शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

दिशा रवि की गिरफ्तारी पर बावेला दुर्भाग्यपूर्ण

अवधेश कुमार 

दिशा रवि की गिरफ्तारी क्या हुई हमारे नेताओं को जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया। जरा नजर उठा कर देख लीजिए। ट्वीट दर ट्वीट गिरफ्तारी के विरोध और दिशा रवि के समर्थन में आ गया। पी चिदंबरम देश के गृह मंत्री रहे है। उनके कार्यकाल के दौरान देश में अनेक गिरफ्तारियां आतंकवाद के संदेह में हुईं। इस तरह कितने नेताओं ने सवाल उठाया कि फलां उम्र के या फलां स्तर के किसी व्यक्ति से देश को खतरा कैसे हो सकता है? अगर पूर्व गृह मंत्री कह रहे हैं कि एक कॉलेज की छात्रा से देश को खतरा है तो देश कमजोर आधार पर खड़ा है तो मान लीजिए हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था उससे कहीं ज्यादा दूषित और भ्रमित है जितनी हम कल्पना करते हैं। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। पिछले डेढ़ दो दशकों से जिस भारत को हम देख रहे हैं उसमें हमेशा आतंकवादियों, देशद्रोहियों, हिंसक समूहों से जुड़े लोगों, माओवादियों, अलगाववादियों आदि के समर्थन में हर स्तर पर बड़ा समूह खड़ा होता रहा है। अगर. ऐसा ना हो तो जरुर आश्चर्य व्यक्त करना चाहिए। इसलिए दिशा रवि की गिरफ्तारी एवं कुछ अन्य सोदिग्धों के खिलाफ कार्रवाई पर हो रही विरोधी प्रतिक्रियाओं को भारत की स्वाभाविक प्रकृति मानकर चलना होगा। 

हालांकि राहुल गांधी, प्रियंका बाड्रा, जयराम रमेश, पी चिदंबरम, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, अखिलेश यादव, शशि थरूर, ममता बनर्जी आदि नेताओं को इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि दिल्ली पुलिस द्वारा छानबीन के आधार पर सामने लाए जा रहे तथ्य सही हैं या नहीं? दिशा ने इतना तो न्यायालय में भी स्वीकार किया है कि उसने टूलकिट में हल्का संपादन किया था। निकिता ने भी कई बातें स्वीकार की है। विडम्बना देखिए कि इमरान खान की ओर से आया ट्वीट भी दिशा रवि का समर्थन करता है। खालिस्तान की विचारधारा और हिंसक गतिविधियों में पाकिस्तान की सर्वप्रमुख भूमिका रही है। उसे तो समर्थन करना ही है। इस मामले में तो उसकी संलिप्तता की गंध भी मिल रही है। यह सामान्य सिद्धांत है कि न्यायालय जब तक किसी को दोषी करार न दे हम उसको दोषी नहीं मानते। लेकिन जो कुछ प्रत्यक्ष दिख रहा है और पुलिस छानबीन से भी जैसे तथ्य सामने आ रहे हैं उनकी निष्पक्ष विवेचना तो की ही जाएगी। दिल्ली पुलिस ने पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को ग्रेटा थनबर्ग द्वारा किसान आंदोलन को लेकर शेयर की गई टूल किट के मामले में मुख्य भूमिका निभाने वालों में से एक मानकर गिरफ्तार किया। निकिता जैकब और शांतनु जैसे कई लोगों की संलिप्तता सामने आ चुकी है। इन दोनों को न्यायालय ने तत्काल गिरफ्तारी से राहत दे दी है, लेकिन यह अंतिम नहीं है। अभी पूरे मामले में अनेक गिरफ्तारियां होंगी। जैसे-जैसे परतें खुलेंगी अनेक छिपे हुए चेहरे सामने आएंगे और इसी के साथ विरोधी प्रतिक्रियाएं भी हमको सुनने को मिलेगी। 


दिल्ली पुलिस का कहना है कि दिशा रवि, निकिता और शांतनु ने ही स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग को टूल किट मुहैया कराई थी। दिशा रवि ने एक वॉट्सएप ग्रुप शुरू किया था जिसमें टूलकिट डॉक्युमेंट तैयार करने के लिए कई लोगों के साथ समन्वय किया गया था। पुलिस ने जो तथ्य सामने लाए हैं उनके अनुसार टूलकिट को निकिता जैकब, शांतनु और दिशा रवि ने साथ मिलकर तैयार किया था। इस गूगल डॉक्युमेंट को शांतनु की ओर से बनाई गई ईमेल आईडी के जरिए तैयार किया गया था। 26 जनवरी को लाल किला की हिंसा सबको नागवार गुजरा। हिंसा न रोक पाने के लिए सरकार को आप जिम्मेदार बता सकते हैं लेकिन हिंसा की साजिश के पीछे के संदिग्ध चेहरे, जिनकी संलिप्तता और सक्रियता के कुछ स्पष्ट सबूत मिले हैं, अगर गिरफ्तार होते हैं तो आपको समस्या है। इनसे पूछा जाना चाहिए कि खालिस्तान का झंडा उठाने वाला भारत विरोधी पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन के साथ काम करना या सक्रिय संपर्क रखना देश के विरुद्ध अपराध माना जाएगा या नहीं? अगर माना जाएगा तो फिर दिशा रवि, निकिता और शांतनु का उसके साथ संपर्क सामने है। पोएटिक फाउंडेशन का सह संस्थापक खालिस्तान की विचारधारा फैलाने का काम करने वाले भारत विरोधी मो धालीवाल के साथ निकिता, दिशा और शांतनु की जूम मीटिंग भारत में सकारात्मक योगदान के लिए तो नहीं हुआ होगा। इसमें 70 लोग शामिल थे। धालीवाल खुलेआम कहता है कि मैं खालिस्तानी हूँ और खालिस्तान आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। यह प्रश्न तो उठेगा कि पर्यावरण एक्टिविस्ट खालिस्तान समर्थक के साथ मीटिंग में क्या रहे थे ? इसका एजेंडा 26 जनवरी के विरोध को वैश्विक करना था। 

 टूलकिट भेजने वालों की सूची में भजन सिंह भिंडर उर्फ इकबाल चौधरी और पीटर फ्रेडरिक का नाम भी है। भिंडर खुलेआम खालिस्तान की बात ही नहीं करता, उसके लिए हिंसा की भी बात और प्रयास करता है। ये दोनों आईएसआई के मोहरे हैं और हर सरकार में इनसे सचेत रहने की खुफिया रिपोर्ट रहीं हैं। पीटर को भी यूपीए सरकार ने ही रडार पर रखा और भिंडर को भी। क्या यह सब गहरी साजिश की ओर संकेत नहीं करता? दिशा ने ही ग्रेटा थनबर्ग को बताया कि उनका टूलकिट सार्वजनिक हो गया है। इसके बाद ग्रेटा में उस टूलकिट को डिलीट किया था। दिशा ग्रेटा बातचीत सामने आया है। दिशा ग्रेटा को कह रही है कि मुझे आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी निरोधक कानून या यूपीए का सामना करना होगा। दिशा ने ह्वाट्सऐप ग्रूप भी डिलीट कर दिया। जिस टूल किट में किसान विरोध प्रदर्शन का लाभ उठाकर उसको किस ढंग से प्रचारित करने, आक्रामक बना देने की पूरी कार्ययोजना हो उसके निर्माता, उसका संपादन करने वाले, फॉरवर्ड कर संबंधित लोगों तक पहुंचाने वाले तथा जारी होने के बाद उस पर नजर रखने वाले दोषी नहीं हो सकते ऐसी धारणा भारत में ही संभव है। देश विरोधी संगठन भी तात्कालिक रूप से अपना निशाना सरकारों को ही बनाती हैं। पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन, आस्क इंडिया ह्वाई डॉट कॉम जैसे वेबसाइट भले सतही तौर पर नरेंद्र मोदी सरकार विरोधी अभियान चलाते दिखते हों, आप गहराई से इनका स्वर देखेंगे तो यह भारत विरोध में परिणत हो जाता है। आंतरिक राजनीति में सरकार से मतभेद, उसका विरोध स्वाभाविक है। सीमा के बाहर सरकार ही देश की प्रतिनिधि है। 

कोई भी देश अगर अंदर बाहरी शक्तियों या देश विरोधी शक्तियों के विरुद्ध एकजुट रहे तो उसका बाल बांका असंभव है। देश विरोधी, हिंसक अलगाववादी समूह या व्यक्ति तभी सफल होते हैं जब देश के अंदर से साथ मिलता है। कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन हमारा अपना मामला है। हम उसके समर्थक और विरोधी हो सकते हैं। भारत विरोधी शक्तियां उसका लाभ उठाएं, विदेशों के ऐसे संगठनों से उनका संपर्क रहे, उनके लिए काम करें, उनकी तैयारी में योगदान करें तो फिर यह नहीं देखा जाएगा कि ऐसा करने वाले की उम्र, जाति, लिंग क्या है? विश्व भर में ना जाने 18 वर्ष से कम उम्र के कितने आतंकवादी भीषण आतंकवादी घटनाओं में संलिप्त पाए गए हैं। जम्मू कश्मीर में ही पाकिस्तान से घुसपैठ कराए गए कई आतंकवादी किशोर उम्र के मिले हैं। तो क्या उनको आतंकवादी नहीं माना जाएगा? क्या उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी? दिशा तो वैसे भी 22 वर्ष की हैं। वो ग्रेटा थनबर्ग द्वारा स्थापित संगठन  फ्राईडेज फॉर फ्यूचर  की भारत प्रमुख हैं। पर्यावरण के झंडाबरदार के रूप में उनके लेख प्रकाशित होते हैं, बयान सामने आते हैं। देश - विदेश में व्यापक संपर्क रखने वाली, सक्रिय रहने वाली एक युवा लड़की देश विरोधी अपराध कर ही नहीं सकती ऐसे मानने वालों की सोच पर तरस आता है। कभी नहीं भूलना चाहिए कि न्यायालय ने इनको पुलिस रिमांड दिया है। अगर केस कमजोर होता है तो न्यायालय सामान्यता न्यायिक हिरासत में संदिग्ध को भेजती है। इनसे पूछताछ के बाद आंदोलन का आड़ लेकर की जा रही साजिशों के और तथ्य सामने आ सकते हैं। 

वास्तव में अब जब यह साफ हो गया है कि किसान आंदोलन की आड़ में देश विरोधी शक्तियां भारत में हिंसा और अराजकता अलगाववाद पैदा करने का षड्यंत्र कर रहीं हैं तो फिर उनके भारतीय हाथों का पकड़ा जाना अपरिहार्य हो चुका है। यह राजनीतिक नहीं, देश की सुरक्षा, एकता अखंडता और संप्रभुता से जुड़ा मामला है। इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए थी। तो राजनीति को नजरअंदाज करते हुए पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को कार्रवाई जारी रखनी चाहिए। उन लोगों का चेहरा सामने आना जरूरी है जो ऐसी साजिशों में संलिप्त हैं। कठोर कार्रवाई से ही ऐसी शक्तियां हतोत्साहित होंगी और भारत के विरोध में सिर उठाने वाले कुछ करने के पहले सौ बार विचार करेंगे। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली रू110092, मोबाइल रू9811027208, 8178547992


शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

खोया तो चीन ने है हमने नहीं

अवधेश कुमार

चीनी सैनिकों का पूर्वी लद्दाख के इलाके में अपने पूर्व निर्धारित एवं मान्य स्थानों की ओर लौटने की सूचना निस्संदेह, तत्काल राहत देने वाली है। पिछले साल जून में गलवान घाटी में भारत के 20 जवानों की शहादत को कौन भारतीय भूल सकता है? उसके बाद पूरे देश में चीन के विरुद्ध आक्रोश का बना माहौल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यह ऐसी टीस है जो लंबे समय तक सालेगी और इसके गंभीर मायने हैं। हालांकि धोखे से किए गए बर्बर हमलों का भारतीय जवानों ने भी  मुंहतोड़ जवाब दिया था और सूचना यही है कि उनकी क्षति ज्यादा हुई। यह बात अलग है कि चीन जैसे बंद देश से वहां के मरने वालों जवानों के बारे में कोई खबर बाहर नहीं आ पाई। तनाव इतना बढ़ गया था कि अगस्त-सितंबर में 45 साल बाद भारत-चीन सीमा पर गोलियां चलीं। हालांकि इसकी पहली सूचना 10 फरबरी को चीन की ओर से ही आई। वहां के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव खत्म होने तथा सेना वापसी की औपचारिक जानकारी दी। किंतु भारत के लोगों के लिए इस पर विश्वास करना कठिन था क्योंकि इसके पहले कई बार सहमति होने के बावजूद चीन ने उसका पालन नहीं किया था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में सेनाओं के झड़प से पूर्व की स्थिति में जाने के समझौता होने की पुष्टि कर दी। 

बहरहाल, रक्षा मंत्री का यह कहना सही है कि इस समझौते से भारत ने कुछ नहीं खोया है। हालांकि भारत में अब रक्षा-सीमा सुरक्षा सहित विदेश नीति को लेकर भी राजनीतिक दल अपने बयानों और प्रतिक्रियाओं में संयम नहीं बरतते। यही कारण है कि रक्षा मंत्री द्वारा संसद में यह कहने के बावजूद कि हम किसी भी देश को अपनी एक इंच जमीन नहीं लेने देंगे सरकार के इरादे पर प्रश्न उठाया जा रहा है। समझौता के बाद दोनों देशों की जो टुकड़ियां एक-दूसरे के एकदम करीब तैनात थीं वहां से पीछे हटते हुए पूर्व स्थिति में जाएंगी। पैंगोग झील इलाके में चीन अपनी सेना की टुकड़ियों को उत्तरी किनारे में फिंगर 8 के पूरब की दिशा की तरफ रखेगा। मई के पूर्व वर्षों से यही स्थिति थी। भारतीय सेना फिंगर 3 के पास स्थित स्थायी धन सिंह थापा पोस्ट पर आ जाएगी। पेंगोंग झील के दक्षिण किनारे से भी दोनों सेनाएं इसी तरह की कार्रवाई करेंगी। हां, इसके समय का खुलासा अभी नहीं हुआ है। इसी तरह चीन ने 2020 में दक्षिण किनारे पर जो भी निर्माण किए हैं उन्हें हटाया जाएगा और पुरानी स्थिति कायम की जाएगी। दोनों देश पेंगोंग के उत्तरी इलाके पर पेट्रोलिंग को फिलहाल रोक देंगे। पेट्रोलिंग जैसी सैन्य गतिविधियां तभी शुरू होंगी जब राजनीतिक स्तर समझौता हो जाएगा। सीमा की गहरी समझ तथा चीन एवं भारत की सेनाओं की तैनात स्थिति को समझने वाले जानते हैं कि तत्काल इससे बेहरत समझौता नहीं हो सकता। 

ठीक है कि चीन ने समझौते में जो कहा वह करेगा ही यह निश्चयात्मकता के साथ कोई नहीं कह सकता। राजनाथ सिंह ने भी यही कहा कि उम्मीद है कि गतिरोध से पहले वाली स्थिति बहाल हो जाएगी। कोई नहीं कहता कि चीन के साथ सीमा तो छोड़िए वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी विवाद खत्म हो गया है। उस दिशा में यह पहला कदम है। रक्षा मंत्री ने भी अपने बयान में कहा कि एलएसी पर कुछ पुराने मसले बचे हुए हैं। आगे इस पर बात होगी। लेकिन अभी तो पूरा फोकस पूर्वी लद्दाख में चीन की धृष्टतापूर्ण कार्रवाइयों को खत्म कराने पर था और वही हुआ है। अगर चीनी सैनिक झील के उत्तरी तट पर फिंगर 8 के पूरब की तरफ लौट जाएंगे तथा अप्रैल 2020 के बाद झील के उत्तरी और दक्षिणी तटों पर बनाए गए किसी भी संरचना को नष्ट कर देगा तो फिर इसमें बचा क्या है? सच तो यह है कि चीन ने उत्तरी तट पर जो अग्रिम स्थिति यानी ऐडवांस पोजिशन हासिल किया था उसे छोड़ेगा। तो फिर खोया किसने इसका उत्तर आप आसानी से दे सकते हैं। वास्तव में गलवान की झड़प के बाद चीन ने बड़ी तादाद में इन इलाकों में जवानों को तैनात कर दिया था।  जवाब में हमने भी जबरदस्त तैनाती की और उसी का परिणाम है कि चीन को अपनी पूरी योजना बदलनी पड़ी है। सच तो यही है कि चीन कसमसाकर पीछे हटने को मजबूर हुआ है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों की पहचान कर हमारी सेनाएं तैनात हैं और इसी कारण भारत की बढ़त है।   

3,488 किलोमीटर लंबी भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा अधिकतर जगह जमीन से गुजरती है, मगर पूर्वी लद्दाख में आने वाली करीब 826 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा के लगभग बीच में पैंगोंग झील पड़ती है। यह एक लंबी, गहरी और लैंडलॉक्ड (जमीन से घिरी हुई) झील है। 14 हजार 270 फीट की ऊंचाई पर स्थित 134 किलोमीटर पेंगोंग झील लद्दाख से लेकर तिब्बत तक फैला हुआ है। 604 किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह झील कहीं-कहीं 6 किलोमीटर तक चौड़ी भी है। इसमें सम्पूर्ण रेखांकन संभव नहीं नहीं। झील के दो-तिहाई हिस्से पर चीन का नियंत्रण है और शेष भारत के हिस्से आता है।  यहां दोनों देश नावों से पेट्रोलिंग करते हैं। यह एक वीरान दुर्गम पहाड़ियों वाला इलाका है जिनके स्कंध निकले हुए हैं। इन्हें ही फिंगर एरिया कहा जाता है। ऐसे 8 फिंगर एरिया हैं, जहां भारत-चीन सेना की तैनाती है। भारत की नियंत्रण रेखा फिंगर 8 तक है लेकिन नियंत्रण फिंगर 4 तक ही रहा है। भारत की एक स्थायी चौकी फिंगर 3 के पास है। चीन की सीमा चौकी फिंगर 8 पर हैं लेकिन नियंत्रण रेखा के फिंगर 2 तक उनका दावा है। फिंगर 4 में एक समय उसने स्थायी सरंचना बनाने की कोशिश की थी जिसे जिसे भारत की कड़ी आपत्ति के बाद हटा लिया गया। भारत फिंगर 8 तक पैट्रोलिंग करता रहा है मगर यह पैट्रोलिंग पैदल होती है। पिछले साल मई में फिंगर 5 एरिया में दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। चीन ने अप्रैल-मई से ही फिंगर 4 तक अपनी सेना को तैनात कर रखा था। कहने की आवश्यकता नहीं कि चीन के जवाब में भारत ने भी चोटियों पर भारी संख्या में जवान तैनात कर दिए। 

जिस तरह के प्रश्न भारत में उठ रहे हैं वैसा चीन में नहीं उठ सकता। मूल बात है अपने देश की क्षमता को पहचानना और विश्वास करना। प्रमुख देशों ने भी पूर्वी लद्दाख से लगी नियंत्रण रेखा पर चीन से निपटने में भारत की दृढ़ता का लोहा माना है। चीन ने भी कल्पना नहीं की थी कि काफी विचार-विमर्श, योजना और सैन्य तैयारी से दिए गए धोखे के खिलाफ  भारत इस तरह डटकर मरने-मारने की अंतिम सीमा तक चला जाएगा। भारत ने जिस तरह सेना के सभी अंगों को सक्रिय किया, आकाश से लेकर धरती और पानी में जैसी जबरदस्त मोर्चाबंदी की उसकी उम्मीद दुनिया में किसी देश को नहीं थी। आज चीन की पूरी योजना जिसे हम साजिश मानते हैं, विफल हो चुकी है। भारत तो जवाब देने के लिए मजबूर था। उनको सबक देने के लिए जवाबी कार्रवाई में अपनी तैनाती की। वे हट जाएं तो हमें वापस पूर्व स्थिति में जाना ही है। वे बात चाहते थे लेकिन भारत ने स्पष्ट किया कि पूर्व स्थिति बहाल होने के 48 घंटे के अंदर फिर बातचीत शुरु होगी और उन्हें मानना पड़ा। बतचीत में भी भारत ने स्पष्ट किया कि समस्याओं का समाधान तीन आधारों पर हो सकता है।  एक, दोनों देश नियंत्रण रेखा को मानें और उसका आदर करें। यानी गलवान का अपराध और विश्वासघात दोबारा न हो। दो, कोई भी देश वर्तमान स्थिति बदलने की एकतरफा कोशिश न करे। तथा तीन, दोनों देश सभी समझौतों को पूरी तरह मानें और पालन करें। 

वास्तव में भारत ने चीन के साथ सीमा व्यवहार में डोकलाम के समय से गलवान तक जिस तरह का कूटनीतिक, सैन्य और राजनीतिक आत्मविश्वासपूर्ण व्यवहार किया है उसने विश्व के बड़े-बड़े रक्षा विश्लेषकों को हैरत में डाल दिया। चीन को भी भारत के साथ सीमा और सैन्य व्यवहार पर अपनी पूरी रणनीति नए सिरे से बनाने को विवश होना पड़ रहा है। वर्तमान समझौता उसी की परिणति है। इसमें खोने के लिए केवल चीन के पास ही कुछ था। चीन के साथ सीमा विवाद इतिहास की भूलों की देन है। चीन जैसा दुष्ट राष्ट्र कभी इसे सुलझाना नहीं चाहता, क्योंकि वह लाभ की स्थिति में है। 1962 के युद्ध का एकतरफा अंत उसने अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद कर दी। उसका राष्ट्रीय लक्ष्य हर मायने में विश्व का सर्वशक्तिमान और सर्वाधिक प्रभाव विस्तार वाला देश बनना है। वह जो कुछ कर रहा है उसी लक्ष्य के अनुरुप। भारत के लिए आवश्यक है कि हम राजनीतिक मतभेद को परे रखकर उसके लक्ष्य को समझते हुए अपनी रक्षानीति के साथ कूटनीति की जवाबी तैयारियों और कार्रवाइयों के प्रति एकजुटता दिखाएं। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइल-9811027208, 8178547992


बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

भविष्य में याद किया जाएगा इस बजट को

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए गुरु रविंद्र नाथ टैगोर की यह पंक्ति सुनाई- उम्मीद ऐसी चिड़िया है जो अंधेरे में भी चहचहाती है। पूरे वर्ष में कोरोना के संकट ने जिस ढंग से दुनिया सहित भारत की अर्थव्यवस्था को धक्का पहुंचाया उसके कारण समाज के हर तबके के मनोविज्ञान में चिंता और निराशा सघन हुई। इन परिस्थितियों में बजट ऐसा चाहिए था जो लोगों के अंदर उनके और संपूर्ण देश के बेहतर भविष्य की उम्मीद पैदा करे, देश के समक्ष समस्याएं और चुनौतियां जितनी गहरी है उनका वास्तविक मूल्यांकन कर उनसे निपटने और सामना करने के लिए साहसपूर्ण व्यावहारिक प्रभावी कदम उठाने का जोखिम ले...। क्या मोदी 2 सरकार के इस दूसरे बजट को हम इस कसौटी पर खरा पा सकते है? तीन दिनों पूर्व संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने बजट की दिशा का संकेत दे दिया था। साफ था गरीबों,किसानों के कल्याण, आम आदमी के जेब में खरीद के लिए धन आने, विकास के पथ पर सरपट दौड़ने का रास्ता तैयार करने और साहस के साथ जोखिम भरे सुधार सरकार के मूल लक्ष्य होंगे। 

इस समय कृषि कानून के विरोध में राजधानी में किसान संगठनों का एक आंदोलन चल रहा है। बड़े वर्ग का ध्यान इस ओर रहा होगा कि कृषि और किसानों से संबंधित क्या घोषणाएं होती हैं। विस्तार से समस्त प्रावधानों का यहां उल्लेख संभव नहीं है, लेकिन कृषि और ग्रामीण आधारभूत संरचना,कृषि के लिए कर्ज की राशि, फसलों के न्यूनतम मूल्य, कृषि से संबंधित उद्योगों को प्रोत्साहित करने, नष्ट होने वाले 22 फसलों को ऑपरेश ग्रीन में शामिल करने आदि बातें निश्चय ही आकर्षक हैं। यह पहली बार है जब कृषि आधारभूत संरचना के धन का उपयोग कृषि उत्पाद बाजार समिति यानी एपीएमसी के लिए भी किया जा सकेगा। जो लोग मंडियों को खत्म किए जाने की साजिश का आरोप लगा रहे थे उनको कम से कम तत्काल तो उत्तर मिल गया होगा। वैसे गांव कृषि और किसान को हम संपूर्ण व्यवस्था से अलग करके नहीं देख सकते। इसी तरह समाज और अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण हिस्सों को गांव, गरीब, किसानों से अलग नहीं कर करते। संतुलित बजट वही माना जाएगा जब समाज, अर्थ और व्यवस्था से जुड़े सभी पहलुओं को आवश्यकता, उपादेयता, अनुपात के अनुसार स्थान दिया जाए। राजनीति को अलग करके विचार करें तो यह स्वीकार करना होगा कि सीतारमण का बजट इन मायनों में संतुलित  है। 

यह पहले से साफ था कि स्वास्थ्य को पूरी तरह भारतीय परंपराओं को भी सशक्त करते हुए विश्वस्तरीय बना देने के लिए सारे पहलुओं को समेटे हुए व्यापक योजना और प्रावधान होंगे। स्वास्थ्य का कुल बजट 2 लाख 23000 करोड़ है। यानी आवंटन रिकॉर्ड 137 प्रतिशत बढ़ा है। इसमें 64,180 करोड़ रुपए के बजट के साथ प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना शुरू होगी। इस कार्यक्रम के अर्थ से ही स्पष्ट है कि इसका लक्ष्य क्या है। 70 हजार गांवों के वेलनेस सेंटर्स को इससे मदद मिलेगी। 602 जिलों में क्रिटिकल केयर अस्पताल शुरू होंगे। नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल या राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र को मजबूत किया जाएगा। इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन पोर्टल शुरू किया जाएगा ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं या पब्लिक हेल्थ लैब्स को कनेक्ट कर सकें। 15 हेल्थ इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर्स शुरू किए जाएंगे, नौ बायो सेफ्टी लेवल लैब शुरू होंगी। बजट में गांव से शहर तक स्वास्थ्य ढांचे को ऐसा बना देने का लक्ष्य है जिसमें सबको उचित इलाज और स्वस्थ रहने का आधार उपलब्ध हो सके। इस नाते भी यह बजट ऐतिहासिक है। 

 विकसित देशों की कतार में खड़े होने के लिए भारत हर क्षेत्र से जुड़े आधारभूत ढांचा को वैश्विक स्तर पर लाना अपरिहार्य है। इस पर पहले भी फोकस हुआ है। मोदी सरकार ने आरंभ से ही इसकी पूरी कोशिश की है। पिछले बजट में 110 लाख करोड़ रुपये पांच वर्षों में खर्च की घोषणा हुई थी। कोरोना आघात से बाहर निकलने का संकेत देते हुए इस बजट में ऐसे प्रावधान हैं जिनसे 2020 की भी भरपाई हो जाए। 1.10 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड आवंटन तो केवल रेलवे के लिए हैं। भारतमाला परियोजना के लिए 3.3 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। रेलवे ने राष्ट्रीय रेल योजना 2030 बनाया है ताकि भविष्य के लिए पूरी तरह तैयार रेल प्रणाली बनाई जा सके। मार्ग आधारभूत संरचना के लिए आर्थिक गलियारे बनाए जाएंगे। सड़क परियोजनाओं को चुनावी राजनीति का तोहफा बताना आसान है। लेकिन क्या इसकी आवश्यकता नहीं थी? बंगाल में 25 हजार करोड़ रुपए से हाईवे का निर्माण , 34 हजार करोड़ रुपए असम में नेशनल हाईवेज पर, 65 हजार करोड़ रुपए से केरल में 1100 किमी नेशनल हाईवे  का निर्माण आदि को चुनावी जनरिए से देखा जा सकता है। किंतु तमिलनाडु में तो भाजपा बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं कर रही होगी। वहां भी 3500 किमी नेशनल हाईवेज परियोजना के तहत 1.03 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा है। इसे देश की आवश्यक आधारभूत संरचना को वर्तमान एवं भविष्य के अनुरुप सशक्त करने की दृष्टि से देखना उचित होगा। आधारभूत ढांच के क्षेत्र में केवल निर्माण और विस्तारों की ही घोषणाएं नहीं है। डेवलपमेंट फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट यानी विकास वित्तीय संस्थान की जरूरत बताते हुए एक विधेयक लाने की घोषणा है। सार्वजनिक आधारभूत ढांचा के मुद्रीकरण पर ध्यान देने की घोषण है। इसके लिए नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन शुरू होगी। इसका एक डैशबोर्ड बनेगा ताकि इस मामले में हो रही तरक्की को देखा जा सके। 

निस्संदेह, कोई भी बजट सबको संतुष्ट नहीं कर सकता। पर जरा दूसरे नजरिए से देखिए। ऐेसे संकट के काल में 34.83 लाख करोड़ का बजट असाधारण साहस का परिचय देने वाला है। आप कोरोना काल में वित्त मंत्री द्वारा घोषित तीन पैकेजों, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना तथा रिजर्व बैंक की योजना को मिला दीजिए तो 20 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि सरकार पहले ही दे चुकी है। इनको साथ मिलाकर देखिए और राजनीतिक नजरिए से परे होकर विचार करिए। चीन ने सीमा पर और उसके परे भारत के अंतरराष्ट्ीय-क्षेत्रीय रक्षा हितों के समक्ष जो चुनौतियां पेश कर दीं हैं उसमें भारत के पास रक्षा व्यवस्था को किसी स्थिति से निपटने के लिए कमर कसने के अलावा कोई चारा नहीं था। 4 लाख 78 हजार करोड़ की राशि का आवंटन करना पड़ा है। अगर सबके सिर से बोझ कम कर दिया जाए तो धन आएगा कहां से? विदेशी निवेश के लिए भी आपको पूरा ढांचा उपलब्ध कराना ही होगा और इसकी पूरी कोशिश बजट में है। हम न भूलें कि किसी के सिर पर करों का बोझ बढ़ाया नहीं गया है।

 कई लोग अलग-अलग विषय उठाकर बजट की हमेशा आलोचना करते हैं। बजट को समग्रता में देखने से ही आप सही निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं, खंड-खंड में विचार करने से नहीं। उदाहरण के लिए जो पूछ रहे हैं कि इसमें रोजगार के लिए क्या किया गया है उनको ध्यान रखना चाहिए कि आधारभूत संरचना के जितनी परियोजनाएं हैं , ग्रामीण आधारभूत संरंचना या शहरी, स्वच्छ जल मिशन, मिशन पोषण कार्यक्रम, शिक्षा क्षेत्र के कदम... सबमें बिना घोषणा के करोड़ों रोजगार के अवसर पैदा होंगे।स्वास्थ्य मूल राज्यों का विषय है लेकिन पूरी योजना साकार हुई तो स्वास्थ्य क्षेत्र की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। देश का कौन सा वर्ग और क्षेत्र इसमें समाहित नहीं होगा? इसमें कितने लोगों को रोजगार मिलेगा जरा इसकी कल्पना करें। आर्थिक विकास में इसका सतत स्थायी योगदान होगा। अर्थव्यवस्था आम मनुष्य के जीवन से अलग हटके नहीं हो सकती । व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र बनता है। इसलिए राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का आधार और उसकी दिशा भी बजट में दिखाई देनी चाहिए। आप ध्यान देंगे तो 100 सैनिक विद्यालय खोलने की ऐतिहासिक घोषणा इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आने वाली पीढ़ी को अनुशासित, मानसिक रूप से संतुलित व देश के लिए समर्पित संस्कारों से ओतप्रोत करने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। आज इसका महत्व समझ में नहीं आए लेकिन भविष्य में जब इसके योगदान का मूल्यांकन होगा तो निश्चित रूप से 2021-22 के बजट को याद किया जाएगा। इसी तरह राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद की योजना है। अन्य भाषाओं की पुस्तकों का हिंदी में, हिंदी की पुस्तकों का अन्य भाषाओं में, अन्य भाषाओं की पुस्तकों का भी दूसरी अन्य भाषाओं में होने से संपूर्ण देश में पढ़ने लिखने वाले लोगएक दूसरे की सभ्यता संस्कृति से परिचित होंगे। इससे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में एकता का पुनर्जागरण होगा । यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक आधार भूमि बन सकती है। इसी तरह उच्च शिक्षा के लिए आयोग, केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना, हजारों विद्यालयों का उन्नतिकरण, आदिवासियों के लिए और एकलव्य विद्यालयों की स्थापना एवं उन्नतिकरण, आदिवासी छात्रों की छात्रवृत्ति का नए सिरे से रचना, अनुसंधान एवं अन्वेषण के लिए मोटी राशि और व्यवस्थाएं आदि भविष्य में महाशक्ति की भूमिका निभाने के लिए भारतीय प्रतिभा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। 

इस तरह कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट के काल में आघात पहुंची अर्थव्यवस्था को, निराश-उदास-हताश भारतीय मानस को तथा भारत को लेकर दुनिया की धारणा को फिर से उम्मीद, विश्वास और सकारात्मक लक्ष्यों की पटरी पर दौड़ाने की दृष्टि से यह बजट याद किया जाएगा। 

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