गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

हिंसा और ममता बनर्जी का रवैया

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा हमेशा पूरे देश का दिल दहलाती है। निस्संदेह, वर्तमान चुनाव में चुनाव आयोग की सख्ती का असर हुआ है।लेकिन तीसरे दौर के मतदान में कूचबिहार के एक विधानसभा क्षेत्र में हुई हिंसा पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने जो रवैया अख्तियार किया है वो हिंसा से कहीं ज्यादा डरावना है । मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी अगर चुनाव की सुरक्षा ड्यूटी में लगे सुरक्षा बल को ही अपराधी घोषित करने लगे तो फिर कानून के राज की बात कौन करेगा। चुनाव आयोग के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट बताती है कि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल या सीआईएसएफ को मजबूरी में स्थिति नियंत्रित करने के लिए गोली चलानी पड़ी। इसे आत्मरक्षार्थ गोली चालन भी कहा जा सकता है क्योंकि ये ऐसा नहीं करते तो कुछ जवान मारे जाते, घायल होते इनमें से कई के हथियार तक छीने जा चुके होते। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट बताती है कि 300- 350 लोगों की भीड़ ने सुरक्षाबलों पर हमला किया, इनके हाथों से हथियार छीनने की कोशिश की। पहले इन्होंने हवा में फायर किया और जब स्थिति नहीं संभली तो भीड़ पर गोली चलानी पड़ी। कोई हिंसक भीड़ अगर चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने लगे, मतदानकर्मियों को पीट दे, काफी कोशिशों के बाद भी न मानेसुरक्षाबलों को भी निशाना बना दे तो फिर विकल्प क्या बचता है? स्थानीय पुलिस अधीक्षक तक के बयान चुनाव आयोग की बातों की पुष्टि करते हैं। 

एक व्यक्ति की भी गोली चालन में मृत्यु दुखद है। कई बार ऐसी कार्रवाई अनेक लोगों की जान की रक्षा के साथ कानून और व्यवस्था कायम रखने का कारण भी बनती है। ममता सुरक्षाबलों को अपराधी कहतीं हैं तो इसका अर्थ है कि वो अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के अपराधिक दुस्साहसों को जानते हुए भी अनदेखी कर रही हैं। इसका अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं। हिंसा पर दुख और पीड़ा व्यक्त करने तथा राज्य के लोगों से चुनाव में कानून को हाथ में ना लेने की स्वाभाविक अपील करने की जगह मुख्यमंत्री का पूरा रवैया उकसाने और उत्तेजित करने वाला है। चुनाव आयोग को निशाना बनाना तथा उसे एमसीसी यानी मोदी कोड ऑफ कंडक्ट कहना केवल दुर्भाग्यपूर्ण नहीं खतरनाक राजनीति है। सच तो यही है कि चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने के पहले से ही ममता बनर्जी ने जिस तरह का आक्रमक रुख अपनाया उसकी स्वाभाविक परिणति हिंसा ही होनी थी। आप अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल को भाजपा की बल कहेंगी, आप बार-बार बयान देंगी कि सुरक्षा बल भाजपा के लिए वोट डालने का दबाव डालती है तो फिर पहले से ही हिंसक समर्थकों में क्या संदेश जाएगा? ममता ने 7 अप्रैल को कहा कि सीआरपीएफ का एक समूह घेराव करो तो दूसरा समूह वोट डालते रहो। यह सीधे-सीधे सुरक्षाबलों के कार्य में बाधा डालने तथा उनके खिलाफ हाथापाई ,मुठभेड़ आदि के लिए उकसाना था। 

वो लगातार सुरक्षाबलों पर तृणमूल के विरोध और भाजपा के पक्ष में काम करने का आरोप लगा रही हैं। इससे पूरे प्रदेश में ममता व तृणमूल समर्थकों, कार्यकर्ताओं तथा सत्ता से जुड़े भारी संख्या में निहित स्वार्थी तत्वों के अंदर सुरक्षा बलों के खिलाफ गुस्सा और उत्तेजना बढ़ा है। वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को निशाना बनाती हैं। चुनाव में राजनीतिक निशाना बनाया जाना बिलकुल स्वाभाविक है किंतु उनके बयानों की ध्वनि यह है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों अपने पदों का दुरुपयोग करते हुए भाजपा के पक्ष में जबरन मतदान करवाने की गैर कानूनी कार्रवाई में संलिप्त हैं। वो कहती हैं कि अमित शाह सुरक्षाबलों को आदेश देते हैं कि भाजपा के लिए वोट कराओ। इसके साथ चुनाव आयोग को लगातार आक्षेपित करते हुए कह रही हैं कि वह  भाजपा को जिताने के लिए काम कर रहा है। जब जनप्रतिनिधित्व कानूनों के उल्लंघन के मामले में उनको नोटिस जारी होता है तो कहती हैं कि देखो चुनाव आयोग भाजपा को नोटिस जारी नहीं करता। कुल मिलाकर ममता बनर्जी ने अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं व भाजपा विरोधियों को यह संदेश दिया है कि मोदी और शाह तो उसके विरुद्ध  है ही चुनाव आयोग और चुनावी ड्यूटी में लगे सुरक्षा बल भी तृणमूल को हराने में लगे हैं। यानी मेरे अकेले पर सब टूट पड़े हैं। जाहिर है, कम समझ रखने वाले और पहले से हिंसा करने के अभ्यस्त उन तृणमूल समर्थकों और कार्यकर्ताओं को लगा है कि जब सभी दीदी को हराने में ही लगे हैं तो उनसे हमको टकराना होगा। एक समुदाय के अंदर तो उन्होंने यह भय पैदा कर ही दिया है कि भाजपा सत्ता में आ गई तो आपकी खैर नहीं। उनको आक्रामक होना ही है। दूसरे, प. बंगाल में लंबे समय से कोई चुनाव काफी हद तक 2019 लोकसभा को छोड़कर सहज, शांतिपूर्ण और निष्पक्ष नहीं हुआ। पहले कांग्रेस हिंसा और धांधली से चुनाव जीतती थी। बाद में माकपा के नेतृत्व में वामदलों ने आगे बढ़कर हिंसा और धांधली को अपनाया। इनकी हिंसा का शिकार होती व जूझती हुई सत्ता तक आने वाली ममता बनर्जी ने हिंसा और धंाधंली को ही मतदान का पर्याय बना दिया। हालांकि वामदलों के साथ टकराव में उनकी लोकप्रियता जितनी चरम पर थी उसमें वो राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिए काम कर सकतीं थीं। दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका भी सूत्र अपने पूर्ववर्तियों की तरह यही रहा कि चुनाव के पहले हिंसक वातावरण बनाओ, विरोधियों को डराओ ताकि वे मतदान करने ना निकलें और जैसे चाहो धांधली करो। अगर कोई साहस करके मतदान केंद्र तक चला जाए तो उस पर हमला करो ताकि दूसरे ऐसा करने का की सोच भी ना सके। चुनाव परिणाम के बाद पता चले कि कुछ लोगों ने गुप्त रूप से हमारे खिलाफ मतदान किया है तो फिर उसके खिलाफ इतनी हिंसा करो कि उसकी दशा देखकर दूसरे डर जाएं। इसमंे पुलिस प्रशासन की भूमिका हमेशा मूकदर्शक की रही है।

 2018 के पंचायत चुनाव में 20,000 से ज्यादा उनके उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए क्योंकि चुनाव पूर्व ही हिंसा से ऐसा माहौल बनाया गया कि भय से दूसरे उम्मीदवार खड़े ही नहीं हुए या जो हुए उनके विरुद्ध किस तरह की हिंसा, आगजनी आदि हुई इसकी कुछ घटनाएं पूरे देश ने मीडिया के माध्यम से देखी। जीते लोगों तक को अपना स्थान छोड़कर भागने की नौबत तक आ गई थी। भाजपा ने तृणमूल विरोधियों और अपने समर्थकों के अंदर 2016 से अभियानों के द्वारा यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की आप सब हिम्मत करके राजनीतिक लड़ाई के लिए आगे आएं हम आपके साथ हैं।  प्रदेश के ही नहीं, भाजपा के राष्ट्रीय नेता हिंसा में मारे गए, घायल हुए, शिकार हुए समर्थकों-कार्यकर्ताओं के घर अवश्य जाने लगे। इनके लिए संघर्ष किया और जहां तक संभव हुआ आवश्यकतानुसार इनकी हरसंभव मदद भी की गई। इन सबसे प्रदेश का वातावरण धीरे-धीरे बदला और पंचायत चुनाव में इसका छोटा रूप दिखा। 2019 लोकसभा चुनाव तक एक बड़े वर्ग के अंदर का भय या तो गायब हो गया या काफी कम हुआ। वर्तमान विधानसभा चुनाव में भारी संख्या में लोग भाजपा की रैलियों, रोड शो, बड़ी-छोटी सभाओं में आ रहे हैं। भाजपा की ताकत बढ़ने के साथ इनके लोग अनेक जगह तृणमूल समर्थकों से आमने-सामने टकराने लगे। कई राजनीतिक हिंसा में दोनों तरफ के लोग शामिल रहे हैं। चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव एवं वर्तमान चुनाव में जैसा सुरक्षा प्रबंध किया उससे भी माहौल बदला है।

 ममता और उनके समर्थकों के सामने इन सबके संकेत साफ हैं। अगर कल तकघरों में दुबके रहने वाले का इनके  आतंक को दरकिनार कर बाहर निकलना इनको नागवार गुजरता है तो समस्या इनकी है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को पक्ष और विपक्ष में मत देने का अधिकार है और इसे बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों तथा संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेवारी है। ममता शासन की नीतियों, नेताओं की कार्यशैली, विशेष समुदाय का आपराधिक तुष्टीकरण ,एक समुदाय की भावनाओं पर कुठाराघात आदि से बदलते वातावरण को समझने की जगह चुनाव आयोग से लेकर केंद्रीय सुरक्षाबलों तक को दुश्मन करार देकर युद्ध जैसा वातावरण बनाती आ रहीं हैं तो इसका परिणाम भयावह होना ही है। चुनाव आयोग की सख्त सुरक्षा व्यवस्था और भाजपा की बराबर की ताकत के कारण हिंसा की ज्यादा घटनाएं नहीं हो रहीं, अन्यथा विकट स्थिति हो सकती थी। आगे के लिए ज्यादा सचेत रहना होगा। सत्ता में आज कोई है कल कोई और रहेगा लेकिन मतदान की स्वच्छता, राजनीतिक शांति, सुरक्षाबलों की धवल छवि और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना सबका दायित्व है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

माओवादियों ने फिर साबित किया वे आतंकवादी ही हैं

अवधेश कुमार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में 15 माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु, 22 जवानों का शहीद होना बड़ी क्षति है। 31 से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है।  इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी। जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया, अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया, माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। ऐसे बहादुरों को पूरा देश अभिनंदन कर रहा है।

कई बातें सामने आ रहीं हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाड़ियों पर भारी संख्या में हथिरबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़ के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की मानें तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन, डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को औपरेशन के लिए भेजा गया था। माओवादियों ने इनमें 700 जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। बीजापुर-सुकमा जिले का सीमाई इलाका जोनागुड़ा माओवादियों का मुख्य इलाका है। यहां माओवादियों की एक बटालियन और कई प्लाटून हमेशा तैनात रहता है। इस इलाके की कमान महिला माओवादी सुजाता के हाथों है। एक जानकारी यह है कि पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी या पीएलजीए का कमांडर हिड़मा आसपास था और कई दिनों से उसकी गतिविधियों को ट्रैक किया जा रहा था। बहरहाल, इस घटना के बाद फिर लगता है मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगेध्यान रखिए माओवादियों ने 17 मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्तें रखी थीं-- सशस्त्र बल हटें, माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन 23 मार्च को नारायणपुर में बारुदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। 

साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। पुलिस की ओर से यह जानकारी दी जा रही है कि वर्तमान हमले में 180 तैनात माओवादी लड़ाकों के अलावा कोंटा एरिया कमेटी, पामेड़ एरिया कमेटी, जगरगुंडा एरिया कमेटी और बासागुड़ा एरिया कमेटी के लगभग 250 अन्य भी थे। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य - असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों है? निस्संदेह, यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग-अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता, सामाजिक-आर्थिक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं। लेकिन समाज विरोधी, देश विरोधी, हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा। भारत में नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनकी कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरुद्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैंइनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं, कुछ जमानत पर बाहर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों, सेमिनारों, लेखों, वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आर्थिक- सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। माओवादियों के पास लड़ाके उपलब्ध हो रहे हैं तो इसका अर्थ है कि इन तर्कों के आधार पर कुछ को प्रभावित करना संभव है। यह समस्या की जड़ और मूल है। तो क्या किया जाए?

अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास, अल्पविकास, असमानता, वंचितों, वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं जो धरातल तक पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास, स्वच्छता अभियान के तहत निर्मित शौचालय, ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच, सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार, किसानों के खाते में हर वर्ष 6000 भुगतान, वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन, पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा, कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। ये सब कार्यक्रम हवा में नहीं है। इसके अलावा अलग-अलग राज्य सरकारों के कार्यक्रम हैं। लड़कियों की शिक्षा, उनकी शादी आदि के लिए ज्यादातर राज्य सरकारें अब एक निश्चित मानदेय प्रदान करती हैं। बाढ़, दुर्भिक्ष आदि में पहले की तुलना में लोगों तक सुविधाओं की बेहतर पहुंच हैं। सरकारों के अलावा अनेक धार्मिक - सामाजिक संस्थाएं भी इनके बीच काम कर रहीं हैं। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत-प्रतिशत बदल गई है। लेकिन बदलाव हुआ है, स्थिति बेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों, जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है। इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा, उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा, संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी, गैर सरकारी कार्यक्रम हैं वे सही तरीके से उन तक पहुंचे, उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगा?

साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा इन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। दुर्भाग्य है कि जब पुलिस - प्रशासन, सरकारें इनके खिलाफ कार्रवाई करती हैं तो मानवाधिकारों और ऐसे अन्य कई नामों से प्रतिष्ठित चेहरे, बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं की फौज पक्ष में खड़ी हो जाती है। ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो ये सब तो समाज हितेषी हैं और केवल वैचारिक विरोध के कारण सरकार इनका दमन कर रही है। इसी तरह सैन्य कार्रवाई का भी विरोध होता रहा है। तो आवश्यकता दृढ़ता और ईमानदारी के साथ तीनों मोर्चों पर काम करने की है। सैन्य अभियान माओवादियों के समूल नाश के लक्ष्य की दृष्टि से सघन किया जाए। इसके समानांतर कल्याण योजनाएं ठीक तरह उन तक पहुंचे उसके लिए काम करने वाले वहां आगे आएं। साथ ही इनकी मूल जड़ यानी विचार व संसाधन सहित अन्य प्रकार से सहयोग करने वालों को भी चिन्हित कर जो जैसा डिजर्व करते हैं उनके खिलाफ वैसी कार्रवाई हो। इन लोगों को समझना चाहिए था कि हिंसा किसी के हित में नहीं। लेकिन जब ये नहीं समझते तो फिर कानून के तहत इनको समझाने की व्यवस्था करनी ही होगी। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं हमारी राजनीति है। किसी भी राजनीतिक दल का इनके पक्ष में खड़ा हो जाने से कार्रवाई मुश्किल हो जाती है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम हो?   

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली रू110092, मोबाइल: 9811027208, 8178547992

बुधवार, 31 मार्च 2021

मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने

अवधेश कुमार

अगर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय बांग्लादेश यात्रा का विश्लेषण निश्चय अलग दृष्टिकोण से किया जाता। चुनाव है और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के किसी तरह बांग्लादेश में मोदी की गतिविधियों से प्रभावित होने की संभावना है तो उस दृष्टिकोण से देखा जाएगा । मोदी जब बांग्लादेश के सत्खीरा स्थित शताब्दियों पुराने 51 शक्तिपीठों में से एक जेशोरेश्वरी काली मंदिर में पूजा अर्चना कर रहे थे, सोने और चांदी के मुकुट चढ़ा रहे थे और वो लाइव भारत में दिख रही थी तो फिर विरोधी और विश्लेषक यह टिप्पणी करेंगे ही कि बंगाल के हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। उसी तरह अगर उन्होंने मतुआ समुदाय के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर के जन्म स्थान गोपालगंज स्थित ओरकांडी मंदिर में पूजा अर्चना के बाद उनको संबोधित किया तो उसका संदेश इस पार आना ही है। आखिर मतुआ महासंघ बांग्लादेश से ज्यादा पश्चिम बंगाल में सक्रिय है। बांग्लादेश मतुआ महाआयोग के अध्यक्ष पद्मनाभ ठाकुर  हों या हरिचंद ठाकुर के वंश के सदस्य सुब्रतो ठाकुर उनका प्रभाव पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय पर निसंदेह है । सुब्रतो ठाकुर बांग्लादेश में काशियानी उपज़िला परिषद के अध्यक्ष हैं।

मतुआ नामशूद्र समुदाय का प बंगाल की सात लोकसभा सीटों और 60-70 विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। मोदी ने अपने संबोधन में जिस बोडो मां  यानी वीणापानी देवी से मुलाकात की चर्चा की उनके जीवनकाल में मतुआ समुदाय की राजनीति उनके संकेत से संचालित होती थी। स्वयं ममता बनर्जी ने भी मतुआ समुदाय को साधने की कोशिश की। बोडो मां के सबसे बड़े बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर को बनगांव लोक सभा सीट से उम्मीदवार बनाया और वे जीतकर 2014 में सांसद बने। अक्तूबर, 2014 में जब उनकी मृत्यु हो गई तो उनकी पत्नी ममता ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा और वह भी सांसद बनी । जो शांतनु ठाकुर ओरकांडी  मंदिर में मोदी के साथ थे वे अभी बनगांव से भाजपा के सांसद हैं। उन्होंने ही अपनी चाची ममता ठाकुर को हराया। भाजपा ने उनके के छोटे भाई सुब्रत ठाकुर को  गाईधाट विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है। संभव है मोदी ने ओरकांडी ठाकुरबारी से बंगाल चुनाव को भी साधने की कोशिश की हो। यह नहीं भूलिए की विभाजन के बाद उस पार रह गए मतुआ लोगों के बीच कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं गया था। मूल प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का वहां जाना, जेशोरेश्वरी मंदिर में पूजा करना कूटनीति की दृष्टि से सही कदम नहीं था ? बिल्कुल था। कूटनीति का अर्थ केवल आर्थिक, सामरिक राजनीतिक द्विपक्षीय अंतर्संबंध नहीं है। सभ्यता - संस्कृति, अध्यात्म, नस्ल आदि इसके ज्यादा सबल पक्ष हैं। दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया आदि में भारतीय कूटनीति तभी सफल होगी जब भारत के नेता संस्कृति- सभ्यता, धर्म और अध्यात्म के तंतुओं को जोड़ने की प्रबल कोशिश करेंगे। मोदी ने अब तक इस भूमिका को प्रखरता से निभाया है। वैसे भी बांग्लादेश हो या पाकिस्तान अगर वहां  हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन हैं, इनके उपासना स्थान वहां है, हमारे देव स्थानों के कुछ मुख्य केंद्र वहां सदियों पुराने हैं तो उन सबका ध्यान भारत के अलावा और कौन रख सकता है ?

भारत और नेपाल के बाद हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी आज भी बांग्लादेश में है। मोटा- मोटी आकलन है कि एक करोड़ 70 लाख हिंदू वहां हैं । बांग्लादेश के निष्ठावान नागरिक होते हुए भी वे लोग हमेशा अपने ऊपर भारत से अपनत्व वाले हाथ तथा संकट में साथ की उम्मीद करते हैं। मोदी जब जून 2015 में बांग्लादेश की पहली यात्रा पर गए थे तब भी उन्होंने ढाकेश्वरी मंदिर और रामकृष्ण मठ की यात्रा की थी और उसका गहरा प्रभाव हुआ। इस समय भी उनकी यात्रा का तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश सरकार ने जेशोरेश्वरी तक जाने की सड़कें बेहतर कर दी, वहां गेस्ट हाउस रेस्ट हाउस बने, मंदिर और आसपास के भवनों का जीर्णाेद्धार हुआ..... । ऐसा ओरकांडी ठाकुर बारी में भी देखा गया । हरिचंद ठाकुर की जयंती पर हर साल बारोनी श्नान उत्सव मनाया जाता है जिसमें भाग लेने के लिए भारत से भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस यात्रा को आसान बनाने की मांग बरसों से थी और मोदी ने इसे पूरा करने का वायदा किया। प्रधानमंत्री ने वहां एक प्राइमरी स्कूल तथा लड़कियों के मिडिल स्कूल को अपग्रेड करने के साथ कई घोषणाएं की जिनका असर वहां की सरकार और प्रशासन पर भी हुआ होगा। आने वाले समय में बांग्लादेश सरकार की ओर से वहां के संपूर्ण हिंदू समुदाय,मंदिरों, मतुआ समुदाय आदि के लिए कई कार्य किए जाएंगे । यह भी न भूलें कि गोपालगंज जिले के ही तुंगीपाड़ा में बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की समाधि है। मोदी वहां जाने और श्रद्धा सुमन अर्पित करने वाले किसी विदेशी सरकार के पहले मुखिया बने हैं । क्या इसे भी चुनाव से जोड़कर देखा जा सकता है

राजनीतिक नजरिए से हम मोदी के इन कार्यक्रमों को चाहे चुनाव की चासनी में डाल दें या फिर एक हिंदू हृदय सम्राट बनने की आकांक्षा का प्रतीक मान लें, भविष्य के भारत की दृष्टि से इन कदमों के बेहतर परिणाम होंगे। वैसे भी मोदी की यात्रा के दौरान द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में पांच सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में ही स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश ने आपदा प्रबंधन, खेल एवं युवा मामलों, व्यापार और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं। विदेश सचिव हर्षवर्धन सिंहला ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच तीस्ता मुद्दे पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने शेख हसीना को कहा कि भारत तीस्ता जल बंटवारे संबंधी समझौते को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए जो भी हित धारक हैं उन सबसे परामर्श किया जा रहा है। भारत ने फेनी नदी के जल बंटवारे के लिए मसौदे को जल्द अंतिम रूप देने का अनुरोध भी किया। दोनों प्रधानमंत्रियों ने वर्चुअल ही कई परियोजनाओं का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया। इनमें भारत-बांग्लादेश सीमा पर तीन नई सीमायी हाटें और ढाका न्यू जलपाईगुड़ी के बीच नई यात्री रेल मिताली एक्सप्रेस शामिल है। इसका महत्व इस मायने में है कि भारत ने बंगबंधु की जन्मशती और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की स्वर्ण जयंती के मौके पर शुरू करने की घोषणा की ।

वास्तव में मोदी की बांग्लादेश यात्रा में जनता से सरकार तक संबंधों को सुदृढ़ करने तथा दूरगामी परिणामों वाला बनाने के कारक सम्मिलित थे। बांग्लादेश की जनता को भावनात्मक तौर पर जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री के वहां जाने के पूर्व शेख मुजीबुरर्हमान को गांधी शांति पुरस्कार-2020 प्रदान करने की घोषणा हो गई थी। मोदी ने जब अपने हाथों से शेख हसीना को यह पुरस्कार सौंपा तो वहां उपस्थित लोग भाव विह्वल नजर आ रहे थे। इसी तरह कोविड-19 टीका का12 लाख खुराक तथा भारत की ओर से 109 एंबुलेंसों की चाबी सौंप कर मोदी ने बांग्लादेश के लोगों को संदेश दिया कि उनका संबंध दिलों तक फैला है। तो मोदी की इस यात्रा को भारतीय विदेश नीति के एक व्यापक प्रभावी कार्यक्रमों के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर बांग्लादेश की स्वतंत्रता घोषित करने की स्वर्ण जयंती है और उसमें भारत के प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित किए गए तो उन्हें जाना ही चाहिए था। भारत में चुनाव है इसका ध्यान रखते हुए बांग्लादेश ने आयोजन तो किया नहीं। चूंकि चुनाव है इसलिए प्रधानमंत्री वहां जाएं ही नहीं इससे बड़ी आत्मघाती सोच कुछ हो ही नहीं सकती। मोदी ने अपने भाषण में भारत और बांग्लादेश को मिलकर विश्व में जिस निर्णायक और प्रभावी भूमिका की बात की वह लंबी वैश्विक साझेदारी की सोच है। मोदी को भी पता है कि बांग्लादेश में मजहबी कट्टरपंथियों तथा जिहादी आतंकवादियों की एक बड़ी फौज विकसित हो गई है। ये समस्या अकेले बांग्लादेश की नहीं हमारी भी है और हमें मिलकर ही इनका समाधान करना होगा। बांग्लादेश भी उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। उसकी आजादी में मुख्य भूमिका के कारण आज भी एक बड़ी आबादी का भारत के प्रति भावनात्मक रिश्ता है। उसे लगातार मजबूत करते रहने की आवश्यकता है। चीन की बांग्लादेश में आर्थिक और रक्षा संबंधी गतिविधियां हमारे लिए चिंता और चुनौतियां हैं लेकिन केवल उन पर फोकस करने वाली कूटनीति से हम सामना नहीं कर सकते। राजनीतिक - आर्थिक - सामरिक के साथ-साथ सभ्यता - संस्कृति, नस्लीय एकता का संदेश देने वाले पहलुओं पर पूरा फोकस करते हुए ही हमारा संबंध ज्यादा विश्वास के साथ सुदृढ़ हो सकता है। मोदी ने बांग्लादेश की यात्रा से इन्ही लक्ष्य को पाने की कोशिश की है।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली : 110092, मोबाइल #9811027208, 8178547992


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