिस प्रशासन के रुख पर काफी तीखी टिप्पणियां की थी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि सरकार विरोध प्रदर्शन दबाने की चिंता में प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधियों में फर्क नहीं कर पा रही है। इससे विरोध प्रदर्शन और आतंकवादी गतिविधियों की रेखा धुंधली हो रही है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि हिंसा नियंत्रित हो गई थी और इस मामले में यूपीए लागू ही नहीं होगा।

वास्तव में दिल्ली दंगे और यूएपीए को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की यह असाधारण प्रतिक्रिया है। दिल्ली पुलिस की याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यह मामला महत्वपूर्ण है और इसके देशव्यापी परिणाम हो सकते हैं। जिस तरह कानून की व्याख्या की गई है संभवत: उस पर शीर्ष न्यायालय की व्याख्या की जरूरत होगी। शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा है कि नोटिस जारी किया जा रहा है और दूसरे पक्ष को भी सुना जाएगा। यह स्वाभाविक है, क्योंकि न्यायालय कभी भी एक पक्ष को सुनकर कोई फैसला नहीं दे सकता। इसलिए शीर्ष न्यायालय द्वारा तीनों आरोपियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगना न्यायिक प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग है। तो जुलाई के तीसरे सप्ताह में होने वाली सुनवाई पर पूरे देश की नजर होगी।

वास्तव में अगर जमानत पर दिए गए उच्च न्यायालय के फैसले को पढें तो ऐसा लगता है जैसे उसने  यूएपीए कानून के तहत विहित प्रक्रिया को काफी हद तक पलटि है। जमानत के लिये दायर याचिका में आरोपियों पर लगे आरोपों पर बात करने के साथ उसने संपूर्ण कानून पर टिप्पणी कर दी है। जिस तरह की टिप्पणियां है उससे लगता है जैसे न्यायालय तीनों आरोपियों को भी दोषी नहीं मानती। जैसा हम जानते हैं शाहीनबाग में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक मुख्य मार्ग को घेर कर दिए गए धरने का दिल्ली में विस्तार करने के लिए प्रकट आक्रामकता फरवरी में दंगों में परिणत हो गया। इसमें 53 लोग मारे गए जिसमें पुलिसकर्मी भी थे और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। यह हिंसा उस समय हुई थी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे। साफ है कि हिंसा के पीछे सुनियोजित साजिश थी ताकि नागरिकता संशोधन कानून के आधार पर सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा सुननी पड़े। आरोपी वास्तविक दोषी हैं या नहीं इस पर अंतिम फैसला न्यायालय करेगा। नागरिकता संशोधन कानून को हालांकि देश के बहुमत का समर्थन प्राप्त था और है लेकिन एक वर्ग उसका विरोधी भी था और आज भी है। किसी लोकतांत्रिक समाज का यह स्वाभाविक लक्षण है। किंतु इसका अभिप्राय नहीं कि हम किसी कानून का विरोध करते हैं तो हमें सड़क घेरने, आगजनी करने, निजी-सार्वजनिक संपत्तियों को किसी तरह का नुकसान पहुंचाने, पुलिस पर हमला करने और इसके लिए अलग-अलग तरीकों से लोगों को भड़काने का भी अधिकार मिल जाता है। यह सब भयानक अपराध के दायरे में आते हैं। दंगों के दौरान लोगों ने देखा कि किस तरह योजनाबद्ध तरीके से कई प्रकार के बम बनाए गए थे, अवैध हथियारों का उपयोग हुआ था, सरकारी निजी संपत्ति संपत्तियां जलाई गई थीं, निर्मम तरीके से हत्यायें हुईं थीं। जाहिर है, इसके साजिशकर्ताओं को कानून के कटघरे में खड़ा कर उनको सजा दिलवाना पुलिस का दायित्व है।

उच्च न्यायालय के सामने नागरिकता संशोधन कानून की व्याख्या का प्रश्न नहीं था। बावजूद उसने लिखा है कि प्रदर्शन के पीछे यह विश्वास था कि नागरिकता संशोधन कानून एक समुदाय के खिलाफ है। जब भी कोई व्यक्ति या समूह आतंकवादी हमला करता है या कोई बड़े नेता की हत्या करता है तो उसका तर्क इसी तरह का होता है कि उन्होंने एक समुदाय, एक समाज, एक व्यक्ति के साथ नाइंसाफी की। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के हत्यारों का तर्क भी तो यही था।  न्यायालय पता नहीं क्यों इस मूल बात पर विचार नहीं कर पाया कि प्रदर्शन के अधिकार में  सड़कों को घेरने, पुलिस से मुठभेड़ करने, हिंसा द्वारा मेट्रो रोकने से लेकर लोगों को मारने और बम फेंकने का अधिकार शामिल नहीं होता। यह तर्क भी आसानी से गले नहीं उतरता कि अगर हिंसा नियंत्रित हो गई तो यूएपीए लागू ही नहीं होगा। अगर हिंसा की साजिश बड़ी हो और उसे पुलिस और खुफिया एजेंसियां विफल कर दें तो क्या उनके साजिशकर्ताओं पर कानून लागू नहीं होता? व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह ने विस्फोट के लिए जगह-जगह बम लगा दिए और पुलिस ने उसे पकड़कर निष्क्रिय कर दिया तो क्या इससे अपराध की तीव्रता कम हो जाएगी?

निश्चय ही उच्चतम न्यायालय का अंतिम फैसला आने के पूर्व हम कोई निष्कर्ष नहीं दे सकते। न्यायिक मामलों में पूर्व आकलन की गुंजाइश नहीं होती। बावजूद कुछ संकेत मिलता है। वस्तुतः उच्च न्यायालय का भी अपना सम्मान है। उच्चतम न्यायालय उसके फैसले पर नकारात्मक टिप्पणी करने या माननीय न्यायाधीशों के बारे में ऐसी कोई टिप्पणी करने से प्रायः बचता है जिससे   उनके सम्मान को किसी तरह धक्का पहुंचे। हमने देखा है कि उच्च न्यायालय के फैसलों को रद्द करते हुए भी उच्चतम न्यायालय ज्यादातर मामलों में केवल मुकदमे के गुण-दोष तक ही अपनी टिप्पणियां सीमित रखता है। यही इस मामले में भी दिख रहा है। शाहीनबाग धरने को लेकर उस समय भी उच्चतम न्यायालय ने तीखी टिप्पणियां की थी। न्यायालय ने सड़क घेरना, आवाजाही को बंद करना आदि को अपराध करार दिया था। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया जिनमें आंदोलनकारियों के धरना प्रदर्शन के अधिकार को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि कानून और संविधान की सीमाओं के तहत ऐसा किया जाए तथा सड़कों पर चलने वालों या उनके आसपास के दुकानदारों के अधिकार का भी ध्यान रखा जाए। न्यायालय ने यहां तक कहा है कि अगर वे सड़कों, गलियों या ऐसे सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करते हैं तो पुलिस को उसे खाली कराने का अधिकार हासिल हो जाता है। उच्च न्यायालय ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है। निश्चित रूप से आगे की सुनवाई में यह विषय भी सामने आएगा। सांप्रदायिक और कुत्सित वैचारिक सोच के आधार पर सुनियोजित हिंसा, आतंकवाद आदि भारत नहीं संपूर्ण विश्व की समस्या है। ऐसे मामलों के आरोपियों पर विचार करते समय न्यायालय सामान्यतः अतीत, वर्तमान और भविष्य के संपूर्ण  परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखता रहा है। पिछले दो दशकों में हुई ऐसी हिंसा के मामलों में आए फैसलों और टिप्पणियां इसके प्रमाण हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा  अंतिम मंतव्य देने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी तथा सांप्रदायिकता हिंसा, आतंकवाद आदि फैलाने के साजिशकर्ताओं से कानूनी स्तर पर मुकाबला करने वाली एजेंसियों के सामने भी स्पष्ट तस्वीर होगी।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली :110092, मोबाइल :9811027208

रविवार, 27 जून 2021

बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द होंगे पूरे, सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी पूरी कालोनी : अनिल वाजपेयी

मो. रियाज़

नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के विधायक अनिल वाजपेयी ने आज बुलंद मस्जिद कालोनी में समाजसेवी इरशाद के कार्यालय का उद्घाटन किया। इस मौके पर विधायक अनिल बाजपेयी का इरशाद अहमद व आम जनता ने फूलमालाओं से जोरदार स्वागत किया।
इस उद्घाटन अवसर पर उनको कालोनी की हर एक परेशानी से अवगत करवाया गया जैसे पीने के पानी की समस्या, सफाई, नाली व सड़कों का पूरा न बना होना आदि। जिसको सुनने के बाद विधायक जी ने लोगों को आश्वासन दिया कि बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द पूरे होंगे, आपकी पूरी कालोनी सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी।

आपको बता दें कि बुलंद मस्जिद कालोनी का विकास कार्य काफी समय से रूका पड़ा है यह कार्य इनके पिछले कार्यकाल में ही पूरा हो जाना चाहिए था पर ठेकेदार की लापरवाही के कारण यह कार्य समय पर पूरा नहीं हो पाया। इसी बीच दिल्ली विधानसभा के चुनावों की घोषणा हो जाने के कारण ठेकेदार ने कार्य में लापरवाही बरती। चुनाव खत्म होने के बाद विधायक जी के कहने पर यह कार्य दोबारा शुरू हुआ ही था कि दिल्ली में दंगे शुरू हो गए और ठेकेदार को एक बार फिर कार्य न करने का बहाना मिल गया और रही सही कमी को कोरोना ने पूरा कर दिया। जब लोगों ने विधायक से शिकायत की तो ठेकेदार ने कोरोना के बहाना बनाया और कहा कि उसे अभी मजदूर नहीं मिल रहे हैं जैसे ही मजदूर मिलेंगे काम को शुरू करवा दिया जाएगा पर समय बीतता गया पर ठेकेदार के बहाने खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे जिससे परेशान होकर विधायक जी ने उसका ठेका रद्द करवा दिया।

नए ठेकेदार को ठेका मिला और काम शुरू हुआ था पर कोरोना की दूसरी लहर के कारण कार्य बीच में ही रुक गया। अब कोरोना की दूसरी लहर खत्म हो गई है और दिल्ली में काम दुबारा शुरू हो गए हैं।
इस मौके पर अनिल वाजेपयी ने सभी को बताया कि आपकी बुलंद मस्जिद कालोनी के अधूरे पड़े विकास कार्य जल्द पूरे होंगे। आपकी पूरी कालोनी भी सीसीटीवी कैमरों व वाईफाई से लैस होगी।
उन्होंने आगे कहा कि मैं हर रविवार को या हफ्ते में एक दिन जनता की समस्या सुनने के लिए इरशाद भाई के ऑफिस में आऊंगा। आपको मेरे कार्यालय में चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है अब आपका विधायक आपके बीच आकर आपके कार्य करेगा। मैंने जनता से वादा किया था कि खुद आपके द्वार आकर आपकी समस्या का समाधान करूंगा।
उन्होंने इरशाद, डाक्टर पाशा, लियाकत खान, मोहम्मद रियाज़, शमीम टीवी वाले, नियाज अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी, अब्दुल जब्बर, मोहम्मद सुहैल आदि का शुक्रिया अदा किया और कहा कि मैं आपके बीच हमेशा रहूंगा और आपकी परेशानी मेरी परेशानी है। आप मुझे कभी भी याद कर सकते हैं।

 


 

बुधवार, 23 जून 2021

पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी ने किया वैक्सीनेशन सेंटर का दौरा

 


18+ वालों का वेक्सिनेशन शुरू होने पर किया सीएम अरविंद केजरीवाल का धन्यवाद

मो. रियाज़
नई दिल्ली। गांधी नगर विधानसभा के अंतर्गत आने वाले बुलंद मस्जिद कॉलोनी के स्कूल में बने वैक्सीनेशन सेंटर पर अब 18 साल से ऊपर के लोगों को भी कोरोना वैक्सीन लगने लगी है। 
आज पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी व गांधी नगर के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन ने अपनी टीम के साथ वैक्सीनेशन सेंटर का दौरा किया। इस दौरान पूर्व निगम पार्षद तुलसी गांधी ने वैक्सीन लगवाने आए लोगों से भी बातचीत की और अधिक से अधिक संख्या में लोगों से वैक्सीन लगवाने की अपील की। साथ ही बुलंद मस्जिद स्कूल में 18+ वालों का वेक्सिनेशन शुरू करवाने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का धन्यवाद किया।

गांधी नगर के मनोनीत निगम पार्षद हसीबुल हसन कहा कि सीएम अरविंद केजरीवाल जी की सोच से आज हमारी दिल्ली में जहां वोट वहीं वैक्सीन योजना रंग ला रही है जिसको लेकर विपक्षी पार्टियों को इस तरह की बातें हजम नहीं हो रही हैं। 

वहीं सीएम की ओर से बुलंद मस्जिद वेक्सिनेशन सेंटर के लिए नामित इंचार्ज कमल अरोड़ा ने कहा कि सभी को वैक्सीन अवश्य लगवानी चाहिए। जिससे हम न केवल खुद सुरक्षित रह सकेंगे बल्कि अपने परिवार व देश को सुरक्षित करने में भी सहयोग कर सकेंगे।
इस मौके पर डीके गांधी उर्फ अब्दुल्ला गांधी अहमद, मो. रियाज़, सोनम वर्मा, महजबी, धंनजय जैन, दीपक हिंदुस्तानी, डा. पासा, लियाकत खान, महेश चौहान, अनीस खान, अब्दुल जब्बार आदि उपस्थित रहे।
 


शुक्रवार, 18 जून 2021

चीन ने युवाओं की घटती संख्या को रोकने के लिए तीन बच्चे की अनुमति दी

अवधेश कुमार

 चीन द्वाराअपने दंपत्तियों को तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति जिस ढंग से विश्व भर की मीडिया की सुर्खियां बनी वह स्वाभाविक ही है। भारत में जहां पिछले काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग जोर पकड़ चुकी है उसमें इस खबर ने आम लोगों को चौंकाया होगा। इस कानून की मांग करने वाले ज्यादातर लोगों का तर्क था कि चीन की एक बच्चे की नीति की तर्ज पर हमारे यहाँ भी कानून बने। इन लोगों को वर्तमान नीति जारी करते समय चीन द्वारा दिए गए अपने जनगणना के आंकड़ोंके साथ नीति बदलने के लिए बताए गए कारणों पर अवश्य गौर करना जाहिए। हालांकि जो लोग चीन और संपूर्ण दुनिया में जनसंख्या को लेकर बदलती प्रवृत्ति पर नजर रख रहे थे उनके लिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। एक समय जनसंख्या वृद्धि समस्या थी लेकिन आज चीन सहित विकसित दुनिया के ज्यादातर देश जनसंख्या वृद्धि की घटती दर, युवाओं की घटती तथा बुजुर्गों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं और अलग - अलग तरीके से जनसंख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

सातवीं राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार चीन की जनसंख्या 1.41178 अरब हो गई है जो 2010की तुलना में5.8 प्रतिशत यानी7.2 करोड़ ज्यादा है। इनमें हांगकांग और मकाउ की जनसंख्या शामिल नहीं है। इसके अनुसार चीन की आबादी में 2019 की लगभग 1.4 अरब की तुलना में 0.53 प्रतिशत वृद्धि हुई है। सामान्य तौर पर देखने से 1.41 अरब की  संख्या काफी बड़ी है और चीन का सबसे ज्यादा आबादी वाले देश का दर्जा कायम है, लेकिन 1950 के दशक के बाद से यह जनसंख्या वृद्धि की सबसे धीमी दर है। वहां 2020 में महिलाओं ने औसतन 1.3 बच्चों को जन्म दिया है। यही दर कायम रहा तो जनसंख्या में युवाओं की संख्या कम होगी, बुदूर्गों की बढ़ेगी तथा एक समय जनसंख्या स्थिर होकर फिर नीचे गिरने लगेगी। चीन में 60 वर्ष से ज्यादा उम्र वालों की संख्या बढ़कर 26.4 करोड़ हो गई है जो पिछले वर्ष से 18.7 प्रतिशत ज्यादा है।  चीन के एनबीएस यानी नेशनल ब्यूरो औफ स्टैटिस्टिक्स ने  कहा है कि जनसंख्या औसत आयु बढ़ने से दीर्घकालिक संतुलित विकास पर दबाव बढ़ेगा। इस समय चीन में कामकाजी आबादी या 16 से 59 आयुवर्ग के लोग 88 करोड़ यानी करीब 63. 3 प्रतिशत हैं। यह एक दशक पहले 70.1 प्रतिशत थी। यही नहीं 65 वर्ष या उससे ऊपर के उम्र वालों की संख्या 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.5 प्रतिशत हो गई है। आबादी का यह अनुपात चीन ही नहीं किसी देश के लिए चिंता का विषय होगा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक चीन की लगभग 44 करोड़ आबादी 60 की उम्र में होगी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जून 2019 में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि चीन में आबादी में कमी आएगी और भारत  2027 तक दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश हो जाएगा।

चीन पहले से इसे लेकर सतर्क हो गया था और उसने 2013 में ढील दी और 2015 में एक बच्चे की नीति ही खत्म कर दी। लेकिन 2013 में इसके लिए शर्त तय कर दी गई थी। दंपति में से कोई एक अपने मां-बाप की एकमात्र संतान हो, तभी वे दूसरे बच्चे को जन्म दे सकते हैं। दूसरे बच्चे की अनुमति के लिए आवेदन करना पड़ रहा था। इसे भी खत्म किया गया लेकिन जनसंख्या बढ़ाने  में अपेक्षित सफलता नहीं मिली।  जनसंख्या व़द्धि को रोकने के लिए चीन ने 1979 में एक बच्चे की नीति लागू की थी। इसके तहत ज्यादातर शहरी पति-पत्नी को एक बच्चा और ज्यादातर ग्रामीण को दो बच्चे जन्म देने का अधिकार दिया गया। पहली संतान लड़की होने पर दूसरे बच्चे को जन्म देने की स्वीकृति दी गई थी। चीन का कहना है कि एक बच्चे की नीति लागू होने के बाद से वह करीब 40 करोड़ बच्चे के जन्म को रोक पाया। तो एक समय जनसंख्या नियंत्रण उसके लिए लाभकारी था, पर अब यह बड़ी समस्या बन गई है। वास्तव में ज्यादा युवाओं का मतलब काम करने के ज्यादा हाथ और ज्यादा बुजुर्ग अर्थात देश पर ज्यादा बोझ। चीन की यह चिंता स्वाभाविक है कि अगर काम करने के आयुवर्ग के लोगों की पर्याप्त सख्या नहीं रही तो फिर देश की हर स्तर पर प्रगति के सोपान से पीछे चला जाएगा।

आज बढ़ती बुजुर्गों की आबादी से अनेक देश मुक्ति चाहते हैं और इसके लिए कई तरह की नीतियां अपना रहे हैं। पूरे यूरोप में जन्मदर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। कई देशों में प्रति महिला जन्मदर उस सामान्य 2.1 प्रतिशत से काफी नीचे आ गई है जो मौजूदा जनसंख्या को ही बनाए रखने के लिए जरूरी है। उदाहरण के लिए डेनमार्क में जन्म दर 1.7 पर पहुंच गई है और वहां इसे बढ़ाने के लिए कुछ सालों से विभिन्न अभियान चल रहे हैं। दंपतियों की छुट्टी के दिन बड़ी संख्या में गर्भधारण के मामलों को देखते हुए सरकार ने विज्ञापन अभियान के जरिए पति-पत्नी को एक दिन की छुट्टी लेने को भी प्रोत्साहित किया। विज्ञापन कंपनियां दंपतियों को ज्यादा से ज्यादा सेक्स के लिए तैयार करने के लिए विज्ञापन में भावनात्मक पहलुओं को ज्यादा उभारा जा रहा है। एक विज्ञ युवा दंपतियों के माता-पिता से  बेटे-बहू और बेटी-दामाद को छुट्टी पर भेजने को कहती है। इसमें एक युवा जोड़े को सेक्स करने की कोशिश करतेभी  दिखाया गया है। विज्ञापन का टैगलाइन है- डेनमार्क के लिए करो, अपनी मां के लिए करो (डू-इट-फोर डेनमार्क, डू-इट-फॉर-यूअर-मॉम)। इटली की सरकार तीसरा बच्चा पैदा करने वाले दंपती को कृषि योग्य जमीन  देने की घोषणा कर चुकी है।2017 के आंकड़ों के अनुसारजापान की जनसंख्या 12.68 करोड़ थी। अनुमान है कि घटती जन्मदर के कारण 2050 तक देश की जनसंख्या 10 करोड़ से नीचे आ जाएगी। वहां ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन दिए गए है।

 भारत की ओर आएं तो 2011 की जनगणना के अनुसार 25 वर्ष तक की आयु वाले युवा कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत तक 35 वर्ष तक वाले 65 प्रतिशत थी। इन आंकड़ों से साबित होता है कि भारत एक युवा देश है। भारत की औसत आयु भी कई देशों से कम है। इसका सीधा अर्थ है कि दुनिया की विकसित महाशक्तियां जहां ढलान और बुजुर्गियत की ओर हैं वहीं भारत युवा हो रहा है। भारत को भविष्य की महाशक्ति मानने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का तर्क यही रहा है कि इसकी युवा आबादी 2035 तक चीन से ज्यादा रहेगी और यह विकास में उसे पीछे छोड़ देगा। लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 2018 में जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2050 तक बुजुर्गों की संख्या आज की तुलना में तीन गुना अधिक हो जाएगी। उस जनगणना के अनुसार करीब दस करोड़ लोग 60वर्ष से ज्यादा उम्र के थे। हर वर्ष इसमें करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। इसके अनुसार ऐसे लोगों की संख्या वर्तमान 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 2050 में 19.4 प्रतिशत यानी करीब 30 करोड़ हो जाएगी। उस समय तक 80 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों की संख्या भी 0.9 प्रतिशत से बढ़कर 2.8 प्रतिशत हो जाएगी। जाहिर है, जो प्रश्न इस समय चीन और दुनिया के अनेक देशों के सामने है वो भारत के सामने भी आने वाला है। उस दिशा में अभी से सचेत और सक्रिय होनो की आवश्यकता है। जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वालों को यह पहलू अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अगर समाज का एक तबका बच्चे पैदा करने पर नियंत्रण नहीं रख रहा है तो उसका निदान अलग तरीके से तलाशना होगा।

अवधेश कुमार, ई :30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली:110092, मोबाइल :9811027208, 8178547992

 

 

 

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