बुधवार, 24 मार्च 2021

यह रक्षक के भक्षक बनने का मामला है

अवधेश कुमार

किसी को कल्पना नहीं रही होगी मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के सामने जिलेटिन वाली स्कॉर्पियो मिलने का मामला इतना बड़ा बवंडर पैदा कर सकता है। पहले इसे आतंकवादियों की करतूत माना गया राजधानी के तिहार जेल में बंद इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकवादी से उसके तार जोड़े गए। छापे में उसके बैरक से दो मोबाइल फोन बरामद हुए जिसका प्रयोग वही करता था। कहा गया कि अंबानी को लिखा पत्र उसी का था। अब इस पर कोई बात नहीं कर रहा है। पूरा मामला घूम कर मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के ईर्द-गिर्द खड़ी हो गई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए के हाथ में आते ही मामला जिस ढंग से परत दर परत खुलता और विस्फोटक बनता जा रहा है वह किसी को अचंभित करने के लिए पर्याप्त है। मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त परमवीर सिंह द्वारा गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाया गया आरोप कि उन्होंने सचिन वाझे को हर महीने 100 करोड़ वसूली के लिए कहा था असाधारण है। अगर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और महाअघारी सरकार के मुख्य रणनीतिकारों ने मान लिया था कि परमवीर सिंह को आयुक्त के पद से हटाने तथा पुलिस प्रशासन में कई फेरबदल के बाद मामले की आंच राजनीतिक नेतृत्व नहीं पहुंचेगी तो उनकी यह सोच गलत साबित हो रही है। परमवीर इस समय भी महानिदेशक स्तर के अधिकारी हैं। इतना बड़ा अधिकारी अपने गृह मंत्री पर बिना किसी आधार और प्रमाण के ऐसा आरोप नहीं लगा सकता। निस्संदेह परमवीर पर भी प्रश्न खड़ा है कि पुलिस आयुक्त के रुप में उनका कर्तव्य क्या था? उन्होंने अपना कर्तव्य क्यों नहीं निभाया लेकिन यह पूरे मामले का एक पहलू है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपने किस्म की यह पहली घटना होगी। इसके पहले शायद ही कोई बड़ा पुलिस अधिकारी अपने गृह मंत्री के विरुद्ध आरोपों के पुलिंदा के साथ सामने आया हो।

वास्तव मैं परमवीर के आरोपों का मूल स्वर यही है कि मंत्री के आदेश पर मुंबई पुलिस का एक महकमा पूरी तरह आपराधिक गतिविधियों में ही संलीप्त था। इस दौरान अनेक बड़े मामलों को गलत मोड़ दिया गया। अगर आप पत्र को देखें तो उसमें जिस तरह का विवरण है उसे आसानी से झुठलाया नहीं जा सकता। मसलन, वे कह रहे हैं कि देशमुख  अपने सरकारी आवास पर सचिन बाझे और कई पुलिस अधिकारियों को बुलाते थे। इसमें ह्वाट्सऐप चौट का उल्लेख है। कायदे से गृह मंत्री के स्तर पर सचिन बाझे जैसे असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर या एपीआई स्तर के अधिकारी के साथ बैठक करने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। पूर्व पुलिस आयुक्त अगर कह रहे हैं कि वसूली महीनों से हो रही थी तो इसे कैसे खारिज किया जा सकता है? इसमें करीब 1750 पब और बार का जिक्र है और उनके अनुसार जिसे बताते हुए गृहमंत्री कह रहे हैं कि उनसे प्रति महीना दो से तीन लाख लिए जाएं तो 40 लाख के आसपास प्रति महीना इकट्ठा हो जाएगा। इसमें एसीपी सोशल सर्विस ब्रांच, संजय पाटिल का जिक्र है जिसे उन्होंने घर पर बुलाकर हुक्का पार्लर से वसूली पर बात की। देशमुख के निजी सचिव मिस्टर पांडे की उपस्थिति का भी इसमें जिक्र है। देशमुख का खंडन पर्याप्त नहीं है।  दादरा और नागर हवेली के सांसद मोहन डेलकर की मौत के मामले में गृह मंत्री की ओर से लगातार आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज करने के दबाव तक के अति गंभीर आरोप भी हैं।

कुल मिलाकर पूरे मामले के कई पहलू हो जाते हैं। आरंभ में इस घटना की जांच महाराष्ट्र आतंक विरोधी दस्ते एटीएस को दिया गया था। परमवीर के आरोपों पर आपका चाहे जो मत हों इससे एटीएस की जांच में कोई प्रगति क्यों नहीं हो सकी और एनआईए के आने के बाद क्यों पूरा मामला खुलता जा रहा है इसका जवाब देश को मिल गया है। अगर पुलिस स्वयं ही साजिश में शामिल हो तथा सरकार या राजनीतिक नेतृत्व का उसे किसी तरह का वरदहस्त प्राप्त हो तो फिर  ऐसे ही होगा। बड़े - बड़े पूर्व पुलिस अधिकारियों को यह देखकर चक्कर आ रहा था कि एक निचले स्तर का पुलिस अधिकारी सचिन वाझे आखिर इतने उच्च स्तरों के मामले की जांच कैसे कर रहा था। एनआईए की जांच से इतना तो साफ हो गया है कि पूरे मामले की साजिश पुलिस मुख्यालय तथा सचिन बाझे के घर पर ही रची गई। आगे जांच में मंत्रियों और नेताओं के नाम भी सामने आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। मनसुख और उसका परिवार दुर्भाग्यशाली साबित हुआ। उसका स्कॉर्पियो वापस नहीं आएगा यह मालूम होने के बावजूद उसने वाझे को चाबी थमाई। जिस स्थिति में उसकी मृत्यु हुई उसे आत्महत्या मानना किसी के लिए कठिन है। वास्तव में वह इस साजिश का एक मुख्य गवाह हो सकता था, इसलिए यह संदेह अब सच्चाई बनता दिख रहा है कि मनसुख की हत्या कर फेंक दिया गया।

यह पहले से ही लग रहा था कि सचिन बाझे इस मामले में अकेले नहीं हो सकता। इसमें राजनीतिक नेतृत्व और बड़े अधिकारियों की भूमिका होगी। देश के सबसे बड़े उद्योगपति के घर के बाहर जिलेटिन वाली गाड़ी खड़ा कर उसे दबाव में लाने का दुस्साहस एक छोटा पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता। इसलिए परमवीर सिंह की शिकायत बेशक इस समय आरोप हैं लेकिन इसमें दम है। वैसे भी बाझे वसूली के मामले में पुलिस सेवा से बाहर हो गया था। उसने पूरी कोशिश की और जब उसकी पुनर्बहाली नहीं हुई तो वह शिवसेना में शामिल हो गया। डेढ़ दशक से ज्यादा समय बाद उद्धव सरकार में पुलिस में उसकी वापसी होती है और वह भी पीआईयू यानी अपराध जांच इकाई में। आप देख लीजिए, टीआरपी में हेरफेर के आरोप, अर्णव गोस्वामी, कंगना रनौत आदि कई बहुचर्चित मामले उसके हाथों ही दिए गए। यह साफ है कि राजनीतिक नेतृत्व का उससे सीधा संपर्क और संवाद नहीं होता या उसे संरक्षण हासिल रहता तो  उस स्तर के अधिकारी को ऐसे मामले नहीं दिए जा सकते हैं। जिस तरह की लग्जरी गाड़ियों का उपयोग करता था वह बड़े पुलिस अधिकारियों के साथ मंत्रियों और नेताओं को भी पता रहा होगा।। इस परिप्रेक्ष्य में परमवीर सिंह का यह कहना सही लगता है कि सीधे गृह मंत्री से संबंध होने के कारण वह कई बार उन्हें भी नजरअंदाज करके काम करता था। यह अलग बात है कि एक पुलिस आयुक्त होकर उन्होंने क्यों यह सब सहन किया इसका जवाब उन्हें देना होगा।

यह इसका एक और पहलू है। चूंकी बड़े से बड़े पुलिस अधिकारियों का कैरियर सरकार के हाथों है, इसलिए वह चाहे - अनचाहे उनके गैर कानूनी और असंवैधानिक आदेशों, इच्छाओं, कदमों, फैसलों का समर्थन करने या उसके अनुसार कार्रवाई करने के लिए मजबूर रहता है। स्वाभिमानी और ईमानदार पुलिस अधिकारी इसका विरोध कर सकता है या ऐसा करने से इंकार कर सकता है लेकिन उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है। उसका स्थानांतरण कर दिया जाएगा या फिर उसे कई तरीकों से उत्पीड़ित किया जाएगा। इसलिए बड़े स्तर के अधिकारी भी राजनीतिक नेतृत्व के सामने नतमस्तक रहते हैं। ज्यादातर आराम से उनके साथ मिलकर हर तरह का काम करते हुए मनचाहा पद, और पदोन्नति पाते हैं। यह हमारी व्यवस्था की बहुत बड़ी त्रासदी है। वास्तव में यह रक्षक के ही भक्षक बन जाने का मामला है। सोचिए, यह कैसी व्यवस्था है जिसमें पुलिस के बड़े अधिकारी स्वीकार रहे हैं कि उनके जानते हुए उनकी पुलिस गुंडों , दादाओंअपराधियों की तरह वसूली कर सरकार तक पहुंचा रही है, अनेक गैर कानूनी काम कर रही है और वे उसे चुपचाप देखने और सहभागिता करने को विवश हैं?

निश्चित रूप से इस विस्फोटक आरोप के राजनीतिक परिणाम होंगे। उद्धव सरकार का इकबाल अब खत्म मानिए। सारे विवादित और बहुचर्चित मामले एवं पुलिस की कार्रवाइयां संदेह के घेरे में आ गए हैं। यह तो संभव नहीं कि पुलिस और मंत्री के बीच ऐसी या इस तरह की अन्य दुरभीसंधियों की जानकारी महाअघारी के वरिष्ठ नेताओं को बिल्कुल नहीं हो। पत्र में तो मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचाने का संकेत है। यह भी सवाल उठता है कि इतनी वसूली अगर हो रही थी तो क्या अकेले देशमुख उसे रख रहे थे? आखिर उसमें और किस किस को हिस्सा मिल रहा था? कोई अकेले ऐसा नहीं कर सकता। गलत तरीके से मुकदमों और गैरकानूनी पुलिस कार्रवाइयां अंधेरे में तो हो नहीं रही थी। इसमें दूसरों की भी संलिप्तता निश्चित रूप से है। जो संलिप्त नहीं थे उनने आवाज क्यों नहीं उठाई? सच कहें तो महाअघारी के किसी नेता या मंत्री के लिए इन प्रश्नों का अब वैसा जवाब देना कठिन है जिससे आम लोग सहमत हो सके। जाहिर है, उच्च स्तरीय व्यापक दायरों वाली स्वतंत्र जांच से ही कुछ हद तक सच्चाई सामने आ सकती है। हां, महाराष्ट्र में पुलिस , प्रशासन के साथ राजनीति में बहुआयामी सफाई की आपातकालीन आवश्यकता एक बार फिर रेखांकित हुई है। यहां भी प्रश्न वही है कि आखिर इसे कैसे और कौन अंजाम देगा?

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर काम्प्लेक्स, दिल्ली : 110092, मोबाइल #9811027208, 8178547992



मंगलवार, 23 मार्च 2021

बुलंद मस्जिद कॉलोनी में बन रही डिस्पेंसरी का दौरा किया दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग चेयरमैन जाकिर खान ने

मो. रियाज़

नई दिल्ली। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान ने बुलंद मस्जिद कॉलोनी में बन रही डिस्पेंसरी का दौरा किया। इसमें मौके पर उनके साथ दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य नैंसी बारर्लो, एडवाइजरी कमेटी के सदस्य नियाज अहमद उर्फ पप्पू मंसूरी, पीस कमेटी के सदस्य फिरदौस अहमद, एडीशनल डायरेक्टर (प्लानिंग) डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विस, सीडीएमओ डिस्ट्रिक्ट नार्थ ईस्ट, सुपरिटेंडेंट इंजीनियर, सिविल सर्कल, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नॉर्थ ईस्ट, एसडीम सीलमपुर, एसडीएम हेड क्वार्टर नॉर्थ ईस्ट के प्रतिनिधि आदि मौजूद थे।

बुलंद मस्जिद कॉलोनी में पहुंचने पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जाकिर खान का लोगों ने फूलों या गुलदस्ता देकर स्वागत किया। उसके बाद चेयरमैन जाकिर खान को पूरी डिस्पेंसरी के बारे में सभी विभागों से आए प्रतिनिधियों ने जानकारी द कि कहाँ क्या परेशानी आ रही है और किन कारणों से डिस्पेंसरी का काम रुका हुआ है। चेयरमैन साहब को बताया गया कि यह कार्य फंड न मिलने के कारण रुका हुआ हुआ है। अधिकारियों ने यही बताया कि यहां पर लगभग 70% कार्य पूरा हो चुका है परंतु अभी भी मुख्य कार्य सर्विस रोड, पानी व सीवर की समस्या, पार्किंग का न होना है। उन्होंने बताया कि जो लेआउट प्लान पहले दिया गया था उसमें भी कुछ बदलाव किया गया है जिसके लिए उच्च अधिकारियों से बातचीत चल रही है।

इस मौके पर दिल्ली माइनॉरिटी कमिशन के चेयरमैन जाकिर खान ने सभी अधिकारियों से इस कार्य को जल्द से जल्द पूरा करवाने के लिए कहा। उन्होंने यह भी कहा कि जहां पर भी उनकी जरूरत हो उन्हें बताएं, हम सब मिलकर अपने स्तर पर ज्यादा से ज्यादा से काम कर सकते हैं जो जिस लायक है वह अपने स्तर पर उस कार्य को करें और कहीं परेशानी आए तो मुझे बताएं, मैं उस कार्य को अपने स्तर पर करवाने की कोशिश करूंगा।

इस मौके पर कॉलोनी के काफी सारे समाजसेवी और आम जनता मौजूद थी जिन्होंने जाकिर खान की तारीफ करते हुए कहा कि यह डिस्पेंसरी लगभग 10 सालों से बन रही है पर अभी तक बन नहीं पाई है। डिस्पेंसरी का काम लगभग 4 वर्ष से ऐसे ही अधूरा पड़ा है जिस कारण लोगों को काफी परेशानी हो रही है अगर यह बन जाती है तो लोगों को इलाज करवाने के लिए दूसरी जगह नहीं जाना पड़ेगा।

अधिकारियों ने भी आश्वासन दिया कि हम आने वाले 8 से 10 महीने में इस डिस्पेंसरी को पूरी तरह से तैयार करवा देंगे ताकि जनता को जो परेशानी हो रही है वह आगे ना हो। इस मौके पर समाजसेवी कमल अरोड़ा, अनिल शर्मा, अब्दुल जब्बार, मोहम्मद जमाल, इजहार सलमानी, फैजी खान, रिहान खान, रिजवान बेकरी वाले, हनीफ उर्फ लल्ला भाई, मन्नान खान आदि लोग मौजूद थे।
































 
 

 

बुधवार, 17 मार्च 2021

फैसले से साबित हुआ बाटला हाउस मुठभेड़ आतंकवादियों के खिलाफ थी

अवधेश कुमार

बहुचर्चित और विवादित बाटला हाउस मुठभेड़ का फैसला आ गया है। दिल्ली के साकेत न्यायालय ने अपराध के दुर्लभों में दुर्लभतम करार देते हुए इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी आरिज खान को फांसी की सजा सुना दिया है।न्यायालय ने आरिज को दोषी करार देते हुए लिखा है कि अभियोजन द्वारा पेश चश्मदीद गवाहों, दस्तावेजों एवं वैज्ञानिक सबूत उस पर लगे आरोपों को साबित करते हैं। इसमें संदेह की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। न्यायालय ने यह भी साफ कहा है कि आरिज व उसके साथियों ने इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या की थी और पुलिसकर्मियों पर गोली चलाई थी। न्यायालय के अनुसार आरिज खान अपने चार साथियों मोहम्मद आतिफ अमीन, मोहम्मद साजिद, मोहम्मद सैफ एवं शहजाद अहमद के साथ बाटला हाउस में मौजूद था। न्यायालय का फैसला उन लोगों को करारा प्रत्युत्तर है जो शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बलिदान को कमतर करते हुए पूरे मामले को पुलिस द्वारा गढ़ा गया एवं मुठभेड़ को फर्जी करार देने का अभियान लगातार चलाए हुए थे। करीब साढ़े 12 वर्षों बाद आया यह फैसला हम सबको उद्वेलित व संवेदित करने के लिए पर्याप्त है। वैसे 25 जुलाई 2013 को न्यायालय ने शहजाद को आजीवन कारावास की सजा देकर बाटला हाउस मुठभेड़ को सही करार दिया था। बावजूद इस पर शोर कम नहीं हुआ। याद करिए 13 सितंबर 2008 को जब दिल्ली में करोल बाग, कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में एक पर एक श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए तो कैसी स्थिति बनी थी? उन धमाकों में 30 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए थे। यह तो संयोग था कि पुलिस ने समय रहते कनॉट प्लेस के रीगल सिनेमा, इंडिया गेट एवं संसद मार्ग से चार बमों को धमाके से पहले बरामद कर निष्क्रिय कर दिया था अन्यथा आतंकवादियों ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

पुलिस के आरोप पत्र और फैसले को देखें तो इसमें पूरी घटना का सिलसिलेवार वर्णन है। पुलिस की जांच से पता लग गया था कि इंडियन मुजाहिद्दीन या आईएम के आतंकवादियों ने इन घटनाओं को अंजाम दिया है और वे सभी बाटला हाउस के एल 18 स्थित फ्लैट नंबर 108 में छिपे हैं। इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की टीम 19 सितंबर 2008 की सुबह सादे कपड़ों में सेल्समैन बनकर आतंकियों को पकड़ने के लिए पहुंची। इन्होंने ज्योंही दरवाजा खटखटाया अंदर से गोली चलनी शुरू हो गई। गोलीबारी में दो आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद सज्जाद मारे गए, मोहम्मद साहब और आरिफ खान भाग निकलने में सफल हो गए जबकि जीशान पकड़ में आ गया। मोहन चंद शर्मा वही शहीद हो गए थे। जैसे ही पुलिस ने लोगों की धरपकड़ शुरू की व्यापक विरोध शुरू हो गया जिसमें राजनीतिक दल, एनजीओ, एक्टिविस्ट, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र संगठन- शिक्षक संगठन शामिल थे। जो मोहन चंद शर्मा बहादुरी से लड़ते हुए हमारी आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बलिदान हो गए उनको  दोषी और अपराधी साबित किया जाने लगा। यह भी आरोप लगा कि पुलिस वालों ने ही उनको गोली मार दी। हालांकि ये लोग भी नहीं बता सके कि आखिर आरिज खान है कहां। ग्रेटर कैलाश के एम ब्लॉक मार्केट स्थित पार्क में आरिफ ने ही बम रखा था।

दिल्ली विस्फोट एक व्यापक साजिश का हिस्सा था। योजना बनाकर विस्फोटक तैयार किया गया।  मोहम्मद कैफ एवं खालिद ऊर्फ कोडी ने कर्नाटक के उड्डपी से विस्फोट की कुछ सामग्रियां लाकर दिल्ली में आरिज एवं आतिफ अमीन को प्रदान किया। आरिज एवं साजिद ने लाजपत राय मार्केट और कई बाजारों से विस्फोटक के शेष सामान खरीदे। सोचिए, इनक ये कितने शातिर थे और हिंसा और खून से राजधानी को दहलाने का उन्माद कितना गहरा था। जुनेद का नाम पुलिस के पास नहीं था। मोहम्मद सैफ और शहजाद अहमद ने पूछताछ में उनका नाम लिया। आरिज बाटला मुठभेड़ के बाद एक महीने तक विभिन्न प्रदेशों में छिपता रहा। इसके बाद अब्दुल सुभान कुरैशी ऊर्फ तौकीर, जो इंडियन मुजाहिद्दीन का सह संस्थापक था, के साथ पहचान छुपाकर रहने लगा। दोनों सऊदी अरब भी चले गए लेकिन आई एम के इकबाल भटकल व रियाज भटकल ने पाकिस्तान से उन्हें निर्देश दिया कि भारत जाकर आइएम एवं सिमी को नए सिरे से संगठित करो। इसके बाद दोनों 2018 के मार्च से भारत आने जाने लगे। इसीमें दोनों दबोचे गए।  यह भी ध्यान रखने की बात है कि आरिज एवं कुरैशी को उनके किसी रिश्तेदार ने शरण नहीं दिया था। दोनों भागते फिर रहे थे। वे नेपाल गए जहां उन्होंने जाली दस्तावेजों से नेपाल की नागरिकता प्राप्त की तथा वहां के एक युवक निजाम खान के सहयोग से किराए पर घर ले लिया। उन्होंने वहां मतदाता पहचान पत्र एवं पासपोर्ट भी बनवा लिए तथा नेपाल की एक युवती से शादी भी कर ली।

इस तरह के आतंकवादियों के पक्ष में अगर देश के बड़े लोग खड़े हो जाएं तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। आज इनके पक्ष में आवाज उठाने वालों से देश चाहेगा कि वे सामने आएं और बताएं कि न्यायालय के फैसले के बाद उनका क्या कहना है। दिल्ली पुलिस की जगह न्यायिक जांच की मांग की जा रही थी। मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय तक ले जाया गया। इनकी अपील पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दो महीने के भीतर मामले की जांच पूरी करने को कहा था। आयोग ने दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देते हुए मुठभेड़ को वास्तविक माना। इसके बाद न्यायिक जांच की मांग खारिज कर दी गई। इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। वहां मामला खारिज हो गया। कोई यह नहीं कह सकता कि इस मामले की कानूनी लड़ाई में आरोपितों की ओर से कहीं भी कोई कमी रही। सच तो यह है कि न्यायालय में जितना संभव था वकीलों ने दोषियों को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। उदाहरण के लिए आरिज की तरफ से पेश अधिवक्ता ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि इंस्पेक्टर शर्मा को कौन सी गोली लगी है। इसके उत्तर में पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश किया गया जिससे साबित हुआ कि आरिज एवं उसके साथियों द्वारा चलाई गई गोलियों से ही इंस्पेक्टर शर्मा की मौत हुई। यह भी दलील दी गई कि ये तो वहां उपस्थित ही नहीं थे। यहीं पर वैज्ञानिक साक्ष्य के रुप में पुलिस की ओर से आरिज की आवाज के नमूने की जांच रिपोर्ट पेश की गई। इससे पता चला कि घटना के दौरान आरिज ने आतिफ अमीन के मोबाइल नंबर 9811 00 43 09 से कॉल किया था। इससे भी उसके घटनास्थल पर होने की पुष्टि हुई। गिरफ्तार मोहम्मद सैफ ने भी आरिज के होने की बात कबूल की। घटनास्थल से आरिज की तस्वीरें, उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र आदि की बरामदगी को भी चुनौती दी गई लेकिन यह नहीं बता सके कि आखिर पुलिस को ये सब मिला कहां से? इंस्पेक्टर शर्मा के गोली लगने के स्थान, उनके सूराख पर भी प्रश्न उठाए गए। अंततः साबित हुआ कि उनको लगी गोली से बने घाव उनके कपड़े पर हुए सुराख से मेल खाते हैं तथा गिरे आंसू उनके घाव को दर्शाते हैं। वैसे फैसला आने के पहले ही दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी करनैल सिंह ने, जो उस समय विशेष शाखा के प्रमुख थे बाटला हाउस एन एनकाउंटर रूदैट शूक द नेशन नामक पुस्तक में इस बात का सिलसिलेवार और विस्तार से जिक्र किया कि किस तरह से दिल्ली धमाकों के सिलसिले में विशेष शाखा को बाटला हाउस में आतंकवादियों के छिपे होने का पता चला था, कैसे कार्रवाई हुई और कैसे एक सही मुठभेड़ को फर्जी करार देने की कोशिश हो रही है।

वास्तव में दिल्ली एवं देश के आम लोगों को पुलिस की जांच पर कोई संदेह नहीं था लेकिन उस वर्ग ने इसे संदेहास्पद बना दिया, जो प्रायः आतंकवादी घटनाओं को संदेह के घेरे में लाता है, पकड़े गए संदिग्ध आतंकवादियों को मासूम बताने के लिए बनावटी तथ्यों और तर्कों का जाल बुनता है तथा पुलिस एवं सरकारों को कठघरे में खड़ा करता है। अभी मामला ऊपर के न्यायालयों में जाएगा। वर्तमान फैसले के आलोक में ऐसे लोगों से फिर निवेदन किया जा सकता है कि सुरक्षा के मामले में राजनीति और तथाकथित विचारधारा के नाम पर इस तरह का वितंडा आत्मघाती हो सकता है।

अवधेश कुमार, ईरू30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली-110092, मोबाइल #9811027208, 8178547992


शुक्रवार, 12 मार्च 2021

ये दृश्य कांग्रेस के बुरे भविष्य की द्योतक हैं

अवधेश कुमार

कांग्रेश की दशा देखकर उसके कट्टर समर्थक भी निस्संदेह हताश हो रहे होंगे। पार्टी के लिए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। आपने गौर किया या नहीं, केंद्रीय नेताओं में केवल  राहुल गांधी तमिलनाडु से पुडुचेरी और केरल तक के चुनाव प्रचार में दिख रहे हैं। प्रियंका वाड्रा भी असम में दिखी हैं। दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के रूप में पहचान रखने वाले कई चेहरे एक साथ जम्मू में एक मंच पर दिखे। उसके बाद अन्य कार्यक्रमों में या सोशल मीडिया से हमें उनके विचार सुनने को मिल रहा है। जिस समय संपूर्ण पार्टी को एकजुट होकर, जान-प्राण लगाकर करो या मरो की भावना से विधानसभा चुनाव अभियान चलाना चाहिए था उस समय इस तरह के परिदृश्य कांग्रेस के भविष्य को लेकर निराशा ही बढ़ाएगा। भारतीय राजनीति की त्रासदी और विडंबना दोनों है कि लंबे समय तक किसी पार्टी में काम करने वाले नेता अगर पार्टी के हित का ध्यान रखते हुए कुछ ऐसे प्रश्न उठाते हैं जो तात्कालिक नेतृत्व के थोड़ा भी विरुद्ध जाए तो उसे पार्टी विरोधी, विरोधी पार्टियों के इशारे पर काम करने वाला, विश्वासघाती और ना जाने क्या-क्या करार दिया जाता है। कांग्रेस के अंदर नेताओं के जिस तबके को जी 23 नाम दिया गया है उनमें ऐसे कौन है जिनकी पहचान एक कट्टर कांग्रेसी कि नहीं रही है? किंतु गुलाम नबी आजाद के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्हें पार्टी से निकालने की मांग की जा रही है। कहा जा रहा है कि वे भाजपा में जाने वाले हैं। अलग-अलग राज्यों में दूसरे नेताओं के खिलाफ भी पार्टी का एक समूह, जो 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी परिवार के प्रति निष्ठा रखता है उसका रवैया लगभग ऐसा ही है। राज्यसभा में पार्टी के उप नेता आनंद शर्मा ने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी जैसे सांप्रदायिक व्यक्ति और उनके संगठन इंडियन पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन को पार्टी के मूल सिद्धांतों के विपरीत क्या बताया उन पर भी हमले शुरू हो गए। अधीर रंजन चौधरी ने उन पर जिस तरह का जवाबी हमला किया, उनका उपहास उड़ाया उसे यहां दुहराने की आवश्यकता नहीं। 

कायदे से जब ऐसे वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव, संगठन में बदलाव, स्थाई अध्यक्ष आदि की मांग पत्र लिखकर सार्वजनिक तौर पर की तो उसे सकारात्मक दृष्टिकोण से लिया जाना चाहिए था। कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व था कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर संगठन चुनाव, महाधिवेशन आदि की तिथि तय करते। अगर ऐसा हुआ होता तो निश्चित रूप से नौबत यहां तक नहीं आती। कांग्रेस इस समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से सीधे मोर्चा लेने में दुर्बल साबित हो रही है। ज्यादातर चुनावों में कांग्रेस इनका मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। इसके कारणों की पड़ताल करते हुए नीति, रणनीति और नेतृत्व में आवश्यकतानुरूप बदलाव करने का माद्दा दिखाया जाना अपरिहार्य था और है। जब ऐसा नहीं हुआ और इसकी संभावना तक नहीं दिखी तभी नेताओं का धैर्य जवाब देने लगा। यह भी विचारणीय है कि इतने वरिष्ठ नेताओं को सोशल मीडिया के माध्यम से या फिर अन्य मंचों से अपनी बात क्यों रखनी पड़ रही है? इसका मतलब यही है कि महत्वपूर्ण चुनावों की घोषणा के बावजूद कार्यकारी अध्यक्ष ने चुनावी अभियान और रणनीति पर इन सबके साथ विचार-विमर्श तथा इनकी भूमिका तय करने की पहल नहीं की है। आखिर आजाद के मार्गदर्शन में चलने वाले ग्लोबल गांधी संगठन की जम्मू में शांति सम्मेलन की आवश्यकता क्यों पड़ी होगी? अगर वे लोग चुनाव में सक्रिय होते तो उनके पास परिणाम आने तक समय ही नहीं मिलता। इसी तरह अगर राज्यों में गठबंधनों पर पार्टी के अंदर विचार-विमर्श होता तो आनंद शर्मा को ट्विटर के माध्यम से अपनी बात रखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती।

 कांग्रेस के पास लोकसभा में जो 53 सीटें हैं उनमें से 29 इन्हीं प्रदेशों से हैं। इन राज्यों में कांग्रेस के विधानसभा सदस्यों की संख्या पिछले चुनाव में 111 थी। सभी स्थानों को मिला दे तो विधानसभा सीटों के अनुसार कांग्रेस तीसरे तथा लोकसभा के अनुसार पहले नंबर की पार्टी है। दक्षिणी राज्य वैसे भी संकट के समय कांग्रेस को संभालते रहे हैं। 1977 में भले उत्तर भारत से कांग्रेस साफ हो गई लेकिन दक्षिण भारत ने इंदिरा गांधी का साथ दिया था। अगर 2004 और 2009 में कांग्रेस अपने नेतृत्व में यूपीए की सरकार बना सकी तो उसके पीछे दक्षिण के राज्यों से प्राप्त अपनी और साथी दलों की सीटों का मुख्य योगदान था। आज अगर कांग्रेस संसद में कमजोर है तो उसका कारण भी इसी में निहित है। वस्तुतः इन चुनावों में हताशा को पीछे रखकर कांग्रेस को जी जान से जुट जाना चाहिए था। यहां सोच यह है कि एकमात्र राहुल गांधी का चेहरा ही जनता और पार्टी के सामने दिखना चाहिए। इससे भविष्य में उनके नेतृत्व का समर्थन आधार मजबूत होगा। यानी इन राज्यों में कांग्रेस को अगर सफलता मिलती है तो उसका पूरा श्रेय परिवार  को मिलेगा। इसके बाद उनकी नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न उठाने वालों की आवाजें कमजोर हो जाएंगी। 

 केरल में हमेशा लड़ाई वाम मोर्चे वाले एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच रहा है। हर चुनाव में सत्ता की अदला-बदली होती रही है। चूंकि इस समय वाममोर्चा सत्ता में है इसलिए कांग्रेसी नेतृत्व वाले मोर्चे के सत्ता में लौटने की संभावना राहुल गांधी और उनके रणनीतिकार को दिख रही होगी। लोकसभा चुनाव में केरल ने 15 सीटें कांग्रेस को दी। भाजपा अभी वहां इतनी मजबूत नहीं दिखती है कि कांग्रेस के सत्ता में आने के मार्ग को बाधित कर सके। असम में भी मतदाताओं के पास दो ही विकल्प हैं। या तो वे भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ जाएं या कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के। इसमें भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद सोनिया, राहुल और उनके रणनीतिकार कर रहे होंगे। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक गठबंधन की अलोकप्रियता का प्रमाण 2019 लोकसभा में मिल गया था। उसे एक सीट पर सीमित होना पड़ा। शेष सारी सीटें द्रमुक गठबंधन ने जीत ली। एक साथी दल होने के नाते कांग्रेस को द्रमुक के सहारे अच्छी सीट पाने की उम्मीद हो सकती है। इसमें सोनिया गांधी परिवार के समर्थक चाहते हैं कि अन्य नेताओं को परे रखकर राहुल गांधी को पूरे प्रदर्शन का श्रेय मिल जाए तो उनकी दृष्टि से यह स्वाभाविक है। उम्मीद के अनुरूप परिणाम आए तो इन सारे नेताओं पर हमले होंगे तथा सोनिया, राहुल और प्रियंका की जय - जयकार सुनाई देगी। तात्कालिक रुप से उनके लिए यह सही लगे, इसमें कांग्रेस का हित कतई निहित नहीं है। जब भी गहरे संकट में फंसे तो शांत और संतुलित होकर विचार करना चाहिए कि ऐसा हुआ क्यों? आपके अंदर समझ है और ईमानदारी से विचार करेंगे तो सारे कारण स्पष्ट हो जाएंगे। ऐसा हुआ ही नहीं। डर है कि ऐसे मंथन में नेतृत्व की क्षमता पर प्रश्न खड़ा होगा और जवाब देना कठिन हो जाएगा। कोई भी विवेकशील और संतुलित प्रश्न नागवार गुजरेगा।

आखिर आनंद शर्मा ने यही कहा है कि बंगाल में आईपीएफ या ऐसे दूसरे समूहों के साथ गठबंधन कांग्रेस की मूल विचारधारा के विपरीत है। आईपीएफ के प्रमुख पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के अनेक वक्तव्य सामने आए हैं जिनसे साबित हो जाता है कि उनका विचार एवं व्यवहार कट्टर मजहबी सोच से निर्धारित है। असम में बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ से गठजोड़ भी इसी श्रेणी का उदाहरण है। पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय तरुण गोगोई ने अपने कार्यकाल में बदरुद्दीन को कभी कांग्रेस से सटने नहीं दिया। वे उनकी सांप्रदायिक एजेंडा को भली प्रकार जानते थे। किसी तरह कुछ सीटें पा लेने के लिए ऐसे समूहों से गठजोड़ करना डरावने जोखिमों से भरा है। आनंद शर्मा ने कहा है कि गठजोड़ पर विचार करने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई जानी चाहिए थी। तरीका तो यही है। हालांकि ये नेता पहले ऐसे गठजोड़ पर प्रश्न नहीं उठाते थे। इनके रहते भी सेक्यूलरवाद की परिभाषा हमेशा सुविधाओं के अनुरूप दी गई।

बहरहालपरिणाम पिछले विधानसभा चुनावों से  बेहतर हुए तो पूरे देश में ऐसे नेताओं को हाशिए पर डालने तथा सोनिया, राहुल व प्रियंका के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों को प्रश्रय देने की प्रक्रिया शुरू होगी। उसमें कांग्रेस का भविष्य क्या होगा? कांग्रेस का भला नहीं होने वाला। उसका राजनीतिक भविष्य और संकटग्रस्त होगा।

अवधेश कुमार, ईरू30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली रू110092, मोबाइल रू9811027208, 8178547992


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