शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

कोरोना से संपूर्ण जीवन प्रभावित: कैसे जीवन व्यवस्था और तंत्र चलता रहे इस पर विचार हो

अवधेश कुमार

जब भी कोई संकट और विपत्ति अनेक उपायों के बावजूद बार-बार वार करता है तो मनुष्य कई प्रकार से उसके कारणों का विश्लेषण करने लगता है। कोरोना प्रकोप के संदर्भ में भी यही हो रहा है। आप देख लीजिए, चुनावी रैलियों पर रोक लगे, कुंभ खत्म हो, दूसरे सामूहिक आयोजन न हो... जैसी आवाजें चारों ओर से उठी हैं। कोरोना की भयावहता खत्म होनी जाहिए, पर हममें से कोई यह सोचने को शायद ही तैयार है कि क्या ये सब कोरोना संकट को दूर करने का कारण बन सकते हैं? विश्व एवं भारत में जिस तरह कोरोना बार-बार धमक रहा है उससे जीवन का एक-एक पहलू दुष्प्रभावित है। केवल राजनीति नहीं, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक ... संपूर्ण जीवन पहलू कोरोना की चोट से मर्माहत हैं। तो सोचना होगा कि आखिर जीवन के कितने पहलुओं को और कितने दिनों तक हम स्थगित या विराम की अवस्था में रख सकते हैं?

राजनीतिक नजरिए से आप किसी दलया कुछ दलों को कटघरे में खड़ा कर दीजिए उससे कोरोना का निदान नहीं निकलेगा। चुनाव हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। कोरोना 10-20 दिन या महीने भर का संकट अब नहीं रहा जिससे कुछ दिनों के लिए बहुत कुछ को स्थगित रखकर आगे फिर प्रारंभ करने पर विचार कर सके। भारत में हर समय कोई न कोई चुनाव चलता रहता है। आगरा कोरोना का प्रकोप ऐसे ही आगे कुछ समय तक बार-बार सामने आता रहा तो हम कितनी चुनाव प्रक्रिया को बाधित करेंगे? चुनाव प्रणाली ऐसी है जिसमें प्रचार की संपूर्ण गतिविधियों को रोक देना संभव नहीं होता। बड़ी रैलियां आप रोक देंगे तब भी उम्मीदवार और उनके समर्थक वोट मांगने के लिए लोगों तक पहुंचेंगे। जब पहुंचेंगे तो उनके साथ छोटा बड़ा समूह भी होगा। छोटी-छोटी बैठकें करेंगे। जिसे चुनाव लड़ना है और जीतने की उम्मीद से लड़ना है वह मतदाताओं तक पहुंचने का कोई न कोई तरीका अपनाएगा। अगर चुनाव प्रक्रिया चलनी है तो प्रतिस्पर्धी पार्टियां एवं उम्मीदवार को जनता के बीच जाकर अपना पक्ष और विरोधी का विपक्ष रखना आवश्यक है। या तो चुनाव स्थगित कर दीजिए या चुनाव प्रचार होने दीजिए। कोई एक पार्टी या नेता किसी एक राज्य में कुछ समय के लिए अपनी रैलियां स्थगित कर सकता है लेकिन दूसरे राज्य में फिर चुनाव होंगे तो वह ऐसा ही करेगा इसकी गारंटी नहीं। जहां जिसको जीतने की उम्मीद होगी वहां वह हर कवायद करेगा और करना भी चाहिए। एक बार कोरोना के कारण हमने चुनाव स्थगित कर दिया या सारी चुनाव चुनावी सभाएं रोक दीं तो भविष्य के लिए भी यही उदाहरण बनेगा। हां राजनीतिक दलों ,चुनाव आयोग, मीडिया ,बुद्धिजीवियों सबको इस प्रश्न का उत्तर अवश्य तलाशना चाहिए कि अगर कोरोना का संकट लंबा खींचता है तो हम किस तरीके से अपने लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया का संचालन करें? वर्चुअल सभाएं, सोशल मीडिया या मीडिया के माध्यम से भारत जैसे विविधताओं वाले देश में कोई पार्टी या नेता सभी मतदाताओं तक अपनी बात नहीं पहुंचा सकता है। तो रास्ता निकालना होगा।

कोरोना संघात का भय केवल चुनावी सभाओं तक ही सीमित नहीं है। भारत एक उत्सव धर्मी देश है। हमारे यहां धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्म भी उत्सव के साथ आबद्ध हैं। अगर नवरात्री है तो दुर्गा प्रतिमा स्थापित होंगी और नौ दिनों की आराधना के बाद उनका विसर्जन होगा। स्थापना और विसर्जन में भीड़ न जुटे तो भी कुछ लोगों को साथ आना ही पड़ेगा। ऐसा कौन सा पर्व त्यौहार है जिसमें हमारे यहां सामूहिकता शामिल नहीं? होली मे घरों में ही सीमित रहने की अपील की गई। भारत में ऐसा कोई समय नहीं जब पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण अलग-अलग क्षेत्रों में कोई पर्व-त्यौहार या उत्सव नहीं होता हो। पता नहीं कितने वर्षों की स्थापित परंपराएं हैं। इन सबको पूरी तरह स्थगित करना संभव नहीं हो सकता। रमजान के महीने में रोजा और उसके साथ इफ्तार का प्रचलन आज तो शुरू हुआ नहीं है। आखिर इसे कब तक कितने दिनों के लिए रोकेंगे? कुंभ और महाकुंभ जैसे आयोजनों की प्रतीक्षा लोग लंबे समय करते हैं और संबंधित नदी में डुबकी लगाने की आकांक्षाएं भी प्रबल होती हैं। ऐसे ही अनेक प्रकार की धार्मिक यात्राएं, तीर्थ यात्राएं, मंदिरों के कर्मकांड आदि भिन्न-भिन्न समय पर आयोजित होते हैं। आप कहीं किसी आयोजन को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकते हैं सबको नहीं किया जा सकता है।

यह समय पूरे भारत में शादियों का भी है। यह कहना बहुत आसान है कि कुछ लोगों के बीच ही शादी के आयोजन को पूरा कर लीजिए। हमारे यहां शादी के पहले अनेक राज्यों में महिलाएं टोली बनाकर देवी-देवताओं के पूजन के लिए निकलती है,साथ बाजा होता है, कहीं-कहीं पुरुष भी निकलते हैं ..कई प्रकार की पूजा होती है ,कई-कई दिनों तक रात्रि में गीत-संगीत का आयोजन होता है..। परिवार, रिश्तेदार शादी को लेकर अनेक सपने संजोए होते हैं। इन सबको कोरोना फैलने के भय से अनिश्चित समय तक के लिए खत्म कर देना कैसे संभव होगा? अनेक क्षेत्रों में मृत्यु के बाद शवदहन ही नहीं श्राद्ध का भी लंबा कर्मकांड है। 12-13 दिनों से लेकर एक महीने का श्राद्ध कर्म होता है। यह तार्किक हो या अतार्किक आम धारणा यही है कि इन सबका पालन ना करें तो मृतक की आत्मा को कष्ट पहुंचता है और उसकी मुक्ति का मार्ग बाधित होता है। नई फसल लगाने के साथ भी उत्सव जुड़े हुए हैं। रबी फसलों की बुवाइ, ,धान की रोपाई आरंभ करने के दिन खेतों में पूजा, घर में पूजा और आसपास के लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार भोजन कराने की परंपरा है। ऐसे उत्सवधर्मी समाज को कोरोना आघात के भय से बार-बार यह कहकर उत्सव से दूर करना कि अभी कठिन समय है जब समय बेहतर होगा तब आप सारे आयोजन करेंगे संभव नहीं है।

 कोरोना नेपूरी शिक्षा व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया है। साल भर से छात्रों के लिए भारत के ज्यादातर राज्यों में नियमित रूप से शिक्षालय जाना संभव नहीं रहा। परीक्षाएं खत्म की जा रहीं या स्थगित हो रहीं हैं। इन सब छात्रों का भविष्य क्या होगा? कोरोना के लंबे संकट काल में कब तक तदर्थता को जारी रखा जाएगा? नौनिहालों, नवजवानों के भविष्य को लेकर फैसला करना होगा। अर्थव्यवस्था के बारे में बताने की भी आवश्यकता नहीं। केंद्र से लेकर राज्यों तक का आर्थिक ढांचा चरमरा रहा है। हमारे आपके घर की भी आर्थिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हैं। लाखों रोजगार से वंचित हुए तो लाखों रोजगार पाने से वंचित हैं। छोटे-बड़े व्यापार सब प्रभावित हैं। स्वच्छंद रूप से आवागमन नहीं हो रहा। इस स्थिति को लंबे समय तक जारी रखना संभव नहीं होगा। ऐसा हुआ तो कैसी विस्फोटक स्थिति होगी इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। सबसे बड़ी बात कि क्या वाकई चुनावी सभाओं, सामूहिक धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक आयोजनों से कोरोना का प्रसार होता है? पिछले वर्ष चुनाव हुए बिहार में और कोरोना का बम फटा दिल्ली में। इस बार भी चुनाव वाले राज्यों में कोरोना का उतना भयानक प्रकोप अभी तक नहीं हुआ जितना कि दिल्ली, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ आदि में। लाखों के कुंभ में कुछ को कोरोना हुआ तो यह अर्थ नहीं कि उसका कारण कुंभ ही हो। वे अपने मूल स्थानों पर रहते तो उनको कोरोना नहीं होता इसकी गारंटी कौन दे सकता है? होली पूरे देश में मना लेकिन कोरोना प्रकोप सब जगह नहीं।

कोरोना को मात देना है, पर ऐसे कदमों से तंत्र चरमरा सकता है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य कि कोरोना संकट पर तात्कालिक भय और घबराहट में निर्णय करने की जगह अब तक उसके प्रसार की गहन समीक्षा तथा जीवन पहलुओं पर पड़ने वाले समस्त प्रभावों का व्यापक स्तर पर गहराई से विचार करके तार्किक-व्यावहारिक निष्कर्ष निकालना होगा। कोरोना प्रसार को रोकना है, उस पर काबू भी करना है लेकिन न लंबे समय तक राजनीतिक प्रक्रियाएं ठप कर सकते हैं, न प्रत्येक चुनाव में उम्मीदवारों, पार्टियों और नेताओं को संपर्क करने से वंचित रख सकते हैं। न धार्मिक आयोजनों, उत्सवों, पर्व-त्योहारों को पूरी तरह सामूहिकता से लंबे समय तक वंचित रखा जा सकता है, न शिक्षा व्यवस्था ही ठप रखी जा सकती है। यह सब आवश्यक भी नहीं है। विचार करें कि कोरोना का दैत्य लंबे समय तक बार-बार आघात करता रहा तो हम इसके फैलाव को रोकने के उपायों को अपनाते हुए भी इन व्यवस्थाओं को कैसे संचालित करेंगे?

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

हिंसा और ममता बनर्जी का रवैया

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा हमेशा पूरे देश का दिल दहलाती है। निस्संदेह, वर्तमान चुनाव में चुनाव आयोग की सख्ती का असर हुआ है।लेकिन तीसरे दौर के मतदान में कूचबिहार के एक विधानसभा क्षेत्र में हुई हिंसा पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने जो रवैया अख्तियार किया है वो हिंसा से कहीं ज्यादा डरावना है । मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी अगर चुनाव की सुरक्षा ड्यूटी में लगे सुरक्षा बल को ही अपराधी घोषित करने लगे तो फिर कानून के राज की बात कौन करेगा। चुनाव आयोग के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट बताती है कि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल या सीआईएसएफ को मजबूरी में स्थिति नियंत्रित करने के लिए गोली चलानी पड़ी। इसे आत्मरक्षार्थ गोली चालन भी कहा जा सकता है क्योंकि ये ऐसा नहीं करते तो कुछ जवान मारे जाते, घायल होते इनमें से कई के हथियार तक छीने जा चुके होते। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट बताती है कि 300- 350 लोगों की भीड़ ने सुरक्षाबलों पर हमला किया, इनके हाथों से हथियार छीनने की कोशिश की। पहले इन्होंने हवा में फायर किया और जब स्थिति नहीं संभली तो भीड़ पर गोली चलानी पड़ी। कोई हिंसक भीड़ अगर चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने लगे, मतदानकर्मियों को पीट दे, काफी कोशिशों के बाद भी न मानेसुरक्षाबलों को भी निशाना बना दे तो फिर विकल्प क्या बचता है? स्थानीय पुलिस अधीक्षक तक के बयान चुनाव आयोग की बातों की पुष्टि करते हैं। 

एक व्यक्ति की भी गोली चालन में मृत्यु दुखद है। कई बार ऐसी कार्रवाई अनेक लोगों की जान की रक्षा के साथ कानून और व्यवस्था कायम रखने का कारण भी बनती है। ममता सुरक्षाबलों को अपराधी कहतीं हैं तो इसका अर्थ है कि वो अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के अपराधिक दुस्साहसों को जानते हुए भी अनदेखी कर रही हैं। इसका अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं। हिंसा पर दुख और पीड़ा व्यक्त करने तथा राज्य के लोगों से चुनाव में कानून को हाथ में ना लेने की स्वाभाविक अपील करने की जगह मुख्यमंत्री का पूरा रवैया उकसाने और उत्तेजित करने वाला है। चुनाव आयोग को निशाना बनाना तथा उसे एमसीसी यानी मोदी कोड ऑफ कंडक्ट कहना केवल दुर्भाग्यपूर्ण नहीं खतरनाक राजनीति है। सच तो यही है कि चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने के पहले से ही ममता बनर्जी ने जिस तरह का आक्रमक रुख अपनाया उसकी स्वाभाविक परिणति हिंसा ही होनी थी। आप अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल को भाजपा की बल कहेंगी, आप बार-बार बयान देंगी कि सुरक्षा बल भाजपा के लिए वोट डालने का दबाव डालती है तो फिर पहले से ही हिंसक समर्थकों में क्या संदेश जाएगा? ममता ने 7 अप्रैल को कहा कि सीआरपीएफ का एक समूह घेराव करो तो दूसरा समूह वोट डालते रहो। यह सीधे-सीधे सुरक्षाबलों के कार्य में बाधा डालने तथा उनके खिलाफ हाथापाई ,मुठभेड़ आदि के लिए उकसाना था। 

वो लगातार सुरक्षाबलों पर तृणमूल के विरोध और भाजपा के पक्ष में काम करने का आरोप लगा रही हैं। इससे पूरे प्रदेश में ममता व तृणमूल समर्थकों, कार्यकर्ताओं तथा सत्ता से जुड़े भारी संख्या में निहित स्वार्थी तत्वों के अंदर सुरक्षा बलों के खिलाफ गुस्सा और उत्तेजना बढ़ा है। वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को निशाना बनाती हैं। चुनाव में राजनीतिक निशाना बनाया जाना बिलकुल स्वाभाविक है किंतु उनके बयानों की ध्वनि यह है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए भाजपा के पक्ष में जबरन मतदान करवाने की गैर कानूनी कार्रवाई में संलिप्त हैं। वो कहती हैं कि अमित शाह सुरक्षाबलों को आदेश देते हैं कि भाजपा के लिए वोट कराओ। इसके साथ चुनाव आयोग को लगातार आक्षेपित करते हुए कह रही हैं कि वह  भाजपा को जिताने के लिए काम कर रहा है। जब जनप्रतिनिधित्व कानूनों के उल्लंघन के मामले में उनको नोटिस जारी होता है तो कहती हैं कि देखो चुनाव आयोग भाजपा को नोटिस जारी नहीं करता। कुल मिलाकर ममता बनर्जी ने अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं व भाजपा विरोधियों को यह संदेश दिया है कि मोदी और शाह तो उसके विरुद्ध  है ही चुनाव आयोग और चुनावी ड्यूटी में लगे सुरक्षा बल भी तृणमूल को हराने में लगे हैं। यानी मेरे अकेले पर सब टूट पड़े हैं। जाहिर है, कम समझ रखने वाले और पहले से हिंसा करने के अभ्यस्त उन तृणमूल समर्थकों और कार्यकर्ताओं को लगा है कि जब सभी दीदी को हराने में ही लगे हैं तो उनसे हमको टकराना होगा। एक समुदाय के अंदर तो उन्होंने यह भय पैदा कर ही दिया है कि भाजपा सत्ता में आ गई तो आपकी खैर नहीं। उनको आक्रामक होना ही है। दूसरे, प. बंगाल में लंबे समय से कोई चुनाव काफी हद तक 2019 लोकसभा को छोड़कर सहज, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष नहीं हुआ। पहले कांग्रेस हिंसा और धांधली से चुनाव जीतती थी। बाद में माकपा के नेतृत्व में वामदलों ने आगे बढ़कर हिंसा और धांधली को अपनाया। इनकी हिंसा का शिकार होती व जूझती हुई सत्ता तक आने वाली ममता बनर्जी ने हिंसा और धंाधंली को ही मतदान का पर्याय बना दिया। हालांकि वामदलों के साथ टकराव में उनकी लोकप्रियता जितनी चरम पर थी उसमें वो राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिए काम कर सकतीं थीं। दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका भी सूत्र अपने पूर्ववर्तियों की तरह यही रहा कि चुनाव के पहले हिंसक वातावरण बनाओ, विरोधियों को डराओ ताकि वे मतदान करने ना निकलें और जैसे चाहो धांधली करो। अगर कोई साहस करके मतदान केंद्र तक चला जाए तो उस पर हमला करो ताकि दूसरे ऐसा करने का की सोच भी ना सके। चुनाव परिणाम के बाद पता चले कि कुछ लोगों ने गुप्त रूप से हमारे खिलाफ मतदान किया है तो फिर उसके खिलाफ इतनी हिंसा करो कि उसकी दशा देखकर दूसरे डर जाएं। इसमंे पुलिस प्रशासन की भूमिका हमेशा मूकदर्शक की रही है।

 2018 के पंचायत चुनाव में 20,000 से ज्यादा उनके उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए क्योंकि चुनाव पूर्व ही हिंसा से ऐसा माहौल बनाया गया कि भय से दूसरे उम्मीदवार खड़े ही नहीं हुए या जो हुए उनके विरुद्ध किस तरह की हिंसा, आगजनी आदि हुई इसकी कुछ घटनाएं पूरे देश ने मीडिया के माध्यम से देखी। जीते लोगों तक को अपना स्थान छोड़कर भागने की नौबत तक आ गई थी। भाजपा ने तृणमूल विरोधियों और अपने समर्थकों के अंदर 2016 से अभियानों के द्वारा यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की आप सब हिम्मत करके राजनीतिक लड़ाई के लिए आगे आएं हम आपके साथ हैं।  प्रदेश के ही नहीं, भाजपा के राष्ट्रीय नेता हिंसा में मारे गए, घायल हुए, शिकार हुए समर्थकों-कार्यकर्ताओं के घर अवश्य जाने लगे। इनके लिए संघर्ष किया और जहां तक संभव हुआ आवश्यकतानुसार इनकी हरसंभव मदद भी की गई। इन सबसे प्रदेश का वातावरण धीरे-धीरे बदला और पंचायत चुनाव में इसका छोटा रूप दिखा। 2019 लोकसभा चुनाव तक एक बड़े वर्ग के अंदर का भय या तो गायब हो गया या काफी कम हुआ। वर्तमान विधानसभा चुनाव में भारी संख्या में लोग भाजपा की रैलियों, रोड शो, बड़ी-छोटी सभाओं में आ रहे हैं। भाजपा की ताकत बढ़ने के साथ इनके लोग अनेक जगह तृणमूल समर्थकों से आमने-सामने टकराने लगे। कई राजनीतिक हिंसा में दोनों तरफ के लोग शामिल रहे हैं। चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव एवं वर्तमान चुनाव में जैसा सुरक्षा प्रबंध किया उससे भी माहौल बदला है।

 ममता और उनके समर्थकों के सामने इन सबके संकेत साफ हैं। अगर कल तकघरों में दुबके रहने वाले का इनके  आतंक को दरकिनार कर बाहर निकलना इनको नागवार गुजरता है तो समस्या इनकी है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को पक्ष और विपक्ष में मत देने का अधिकार है और इसे बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों तथा संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेवारी है। ममता शासन की नीतियों, नेताओं की कार्यशैली, विशेष समुदाय का आपराधिक तुष्टीकरण ,एक समुदाय की भावनाओं पर कुठाराघात आदि से बदलते वातावरण को समझने की जगह चुनाव आयोग से लेकर केंद्रीय सुरक्षाबलों तक को दुश्मन करार देकर युद्ध जैसा वातावरण बनाती आ रहीं हैं तो इसका परिणाम भयावह होना ही है। चुनाव आयोग की सख्त सुरक्षा व्यवस्था और भाजपा की बराबर की ताकत के कारण हिंसा की ज्यादा घटनाएं नहीं हो रहीं, अन्यथा विकट स्थिति हो सकती थी। आगे के लिए ज्यादा सचेत रहना होगा। सत्ता में आज कोई है कल कोई और रहेगा लेकिन मतदान की स्वच्छता, राजनीतिक शांति, सुरक्षाबलों की धवल छवि और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना सबका दायित्व है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

माओवादियों ने फिर साबित किया वे आतंकवादी ही हैं

अवधेश कुमार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में 15 माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु, 22 जवानों का शहीद होना बड़ी क्षति है। 31 से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है।  इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी। जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया, अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया, माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। ऐसे बहादुरों को पूरा देश अभिनंदन कर रहा है।

कई बातें सामने आ रहीं हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाड़ियों पर भारी संख्या में हथिरबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़ के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की मानें तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन, डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को औपरेशन के लिए भेजा गया था। माओवादियों ने इनमें 700 जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। बीजापुर-सुकमा जिले का सीमाई इलाका जोनागुड़ा माओवादियों का मुख्य इलाका है। यहां माओवादियों की एक बटालियन और कई प्लाटून हमेशा तैनात रहता है। इस इलाके की कमान महिला माओवादी सुजाता के हाथों है। एक जानकारी यह है कि पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी या पीएलजीए का कमांडर हिड़मा आसपास था और कई दिनों से उसकी गतिविधियों को ट्रैक किया जा रहा था। बहरहाल, इस घटना के बाद फिर लगता है मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगेध्यान रखिए माओवादियों ने 17 मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्तें रखी थीं-- सशस्त्र बल हटें, माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन 23 मार्च को नारायणपुर में बारुदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। 

साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। पुलिस की ओर से यह जानकारी दी जा रही है कि वर्तमान हमले में 180 तैनात माओवादी लड़ाकों के अलावा कोंटा एरिया कमेटी, पामेड़ एरिया कमेटी, जगरगुंडा एरिया कमेटी और बासागुड़ा एरिया कमेटी के लगभग 250 अन्य भी थे। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य - असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों है? निस्संदेह, यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग-अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता, सामाजिक-आर्थिक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं। लेकिन समाज विरोधी, देश विरोधी, हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा। भारत में नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनकी कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरुद्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैंइनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं, कुछ जमानत पर बाहर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों, सेमिनारों, लेखों, वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आर्थिक- सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। माओवादियों के पास लड़ाके उपलब्ध हो रहे हैं तो इसका अर्थ है कि इन तर्कों के आधार पर कुछ को प्रभावित करना संभव है। यह समस्या की जड़ और मूल है। तो क्या किया जाए?

अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास, अल्पविकास, असमानता, वंचितों, वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं जो धरातल तक पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास, स्वच्छता अभियान के तहत निर्मित शौचालय, ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच, सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार, किसानों के खाते में हर वर्ष 6000 भुगतान, वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन, पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा, कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। ये सब कार्यक्रम हवा में नहीं है। इसके अलावा अलग-अलग राज्य सरकारों के कार्यक्रम हैं। लड़कियों की शिक्षा, उनकी शादी आदि के लिए ज्यादातर राज्य सरकारें अब एक निश्चित मानदेय प्रदान करती हैं। बाढ़, दुर्भिक्ष आदि में पहले की तुलना में लोगों तक सुविधाओं की बेहतर पहुंच हैं। सरकारों के अलावा अनेक धार्मिक - सामाजिक संस्थाएं भी इनके बीच काम कर रहीं हैं। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत-प्रतिशत बदल गई है। लेकिन बदलाव हुआ है, स्थिति बेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों, जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है। इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा, उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा, संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी, गैर सरकारी कार्यक्रम हैं वे सही तरीके से उन तक पहुंचे, उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगा?

साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा इन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। दुर्भाग्य है कि जब पुलिस - प्रशासन, सरकारें इनके खिलाफ कार्रवाई करती हैं तो मानवाधिकारों और ऐसे अन्य कई नामों से प्रतिष्ठित चेहरे, बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं की फौज पक्ष में खड़ी हो जाती है। ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो ये सब तो समाज हितेषी हैं और केवल वैचारिक विरोध के कारण सरकार इनका दमन कर रही है। इसी तरह सैन्य कार्रवाई का भी विरोध होता रहा है। तो आवश्यकता दृढ़ता और ईमानदारी के साथ तीनों मोर्चों पर काम करने की है। सैन्य अभियान माओवादियों के समूल नाश के लक्ष्य की दृष्टि से सघन किया जाए। इसके समानांतर कल्याण योजनाएं ठीक तरह उन तक पहुंचे उसके लिए काम करने वाले वहां आगे आएं। साथ ही इनकी मूल जड़ यानी विचार व संसाधन सहित अन्य प्रकार से सहयोग करने वालों को भी चिन्हित कर जो जैसा डिजर्व करते हैं उनके खिलाफ वैसी कार्रवाई हो। इन लोगों को समझना चाहिए था कि हिंसा किसी के हित में नहीं। लेकिन जब ये नहीं समझते तो फिर कानून के तहत इनको समझाने की व्यवस्था करनी ही होगी। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं हमारी राजनीति है। किसी भी राजनीतिक दल का इनके पक्ष में खड़ा हो जाने से कार्रवाई मुश्किल हो जाती है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम हो?   

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली रू110092, मोबाइल: 9811027208, 8178547992

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