शुक्रवार, 14 मई 2021

महाआपदा में निःस्वार्थ सहायता का आचरण उम्मीद पैदा करता है

अवधेश कुमार 

कोरोना महाआपदा में नकारात्मक सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि हमारे चारों ओर घट रहीं सकारात्मक घटनायें उनमें दब गईं हैं। वास्तव में चरमराती स्वास्थ्य सेवाओं और उनसे उत्पन्न डर और हताशा के बीच ऐसे समाचार और दृश्य सामने आ रहे हैं जो फिर यह उम्मीद पैदा करते हैं कि विकट परिस्थितियों में देश के लोगों, संस्थाओं संगठनों आदि का बड़ा समूह भारी जोखिम उठाकर भी समर्पण और संकल्प के साथ सेवा भाव से काम करने को तत्पर है। कोई भी आपदा अकेले केवल सरकारों के लिए चुनौतियां खड़ी नहीं करती, समाज के लिए भी करती है। अगर समाज का बड़ा समूह इसे समझता है तो वह अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार खड़ा होता है, आगे आता है और उन चुनौतियों को दूर करने या कम करने की यथासंभव कोशिश करता है। एक संवेदनशील सतर्क और सक्रिय समाज का यही लक्षण है। तमाम हाहाकार और कोहराम के बीच हमारे सामने मने ऐसी खबरें लगातार आ रहीं है जिसमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, सेवा संगठन-समूह या कुछ निजी लोग भी अपने-अपने तरीकों से पीड़ित व प्रभावित लोगों की सहायता कर रहे हैं। गाजियाबाद से एक समाचार ने पूरे देश का ध्यान खींचा जहां एक गुरुद्वारे ने घोषणा की कि कोई भी मरीज अगर ऑक्सीजन के बिना छटापटा रहा है तो आप हमारे पास ले आइए, हम उनको तब तक ऑक्सीजन देते रहेंगे जब तक या तो किसरी अस्पताल में उनको जगह नहीं मिल जाती या वे इस स्थिति में नहीं आ जाते कि घर लौटक आइसोलेट होकर चिकित्सा करा सकें। लगातार कोरना पीड़ित वहां जा रहे हैं, उनको ऑक्सीजन मिल रहा है। वहां पर अस्पतालों को फोन किया जा रहा है और अनेक मरीज कुछ घंटे  ऑक्सीजन के बाद स्थिति सुधरने पर अपने घर वापस आ गए। 

ऐसे कुछ और समाचारों पर नजर डालेंगे तो इनके विस्तार और प्रभाव का अहसास हो जाएगा। जोधपुर से खबर आई कि वहां के कुछ व्यापारियों ने मिलकर ऑक्सीजन बैंक शुरू किया है। ब्लड बैंक की तर्ज पर चलने वाला यह ऑक्सीजन बैंक केवल कोरोना में ही नहीं हर विकट परिस्थिति में स्थायी रुप से अस्पतालों को, व्यक्तियों को ऑक्सीजन मुहैया कराएगा। शायद हममें से किसी को आश्चर्य हो कि दो-तीन दिनों के अंदर ही करोड़ों रुपए इसके लिए इकट्ठे हो गए और ऑक्सीजन बैंक चालू होने की स्थिति में है। हम उन औद्योगिक घरानों की चर्चा नहीं करेंगे जो भारी मात्रा में ऑक्सीजन के साथ अन्य सहायता के साथ आगे आएं हैं। हालांकि आने वाले कुछ दिनों में ऑक्सीजन की आपूर्ति मांग के अनुरूप हो जाएगी लेकिन विकट परिस्थिति में जब चारों ओर हाहाकार हो तब इस ढंग की संस्थाएं उम्मीद जगातीं है। ये दों तो केवल उदाहरण हैंए देशभर में अलग-अलग न जाने कितनी संस्थाओं, गुरुद्वारों, मंदिरों, व्यापारिक समूहों, राजनीतिक दलों तथा निजी लोगों ने अपनी ओर से ऑक्सीजन मुहैया कराना शुरु किया और जितना संभव है करा रहे हैं। हमारे देश के बुद्धिजीवियों में धार्मिक संस्थाओं की आलोचना करने का फैशन है। वे भी आगे आकर काम कर रहे हैं।  धार्मिक संस्थाओं की ओर से देश भर में कोविड केयर सेंटर बनाए गए हैं और बनाए जा रहे हैं। निरंकारी मिशन, राधास्स्वामी सत्संग, सावन कृपाल रूहानी मिशन, चिन्मय मिशन, स्वामीनारायण मंदिर, रामकृष्ण मिशन आदि तो वो नाम हैं जिनके कोविड केयर केन्द्रों के समाचार और तस्वीरें राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पा रहीं हैं। क्षेत्रीय स्थानीय मीडिया में छोटी - बड़ी धार्मिक संस्थाओं की कोरोना मरीजों के उपचार, उनकी देखभाल तथा अन्य गतिविधियों के समाचार प्रतिदिन आ रहे हैं। सच यह है कि जिस धार्मिक संस्था की भी थोड़ी क्षमता है वो किसी न किसी रुप में सेवा कर रहा है। यहां तक कि मंदिर, मठ, गुरुद्वारे और मस्जिदों ने भी कोविड केयर के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। आरंभ में मुंबई के एक जैन मंदिर को चिकित्सा की सभी व्यवस्था के साथ कोविड केयर सेंटर में तब्दील करने की खबर आई। उसके बाद देशभर से ऐसी खबरें आने लगीं। इसी तरह पहले वडोदरा की जहांगीरपुरा मस्जिद द्वारा कोरोना मरीजों के लिए अपने परिसर में बेड का इंतजाम करने की खबर आई। उसके बाद कई जगहों से मस्जिद परिसर में कोरोना मरीजों के इलाज के इंतजाम किए जाने की सूचना आ रही है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यवस्थित तरीके से सेवा अभियान चलाने के लिए सभी राज्यों के प्रभारियों की नियुक्ति कर दी। उससे जुड़े संगठन अपनी क्षमता के अनुसार कई तरीकों से काम कर रहे हैं। जगह-जगह पूरे देश में इनका कार्यक्रम चल रहा है।  कुछ संगठन से जुड़ कर कर रहे हैं तो निजी स्तर पर भी, सेवा भारती, वनवासी कल्याण केंद्र, विश्व हिंदू परिषद, मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद आदि के कार्यकर्ता अपने-अपने स्थानों पर छोटे-बड़े समूह बनाकर कई तरीकों से सहायता  कर रहे हैं। कोई टीकाकरण अभियान में सहयोग कर रहा है, छोटे-बड़े कोविड केयर या आइसोलेशन सेंटर बनाए गए हैं, एंबुलेंस की व्यवस्था कर रहे हैं, दवाइयां और ऑक्सीजन की उपलब्धता में भी लगे हैं.. मरीज को भर्ती करानने में सहयोग  कर रहे हैं, भोजन उपलब्ध करा रहे हैं...। इन सबके लिए नंबर भी जारी किए है।ं कई जगह हेल्प सेंटर बने हैं । कहीं-कहीं निश्चित समय पर फोन नंबर पर डॉक्टर डॉक्टर उपलब्ध कराए गए हैं जो बचाव या कोविड-19 संक्रमितों के इलाज के लिए सुझाव देते हैं।

 इसी तरह राजनीतिक दलों में भी अकेले भाजपा नहीं, कांग्रेस और दूसरे दल भी अपने-अपने क्षेत्रों में सेवा सहायता में लगे हैं। दिल्ली में ही युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने मिलकर भोजनालय शुरू किया है जिससे अस्पतालों में मरीजों के रिश्तेदारों को भोजन कराया जा रहा है।   व्हाट्सएप से लेकर सोशल मीडिया पर अनेक लोगों के नंबर आपको मिले हैं जहां फोन करने पर आपको भोजन उपलब्ध हो सकता है। कोरोना आपदा के समय खासकर लॉकडाउन में केवल अस्पतालों और मरीज वाले परिवारों में ही नहीं, अनेक घरों में भी ंखाने की समस्याएं पैदा होतीं हैं। आप फोन पर बताते हैं और उतनी संख्या में भोजन के पैकेट आप तक पहुंच जाते हैं। गुरुद्वारों, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं से लेकर अनेक सेवा संस्थाएं, एनजीओ, निजी समूह आदि दिन रात इसमें लगे हैं। कहीं-कहीं भोजन यान चल रहा है जो बिना पूर्व सूचना के लोगों तक घूम-घूमकर भोजन पहुंचा रहे हैं। राजधानी दिल्ली के इर्द-गिर्द कई जगहों से खबर आई कि सोसायटी के लोगों ने अपने अपार्टमेंट के अंदर के कम्युनिटी हॉल, क्लब रूम आदि को ही कोविड-19 सेंटर में बदल दिया। वहां सामान्य तौर पर आवश्यकता पड़ने वाली औषधियों से लेकर डॉक्टर और नर्स तक की व्यवस्था है। कुछ लोगों ने भी समूह बनाए हैं जिनके व्हाट्सएप नंबरों पर मेसेज से आपकी कई समस्याएं हल हो जातीं हैं। मसलन, कुछ समूह दवा उपलब्ध कराता है। आपने किसी दवा की मांग की तो उनका समूह यह पता करता है कि दवा कहां उपलब्ध है और वहां से वो मंगाकर पहुंचा रहे हैं। 

वास्तव में इस तरह की गतिविधियों को आप लिखने लगें तो पन्ने भरते जाएंगे लेकिन सिलसिला खत्म नहीं होगा।यही भाव और आचरण उम्मीद पैदा करतीहै कि चाहे संकट कितना भी बड़ा हो हम उसका सफलतापूर्वक सामना करेंगे और विजीत भी होंगे। इससे यह भी पता चलता है कि हमारे देश और समाज की जैसी निराशाजनक तस्वीरें बनाई जा रहीं वैसा है नहीं। वाकई सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। लोगों के अंदर आज भी बिना सरकारी सहायता के निस्वार्थ भाव से अपना खर्च करके दुखी-पीड़ित लोगों की सेवा व हरसंभव सहायता करते हुए संकट का मुकाबला करने का जज्बा कायम है। जिस देश में धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व गैर राजनीतिक संगठन ही नहीं राजनीतिक दल और निजी लोग संकट में अपने संसाधनों के साथ हाथ बंटाने निकल जाएंगे उस देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता। इससे यह भी साबित हुआ है कि हमारे राजनीतिक वैचारिक मतभेद जितने गहरे हों, एक दूसरे की हम भले जितनी आलोचना करें, अंततः आपदा का सामना करने के लिए सब काम करेंगे। ऐसे भाव और व्यवहार वाले जनसमूह का सरकारी-गैर सरकारी तंत्रों पर प्रभाव भी पड़ता है। आखिर 2-3 दिनों में ऑक्सीजन पैदा करने वाले प्लांट इसी देश में तैयार हो रहे हैं। जिस तंत्र की हम आलोचना करते हैं और सही करते हैं वही इस काम को भी अंजाम दे रहा है। सामाजिक दूरी और अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए लोगों द्वारा उसमें भी यथासंभव सहयोग करने की तस्वीरें आ रहीं हैं। तो कामना करिए और उम्मीद भी रखिए कि इसी तरह का सामूहिक आचरण देश का बना रहेगा। हां, ऐसे व्यवहार केवल आपदा, विपत्ति और संकट के समय तक ही सीमित न रहे, सामान्य दिनों में भी दिखे। पहले आपदा से निपटें और फिर इस चरित्र को स्थाई भाव बनाने के लिए काम करें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः11009, मोबाइलः9811027208, 8178547992

 

शनिवार, 1 मई 2021

चेस्ट फिजियोथेरेपी कोरोना संक्रमण के लिए वरदान: डॉ. आसिफ हुसैन

डॉ. आसिफ हुसैन
मो. रियाज़

नई दिल्ली। आज पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है, कोरोना संक्रमण को झेल रहे मरीजों के लिए चेस्ट फिजियोथेरेपी बहुत उपयोगी है। कोरोना संक्रमण की वजह से मरीजों के सीनों और फेफड़ों में कई तरह की समस्या हो सकती है, ऐसे में लोगों में सांस फूलने की समस्या दिखे तो इसमें चेस्ट फिजियोथेरेपी कारगर साबित हो सकता है, चेस्ट फिजियोथेरेपी की मदद से मरीज खुद को पूरी तरह से ठीक और तंदुरुस्त कर सकता है।

कोरोना संक्रमित के कई लक्षणों में सांस लेने में दिक्कत भी एक प्रमुख लक्षण माना गया है, इसका सीधा संबंध फेफड़ों से होता है। कोरोना के अलावा फेफडों के कई ऐसे रोग है जिन्हें खतरनाक समझा जाता है जैसे:  अस्थमा, सीओपीडी, सिस्टिक फाइब्रोसिस आदि।  चेस्ट फिजियोथेरेपी में कई प्रकार का ग्रुप होता है जैसे पोस्चरल ड्रैनेज, चेस्ट पर्फ्यूजन, चेस्ट वाइब्रेशन, टर्निंग, डीप ब्रीथिंग एक्सरसाइज और भी ऐसी कई थैरेपी शामिल होती है। जब फेफड़े ठीक से काम नहीं करते या इससे जुड़ी गंभीर बीमारी हो तो फिजियोथेरेपी का सहारा पेशेंट को लेना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में इसका नाम चेस्ट फिजियोथेरेपी दिया गया है।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

उम्मीद रखिए, इस अंधियारी रात की भी सुबह होगी

अवधेश कुमार

निसंदेह जिस पर विपत्ति आती है उसका दर्द वही जानता है। हम सब महसूस कर सकते हैं लेकिन भुगतना तो उन्हीं को पड़ता है। जिनको भुगतना पड़ रहा है उनके सामने आप चाहे नीति और विचार के जितने वाक्य सुना दें तत्काल उनका मानस उसे ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होता। चाहे कितनी बड़ी आपदा हो, विनाश का हाहाकार हो, चारों ओर मौत का भय व्याप्त हो, मनुष्य के नाते हमें भविष्य के लिए आशा की किरण की ही तलाश करनी होती है। अगर हमने उम्मीद खो दी, हमारा हौसला पस्त हो गया ,साहस ने ही जवाब दे दिया तो फिर किसी आपदा पर विजय पाना कठिन हो जाएगा। कोरोना की महाआपदा से घिरे देश में मचा कोहराम कोई भी देख सकता है। जिनके अपने या अपनों की चिंताएं जली हैं उनको कहें कि हौसला बनाए रखिए... ये भी दिन गुजर जाएंगे, अच्छे दिन आएंगे तो ये बातें उनके गले आसानी से नहीं उतरेंगी, बल्कि इस समय शूल की तरह चुभती हुई भी लगेगी। मैंने अपने फेसबुक पोस्ट में लोगों से अपना हौसला बनाए रखने, अपनी सुरक्षा करने के साथ दूसरों को भी हौसला देने की अपील की थी। बड़ी संख्या में उत्तर सकारात्मक थे पर कुछ जवाब ऐसे भी थे जिनको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। किसी ने लिखा कि अगर घर के सदस्य की या रिश्तेदार की चिता जल रही हो तो ये बातें किस काम की। उनके अनुसार एक ही दिन में कई चिताएं जला कर लौटे हैं। ये दिन भी गुजर जाएंगे पर एक मित्र ने लिखा कि पता नहीं तब तक हम जीवित होंगे या नहीं।

  ये दोनों बातें निराशाजनक लग सकती हैं किंतु कोरोना से जिस प्रकार का घटाटोप कायम हुआ है उसमें सामान्य मनुष्य की यह स्वाभाविक दारुण अभिव्यक्ति है। जिस तरह ऑक्सीजन और औषधियों के लिए देशभर के अस्पतालों में हाहाकार मचा है, ऑक्सीजन के अभाव में लोगों के घुट-घुट कर दम तोड़ने के समाचार आ रहे हैं, अस्पतालों में मरीज को भर्ती कराने के लिए सौ जुग्गतें करनी पड़ रहीं है उसमें हर घर मिनट-मिनट डर और आतंक के साए में जी रहा है। मेरे व्हाट्सएप मैसेज के उत्तर में एक जानी-मानी एंकर ने लिखा कि सर, हम सब कुछ कर रहे हैं फिर भी हर क्षण इस डर में जी रहे हैं कि पता नहीं क्या होगा, बाहर कदम रखने में डर लग रहा है। यह किसी एक व्यक्ति की आवाज नहीं है पूरे देश का अंतर्भाव यही है। मैंने जितने व्हाट्सएप किए उनमें से ज्यादातर के उत्तर कहीं न कहीं अंतर्मन में व्याप्त भय और भविष्य की चिंता से लवरेज थे।

कोई कुछ कहे लेकिन इस समय पूरा भारत ऐसे ही घनघोर निराशा में जी रहा है और चिंता का शिकार है। हम सबने अपने जीवन में कई महामारियों का सामना किया है लेकिन एक-एक व्यक्ति को इतने दहशत में जीते कभी नहीं देखा। कोरोना के बारे में चिकित्सकों एवं वैज्ञानिको के एक बड़े समूह की राय है कि यह इतनी बड़ी बीमारी है नहीं जितनी बड़ी बन या बना दी गई है। किंतु यह अलग से विचार कर विषय है। भारत में डर और निराशा का सामूहिक अंतर्भाव कोरोना की आपदा से बड़ी आपदा है। प्रश्न है ऐसी स्थिति में हमारे सामने रास्ता क्या है? ऐसे मुश्किल वक्त में कोई सरल उत्तर व्यवहारिक रास्ता नहीं हो सकता। लेकिन जीवन क्रम की ऐतिहासिक सच्चाई को भी हम नकार नहीं सकते। सृष्टि के आरंभ से मनुष्य ने न जाने कितनी आपदाएं, विपत्तियां, विनाशलीलाएं देखीं, उनका सामना किया और उन सबसे निकलते हुए जीवन अपनी गति से आगे बढ़ती रही। यही पूरी सृष्टि का क्रम रहा है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में तो संपूर्ण प्रलयों का विवरण है। प्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाता है। बावजूद वहां से फिर जीवन की शुरुआत होती ही है। हर प्रलय के बाद नवसृजन यही जीवन का सच है। जो ईश्वर में विश्वास करते हैं यानी आस्तिक हैं वे मानते हैं कि हर घटित के पीछे ईश्वरीय महिमा है। कोई अवैज्ञानिक अंधविश्वासी सोच कह कर खारिज कर दे, पर ऐसी सोच से यह भावना कायम रहती है कि जब घटनाएं ईश्वर की देन है तो इनका सकारात्मक तरीके से सामना करना, सहना और जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करते रहना है। इस धारणा से यह उम्मीद भी पैदा होती है कि ईश्वर ने बुरे दिन दिए हैं तो वही अच्छे दिन भी लाएगा। इस एक धारणा ने मनुष्य को सृष्टि के आरंभ से अभी तक हर विपरीत परिस्थितियों से जूझने और उससे उबर कर जीवन क्रम को आगे बढ़ाने की शक्ति प्रदान की है।

तो इस तरह की शक्ति हमारे आपके अंदर है और उसी से वर्तमान आपदा का भी सामना करना पड़ेगा। आप ईश्वर पर विश्वास न भी करें तो प्रकृति की गति और उसके नियमों को मानेंगे ही। अगर हर घटना की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है तो इसमें अच्छी बुरी दोनों प्रकार की घटनाएं शामिल हैं। इस सिद्धांत में ही यह सच अंतर्निहित है कि बुरी घटना की विपरीत प्रतिक्रिया अच्छी ही होगी। तो भौतिकी का यह सिद्धांत भी उम्मीद जगाती है कि निश्चित रूप से निराशा और हताशा के वर्तमान घटाटोप से प्रकृति अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा हमें उबारेगी। षड् दर्शनों के विद्वान आपको इसे ज्यादा बेहतर तरीके से समझा सकेंगे। हमारे यहां बुजुर्ग धर्म और इतिहास से ऐसी कहानियां बचपन से सुनाते थे, विद्यालयों की पाठ पुस्तकों में पढ़ाई जातीं थी जिनमें जीवन पर आईं विपत्तियां और उसमें अविचल रह कर जूझने और विजय पाने की प्रेरणा मिलती थी। इस दौर में साहित्य, धर्म, दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र आदि विषयों की ओर युवाओं की रुचि घटी है, स्कूली पाठ्यपुस्तकों से भी वैसी कथाएं गायब है और इन सबका परिणाम हमारे सामूहिक मनोविज्ञान पर पड़ा है। लेकिन जो कुछ हम व्यवहार में भुगतते हैं वह भी हमें सीख देता है। हमारे आसपास ही ऐसे परिवार होंगे या स्वयं हम ही वैसे परिवार से आते होंगे जहां किसी बीमारी या घटना में एक साथ बड़ी संख्या में हमारे प्रियजन चल बसे। ऐसी त्रासदीयों के व्यावाहारिक और मानसिक संघात से पीड़ित होते हुए भी हम अपने को संभालते और जीवन की गाड़ी को आगे खींचते हैं। यही जीवन है। जब विनाशकारी तूफान आता है तो फसलें नष्ट हो जाती हैं.. बड़े-बड़े पेड़ भी जड़ों से उखड़ जाते हैं... लगता है पूरी प्रकृति बिखर गई हो लेकिन धरती बंजर नहीं होती। बीज फिर से अंकुरित होते हैं, फसलें फिलहाल आती हैं, वनस्पतियां फिर अठखेलियां करने लगती हैं। मनुष्य अपनी जीजीविषया में फिर फसलें लगाने निकलता है और सफल होता है। जीवन क्रम इसी तरह आगे बढ़ता है। प्रकृति और जीवन के ये दोनों पहलू सच हैं। इसका कोई एक पहलू पूरा सच नहीं हो सकता। तूफान और विनाश भी प्रकृति चक्र के अंगभूत घटक हैं तो फिर नए सिरे से बीजों का अंकुरण और पौधों का उगना भी। कोरोना अगर इस चक्र में तूफान है तो यकीन मानिए इसके बाद फिर जीवन की हरियाली लहलहाती दिखेगी।

हमारे जीवन को क्षणभंगुर कहा गया है। अगले क्षण हम जीवित रहेंगे इसकी कभी कोई गारंटी नहीं होती। लेकिन हम यह सोचकर अकर्मक नहीं हो जाते कि जब आने वाले किसी क्षण में हमारी मौत होनी है तो ज्यादा उद्यम क्यों करें ,हाथ-पांव क्यों मारे। हम हर दिन अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद से अपने कर्मों में रत रहते हैं। कोई ऐसी अंधियारी रात नहीं हो सकती जिसका अंत सुबह से नहीं हो। हर अंधकारपूर्ण रात के बाद सूर्य का प्रकाश निकलना ही है। इसलिए बिल्कुल सच मानिए यह आपदा भी जाएगा और हमारी कोशिशों से ही जाएगा। उसके बाद हम सब फिर अपनी स्वाभाविक भूमिका में पहले की भांति या उससे ज्यादा उत्साह से सक्रिय होंगे। अभी रास्ता यही है कि हम स्वयं और परिजनों को सुरक्षित रखें, दूसरों की सुरक्षा को खतरे में ना डालें तथा अपना हौसला बनाए रखते हुए एक दूसरे की ममद करें व अन्यों को भी हौसला देने की कोशिश करें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

कोरोना से संपूर्ण जीवन प्रभावित: कैसे जीवन व्यवस्था और तंत्र चलता रहे इस पर विचार हो

अवधेश कुमार

जब भी कोई संकट और विपत्ति अनेक उपायों के बावजूद बार-बार वार करता है तो मनुष्य कई प्रकार से उसके कारणों का विश्लेषण करने लगता है। कोरोना प्रकोप के संदर्भ में भी यही हो रहा है। आप देख लीजिए, चुनावी रैलियों पर रोक लगे, कुंभ खत्म हो, दूसरे सामूहिक आयोजन न हो... जैसी आवाजें चारों ओर से उठी हैं। कोरोना की भयावहता खत्म होनी जाहिए, पर हममें से कोई यह सोचने को शायद ही तैयार है कि क्या ये सब कोरोना संकट को दूर करने का कारण बन सकते हैं? विश्व एवं भारत में जिस तरह कोरोना बार-बार धमक रहा है उससे जीवन का एक-एक पहलू दुष्प्रभावित है। केवल राजनीति नहीं, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक ... संपूर्ण जीवन पहलू कोरोना की चोट से मर्माहत हैं। तो सोचना होगा कि आखिर जीवन के कितने पहलुओं को और कितने दिनों तक हम स्थगित या विराम की अवस्था में रख सकते हैं?

राजनीतिक नजरिए से आप किसी दलया कुछ दलों को कटघरे में खड़ा कर दीजिए उससे कोरोना का निदान नहीं निकलेगा। चुनाव हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। कोरोना 10-20 दिन या महीने भर का संकट अब नहीं रहा जिससे कुछ दिनों के लिए बहुत कुछ को स्थगित रखकर आगे फिर प्रारंभ करने पर विचार कर सके। भारत में हर समय कोई न कोई चुनाव चलता रहता है। आगरा कोरोना का प्रकोप ऐसे ही आगे कुछ समय तक बार-बार सामने आता रहा तो हम कितनी चुनाव प्रक्रिया को बाधित करेंगे? चुनाव प्रणाली ऐसी है जिसमें प्रचार की संपूर्ण गतिविधियों को रोक देना संभव नहीं होता। बड़ी रैलियां आप रोक देंगे तब भी उम्मीदवार और उनके समर्थक वोट मांगने के लिए लोगों तक पहुंचेंगे। जब पहुंचेंगे तो उनके साथ छोटा बड़ा समूह भी होगा। छोटी-छोटी बैठकें करेंगे। जिसे चुनाव लड़ना है और जीतने की उम्मीद से लड़ना है वह मतदाताओं तक पहुंचने का कोई न कोई तरीका अपनाएगा। अगर चुनाव प्रक्रिया चलनी है तो प्रतिस्पर्धी पार्टियां एवं उम्मीदवार को जनता के बीच जाकर अपना पक्ष और विरोधी का विपक्ष रखना आवश्यक है। या तो चुनाव स्थगित कर दीजिए या चुनाव प्रचार होने दीजिए। कोई एक पार्टी या नेता किसी एक राज्य में कुछ समय के लिए अपनी रैलियां स्थगित कर सकता है लेकिन दूसरे राज्य में फिर चुनाव होंगे तो वह ऐसा ही करेगा इसकी गारंटी नहीं। जहां जिसको जीतने की उम्मीद होगी वहां वह हर कवायद करेगा और करना भी चाहिए। एक बार कोरोना के कारण हमने चुनाव स्थगित कर दिया या सारी चुनाव चुनावी सभाएं रोक दीं तो भविष्य के लिए भी यही उदाहरण बनेगा। हां राजनीतिक दलों ,चुनाव आयोग, मीडिया ,बुद्धिजीवियों सबको इस प्रश्न का उत्तर अवश्य तलाशना चाहिए कि अगर कोरोना का संकट लंबा खींचता है तो हम किस तरीके से अपने लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया का संचालन करें? वर्चुअल सभाएं, सोशल मीडिया या मीडिया के माध्यम से भारत जैसे विविधताओं वाले देश में कोई पार्टी या नेता सभी मतदाताओं तक अपनी बात नहीं पहुंचा सकता है। तो रास्ता निकालना होगा।

कोरोना संघात का भय केवल चुनावी सभाओं तक ही सीमित नहीं है। भारत एक उत्सव धर्मी देश है। हमारे यहां धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्म भी उत्सव के साथ आबद्ध हैं। अगर नवरात्री है तो दुर्गा प्रतिमा स्थापित होंगी और नौ दिनों की आराधना के बाद उनका विसर्जन होगा। स्थापना और विसर्जन में भीड़ न जुटे तो भी कुछ लोगों को साथ आना ही पड़ेगा। ऐसा कौन सा पर्व त्यौहार है जिसमें हमारे यहां सामूहिकता शामिल नहीं? होली मे घरों में ही सीमित रहने की अपील की गई। भारत में ऐसा कोई समय नहीं जब पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण अलग-अलग क्षेत्रों में कोई पर्व-त्यौहार या उत्सव नहीं होता हो। पता नहीं कितने वर्षों की स्थापित परंपराएं हैं। इन सबको पूरी तरह स्थगित करना संभव नहीं हो सकता। रमजान के महीने में रोजा और उसके साथ इफ्तार का प्रचलन आज तो शुरू हुआ नहीं है। आखिर इसे कब तक कितने दिनों के लिए रोकेंगे? कुंभ और महाकुंभ जैसे आयोजनों की प्रतीक्षा लोग लंबे समय करते हैं और संबंधित नदी में डुबकी लगाने की आकांक्षाएं भी प्रबल होती हैं। ऐसे ही अनेक प्रकार की धार्मिक यात्राएं, तीर्थ यात्राएं, मंदिरों के कर्मकांड आदि भिन्न-भिन्न समय पर आयोजित होते हैं। आप कहीं किसी आयोजन को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकते हैं सबको नहीं किया जा सकता है।

यह समय पूरे भारत में शादियों का भी है। यह कहना बहुत आसान है कि कुछ लोगों के बीच ही शादी के आयोजन को पूरा कर लीजिए। हमारे यहां शादी के पहले अनेक राज्यों में महिलाएं टोली बनाकर देवी-देवताओं के पूजन के लिए निकलती है,साथ बाजा होता है, कहीं-कहीं पुरुष भी निकलते हैं ..कई प्रकार की पूजा होती है ,कई-कई दिनों तक रात्रि में गीत-संगीत का आयोजन होता है..। परिवार, रिश्तेदार शादी को लेकर अनेक सपने संजोए होते हैं। इन सबको कोरोना फैलने के भय से अनिश्चित समय तक के लिए खत्म कर देना कैसे संभव होगा? अनेक क्षेत्रों में मृत्यु के बाद शवदहन ही नहीं श्राद्ध का भी लंबा कर्मकांड है। 12-13 दिनों से लेकर एक महीने का श्राद्ध कर्म होता है। यह तार्किक हो या अतार्किक आम धारणा यही है कि इन सबका पालन ना करें तो मृतक की आत्मा को कष्ट पहुंचता है और उसकी मुक्ति का मार्ग बाधित होता है। नई फसल लगाने के साथ भी उत्सव जुड़े हुए हैं। रबी फसलों की बुवाइ, ,धान की रोपाई आरंभ करने के दिन खेतों में पूजा, घर में पूजा और आसपास के लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार भोजन कराने की परंपरा है। ऐसे उत्सवधर्मी समाज को कोरोना आघात के भय से बार-बार यह कहकर उत्सव से दूर करना कि अभी कठिन समय है जब समय बेहतर होगा तब आप सारे आयोजन करेंगे संभव नहीं है।

 कोरोना नेपूरी शिक्षा व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है। साल भर से छात्रों के लिए भारत के ज्यादातर राज्यों में नियमित रूप से शिक्षालय जाना संभव नहीं रहा। परीक्षाएं खत्म की जा रहीं या स्थगित हो रहीं हैं। इन सब छात्रों का भविष्य क्या होगा? कोरोना के लंबे संकट काल में कब तक तदर्थता को जारी रखा जाएगा? नौनिहालों, नवजवानों के भविष्य को लेकर फैसला करना होगा। अर्थव्यवस्था के बारे में बताने की भी आवश्यकता नहीं। केंद्र से लेकर राज्यों तक का आर्थिक ढांचा चरमरा रहा है। हमारे आपके घर की भी आर्थिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हैं। लाखों रोजगार से वंचित हुए तो लाखों रोजगार पाने से वंचित हैं। छोटे-बड़े व्यापार सब प्रभावित हैं। स्वच्छंद रूप से आवागमन नहीं हो रहा। इस स्थिति को लंबे समय तक जारी रखना संभव नहीं होगा। ऐसा हुआ तो कैसी विस्फोटक स्थिति होगी इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। सबसे बड़ी बात कि क्या वाकई चुनावी सभाओं, सामूहिक धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक आयोजनों से कोरोना का प्रसार होता है? पिछले वर्ष चुनाव हुए बिहार में और कोरोना का बम फटा दिल्ली में। इस बार भी चुनाव वाले राज्यों में कोरोना का उतना भयानक प्रकोप अभी तक नहीं हुआ जितना कि दिल्ली, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ आदि में। लाखों के कुंभ में कुछ को कोरोना हुआ तो यह अर्थ नहीं कि उसका कारण कुंभ ही हो। वे अपने मूल स्थानों पर रहते तो उनको कोरोना नहीं होता इसकी गारंटी कौन दे सकता है? होली पूरे देश में मना लेकिन कोरोना प्रकोप सब जगह नहीं।

कोरोना को मात देना है, पर ऐसे कदमों से तंत्र चरमरा सकता है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य कि कोरोना संकट पर तात्कालिक भय और घबराहट में निर्णय करने की जगह अब तक उसके प्रसार की गहन समीक्षा तथा जीवन पहलुओं पर पड़ने वाले समस्त प्रभावों का व्यापक स्तर पर गहराई से विचार करके तार्किक-व्यावहारिक निष्कर्ष निकालना होगा। कोरोना प्रसार को रोकना है, उस पर काबू भी करना है लेकिन न लंबे समय तक राजनीतिक प्रक्रियाएं ठप कर सकते हैं, न प्रत्येक चुनाव में उम्मीदवारों, पार्टियों और नेताओं को संपर्क करने से वंचित रख सकते हैं। न धार्मिक आयोजनों, उत्सवों, पर्व-त्योहारों को पूरी तरह सामूहिकता से लंबे समय तक वंचित रखा जा सकता है, न शिक्षा व्यवस्था ही ठप रखी जा सकती है। यह सब आवश्यक भी नहीं है। विचार करें कि कोरोना का दैत्य लंबे समय तक बार-बार आघात करता रहा तो हम इसके फैलाव को रोकने के उपायों को अपनाते हुए भी इन व्यवस्थाओं को कैसे संचालित करेंगे?

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

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